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Thursday, April 23, 2026
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अब एसपी डीडब्ल्यू नेगी की तरफ घूमी CBI जांच की सूई

शिमला।। गुड़िया हत्याकांड के नाम से पहचाने जाने वाले कोटखाई रेप ऐंड मर्डर केस की जांच कर रही सीबीआई ने अब अपना रुख शिमला के तत्लकालीन एसपी डीडब्ल्यू नेगी की तरफ किया है। गुड़िया का शव मिलने के बाद शुरू के तीन दिनों तक शुरुआती जांच के लिए एसपी नेगी ही हलाइला में डटे थे। किसी भी मामले में शुरुआती जांच बहुत अहम होती है क्योंकि उसी दौरान संवेदनशील सबूत और जानकारियां जुटाई जानी होती हैं। मगर नेगी की जांच के दौरान कोई भी सबूत नहीं मिला था। इसी कारण लोगों में नाराज़गी पैदा हुई थी और आईजी जहूर एच. ज़ैदी के नेतृत्व में एसआईटी बनी थी, जिसके ज्यादातर सदस्य पहले ही सीबीआई की गिरफ्त में हैं।

 

हिंदी अखबार अमर उजाला की रिपोर्ट के मुताबिक सीबीआई के सूत्रों का कहना है कि शुरुआती तीन दिनो की जांच ही नेगी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। सीबीआई पूछ सकती है कि शुरुआती जांच में आखिर क्या पता चला था। अखबार ने लिखा है, “सूत्र बताते हैं कि शुरुआती जांच के दौरान ही एसपी नेगी पर साक्ष्य मिटाने जैसे गंभीर आरोप लगे थे। शव से सैंपल लेने, क्राइम सीन सील करने के अलावा कथित संदिग्ध आरोपियों के घर दबिश और वहां से मिले सामान को सील करने में गड़बड़ी की आशंका थी। इसके अलावा अब तक गुड़िया के दाएं पैर का एक जुराब भी गायब थी। कहा जाता रहा कि एक आरोपी के घर से वह जुराब मिली थी लेकिन उसे गायब कर दिया गया। नेगी को भी ऐसे ही आरोपों और सवालों का सामना करते हुए सीबीआई को संतोषजनक जवाब देना है।”

 

बता दें कि डीडब्ल्यू नेगी मुख्यमंत्री वीरभद्र के खास मानते जाते हैं। पिछले दिनों कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि वह शिमला के एसपी बनने वाले एसपीएस कैडर के पहले अधिकारी रहे हैं। उनसे पहले जो भी शिमला का एसपी बना, वह आईपीएस ऑफिसर था। मौजूदा एसपी सौम्या सांबशिवन भी आईपीएस ऑफिसर हैं। नेगी पिछले दिनों विवादों में भी रहे थे, जब रिकांगपिओ में आत्महत्या करने वाले एक शख्स ने अपने सुसाइड नोट में अपनी मौत के लिए जिम्मेदार लोगों में नेगी का भी नाम लिखा था। इस मामले में नेगी पर मामला दर्ज न होने को लेकर सवाल भी उठे थे।

बुरी तरह से गिर चुका है हिमाचल की पुलिसफोर्स का मनोबल

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में आईजी, एसपी, डीएसपी, एएसपी जैसे स्तर के पुलिस अधिकारी सीबीआई की जांच की ज़द में हैं और इनमें से कई को गिरफ्तार भी किया जा चुका है। जैसे ही यह खबर मीडिया में फैली थी कि सीबीआई ने कोटखाई रेप ऐंड मर्डर केस के संबंध में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को पकड़ा, पूरे प्रदेश के पुलिसकर्मी असहज स्थिति में आ गए। मामला सीधे-सीधे उनके महकमे से जुड़ा था। उनके महकमे की प्रतिष्ठा में आंच आने का मतलब है कि उनकी अपनी प्रतिष्ठा भी कम होती। इसके बाद कई पुलिसकर्मियों ने सोशल मीडिया अपने विचार जाहिर कि और कहा कि सभी पुलिसवाले एक जैसे नहीं होते और कुछ गंदी मछलियों की वजह से पूरा डिपार्टमेंट गलत समझ लिया जाता है। इनमें से कुछ ने इस संबंध में दूसरों की पोस्ट्स शेयर कीं तो कहीं पर कॉमेंट या लाइक किए। कुछ ने अपनी पोस्टें हटा दीं तो कुछ ने बनाए रखी हैं।

 

ब्लैकमेलिंग करके उगाही का आरोप
भारत में पुलिस की छवि एक तो पहले ही ठीक नहीं है। और यह भी सही है कि पुसिसवालों का रवैया आम आदमी के प्रति रूखा-सूखा सा रहता है और इससे तमाम आशंकाओं और अफवाहों को बल मिलता है। साथ ही इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि पुलिस अपनी कार्यप्रणाली की वजह से भी बदनाम है। उदाहरण के लिए पिछले दिनों एचआरटीसी के आरएम को चिट्टा के साथ पकड़े जाने की खबर आई। कुछ दिनों बाद वह आरएम मीडिया के सामने आए और दावा किया कि जिसे पुलिस चिट्ठा बता रही थी, वह लैब में सोडा निकला। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें झूठा फंसाया गया और बदले में उनसे पैसों की मांग की जा रही थी। उन्होंने कहा कि इस आधार पर मैं कोर्ट से भरी भी हो गया हूं। मगर इसके बाद पुलिस की तरफ से कोई सफाई नहीं आई।

एसपी पर सुसाइड के लिए उकसाने का आरोप
जहां एक तरफ आम मामलों में किसी का नाम किसी के सुसाइड नोट में आए तो सबसे पहले उसे हिरासत में लेकर पूछचाथ की जाती है। मगर शिमला के पूर्व एसपी डीडब्ल्यू नेगी का नाम एक सुसाइड नोट में आया। रिकांगपिओ में खुदकुशी करने वाले शख्स के पास मिले सुसाइड नोट में दबाव बनाने का आरोप नेगी पर भी लगा था। अगर मामला किसी आम इंसान से जुड़ा होता तो पुलिस तुरंत उठाकर ले जाती। मगर इस केस में पुलिस ने एफआईआऱ में नेगी को नामजद करने में भी आनाकानी की। अब इस मामले की प्रगति कहां पहुंची है, साफ नहीं हो पाया है। इस तरह की घटनाओं से भी जनता में गलत संदेश जाता है और आम आदमी सवाल उठाता है तो ईमानदार अफसर और पुलिसकर्मी खुद को शर्मिंदा महसूस करते हैं।

 

वनरक्षक होशियार सिंह केस
वनरक्षक होशियार सिंह पहले गायब होता है और पुलिस ज्यादा हाथ-पैर नहीं मारती। फिर उसकी लाश पेड़ पर उल्टी टंगी मिलती है तो वह पहले हत्या का मामला दर्ज करती है और फिर तुरंत खुदकुशी का मामला दर्ज कर लेती है। एसआईटी बनती है, कई जांच टीमें बदलती जाती हैं और तरह-तरह के दावे किए जाते हैं मगर पुलिस यह नहीं बता पाती कि अगर यह खुदकुशी है तो बंदा पेड़ पर जाकर उल्टा कैसे लटक गया। खैर, वनमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक जब ऐसी घटनाओं को मामूली बताकर टालने की कोशिश करते हों, तब पुलिस पर सही से जांच करने का दबाव कैसे बन सकता है? नतीजा यह रहता है कि हाई कोर्ट को संज्ञान लेना पड़ता है और वहां पुलिस आए दिन फटकार सुन रही है। इस मामले में पुलिस फोर्स बैकफुट पर नहीं आएगी तो क्या होगा?

 

कोटखाई रेप ऐंड मर्डर केस
आईजी (इंस्पेक्टर जनरल) जैसे सीनियर अधिकारी पर सीबीआई हिरासत में मौत के मामले में हत्या, सबूत मिटाने जैसी धाराओं में केस दर्ज करती है। जिस एसआईटी को यह मानकर केस की जिम्मेदारी दी गई थी कि स्थानीय पुलिस शायद सही से जांच न कर पाए, वही एसआईटी आज अपनी जांच को लेकर इतने सवालों के घेरे में है कि असल कैदियों को सज़ा दिलाने के बजाय खुद भी गिरफ्त में आ गई। जब सीनियर अधिकारी ऐसे मामलों में फंसे हों, बाकी पुलिस फोर्स में इसका क्या संदेश जाएगा? क्या उन्हें गर्व होगा अपने काबिल अफसर पर?

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बाबा अमरदेव को राजनीतिक संरक्षण
सोलन के कंडाघाट के विवादित बाबा अमरदेव पर सरकारी जमीन कब्जाने का मामला चल रहा है, उनके यहां से संरक्षित जीवों की खालें बरामद हुईं, उन्होंने एक महिला पर तलवार से हमला करके जख्मी किया, उनकी सही पहचान स्थापित करने में पुलिस को मुश्किल हुई, स्थानीय लोग इस बाबा से परेशान हैं… मगर सरकार अपने लोगों की नहीं सुन रही और बाबा को शह दे रही है। सरकार के मंत्रियों का इस बाबा के यहां आना जाना लगा रहता है। मगर हद तक हो गई जब मुख्यमंत्री ने अस्पताल जाकर इस बाबा से मुलाकात की और 48 घंटों के अंदर पूरा का पूरा कंडाखाट थाना (18 पुलिसकर्मी) ट्रांसफर कर दिया। इससे पुलिस फोर्स को क्या संदेश गया होगा?

राजनीतिक दबाव ने भी तोड़ा अधिकारियों का उत्साह
याद होगी वह घटना जब एएसपी गौरव सिंह को मुख्यमंत्री के खास माने जाने वाले विवादित कांग्रेस विधायक रामकुमार (दून के विधायक) की पत्नी के टिप्पर का चालान किए जाने के बाद बद्दी से कांगड़ा ट्रांसफर किया गया था। मामला हाईकोर्ट तक जा पहुंचा था। ऐसी घटनाओं से पूरी पुलिस टीम में संदेश जाता है कि भैया, मुख्यमंत्री के खास बंदे जो मर्जी करें, हमें कार्रवाई नहीं करनी है वरना देख लो क्या अंजाम होता है।

 

पंडोह में किशोर-किशोरी के शव संदिग्ध हालात में पाए जाने को आत्महत्या का मामला बताने पर उठे सवाल हों या अन्य हिस्सों सामने आई घटनाओं को रफा-दफा करने की कोशिश, हालात यह हुए हैं कि आम जनता में पुलिस की छवि खराब हुई है। इस बीच वे पुलिसकर्मी घुटन महसूस कर रहे हैं जो पूरी निष्ठा से ड्यूटी करते हैं। ऊपर से शिमला में ट्रैफिक पुलिसकर्मी जब अपनी ड्यूटी निभा रहा था तो उसका गिरेबान शराबी ने पकड़ लिया, नादौन में जब पुलिसर्मी अपनी ड्यूटी निभा रहा था तो उसे धमकियां मिलीं अगली सरकार में देख लेने की और विधायक ने धक्का तक दिया। ये घटनाएं दिखाती हैं कि पुलिसफोर्स खुद को कितनी लाचार पा रही है। उसका मनोबल कितना गिरा हुआ है।

डीजीपी की भूमिका अहम है, मगर….
इस मौके पर चाहिए था कि हिमाचल पुलिस का मुखिया कमान संभालता और कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करके मिसालें पैदा करे। वह पूरे प्रदेश में घूमे और पुलिसकर्मियों का मनोबल बढ़ाए। काबिल अधिकारियों को प्रोत्साहन और संदिग्ध आचहरण वाले अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई के काम किए जाएं। साथ ही मीडिया पर नजर रखे कि प्रदेश के किस हिस्से में क्या मामला चल रहा है और पुलिस ने उसमें क्या कार्रवाई की। अगर लगे कि कोई चूक हो सकती है, तो तुरंत वहां दखल दे और चीज़ों को सही करे।

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सरकार की भी बनती है जिम्मेदारी
पुलिस विभाग गृह मंत्रालय के अंदर आता है। चूंकि मुख्यमंत्री ने होम डिपार्टमेंट अपने पास रखा है, इसलिए पुलिस की जिम्मेदारी उन्हीं के ऊपर है। इसलिए उनकी भी जिम्मेदारी बनती है कि ठीक डीजीपी की तरह घटनाओं और उनकी जांच आदि की प्रगति पर नजर रखे। साथ ही कसकर रखे डीजीपी। बजाय उल्टे सीधे या फिर घटनाओं की गंभीरता को कम करने वाले बयान देने के ऐसा रुख अपनाए कि पुलिस के अधिकारियों को लगे कि भाई, लापरवाही नहीं चलेगी। मगर अफसोस, इस तरफ ध्यान देने की फुरसत किसे है?

नहीं लिया कोटरोपी से सबक, नजदीक से वीडियो बनाते रहे

शिमला।। शिमला में ढली के पास हुए भूस्खलन में लोगों की जिंदगी नहीं गई, यह सुकून भरी खबर है। मगर वीडियो देखकर पता चलता है कि लोग भूस्खलन वाली जगह के कितने नजदीक खड़े हुए थे। एक वीडियो तो ऐसा भी है, जिसमें वीडियो बनाने वाला बाल-बाल बचता है। इससे पता चलता है कि लोग अभी भी सबक सीखने को तैयार नहीं हुई हैं। वे भूल गए कि कुदरत कितना विकराल रूप ले सकती है। कोटरोपी में पहले छोटे से हिस्से में ही पत्थर गिरने शुरू हुए थे। मगर बाद में एकाएक बहुत बड़ा हिस्सा धंस गया। इस मलबे की चपेट में वह नौजवान सैनिक भी आ गया था, जो कथित तौर पर अपनी बाइक से उतरकर भूस्खलन का वीडियो बनाने गया था। देखें:

जो लोग ढली में इस इलाके में न गए हों, वे समझ सकते हैं कि यह इलाका कैसा है। एकदम खड़ी पहाड़ी है और यहीं पर इक पहाड़ी को काटकर बाइपास निकाला गया है। खड़ी पहाड़ी में हुए कटान के कारण इसकी स्टेबिलिटी में कमी आई है और कई हिस्से ऐसे हैं जहां पर पहाड़ का वज़न सड़क के कटाव के ऊपर झूल रहा है। इस भूस्खलन को गौर से देखें तो अनुमान लगाया जा सकता है कि शुरुआत भले ही छोटे से हिस्से से हो, मगर जब पीछे की तरफ सपॉर्ट कम होती जाएगी तो जैसे चेन रिऐक्शन होता है, वैसे ही कच्ची पहाड़ी ढहती चली जाएगी।

साथ ही यहां पर डंगे लगाकर (रिटेनिंग वॉल बनाकर) सड़क बनाई गई है। ऐसे में ऊपर से मलबा गिरने पर वह दीवार भी ढह सकती थी और सड़क के दोनों छोरों पर खड़ी गाड़ियां तमाशवीनों के साथ मलबे में दफ्न हो जातीं। साथ ही नीचे गहरी खाई भी है। वीडियो में दिखता है कि कारें कैसे खिलौनों की तरह उड़कर खाई में गिरीं।

इससे पता चलता है कि लोग अपनी जिंदगी दांव पर लगाने से बाज़ नहीं आ रहे। साथ ही प्रशासन की तरफ से भी एक तरह से लापरवाही मानी जाती है कि उन जगहों को चिह्नित नहीं किया जा रहा, जहां भूस्खलन हो सकते हैं। वक्त रहते उन जगहों पर साइंटिफिक अप्रोच अपनाकर इंतज़ाम किए जाएं तो भूस्खलन से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

साथ ही पाठकों से गुजारिश- कृपया वीडियो बनाने के चक्कर में न पड़ें, कहीं खतरा देखें तो सबसे पहले सुरक्षित जगह की तरफ भागें।

बीजेपी MLA पर SHO को धक्का देने का आरोप, कार्यकर्ताओं ने धमकाया

हमीरपुर।। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में नादौन उपमंडल में शुक्रवार को बीजेपी कार्यकर्ताओं पर पुलिस के साथ हाथापाई का आरोप लगा है। यही नहीं, बीजेपी के विधायक विजय अग्निहोत्री पर भी नादौन के एसएचओ पर धक्का देने का आरोप लगा है। गौरतलब है कि बीजेपी के कार्यकर्ता मुख्यमंत्री का पुतला फूंकने की कोशिश कर रहे थे और पुलिस ऐसा करने से रोक रही थी।

 

इस बीच बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने विधायक के सामने ही एसएचओ को धमकाते हुए कहा कि मौजूदा सरकार का कार्यकाल सिर्फ दो महीनों का है, इसके बाद बाद देखते हैं कि क्या होता है। एक कार्यकर्ता ने तो एसएचओ के कंधे पर लगे स्टार को लेकर भी टिप्पणी कर दी। यह खबर मीडिया में भी छाई हुई है

 

मामला काफी तनावपूर्ण था और एसएचओ ने विधायक और कार्यकर्ताओं को समझाने की कोशिश की। मगर बीजेपी कार्यकर्ता एसएचओ मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए आगे बढ़ गए और पुतला भी जला दिया।

 

उधर एसएचओ सतीश कुमार ने मीडिया से बातचीत में बताया है कि भाजपा नेता मुख्यमंत्री का पुतला जलाने की कोशिश कर रहे थे और पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो वे बदतमीजी पर उतारू हो गए। साथ ही एसपी रमन कुमार का कहना था कि अगर भाजपा विधायक ने पुलिस कार्यवाही में बाधा डाली है तो कार्रवाई की जाएगी।

 

वहीं नादौन के विधायक विजय अग्निहोत्री ने कहा कि पुलिस ने उनके साथ बदतमीजी की है। उनका कहना था कि बीजेपी कार्यकर्ता कोटखाई की गुड़िया को न्याय दिलवाने के लिए विरोध प्रदर्शन कर रहे थे तो पुलिस ने उन्हें मुख्यमंत्री का पुतला जलाने से रोका और कार्यकर्ताओं को धमकाया।

आज है सोलन का जन्मदिन, जानें इस ख़ूबसूरत जगह को

इन हिमाचल डेस्क।। इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो वर्तमान सोलन तहसील (इतिहास में बघाट) हिमाचल की पहली रियासत थी, जिसने स्वेच्छा से भारतीय गणतंत्र में विलय को स्वीकार किया था।

 

“बघाट” नाम दो शब्दों के मिलन से बना है बहु और घाट ”बहु” का मतलब बहुत सारे और घाट मतलब ”दर्रा।” यानी ऐसा स्थान जहां से पानी या हवा का मूवमेंट ज्यादा हो। इसलिए सोलन में आज भी बहुत सारे स्थानों के साथ घाट शब्द लगा है।

 

रियासत की नींव राजा बिजली देव ने रखी थी। बारह घाटों से मिलकर बनने वाली बघाट रियासत का क्षेत्रफल 36 वर्ग मील में फैला हुआ था। इस रियासत की प्रारंभ में राजधानी जौणाजी, परवाणू के पास कोटी में हुआ करती थी।

 

कहते हैं किसी पंडित के श्राप से अभिशप्त यह राजधानी तबाह हो गयी  मजबूर होकर बघाट रियासत की राजधानी को वहां से हटाना पड़ा था। कोटी के बाद बेजा, बोचह, जौणाजी जैसे महत्वपूर्ण स्थलों पर बघाट की राजधानियों को बसाने का प्रयास किया गया, किन्तु सारे प्रयास असफल रहे।

 

अंत में बघाट की राजधानी माता शूलिनी के मंदिर के पास बसाई गयी, जिस कारण इसका नाम सोलन पड़ा। सोलन में आज का पुराना कचहरी भवन  बघाट रियासत का भवन था।

 

1  सितंबर 1972, यानि आज के दिन हिमाचल प्रदेश के ज़िले के रूप में सोलन जिला को शामिल किया गया था। बघात रियासत के हिस्सों के साथ साथ बाघल और हॉण्डुर के हिस्से भी सोलन में मिलाये गए। समुद्र  सतह से लगभग  समुद्र सतह से 1467 मीटर की ऊँचाई पर स्थित सोलन  शहर जिला का मुख्यालय बना।

 

हिमाचल के  शिमला सिरमौर बिलासपुर ज़िलो और हरियाणा पंजाब राज्यों के साथ सोलन की सीमायें लगती हैं। वर्तमान में अर्की, बद्दी, डरलाघाट, कंडाघाट, कसौली, किशनगढ़, नालागढ़, रामशहर, सोलन इस ज़िले की तहसील हैं तथा अरकी, नालागढ़, दून, सोलन, कसौली विधानसभा क्षेत्र हैं।

 

सोलन जिला 1936 वर्ग किलोमीटर में फैला है और जनगणना  2011 के अनुसार सोलन ज़िले की जनसंख्या 580320 है जबकि घनत्व 298 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है।  सोलन जिला की  साक्षसरता दर  85.02 और लिंग अनुपात  880 है।

 

सोलन जिला के मुख्य धार्मिक  पर्यटन स्थल जतोली मंदिर, मोहन नेशनल हेरिटेज पार्क, काली टिब्बा  मंदिर, हनुमान मंदिर हैं। वहीं अरकी किला, नालागढ़ रामशहर  किला,  सुबाथू आदि भी सोलन ज़िले के पार्ट हैं।
वहीँ कसौली डगशाई चायल जैसे रमणीय स्थान भी सोलन ज़िले की खूबसूरती में चार चाँद लगाते हैं।

 

चंडीगढ़  शिमला हाईवे के एकदम बीच में होने के कारण सोलन हिमाचल प्रदेश की व्यापारीक राजधानी के रूप में भी उभरा। कृषि और बागवानी के क्षेत्र में भी सोलन ने अभूतपूर्व प्रगति की , देश में मशरूम सिटी के नाम से जाना जाने लगा।  टमाटर भी इस जिले की मुख्य फसल है।

 

हिमाचल प्रदेश का अधिकाँश औद्योगिक क्षेत्र भी सोलन ज़िले में ही आता है जिसे बी बी एन के नाम से बद्दी बरोटीवाला और नालागढ़ कहा जाता है। सीमा से सटे परवाणु शहर में भी  इंडस्ट्रीज़ हैं।

पुलिसवालों की गिरफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री का पहला बयान

शिमला।। कोटखाई रेप ऐंड मर्डर केस की जांच कर सीबीआई द्वारा पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार करने के बाद हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिह का पहला बयान आया है।

 

उन्होंने कहा कि यह बहुत दर्दनाक घटना है और जो भी दोषी हैं, उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने बीजेपी और सीपीएम पर राजनीति करने का आरोप भी लगाया।

 

मुख्यमंत्री ने कहा, ‘सरकार ने खुद ये मामला सीबीआई को सौंपा था। अभी तक यह मामला सुलझा नहीं है। उन्होंने कहा कि मुझे विश्वास है कि सीबीआई इस मामले को जल्द सुलझा लेगी और दोषियों को सजा मिलेगी।’ सीएम ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के साथ उन्हे कोई हमदर्दी नहीं।

 

भाजपा और माकपा पर राजनीति करते हुए उन्होंने कहा, ‘भाजपा के पास कोई मुद्दा नहीं है और इसको मुद्दा बनाकर राजनीति की जा रही है। प्रदर्शन करना किसी हद तक ठीक होता है लेकिन इसे मुद्दा बनाना दिखाता है कि ये कितने खोखले हैं।’

गुड़िया केस: अगली गिरफ्तारी किस ‘बड़ी मछली’ की?

शिमला।। कोटखाई रेप ऐंड मर्डर केस एक मिस्ट्री बनता जा रहा है। शायद यह हिमाचल का अब तक का सबसे बड़ी क्राइम मिस्ट्री है। अब जनता के मन में शक यह भी पैदा हो गया है कि न जाने ऐसी कार्यप्रणाली वाली पुलिस ने अब तक कितने ही मामलों को ऐसे ही सुलझाने का दावा किया होगा, कितने लोगों को सच या झूठ में अंदर ठोक दिया होगा। दरअसल हिमाचल में आईजी स्तर के अधिकारी की गिरफ्तारी होना चौंकाने वाला है। वह अधिकारी, जिसके पास साउथ रेंज के कई जिलों की जिम्मेदारी थी। मगर सीबीआई को आखिर 1994 बैच के आईपीएस ऑफिसर को गिरफ्तार करने की जरूरत क्यों पड़ गई?

 

अभी तक जो जानकारियां छन-छनकर आ रही हैं, उनमें सीबीआई को संदेह है कि इस मामले में पकड़े गए आरोपी सूरज की जो कोटखाई थाने में मौत हुई थी, वह पुलिस की थ्योरी के हिसाब से नहीं हुई थी। सीबीआई ने प्रेस रिलीज़ में भी कहा है कि इन पुलिसकर्मियों को कस्टोडियल डेथ केस में पकड़ा है। एसआईटी में शामिल पुलिसकर्मियों ने कहा था कि अन्य आरोपी राजू ने सूरज को मार डाला। मगर सीबीआई को शक है कि यह कस्टोडियल डेथ है और इसकी मौत की वजह वह नहीं है जो पुलिस बता रही है। मगर चूंकि पुलिस की तरफ से सीबीआई को सहयोग नहीं मिला, इसलिए उसने एसआईटी के सारे सदस्यों को आईजी और डीएसपी समेत उठा लिया।

 

चलिए मान लेते हैं कि सीबीआई का शक सही है और सूरज की हत्या राजू ने नहीं की बल्कि उसकी मौत में किसी पुलिसवाले का हाथ है। कोई पुलिसवाला ऐसा क्यों करेगा, इसिलए संभावित कारणों पर बात करें तो मुख्य तीन कारण नज़र आते हैं:

1) हो सकता है कि पुलिस कुछ उगलवाने के लिए थर्ड डिग्री इस्तेमाल कर रही हो इसी दौरान सूरज की मौत हो गई हो। मगर इस थ्योरी को कुछ बातें काउंटर करती हैं। ध्यान रहे कि पोस्टमॉर्टम में पता चला था कि मृतक के गुप्तांग पर चोट से लेकर कई जगह जख्म के निशान थे। ऐसे मामलों से निपटने वाली पुलिस किसी कैदी को ऐसे कैसे पीट सकती है कि उसे ध्यान ही नहीं रहे कि बंदे को कोर्ट में भी पेश करना है, जख्म नहीं आने चाहिए वरना मुश्किल हो जाएगी। इन हालात में कोई अनाड़ी पुलिसवाला भी ऐसा काम नहीं कर सकता।

2) दूसरी संभावना यह है कि कहीं किसी पुलिसवाले ने जानबूझकर हत्या तो नहीं कर दी? और अगर ऐसा है तो बाकी पुलिसकर्मियों की चुप्पी उनपर भी शक पैदा करेगी। मगर पुलिसवाले किसी आरोपी की हत्या क्यों करेंगे? उन्हें ऐसा क्या डर रहा होगा। इन सवालों का जवाब ढूंढने की कोशिश करें तो माना जा सकता है कि चूंकि पुलिस ने शुरुआत में खुलासा कर दिया था कि ये-ये लोग पकड़े हैं, मगर उसे सबूत न मिल मिर रहे थे. हो सकता है कि सूरज पुलिस के हिसाब से गवाही न देना चाह रहा हो और सब सच बताने की बात कर रहा हो। ऐसा होता तो पुलिसवालों के लिए मुश्किल हो जाती। ऐसे में हो सकता है कि तैश में आकर उसे बेतहाशा पीटा गया हो या फिर खुद को बचाने के लिए उसे मार ही डाला गया हो। यह सोचकर कि रेप का आरोपी ही तो है, मर जाएगा तो लोगों को संतोष होगा। और उस वक्त सीबीआई जांच की भी कोई चर्चा नहीं थी।

3) पुलिस के ऊपर प्रेशर था?  तीसरा और एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है। अगर प्रेशर में आकर सूरज को मारा गया तो यह समझने वाली बात है कि आईजी जैसे स्तर के अधिकारी पर कोई छोटा-मोटा नेता या व्यक्ति प्रेशर नहीं डाल सकता। यह सही है कि देश में पुलिस को पैसे लेकर मामले दबाने या बनाने के लिए बदनाम समझा जाता है। मगर जिन पुलिसकर्मियों को सीबीआई ने पकड़ा है, उनमें से कुछ की छवि ऐसी नहीं रही है कि वे ऐसे कामों में शामिल हों। ऐसे में संभावना बचती है प्रेशर की। अगर किसी प्रेशर में पुलिस ने असली गुनहगारों को बचाकर इन लोगों को फंसाने की कोशिश की है तो साफ है कि प्रेशर किसी बड़े प्रभावशाली शख्स की तरफ से रहा होगा। अगर तीसरे नंबर वाली आशंका सही है तो आने वाले दिनों में खुलासा हो सकता है कि किसने और क्यों एसआईटी पर प्रेशर बनाया। पुलिसकर्मियों से पूछताछ हो रही है, उनके लाइ डिटेक्टिंग और नारको टेस्ट की बात हो रही है। अगर इस तरह का प्रेशर हुआ तो सीबीआई को नया सबूत मिल जाएगा। ऐसे में आने वाले दिनों में कोई बड़ी मछली भी सीबीआई के हत्थे चढ़ सकती है, अगर उसकी इस केस में भूमिका रही हो तो।

 

चूंकि द ट्रिब्यून का दावा है कि इस मामले में पकड़े गए आरोपियों के डीएनए का मैच विक्टिम के शरीर में मिले सैंपल्स से नहीं हुआ है, इसलिए लोग शक कर रहे हैं कि कहीं वाकई पुलिस ने असली दोषियों को पकड़ने के बजाय गलत लोगों को तो नहीं पकड़ लिया। चर्चा है कि या तो ऐसा जल्दबाजी में किया गया है, या फिर प्रेशर में आने के बाद जानबूझकर। बहरहाल, अटकलों का दौर तब तक जारी रहेगा, जब तक पूरे केस से पर्दा नहीं उठ जाता। साथ ही यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि जिन पुलिसवालों को सीबीआई ने पकड़ा है, वे अभी सिर्फ़ आरोपी हैं, दोषी नहीं। और आरोप लगने से कोई दोषी नहीं हो जाता।

गुड़िया केस में हिमाचल पुलिस द्वारा पकड़े किसी भी आरोपी का DNA मैच नहीं: मीडिया रिपोर्ट

शिमला।। कोटखाई में हुए रेप ऐंड मर्डर केस में नया मोड़ आ गया है। सीबीआई की जांच में संकेत मिल रहे हैं हिमाचल पुलिस की एसआईटी ने जिन आरोपियों को पकड़ा है, उनमें से कोई भी इस अपराध में शामिल नहीं है। यह खुलासा प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार ‘द ट्रिब्यून’ ने आज के संस्करण में किया है। पहले पन्ने में छपी खबर में कहा गया है कि पुलिस द्वारा शुरू में जिन 8 संदिग्धों के डीएनए सैंपल लिए थे, उनमें से किसी का भी मिलान विक्टिम के शरीर से मिले नमूनों से नहीं हुआ है।

 

अखबार ने लिखा है कि इस खुलासे से उन आरोपों को बल मिल रहे हैं जिनमें एसआईटी पर असल दोषियों को बचाने के लिए बेकसूर लोगों को फंसाने की बात कही जा रही थी। सीबीआई का फोकस फरेसिंग सबूतों पर था और वह कोटखाई से 29 साल के आशीष चौहान उर्फ आशु, राजेंद्र सिंह उर्फ राजू (32), सुभाष सिंह बिष्ट (42), दीपक (29), लोक जंग उर्फ छोटू (19) और सूरज सिंह (29) के डीएनए सैंपल्स का इंतजार कर रही थी। गौरतलब है कि इनमें सूरज की पुलिस हिरासत में संदिग्ध हालात में मौत हो चुकी है।

 

अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि डीएनए टेस्टिंग के लिए क्राइम सीन से खून, वीर्य, त्वचा, लार, म्यूकस, पसीने और बालों समेत कई नमूने लिए गए थे. आठ संदिग्धों के नमूने भी लिए थे मगर टेस्ट नेगेटिव आया जिसका मतलब है कि मालन नहीं हुआ. अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि अगर एक भी सैंपल मैच हुआ होता तो केस सॉल्व हो जाता.

 

पुलिसवाले की कॉल डीटेल से मिले सबूत
अखबार के मुताबिक सूत्र बताते हैं कि सूरज की हिरासत में मौत के सिलसिले में जिन पुलिसवालों को इस मामले में पकड़ा गया है, उनमें से एक के कॉल रिकॉर्ड की वजह से इन्हें पकड़ने में सीबीआई को मदद मिली। अगर सीबीआई तथाकथित साजिशकर्ताओं को सामने लाने में कामयाब हो जाती है तो इस मामले से सरकार असहज स्थिति में आ जाएगी. चूंकि डीएनए रिपोर्ट एसआईटी की थ्योरी के खिलाफ है, सीबीआई अब पकड़े गए पुलिसवालों का लाइ डिटेक्टर टेस्ट करवा सकती है।

स्टंट करने से रोका तो पकड़ लिया पुलिसकर्मी का कॉलर

शिमला।। शिमला में बुधवार शाम 6 बजे के करीब अजीब हालात पैदा हो गए। कुछ युवक बाइक पर स्टंट कर रहे थे। जब ट्रैफिक पुलिस के जवान ने उन्हें रोका तो न सिर्फ हाथापाई की गई, बल्कि पुलिसकर्मी का कॉलर पकड़ लिया गया। बताया जा रहा है कि युवक रोहड़ू के हैं और उन्हें हिरासत में लेकर लक्कड़ बाजार पुलिस चौकी पहुंचाया गया है। बताया जा रहा है कि युवक नशे में थी।

 

इन युवकों द्वारा पुलिसकर्मी के साथ हाथापाई करने का पंजाब केसरी ने एक वीडियो भी पोस्ट किया है। देखें:

 

बताया जा रहा है कि नशे की हालत में 3 युवक एक बाइक पर सवार होकर तेज रफ्तार में खतरनाक तरीके से स्टंट मारते हुए ढली से लक्कड़ बाजार की ओर जा रहे थे। जब लक्कड़ बाजार में बैरीकेड लगाकर पुलिस ने इन्हें रोका तो उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया। यहां तक की ड्यूटी पर तैनात एक ट्रैफिक पुलिस कर्मचारी से हाथापाई करते हुए उक्त युवकों ने उसकी कॉलर तक पकड़ ली।

 

इस दौरान लोगों की भी काफी भीड़ लग गई थी। बड़ी मुश्किल से पुलिस ने उक्त युवकों को हिरासत लेकर लक्कड़ बाजार चौकी पहुंचाया। उक्त युवक रोहड़ू के रहने वाले बताए जा रहे हैं। फिलहाल पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया है तथा युवकों से पूछताछ की जा रही है। जैसे ही पुलिस वालों ने उक्त हुड़दंगी युवकों को पकडऩा शुरू किया तो उनके तेवर ढीले हो गए। कोई रास्ता बदल कर भागने लगा तो कोई हुड़दंग छोड़ पूरी शराफत दिखाने लगा। इतना ही नहीं पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर वे माफी मांग दोबारा ऐसा न करने की बात कहते हुए गिड़गिड़ाने लगे।

 

एस.पी. शिमला सौम्या साम्बशिवन ने बताया कि फिलहाल मामले में कार्रवाई की जा रही है। जल्द ही पता लगाया जाएगा कि आखिर में ये युवक बाइक के ऊपर स्टंट क्यों मार रहे थे और पुलिस के साथ हाथापाई क्यों की। खबर लिखे जाने तक पुलिस पुख्ता सबूत जुटाने के लिए युवकों का आई.जी.एम.सी. में मेडिकल करवा रही है। रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा कि युवकों ने शराब का सेवन किया था या कोई और नशा किया है।

सवाल उठता है कि रोहड़ू के बताए जा रहे इन युवकों में ऐसी हिम्मत कहां आ गई कि पहले तो शराब पीकर स्टंट करें और फिर पुलिसकर्मियों के गिरेबान पर हाथ डालें? यह वाकई शर्मनाक घटना है।

मंत्री के स्वागत में खड़े रहे डॉक्टर, युवती ने तड़पकर दम तोड़ा

ऊना।। क्या इंसान की जान की कोई कद्र नहीं है? क्या मंत्रियों के कार्यक्रम इंसान की जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं? क्या डॉक्टरों को किसी जान बचाने के बजाय किसी मंत्री के स्वागत में खड़े रहना चाहिए था? नौकरी बजाना ज्यादा जरूरी है या इंसानियत बचाना? ये सब सवाल खड़े हो रहे हैं ऊना के क्षेत्रीय अस्पताल में एक 23 साल की युवती की मौत के बाद। ऊना के जिला अस्पताल के प्रबंधन और डॉक्टरों पर आरोप लगे हैं कि कि जिस वक्त उन्हें किसी जहरीले कीड़े के काटने से जिंदगी और मौत के बीच झूल रही युवती का इलाज करना चाहिए था, उस वक्त वे उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री के स्वागत में हाथ जोड़े खड़े थे।

 

हिंदी अखबार पंजाब केसरी तो इस अस्पताल को ‘खून का प्यासा’ बता रहा है। अखबार के पोर्टल पर छपी रिपोर्ट में लिखा गया है- ऊना जिला के क्षेत्रीय अस्पताल में अस्पताल प्रबंधन व चिकित्सकों की लापरवाही से मरीजों के मौत के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। अस्पताल में दो-तीन महीने के भीतर ही दो गर्भवती महिलाओं और एक वृद्ध की ऑपरेशन के बाद मौत के मामले शांत भी नहीं हुए थे कि जहरीले कीट के काटने का इलाज करवा रही 23 वर्षीय युवती की मौत ने अस्पताल की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं।

 

क्या है मामला?
हरोली क्षेत्र के गांव ललड़ी की रहने वाली सुनीता देवी को मंगलवार देर रात एक जहरीले कीट ने काट लिया था जिसके बाद उसे अपने स्तर पर इलाज दिलवाने के बाद परिजन हरोली अस्पताल ले गए। यहां से उसे क्षेत्रीय अस्पताल ऊना के लिए रेफर कर दिया। अखबार ने लिखा है कि क्षेत्रीय अस्पताल में युवती को स्वास्थ्य सुविधाएं समय पर न मिलने के कारण मौत हो गई।

 

परिजनों ने इसकी शिकायत अस्पताल के कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे उद्योगमंत्री मुकेश अग्निहोत्री व डीसी ऊना विकास लाबरू से भी की। मृतक के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों पर लापरवाही का आरोप लगाया है। आरोप है कि  अस्पताल में उद्योग मंत्री के स्वागत के लिए चिकित्सक गेट पर खड़े रहे और अंदर एमरजेंसी में युवती के तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया।

 

रूबेला टीकाकरण अभियान की होनी थी शुरुआत
अस्पताल में खसरा रूबेला टीकाकरण अभियान का शुभारंभ के लिए उद्योग मंत्री पहुंचने वाले थे। मृतका के परिजन आरोप लगाते हैं कि चिकित्सक और स्टाफ उद्योग मंत्री के स्वागत में लगे रहे और उनकी लाडली की कोई खबर तक नहीं ली गई। हालांकि परिजनों की शिकायत के बाद उद्योग मंत्री और डीसी विकास लाबरू ने सीएमओ की जमकर खिंचाई की। उद्योग मंत्री ने डीसी ऊना को मामले में उचित कार्रवाई के निर्देश दिए। डीसी ने सीएमओ को तत्काल विभागीय जांच करके रिपोर्ट तलब की है।

मंत्री
परिजनों से बात करते उद्योग मंत्री मुकेश अग्निहोत्री

जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रकाश दड़ोच का कहना है कि युवती की मौत मामले को लेकर जांच की जाएगी। उन्होंने कहा कि इसकी जांच रिपोर्ट तैयार कर जिलाधीश ऊना व सरकार को सौंपी जाएगी।