HRTC की IGMC-PGI टेंपो ट्रैवलर चंडीगढ़ में रोकी गई, नहीं थी परमिट

शिमला।। आईजीएमसी शिमला से पीजीआई चंडीगढ़ के लिए एचआरटीसी की ओर से शुरू की गई टेंपो ट्रैवलर को चंडीगढ़ प्रसासन ने परमिट न होने के कारण रोक लिया। बुधवार को जब यह वाहन पीजीआई पहुंचा तो प्रशासन की ओर से परमिट दिखाने को कहा गया। इस पर ड्राइवर और कंडक्टर लिखित अनुमति नहीं दिखा पाए।

इस टेंपो ट्रैवलर को परिवहन मंत्री बिक्रम ठाकुर ने मंगलवार को हरी झंडी दिखाई थी। अखबार अमर उजाला की खबर के मुताबिक बुधवार को चंडीगढ़ प्रशासन ने परमिट न होने के कारण इस गाड़ी को जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। मगर ड्राइवर और कंडक्टर ने एचआरटीसी के अधिकारियों को बताया तो उन्होंने चंडीगढ़ प्रशासन से संपर्क साधकर गाड़ी जब्त न करने की गुजारिश की। इसके बाद इस वाहन को चंडीगढ़ से खाली शिमला लौटना पड़ा।

एचआरटीसी का कहना था कि मरीजों और उनके तीमारदारों की मांग के आधार पर यह सेवा शुरू की गई है। एचआरटीसी के एमडी संदीप कुमार ने पत्रकारों को बताया है कि अगर कोई औपचारिकता बाकी है तो उसे पूरा कर दिया जाएगा।

बताया जा रहा है कि चंडीगढ़ प्रशासन ने मौखिक रूप से एचआरटीसी द्वारा यह सेवा शुरू करने पर सहमति जताई थी। लेकिन जब तक परमिट नहीं मिल जाती, तब तक इस ट्रैवलर को पीजीआई के बजाय चंडीगढ़ सेक्टर 43 बस अड्डे के बाहर तक चलाने की योजना है।

 

हारकर ध से धामी तो बन गए सीएम, पर ध से धूमल क्यों नहीं बने थे?

सुऱेश चंबियाल।। पुष्कर सिंह धामी चुनाव हारने के बावजूद उत्तराखंड के सीएम बने रहेंगे। इसी तरह चर्चा है कि केशव प्रसाद मौर्य को भी हारने के बावजूद यूपी का डेप्युटी सीएम बनाया जा सकता है। अब हिमाचल प्रदेश में एक बड़ा वर्ग यह सवाल करने लगा है कि भारतीय जनता पार्टी जब उत्तराखंड और यूपी में किसी हारे हुए नेता को फिर अवसर दे सकती है तो 2017 में ऐसा हिमाचल प्रदेश में क्यों नहीं किया गया।

हिमाचल प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी तो सत्ता में आ गई थी मगर उसके सीएम कैंडिडेट प्रेम कुमार धूमल चुनाव हार गए थे। उस समय धूमल समर्थकों ने मांग की थी उन्हें फिर से सीएम बनाया जाए। कुछ विधायकों ने उनके लिए अपनी सीट छोड़ने की भी पेशकश की थी ताकि वहां से होने वाले उपचुनाव में धूमल जीत सकें। लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने ऐसा नहीं किया और नए चेहरे के तौर पर जयराम ठाकुर को सीएम बनाया।

अब जबकि उत्तराखंड में चुनाव हारे हुए पुष्कर सिंह धामी को बनाया जा रहा है तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब उत्तराखंड में ऐसा किया जा सकता है तो हिमाचल में ऐसा क्यों नहीं किया गया? बहुत से लोग सोशल मीडिया पर इस संबंध में सवाल उठा रहे हैं। कुछ इसे पार्टी के दोहरे मापदंड भी बता रहे हैं। लेकिन बारीकी से अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट होता है हिमाचल में 2017 के चुनावों और उत्तराखंड के 2022 के चुनावों की आपस में तुलना नहीं की जा सकती।

पहली बात तो यह है कि पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में पार्टी ने सत्ता विरोधी लहर यानी ऐंटी-इनकमबेंसी को मात देकर फिर सरकार बनाई है। वह भी तब, जब धामी को चुनाव से कुछ समय पहले ही सीएम बनाया गया था। जबकि हिमाचल में प्रेम कुमार धूमल दो बार मुख्यमंत्री रहे और दोनों बार पार्टी सत्ता विरोधी लहर के कारण बुरी तरह हारी थी। ऐसे में पार्टी का मानना था कि अगर फिर किसी तरह उन्हें सीएम बना दिया जाता है तो क्या गारंटी कि आगमी चुनावों में वह पार्टी को सत्ता में ले आते। जबकि केशव प्रसाद मौर्य और धामी के मामले में पार्टी सत्ता विरोधी लहर को मात देकर जीती है।

अगर हिमाचल की बात करें तो राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यह धूमल के समर्थकों की दी थ्योरी है कि 2017 का चुनाव भाजपा ने धूमल के कारण जीता था। अधिकतर राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2017 का चुनाव सीट वाइज़ समीकरणों पर हुआ था। उस चुनाव में जहां कांग्रेस की सरकार के खिलाफ जनता में रोष था, वहीं मोदी लहर का भी अहम फैक्टर था।

विशेषज्ञों के अनुसार अगर प्रदेश में बीजेपी को धूमल के नाम पर अगर वोट पड़ रहे थे तो क्यों खुद धूमल, उनके समधी गुलाब सिंह ठाकुर, करीबी रविंद्र रवि, बदलेव शर्मा, सतपाल सत्ती और रणधीर शर्मा को नहीं पड़े? ये बातें दिखाती हैं कि हर सीट पर उस सीट के ही समीकरणों के आधार पर वोट पड़े, न कि किसी व्यक्ति के नाम पर। जैसे कि कांगड़ा से दिवगंत जीएस बाली और सुधीर शर्मा व मंडी से कौल सिंह जैसे बड़े नेता भी सीट वाइज समीकरणों से हारे थे।

कमोबेश यही स्थिति हर सीट की थी। ऐसा नहीं था कि वहां की जनता ने प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए भाजपा का साथ दिया। उल्टा बीजेपी तो धूमल के खास प्रभाव वाले हमीरपुर और ऊना जिलों में भी कांग्रेस से पिछड़ गई थी। विश्लेषकों का कहन है कि अगर प्रदेश भर में किसी एक चेहरे के नाम पर पड़ रहे होते तो बीजेपी पहले के चुनावों में ही सरकार रीपीट करवा चुकी होती।

वहीं धामी के मामले में एक और फैक्टर अहम माना जा रहा है। वह है उम्र। 2014 में प्रेम कुमार धूमल 74 वर्ष के थे। चूंकि पार्टी दीर्घकालिक योजना पर काम करती है, संभवत: इसीलिए उसने अपेक्षाकृत कम उम्र के नए चेहरे को सीएम बनाया ताकि अगले चुनावों में फिर कोई नया चेहरा न तलाशना पड़े। यही बात उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी के पक्ष में जाती है जो अभी 44 वर्ष के हैं और सीएम रहते हुए पार्टी को सत्ता में भी लाए हैं। संभवत: इसीलिए उन्हें मौका दिया गया है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के राजनीतिक विषयों पर लंबे समय से लिख रहे हैं।)

ये लेखक के निजी विचार हैं। आप भी अपने लेख हमें inhimachal.in@gmail.com पर भेज सकते हैं।

विधायकों जैसी पेंशन चाहिए तो चुनाव लड़ें कर्मचारी: जयराम ठाकुर

शिमला।। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कुछ ऐसा कह दिया है जो आने वाले समय में उनकी और बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा सकता है। पेंशन स्कीम की बहाली की मांग कर रहे प्रदेश सरकार के कर्मचारियों को सीएम ने चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे विधायकों की तर्ज पर पेंशन चाहते हैं तो नौकरी छोड़कर चुनाव लड़ें और फिर पेंशन लें।

दरअसल मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर आज विधानसभा में विधायकों के यात्रा भत्ते को लेकर मीडिया में छपी खबरों पर टिप्पणी कर रहे थे। यह मामला कांग्रेस सदस्य सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने प्वाइंट आफ आर्डर के माध्यम से उठाया था। मुख्यमंत्री ने कहा कि विधायकों की पेंशन को लेकर लोग, खासकर कर्मचारी गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियां कर रहे हैं। इससे विधायक संस्थान की छवि खराब हुई है।

सुक्खू ने कहा कि लोग सोशल मीडिया में यहां तक टिप्पणियां कर रहे हैं कि जब कर्मचारियों को पेंशन नहीं है तो विधायकों को पेंशन क्यों दी जा रही है। इस पर जयराम ठाकुर ने कहा कि सरकार ने अभी विधायकों के टीए-डीए में कोई बढ़ोतरी नहीं की है। आगे उन्होंने कहा कि विधायकों की पेंशन पर जो सवाल उठा रहे हैं, वे चुनाव लड़ें, उन्हें किसने रोका है।

राजनीतिक विश्लेषक इस बयान को न सिर्फ गैर जरूरी बल्कि सरकार के लिए नुकसानदेह मान रहे हैं। इस बयान का असर चुनावों तक बना रह सकता है।

हिमाचल में भी टैक्स फ्री हुई विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’

शिमला।। 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार और उनके पलायन पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ हिमाचल प्रदेश में टैक्स फ्री हो गई है। यानी अब थिएटर में लिए जाने वाले टिकट सस्ते हो जाएंगे क्योंकि उसपर SGST (स्टेट जीएसटी) नहीं लगेगा।

हिमाचल सरकार ने आज मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट में यह फैसला लिया। अभी तक कई राज्य इस फिल्म को टैक्स फ्री कर चुके हैं। इनमें हरियाणा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और त्रिपुरा शामिल हैं। ऐसी भी खबर है कि मध्य प्रदेश में पुलिसकर्मियों को छुट्टी दी जाएगी ताकि वे इस फिल्म को देख सकें।

फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की इस फिल्म में 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार, हिंसा और अपनी भूमि से पलायन के दर्द को दिखाया गया है। उस दौरान कश्मीरी पंडितों और हिंदुओं को लगातार होती हिंसा और खराब होते माहौल के बीच जान बचाकर भागना पड़ा था।

अभी तक कई कश्मीरी पंडित परिवार देश के विभिन्न हिस्सों में रिफ्यूजी के तौर पर रह रहे हैं। उन्हें वापस घाटी में बसाने के लिए कई कोशिशें हुईं मगर सफलता नहीं मिल पाई।

 

भाजपा के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान को क्या कांग्रेस खुद पूरा करेगी?

मुकेश सिंह ठाकुर।। पांच राज्यों में हुए चुनावों के नतीजे आने के बाद कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता एक बार फिर असमंजस की स्थिति में हैं। उन्हें अभी भी समझ नहीं आ रहा कि दिक्कत आखिर है कहाँ। और जिन्हें समझ आ गया है, वो कुछ करने की स्थिति में नहीं हैं। अभी भी बहुत से कांग्रेसी कार्यकर्ता ये बोल रहे हैं कि राहुल गाँधी को पूरी कमान दी जाए और पुराने नेताओं को बाहर किया जाए। वहीं दूसरी तरफ बहुत से अन्य कार्यकर्ता और नेता ये बोल रहे हैं कि अनुभवी पुराने नेताओं को ही बड़ी जिम्मेदारियाँ दी जाएं और उन्हें इग्नोर ना किया जाए।

एक बात जो कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को समझनी है, वो ये है कि कांग्रेस की आखिरी शक्तिशाली नेता इंदिरा गांधी ही थीं। उसके बाद गांधी परिवार के इर्द-गिर्द कुछ बड़े कांग्रेसियों ने एक घेरा बनाया और सोनिया गांधी की इच्छा न होते हुए भी उन्हें जबरदस्ती 1998 में पार्टी अध्यक्ष बनाया। फिर इन्हीं कुछ नेताओं ने सोनिया गाँधी के चारों तरफ एक घेरा बनाए रखा और अपना उल्लू सीधा करते रहे। इसके बाद राहुल गाँधी को भी जबरदस्ती राजनीति में लाया गया और 2004 में उन्होंने अपना पहला चुनाव लड़ा और जीता। अब इसका कारण सोनिया का पुत्र मोह भी हो सकता है या वंशवाद की राजनीति भी लेकिन जो भी हो, कांग्रेस हाईकमान धरातल से कटती गई और ये भूल गई की भाजपा तेजी से जमीनी स्तर पर राजनीतिक और वैचारिक पकड़ बना रही है।

साल 2011 के आते आते देश ने कई घोटाले देखे और उन्हें लेकर आंदोलन भी देखे। अन्ना हज़ारे के आंदोलन ने तो कांग्रेस की नींव हिला दी। भाजपा ने भी देखा की अपना टाइम आ गया। वो शोले फिल्म का डायलॉग है न “लोहा गर्म है, हथौड़ा मार दो।” तो अन्ना आंदोलन ने देश की जनता के दिल में कांग्रेस के लिए जो नफरत पैदा की थी, उसका बहुत ही बेहतरीन रणनीति के तहत भाजपा ने अपने पक्ष में मोड़ने का काम शुरू कर दिया।

बाबा रामदेव भी अन्ना आंदोलन के समक्षक आंदोलन चला रहे थे और राष्ट्रवाद की राजनीति का दौर शुरू होने वाला था, कांग्रेस हाईकमान और सोनिया गाँधी इसे भांप नहीं पाई क्योंकि ये अपने अंदरूनी मुद्दों में ही उलझे हुए थे। और आज दिन तक यही हाल हैं। दूसरी तरफ भाजपा नरेंद्र मोदी जैसी मजबूत शख्सियत को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना के चुनाव लड़ती है जिसका तोड़ कांग्रेस के पास था नहीं। राहुल गांधी को मोदी के साथ दिखाने की कोशिश जरूर की गई लेकिन आप जानते ही हैं कि नतीजा क्या हुआ।

2014 के झटके के बाद कांग्रेस आज दिन तक संभल नहीं पाई है और इसका सबसे बड़ा कारण है कमजोर हाईकमान जिसका जोर अब पार्टी पर चलता नहीं। पार्टी के कद्दावर नेता या तो दूसरी पार्टियों में चले जाते हैं या G 23 जैसे गुट बनाकर अंदर से पार्टी को कमज़ोर करते हैं। इस सबके बीच कांग्रेस हाईकमान हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। कांग्रेस के बहुत से नेताओं और कार्यकर्ताओं को अभी भी लगता है की कमान गाँधी परिवार के पास ही रहनी चाहिए और वो ही पार्टी का बेड़ा पार करवा सकते हैं। लेकिन कार्यकर्ता ये भूल जाते हैं कि बहुत से राज्यों में कांग्रेस गाँधी परिवार के कारण नहीं, बल्कि उस राज्य के मजबूत कांग्रेसी नेता के दम पर सरकार बनाती आई है। हमारे राज्य का उदाहरण ही ले लो। यहाँ काँग्रेस का नाम वीरभद्र सिंह था। पड़ोसी राज्य पंजाब को देख लो जहाँ कांग्रेस का नाम अमरिंदर सिंह था। हरियाणा को देख लो जहाँ कांग्रेस का नाम बंसी लाल और भजन लाल जैसे कद्दावर नेता थे। ये तो कुछ उदाहरण हैं ऐसे अनेकों नाम आपको मिल जाएंगे।

राहुल गांधी हर चुनाव के बाद गायब हो जाते हैं। विदेशों में एक एक महीना छुट्टियाँ मनाने चले जाते हैं। भाई ऐसे थोड़ी ना बनते हैं कमांडर। दूसरी तरफ प्रियंका गांधी,. जो एक वक्त लग रहा था की पार्टी में जान फूंक सकती हैं, वो भी ज्यादा कमाल कर नहीं पा रही। सोनिया गाँधी कहीं दिखती नहीं क्योंकि उनकी उम्र भी ज्यादा हो चुकी है और शायद बार बार हार का मुँह देखने से और पार्टी की कलह के कारण उनकी समझ को भी नुकसान हुआ होगा।

कांग्रेस आज एक ऐसे दौर में है जहाँ उसके लिए अब करो या मरो का संकट आ चुका है। 1885 में दादाभाई नौरोजी, सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी, रोमेश चंद्र दत्त जैसे 72 विद्वानों ने इस पार्टी की शुरुआत की थी, जिसमे अंग्रेजी अधिकारी ए.ओ ह्यूम का भी काफी अहम रोल था।  बाद में भी नेहरू के पार्टी की कमान संभालने से पहले बड़े बड़े क्रांतिकारी और विद्वान इस पार्टी को संभालते रहे। नेहरू और उसके बाद इंदिरा गांधी ने भी अपना काम बखूबी किया लेकिन फिर ये पार्टी Dynasty Politics यानी वंशवाद की राजनीति को ही सबकुछ मानने लगी और यहीं से इनके बुरे दिनों की नींव डलना शुरू हो गई।

आज पार्टी हाईकमान कैसे कैसे फैसले करती है, ये आप भी देख रहे हैं। पंजाब में अमरिंदर जैसे कद्दावर नेता को संभाल नहीं पाए और चुनावों से ठीक 4 महीना पहले कलह डाल दी। सिद्धू को कुछ ज्यादा ही भाव दे दिए गए और नतीजा आपके सामने है। ऐसे ही फैसले UP में लिए और पार्टी 403 में से सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई। आज की तारीख में पार्टी को अगर फिर से अपने पुराने दिनों के वैभव में आना है तो बड़े स्तर पर आंतरिक बदलाव करने होंगे। और इसकी शुरुआत खुद टॉप लेवल यानी गाँधी परिवार से करनी होगी। वरना ऐसा न हो कि भाजपा के ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ अभियान या तंज को कांग्रेस खुद ही मूर्त रूप दे दे।

(लेखक पत्रकार हैं। उनसे polestartv77@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

ये लेखक के निजी विचार हैं

एचआरटीसी की बुकिंग वाली वेबसाइट ठप, डोमेन हुआ एक्सपायर

शिमला।। हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम की टिकट बुक करने वाली वेबसाइट hrtchp.com ठप हो गई है। इस डोमेन पर जाने पर इधर उधर के विज्ञापन दिख रहे हैं और ऊपर संदेश है- This domain name expired on 2022-03-04 08:22:52Click here to renew it.

एकदम ऊपर डोमेन एक्सपायर होने की नोटिफिकेशन देखी जा सकती है।

यह दिखाता है कि डोमेन नेम hrtchp.com शुक्रवार को एक्यपायर हो गया था मगर विभाग ने इसे समय पर रीन्यू नहीं करवाया। Who is इन्फर्मेशन देखने पर पता चला कि इसे विभाग ने संभवत: वेबसाइट ठप होने के बाद रीन्यू तो करवा लिया मगर वेबसाइट  रीस्टोर नहीं की। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों को असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।

who is इन्फर्मेशन से पता चलता है कि डोमेनको कल रीन्यू किया गया है।

इस मामले में विभागीय अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई मगर उनका पक्ष अभी सार्वजनिक नहीं हो पाया है। खबर लिखे जाने तक वेबसाइट डाउन ही थी। जैसे ही कोई सूचना आएगी, उसे अपडेट किया जाएगा।

यूक्रेन में भारतीय छात्रों से दुर्व्यवहार पर राहुल गांधी की अपील

नई दिल्ली।। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बार फिर केन्द्र से मांग की है कि भारतीय छात्रों को जल्द से जल्द रेस्क्यू किया जाए। उन्होंने एक वीडियो भी ट्वीट किया है, जिसमें छात्रों के साथ मारपीट होती नजर आ रही है।

इस वीडियो को ट्वीट करते हुए राहुल गांधी ने लिखा, ‘इस तरह की हिंसा झेल रहे भारतीय छात्रों और ये वीडियो देखने वाले उनके परिवार के प्रति मेरी संवेदना है। इस तरह की हिंसा झेल रहे भारतीय छात्रों के लिए और ये वीडियो देखने वाले उनके परिवार के लिए दिल से दुख हो रहा है। किसी भी अभिभावक को ऐसी स्थिति से नहीं गुजरना चाहिए। भारत सरकार को यूक्रेन में फंसे हुए लोगों और उनके परिवारों के साथ तत्काल निकासी योजना शेयर करना चाहिए। हम अपनों को नहीं छोड़ सकते।’

इससे पहले गांधी ने कर्नाटक के कुछ भारतीय छात्रों का एक वीडियो शेयर किया था, जो यूक्रेन में एक बंकर में फंसे हुए थे। वीडियो शेयर करते हुए ट्वीट किया, ‘‘बंकर में मौजूद भारतीय छात्रों का यह दृश्य परेशान करने वाला है। बहुत सारे छात्र पूर्वी यूक्रेन में फंसे हुए हैं जहां भीषण हमला हो रहा है। मैं उनके चिंतित परिजन के साथ हूं। मैं एक बार फिर भारत सरकार से उन्हें तत्काल निकालने की अपील करता हूं।’’

हरोली की बेटी की व्यथा- घरवाले स्कूल की जगह लकड़ी लाने भेज रहे

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री का दावा है कि उनके क्षेत्र की लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रहीं क्योंकि क्योंकि घरवाले उन्हें चूल्हे के लिए लकड़ियां लाने भेज रहे हैं। उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर एक वीडियो पोस्ट किया है जो संभवत: उन्हीं के विधानसभा क्षेत्र हरोली के लोगों का है।

इस वीडियो में एक लड़की अपनी व्यथा सुनाते हुए कह रही है-घर वाले कहते हैं कि पहले लकड़ियां लाएं, फिर स्कूल भेजेंगे आपको। इस वीडियो में एक अन्य महिला का भी कहना है कि उसके पास पैसे नहीं है कि सिलेंडर भरवा सके, इसलिए बच्चों को स्कूल भेजने से पहले और बाद में लकड़ी लाने के लिए भेजना पड़ता है।

अपने फेसबुक पेज पर डाले वीडियो में मुकेश अग्निहोत्री ने कहा है कि गृहिणी योजना विफल साबित हुई है और लोग सिलेंडर नहीं भरवा पा रहे। इस कारण उन्हें चूल्हा इस्तेमाल करना पड़ रहा है और बेटियों को लकड़ी लाने भेजना पड़ रहा है। हालांकि, इस दावे पर सोशल मीडिया में कुछ लोगों ने सवाल उठाते हुए पूछा है कि जब दो साल से स्कूल बंद थे तो स्कूल भेजने की बात ही कहां से आई। कुछ लोग यह भी पूछ रहे हैं कि क्या यह समस्या गृहिणी योजना के बाद ही पैदा हुई।

इन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोपों से इतर गंभीर बात यह है कि अगर बेटियां किसी कारण स्कूल नहीं जा पा रहीं तो यह पूरे समाज के लिए चिंता की बात है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि स्थानीय विधायक भी क्षेत्र में लोगों को यह नहीं समझा पा रहे कि बाकी विषय अपनी जगह हैं लेकिन बेटियों की पढ़ाई बहुत जरूरी है। संभवत: इसी कारण उन्हें इस विषय को उठाने के लिए सोशल मीडिया का सहारा लेना पड़ा। ऐसे में स्थानीय प्रशासन को जांच करनी चाहिए कि ऐसा कहां और क्यों हो रहा है।

 

सरकार की चेतावनी- हड़ताल कर जनता के काम रोकने पर होगी कार्रवाई

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार ने सर्विसेज रूल्स के अनुसार आदेश जारी करते हुए प्रदेश के कर्मचारियों को आगाह किया है कि अगर वे प्रदर्शन, कार्य बहिष्कार, पेन डाउन स्ट्राइक या इसी तरह की अन्य गतिविधियों में शामिल होते हैं तो उन पर कार्रवाई की जाएगी।

कार्मिक विभाग ने पेन डाउन स्ट्राइक और मास लीव को लेकर सख्त दिशा निर्देश जारी किए हैं। ये निर्देश हिमाचल प्रदेश सिविल सर्विसेज़ रूल्स 3 और 7 के आधार पर इशू किए गए हैं। इन नियमों के मुताबिक जनता के काम में बाधा पहुंचाने या व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर कर्मचारियों का वेतन काटा जा सकता है और उन पर आपराधिक मामला भी दर्ज किया जा सकता है।

इसके अलावा संबंधित विभाग कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई भी कर सकते हैं। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने हाल ही में कहा था कि कर्मचारियों को संयमित ढंग से अपनी बात रखनी होगी, काम रोककर जनता को असुविधा पैदा करके आंदोलन का रास्ता अपनाने वालों की बात नही्ं सुनी जाएगी।

कार्मिक विभाग के दिशा निर्देशों को हाल ही में डॉक्टरों की पेन डाउन स्ट्राइक और ओपीएस बहाली के लिए एनपीएस कर्मचारियों की पद यात्रा के संबंध में भी देखा जा रहा है।