हिमाचल में अनाथ बच्चों के लिए पहले से मौजूद है 2500 रुपये मदद की योजना

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश में कोरोना के कारण अनाथ होने वाले बच्चों की मदद को लेकर एक अजीब सी स्थिति बनती दिख रही है। पहले कांग्रेस की ओर से हिमाचल में कोरोना रिलीफ कमेटी के अध्यक्ष बनाए गए पूर्व मंत्री जीएस बाली की ओर से बयान दिया गया कि कोविड के कारण अनाथ होने वाले बच्चों को कांग्रेस 18 साल का हो जाने तक हर महीने दो हजार रुपये की आर्थिक मदद देगी ताकि उनकी पढ़ाई और अन्य खर्चों में मदद मिल सके।

इसके तुरंत बाद सरकार की ओर से बयान जारी किया गया कि हिमाचल सरकार कोविड के कारण अनाथ होने वाले बच्चों को हर महीने 2500 रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी। लेकिन कुछ मीडिया संस्थानों ने इस खबर को ऐसे चलाया मानो यह कोविड के लिए कोई विशेष नई योजना शुरू की गई है। वास्तव में पहले से ही एक सरकारी योजना मौजूद है जिसके तहत अनाथ या बेसहारा बच्चों को बालिग हो जाने तक हर माह 2500 रुपये दिए जाते हैं।

क्या है योजना
हिमाचल प्रदेश सरकार ‘बाल-बालिका सुरक्षा योजना’ के तहत अनाथ और बेसहारा बच्चों के पालन-पोषण और देखभाल के लिए प्रति माह 2,000 रुपए की सहायता राशि प्रदान करती है। बच्चों को संभालने वाले परिवार (अभिभावकों) को दी जाने वाली इस सीधी मदद के अलावा बेसहारा बच्चों के नाम हर माह 500 रुपये एफडी में भी जमा किए जाते हैं। ऐसे बच्चों को यह आर्थिक सहायता 18 वर्ष की आयु पूर्ण होने तक प्रदान की जाती है। जैसे ही बच्चे बालिग होते हैं, वे एफडी में जमा पैसे भी निकाल सकते हैं।

पहले इस योजना के तहत एफडी में हर माह 300 रुपये जमा किए जाते थे लेकिन जयराम सरकार ने 22 जुलाई 2020 से इसे बढ़ाकर 500 रुपये प्रति माह कर दिया था। अनाथ बच्चों के अलावा ऐसे बच्चों को भी यह मदद मिलती है, जिनके माता-पिता दोनों जेल में हों या फिर दोनों एचआईवी पॉजिटिव हों या किसी गंभीर घातक बीमारी से जूझ रहे हों। इसके अलावा अगर पिता का देहांत होने पर मां ने कहीं अन्य विवाह करके बच्चे की देखभाल छोड़ दी हो या फिर मां का देहांत होने पर पिता ने कहीं विवाह करके बच्चे का देखभाल बंद कर दी हो, तब भी उसे यह मदद मिल सकती है।

इस योजना का लाभ उन्हीं को मिल सकता है जब माता-पिता और बच्चे, सभी हिमाचल के स्थायी निवासी हों। इसके साथ ही पालने वाले अभिभावकों की उम्र और आय को लेकर भी कुछ शर्तें हैं। सीएम ने हाल ही में इसी योजना को लेकर जानकारी देते हुए कहा था, “प्रदेश में अब तक करोना से सात बच्चे अनाथ हुए हैं। वो अभी रिश्तेदारों के साथ रह रहे हैं। उनके रिश्तेदारों से संपर्क किया गया तो उन्होंने बच्चों को शिशु देखभाल केंद्र में भेजने से इनकार कर दिया। ऐसे में अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि ऐसे बच्चों को उनके पालक की देखभाल में रखने की कार्यवाही शुरू करें और उन्हें 18 साल की उम्र तक 2500 रुपये प्रतिमाह प्रदान किए जाएं।”

इस बीच कांग्रेस अपनी ओर से 2000 रुपये प्रतिमाह देने की योजना को 21 मई को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्य तिथि के अवसर पर लॉन्च करने जा रही है। इस तरह से देखें तो सरकारी 2500 और कांग्रेस की ओर से 2000 रुपये मिलाकर अनाथ बच्चों को प्रतिमाह 4500 रुपये की आर्थिक मदद मिलेगी। कोशिश यह रहनी चाहिए कि इतनी रकम को पालन करने वाले अभिभावकों को सीधे देने के बजाय बच्चे के नाम एफडी बनाई जाए ताकि वह बालिग होने पर उसका कुछ उपयोग कर पाए।

क्या कोविड काल में सुन्न हो गई है हिमाचल सरकार की समझ?

इन हिमाचल डेस्क।। मंगलवार को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने मंडी के खलियार में कोविड के मरीजों की देखभाल के लिए बनाए मेकशिफ्ट कोविड अस्पताल को जनता को समर्पित कर दिया। यहां पर 200 बिस्तरों की व्यवस्था है जिनके साथ ऑक्सीजन की सुविधा है। है तो यह अस्थायी अस्पताल मगर इसमें कई सारी आधुनिक सुविधाएं हैं। लेकिन इसे जनता को समर्पित करने के लिए कुछ ऐसा कर दिया जिसे कोरोना काल का सबसे खराब उदाहरण कहा जा सकता है।

प्रदेश में रोजाना लगभग तीन हजार नए मामले सामने आ रहे हैं और औसतन 60 लोगों की जान जा रही है। संक्रमण घटे, इसलिए  लिए राज्य सरकार ने प्रदेश भर में धारा 144 लगाई है ताकि बिना वजह लोगों का जमावड़ा न लगे। सार्वजनिक, राजनीतिक कार्यक्रमों पर रोक है और विवाह आदि समारोहों पर सख्त पाबंदियां हैं। सीएम ने तो यहां तक अपील की थी कि यदि संभव है को तो मौके की नज़ाकत को समझते हुए लोग विवाह समारोहों को कुछ समय के लिए टाल दें। मगर अफसोस, सीएम खुद मौके की नज़ाकत समझने में चूक गए।

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कल जब इस अस्पताल को को मंडी में लोकार्पित किया गया, तब कोरोना संक्रमण रोकने के लिए लगाई गई पाबंदियां जमकर टूटीं। वैसे भी संकट के दौर में अस्थायी अस्पताल बनाया गया है, कोई मील का पत्थर नहीं कि तामझाम के साथ बड़ा कार्यक्रम करके इस अस्पताल का उद्घाटन किया जाता। होना तो यह चाहिए था कि इस अस्पताल को ऑनलाइन लोकार्पित कर दिया जाता। मगर न जाने क्यों सरकार ने मौके पर जाकर इसका उद्घाटन करना चुना।

यही नहीं, कल इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री के अलावा जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर, स्वास्थ्य मंत्री डॉ. राजीव सैजल, विधायक कर्नल इंद्र सिंह, राकेश जम्वाल, इंद्र सिंह गांधी, हीरा लाल, जवाहर ठाकुर, विनोद कुमार, प्रकाश राणा और अनिल शर्मा, अध्यक्ष जिला परिषद पाल वर्मा, डीसी मंडी, महापौर नगर निगम मंडी दीपाली जस्वाल भी उपस्थित रहे। इनके अलावा इनके स्टाफ, ड्राइवर और अन्य सुरक्षाकर्मी आदि भी मौजूद रहे।

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चूंकि यह संकट का काल है, इसलिए अगर सीएम को उद्घाटन करना ही था तो मंत्रियों और विधायकों को बुलाने की क्या जरूरत थी? कार्यक्रम के दौरान भारी भीड़ नजर आई। यही नहीं, अंदर जब फैसिलिटी का मुआयना किया गया, तब सामाजिक दूरी की भी धज्जियां उड़ती दिखीं। अफसोस, पत्रकार बंधु भी भारी संख्या में वहां मौजूद थे और उनमें फोटो-वीडियो लेने की जो होड़ मची, उसमें भी नियम टूटते दिखे।

इस तरह से यह पूरा आयोजन प्रदेश की जनता के लिए एक खराब उदाहरण की तरह पेश हुआ। हर व्यक्ति मौके की संवेदनशीलता को समझे, उसे कोरोना की गंभीरता का अहसास हो, यह संभव नहीं। इसलिए तो सरकार को नियम, जुर्माना और दंड लगाने की व्यवस्था करनी पड़ी है। और अगर इन नियमों का पालन करवाना है तो खुद भी नियमों का पालन करना पड़ेगा। ऐसा नहीं हो सकता कि आप खुद कानूनों को ठेंगा दिखाएं और फिर जनता से भावुक अपील करते रहें।

ऐसा लगता है कि इस सरकार में विजन की ही नहीं, कॉमन सेंस की भी कमी हो गई है। वरना इतने मंत्री, इतने नेता, इतने अधिकारी हैं, कोई तो सलाह देता कि इस दौर में इस तरह का आयोजन करना शोभा नहीं देता। यह सरकार जिसमें नेताओं से लेकर बड़े टफ कंपीटीशन के बाद चुने जाने वाले प्रशासनिक अधिकारी भी हैं, उनकी कलेक्टिव कॉन्शस की नाकामी का उदाहरण है। इतिहास याद रखेगा कि मुश्किल के दौर में भी कैसे हर बात को इवेंट बनाने की कोशिश की गई थी।

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चींटियों को डाले गए अनाज से दाने चुनकर खाता मिला शख्स

ऊना।। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में एक दिल पिघला देने वाली घटना सामने आई है। यहां पर एक शख्स को सड़क किनारे चींटियों के लिए डाले गए अनाज के दाने उठाकर खाते हुए पाया गया। घटना जिले के मुबारकपुर की है।

अक्सर लोग सड़क या रास्तों के किनारे चींटियों के लिए आटा या अनाज डाल देते हैं। लोग धार्मिक मान्यताओं के आधार पर अपने बुरे ‘ग्रह दोष’ के निवारण के लिए ऐसा करते हैं। मुबारकपुर में विकास कुमार नाम के शख्स ने देखा कि एक व्यक्ति अनाज के ऐसे दानों को खा रहा है।

बताया जा रहा है कि ऐसा करने वाला यह व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है हालांकि इसकी पुष्टि नहीं की जा सकती है। मगर यह दिन भर पेट भरने के लिए इधर-उधर घूमता है। विकास कुमार ने इन्हें सड़क किनारे से हटाया और खाने की व्यवस्था की। कुछ पैसे और भोजन भी साथ में दिया ताकि आने वाले कुछ दिनों तक वह किसी तरह पेट भर सकें। पत्रकार अविनाश विद्रोही ने इस पूरे वाकये को फेसबुक पर बताया है।

लॉकडाउन के कारण इस तरह के लोगों की हालत और गंभीर होती जा रही है जो खुद किसी तरह से भोजन का इंतजाम करने में अक्षम हैं। पहले कोई न कोई बाहर निकलकर इन लोगों को खाना आदि दे देता था, मगर लॉकडाउन के कारण मूवमेंट घट जाने से मानसिक रूप से अस्वस्थ और बेसहारा लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

धर्मपुर में 3 साल से SDO ही बना है XEN, मंत्री पर उठे गंभीर सवाल

सरकाघाट से रितेश चौहान, फॉर इन हिमाचल।। हिमाचल प्रदेश के जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर के विधानसभा क्षेत्र धर्मपुर के लोक निर्माण विभाग में प्रदेश सरकार और लोक निर्माण विभाग के तमाम कायदे कानून ठेंगे पर रखे जा रहे हैं। यहां पर पिछले तीन सालों से एसड़ीओ को कार्यवाहक एक्सईएन बनाकर रखा गया है।

यह न सिर्फ प्रदेश में अपनी तरह का इकलौता मामला है बल्कि नियुक्ति के नियमों के भी खिलाफ है। आरोप लग रहा है कि यह सब इसलिए किया जा रहा है कि मंत्री इस एसडीओ के माध्यम से अपने खास चहेते ठेकेदारों को टेंडर देते रहें।

इस समय लोक निर्माण विभाग में कार्यवाहक XEN जयपाल नायक के खिलाफ कांग्रेस और अन्य दलों ने बाकायदा मोर्चा खोल रखा है l सत्ता पक्ष के साथ खड़े न रहने वाले ठेकेदारों को टेंडर ना दिए जाने का मामला पुलिस से लेकर कोर्ट तक में दायर है। कार्यवाहक एक्सईएन के ख़िलाफ़ कई शिकायतों के बावजूद प्रदेश सरकार धर्मपुर को लेकर पूर्णत: आंखें बंद करके बैठी है।

आरटीआई में क्या पता चला?
इस मामले में पूर्व जिला परिषद सदस्य और माकपा नेता भूपेंद्र सिंह ने आरटीआई के माध्यम से जानकारी जुटाई है। भूपेंद्र सिंह ने बताया कि धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक व वर्तमान सरकार में चार विभागों के मन्त्री की मेहरबानी के कारण प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद मंडप उपमण्डल के सहायक अभियंता जयपाल नायक को 18 मई 2018  को धर्मपुर मण्डल का कार्यवाहक एक्सईन लगाया था जो अभी तक भी बतौर कामचलाऊ एक्सईन काम कर रहे हैं।

लेकिन विभागीय नियमों में ये जानकारी दी गई है कि अधिशासी अभियंता भर्ती विभाग द्वारा स्थाई तौर पर की जाती है या फ़िर प्रतिनियुक्ति पर की जा सकती है। लेकिन धर्मपुर मंडल में एक्सईन न तो विभागीय नियमों के तहत न तो पदोन्नत हुए हैं और न ही प्रतिनियुक्ति पर हैं। उन्हें किस  नियम के तहत तीन वर्षों से इस पद पर लगाया गया है इसकी कोई जानकारी नहीं है।

पूर्व ज़िला परिषद सदस्य भूपेंद्र सिंह ने बताया कि विभाग द्वारा 3 अगस्त 2012 को लोकनिर्माण विभाग में एक्सईन अपॉइंटमेंट के जो दिशा निर्देश जारी किए हैं उनके तहत विभाग में सत्तर प्रतिशत भर्ती  पांच साल अनुभव वाले डिग्री होल्डर्स अभियंताओं में से होती है और तीस प्रतिशत पदों की भर्ती डिप्लोमा कोर्स वालों में से की जाती है। लेकिन धर्मपुर मण्डल में कार्यरत एक्सईन जो अपने तीन वर्षों में कई तरह के विवादों में रहे हैं और उन्हें यहां से ट्रांसफर करने की भी मांग भी होती रही है और कई बार उनके ख़िलाफ़ प्रदर्शन भी हुए हैं क्योंकि वे पूरी तरह से राजनीतिक दबाव व इशारे पर काम कर रहे हैं।

आरोप है कि इस मंडल में जो भी विभागीय टेंडर जारी होते है वे कभी भी सार्वजनिक तौर पर न होकर चुनिंदा ठेकेदारों को ही दिए जाते हैं। कई बार तो टेंडर प्रक्रिया काम पूरा होने के बाद पूरी की जाती है। भूपेंद्र सिंह ने बताया कि एक ही काम के छोटे छोटे टेंडर जारी किए जाते हैं ताकि उनको एक्सईन की शक्तियों के तहत अपने चेहतों को दिया जा सके। उन्होंने कहा कि इस प्रकार धर्मपुर लोकनिर्माण मंडल कार्यालय पूरी तरह करप्शन का अड्डा बन गया है और इसी कारण राजनीतिक इशारे पर काम करने वाले इन एक्सईन को गैर कानूनी तौर पर यहाँ लगाया गया है।

पढ़ें- HPPWD धर्मपुर में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, बड़े अधिकारियों की चुप्पी

भूपेंद्र सिंह ने बताया कि इस नियुक्ति के बारे प्रदेश के तथाकथित साफ़ छवि वाले मुख्यमन्त्री भी आंखे बंद किये हुए हैं। उन्होंने मांग की है नियमों के विपरीत हुई एक्सईन की इस नियुक्ति को को रद्द किया जाये और यहां हो रहे भ्र्ष्टाचार तथा भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली की जांच करवाई जाए।

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महेंद्र सिंह ठाकुर पर फिर लगा सरकारी गाड़ियों के दुरुपयोग का आरोप

ठेकेदार का मोबाइल गुम हुआ, पुलिस ने मुर्गा बना दिए मजदूर

शिमला।। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में एक शर्मनाक घटना सामने आई है। एक ठेकेदार का मोबाइल गुम हुआ तो उसे मजदूरों पर शक हुआ। उसने इसकी शिकायत छोटा शिमला पुलिस को की। जब तीन पुलिसकर्मी मौके पर पहुंचे तो उन्होंने मजदूरों को मुर्गा बना गिया।

टिंबर हाउस से होकर गुजर रहे लोग इस मंजर को देख हैरान थे। ऐसे में अखबार ‘दिव्य हिमाचल’ की टीम ने इस घटनाक्रम का वीडियो बना दिया। जब मामला मीडिया पर छाया तो एसपी शिमला ने इन तीन पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर डीएसपी को मामले की जांच सौंप दी।

यह घटना हिमाचल प्रदेश पुलिस के तौर तरीकों पर भी सवाल करती है। अगर किसी पर चोरी का शक था तो पुलिस को स्टेशन में बुलाकर पूछताछ करनी चाहिए थी। इस तरह से श्रमिकों को इंसान न समझकर उन्हें मुर्गा बनाना दिखाता है कि कैसे पुलिस विभाग में ऐसे लोग हैं जिनकी मानसिकता में बदलाव की जरूरत है।

इस बीच, शिमला के एसपी मोहित चावला ने कहा कि पुलिसकर्मियों का इस तरह का व्यवहार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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कोरोना संक्रमित को बाहरी बता बंद कर दिए श्मशान घाट के गेट

मंडी।। हिमाचल प्रदेश में मूर्खता अपने चरम पर दिखती नजर आ रही है। महामारी ने लोगों का बौद्धिक दीवालियापन भी सामने लाकर रख दिया है। मंडी जिले के जोगिंदर नगर के मच्छयाल मोक्षधाम में कोरोना मृतक पूर्व सैनिक के दाह संस्कार का ग्रामीणों ने पहुंचकर कड़ा विरोध जताया। लोगों का कहना था कि मृतक मोक्ष धाम के अधीन आने वाली पंचायत से संबंध नहीं रखता था।

बताया जा रहा है कि जब अंतिम संस्कार चल रहा था, तभी करीब दस से पंद्रह ग्रामीण मौके पर पहुंचे और दाह संस्कार के बीच मोक्षधाम का गेट बाहर से बंद कर दिया। सूचना प्रशासन को मिली तो पंचायत प्रधान से हस्तक्षेप करने की मांग की। पंचायत प्रधान और पुलिस की टीम ने पहुंचकर ग्रामीणों को समझाया और दाह संस्कार की प्रक्रिया पूर्ण करवाई।

दरअसल, नेरचौक मेडिकल कॉलेज में पूर्व सैनिक की कोरोना संक्रमण से मौत होने के बाद परिजन शव को मच्छयाल स्थित श्मशानघाट तक एंबुलेंस में लाए। मृतक के पैतृक गांव मंढौता के ग्रामीणों ने लकड़ी की व्यवस्था की। शव के लिए जब चार कंधे भी नसीब न हुए तो भाई ने पीपीई किट पहनकर शव को अकेले चितास्थल तक पहुंचाया।

अभी करीब 70 प्रतिशत अंतिम संस्कार हुआ था कि मुख्य गेट पर दस से पंद्रह ग्रामीण आ पहुंचे और विरोध जताते हुए श्मशानघाट के मुख्य गेट को बंद कर दिया। इस पर एसडीएम को सूचना दी। उन्होंने संबंधित पंचायत प्रधान अंजना शर्मा को मामले में हस्तक्षेप करने का आह्वान किया। इसके बाद मामला शांत करवाया गया।

मच्छयाल मोक्षधाम समिति के अध्यक्ष चुनी लाल ने कहा कि मोक्ष धाम में अंतिम संस्कार को लेकर समिति को आपत्ति नहीं थी। कोविड प्रोटोकोल के तहत अंतिम संस्कार होना चाहिए। अगर अंतिम संस्कार को लेकर समिति प्रबंधन को अवगत करवाया होता तो इस प्रकार की स्थिति पैदा नहीं होती।

बाहरी बताकर रोक दिया कोरोना से जान गंवाने वाली महिला का अंतिम संस्कार

आयुर्वेदिक डॉक्टरों और स्टाफ को भूल गई है हिमाचल सरकार?

इन हिमाचल डेस्क।। राज्य में कोविड के बढ़ते हुए मामलों के बीच ऐसा लग रहा है कि स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा रही है और भारी दबाव में है। सरकार के दावे कुछ भी हों लेकिन ऐसी रिपोर्ट्स आ रही हैं कि मरीज़ों को ऑक्सीजन सिंलेंडर और वेंटिलेटर्स की समस्या से जूझ पड़ रहा है और इससे कइयों की जान भी जा रही है। इस तरह की घटनाएं सरकार के उन दावों को धता बता रही हैं कि प्रदेश की स्वास्थ्य प्रणाली एकदम दुरुस्त है।

महामारी की शुरुआत से ही हिमाचल में स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियां उभरकर आने लगी थीं। कमजोर स्वास्थ्य प्रणाली और सुविधाओं के अभाव ने इस संकट से निपटने के लिए सरकार की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए थे। व्यवस्थाएं तब और खराब होती नजर आईं जब सूबे के स्वास्थ्य मंत्री पूरे दृश्य से ही गायब नजर आए। कोविड से जुड़े मसलों को सुलझाने के लिए शायद उन्हें समय ही नहीं मिल पाया। वे तभी मीडिया में नज़र आए जब उनके मंत्री होने पर ही चारों ओर से सवाल उठने लगे। वैसे भी, उस शख्स के बारे में क्या ही कहा जाए जिसे यह तक मालूम न हो कि प्रदेश के अस्पतालों और कोविड सेंटरों में कितने वेंटिलेटर हैं। वह भी तब, जब कांगड़ा जिले में ही वेंटिलेटर की कमी से छह लोगों की जान जाने की खबरें हैं।

संकट के इस दौर में एक और महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करना जरूरी है। यह है आयुर्वेदिक डॉक्टरों और स्टाफ की ओर से बतौर फ्रंटलाइन वर्कर निभाई जा रही भूमिका। हिमाचल प्रदेश में अभी 1100 से अधिक आयुर्वेदिक डिस्पेंसरियां हैं जो राज्य में प्राइमरी और टर्शरी हेल्थ केयर सिस्टम की ज़रूरत को पूरा करती हैं। इस विभाग के डॉक्टर और स्टाफ़ पिछले साल से ही बिना थके फ्रंटलाइन हेल्थ वर्कर्स के तौर पर काम कर रहे हैं। वे सैंपल लेने से लेकर कोविड केयर सेंटरों में स्वास्थ्य सेवाएं भी मुहैया करवा रहे हैं।

हाई रिस्क में होने के बावजूद राज्य सरकार इस महत्वपूर्ण काम में उनके योगदान को पहचान और सम्मान देने में विफल रही है। पिछले दिनों सरकार ने मेडिकल ऑफिसर्स, नर्सों और छात्रों को इन्सेंटिव यानी प्रोत्साहन राशि देने का फैसला किया। मगर ऐसी कोई सूचना सार्वजनिक नहीं हुई है कि कितने आयुर्वेदिक मेडिकल ऑफिसर्स (एएमओ) या दूसरे आयुर्वेदिक स्टाफ़ को ऐसी प्रोत्साहन राशि दी गई है या दी जानी है।

आयुर्वेद की उपेक्षा
आयुर्वेदिक मेडिकल सिस्टम का अन्य आधुनिक प्रणालियों के साथ संयोजन तब तक संभव नहीं है, जब तक कि सरकार इस विभाग में काम कर रहे लोगों के हितों की रक्षा नहीं करती। पहले भी आयुर्वेदिक डॉक्टर राज्य में प्राइमरी हेल्थ केयर सिस्टम के प्रबंधन में अहम भूमिका निभाते रहे हैं मगर कभी उन्हें ढंग से सराहना नहीं मिली। इतना महत्वपूर्ण विभाग होने के बावजूद इसमें काम करने वाले लोगों के हितों को हाशिये पर डाला जाता रहा। हिमाचल प्रदेश में आयुर्वेदिक डॉक्टरों की भूमिका ‘डॉक्टर प्रति मरीज’ के अनुपात को बेहतर रखने में भी अहम रही है। इसी कारण इस अनुपात में हिमाचल देश के शीर्ष पांच राज्यों में आता है।

आयुर्वेदिक सिस्टम के वर्तमान हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर के पुनर्निर्माण पर ज़ोर दिए जाने की ज़रूरत है। अगर सरकार स्वास्थ्य प्रणाली में सुधार लाने को लेकर गंभीर होती तो इंडियन मेडिसन सेंट्रल काउंसिल रेग्युलेशन ऐक्ट 2016 से आगे बढ़ती और ज़रूरी संशोधन करके आयुर्वेदिक डॉक्टरों को इंटेंसिव केयर यूनिट्स संभालने के लिए ट्रेन्ड करती। ध्यान देने की बात यह भी है कि देश में कई निजी अस्पतालों और दूसरे केंद्रों में आयुर्वेदिक डॉक्टरों को तौर कंसल्टेंट रखा जाता है और उन्हें आईसीयू मैनेज करने में भी नियुक्त किया जाता है।

आयुर्वेदिक सिस्टम को लेकर सरकार की उदासीनता इस बात से भी स्पष्ट दिखती है कि राज्य का सबसे बड़ा आयुर्वेदिक अस्पताल- राजीव गांधी आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (पपरोला) में एक भी आईसीयू बेड नहीं है। अगर यहां आईसीयू की व्यवस्था होती तो वो महामारी के दौर में वरदान साबित होती।

Govt Ayurvedic College Paprola 2020-21: Admission, Fees & Much More!

इस अस्पताल में मात्र 215 बिस्तर हैं जो कि अलॉपथी अस्पताल मेडिकल कॉलेज की तुलना में 50 फीसदी से भी कम है। क्योंकि बाकी मेडिकल कॉलेजों में कम से कम 500 बिस्तर होना जरूरी है जिनमें से 75 फीसदी भरे रहें ताकि वहां से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे छात्र अच्छे से प्रैक्टिकल शिक्षा ग्रहण कर सकें।

जब तक कि आयुर्वेदिक प्रैक्टिस करने वाले लोग अपने अधिकारों को लेकर खुद मुखर नहीं होंगे और जब तक हमारे पास दूरदृष्टि रखने वाला नेतृत्व नहीं होगा, तब तक इस दिशा में सुधार होना दूर की कौड़ी नजर आती है।

बाहरी बताकर रोक दिया कोरोना से जान गंवाने वाली महिला का अंतिम संस्कार

कांगड़ा।। संकट की इस घड़ी में कुछ लोगों का व्यवहार इंसानियत को भी शर्मसार कर दे रहा है। बुधवार को मां चामुण्डा की नगरी में एक सैनिक परिवार को उनके परिवार की 70 वर्षीय महिला के शव का अंतिम संस्कार करने से इसलिए लोगों ने रोक दिया क्योंकि मृतक उस इलाके की नहीं थी और कोरोना पोजिटिव थी।

दरअसल, सुलह विधानसभा क्षेत्र की नौरा पंचायत की एक 74 वर्षीय महिला कोरोना पॉजिटिव होने के कारण एम.एच. योल में उपचाराधीन थी। तबीयत खराब होने पर महिला को एम.एच. पठानकोट के लिए रैफर किया गया था, लेकिन वहां पर महिला की मौत हो गई।

महिला के शव को एम.एच. योल की एम्बुलैंस से रात को ही योल पहुंचा दिया गया। सुबह महिला के परिजनों ने आपस में सलाह की और तय किया कि उनके अपने गांव में अंतिम संस्कार करने की बजाय चामुण्डा धाम में ही अंतिम विधि कर दी जाए।

शव को लेकर जैसे ही ये लोग चामुण्डा पहुंचे और इसके लिए जरूरी सामान व लकड़ी आदि का बंदोबस्त करने लगे तो कोरोना प्रोटोकोल में होते संस्कार को देख लोगों में खुसर पुसर शुरू हो गई। बात फैल गई और आसपास के कई लोग वहां पहुंच गए और शव का संस्कार यहां न करने को कहा।

महिला के परिजनों ने शक्तिपीठ का हवाला देते हुए यहां पर ही दाह संस्कार करने की बात रखी जिस पर कुछ लोग झगड़े पर उतारू हो गये। मारपीट होने वाला माहौल बनता देख महिला के परिजनों ने अपने गांव में संपर्क किया और सारी बात बताकर गांववासियों को अपने पैतृक श्मशान में ही संस्कार की तैयारी करने को कहा और शव को पुनः वाहन में रखकर अपने गांव की ओर निकल गए और अपने गांव में न्यूगल खड्ड के किनारे महिला का अंतिम संस्कार किया।

होम आइसोलेट कोविड मरीज इन 4 नंबर पर कॉल कर लें चिकित्सीय सलाह : HMOA

इन हिमाचल डेस्क| हिमाचल में कोरोना के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। हालात अच्छे नहीं कई डेडिकेटिड कोविड हॉस्पिटल कितनी तेजी से भर रहे हैं इसका ताजा उदाहरण यह है कि बीते रोज लाल बहादुर शास्त्री मेडिकल कॉलेज नेरचौक में एकाएक 10 एंबुलेंस पहुंच गईं, जबकि अस्पताल में सभी बेड भर चुके थे। इसके बाद करीब तीन घंटे तक सभी एंबुलेंस में ही मरीज रखे गए।

अभी भी 90 फीसदी मरीज होम आइसोलेशन में है। होम आइसोलेशन में वैसे सरकार का कहना है कि डॉक्टरों द्वारा मरीजों की अपेडट ली जा रही है। उधर, हिमाचल प्रदेश मेडिकल ऑफिसर्ज एसोसिएशन (HMOA) के सचिव डॉ. पुष्पेंद्र वर्मा ने चार डॉक्टर्ज के नंबर जारी किए हैं।

1 मई को नेरचौक मेडिकल कॉलेज में मरीजों को लेकर पहुंची एंबुलेंस

ये नंबर उन कोविड मरीजों के लिए हैं जो होम आइसोलेशन में हैं। इन नंबर पर कोई भी कोविड मरीज परामर्श ले सकता है। डॉक्टर पुष्पेंद्र वर्मा ने कहा कि कोरोना काल में लोगों को मदद की ज्यादा जरूरत है। 90 फीसदी से भी ज्यादा मरीज इस समय होम आइसोलेशन में हैं। लोगों को कोरोना के नाम से ही स्ट्रेस हो रहा है, जिन मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत नहीं भी है वो भी घबरा जाते हैं।

इसलिए चार नंबर फिलहाल जारी किए गए हैं। उन्होंने कहा इन नंबर पर 24 घंटे सातों दिन कॉल कर कोविड मरीज परामर्श ले सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमारी कोशिश है कि इन नंबर की संख्या को और ज्यादा बढ़ाया जाए। होम आइसोलेशन में जो मरीज हैं वो इन नंबर पर कॉल कर डॉक्टरी सलाह ले सकते हैं।

होम आइसोलेट कोविड मरीज इन नंबर पर घुमाएं फोन

  • डॉक्टर पुष्पेंद्र वर्मा -9418080049
  • डॉक्टर विकास ठाकुर – 9816754604
  • डॉक्टर अनुराग -9816927789
  • डॉक्टर मोहिंद्र- 9816927450