आई. एस. ठाकुर।। क्या भांग के बिना या नशे में आए बिना शिव भक्ति नहीं की जा सकती?
हिमाचल में बहस उठी है कि आजकल शिव के नाम पर भांग और नशे के प्रचार वाले गाने बहुत आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि इससे युवा पीढ़ी पर गलत असर पड़ रहा है और वो नशे की ओर आकर्षित हो रही है। एक चर्चित गायक, जिनका गाना हिमाचल की पहाड़ियों को लांघकर देश के कोने-कोने में गाया-बजाया जा रहा है, उनपर आरोप ज्यादा लग रहे हैं।
गायक का कहना है कि मैंने और भी गाने गाए, तब किसी ने मुझे नहीं पूछा, अब ये गाना गाया और लोगों को पसन्द आया तो मुझसे अब सवाल उठाए जा रहे हैं। गायक का एक और गाना वायरल हुआ तो उन्होंने कहा- ये तो पहले का है। मगर आज 24 अगस्त को एक नया गाना जारी हुआ है और उसमें भी शिव, भांग, धुआं और हिमाचल के खड्ड-नालुओं के अलावा दो कलाकार ही नए हैं।
वैसे कोई क्या गाता है, क्या लिखता है, क्या नाम रखता है, क्या वीडियो बनाता है; यह उसका निजी मामला है। यह भी कहा जा सकता है कि गानों से, फिल्मों से, वीडियो या नाटकों से अगर इतना ही असर पड़ता है तो ऐसे गाने और क्राइम सीन तक उनसे हटा दिए जाने चाहिए। मगर ऐसा याद नहीं आता कि किसी फिल्म या सीरियल आदि में ऐसे अपराधों को बार-बार ग्लोरीफाई किया गया हो।
कुछ लोग शराब का उदाहरण देंगे कि इसपर भी गाने हैं, ग़ज़लें हैं, शेर हैं। मगर यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि दोनों में क्या फर्क है। शराब पीकर कोई बच्चा घर नहीं जा सकता, स्कूल नहीं जा सकता क्योंकि गन्ध से पकड़ा जा सकता है। भांग इसीलिए लोकप्रिय हुई है युवा पीढ़ी में क्योंकि इसका नशा करने के बाद आपको पकड़ा नहीं जा सकता। लैब टेस्ट से ही पुष्टि हो सकती है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हिमाचल प्रदेश इस समय नशाखोरी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है। जब कुछ ग्राम चरस-गांजा मिलने पर ही आप सलाखों के पीछे जा सकते हैं तो बार-बार उसका अप्रत्यक्ष प्रचार करना कैसे सही हो सकता है? दुनिया के अन्य देशों का उदाहरण देने वाले समझें कि हिमाचल भांग के उत्पादों को लीगलाइज़ करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए कि आपके प्रदेश में आठवीं-नौवीं तक के बच्चे सुट्टा मार रहे हैं।
इस माहौल में शिव के बहाने वे अपनी लत को जस्टिफाई करते हैं। इसी पोस्ट पर देखना, कितने सारे बालक भांग और शिव के नाम पर भांग उत्पादों के सेवन को जस्टिफाई करते दिखेंगे। और फिर आपके भांग को पवित्र बताने वाले गाने इनके बीच इस नशीली चीज की स्वीकार्यता को बढ़ाते हैं।
बार-बार गाने भांग पर ही क्यों?
एक आध बार तो मान लिया मगर बार-बार जब आपके गाने इसी विषय पर आ रहे हों तो यह शक क्यों न जताया जाए कि भांग के प्रति बच्चों की जिज्ञासा और नशे को सामान्य मानने वाले युवाओं की भावना का दोहन करने के लिए आप ऐसे गाने बना रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि इनके सफल होने की संभावना ज्यादा है। मगर याद रखें, जब आप सफल हो जाते हैं तो आप इंफ्लुएंसर बन जाते हैं। यानी लोग आपको फॉलो करते हैं, आपकी जीवनशैली को अपनाने की कोशिश करते हैं। इसलिए पॉपुलर होने के साथ आपकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।
यह प्रीतम का दौर है जब आप किसी भी गाने का संगीत उठाकर अपने बोल बिठा दीजिए और कह दीजिए कि हमने तो बस प्रेरणा ली। इंडियन ओशन के ‘मां रेवा’ को ‘महादेवा’ बनाकर गा दीजिए मगर जबरन और बार-बार उसमें भांग, गांजा, चरस, सुट्टा, धुआं, बूटी न डालें। इनके बिना भी शिव की स्तुति हो सकती है और साथ ही और विषयों पर भी सफल गाने बन सकते हैं। हमें आपकी प्रतिभा पर विश्वास है। आप कब अपनी प्रतिभा पर भरोसा करेंगे?
(लेखक लंबे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है)
बिलासपुर।। जिन युवाओं ने घुमारवीं में खाद्य में नागरिक आपूर्ति विभाग के स्टोर से गलत ढंग से गेहूं ले जा रहे दुकानदार का वीडियो बनाया था, अब उनके ऊपर दबाव बनाने का खेल चल पड़ा है।
वीडियो बनाने में शामिल रहे युवक के भाई की दुकान है। यहां से सैम्पल भरे गए हैं। इसे युवकों पर प्रशासन में बैठे अधिकारियों की ओर से दबाव बनाने की कोशिश माना जा रहा है। हालांकि विभाग इसे सामान्य कदम बता रहा है।
हालात ऐसे हैं कि मीडिया में भी चर्चा होने लगी है कि सैम्पल भरने का यह कदम इसीलिए उठाया जा रहा है कि उन्होंने एक बड़े घोटाले से पर्दा उठाया। ऐसी भी चर्चा है कि सैम्पल भरने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों पर भी दबाव बनाया जा रहा है। लोगों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गुस्सा देखने को मिल रहा है।
गौरतलब है कि युवकों द्वारा बनाए गए वीडियो में दिखता है कि खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम के स्टोर से गेहूं को जीप में लोड किया जा रहा था। फिर युवाओं ने जब कर्मचारियों से इसके बिल दिखाने को कहा तो वे गोलमोल बातें करते दिखे।
बाद में एक दुकानदार ने फंसने के डर से इन युवाओं को बातचीत में बताया कि कैसे वह लंबे समय से यहां से सामान खरीदता है। उसने कुछ और लोगों के भी नाम लिए जो इस खेल में शामिल हैं।
बिलासपुर।। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले के घुमारवीं में कुछ युवाओं के बनाए वीडियो पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गए हैं। वायरल हुए इन दो वीडियो में दिखता है कि खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम के स्टोर से गेहूं को जीप में लोड किया जा रहा था। फिर युवाओं ने जब कर्मचारियों से इसके बिल दिखाने को कहा तो वे गोलमोल बातें करते दिखे। बाद में एक दुकानदार ने फंसने के डर से इन युवाओं को बातचीत में बताया कि कैसे वह लंबे समय से यहां से सामान खरीदता है। उसने कुछ और लोगों के भी नाम लिए जो इस खेल में शामिल हैं। यह सब बातचीत मोबाइल में रिकॉर्ड हो गई। मगर अब इन युवकों को टारगेट किए जाने की खबर भी सामने आई है।
सोशल मीडिया में लोग तो दुकानदार के कन्फेशन वाले वीडियो को शेयर करते हुए सरकार से कार्रवाई की मांग कर ही रहे थे, अब इस कांग्रेस भी इस मामले में सक्रिय हो गई है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री से मामले की न्यायिक जांच करवाने की मांग की है। घुमारवीं के पूर्व विधायक राजेश धर्माणी ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने इस घटना को बड़ा घोटाला बताते हुए आपोप लगाया कि इसमें कुछ हाई प्रोफाइल चेहरे और बीजेपी नेताओं के चहेते भी शामिल हैं।
क्या है मामला इस घटना के दो वीडियो हैं। इस मामले में विसलब्लोअर है एक युवक जिसने इस वीडियो के संबंध में सबसे पहले पत्रकारों को जानकारी दी थी। उनका कहना था कि जब वह दोस्तों के साथ घुमारवीं के चैहड़ में नागरिक आपूर्ति निगम के स्टोर के पास से गुजर रहे थे, तब उन्होंने देखा कि पट्टा में दुकान करने वाले शख्स की जीप यहां पर खड़ी थी। रमेश महाजन नाम का यह शख़्स स्टोर के कर्मचारियों से कह रहा था कि उसने तीन दिन पहले पैसे दिए हैं और अब हर हाल में माल चाहिए। इसपर उन्हें शक हुआ। देखते ही देखते स्टोर से जीप में 20 क्विंटल गेहूं के बोरे लोड कर दिए गए।
इन युवाओं ने सामान लोड कर रहे व्यापारी और कर्मचारियों से कहा कि बिल दिखाएं मगर वे बिल नहीं दिखा पाए। जब युवाओं ने पूछा कि राशन कहां के लिए जा रहा है तो वे लोग कभी वे डंगार का नाम लेने लगे तो कभी लैहड़ी-सरेल डिपो का। बाद में पूछताछ से परेशान दुकानदार ने यह कहना शुरू कर दिया कि वह ही नहीं, और लोग भी हैं जो इसी तरह से सामान उठाते हैं। उसने बताया कि वह लंबे समय से स्टोर में तैनात कर्मचारियों को पैसे देकर सामान खरीदता है। उसने और लोगों के नाम भी लिए और आरोप लगाया कि वे भी ऐसा ही करते हैं।
तीन लोगों पर लगाए आरोप
वायरल वीडियो में दिखता है कि दुकानदार ने तीन लोगों के नाम लिए। पहला नाम घुमारवीं शहर में किराने की दुकान चलाने वाले जगरनाथ शर्मा का है जो स्थानीय विधायक के रिश्तेदार हैं। दूसरा नाम महेंद्र पाल रतवान का है जो बीजेपी के मीडिया प्रभारी और जिला बिलासपुर फेडरेशन के चेयरमैन व घुमारवीं कॉलेज की एसएमसी के प्रधान हैं। तीसरा नाम हरिजन सहरकारी सभा हारकुकाहर के सचिव रमेश कुमार का है। फंसे हुए दुकानदार ने इन सभी के नाम लिए हैं।
ध्यान देने की बात यह है कि ये नाम उस शख्स ने लिए हैं, जो खुद गलत काम करता हुआ पकड़ा गया है और उसने खुद माना है कि वह गलत काम में शामिल है। ऐसे में इस शख्स की बात पर आंखें मूंदकर तो यकीन नहीं किया जा सकता। बेहतर होता कि वीडियो सामने आने के बाद तुरंत खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग और पुलिस महकमा हरकत में आकर तुरंत जांच करते। मगर अब तक इस मामले में कोई प्रगति नहीं हो पाई है। अब जांच होती है तो भी यह आशंका है कि इस खेल में शामिल रहे लोगों ने बिलों आदि का जुगाड़ करके अपने बचने की व्यवस्था कर ली होगी।
Mixture of dried lentils, peas, soybeans, beans – background
पूरे प्रदेश में चल रहा है किसान
मगर यह वीडियो और इसमें दिखने वाले शख्स की स्वीकारोक्ति दिखाती है कि इस तरह का खेल कैसे चल रहा है। ऐसे में प्रदेश के अन्य हिस्सों के स्टोरों में भी ऐसा खेल न चल रहा हो, ऐसा नहीं माना जा सकता। अक्सर लोगों को तय तारीख के बाद डिपो होल्डर राशन देने से इनकार कर देते हैं। वे बचे हुए राशन को कहां बेचते हैं, यह तो जांच का विषय है ही, बड़े स्टोरों से भी राशन कहां जाता है, इसकी भी जांच होनी चाहिए।
सरकार हर साल करोड़ों रुपये की सब्सिडी देकर जरूरतमंद लोगों को सस्ती दरों पर राशन मुहैया करवाती है लेकिन सोचिए, आपके पैसे से दी जा रही सब्सिडी और इससे खरीदा जाने वाला राशन किन लोगों के घर भर रहा है। अफसोस, सरकार अब तक खामोश है।
बद्दी।। हिमाचल प्रदेश स्टेट विजिलेंस ऐंड ऐंटी करप्शन ब्यूरो की टीम ने बद्दी में तैनात रहे सहायक ड्रग कंट्रोलर के कई ठिकानों पर दबिश दी है। जानकारी मिली है कि चंडीगढ़, बद्दी और अन्य ठिकानों पर भी कार्रवाई की जा रही है। इसके लिए विजिलेंस ने चार से छह टीमों का गठन किया है।
बता दें कि इस अधिकारी पर अवैध ढंग से घुसकर सैम्पल फेल करने की धमकी देकर ब्लैकमेल करने का आरोप लगा हुआ था। इसके साथ कथित तौर पर एक पत्रकार भी शामिल था जिसने रेड की फर्जी न्यूज अपने पोर्टल पर लगाई थी। इस संबंध में हमने हाल ही में एक आर्टिकल में जानकारी दी थी।
उधर एमबीएम न्यूज के मुताबिक, संपर्क किए जाने पर स्टेट विजिलेंस व ऐंटी करपशन ब्यूरो के एडीजी अनुराग गर्ग ने पुष्टि करते हुए कहा कि करीब आधा दर्जन ठिकानों पर कार्रवाई जारी है। उन्होंने कहा कि सहायक ड्रग कंट्रोलर के खिलाफ शिकायत मिली थी कि वह रिश्वत के मामलों में संलिप्त हैं, इसी के तहत कार्रवाई की जा रही है।
(सिंडिकेशन के तहत एमबीएम न्यूज नेटवर्क के इनपुट्स के साथ)
धर्मशाला।। कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और धर्मशाला के पूर्व विधायक सुधीर शर्मा ने कहा जाए कि वह सेहत ठीक न होने के कारण राजीव गांधी की जयंती के कार्यक्रम में शिरकत नहीं कर पाए। उन्होंने बीजेपी में शामिल होने की अटकलों को भी गलत बताया है।
पूर्व मंत्री ने एक बयान जारी करके कहा है, “सोशल मीडिया पर मेरे बारे में भाजपा में शामिल होने को लेकर फैल रही खबरें सच्चाई से परे हैं। मैं कांग्रेस का सच्चा सिपाही हूं और इसका मुझे किसी को प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है। कांग्रेस पार्टी मेरी माँ है और इसका मैं वफादार बेटा हूँ।”
आगे उन्होंने कहा है, “सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही खबरें राजनीतिक द्वेष से प्ररित हैं और इससे मेरी छवि को धूमिल करने की नाकाम कोशिश की जा रही है, जिसका मैं कड़े शब्दों में विरोध करता हूं।’
राजीव जयंती पर न आ पाने को लेकर सुधीर ने कहा है, “इस मौके पर मेरा भी उपस्थित होना अपेक्षित था लेकिन स्वास्थ्य ठीक न होने के कारण मैं इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पाया जिसका मुझे खेद है। कांग्रेस पार्टी एकजुट है और इसे तोड़ने की कोशिश करने वाली ताकतों को कड़ा जबाव दिया जाएगा।। पार्टी के सभी सदस्य परिवार की तरह हैं और परिवार में कई उतार- चढ़ाव आते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि परिवार को मुसीबत में छोड़ कर गैरों को गले लगा लिया जाए।”
धर्मशाला।। धर्मशाला में होने जा रहे उपचुनाव से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 75वीं जयंती पर अपना राज्य स्तरीय कार्यक्रम धर्मशाला में रखा था। इसका मकसद उपचुनाव से पहले कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में जोश भरना था। इसके लिए प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर भी यहां पहुंचे थे मगर उस समय कांग्रेसी खेमे में हलचल पैदा हो गई जब सुधीर शर्मा ही इस कार्यक्रम में नहीं आए।
धर्मशाला के पूर्व विधायक सुधीर शर्मा का इस कार्यक्रम से गायब रहना इसलिए भी अहम है क्योंकि उनके कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने की चर्चा पहले से ही छिड़ी हुई। यहां तक कि कुछ अखबारों और ऑनलाइन समाचार स्रोतों ने भी इस खबर को प्रकाशित किया था। ऐसे में सुधीर का कांग्रेस के ही बड़े कार्यक्रम, जिसमें प्रदेशाध्यक्ष भी थे, से गायब रहना कई सवाल छोड़ गया है। इसने इन अटकलों को बल दिया है कि वह कांग्रेस छोड़कर वाकई कहीं बीजेपी में शामिल न हो जाएं।
अक्सर सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखने वाले सुधीर ने इस संबंध में अपने फेसबुक पेज पर भी खंडन नहीं किया है उनके बीजेपी में जाने वाली अटकलें सच्ची हैं या झूठी हैं। यह भी पता नहीं चल पाया है कि वह कांग्रेस के कार्यक्रम में क्यों नहीं आ पाए। हालांकि उन्होंने मंगलवार सुबह अपने फेसबुक पेज पर राजीव गांधी को श्रद्धांजलि दी है।
अब राठौर के भी बदले स्वर
धर्मशाला से बीजेपी किसे टिकट देगी, इस बात को लेकर संशय बना ही हुआ था मगर कांग्रेस को लेकर स्थिति साफ थी कि वह यहां से पूर्व विधायक रहे सुधीर शर्मा को ही उतारेगी। मगर मंगलवार की घटना के बाद कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर के भी स्वर बदल गए हैं। उन्होंने कहा है- किसी का टिकट फाइनल नहीं है, अभी हाईकमान तय करेगा कि किसे टिकट देना है। हालांकि सुधीर शर्मा के कांग्रेस छोड़ने को लेकर उन्होंने कहा- “ऐसा कुछ नहीं है। अभी मेरी उनसे बात हुई है और उन्होंने इन बातों का खंडन किया है। वैसे आप चाहें तो उनसे बात कर सकते हैं।”
उधर इस खबर से पूरे प्रदेश में कांग्रेस कार्यकर्ताओं में हलचल मच गई है। कांग्रेस ने धर्मशाला को राजीव गांधी जयंती के लिए इसीलिए चुना था ताकि एक तरह से उपचुनाव की तैयारी की जा सके। यह ठीक वैसा क़दम था, जैसे पच्छाद उपचुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने हिमाचल निर्माता डॉ. वाई.एस. परमार के पैतृक गांव में उनकी जयंती मनाई थी। मगर धर्मशाला में जिस सिपहसलार के लिए यह किया गया, उसी का कार्यक्रम से नदारद रहना सबको चौंका गया है।
इन हिमाचल डेस्क।। आईटी सेक्टर में तेजी से हुई प्रगति के कारण कई अच्छी चीजें हुई हैं। मीडिया का भी स्वरूप भी बदला है। अखबार, रेडियो और टीवी जैसे पारंपरिक मीडिया को तो डिजिटल प्लैटफॉर्म्स पर आना ही पड़ा, कुछ नए डिजिटल ओनली मीडिया प्लैटफॉर्म भी उभरे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी कई ऐसे समाचार और विचार आधारित पोर्टल हैं जो अच्छा काम कर रहे हैं। इनमें से कई का कॉन्टेंट बहुत सारे पारपंरिक मीडिया संस्थानों से भी बेहतर है। मगर इसी मीडिया को गलत ढंग से भी इस्तेमाल किया जा रहा है।
फेक न्यूज
जहां पत्रकारों और मीडिया का काम जनता के हित के मुद्दे उठाना और सरकार की योजनाओं या फैसलों की समीक्षा करना है, वहीं कुछ पोर्टल इस सब से परे कुछ और ही काम कर रहे हैं। इन पोर्टलों की जनता के बड़े वर्ग तक पहुंच नहीं है मगर ये क्लोज फेसबुक और वॉट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से एक विशेष तरह के आर्टिकल प्रसारित करते हैं जिनका अक्सर सच्चाई और तथ्यों से कोई वास्ता नहीं होता। वॉट्सऐप पर सबसे तेजी से फेक न्यूज का प्रसार होता है और न्यूज की शक्ल में पेश की गई किसी भी बात पर आम लोग जल्दी यकीन कर लेते हैं।
न्यूज के नाम पर कुछ भी छापा जा रहा है।
ब्लैकमेलिंग और धन उगाही
डिजिटल मीडिया के संबंध में अभी तक कोई कानून या नीति नहीं है, इसलिए डिजिटल मीडिया सेल्फ रेग्युलेटेड ही है। इसका फायदा यह है कि पोर्टलों पर किसी भी तरह के प्रभाव का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, आसानी से कोई सेंसरशिप नहीं थोपी जा सकता। मगर इसका नुकसान भी है। दरअसल इसी स्वतंत्रता की आड़ में कुछ लोग गैरजिम्मेदाराना रिपोर्टिंग भी करने लगे हैं। इसके पीछे का मकसद जनहित नहीं बल्कि ब्लैकमेलिंग से लेकर राजनीतिक या व्यावसायिक हितों को साधना तक हो सकता है। इस तरह के कई मामले आए दिन सामने आ रहे हैं।
बद्दी के एक चर्चित मामले का उदाहरण
हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक शहर बद्दी में इसी साल जून में असिस्टेंड ड्रग कंट्रोलर (एडीसी) और एक स्थानीय पत्रकार पर मिलकर एक फार्मा कंपनी को ब्लैकमेल के आरोप लगे थे। इस मामले में फार्मा कंपनी ने शिकायत दी थी कि एडीसी ने 27 जून को 12 बजे एक वेब पोर्टल के पत्रकार के साथ मिलकर फर्जी रेड की कहानी रची। पुलिस को दी गई शिकायत में फार्मा कंपनी के मालिक ने लिखा है कि ये दोनों लोग भारत सरकार के चिह्न वाली गाड़ी में आए बदतमीजी करने लगे। यही नहीं, कथित तौर पर इनसे कहा गया कि ड्रग विभाग के आला अधिकारियों के खिलाफ कैमरे के सामने बयान दो वरना सैंपल भरके कार्रवाई की जाएगी।
पोर्टल पर खबर फ्रेम करने का आरोप
शिकायत में लिखा गया है कि एडीसी और कथित पत्रकार ने बतदमीजी भी की। फार्मा कंपनी के मुताबिक बिना नोटिस इस तरह की कार्रवाई नहीं की जा सकती थी। एडीसी और पत्रकार ने यह भी कहा था कि पुलिस भी थोड़ी देर में पहुंचेगी मगर पुलिस वहां नहीं आई। आरोप यह भी है कि बाद में एडीसी ने बिहार के स्टेट ड्रग कंट्रोलर को चिट्ठी भेजकर उनकी कंपनी से गया माल फ्रीज करवा दिया। शिकायत में कहा गया है कि इस घटनाक्रम में शामिल रहे पत्रकार ने ‘फर्जी रेड’ की खबर बनाकर अपने पोर्टल पर लगा दी जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा।
पुलिस को दी गई शिकायत का हिस्सा
उस समय एसपी ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज करने और जांच के बाद कार्रवाई करने की बात कही थी। अब क्या स्थिति है, यह स्पष्ट नहीं। मगर सवाल यह है कि पत्रकार पर लगे इस गंभीर आरोप की जांच क्यों नहीं की जा रही? दूध का दूध और पानी का पानी होना जरूरी है वरना कल को सभी पत्रकारों से लोगों का भरोसा उठ जाएगा। इस तरह के मामलों में बरती जाने वाली सुस्ती से सरकार पर भी सवाल उठते हैं कि वह क्यों शांत है और कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी तंत्र में ही बैठे कुछ लोग ऐसे लोगों को संरक्षण देते हैं। ऐसे हर मामले में पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए ताकि अगर कोई शख्स पत्रकारिता की आड़ में गलत काम कर रहा हो तो उसे सलाखों के पीछे डाला जाए।
बहरहाल, बद्दी का यह मामला एक बार फिर से चर्चा में है क्योंकि इस विवादित घटनाक्रम में कथित तौर पर शामिल रहे पत्रकार के गुमनाम से पोर्टल को एक नहीं, तीन-तीन सरकारी विज्ञापन मिले हुए हैं। ऑनलाइन मीडिया संस्थानों के कर्मचारियों और पत्रकारों के बीच चर्चा छिड़ गई है कि इस तरह के पोर्टल को धड़ल्ले से सरकारी विज्ञापन मिल रहे हैं जबकि हिमाचल में कई सालों से काम कर रहे भरोसेमंद और स्थापित पोर्टलों को सरकारी विज्ञापन देने में कोताही की जा रही है। सवाल उठ रहा है कि सरकार के विज्ञापन जारी करने वाले महकमे में कौन बैठा है जो इस तरह के पोर्टलों को आश्रय दे रहा है।
कैसे दिए जाते हैं सरकारी ऐड
हिमाचल प्रदेश का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ही प्रदेश सरकार की ओर से जारी होने वाले विज्ञापनों को आवंटन करता है। अमूमन होना यह चाहिए कि अखबारों और मीडिया चैनलों की तर्ज पर डिजिटल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को भी उनकी रीडरशिप/व्यूरअरशिप के आधार पर विज्ञापन मिलने चाहिए और उनका रेट भी उसी आधार पर फिक्स होना चाहिए। मगर ‘इन हिमाचल’ को जानकारी मिली है कि विभाग में तय नियमों का कोई पालन नहीं किया जाता।
अखबारों और चैनलों को अधिकारियों की मर्जी से ही ऐड दिए जाते हैं। होना यह चाहिए कि जिस अखबार का सर्कुलेशन ज्यादा है, उसे किसी विज्ञापन के लिए अधिक पैसे मिलने चाहिए जबकि कम पहुंच वाले अखबार को कम। मगर इसमें पूरी तरह से सर्कुलेशन को आधार नहीं बनाया जाता। रही बात पोर्टल की, उसके लिए कोई पॉलिसी ही नहीं है। यह जांच होनी चाहिए कि कौन सरकार के यानी कि आपके पैसे की बंदरबांट कर रहा है। विज्ञापन सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए दिए जाते हैं। वे जनता तक तभी पहुंचेंगे जब विज्ञापन लेने वाला मीडिया जनता तक पहुंचता हो।
विज्ञापन उस पोर्टल, अखबार या चैनल को मिलने चाहिए जिसकी पहुंच हो।
बंदरबांट
हिमाचल प्रदेश में आप कई पोर्टल देखेंगे जिन्हें खुले एक महीना नहीं हुआ मगर उनके ऊपर हिमाचल सरकार के विज्ञापन होते हैं। उनकी पहुंच भले ही पोर्टल के संचालक और उसके चार परिजनों तक हो, उसे वह विज्ञापन मिल रहा है। इसके साथ ही जो पोर्टल हर मीने लाखों लोगों तक पहुंचते हैं, उन्हें भी वह विज्ञापन मिल रहा है। मगर आपको हैरानी होगी कि चार लोग जिसे पढ़ते हैं, उस पोर्टल को भी 10 हजार दिए जा रहे हैं और जिसे 10 लाख पढ़ते हैं, उसे भी 10 हजार। बहुत सारे लोग तो ऐसे हैं जिन्होंने बाजार में न दिखने वाले साप्ताहिक या मासिक अखबार चलाए हैं और उन्हीं के नाम पर पोर्टल खोलकर डबल ऐड ले रहे हैं।
यानी हिमाचल प्रदेश सरकार ने कोई नीति, कोई क्राइटीरिया नहीं रखा है कि किसे विज्ञापन देना है और किस दाम पर। अगर आप भी हर महीने 10 हजार का ऐड लेना है तो तुरंत एक वेबसाइट बनाइए और शिमला में संबंधित विभाग में कोई जुगाड़ खोजकर आवेदन कर दीजिए। बेरोज़गारी भत्ते से तो ज्यादा ही पैसे मिलेंगे आपको।
ऑनलाइन मीडिया के पत्रकारों का दर्द
इसके अलावा अगर आप लंबे समय से टीवी या अखबार के लिए काम कर रहे हैं तो हिमाचल सरकार आपको मान्यता देगी। मगर पूरी दुनिया में जो मीडिया टीवी और अखबार पर हावी हो चुका है, उस मीडिया के लिए काम करने वाले पत्रकारों की उपेक्षा हो रही है। जी हां, डिजिटल प्लैटफॉर्म्स के लिए काम करने वाले पत्रकारों को मान्यता हासिल करना मुश्किल है। यही कारण है अच्छे अनुभवी पत्रकार डिजिटल पोर्टलों के साथ काम करने से कतराते हैं और यही कारण है कि डिजिटल पोर्टलों के कॉन्टेंट में तीखापन देखने को नहीं मिलता है।
बहरहाल, जरूरी है कि सरकार न सिर्फ डिजिटल मीडिया में काम करने वाले पत्रकारों को अन्य पत्रकारों की तरह मान्यता दे, बल्कि यह भी जरूरी है कि ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स को ऐड देने के नियम तय किए जाएं। यह देखा जाए कि वे कितने समय से हैं, उनकी रीच (पहुंच) कितनी है और उनकी विश्वसनीयता क्या है। तभी ऑनलाइन मीडिया का स्तर बेहतर होगा, अच्छे और अनुभवी लोग अच्छे पोर्टलों से जुड़ेंगे। साथ ही फर्जी खबरें फैलाने वाले पोर्टलों पर भी लगाम लगेगी।
Disclaimer: ‘इन हिमाचल’ सरकार, कंपनियों, संस्थानों, राजनीतिक दलों या संगठनों से किसी तरह के विज्ञापन नहीं लेता है और न ही ऐसा करने का इरादा रखता है। इस संबंध में हमारी नीति पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश के कई इलाकों में पिछले 24 घंटों से लगातार बारिश हो रही है। इस कारण नाले, खड्डें और नदियां पानी से लबालब भरी हैं और कुछ जगहों पर तो पानी किनारों से निकलकर आसपास के रिहायशी इलाकों में घुस गया है। पानी की इन प्राकृतिक धाराओं के किनारे बसे लोग परेशान हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उनके लिए है जिनके घर या दफ्तर आदि खड्डों या नदियों के किनारे की खाली पड़ी जमीन पर बने हैं।
यह बिना प्लानिंग पानी की धाराओं के किनारे बस जाना या अन्य कई तरह के निर्माण करना खतरनाक हो सकता है। कुदरत का कोई भरोसा नहीं है। 2004 में सतलुज ने हिमाचल में तबाही मचाई थी और 2013 में उत्तराखंड में जानमाल का नुकसान ज्यादा हुआ था। बेशक कुछ मौकों पर बादल फटने या प्राकृतिक कारणों से पानी का रुख मुड़ने के कारण तबाही मचती है लेकिन अक्सर नुकसान नालों, खड्डों और नदियों के किनारे तक बस गए इलाकों में होता है।
पालमपुर की न्यूगल खड्ड ने फिर दिखाया रौद्र रूपसुबह से जारी है भारी बरसातबरसात के चलते नदी-नाले पूरे सबाब परपालमपुर की न्यूगल खड्ड ने फिर दिखाया रौद्र रूपसुबह 4 बजे से पूरे उफ़ान पर है न्यूगल खड्डबीते साल सौरभ वन विहार को लील गई थी ये खड्डकरोड़ों की लागत से बनाया गया गए वन विहार हो गया था तहस-नहस
ऐसे में बिना प्लैनिंग हिमाचल में जगह जगह नदी-नालों के किनारे बने घरों, मंदिरों, दफ्तरों, स्कूलों और अन्य इमारतों आदि के ऊपर हमेशा खतरा रहेगा। जरूरी है कि सरकार इस ओर ध्यान दे और किसी को भी पानी के करीब कोई स्थायी निर्माण न करने दें। वरना सरकारी यानी आपकी जेब से गए पैसे की बर्बादी तो ये है ही, किसी दिन बड़े हादसे को भी न्योता देगा।
इस संबंध में हम मंडी से संबंध रखने वाले आदर्श राठौर के फेसबुक पेज से उनके शब्दों को आगे लेख के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। पढ़ें:
कोई बादल फटने को दोष दे रहा है तो कोई सरकार की लापरवाही को। मगर कोई ये मानने और बोलने को तैयार नहीं है कि पहाड़ी इलाकों में तबाही जलधाराओं में उफान के कारण नहीं बल्कि इंसान के लालच की सीमाएं पार होने के कारण मच रही है। यह कुदरत की नहीं, इंसानी फितरत की देन है। यह जलवायु परिवर्तन ही नहीं, भावना परिवर्तन की भी मार है।
बरसात में आपको कोई पुराना कच्चा मकान नदी या नाले में डूबता नहीं मिलेगा। सब नए मकान पानी में डूब रहे होंगे जो उन्होंने उस खाली जगह पर बनाए हैं जहां उनके पूर्वज या तो खेती करते थे या फिर यूं ही उन्होंने जमीन खाली छोड़ी हुई थी। कभी सोचा कि उन्होंने क्यों यहां मकान नहीं बनाया था? दरअसल हमारे पूर्वज इस बात को समझते थे कि पहाड़ी नदी-नालों के करीब बसना खतरनाक हो सकता है। इसलिए उन्हें दूर-दूर पहाड़ों की चोटियों पर जाकर बसना मंजूर था मगर जलधाराओं से उन्होंने दूरी बनाकर रखी। हम उनसे ज्यादा विकसित और शिक्षित हैं मगर खड्डों और नदी-नालों में घुसने को बेताब हैं।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के कई इलाकों में भारी बारिश। बनेर खड्ड समेत कई नदियां, खड्डें और नाले उफान पर। चामुंडा माता मंदिर परिसर में घुसा पानी। देखें, सुबह कैसे थे हालात।
In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಶನಿವಾರ, ಆಗಸ್ಟ್ 17, 2019
पालमपुर में न्यूगल खड्ड लगातार दूसरे साल सौरभ वन विहार में विहार कर रही है। पिछले साल जब सौरभ वन विहार को नुकसान पहुंचा था, तब मैंने लिखा था कि खड्डों और नदियों के इलाके में किसी भी तरह का निर्माण बेवकूफी है। मगर एक मंत्री जी ने लाखों लगाकर फिर से वहीं सौरभ वन विहार बनाने का ऐलान किया था। उसके बाद बड़ी रकम खर्च भी हुई थी मगर इस साल फिर सब बह गया।
पूरे हिमाचल में जलधाराओं के बीच या एकदम किनारे पर कहीं घर बने हैं, कहीं दुकानें, कहीं सरकारी दफ्तर, कहीं कॉलोनियां तो कहीं फैक्ट्रियां। कुल्लू, मंडी, कांगड़ा, चम्बा, शिमला; कौन सी जगह ऐसी है जहां किसी ने गांव के नाले का रुख न मोड़ा हो? कौन सा जिला ऐसा है जहां किसी खड्ड में कोई सरकारी इमारत न बनी हो? नदी किनारे का कौन सा शहर ऐसा है जहां कई मकानों के पिलर नदी की तलहटी से न उठे हों?
अगर खड्डें और नदी-नाले 15-20 साल में रास्ता नहीं बदल रहे तो इसका मतलब यह नहीं कि आप उनके इलाके में घुसपैठ कर दें। आज से 5 करोड़ साल पहले हिमालय पर्वत बना था। ये नदी-नाले तब से नहीं तो कम से कम कुछ लाख सालों से तो यहां बह ही रहे हैं। सोचिए, अब तक कितनी बार इन्होंने रास्ता बदला होगा। इसलिए सूख चुके नदी-नालों के नजदीक की भी कोई जगह सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।
देखते ही देखते ब्यास में बह गया कुल्लू की नग्गर तहसील के पलचान का गवर्नमेंट हाई स्कूल।
बहरहाल, शुक्र मनाइए कि आप मैदान नहीं पहाड़ में रहते हैं जहां बारिश का पानी ठहरता नहीं। यह नालों और खड्डों के सहारे लगातार निचले इलाके की ओर बहते-बहते नदियों तक पहुंच जाता है। कुदरत ने खुद पानी के लिए ऐसे रास्ते बनाए हैं कि यह अचानक आपको नुकसान नहीं पहुंचा सकता। लेकिन आप ‘आ बैल मुझे मार’ की तर्ज पर पानी के इन रास्तों को ही रोक देंगे तो फिर नुकसान के लिए भी आप खुद ही जिम्मेदार होंगे। याद रखें कि नदी-नाले पानी के बहने के लिए हैं, इंसान के रहने के लिए नहीं।”
(अगर आप भी हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर कोई लेख भेजना चाहते हैं तो हमें inhimachal.in @ gmail.com पर भेजें)
इन हिमाचल डेस्क।। आज पतरोड़ू की सगरांद मनाई जा रही है। पतरोड़ा यानी पत्तों का रोल। दरअसल ये अरबी की एक किस्म कचालू (Taro) के पत्ते होते हैं जो बरसात में उगते हैं। पूरे देश में अलग-अलग तरीके से अरबी के पत्तों के पकौड़े बनाए जाते हैं। अधिकतर जगह बेसन का लेप लगाकर सीधे ही डीप फ्राई कर दिया जाता है और फिर इन्हें स्नैक्स की तरह खाया जाता है। मगर हिमाचल में तरीका थोड़ा अलग है।
अधिकतर जगह कच्चे पत्तों को बेसन लगाकर स्लाइस काटे जाते हैं और फिर डीप फ्राई करके स्नैक्स के तौर पर इन्हें खाते हैं। मगर हिमाचल में विधि अलग है।
इन्हें साफ करके बेसन वगैरह का लेप लगाकर पहले स्टीम किया जाता है, उसके बाद इन्हें बिना फ्राई किए भी घी या मक्खन के साथ खाया जा सकता है। इसे रोटी के साथ भी खाया जा सकता है। पहले लोग बिना रोटी के सिर्फ उबले हुए पतरोड़े भी खाया करते थे क्योंकि लेप में मक्की का आटा और बेसन लगा ही होता था। बरसात के दिनों में लोगों के लिए यह वरदान था क्योंकि और सब्जियां आदि उपलबध न होने पर यही पोषक तत्वों की जरूरत को पूरा करता था। इसलिए इसके लिए विशेष त्योहार भी समर्पित है- पतरोड़ों की सगरांद।
वैसे हिमाचली पतरोड़ों को खाने के लिए घी और मक्खन जरूरी है क्योंकि चिकनाई के बिना खाने में ये थोड़े रूखे लगते हैं। तो आगे जानें, कैसे बनाएं अरबी के पत्तों का लजीज हिमाचली व्यंजन।
हिमाचली पतरोड़े या पत्रोड़े बनाने की विधि स्टेप बाइ स्टेप सीखें। तस्वीरें क्रम से लगी हैं, देखें और कैप्शन पढ़ें।
अरबी या कचालू के हरे पत्ते लें और उन्हें बहते हुए पानी में अच्छी तरह से धोएं।बेसन का ठीक वैसा घोल बनाएं, जैसा घोल पकौड़ों के लिए बनाया जाता है। नमक, प्याज, मक्की का आटा आदि स्वादनुसार डाल सकते हैं। भाभरी (एक तरह का खुशबूदार पौधा) डालना न भूलें।अरबी के पत्तों को इस तरह से उल्टा करके रखें और उसमें अच्छे से बेसन का लेप लगाएं।एक तरफ से आधा इस तरह से फोल्ड करें और फिर से बेसन लगाएं।दूसरी तरफ से भी फोल्ड करें ताकि इस तरह की शेप बने। उसपर भी लेप लगाएं।फिर इसे टाइट रोल करें (फोल्ड करें) ताकि बीच में जगह न बचे।रोल होने जाने पर पतरोड़ू ऐसा दिखेगा।इस तरह से उतने पतरोड़ू तैयार कर लें, जितने लोगों के लिए बनाए जाने हों।आमतौर पर यह स्टैंड बर्तन रखने के काम आता है, मगर इसका पतरोड़ू बनाने में बहुत योगदान है। आगे देखें।इसे बड़े से कुकर के बेस में डालें। ऐसा करने से पहले इसे साफ करना न भूलें। पहले लकड़ी के टुकड़ों का ऐसा बेस बनाया जाता था। ऐसा इसलिए ताकि पत्ते चिपकें न।अब इसमें 2 गिलास पानी डालें। ध्यान रहे कि पानी ज्यादा न हो।हल्की के पौधों के पत्ते लें। ये बरसात में उगे होते हैं।इन पत्तों को कुकर में स्टैंड के ऊपर बिछाएं। इससे उबले हुए पानी की भाप हल्दी की खुशबू का फ्लेवर पतरोड़ू में आ जाता है।अब पतरोड़ुओं को सलीके से रखें।ऊपर से और हल्दी के पत्ते रखें और ढक दें।कुकर को गैस पर रखकर करीब 20 से 30 मिनट तक पकाएं। पतरोड़े कच्चे रह गए तो लगेगी डिडरी। डिडरी यानी गले में कसैलापन महसूस होगा, इरिटेशन सी रह जाएगी।जिस दौरान पतरोड़ू पक रहे हों, ताजा मक्खन (नौणी) निकाल लें।आधे घंटे बाद पतरोड़ू पक गए होंगे। इस तरह से। ध्यान रहे, कच्चे रहे पतरोड़ू से डिडरी लगेगी, जैसा कि पहले बताया।और इस तरह से पतरोड़ू ताजा नौणी (मक्खन) और फुल्कों के साथ खाने के लिए तैयार है। यह पतरोडू बनाने का बेसिक तरीका है। आप खाने से पहले इन पतरोड़ुओं को तवे पर थोड़ा फ्राइ कर सकते हैं या डीप फ्राई भी कर सकते हैं।जो ऊपर उबले हुए पतरोड़े हैं, उनके पतले स्लाइस काटिए और तवे पर घी में या ताजा सरसों के तेल में फ्राई कीजिए। डीप फ्राई भी किया जा सकता है मगर उसमें वो वाली बात नहीं रहेगी।
वैसे पतरोड़े कई तरीकों से बनाए जा सकते हैं। यह तरीका सबसे आसान है। पसंद आए तो शेयर भी करें।
शिमला।। हिमाचल प्रदेश पुलिस के साइबर सेल ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट किया है कुछ लोग बच्चा चोरी करने वाले गिरोहों के सक्रिय होने की अफवाहें फैला रहे हैं। पुलिस ने चेताया है कि उसे ऐसे किसी मामले की जानकारी नहीं मिली है और जो लोग अफवाहें फैला रहे हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
दरअसल कुछ लोग धामी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे हैं। इसमें एक आदमी जमीन पर बैठा है और लोग उससे पूछताछ कर रहे हैं। वह घबराया हुआ है और लोगों का जवाब दे नहीं पा रहा। कभी वह हां कहता है, कभी ना। लोग सवाल पूछते हैं तो वह चुप हो जाता है। मगर जब उसे डांटा जाता है तो कुछ भी बोलने लगता है।
जब उससे हिंदी में बोलने के लिए कहा जाता है तो यह शख्स बीच में एक-दो बार ‘कन्नड़’ कहता है। फिर कोई कहता है कि क्या तुम कर्नाटक से हो, तो वो हां में जवाब देता है। इस बीच इससे बच्चा चोरी के विषय में सवाल किए जाते रहे और वो घबराया हुआ हां हां कहता रहा। सुनाई देता है कि कुछ लोग दूसरों को इसे काटने और इसकी टांग काटने की भी सलाह दे रहे हैं।
क्या कहती है शिमला पुलिस
पुलिस ने लिखा है कि जिस लड़के को धामी में लोगों ने पकड़ा है, वह हिंदी नहीं जानता और पहले से फैली अफवाहों के कारण लोग उसे बच्चा चोर समझ रहे हैं। शिमला पुलिस ने लिखा है, “कोई भी शिकायत शिमला पुलिस को नहीं मिली है। कुछ लोग सोशल मीडिया का दुरुपयोग कर अफ़वाहें फैला रहें हैं। इस तरह की अफ़वाहें फैलाना कानूनी अपराध है तथा इस पर कानून के अनुसार कार्यवाही अमल में लाई जाएगी।”
आगे लिखा है, “सभी से अनुरोध है कि किसी भी जानकारी के लिए नजदीकी पुलिस थाने से संपर्क करें। धामी में जो लड़का गांव वालों द्वारा लाया गया है वह हिंदी नहीं जानता है व इन्हीं अफवाहों की वजह से लोग उसे बच्चा चोर समझ रहे है। न उसे किसी ने कोई बच्चा उठाते देखा न ही उस इलाके में ऐसी कोई शिकायत है।” शिमला पुलिस ने साइबर टीम को सोशल मीडिया पर अफ़वाहें फैलाने वाले के खिलाफ जांच के निर्देश दिए गए हैं।
गौरतलब है कि देश में ऐसी ही अफवाहों के कारण कई लोगों को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला है। इसलिए अफवाहों से बचें, अज्ञान में कानून अपने हाथ में लेने से बचें। किसी भी तरह का संदेह हो तो पुलिस को सूचित करें।