शिमला।। बिना प्लैनिंग, बिना पैसे के स्कूल खोल दिए जाने के कारण हिमाचल प्रदेश में शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट देखने को मिल रही है। आप यह जानकर हैरान होंगे कि बहुत कम छात्रों वाले स्कूलों से इतर कुछ स्कूल ऐसे भी हैं जहां एक ही क्लासरूम है। यह स्थिति प्रदेश के एक नहीं बल्कि कई ज़िलों में हैं।
जो स्कूल एक ही कमरे के दम पर चल रहे हैं, उनमें प्राइमरी और मिडल स्कूल दोनों शामिल हैं। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यू-डाइस) की रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। अकादमिक सत्र 2018-19 के दौरान 30 सितंबर 2018 तक इकट्ठा किए गए डेटा के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है।
प्राइमरी स्कूल
रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश में कुल 10,623 प्राइमरी स्कूलों में से 441 ऐसे हैं जहां एक ही क्लासरूम है। 3,022 प्राइमरी स्कूलों में मात्र दो क्लासरूम हैं, 3,973 प्राइमरी स्कूल ऐसे हैं जहां तीन क्लासरूम हैं जबकि 3,036 स्कूलों के पास 4-6 क्लासरूम हैं।
पहली से पाँचवीं तक की कक्षाओं में कम से कम पाँच क्लासरूम तो होने चाहिए। अध्यापकों के लिए दफ़्तर, लाइब्रेरी और खेल के सामान व स्टोर की व्यवस्था अलग से होनी चाहिए। मगर ऊपर की स्थिति बताती है कि कैसे शिक्षा को रामभरोसे छोड़ा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश भर के चार स्कूल तो ऐसे हैं जो बिना क्लासरूम ही चल रहे हैं। मात्र 140 प्राइमरी स्कूलों में 7 से 10 क्लासरूम हैं और सिर्फ़ 7 प्राइमरी स्कूलों में 11 से 15 क्लास रूम मौजूद हैं।
मिडल स्कूलों की स्थिति भी ख़राब
रिपोर्ट कहती है कि हिमाचल प्रदेश में कुल 1,969 मिडल स्कूलों में 4 स्कूल ऐसे हैं जो बिना क्लासरूम के चल रहे हैं। 263 स्कूल एक क्लासरूम के सहारे चल रहे हैं। 244 मिडल स्कूलों में 2 क्लासरूम, 1126 मिडल स्कूलों में 3 क्लासरूम जबकि 314 मिडल स्कूलों में 4 से 6 क्लासरूम मौजूद हैं। 18 मिडल स्कूल ही ऐसे हैं जहां पर 7 से 10 क्लासरूम मौजूद हैं।
जब बुनियादी इन्फ़्रास्ट्रक्चर नहीं है तो कौन अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएगा। अध्यापकों की कमी से तो कई स्कूल पहले से ही जूझ रहे हैं।
कोलकाता।। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा पहली बार ‘अल्पसंख्यक कट्टरता’ का ज़िक्र करना चर्चा में आ गया है। उन्होंने लोगों को इससे सचेत रहने के लिए कहा है।
पश्चिम बंगाल के कूच बिहार इलाक़े में उन्होंने इसका ज़िक्र किया और नाम लिए बग़ैर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को भी निशाने पर लिया।
कूचबिहार में पार्टी के कार्यकर्ताओं की बैठक के दौरान ममता बनर्जी ने कहा, “मैं देख रही हूं कि अल्पसंख्यकों के बीच कई कट्टरपंथी हैं। इनका ठिकाना हैदराबाद में है। आप लोग इन पर ध्यान मत दें।”
इस बीच ममता बनर्जी कूचबिहार में मदनमोहन मंदिर भी गईं। इसके बाद वह रासमेला भी गईं जो राजबाड़ी ग्राउंड में हो रहा था।
ममता बनर्जी के रुख़ में बदलाव को कूच बिहार इलाके में हिंदू वोटरों को साधने के तौर पर देखा जा रहा है। यहाँ पर हिंदू मतदाता बड़ी संख्या में हैं।
शिमला।। सोमवार को हिमाचल प्रदेश सरकार ने हाई कोर्ट को बताया कि उसने सरकाघाट में बुजुर्ग महिला से बदसलूकी करने के मामले में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई है।
इस बुजुर्ग महिला को कुछ दिन पहले देवता के नाम पर गांव के ही लोगों ने डायन कहकर जादू-टोना करने का आरोप लगाया था। महिला के चेहरे पर कालिख पोती गई थी और जूतों की माला पहनाकर घुमाया गया था।
अब हिमाचल प्रदेश सरकार ने कहा है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए एसआईटी बनाई गई है। कोर्ट को बताया गया कि इस संबंध में पुलिस स्टेशन में नौ नवंबर को एफआईआऱ दर्ज की गई है। मामले की सुनवाई करते हुए चीफ़ जस्टिस एल नारायण स्वामी और जस्टिस ज्योत्सना रेवाल दुआ की बेंच ने राज्य सरकार को मामले में छह हफ़्तों के अंदर ताज़ा स्टेटस रिपोर्ट फाइल करने को कहा।
कोर्ट ने इस मामले में अख़बारों में छपी ख़बरों पर स्वतः संज्ञान लिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि मामले में आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया है और जाँच की निगरानी ख़ुद मंडी के एसपी कर रहे हैं। कोर्ट अब मामले की अगली सुनवाई के लिए जनवरी के दूसरे हफ़्ते में करेगा।
एमबीएम न्यूज, मंडी।। सरकाघाट में बजुर्ग महिला के साथ देवता के नाम पर बदसलूकी करने के मामले में एसएचओ सरकाघाट और हेड कॉन्स्टेबल को लाइन हाजिर किया गया है। मंडी के एसपी गुरदेव शर्मा ने शुक्रवार देर शाम दोनों को सरकाघाट थाने से हटाकर पुलिस लाइन में हाजिर होने का आदेश जारी किया। ग़ौरतलब है कि इस पूरे मामले में पुलिस की काम करने के तरीक़े पर सवाल उठ रहे थे।
बुजुर्ग महिला को पीटने और चेहरा काला करके जूते की माला पहनाकर घुमाने का मामला सामने आने के बाद रिटायर्ड अध्यापक गोपाल भी सामने आए थे जिन्होंने कहा था कि कुछ दिन पहले उनके साथ भी देवता के नाम पर दुर्व्यवहार किया गया था। अब एक और मामला सामने आया है जिसमें एक बुजुर्ग महिला ने आरोप लगाया है कि देवता की पुजारिन ने लोगों को उनके मुँह पर थूकने का आदेश दिया।
यानी इस तरह की घटनाएँ गाँव में पहले भी हो रही थीं और आशंका जताई जा रही है कि कुछ और लोगों के साथ भी ऐसा दुर्व्यवहार हुआ हो मगर वे डर के कारण सामने न आ रहे हों। इस बीच पुलिस ने एएसपी पुनीत रघु की अध्यक्षता में एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी का गठन भी किया जो जाँच पूरी करके एसपी को सौंपेगी।
एसएचओ पर सवाल
बड़ा समाहल गांव निवासी जय गोपाल को देवता के नाम पर प्रताड़ित किया गया था तो उनकी शिकायत पर सरकाघाट के एसएचओ सतीश शर्मा खुद मौके पर गए थे। इसके बाद जय गोपाल ने अपनी शिकायत वापिस ले ली थी। लेकिन गोपाल का आरोप है कि उन्हें एसएचओ के समक्ष भी प्रताड़ित किया गया लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई अमल में नहीं लाई।
वहीं हैड कांस्टेबल भव देव को उस वक्त जांच के लिए भेजा गया था जब इलाके में बुजुर्ग के साथ क्रूरता की खबर फैली थी। उस वक्त भी सही ढंग से जांच न होने के कारण पुलिस को मामले का पता ही नहीं चल पाया था। यह तो वीडियो वायरल होने के बाद सारा मामला ध्यान में आया।
एसपी गुरदेव शर्मा ने बताया कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए एसएचओ सरकाघाट सतीश शर्मा और हैड कांस्टेबल भव देव को लाईन हाजिर कर दिया गया है। अगले आदेशों तक सब इंस्पेक्टर राज कुमार सरकाघाट थाने के प्रभारी होंगे।
धर्मशाला।। सांसद बनने के बाद किशन कपूर हिमाचल प्रदेश के मीडिया की सुर्खियों से गायब से हो गए हैं लेकिन एक बार फिर उन्होंने विवाद खड़ा कर दिया है। शुक्रवार को फतेहपुर विधानसभा क्षेत्र आए कपूर पत्रकारों से भिड़ गए। राष्ट्रीय प्रेस दिवस से एक दिन पहले उन्होंने गुस्से में मीडिया कर्मियों से साफ-साफ कहा कि आपने मेरे खिलाफ बहुत खबरें छापीं, मेरा क्या बिगाड़ लिया, मैं तो सांसद बन गया।
कपूर ने कहा, “लोगों ने 72.2 फीसदी वोट देकर सांसद बनाया। फतेहपुर से ही 31 हजार 500 की लीड मिली है। देश व प्रदेश की सरकार बढ़िया काम कर रही है, वो खबरें छापो।”
फतेहपुर में पत्रकारों पर बरसे कांगड़ा के सांसद किशन कपूर, बोले- "आपने मेरे खिलाफ खबरें छापकर क्या बिगाड़ लिया, मैं तो सांसद बन गया।" और क्या कहा, देखें।
In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಶುಕ್ರವಾರ, ನವೆಂಬರ್ 15, 2019
हालांकि ध्यान देने वाली बात है कि बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कांगड़ा के प्रत्याशी को जिताने के लिए अजीब अपील करनी पड़ी थी।
वैसे तो बीजेपी ने चुनाव ही पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा था मगर कहीं भी किसी नेता ने यह नहीं कहा था कि प्रत्याशी के बजाय सीधे पीएम को वोट दो। उस समय विश्लेषकों का कहना था कि किशन कपूर को लेकर स्वीकार्यता कम होने के कारण अमित शाह को मोदी के नाम पर खुलकर वोट मांगने पड़े थे।
शुक्रवार को फ़तेहपुर में किशन कपूर ने यहां तक कह दिया कि मैंने जो बोलना था बोल दिया। आपने जो इफ एंड बट निकालना है निकाल लेना, मैं चिंता नहीं करता हूं।
उनका गुस्सा यहीं नहीं थमा और उन्होंने कहा, “आपने बड़ी खबरें छापीं, पता नहीं इसका क्या कर लेंगे। कोई किसी का कत्ल नहीं कर सकता, आदमी एक पानी की बूंद और रेत के कण को खत्म नहीं कर सकता है।”
पत्रकार आदर्श राठौर के ब्लॉग से साभार।। मंडी के सरकाघाट में जादू-टोना करने का आरोप लगाकर वृद्ध महिला की पिटाई करने की घटना आजकल पूरे हिमाचल में छाई हुई है। वैसे तो हर कोई इस घटना की आलोचना कर रहा है मगर इस बारे में कोई विचार नहीं कर रहा कि ये घटना आख़िर हुई क्यों और दोबारा ऐसा न हो, इसके लिए क्या करना चाहिए।
पुलिस ने भी कुछ लोगों को गिरफ्तार कर दिया मगर किसी के मन में ये ख़्याल नहीं आया कि इस मामले में पुजारिन से लेकर उसके आदेशों को ज़ॉम्बी बनकर फ़ॉलो करने वाले लोगों को अच्छे मनोचिकित्सक को दिखाया जाए, उनकी काउंसलिंग की जाए ताकि ‘देवता के आदेश’ के नाम का फ़ितूर उनके दिमाग़ से निकाला जा सके।
आज मैं देखता हूँ कि गाँव-गांव में किसी प्राचीन और लोकप्रिय देवता के नाम पर नए मंदिर खुल रहे हैं, नए देवरथ (पालकियाँ) बन गई हैं और उनके चेले या गूर लोगों की समस्याओं का इलाज करने के नाम पर ज़हर फैला रहे हैं। इनमें आधे से ज़्यादा लोग किसी न किसी मानसिक समस्या के कारण यह भ्रम पाल बैठे हैं कि उनके ऊपर किसी देवता की कृपा हो गई है और वह देवता उनके माध्यम से संवाद करता है।
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो जानबूझकर नाटक करते हैं और अपने ऊपर देवता की कृपा होने का प्रचार करते हैं ताकि उसके नाम पर अपनी दुकान चला सकें। मैदानी इलाक़ों में कुछ लोग फ़र्ज़ी पालकी बनाकर सड़क किनारे बैठ जाते हैं या फिर वाहनों को रोककर उनसे पैसे एंठते है।
पाखंडियों की हिम्मत बढ़ाता है हमारा डर
हममें से बहुत सारे लोग इस विषय पर बात करने से बचते हैं क्योंकि अभी हमारे अंदर से अंधविश्वास गया नहीं है। हम जगह-जगह दुकान चला रहे पाखंडी पुजारियों के ढोंग और उनके ‘खेलने’ या दैवी शक्ति के आधार पर लोगों के प्रश्नों के जवाब देने के पाखंड पर इसलिए सवाल नहीं उठाते क्योंकि डरते हैं कि…
वाक़ई देवता नाराज़ न हो जाए या फिर देवता में आस्था रखने वाले हमारे अपने न ख़फ़ा हो जाए।
एक देवता और उसके पुजारी के पाखंड पर सवाल उठाया तो पूरी देव परंपरा पर ही प्रश्न चिह्न लग जाएगा।
देव परंपरा हमारी संस्कृति का हिस्सा है और हम इसी को देखते हुए, इसी को मानते हुए बड़े हुए है। ऐसे में ऊपर वाली बातों का डर हमें लॉजिकल होने से रोकता है। और इसी कारण उन नए-नए ‘चेलों’ को बढ़ावा मिल रहा है जिन्हें वास्तव में अच्छे मनोचिकित्सक की ज़रूरत है।
हिस्टीरिया और साइकोसिस का ‘खेल’
1950 के आसपास जब राहुल सांकृत्यायन हिमाचल के दौरे पर आए थे, तब उन्होंने देव परंपरा को लेकर अनुमान लगाया था कि जैसे-जैसे स्वतंत्र भारत में शिक्षा का प्रचार होगा, यह परंपरा ख़त्म हो जाएगी। मगर हुआ इसका उल्टा। गाँव-गांव में कुकुरमुत्तों की तरह तथाकथित ‘पुजारी’ पैदा होने लगे हैं और देवताओं के नाम पर बड़ा कारोबार खड़ा हो गया है।
ये सब हिस्टीरिया का परिणाम है और हिस्टीरिया ऐसी चीज है जो बढ़ती चली जाती है। उदाहरण के लिए चोटी जाने की एक ख़बर को किसी मीडिया ने क्या दिखाया, पूरे देश में चोटी कटने की ख़बर आने लगी। ठीक इसी तरह से स्थापित देवताओं के नाम पर कई मंदिर खुले हैं। अगर कोई एक शख़्स हिस्टीरिया का शिकार होकर ट्रांस में जाकर (ज़िसे ‘खेलना’ कहते हैं हिमाचल में) देवता के तौर पर बात करता है तो हमारा समाज तुरंत मान लेता है कि उस बंदे में फलां देवता या देवी आई है।
एक बार ख़बर फैलती है तो फिर उसका रुकना मुश्किल है। फिर कुछ लोग जो कई परेशानियों से जूझ रहे होते हैं, मानसिक रूप से अस्वस्थ होने के कारण अजीब हरकतें करने वाले अपने रिश्तेदारों को भूत की गिरफ़्त में आया मानकर ऐसे मंदिरों में ले जाने लगते हैं। फिर शुरू होता है महापाखंड का सिलसिला जिसका कोई वैज्ञानिक आधार है। ये हॉरर फ़िल्मों में दिखने वाले एक्सॉरसिज़म जैसा होता है।
जो लोग, ख़ासकर बच्चे, इस नज़ारे को देखते हैं, उनके सबकॉन्शस माइंड या अवचेतन मन में डर बैठ जाता है और पूरी आशंका पैदा हो जाती है कि कल को किसी परेशानी के दौरान उनका दिमाग़ भी ऐसा ही व्यवहार करने लगे। वे भी कल को भूत या देवता के प्रभाव में होने का दावा करके अजीब हरकतें कर सकते हैं। आज जो अचानक चेले बन रहे हैं, बहुत संभव है कि ऐसी किसी घटना को देखने से मन में बैठे डर के कारण उनकी मानसिक स्थिति ऐसी हुई हो। और इस मानसिक समस्या (Psychosis) के साथ दिक़्क़त यह है कि इसमें आदमी को पता नहीं चलता कि वह क्या करता है। वह वास्तविकता से पूरी तरह कट जाता है।
प्रतीकात्मक तस्वीर
पाखंडियों के आगे नतमस्तक है सिस्टम
अफ़सोस कि डॉक्टरी सहायता के ज़रूरतमंद इन मानसिक रोगियों और कुछ जानबूझकर नाटक कर रहे ढोंगियों को हमारी सरकारें ही संरक्षण दे रही हैं। सरकारें जानती है कि देवताओं के नाम पर दुकानें चल रही हैं और ये लोग समाज का सत्यानाश कर रहे हैं। इन्हें रोकने के लिए कोई कदम उठाना तो दूर की बात है, उल्टा बढ़ावा दिया जा रहा है। हिमाचल में कई सारे मेले होते हैं। मेलों में बहुत सारे ‘पुजारियों’ के ‘देवरथों’ को बुलाया जाता है और उनके साथ आने वालों को सरकारी खर्च पर ठहराने का इंतज़ाम किया जाता है, उनके लिए ‘नज़राने’ के तौर पर कुछ रक़म भी दी जाती है। लेकिन सवाल उठता है कि इन देवताओं को न्योता देने का आधार क्या है?
संस्कृति के संरक्षण के लिए होने वाले मेलों में उन प्राचीन मंदिरों वाले स्थापित देवताओं को बुलाना तो समझ आता है, जो कई सदियों, कई पीढ़ियों से आस्था के केंद्र में रहे हैं। ऐसे देवता गिने-चुने ही हैं। मगर हिस्टीरिया के शिकार मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों द्वारा खुद पर देवकृपा मान लेने से बना दिए नए-नए रथों को भी जगह देना क्या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है? जबकि वहम के शिकार इन लोगों को इलाज की ज़रूरत होती है। ठीक शिमला के ठियोग वाले मामले की तरह जहां कुछ बच्चे ख़ुद को शिव का अवतार बता रहे थे और उनके यहाँ चमत्कार की उम्मीद में आने वाले लोगों का ताँता लग गया था। जब उन बच्चों को मनोचिकित्सक से मिलवाया गया तो उनका फ़ितूर ठीक हो गया। अगर समय पर प्रशासन न जागता तो वहाँ भी देवरथ बन गया होता।
कुछ सालो से रिवाज चल गया है कि अगर किसी को वहम हो गया कि उसके ऊपर देवता आ गया है तो वह कुछ ही दिनों में उसकी पालकी या रथ तैयार कर देता है। पॉप्युलर देवताओं के नए रथ तो बने ही हैं, ऐसे-ऐसे देवताओं के भी रथ बन गए हैं जो हिमाचल की प्राचीन देव संस्कृति से मेल नहीं खाते। उदाहरण के लिए संतोषी माता का देवरथ। संतोषी माता का किसी प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथ में ज़िक्र नहीं। मगर 60-70 के दशक में कुछ लोग देखादेखी में संतोषी माता के नाम पर कार्ड भेजने लगे, फिर फ़िल्में बनीं संतोषी माता पर और देशभर में (ख़ासकर, उत्तर भारत) में संतोषी माता के मंदिर बनने लगे। अब तो किसी संतोषी माता का भी रथ बना दिया है जो मेलों में आपको दिख सकता है।
इसी तरह जब शनि देवता को एक टीवी चैनल पर आने वाले बाबा ने पॉप्युलर किया तो आजकल शनि मंदिरों की देश में (हिमाचल में भी) बाढ़ आ गई है। पहले शनि देव का नाम तक कोई नहीं लेता था। और तो और, अब उनके नाम पर भी देवरथ बन रहे हैं। कल को मानसिक रूप से अस्वस्थ कोई व्यक्ति चाट-पकौड़े खिलाने वाले निर्मल बाबा का भी देवरथ बना देगा और हमारे मंत्री, विधायक, डीसी, एसडीएम किसी मेले में उसी फर्जी रथ की आरती उतार रहे होंगे। इसी का फर्जी पुजारी भूत-प्रेत, जादू-टोने के नाम पर समाज में जहर घोल रहे होगा। हो भी ऐसा ही रहा है।
संस्कृति और बीमारी का फ़र्क़ समझे सरकार
इन नए-नए ‘देवता’ के फ़र्ज़ी पुजारियों को ढंग से मानसिक इलाज मिले तो वे ठीक हो सकते हैं। मगर इसके लिए प्रदेश में अच्छे मनोचिकित्सक होने चाहिए, अच्छे अस्पताल होने चाहिए। साथ ही सरकारों के पास परंपरा और अंधविश्वास के बीच की लाइन को गहरा करने की हिम्मत होनी चाहिए। अगर सरकारें स्टैंड लें और अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम छेड़े तो सब ठीक हो सकता है। उसे रेडियो, अख़बार, पोस्टर, बैनर के ज़रिए मुहिम चलानी होगी कि भूत-प्रेत आना और देवता आना कुछ नहीं होता, यह सब मानसिक विकार हैं और समय पर इलाज करवाने पर आप ठीक हो सकते हैं। मगर मानसिक स्वास्थ्य की ओर सरकारों का बिल्कुल ध्यान नहीं है।
दिमाग आदमी के शरीर का सबसे अहम अंग है लेकिन उसके इलाज के लिए हमारे पास अस्पताल और डॉक्टर नहीं। नतीजा- डिप्रेशन में आए शख्स को भी लोग ‘ओपरी कसर’ का शिकार मानकर किसी पुजारी या चेले के पास ले जाते हैं। झाड़-फूंक में पैसे तो बर्बाद होते ही हैं, मानसिक बीमारी भी बढ़ जाती है। फिर बहुत से लोग बाद में चिल्लाते फिरते हैं कि इलाज के नाम पर हमारी पिटाई हुई, बकरा माँगकर हमारा शोषण किया।
ऐसे मामलों में सरकारें और प्रशासन दखल ही नहीं देना चाहता। जैसे कि जानकारी आई है कि पुलिस ने सरकाघाट वाले मामले में सुस्ती बरती क्योंकि मामला देवता से जुड़ा था। बाद में मंडी के डीसी ने भी सरकाघाट मामले में सख़्त स्टैंड नहीं लिया। बल्कि उन्हें देव परंपरा की चिंता ज़्यादा दिखी और कहा- देव समाज ने कहा है कि ये घटना देवता के प्रभाव के कारण नहीं हुई।
देवता के प्रभाव के कारण हुई हो या न हुई हो, अथॉरिटी आप हैं या देव समाज? देव समाज क्या कोई आधिकारिक वैज्ञानिक या संवैधानिक संस्था है? और देवताओं के नाम पर बने मंचों पर आपको इतना यक़ीन क्यों है? ऐसे संगठनों के लोग देवता के नाम पर होने वाली भयंकर छुआछूत और भेदभाव को खत्म करने की दिशा में कदम क्यों नहीं उठाते। इन्होंने कुछ किया होता आज आंतरिक इलाकों से देवता का डर दिखाकर शोषण की घटनाएं सामने न आतीं। ये संगठन अच्छी भूमिका निभा सकते हैं, मगर इसके बारे में आगे बात करेंगे।
प्रतीकात्मक तस्वीर
हल क्या है शायद किसी नेता में हिम्मत नहीं कि इस दिशा में सुधारवादी कदम उठाए। क्योंकि कुछ नेता तो इन देवताओं का डर दिखाकर या इनकी क़समें खिलाकर ही काफ़ी वोट बटोरते रहे हैं। वे हिमाचल की परंपरा और संस्कृति का हवाला देकर इस संबंध में सख़्त नियम लाए जाने का विरोध करेंगे। और अधिकारियों का तो कहना ही क्या, सबसे मुश्किल पढ़ाई करके अधिकारी बनने वाले लोगों को मानसिक रूप से बीमार लोगों को अस्पताल भेजने के बजाय उनके वहम को और मजबूत करता देख तरस आता है।
प्रदेश में अच्छे अस्पताल होंगे और वहाँ मनोचिकित्सकों की तैनाती होगी, साथ ही अगर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सरकार व्यापक जागरूकता अभियान चलाएगी तो लोगों का चेलों और तांत्रिकों के पास जाना अपने आप ख़त्म या कम हो जाएगा। इसके अलावा सरकार को जादू-टोने को बढ़ावा देने वालों, अंधविश्वास फैलाने वालों और किसी और को डायन आदि कहकर किसी भी तरह प्रताड़ित करने वालों को रोकने के लिए सख्त क़ानून बनाना चाहिए। साथ ही पुलिस को चाहिए कि ऐसी शिकायतों को गंभीरता से ले। प्रदेश में पुलिस को लेकर कोई डर ही नहीं है। डर का मतलब डंडे का आतंक का नहीं बल्कि पुलिस की चुस्ती और मामलों को सुलझाने की क्षमता के कारण लोगों में होने वाला क़ानून का डर। ये डर है ही नहीं हिमाचल में।
अगर कोई महिला या पुरुष ख़ुद को चेला-चेली, माता, देवता घोषित करता है तो तुरंत उसपर इस नियम के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासन को भी मुस्तैद रहना चाहिए कि कहीं से ऐसी ख़बर आए तो तुरंत उस व्यक्ति की मानसिक सेहत की जाँच की जाए। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग उसी तरह से आंगनवाड़ी या आशा वर्कर्स की मदद ले सकता है, जैसे किसी क्षेत्र में नए बच्चे पैदा होने को लेकर जानकारी जुटाई जाती है।
संस्कृति का संरक्षण, अच्छी परंपराओं को बनाए रखना हमारी ज़िम्मेदारी है। मगर यह भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है कि अगर कोई इसका लाभ ग़लत ढंग से उठाने की कोशिश करे तो उसे रोकें। एक नीति ये भी बनाई जाए कि मेलों और अन्य आयोजनों में उन्हीं देवताओं को न्योता भेजा जाएगा, जिनकी पंजीकृत संस्था होगी और उसके पदाधिकारी शपथपत्र देंगे कि उनके यहां झाड़फूंक, पूछ, प्रश्ना देना, या किसी तरह ‘इलाज’ नहीं होगा। साथ ही वे अपने यहाँ जाति या लिंग आधारित भेदभाव नहीं करेंगे। ऐसा न करने वालों को न्योता न भेजा जाए और अगर कोई मंदिर ऐसी गतिविधियाँ चलाता हो, उसपर कार्रवाई की जाए।
ये नियम उन सब लोगों को लाइन पर ले आएंगे जो देवताओं का डर दिखाकर अपना एजेंडा चला रहे हैं। अगर ये कदम उठा लिए गए तो प्राचीन और प्रतिष्ठित देवताओं का भी सम्मान बना रहेगा और फर्जी चेलों की दुकानें भी बन्द हो जाएगी। इन बातों को मानने में अगर कोई आनाकानी करता है तो समझ लो कि वो लोग देवता के नाम पर बेवकूफ बना रहे हैं क्योंकि मुझे नहीं लगता कि कोई पवित्र शक्ति होगी तो वो इस तरह की वाहियात बातों को बढ़ावा देगी। इस मामले में देव समाज या देवताओं से जुड़े संगठनों को आगे आना चाहिए क्योंकि ये उनकी प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला है। उन्हें और सकारात्मक भूमिका निभानी होगी। उन्हें ही माँग करनी चाहिए कि इस संबंध में सरकार नियम बनाए ताकि देवता के नाम पर कोई भी शख़्स या लोगों का समूह अपना अजेंडा न चला पाए।
सरकाघाट की घटना चेतावनी है कि आस्था, परंपरा, संस्कृति और पाखंड के बीच का फ़र्क़ समझा जाए। वरना आज तो ऐसी एक घटना हुई है; जिस रफ़्तार से देवताओं के नाम पर मानसिक रोगियों की फ़र्ज़ी दुकानें खुल रही है, वे हिस्टीरिया से पूरे प्रदेश को मानसिक रोगी बनाकर तबाह कर देंगे। फिर इस तरह की घटनाएँ आम हो जाएगी। रास्ता एक ही है- अंधविश्वास को अंधविश्वास कहने की हिम्मत लाइए और जागरूकता अभियान चलाइए की भूत-प्रेत, ओपरी कसर कुछ नहीं होती और इसका इलाज चेलों के बजाय अस्पताल में करवाए। लेकिन इसके लिए पहले हर अस्पताल में मनोचिकित्सक की नियुक्ति करना ज़रूरी है।
एमबीएम न्यूज, मंडी।। सरकाघाट में बुजुर्ग महिला से बदसलूकी के मामले में अब जो जानकारियां सामने आ रही हैं, उससे पता चल रहा है कि हमारे समाज में सोचने-समझने की क्षमता किस तरह खत्म हो गई है। अब इस मामले में पुलिस जब शुरुआती जांच की तो ऐसा पता चला है कि माहूंनाग देवता के मुख्य गूर की तीन साल पहले मृत्यु हो गई थी और उसके बाद उनकी बेटी ने खुद को पुजारी घोषित कर दिया। इस मामले में अब एक और एफआईआर हुई है जिससे पता चलता है कि देवता के नाम पर इन लोगों ने कितनी गंदगी फैलाई हुई थी।
ऐसी जानकारी सामने आ रही है कि 22 साल की इस पुजारिन के आदेश पर लोग देवरथ को उठाकर गांव में कभी भी लोगों को डराने लग जाते थे। ये लोग पुजारिन की बातों पर आंख मूंदकर यकीन करते हैं। यही कारण है कि बुजुर्ग महिला की पिटाई करते हुए किसी एक का भी दिमाग काम नही किया। शुक्र है कि इन्हीं में से किसी ने वीडियो बना दिया जो बाद में लीक हो गया। इसी कारण आज पुजारिन भी सलाखों के पीछे है और उसके इशारों पर नाचने वाले अंधभक्त भी।
सरकाघाट इलाका पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है
चार-पांच महीने से बढ़ी सनक
पिछले करीब चार-पांच महीनों से गांव में एक के बाद एक ऐसे घटनाक्रम हुए जिनसे गांव के समझदार लोग हैरान रह गए। इस तथाकथित पुजारिन को सनक चढ़ती तो देवता का आदेश बताते हुए देवरथ के साथ भीड़ लेकर कहीं भी पहुंच जाती। ये उन लोगों को टारगेट करती जो अन्य देवताओं में आस्था रखते थे और इसके आगे नतमस्तक नहीं होते थे।
ऐसा सामने आया है कि इस युवती को लगा कि अन्य देवी-देवताओं में लोगो की आस्था बढ़ेगी तो उसकी दुकान बंद हो जाएगी। इसलिए उसने लोगों को डराकर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश की। बुजुर्ग महिला से पहले रिटायर्ड अध्यापक जय गोपाल के साथ भी बदसलूकी की गई थी।
जय गोपाल ने सरकाघाट थाने में लिखित शिकायत दी थी जिस पर पुलिस ने धारा 147, 149, 452, 355, 323, 379, 435 और 427 के तहत मामला दर्ज किया है। इनमें भी वही लोग नामजद हैं, जिन्होंने बूढ़ी महिला के साथ बदसलूकी की थी। गोपाल ने बताया है कि 7 नवंबर को शाम सवा पांच बजे गांव के कुछ लोग देवता का रथ लेकर उनके घर आए और तोड़फोड़ करके घर जलाने की कोशिश की। जय गोपाल का कहना है कि इन लोगों ने कहा – तुम देवता की पूजा नहीं करते और दूसरे देवी-देवताओं को मानते हो।
अपने पुजारी बनने के बाद मंदिर की घटती लोकप्रियता से चिढ़ी थी ‘पुजारिन’ (प्रतीकात्मक तस्वीर)
अन्य देवता नहीं थे बर्दाश्त
माहूंनाग देवता के नाम पर दुकान चलाने को बेकरार यह युवती अन्य देवताओं की पूजा को बर्दाश्त नहीं कर पाती थी। रिटायर्ड अध्यापक ने पुलिस को बताया है कि उन्होंने घर पर मां सरस्वती और अन्य देवी-देवताओं की तस्वीर लगा रखी थी और इसी के कारण देवरथ लेकर लोग उनके घर पराए और तोड़फोड़ की। ये चेतावनी भी दी गई कि माहूंनाग की ही पूजा करनी है।
इस संबंध में जब पड़ताल की गई तो पता चला कि कई लोगों के साथ ऐसा व्यवहार हो चुका मगर अभी भी डर के मारे लोग कुछ नहीं कह रहे हैं। ऐसा भी पता चला है कि कम उम्र पुजारिन बन गई ये लड़की कान की कच्ची थी। अपनी समझ तो थी नहीं, इसलिए गांव के कुछ लोगों ने देवता के प्रभाव का इस्तेमाल करने के लिए इस लड़की को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। वे अपनी रंजिश के चलते पुजारिन को भड़काते और देव आस्था के नाम पर अपनी योजनाओं को सिरे चढ़ाते।
माहूंनाग देवता के नाम पर बने इस मंदिर की आसपास के इलाके में मान्यता रही है और काफ़ी लोग यहां आते रहे हैं। मगर घटना के बाद इलाके के लोग भी शर्म महसूस कर रहे हैं। बता दें कि बुजुर्ग महिला के साथ बदसलूकी के बाद जह पुलिस ने अभियुक्तों को गिरफ्तार किया तो ये पुजारिन देवरथ के साथ थाने का घेराव करने निकली थी मगर पुलिस के इंतजाम देखकर उसने कहा था- देवता ने आने से इनकार कर दिया।
अब महिला आयोग से लेकर हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट तक ने मामले का संज्ञान ले लिया है।
मंडी।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सरकाघाट में देवता के नाम पर महिला पर जादू-टोने का आरोप लगाकर प्रताड़ित करने के मामले में 21 लोगों की गिरफ्तारी हुई है। इनमें 14 पुरुष और 7 महिलाएं हैं। पुलिस का कहना है कि 17 लोगों को कल ही अदालत में पेश कर दिया गया था जबकि बाकियों को आज (सोमवार को) कोर्ट में पेश किया जाएगा।
ग्रामीण इन गिरफ्तारियों का विरोध कर रहे हैं और पहले उन्होंने देवता का रथ (पालकी) लाकर सरकाघाट थाने का घेराव करने की धमकी दी थी मगर बाद में जब पुलिस ने अपने स्तर पर इंतजाम कर दिए तो गुर और पुजारी ने कहा- देवता ने आने से इनकार कर दिया।
बता दें कि घटना 6 नवंबर की है। गाहर पंचाय में माहूंनाग देवता के मंदिर में खुद को गूर और पुजारी कहने वाले लोगों ने बुजुर्ग महिला पर दूसरे लोगों के ऊपर जादू-टोना करने का आरोप लगाकर चेहरे पर कालिख पोती थी और जूतों की माला पहनाकर घसीटा था।
उधर पीड़ित महिला ने दावा किया है कि इस मामले में अभियुक्तों और उनके रिश्तेदारों की ओऱ से उन्हें हत्या करने की झमकियां मिल रही हैं। पीड़िता की बेटी ने हमीरपुर में पत्रकारों को बताया कि अब वे उस गांव में कभी नहीं जाएंगे। उन्होंने इस मामले में सीएम से सुरक्षा की गुहार लगाई है।
पुलिस पर सवाल
इस घटना में पुलिस पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि जानकारी मिली है कि छह नवंबर को एफआईआर दर्ज नहीं की गई। जब नौ नवंबर को वीडियो वायरल हुआ और सीएम की ओर से आदेश मिले, तब पुलिस हरकत में आई।
अब पुलिस का कहना है कि दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। मंडी पुलिस के फेसबुक पेज पर लिखा गया है, “थाना सरकाघाट में अभियोग संख्या 184/19 दिनाँक 09.11.2019 अधीन धारा 147,149,452,435,355,427 भारतीय दण्ड संहिता के अन्तर्गत पंजीकृत किया जा चुका है व अभद्र व्यवहार करने वाले 17 (12 पुरुष व 5 महिला) लोगों को पुलिस द्वारा हिरासत में लिया जा चुका है । मामले की गहनता से छानबीन की जा रही है, किसी भी दोषी को छोड़ा नहीं जाएगा।
इसके साथ ही पुलिस ने रविवार को अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया है, “7 अभियुक्तों को आज माननीय अदालत में पुलिस द्वारा पेश किया गया था व माननीय अदालत द्वारा इन 17 अभियुक्तों को 3 दिन (10.11.2019 से 12.11.2019) तक Police Custody में रखने के आदेश दिये हैं। पुलिस हिरासत में लिए गये शेष 4 अभियुक्तों को दिनाँक 11.11.2019 को माननीय अदालत में पेश किया जाएगा।”
यतिन पंडित।। पिछले दिनों सरकाघाट में हुई घटना से हमारे धर्म में व्याप्त अंधविश्वास का जिन्न फिर बाहर आ गया। लोगों ने जिस प्रकार अमानवीयता का परिचय देते हुए बुज़ुर्ग के साथ हैवानियत की हदें पार कीं, उसे किसी भी तरह न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। यह देखकर हम सोचने पर विवश हो जाते हैं कि आख़िर इस प्रकार की घटनाएं समाज में हो क्यों रही हैं? धर्मांधता का यह खेल कब बंद होगा?
अक़्सर देखने में आता है कि देवी देवताओं की भूमि हिमाचल में कुछ लोगों ने लोगों की आस्था को कमाई का ज़रिया बनाकर रख दिया है। स्थान-स्थान पर नित नए देवता प्रकट कर देना और उनके प्रमुख सेवादार बनकर वहां देवखेल का आयोजन करवाना इस पहाड़ी राज्य में एक शगल हो चुका है। लोगों के इलाज और उनके जीवन को सुखी बनाने के नाम पर इस प्रकार के मोहल्ला क्लिनिक शुरु किए जाते हैं। लोग अपनी आस्थाओं के कारण इन मोहल्ला क्लीनिकों के चक्रव्यूह में उलझते जाते हैं और ये लोग जादू टोने की नाम पर लोगों में डर पैदा करके अपना कारोबार चलाते रहते हैं।
जादू-टोने का डर दिखाते हैं ये फर्जी देव क्लीनिक वाले
देवता के नाम पर दुकान
अब कुछ साधन सम्पन्न लोगों ने अपने निजी देवरथ बनाकर अपने इस पाखंड के कारोबार को विस्तार देने का काम भी शुरू कर दिया है। सबसे पहले किसी भी प्राचीन देवता या किसी नए देवता का कथानक सम्बंधित स्थान के साथ गढ़ा जाता है। फिर जो व्यक्ति इस पाखंड का कर्णधार होता है वह देवता का चेला या प्रमुख बनकर इस कहानी को आगे बुनता जाता है। धीरे-धीरे लोग जुड़ते जाते हैं और उस स्थान पर लोगों के ही पैसों से एक मंदिर का निर्माण करवा दिया जाता है।
यह काम वर्षों से चला आ रहा है। पर हैरानी की बात है कि ना तो समाज का जागरूक तबका आजतक इसके विरुद्ध कोई आवाज़ उठाने की ज़हमत उठा पाया, ना ही सरकार ने कभी इस प्रकार के नकली देव स्थलों पर किसी प्रकार का अंकुश लागाने की नीयत ही दिखाई। पिछली सरकार के कार्यकाल में एक बार पूर्व मुख्यमंत्री ने इस मामले में थोड़ी सक्रियता दिखाकर नए देवताओं के विषय में संज्ञान लिया था। परंतु उसके पश्चात वह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
अगर बात करें तो कुल्लू ज़िला में भी इस प्रकार के मोहल्ला क्लीनिकों की भरमार हो चुकी है। हर कोने में नए-नए देवता प्रकट हो रहे हैं और लोगों में जादू-टोने का भय बनाकर , राक्षसों के आने की बात से लोगों के मन में संशय उत्पन्न करके ये लोग अपने स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं।
देखने में आता है कि इस प्रकार के स्थल जो किसी देव शक्ति के नाम पर खोले जाते हैं, वहां सुख की आस लेकर जाने वाले लोग अमूमन अपने दुखों से छुटकारा नहीं पा पाते। इसका सामान्य सा कारण होता है कि वे अपने जीवन को सरल बनाने के लिए पुरुषार्थ के बजाय किसी चमत्कार के भरोसे बैठे रहते हैं। जबकि यदि वे इन मोहल्ला क्लीनिकों में समय गंवाने के बजाय स्वयं को प्रयत्नशील बनाएं तो अपने आप उनके दुःखों में कमी आ जाएगी।
प्राचीन है हिमाचल की देव परंपरा
फूट डालने का काम
ये मोहल्ला क्लिनिक चलाने वाले लोग एक ओर अपना तो आर्थिक फ़ायदा उठा लेते हैं, परंतु दूसरी ओर ये समाज में अराजकता और विद्वेष फैलाकर सामाजिक ढांचे को हिलाने का भी काम करते हैं। अक़्सर इन जगहों पर लोगों के मन में यह वह डाला जाता है कि तुम पर किसी ने किया कराया है। इस मामले में अमूमन किसी जान पहचान वाले को या किसी नज़दीकी रिश्तेदार को जादू करने वाला बताकर आपस में विद्वेष पैदा कर दिया जाता है। फिर समस्या के इलाज के नामपर वर्षों वर्ष लूट का खेल चलाया जाता है, जिसमे लोगों को देवता के नाम पर डराकर उनसे पैसे बटोरे जाते हैं।
सोचने वाली बात है कि आजतक इस प्रकार के फर्ज़ी मोहल्ला क्लीनिकों के चक्कर में ना जाने कितने घरों में आपसी रंजिशें पैदा हुई होंगी? और एक समाज के रूप में हम कितने जागरूक हैं, इसी बात से पता चल जाता है।
सरकारें मूकदर्शक
यदि बात करें तो इस विषय को लेकर हमारी सरकारें भी निरंतर उदासीन रही हैं। कुल्लू दशहरा में साल-दर-साल नए देवताओं की बढ़ती आमद इस बात का प्रमाण हैं। इन नए देवताओं की देखा-देखी दूसरे लोग भी जो एक देवरथ बनाने में सक्षम हैं, या किसी तरह पैसे इकट्ठे कर बना लेते हैं, वे इस तरह के प्रपंचों को और अधिक बढ़ावा देते हैं।
इन मोहल्ला क्लीनिकों की इस बढ़ती भरमार के कारण एक ओर जहां लोगों की आस्थाओं से खिलवाड़ हो रहा है वहीं दूसरी ओर हमारी वास्तविक देव संस्कृति पर भी आए दिन लांछन लग रहे हैं। लोग भी तंत्र-मंत्र की अचम्भित और रहस्यमयी दुनिया के छलावे में आकर, श्रद्धा और आस्था की तिलांजलि देकर पाखंडियों के चक्कर में अपना जीवन बर्बाद करते जा रहे हैं।
ऐसे ही पाखंड का परिणाम पिछले कल एक वीडियो के रूप में हमारे सामने आ चुका है। बेशक इस मामले में अब कारवाई हो रही है, पर सवाल यह है कि अपने उपेक्षित रवैय्ये के कारण क्या हम लोग भविष्य में ऐसी और घटनाएं घटित होने का इंतज़ार करते रहेंगे? हम, हमारा समाज और सरकार इस विषय पर कब संज्ञान लेना शुरू करेंगे? इन मोहल्ला क्लीनिकों का विरोध करना कब आरम्भ करेंगे?
कुल्लू दशहरा
देवता डराते नहीं
ध्यान रखिये, देवी देवता डर से नहीं समर्पण से पूजे जाते हैं। यदि कोई छोटी शक्तियां हैं भी, जिनके विषय में आपको संदेह है, उनका निराकरण भी पुरातन स्थलों पर आपकी अटूट आस्था होने से स्वतः हो जाता है। देवी देवताओं के नाम पर चलने वाले ऐसे मोहल्ला क्लीनिकों के प्रति जागरूकता तभी उत्पन्न होगी जब आपके मन में देवी देवताओं के प्रति डर समाप्त हो जाएगा। पहले अपने मन के डर को ख़त्म कीजिये। उसके बाद इनका धन्धा अपने आप चौपट होना शुरू हो जाएगा। जब तक आपका डर, आपका संदेह, आपके मन का द्वेष आप पर हावी है, ये लोग ऐसे ही उसका फायदा उठाते रहेंगे।
सरकार को भी इस विषय पर कड़ा संज्ञान लेकर पुराने देवताओं के नाम पर चल रहे ऐसे मोहल्ला क्लीनिकों को चिन्हित कर उन्हें बंद करने की आवश्यकता है। देवताओं का पंजीकरण करके केवल उनके प्राचीन स्थान को ही मान्यता दी जाए, तब लोगों के भी इस विषय को लेकर कई भ्रम दूर होंगे।
सबसे बड़ी बात, हमे स्वयं इस विषय पर जागरूक होना होगा, अपनो को जागरूक करना होगा। शुरुआत ख़ुद से ही होगी, तभी हमारी संस्कृति का मौलिक स्वरूप बचा रहेगा। वह मौलिक स्वरूप जिसमे देव नीतियां प्रेम पर आपसी आधारित हैं नाकि किसी प्रकार के टोने-टोटके या डर पर।
हिमाचल की देव परंपरा और इसके नाम पर कुछ लोगों द्वारा अपनी दुकान चलाए जाने से फैले भ्रम को लेकर दो हिस्सों के लेख का यह पहला दूसरा भाग है. पहले हिस्से के लिए नीचे क्लिक करें-
यतिन पंडित।। आस्था और अंधविश्वास के निर्धारण के बीच उतनी ही महीन रेखा होती है जितनी साक्षरता और ज्ञान के बीच होती है। पिछले दिनों जिला मंडी के सरकाघाट में घटित हुई एक घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया गया। 81 वर्षीय महिला बुज़ुर्ग के साथ हुई इस हृदय विदारक घटना ने हमारे समाज के समक्ष बहुत सारे प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न, क्या कोई देवता इस प्रकार के आदेश देता है? दूसरा प्रश्न, क्या हम अपनी मान्यताओं को उसके मूल रूप में समझते भी हैं या नहीं? क्या किसी देवता का गूर व चेला कोई भी ऐसे ही बन सकता है? क्या धर्म के नाम पर पाखंड की दुकान चलाने वाले लोगों को पहचानना इतना मुश्किल काम है?
पहले इस घटना के विषय में बात करें तो मानवीयता को शर्मसार करने वाली इस घटना के सोशल मीडिया पर उछलने के बाद इस मामले में अब तक कुछ लोगों की गिरफ़्तारी हो चुकी है और पुलिस द्वारा आगे की कारवाई की जा रही है। एक बुज़ुर्ग महिला को देव आज्ञा के नाम पर डायन घोषित कर, उसे निर्दयता से पीटना और घसीटना हमारी मानसिकता के किसी कोने में दबी हुई विकृति को उजागर करता है। तो प्रश्न यह भी है कि क्या कोई देवता इस प्रकार के आदेश अपने गूर या चेले के माध्यम से देता भी है या नहीं?
पर इस विषय से पहले हमे यह समझना होगा कि हिमाचल की देव प्रणाली वास्तव में है क्या?
हिमाचल प्रदेश में वर्तमान में देव प्रणाली के विभिन्न संस्करण मौजूद हैं। इसमे पहली प्रणाली जिसे आज सर्वमान्य रूप से स्वीकार किया जाता है, वह है वैदिक मान्यता के देवी देवताओं की प्रणाली। जिसे लोक समाज हिन्दू मान्यता या सनातन मान्यता के रूप में समझते हैं। यह प्रणाली प्रमुख रूप से हिमाचल के विभिन्न ज़िलों के उन इलाकों में विद्यमान है जहां समय के साथ हिन्दू मान्यताओं का प्रभाव बढ़ा है। या यूं कहें कि वे इलाके जो विभिन्न क्षेत्रों में मुख्य कस्बों के रूप में विकसित हुए। इन स्थानों पर अलग-अलग मान्यताओं के लोगों की आमद अधिक होने के कारण कालांतर में यहां बहु-प्रचलित मान्यताएं स्थापित हुईं। इसके अंतर्गत वैदिक देवताओं और हिन्दू देवताओं की मान्यता तथा उनके वैदिक व शास्त्रीय रीति-नीतियों का स्थान आता है।
दूसरी प्रणाली जो बहुधा हिमाचल के ऊपरी पहाड़ी इलाकों में प्रचलित है, वह अर्ध-अध्यात्मवाद की प्रणाली है। इसके अंतर्गत वे देवी देवता आते हैं जो आधे देव रूप व आधे यक्ष/नाग रूप माने जाते हैं। इस कड़ी में ही मनाली की हिडिम्बा देवी भी आती हैं। इस प्रणाली को प्रमुख रूप से हिमालय की कबाइली मान्यताओं में मौजूद देवप्रथा के आधार के रूप में देखा जा सकता है। हम यह मानकर चलें कि हिमाचल में प्रचलित जितनी भी परम्पराएं जिनपर आज सनातन वैदिक धर्म की दुहाई देकर बारंबार प्रश्रचिन्ह लगाए जाते हैं वे सभी परम्पराएं इसी अर्ध-अध्यात्मवाद की प्रणाली से जुड़ी होती हैं।
इस प्रणाली के प्रति समझ की अक्षमता के कारण बहुत से समाज के विभिन्न वर्गों में अक्सर विवाद उत्पन्न होते रहते हैं। गूर और चेला प्रथा इसी प्रणाली के अंतर्गत विकसित हुई प्राचीन परम्पराएं हैं। हिमाचल के ऊपरी इलाकों में पूर्वकाल में प्रकृति पूजा की प्रधानता रही है। कालांतर में यही प्रकृति पूजा अन्य मान्यताओं के प्रभाव में आकर विभिन्न चरणों से गुज़रते हुए अपने वर्तमान स्वरूप तक पहुंची है। गूर या चेले जिन्हें शामन्स व ओरेकल्स भी कहा जाता है, यह प्रथा केवल हिमाचल में ही नहीं अपितु विश्वभर में विद्यमान प्रथा है। आप विश्व का कोई भी हिस्सा ले लीजिए, आपको यह प्रथा हर स्थान पर किसी ना किसी रूप में मिल जाएगी। यहां इसे इंगित करने का मकसद केवल इतना है कि इस प्रथा के अस्तित्व पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।
दुनिया भर में मौजूद हैं शामन्स
तीसरी प्रणाली वह प्रणाली है जो विभिन्न स्थानों से आकर हिमालयी क्षेत्र में स्थापित हुई हैं। अर्थात वे अपने तद्भव रूप में यहां विद्यमान है। जिसमे बुद्धिज़्म और मंगोल मान्यताएं भी शामिल हैं। बेशक यही मान्यताएं आंशिक रूप से अर्ध-अध्यात्मवाद की प्रणाली में भी मौजूद हैं परंतु जहां पर इस प्रणाली में हिंदु मान्यताओं का प्रतिस्थापन नगण्य है, उन्हें हम इस प्रणाली के अंतर्गत मान सकते हैं। यह प्रमुख देव प्रणालियां हिमालय की मान्यताओं में हैं। जिनके आधार पर हिमाचल को देव भूमि का वह दर्जा प्राप्त है जो लोगों के लिए उत्सुकता और कौतूहल का विषय रहता है।
क्या देवता किसी व्यक्ति के लिए आदेश जारी कर सकता है? अब बात करें उस घटना की जिसे केंद्र में रखकर यह सब बातें निकल कर आ रही हैं। सरकाघाट के गांव में हुई उस निर्मम घटना के पश्चात देव प्रथाओं के गलत इस्तेमाल की बात भी लोगों के सामने आई है। सबसे पहले तो हम सभी यह समझ लें कि गूर प्रथा के अंतर्गत कोई भी देवता या शक्ति कभी किसी व्यक्ति विशेष को सीधे तौर पर इंगित कर इस प्रकार का कोई आदेश पारित नहीं करती हैं। अतः जो उन लोगों ने किया है, वह सरासर उदण्डता और देव आस्था के साथ खिलवाड़ है।
आजकल यह देखा गया है कि लोग इस विधा का प्रयोग अपने आर्थिक फायदे के लिए अधिक करने लगे हैं। कुछ लोग नए-पुराने नामों से देवता के रथ बनाकर खुद उनके गूर चेले बन समाज में स्वयं को स्थापित करने का ढोंग भी रचाने लगे हैं। जबकि देव नीति को बारीकी से समझने वाले लोगों की माने तो कोई भी देवता गूर और चेले के माध्यम से आदेश देने के लिए कुछ घड़ी ही किसी के शरीर में प्रविष्ट होता है। जो लोग अपने निजी देवस्थल बनाकर पूरा-पूरा दिन पूछ और देव खेल का आयोजन करते हैं, वे केवल जनता को देव शक्तियों के नाम पर छल रहे होते हैं और कुछ नहीं। इन लोगों को वास्तव में ही किसी मनोवैज्ञानिक की सलाह और इलाज की आवश्यकता है।
गूर का चयन जटिल प्रक्रिया
गूर प्रणाली के अंतर्गत गूर का चयन किया जाना एक बहुत ही जटिल प्रक्रिया है। जिसके लिए बहुत सावधानी से और बड़ी रीति निर्धारित प्रक्रिया के तहत चुनाव होता है। ऐसे हर कहीं गूर चेला नहीं निकल आता, जैसा आजकल देखने में आ रहा है।
ऐसे पाखण्डी लोग वास्तव में देव शक्तियों के नाम पर अपनी दुकान चलाने का काम कर रहे होते हैं। इन लोगों के कारण एक तो लोगों की आस्थाओं से खिलवाड़ किया जाता है और दूसरा आम जनमानस की मान्यताओं को भी खंडित करने का काम किया जाता है। कल की घटना के बाद ना जाने कितने ही लोगों की माहूंनाग जी में आस्था खंडित हुई होगी?
यह परिस्थिति उत्पन्न होने का कारण, आस्था और अंधविश्वास की वही महीन रेखा है जिसका ज़िक्र शुरू में किया है। हम लोग जब तक अपनी मान्यताओं के मूल को नहीं समझेंगे, तब तक इस प्रकार के पाखण्डी जन्म लेते रहेंगे और हमारी आस्थाओं को खंडित करते रहेंगे।
सर्वप्रथम हमें अपनी मान्यताओं के प्रति यह स्वीकार्यता उत्पन्न करनी होगी कि हम पहाड़ी लोग अर्ध-अध्यात्मवाद को मानने वाले लोग हैं। ईश्वरीय सत्ता या परम सत्ता तो इससे ऊपर की चीज़ है जो सभी देव, दानव, मानव का मूल आधार है। हमे समझना होगा कि यह प्रणालियां वास्तव में हैं क्या, इनका आधार क्या है, हमारे वास्तविक देवता जिन्हें पूर्वज भी कह सकते हैं, वे हैं कौन? जब तक देव रीतियों के प्रति साक्षरता और ज्ञान का अंतर रहेगा , हम लोगों के सामने इस प्रकार के घटनाक्रम आते रहेंगे।
निजी रूप से मैं सभी चीजों को स्वीकार करने का भाव रखता हूँ। तंत्र, मंत्र, देव, दानव सबको। परंतु इसका यह अर्थ नहीं हो जाता कि इस आधार पर हम अपनी तार्किक बुद्धि को तिलांजलि देकर अंधों की तरह हर चीज़ पर विश्वास करने लग जाएं। आस्थाओं को जीवित रखिये, बेशक रखिये, परंतु अंध-आस्थाओं और अंधविश्वासों के प्रति जागरूक बनिये। तभी हमारा समाज हमारी पुरातन संस्कृति के पहलुओं का अस्तित्व व औचित्य बना रहेगा। अन्यथा जगह-जगह देवताओं के नाम पर मोहल्ला क्लिनिक खोलकर बैठे पाखंडी लोग धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह करते रहेंगे और अपनी दुकान चलाते रहेंगे।
हिमाचल की देव परंपरा और इसके नाम पर कुछ लोगों द्वारा अपनी दुकान चलाए जाने से फैले भ्रम को लेकर दो हिस्सों के लेख का पहला भाग है. दूसरा हिस्सा पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें-