शिव, भांग, चिलम, धुआं, बूटी के बिना गाना नहीं बन सकता क्या

आई. एस. ठाकुर।। क्या भांग के बिना या नशे में आए बिना शिव भक्ति नहीं की जा सकती?

हिमाचल में बहस उठी है कि आजकल शिव के नाम पर भांग और नशे के प्रचार वाले गाने बहुत आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि इससे युवा पीढ़ी पर गलत असर पड़ रहा है और वो नशे की ओर आकर्षित हो रही है। एक चर्चित गायक, जिनका गाना हिमाचल की पहाड़ियों को लांघकर देश के कोने-कोने में गाया-बजाया जा रहा है, उनपर आरोप ज्यादा लग रहे हैं।

गायक का कहना है कि मैंने और भी गाने गाए, तब किसी ने मुझे नहीं पूछा, अब ये गाना गाया और लोगों को पसन्द आया तो मुझसे अब सवाल उठाए जा रहे हैं। गायक का एक और गाना वायरल हुआ तो उन्होंने कहा- ये तो पहले का है। मगर आज 24 अगस्त को एक नया गाना जारी हुआ है और उसमें भी शिव, भांग, धुआं और हिमाचल के खड्ड-नालुओं के अलावा दो कलाकार ही नए हैं।

वैसे कोई क्या गाता है, क्या लिखता है, क्या नाम रखता है, क्या वीडियो बनाता है; यह उसका निजी मामला है। यह भी कहा जा सकता है कि गानों से, फिल्मों से, वीडियो या नाटकों से अगर इतना ही असर पड़ता है तो ऐसे गाने और क्राइम सीन तक उनसे हटा दिए जाने चाहिए। मगर ऐसा याद नहीं आता कि किसी फिल्म या सीरियल आदि में ऐसे अपराधों को बार-बार ग्लोरीफाई किया गया हो।

कुछ लोग शराब का उदाहरण देंगे कि इसपर भी गाने हैं, ग़ज़लें हैं, शेर हैं। मगर यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि दोनों में क्या फर्क है। शराब पीकर कोई बच्चा घर नहीं जा सकता, स्कूल नहीं जा सकता क्योंकि गन्ध से पकड़ा जा सकता है। भांग इसीलिए लोकप्रिय हुई है युवा पीढ़ी में क्योंकि इसका नशा करने के बाद आपको पकड़ा नहीं जा सकता। लैब टेस्ट से ही पुष्टि हो सकती है।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हिमाचल प्रदेश इस समय नशाखोरी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है। जब कुछ ग्राम चरस-गांजा मिलने पर ही आप सलाखों के पीछे जा सकते हैं तो बार-बार उसका अप्रत्यक्ष प्रचार करना कैसे सही हो सकता है? दुनिया के अन्य देशों का उदाहरण देने वाले समझें कि हिमाचल भांग के उत्पादों को लीगलाइज़ करने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए कि आपके प्रदेश में आठवीं-नौवीं तक के बच्चे सुट्टा मार रहे हैं।

इस माहौल में शिव के बहाने वे अपनी लत को जस्टिफाई करते हैं। इसी पोस्ट पर देखना, कितने सारे बालक भांग और शिव के नाम पर भांग उत्पादों के सेवन को जस्टिफाई करते दिखेंगे। और फिर आपके भांग को पवित्र बताने वाले गाने इनके बीच इस नशीली चीज की स्वीकार्यता को बढ़ाते हैं।

बार-बार गाने भांग पर ही क्यों?
एक आध बार तो मान लिया मगर बार-बार जब आपके गाने इसी विषय पर आ रहे हों तो यह शक क्यों न जताया जाए कि भांग के प्रति बच्चों की जिज्ञासा और नशे को सामान्य मानने वाले युवाओं की भावना का दोहन करने के लिए आप ऐसे गाने बना रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि इनके सफल होने की संभावना ज्यादा है। मगर याद रखें, जब आप सफल हो जाते हैं तो आप इंफ्लुएंसर बन जाते हैं। यानी लोग आपको फॉलो करते हैं, आपकी जीवनशैली को अपनाने की कोशिश करते हैं। इसलिए पॉपुलर होने के साथ आपकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

यह प्रीतम का दौर है जब आप किसी भी गाने का संगीत उठाकर अपने बोल बिठा दीजिए और कह दीजिए कि हमने तो बस प्रेरणा ली। इंडियन ओशन के ‘मां रेवा’ को ‘महादेवा’ बनाकर गा दीजिए मगर जबरन और बार-बार उसमें भांग, गांजा, चरस, सुट्टा, धुआं, बूटी न डालें। इनके बिना भी शिव की स्तुति हो सकती है और साथ ही और विषयों पर भी सफल गाने बन सकते हैं। हमें आपकी प्रतिभा पर विश्वास है। आप कब अपनी प्रतिभा पर भरोसा करेंगे?

(लेखक लंबे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है)

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