HRTC यात्रियों को महंगा और घटिया खाना मिलने पर परिवहन मंत्री का गोलमोल जवाब

एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क, शिमला।। एचआरटीसी बसों से यात्रा करने वालों के साथ ढाबों में लूट-खसूट को लेकर सामने आई खबर पर परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया है। एमबीएम से फोन पर बातचीत में मंत्री ने कहा, “मैं इस गंदगी वाले मुद्दे में नहीं पड़ना चाहते था लेकिन लगातार शिकायतें मिल रही हैं तो कार्रवाई करनी ही पडे़गी।”

दरअसल इस संबंध में प्रकाशित खबर पर न केवल प्रदेश के हरेक कोने से प्रतिक्रियाएं आई, बल्कि अन्य राज्यों से भी हाईवे पर लूट-खसूट को लेकर तीखी टिप्पणियां आई। लगातार पाठक इस मुद्दे पर ट्रांसपोर्ट मंत्री से बात करने का आग्रह कर रहे थे।

ट्रांसपोर्ट मंत्री ने यह तो कहा कि जल्द ही कदम उठाया जाएगा, लेकिन उनसे जब यह पूछा गया कि समयबद्ध कार्रवाई होगी तो इससे इनकार करते हुए कहा कि इसे समयबद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि अगर कार्रवाई को समय में बांध दिया गया तो बाद में भी सवाल पूछे जा सकते हैं।

मंत्री से जब यह पूछा गया कि क्या हाईवे पर निगम के मुख्यालय स्तर पर ढाबों को अधिकृत किया जाता है या नही तो इस बारे जानकारी होेने से अनभिज्ञता जाहिर की।

एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क का फेसबुक पेज लाइक करें

मंत्री के संज्ञान में इस बात को भी लाया गया कि हरियाणा के कुरुक्षेत्र के समीप डिवाइन ढाबे में बसों के यात्रियों को 80 रुपए का परांठा व 25 रुपए की चाय परोसी जाती है। जब यात्री सवाल करते हैं तो बदतमीजी से भी गुरेज नहीं किया जाता।

(यह एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

प्राइवेट स्कूल के फंक्शन में ऊर्जा मंत्री अनिल शर्मा ने सरकारी अध्यापकों को लताड़ा

एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क, मंडी।। एक ओर जहां हिमाचल सरकार यह कोशिश कर रही है कि सरकारी स्कूलों को लेकर लोगों में बनी धारणा को तोड़ा जाए, उसके ही एक मंत्री ने सरकारी स्कूलों की आलोचना की है। सरकार ने बच्चों को सरकारी स्कूलों की ओर आकर्षित करने के लिए जहां ‘मेरे स्कूल से निकले मोती’ जैसी योजना शुरू की है, वहीं एक मंत्री ने निजी स्कूल के फंक्शन में जाकर जो कहा है, उसे सरकार की मुहिम और सरकारी स्कूलों के लिए झटका माना जा रहा है।

प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अनिल शर्मा ने सरकारी अध्यापकों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उनपर तीखी टिप्पणियां की हैं। अनिल शर्मा का कहना है कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों का पढ़ाई और परिणाम की तरफ कम जबकि तबादलों की तरफ ज्यादा ध्यान रहता है।

अनिल शर्मा ने यह बात सोमवार को मंडी में गुरु गोबिंद सिंह पब्लिक स्कूल के वार्षिक समारोह के दौरान कही। अनिल शर्मा ने कहा कि निजी स्कूलों के अध्यापक कमिटमेंट के साथ कार्य करते हैं और बेहतर परिणाम देते हैं, जबकि सरकारी स्कूलों के अध्यापक ऐसी किसी कमिटमेंट के साथ काम नहीं करते।

एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क का फेसबुक पेज लाइक करें

ऊर्जा मंत्री ने कहा कि सरकारी स्कूलों के अध्यापकों को सिर्फ अपने तबादलों की पड़ी रहती है। अधिकतर अध्यापक यही देखते हैं कि घर के नजदीक किस स्कूल में अडजेस्टमेंट करवाई जा सके ताकि आने-जाने में सुविधा हो सके। उन्होंने कहा कि रोजाना उन्हें इस प्रकार के तबादलों के आवेदनों से जूझना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की कमी नहीं है बल्कि यहां पर अध्यापकों को कमिटमेंट के साथ काम करने की जरूरत है।

(यह एमबीएम न्यूज़ नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है।)

प्रदेश डूबा है कर्ज में, ऊर्जा मंत्री ने सरकारी पैसे से खरीदी नई SUV

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने किया ‘मनाली विंटर कार्नवल’ का अनुवाद

मनाली।। पर्यटन नगरी मनाली में पिछले कुछ सालों से सर्दियों के मौसम में विंटर कार्नवल मनाया जा रहा है। इस उत्सव को ‘मनाली विंटर कार्नवल’ या ‘मनाली विंटर कार्निवल’ कहा जाता है। मगर अब हिमाचल प्रदेश सरकार इस उत्सव का नाम बदल रही है।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर बुधवार को 8वें ‘नैशनल विंटर कार्नवल- मनाली 2019’ की शुरुआत के लिए पहुंचे हुए थे। इस दौरान सीएम ने कहा कि अब विंटर कार्निवल का नाम ‘मनाली शरदोत्सव’ होगा।

हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री कोई नया नाम नहीं दिया बल्कि अंग्रेजी नाम का हिंदी अनुवाद कर दिया है। विंटर कार्निवल का मतलब खुद में शरदोत्सव होता है। विंटर यानी शरद और कार्निवल यानी उत्सव। लेकिन पता नहीं मुख्यमंत्री को क्या खटका कि उन्होंने इसका आधिकारिक नाम बदलने का फैसला कर लिया।

न तो विंटर कार्निवल इतना मुश्किल नाम है कि इसके उच्चारण में लोगों को दिक्कत आती हो और न ही ये अंग्रेजों का दिया नाम है, जैसा कि शिमला को लेकर दावा किया जा रहा था। फिर भी इसे हिंदी में ‘मनाली शरदोत्सव’ किया जा रहा है।

खास बात यह है कि यहां के स्थानीय विधायक और मंत्री गोबिंद ठाकुर बहुत पहले से अपने फेसबुक पेज वगैरह पर और संबोधनों में मनाली विंटर कार्नवल को ‘मनाली शरदोत्सव’ कहते रहे हैं।

बहरहाल, लोगों के बीच दोनों नाम प्रचलित है। ऐसे में जिस तरह से बहुत से लोग पहले इसे मनाली शरदोत्सव कहते थे, उसी तरह बहुत से लोग आगे भी अपनी सहूलियत के हिसाब से इसे ‘विंटर कार्निवल’ कहते रहेंगे। मगर नाम बदलने का यह खेल हास्यास्पद है।

क्या हिमाचल को भी चाहिए मनु महाराज जैसा दबंग पुलिस अफसर?

एमबीएम न्यूज नेटवर्क की इनपुट्स के साथ।। हिमाचल प्रदेश में आजकल अपराध को लेकर सबसे बड़ी चिंता है ड्रग्स की। हिमाचल प्रदेश पुलिस बड़े पैमाने पर विभिन्न तरह के ड्रग्स की बरामदगी कर रही है और इसकी तस्करी करने वाले भी पकड़े जा रहे हैं। मगर समस्या यह है कि इस काले कारोबार के उस्तादों तक पुलिस पहुंच नहीं पा रही। तस्कर पकड़े जाते हैं, माल पकड़ा जाता है मगर नशे के कारोबार का धंधा थम नहीं रहा। तो क्या हिमाचल पुलिस को एक ऐसे दबंग अधिकारी की जरूरत है जो नशा विरोधी अभियान की कमान संभालकर इस समस्या को जड़ से समाप्त कर दे?

यहां हिमाचल प्रदेश के अधिकारियों की योग्यता पर सवाल नहीं उठा रहे मगर प्रदेश के इतिहास में कभी कोई ऐसा पुलिस अधिकारी नहीं रहा, जिसके कारनामों के चर्चे लोगों की जुबां पर हों। ऐसे कुछ अधिकारी हिमाचल में रहे भी हैं जिन्होंने अपने काम से लोगों का दिल जीता मगर सिस्टम ने उन्हें ऐसा घुमाया कि वे भी अपनी धार खो बैठे। यह ठीक है कि छोटे से प्रदेश में अपराध कम होते हैं तो पुलिस के पास करने के लिए ज्यादा नहीं होता। मगर जो कुछ होता है, उसमें भी पुलिस के हाथ-पांव फूल जाते हैं।

नशे के अलावा अन्य कई आपराधिक मामलों को आठ में साठ करके निपटा दिया जाता है या फिर मामले सॉल्व हो नहीं हो पाते। जो मामले लोगों को उत्तेजित करते हैं, वे पुलिस की तथाकथित अक्षमता के कारण सीबीआई को सौंपने पड़ जाते हैं। होशियार सिंह केस से लेकर कोटखाई के गुड़िया रेप और मर्डर केस तक इसके उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। मगर हिमाचल प्रदेश से संबंध रखने वाला एक आईपीएस अधिकारी ऐसा है जो बिहार में एक आइकॉन बन गया है। नशे के खिलाफ लड़ना है तो पुलिस में कोई तो एक आइकॉन होना चाहिए जिससे पूरी टीम को प्रेरणा मिले।

फिलहाल, जानें बिहार कैडर उस आईपीएस ऑफिसर के बारे में, जिसका संबंध हिमाचल प्रदेश से है। ये हैं- मनु महाराज जिन्हें हाल ही में डीआईजी के रूप में प्रमोशन मिला है।

कौन हैं मनु मराहाज
बिहार की राजधानी पटना में एक अरसे से दबंग एसएसपी के तौर पर तैनात मनु महाराज को डीआईजी के पद पर प्रमोशन मिली है। हिमाचली लाल ने यह सफर 13 साल में पूरा किया है। 2005 में मनु महाराज ने यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की थी, यहां उनके सामने आईएएस बनने का भी अवसर था। बचपन से ही पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखने वाले मनु महाराज ने आईपीएस को ही चुना। देश भर में आईपीएस मनु महाराज की पहचान रियल लाइफ सिंघम के तौर पर होती है।

क्या है हिमाचल से संबंध
वैसे आईपीएस मनु महाराज का गृह क्षेत्र चंबा जिला का डलहौजी है, लेकिन परिवार शिमला में सैटल है। पिता विष्णु कीर्ति बिजली बोर्ड से बतौर अधीक्षण अभियंता सेवानिवृत हुए, जबकि चंद्र प्रकाश मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद से रिटायर हो चुकी हैं। शिमला में ही पढ़ाई करने के बाद मनु महाराज ने आईआईटी रूड़की से बीटेक किया। चाहते तो मल्टी नेशनल कंपनी में नौकरी से हर साल करोड़ों रुपए का पैकेज ले सकते थे, लेकिन इसकी बजाय आईपीएस अधिकारी बनने के सपने को पूरा कर दिया। अपराधियों को दबोचने के जो सपने बचपन में देखे थे, उन्हें पिछले 13 साल से पूरा भी कर रहे हैं।

पिता की नौकरी के दौरान मनु महाराज ने राज्य के कई हिस्सो में बचपन बिताया। इसमें सबसे ज्यादा नाहन व धर्मशाला की यादें उनके जहन में ताजा हैं। नाहन के चौगान मैदान में हॉकी खेलना भी नहीं भूल पाए हैं। उल्लेखनीय है कि बिहार जैसे राज्य में अपराध पर अंकुश लगाना एक पुलिस अधिकारी के लिए आसान नहीं होता, लेकिन हिमाचली बेटे ने कर दिखाया है।

किसलिए हैं प्रसिद्ध
मनु महाराज की फिल्मी हीरो की तरह स्टाइलिश मूंछे, सुडौल शरीर व दबंग अंदाज से ही अपराधी थर-थर कांपने लगते हैं। देवभूमि के लिए गौरव की बात इस कारण है, क्योंकि देश का एक नामी आईपीएस अधिकारी हिमाचल का बेटा है। खास बात यह है कि अपराध जगत में विषम परिस्थितियों के बावजूद भी मुस्कुराते रहने वाले मनु महाराज का एक अंदाज यह भी है कि वो अपराधियों के साथ भी अपशब्दों का इस्तेमाल नहीं करते। बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार का भी हिमाचली बेटा चहेता है।

एमबीएम न्यूज नेटवर्क का फेसबुक पेज लाइक करें

इन बातों के लिए होती है चर्चा
1- रात के वक्त पटना की सडक़ों पर जब सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने निकलते है तो सरकारी वाहन की बजाए बाइक पर जाते हैं। चेहरे पर नकाब पहन लेते हैं, ताकि कोई पहचाने न। जान बूझकर हैल्मेट नहीं पहनते, ताकि पता चले कि पुलिस कर्मी चैकिंग करेंगे या नहीं।

2- एक मर्तबा आईपीएस अधिकारी ने अपने चेहरे पर गमछा लगा लिया। पैर में टूटी चप्पल पहनकर साइकिल पर सवार होकर चल पडे। रास्ते में पुलिसवालों को बोले साहब मजदूरी करके लौट रहा था रास्ते में बदमाशों ने लूट लिया। मदद की बात अनसुनी करने वाले पुलिस कर्मियों पर उचित एकशन लिया गया।

3- एंटी नक्सल ऑपरेशन के स्पेशलिस्ट होने की वजह से भी मनु महाराज को बिहार पुलिस में दबंग माना जाता है। उपलब्धियों पर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

4- अब तक 1 लाख से अधिक खूंखार अपराधियों को सलाखों के पीछे धकेल चुके है।

5- नक्सल प्रभावित क्षेत्र रोहतास में तैनात रहने के दौरान आईपीएस की कोशिश से ही तीन दशक से नक्सलवाद के जाल में फंसे लोगों को खुले में सांस लेने का मौका मिला। कईयों ने आत्मसमर्पण किया। कुख्यात नक्सली मुन्ना समेत 4 ने मनु महाराज के सामने घुटने टेके।

6- एमबीएम ने जुटाई जानकारी में पाया कि एक मर्तबा बेबाक स्टाइल का सहारा लिया गया। सिंघम के नाम से चर्चित मनु महाराज ने बेहद सुरक्षित कोतवाली थाना से खुद ही जीप चोरी कर ली, ताकि पता लगा सकें कि कर्मी कितने अलर्ट हैं। साहब का इस तरह का स्टाइल देखकर खुद पुलिस कर्मी दंग रह गए।

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की इनपुट के साथ प्रकाशित)

हिमाचल प्रदेश सरकार के 2019 के कैलंडर में जनता के साथ ‘धोखा’

इन हिमाचल डेस्क।। साल 2019 के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार का आधिकारिक कैलंडर जारी हो गया है और सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें जमकर शेयर हो रही हैं। जहां इस कैलंडर इस बात के लिए तारीफ हो रही है कि इसमें मुख्यमंत्री के बजाय किसी जगह की तस्वीर लगाई गई है, वहीं एक बात को लेकर यह कैलंडर विवादों में घिर गया है।

दरअसल पहले राज्य सरकार के कैलंडर पर मुख्यमंत्रियों की तस्वीर छपी होती थी। इस बार जहां मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के गृहक्षेत्र जुंजैहली की तस्वीर इसमें लगाई गई है। इरादा रहा होगा टूरिजम को प्रमोट करने का मगर हकीकत यह है कि यह तस्वीर भ्रामक है। यहां तक जुंजैहली के स्थानीय निवासी भी इस तस्वीर को देखकर हैरान हैं।

सरकारी कैलंडर में छपी तस्वीर

दरअसल कैलंडर में जो तस्वीर छपी है, वह कई साल पुरानी है। अब जुंजैहली की तस्वीर बदल गई है। खेतों के बीच और सड़क के किनारे कई मकान बन चुके हैं। जाहिर है, इससे घाटी का सौंदर्य बरकरार है मगर लैंडस्केप तो बदला ही है। ऐसे में पहले जहां साफ-सुथरी तस्वीर में खेत और पहाड़ियां नजर आती थीं, अब सड़क किनारे ऊंची और रंग-बिरंगी इमारतें दिखती हैं। ऐसे में पुरानी तस्वीर लगाना जनता के साथ धोखा नहीं तो और क्या है।

नीचे देखें इसी ऐंगल से खींची गई ताज़ा तस्वीर

ताज़ा तस्वीर

यानी नहीं भी तो कैलंडर में लगाई गई तस्वीर 10-15 साल पुरानी है। हालांकि कुछ लोगों का दावा है 18-20 साल पुरानी तस्वीर है और कई अखबारों में छप चुकी है। लेकिन हिमाचल सरकार के कैलंडर में इस तस्वीर को लगाने को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं। लोगों का कहना है कि खुशामद के लिए किसी अधिकारी ने सीएम के इलाके की तस्वीर लगा दी और वह भी पुरानी।

यह सामान्य चूक नहीं है क्योंकि अगर इस तस्वीर का मकसद टूरिस्ट्स को आकर्षित करना है तो यह उनके साथ धोखा है। अगर कोई जुंजैहली घाटी की तस्वीर को कैलंडर पर देखकर यहां आ जाए तो उसके झटका लगेगा। अगर टूरिजम विभाग के पास टाइम मशीन हो तो बात अलग है। इसमें कोई शक नहीं कि जुंजैहली अब भी खूबसूरत है और टूरिस्टों को आकर्षित करने की क्षमता उसमें है। ऐसे में कोई और तस्वीर लगाई जा सकती थी।

बहरहाल, आप छुट्टियों और त्योहारों आदि की जानकारी के लिए ये लीजिए कैलंडर:

डॉक्टर सुरेश कुमार सोनी स्कूल एजुकेशन बोर्ड के चेयरमैन नियुक्त

शिमला।। हिमाचल सरकार ने बिलासपुर के घुमारवीं के डॉक्टर सुरेश कुमार सोनी को हिमाचल प्रदेश बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन का चेयरमैन नियुक्त किया है।

वन अधिकार कानून लागू न किए जाने के खिलाफ किन्नौर में प्रदर्शन

रिकॉन्ग पिओ।। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के जनजातीय मूल निवासी ने फॉरेस्ट राइट्स ऐक्ट 2006 को लागू न किए जाने के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। स्थानीय लोग राज्य सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने की तैयारी में हैं। शनिवार को वे FRA के तहत विरोध प्रदर्शन करेंगे।

जिला वन अधिकार समिति किन्नौर के अध्यक्ष जिया लाल नेगी ने कहा कि वादे किए जाने के बावजूद राज्य सरकार ने FRA को लागू करने की दिशा में कुछ नहीं किया है। उन्होंने कहा कि लिप्पा गांव के 47 दावों को रिकॉन्ग पिओ की डिस्ट्रिक्ट लेवल कमिटी ने कानून को नजरअंदाज करते हुए खारिज कर दिया।

उनका कहना है कि डिस्ट्रिक्ट लेवल कमिटी के आदेश बताते हैं कि उसके अधिकारी FRA 2006 के प्रावधानों के आधार पर नहीं चल रहे। जिया लाल नेगी ने कहा है कि अकेले किन्नौर जिले में 3000 दावे अभी तक निपटाए नहीं गए हैं। ऐसे में लोग शनिवार को  ‘रिकॉन्ग पिओ चलो’ नारे के तहत बुलाए गए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले रहे हैं।

जयराम ठाकुर को क्यों पसंद करते हैं नरेंद्र मोदी और अमित शाह?

भूप सिंह ठाकुर।। दिसंबर 2017 को शिमला के पीटरहॉफ में सर्दियों की हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच माहौल गर्म था। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से आए भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता स्टेट गेस्ट हाउस के मैदान में जुटे हुए थे। अक्सर हिमाचल को नदरअंदाज़ कर देने वाला राष्ट्रीय मीडिया भी अचानक हिमाचल में दिलचस्पी लेने लगा था। कई राष्ट्रीय समाचार चैनलों के पत्रकार भी पीटरहॉफ के बाहर जुटे हुए थे। बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं का दिल्ली से शिमला आना-जाना लगा हुआ था। प्रदेश की जनता भी टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर चिपकी हुई थी। हर कोई इंतज़ार कर रहा था कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा।

बीजेपी स्पष्ट बहुमत लायक सीटें तो ले आई थी मगर जिस नेता को चुनाव से पहले अभियान की कमान सौंपी थी, वह अपनी सीट हार चुका था। मगर प्रेम कुमार धूमल और उनके समर्थक सीएम के तौर पर दावेदारी छोड़ने के तैयार नहीं थे। धूमल जहां विनम्रता से यह कह रहे थे कि अंतिम फैसला पार्टी को करना है, वहीं उनके कुछ समर्थक दिल्ली से आए पर्यवेक्षकों के सामने शक्ति प्रदर्शन में जुटे हुए थे। हालात ऐसे थे कि वरिष्ठ नेता शांता कुमार ने आजिज आकर यह तक कह दिया था कि मैं इन अनुशासनहीनों को पार्टी से बाहर निकाल देता।

उधर दिल्ली में मौजूद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के भी सीएम बनने अटकलें की खबरें मीडिया में चलने लगीं। कुछ चैनलों ने तो उनका नाम भावी सीएम के तौर पर अपनी स्क्रीन पर फ्लैश कर दिया। उधर धूमल के खेमे के कुछ विधायकों ने तो यह कह दिया कि हम धूमल के लिए अपनी सीट छोड़ने को तैयार हैं और धूमल चाहें तो उनकी सीट पर आकर चुनाव लड़ सकते हैं मगर सीएम उन्हें ही बनाया जाए।

लेकिन तभी आलाकमान ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री जो भी होगा, वह चुने हुए विधायकों में ही होगा। इसके साथ ही चुने हुए विधायकों के बीच होड़ लग गई। वरिष्ठ और अनुभवी विधायक संघ और पार्टी संगठन में बैठे अपने करीबियों से लिंक भिड़ाने में जुट गए। उस समय ‘इन हिमाचल’ ने सबसे पहले संभावितों के तौर पर जयराम ठाकुर का नाम सबसे आगे बताया। ऐसा करने के पीछे इन हिमाचल ने लिखा था कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जयराम ठाकुर के पक्ष में चुनाव प्रचार करते समय कहा था- आप इन्हें जिताइए, पार्टी इन्हें सरकार में सबसे बड़ा पद देगी।

नवंबर में भी इन हिमाचल पर खबर पढ़ी थी जिसमें अंदाजा लगाया गया था कि पार्टी के मन में क्या है (यहां क्लिक करके पढ़ें)। इस खबर को पढ़कर लगा था कि शुरू में कुछ समय के लिए प्रेम कुमार धूमल को सीएम बनाया जा सकता है मगर बाद में धूमल की जगह जयराम को नेतृत्व सौंपा जा सकता है। मगर जिस समय प्रेम कुमार धूमल की हार हो गई, उसी समय स्पष्ट हो गया कि अब उनकी जगह नंबर जयराम ठाकुर का ही लगने वाला है।

एक साल पहले जब अमित शाह ने यह बयान दिया था और फिर बाद में जब जयराम को ही मुख्यमंत्री बनाया था, उसी समय स्पष्ट हो गया था कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी दोनों की हिमाचल के लिए पसंद जयराम ठाकुर ही हैं। वैसे भी जबसे भारतीय जनता पार्टी पर अमित शाह और नरेंद्र मोदी का प्रभुत्व हुआ है, उसके बाद से जिन-जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें बनी हैं, उनमें स्थापित नेताओं के बजाय नए चेहरों को मुख्यमंत्री बनाया गया है।

महाराष्ट्र में फडनवीस, राजस्थान में खट्टर, झारखंड में रघुबर इसके उदाहऱण हैं। इसके अलावा जब जयराम को हिमाचल में नेतृत्व सौंपा गया, उसके बाद अन्य राज्यों में भी यह सिलसिला जा रही। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश से लेकर सुदूर उत्तर पूर्व तक नए चेहरों को मौका दिया गया। अगर पैटर्न पर गौर फरमाएं तो यह चयन करने के पीछे शाह और मोदी की खास रणनीति रही है। वह है- पार्टी में गुटबाजी खत्म करना।

दरअसल हर पार्टी में हर राज्य के अंदर गुट होते ही हैं। उनकी आपसी खींचतान पार्टी के लिए खतरनाक रहती है। अगर इन गुटों में से किसी एक को नेतृत्व सौंप दिया जाए तो दूसरा गुट नाराज होकर पार्टी की कब्रें खोदने में जुटा रहता है। ऐसे कई उदाहऱण देखने को मिले हैं और गुटबाजी के कारण पहले भी हिमाचल प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी नुकसान उठाती रही है। उसके लगातार सत्ता में न आ पाने के पीछे भी यही कारण माना जाता है।

तो अगर इन गुटों के अलावा किसी अन्य को यह कमान सौंप दी जाती है तो बाकी गुट कमजोर हो जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि जिन ध्रुवों के इर्द-गिर्द विधायक और नेता आदि घूम रहे होते हैं, उनमें से कई लोग नए नेतृत्व की ओर शिफ्ट हो जाते हैं। इससे पहले वाले गुट असंतुष्ट हो भी जाएं, तब भी उनका प्रभाव इतना नहीं रहता कि वे पार्टी को कमजोर कर पाएं। ऐसे में उनके पास भी अपनी प्रासंगिकता बानए रखने के लिए नए नेतृत्व को स्वीकार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता।

लेकिन अगर खेमेबाजी तोड़कर किसी और अन्य को नेतृत्व सौंपना है तो उसमें भी अमित शाह और नरेंद्र मोदी यूं ही किसी का चयन नहीं करते। वे ऐसे नेता का चयन करते रहे हैं जो बेदाग हो, अनुशासित हो और लो प्रोफाइल रहते हुए खेमेबाजी से दूर रहे। ऐसे व्यक्ति का सीएम के तौर पर चयन कर लेने के बाद मोदी-शाह की जोड़ी उसे अपना पूरा समर्थन देती है।

जिस समय नरेंद्र मोदी में थे, उस समय संगठन के स्तर पर उनका सभी के साथ मिलना-जुलना रहा है। धर्मशाला की रैली में भी उन्होंने जिक्र किया कि वह तहसील स्तर पर काम करने वाले नेताओं को आज मंच पर कैबिनेट मंत्रियों के तौर पर बैठा देख खुश हैं। तो उस दौरान से जयराम को वह जानते रहे हैं। आज भी जयराम की पहचान मृदुभाषी नेता की है। संभवत: इन्हीं बातों ने जयराम ठाकुर को हिमाचल के सीएम की कुर्सी पर बिठाने में मदद की। पिछले साल दिसंबर में लंबे मंथन के बाद जैसे ही जयराम ठाकुर को सीएम बनाने का ऐलान किया था, पीटरहॉफ के प्रांगण में बीजेपी समर्थक झूमने लगे थे।

जनाभार रैली के दौरान जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच से संबोधन की शुरुआत की, उन्होंने सभी नेताओं और पदाधिकारियों को उनके पदनाम के साथ संबोधित किया जबकि जयराम ठाकुर को मेरे मित्र कहा। इसके बाद भी उन्होंने जयराम सरकार के काम की तारीफ की और उनके काम पर बने वीडियो को सभी लोगों तक पहुंचाने की अपील की।

यह एक तरह से जयराम सरकार के एक साल के कार्यकाल को प्रधानमंत्री का अप्रूवल था कि वह उनके कामकाज से संतुष्ट हैं। साथ ही यह पार्टी और असंतुष्ट धड़ों को भी संदेश था कि वे टांग खिंचाई से बाज आकर सरकार की योजनाओं का जनता के बीच प्रचार-प्रसार करें। मंच से प्रधानमंत्री ने जयराम और उनकी सरकार के कामों की जिस तरह से तारीफ की है, जाहिर है उससे जयराम और उनके कैबिनेट के सहयोगियों का जहां मनोबल बढ़ा होगा तो वहीं पार्टी के अंदर के उनके विरोधियों को झटका भी लगा होगा।

लेकिन अभी तो एक साल पूरा हुआ है और इस दौरान हुए काम के आधार पर सरकार को निर्णायक तौर पर जज नहीं किया जा सकता। लेकिन सरकार को जनता और खासकर पार्टी के अंदर के ही लोगों की भावनाओं को समझना होगा। जनता ने कांग्रेस को हराकर अगर बीजेपी को वोट दिया था तो उसकी कुछ अपेक्षाएं थीं। उन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए जयराम सरकार को बहुत मेहनत करनी होगी। वरना जिस तरह से एक साल तेजी से बीता है, बाकी के चार साल बीतने में भी समय नहीं लगेगा।

जरूरी यह भी है कि जयराम सरकार असंतुष्ट कार्यकर्ताओं की भी सुने, भले वे किसी भी खेमे से क्यों न हों। उनकी वाजिब मांगों और समस्याओं पर ध्यान देकर ही उनके असंतोष को दूर किया जा सकता है। सर्वमान्य नेता की पहचान यही है कि वह खेमेबाजी को तोड़कर पार्टी को एकजुट करे। अगर एक बार इस पार्टी की सरकार, अगली बार उस पार्टी की सरकार के सिलसिले को तोड़कर जयराम ठाकुर ने अगली बार भी भाजपा को सत्ता में लाने का लक्ष्य है तो उन्हें पूरी पार्टी को साथ में लेकर चलना होगा। कार्यकर्ताओं का असंतोष दूर करना होगा और वह भी बिना तुष्टीकरण किए।

(लेखक मंडी के रहने वाले हैं और आयकर विभाग से सेनानिवृति के बाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिख रहे हैं।)

DISCLAIMER: ये लेखक के निजी विचार हैं।

धर्मशाला में 2019 लोकसभा चुनाव का अजेंडा सेट कर गए मोदी?

आई.एस. ठाकुर।। गुरुवार को धर्मशाला में आयोजित ‘जन आभार रैली’ हिमाचल में बीजेपी की सरकार का एक साल पूरा होने का जश्न ही नहीं था बल्कि अगले साल होने जा रहे लोकसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी के चुनाव प्रचार अभियान की अनौपचारिक शुरुआत थी।

धर्मशाला में नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर फिर वैसे ही आक्रामक भाषा इस्तेमाल की, जैसी भाषा वह 2014 में करते थे। लेकिन जिस समय उन्हें अपनी सरकार की उपलब्धियों को गिनाने में व्यस्त होना चाहिए, उस समय उनका विपक्ष के आरोपों की सफाई में समय गंवाना खटकता है। 2014 में पालमपुर में परिवर्तन रैली के दौरान उन्होंने कहा था कि मैं आपके जीवन को रोशनी से भर दूंगा, मैं सेवक की तरह काम करूंगा और 60 सालों के जो अंधेरा फैला है उसे खत्म कर दूंगा।

मगर पांच साल खत्म होने को हैं और प्रधानमंत्री का अपने भाषण में ज्यादा समय विपक्ष पर आरोप लगाने और अपने ऊपर लगे आरोपों की सफाई देने में बिताना दिखाता है कि कहीं न कहीं उन्हें अहसास है कि जो वादे उन्होंने किए थे, उनपर वे पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए हैं।

हालांकि ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है। मगर रफाल विमान के मुद्दे को विपक्ष ने इतने जोर-शोर से उठाया है कि वह यह संदेश देने में कहीं न कहीं कामयाब रही है कि सौदे में कुछ तो गड़बड़ है। भले ही सरकार आश्वस्त हो कि उसने कुछ गलत नहीं किया है, मगर उसकी ऊर्जा रफाल को लेकर बने माहौल में अपना बचाव करने में ज्यादा नष्ट हो रही है।

लेकिन बीजेपी भूल गई है कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान जब मोदी देश में घूम रहे थे तो लोगों में उन्हें लेकर जिज्ञासा थी। उन्होंने मोदी के बारे में सुना था मगर वे नहीं जानते थे कि वह कैसे हैं, गुजरात में उन्होंने क्या किया है। गुजरात मॉडल की मीडिया में बहुत चर्चा थी। मगर पिछले पौने पांच सालों में प्रधानमंत्री जिस तरह से हर मौके पर सोशल मीडिया, टीवी और रेडियो पर छाए रहे, उससे लोगों में वह जिज्ञासा खत्म हुई है।

पहले जहां उनके पास दिखाने और गिनाने के लिए कथित गुजरात मॉडल था, अब उनके पास प्रधानमंत्री के तौर पर उसी तरह कोई मॉडल होना चाहिए था। चूंकि 2014 में लोग मोदी के काम और उनके बारे में जानते नहीं थे, तो उन्हें नहीं मालूम था कि किस मॉडल की बात मोदी कर रहे हैं। मगर अब पीएम के तौर पर जनता ने उन्हें लंबे समय तक फॉलो किया है। वह क्या कहते हैं, क्या करते हैं, इस पर नजर रही है। इसलिए इस बार पीएम के तौर पर उनका काम जनता से छिपा नहीं है।

राज्यों के मुद्दे उठाने हों, तब भी नरेंद्र मोदी को सावधान रहना होगा। हिमाचल की ही बात करें तो धर्मशाला का भाषण बहुत से लोगों को पुराना लगेगा क्योंकि उसमें अधिकतर बातें वही हैं जो उन्होंने हिमाचल के हर दौरे में कही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंच से जिस तरह की बातें की, वो अप्रैल 2014 में ‘परिवर्तन रैलियों’ के दौरान पालमपुर, सुजानपुर और मंडी में दिए गए भाषणों या इसके बाद शिमला, बिलासपुर आदि जगहों पर कही गई बातों से अलग नहीं थीं। धर्मशाला में उनके पास गिनाने को कम, कांग्रेस को सुनाने के लिए ज्यादा था। 2014 में जब वह वोट मांग रहे थे, तब उनके भाषण का जो कॉन्टेंट होता था, 2018 तक अधिकतर वही कॉन्टेंट रिपीट हो रहा है

उदाहरण के लिए वह हर बार हिमाचल प्रभारी होने के दौरान यहां बिताए समय, यहां के खान-पान की बातें करते हैं, फिर कहते हैं कि टूरिजम का विकास होना चाहिए, फिर कहते हैं लाहौल स्पीति के आलू फ्लां जगह खाए जाते हैं, फिर कहेंगे कि फलों का जूस कोका कोला में होना चाहिए और फिर रेल और सड़कों के विकास की बातें करते हैं। साथ ही हिमाचल से बहुत ज्यादा सैनिक होने का जिक्र करना भी वह नहीं भूलते। मगर वह यह गिनाने में नाकाम रहते हैं कि इन चार सालों में इन विषयों पर उन्होंने क्या किया।

वह केंद्र सरकार से राज्य को मिलने वाली मदद बढ़ने की बात तो करते हैं मगर ये आंकड़े किस आधार पर दिए गए हैं, यह स्पष्ट नहीं करते। इसमें कोई शक नहीं कि केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार हो तो अचानक राज्यों को मिलने वाली आर्थिक मदद बढ़ जाती है। वैसे भी संघीय ढांचे में हिमाचल जैसे छोटे और कम राजस्व वाले प्रदेशों को तो केंद्र सरकारों पर आश्रित तो होना ही पड़ता है।

बाकी उन्होंने अन्य योजनाओं के आंकड़े पेश किए जो हिमाचल के लिए शायद उतनी लाभकारी न हों, जितनी देश के अन्य हिस्सों के लिए हुई हो। धर्मशाला में दिए गए मोदी के भाषण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले दिनों में जब पार्टी चुनाव के मैदान में उतरेगी तो उसके मुद्दे क्या होंगे और प्रधानमंत्री के भाषण के तेवर क्या रहेंगे। लेकिन अगर वह इसी तरह का भाषण देंगे, ऐसी ही बातें गिनाएंगे तो जनता पर इसका प्रभाव होने की संभावनाएं कम ही हैं। हो सकता है कि संसद सत्र जारी होने के कारण इस रैली के लिए भाषण तैयार करते समय उन्होंने पूरी तैयारी न की हो, मगर आगे उन्हें ख्याल रखना होगा।

बेहतर तो यह होता कि मोदी खुद अपने पुराने (2014 के प्रचार अभियान के दौरान दिए गए) भाषणों में किए गए वादों की सूची निकालते और फिर बारी-बारी से गिनाते कि इस संबंध में उन्होंने और उनकी सरकार ने क्या काम किए हैं। हो सकता है कि सभी वादे पूरे न हुए हों। और सभी वादों को पूरा करना संभव भी नहीं है। लेकिन जितने वादे पूरे हों, उन्हें गिनाना उनके लिए सही रहेगा। वरना ऐसा न हो कि जनता को यही लगे कि वह 2014 के चुनाव से पहले के भाषणों के रिकॉर्डेड टेप को 2019 के चुनावों से पहले दोबारा सुन रही है।

(लेखक हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

विक्रमादित्य का बयान जुबान का फिसलना है या सामंती सोच का प्रदर्शन?

इन हिमाचल डेस्क।। वीरभद्र सिंह हिमाचल प्रदेश के लोकप्रिय नेता हैं और काफ़ी सुलझे हुए भी हैं. मगर उनकी भाषा कई बार इस तरह की होती है कि उसे सभ्य व्यक्ति की भाषा नहीं कहा जा सकता. वह कई बार ऐसे बयान दे चुके हैं जो व्यक्तियों और समुदायों पर न सिर्फ निजी हमले होते हैं बल्कि अपमानजनक भी होते हैं.

किसी को मकरझंडू कह देना, किसी को गुंडा कह देना तो एक बार नज़रअंदाज़ किया भी जा सकता है मगर जाति या समुदाय के आधार पर किसी पर प्रहार करना या किसी को नीचा दिखाने के लिए किसी जाति या समुदाय का उदाहरण देते हुए तुलना करना वीरभद्र की आदत रही है. एक बार माना जा सकता है कि वीरभद्र बुजुर्ग हो चुके हैं और शायद इस कारण उन्हें मर्यादाओं का ख्याल नहीं रहता. मगर समस्या यह है कि उनके बेटे और शिमला ग्रामीण के विधायक विक्रमादित्य भी उनकी ही राह पर निकल पड़े हैं.

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान विक्रमादित्य सिंह ने जयराम सरकार पर ‘संघियों और भंगियों के ग्रिप में’ होने की बात कहीं। पहली नज़र में यह स्लिप ऑफ टंग लग सकता है यानी जुबान का फिसलना लग सकता है मगर वीरभद्र परिवार के इतिहास को देखें तो लगता है कि यह सिर्फ लापरवाही का मामला नहीं बल्कि फ्यूडल मानसिकता का नतीजा है. ज़रा 40वें सेकंड से सुनें:

विक्रमादित्य ने CM जयराम से 1 साल के कार्यकाल का मांगा ब्यौरा, कहा- ये तो संघियों और भंगियों की सरकार

विक्रमादित्य ने CM जयराम से 1 साल के कार्यकाल का मांगा ब्यौरा, कहा- ये तो संघियों और भंगियों की सरकारhttps://goo.gl/8Kk9bm#HimachalPradesh #HimachalNews

Etv Himachal Pradesh ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಗುರುವಾರ, ಡಿಸೆಂಬರ್ 20, 2018

ध्यान दें, जब कांग्रेस सत्ता में थी तो किसी ने सीपीएस नीरज भारती को कथित तौर पर ‘भंगी’ कह दिया था। उस समय नीरज ने इसका विरोध किया था और काँग्रेस ने भी इसे अपमानजनक टिप्पणी बता दिया था। मगर अब वैसी ही टिप्पणी, वह भी बेहद अपमानजनक ढंग से कांग्रेस विधायक ने कर दी है।

सामंती मानसिकता?
वीरभद्र अक्सर यह गर्व से कहते रहे हैं कि मैं अपने वंश का 122वें नंबर का राजा हूं, कोई खानाबदोश नहीं. दरअसल यह टिप्पणी उस बोध से भरी हुई है कि मैं आम लोगों से अलग हूं और शासक वर्ग हूं इसलिए मैं बाकियों से श्रेष्ठ हूं. मगर इस कड़ी में वीरभद्र न जाने कितनी ही अनावश्यक और वाहियात टिप्पणियां कर चुके हैं. अगर कोई खानाबदोश है तो क्या वह खराब हो गया?

जब वह सत्ता में थे तो उन्होंने बीजेपी की तुलना सफाई कर्मचारियों से कर दी थी. जब बीजेपी ने कांग्रेस के खिलाफ चार्जशीट लाने की बात कही थी तो वीरभद्र ने कहा था- ये गंदगी उठाने वाले लोग है, यही काम करेंगे. इन्हें चाहिए म्यूनिसिपल कमेटी में नौकरी के लिए दरख्वास्त दें.

यानी वीरभद्र को बीजेपी पर प्रहार करना था तो गंदगी उठाने वाले लोग कह दिया. यह उनकी सोच का स्तर था. मगर यह पहला मौक़ा नहीं था. जब वह सिरमौर दौरे पर गए थे तो बिंदल पर हमला करने के लिए कह दिया था- बिंदल कोई सुंदर नारी नहीं कि नाहन की जनता उनपर मोहित हो जाए. और गुड़िया केस को कौन भूल सकता है जब पुलिस की कार्रवाई पर लोग सवाल उठा रहे थे तो वीरभद्र ने कहा था- कोटखाई के लोग ज्यादा होशियार बन रहे हैं.

इसके अलावा उन्होंने महेश्वर सिंह को लेकर पत्नी को लेकर भी टिप्पणी की थी. उन्हंने सुक्खू को लेकर कहा था कि उन्हें वह दिन भी याद है जब सुक्खू पैदा हुए थे. स्वर्गीय आईडी धीमान पर टिप्पणी कर दी थी, बीजेपी के विधायक पर निजी टिप्पणियां की थीं, वनरक्षक की मौत पर कहना था कि ऐसे मामले होते रहते हैं, चौपाल के तत्कालीन एमएलए पर व्यक्तिगत टिप्पणियां की थीं. यही नहीं, गद्दी समाज का जिक्र करते हुए सत्ती पर टिप्पणी की थी.

हर मामले में उन्होंने दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश की है और खुद को श्रेष्ठ और उच्च. लिंक नीचे देखें। शायद वीरभद्र भूल गए हैं कि यह राजशाही नहीं बल्कि स्वतंत्र भारत है जहां पर राजशाही खत्म हो चुकी है. यहां आप अपनी खुशी के लिए खुद को राजा, बेटे को टीका या रानी कहते रहिए, अपने समर्थकों से खुद को राजा कहलवाकर खुश होते रहिए, मगर आप इस देश के नागरिक हैं. और अगर आप विधायक या मुख्यमंत्री हैं तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत जनता के सेवक हैं.

एक समय वीरभद्र ने जेपी नड्डा को बदतमीज़ लड़का बता दिया था. मगर उन्होने खुद की जुबान पर संयम रखा होता तो शायद उनके बेटे विक्रमादित्य भूल से ही, अपमानजनक शब्द अपने मुंह पर नहीं लाते. मगर अफसोस की बात है कि अपने पिता के नक्शे क़दम पर चलकर आगे बढ़ने की बात करने वाले विक्रमादित्य इस मामले में भी अपने पिता के नक्शे कदम पर बढ़ते नज़र आ रहे हैं. यह ठीक बात नहीं है. ऐसे शब्द भूलकर भी नहीं निकलने चाहिए. वे भी जल्दी समझ जाएं कि टीका वह समर्थकों या परिवार के लिए होंगे, देश के संविधान में वह नागरिक ही हैं। और आपको देश का संविधान किसी अन्य नागरिक के प्रति संवेदनहीन टिप्पणी की इजाज़त नहीं देता। यह नैतिक रूप से तो गलत है ही, अपराध भी है।

बहरहाल, आप नीचे वीरभद्र सिंह के अजीब बयानों को पढ़ सकते हैं:

बिंदल सुंदर नारी नहीं कि नाहन की जनता बार-बार मोहित हो जाए: वीरभद्र

मुख्यमंत्री ने गद्दी समाज का जिक्र करते हुए सत्ती पर की टिप्पणी

सीएम ने सफाई कर्मचारियों का हवाला देकर बीजेपी पर तंज

गुड़िया केस में मुख्यमंत्री ने कहा ज्यादा होशियार बन रहे हैं लोग

महेश्वर सिंह ने पत्नी वाले बयान पर मुख्यमंत्री पर किया पलटवार

मुख्यमंत्री ने केंद्रीय मंत्री नड्डा को बताया बदतमीज लड़का

मुझे वो दिन भी याद है जब सुक्खू पैदा हुए थे

वनरक्षक की मौत पर बोले सीएम- ऐसे मामले होते रहते हैं 

मुख्यमंत्री ने चौपाल के विधायक पर किए व्यक्तिगत कॉमेंट

स्वाइन फ्लू से मौतों पर मुख्यमंत्री का शर्मनाक बयान

वीरभद्र ने स्वर्गीय आई.डी. धीमान पर की टिप्पणी

मुख्यमंत्री ने बीजेपी विधायक पर निजी टिप्पणी

कार्यकर्ता पर मंच से ही भड़क गए मुख्यमंत्री

खराब सड़कों के सवाल पर मीडिया पर बिफरे सीएम