मिलिए पूरे हिमाचल का दिल जीतने वाली असली ‘बांकी बिट्टी’ अंजलि से

इन हिमाचल डेस्क।। वह नटखट है, बातूनी है, नादान है मगर होशियार भी। खाने-पीने की शौकीन है, उसे रड़काटी में मज़ा आता है मगर अपनी प्यारी मां का हाथ बंटाने से कभी पीछे नहीं हटती। सादगी पसंद इतनी कि कपड़े धोने वाला नरोल साबुन ही उसकी महकती त्वचा और चमकते बालों का राज़ है। ख्याली पुलाव बनाने में माहिर, मस्तमौला इतनी कि रास्ते में बिच्छू भी मिल जाए तो एक तरफ़ हटते हुए बोलती है- पहले आप!

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कान में बालियां, बालों में रबर बैंड और सूट पहन मुस्कुराती ‘बांकी बिट्टी‘ का व्यक्तित्व ऐसा कि पहली नजर में आप उसके फैन हो जाएंगे। लगेगा नहीं कि ये अलग-अलग रंगों के पिक्सल्स या रेखाओं से बना कोई कैरक्टर है। लगता है कि हमारे आसपास की हर वो बांकी बेटियां इसमें समाहित हो गई हैं जिनकी वजह से हमारी ये दुनिया इतनी खूबसूरत है। किसी को इसमें अपना बीता हुआ बचपन नजर आता है, किसी को अपनी चंचल बहन या दोस्त तो किसी अपनी नटखट और हाजिरजवाब बिटिया।

फेसबुक, इंस्टाग्राम से लेकर वॉट्सऐप तक पर इस शरारती गुड़िया की हरकतों, बातों और ख्यालों की चर्चा है। एक ऐसी लड़की जो आज के इस दौर में रहती है, आधुनिक भी है मगर जड़ों से नाता नहीं टूटा। छोटी-छोटी बातों पर नॉस्टैलजिक हो जाने वाली ये लड़की आपकी मुलाकात आपके ही व्यक्तित्व के उस पहलू से करवा देगी, जो तेजी से हो रहे बदलाव के बीच कहीं गुम हो गया है। मिलिए बांकी बिट्टी से जिसका जिक्र इन दिनों पूरे हिमाचल में हो रहा है।

Image: FB/Baanki Bitti

अंजलि सोहल- बांकी बिट्टी
जो बांकी बिट्टी हिमाचल के लोगों को उनकी भूली हुई परंपराओं और संस्कृति की याद करा रही है, उसे मूर्त रूप देने वाली भी हिमाचल की ही बेटी है। नाम है अंजलि सोहल। कांगड़ा जिले के नगरोटा बगवां की रहने वाली अंजलि सोहल की स्कूलिंग आर्मी स्कूल योल कैंट से हुई और फिर उन्होंने एनआईएफ़टी से फ़ैशन कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की। बेंगलुरू, तमिलनाडु, केरल से लेकर यूरोपीय देशों तक ‘रड़काटी’ करने के बाद अंजलि अपने होमटाउन से ही काम कर रही हैं और काम के साथ-साथ ‘बांकी बिट्टी’ की भी देखभाल कर रही हैं।

Image: Anjali Sohal

‘इन हिमाचल’ ने बांकी बिट्टी के जन्म की कहानी, इसके पीछे की सोच और आगे की योजनाओं को लेकर जब अंजलि से बात की तो वह भी बांकी बिट्टी की चंचल मगर आत्मविश्वास से भरी नजर आईं। हालांकि अंजलि कहती हैं कि बांकी बिट्टी का उनके व्यक्तित्व से कोई लेना देना नहीं। वह बताती हैं, “नाम ‘बांकी बिट्टी’ रखा ही इसलिए गया क्योंकि इसका कैरक्टर हिमाचल की संस्कृति के इर्द-गिर्द घूमता है। मैं चाहती थी कि हिमाचल की कोई भी लड़की रिलेट कर सके कि वह बांकी बिट्टी है।”

कैसे अस्तित्व में आई बांकी बिट्टी
लगभग एक महीने में ही बांकी बिट्टी हिमाचल प्रदेश के सोशल मीडिया सर्कल में छा गई है। इसकी वजह है- हिमाचल के लोगों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी घटनाओं और बातों को बेहद सरलता से कॉमिक रूप में दिखाना। हिमाचल में यह इस तरह का पहला प्रयोग भी है। पहले भी कुछ टून और मीम्स सोशल मीडिया पर शेयर किए जाते रहे थे मगर वे पहले से बनाए गए कॉन्टेंट को एडिट करके बनाए गए होते थे।

बांकी बिट्टी जैसा कैरक्टर बनाने की जरूरत आखिर क्यों महसूस हुई? इस पर अंजलि बताती हैं, “जब आप अपने घर से बाहर निकलकर नई जगहें देखते हैं तो तुलना करने पर आपको काफी कुछ सीखने को मिलता है। मैं कम्यूनिकेशन डिजाइन की पढ़ाई करेन के बाद यूरोप में पांच-छह महीने अलग-अलग देशों में रही, वापस आकर बेंगलुरू में दो साल नौकरी की। तमिलनाडु और केरल में गांव से लेकर शहर तक घूमने का मौका मिला। इस दौरान मैंने देखा कि यहां सभी जगह के कलाकारों ने अपनी संस्कृति को कला के माध्यम से जिंदा रखा है। इसी कारण लोगों में भी आत्मविश्वास बना रहा और वे जड़ों से जुड़े रहे।”

अंजलि कहती हैं कि बाहर उन्होंने देखा कि लोग अपने यहीं रहकर अच्छा काम करने के बारे में सोचते हैं मगर हिमाचल में देखने को मिलता है कि काफी लोग मानते हैं कि यहां कुछ नहीं होगा, बाहर निकला होगा। वह कहती हैं, “बहुत से लोग तो हिमाचल में संभावनाएं तलाशने क कोशिश भी नहीं करते, वे बाहर की ओर भागते हैं। मैं इसी पर सोचती थी हमेशा कि ऐसा क्यों है। इसीलिए जब मैं बेंगलुरु में दो साल काम करने के बाद घर लौट आई और यहीं से काम करना शुरू किया। बीच में खाली समय मिला तो खाली समय में कॉमिक्स या इलस्ट्रेशन बनाना शुरू किया। मैं ऐसा हिंदी और अंग्रेजी में भी कर सकती मगर मैंने अपनी बोली में बनाना शुरू किया, बाहर के उन कलाकारों की तरह जो अपनी भाषा और संस्कृति के लिए काम करते हैं।”

हिमाचल की अलग-अलग बोलियों की बाधा कितनी?
हिमाचल में हिंदी व्यापक स्तर पर बोली और समझी जाती है मगर इसके साथ-साथ यहां पर बहुत सारी बोलियां हैं। बोलियों का अंतर एक ही जिले में बहुत है और पूरे प्रदेश में तो यह फर्क और भी बढ़ जाता है। जरूरी नहीं कि शिमला और कुल्लू के आंतरिक क्षेत्रों की बोलियों के सभी शब्द ऊना और कांगड़ा के लोगों को समझ आएं या चंबा की बोली पूरी तरह से सोलन के लोग समझ सकें। ऐसी परिस्थिति में हिंदी, जो कि पूरे प्रदेश में स्वीकार्य है, उसकी जगह कांगड़ी में बांकी बिट्टी बनाना क्या मुश्किल पैदा नहीं करता? इस सवाल के जवाब में अंजलि बहुत सधा हुआ जवाब देती हैं।

वह कहती हैं, “मुझे पता है कि हिमाचल की कोई एक भाषा नहीं है। कांगड़ी के इस्तेमाल से ऑडियंस छोटी रह जाने की बाधा तो थी मगर मैंने यह काम किसी फायदे के लिए शुरू नहीं किया है। मैंने वही काम करना शुरू किया जो मैं कर सकती थी। मगर अन्य बोलियां बोलने वाले लोग भी जुड़े हैं इससे.”

अंजलि कहती हैं, “शुरू में मैं कॉमिक्स को अंग्रेजी में लिख रही थी फिर हिंदी में शुरू किया। मगर फिर लगा हिंदी और अंग्रेजी में लिखना है तो कॉमिक्स और इसके पात्र और विषय पहाड़ी में क्यों हैं। वैसे कांगड़ी को बहुत लोग समझते हैं। अन्य जिलों के लोग भी, जम्मू के लोग भी। मेरा मकसद था स्थानीय भाषा के लोगों में आत्मविश्वास भरना। उन्हें यह भरोसा देना कि उनकी भाषा, उनकी बोली का भी महत्व है, मीडिया में उस पर बात हो रही है।”

अंजलि का कहना है कि कांगड़ी में कॉमिक्स होने में कोई भेदभाव नहीं, इसमें शिमला औ कुल्लू का कॉन्टेंट भी होगा।

व्यस्तता के बीच कैसे मिलता है समय?
चूंकि अंजलि अधिकतर समय अपने प्रॉजेक्‌ट्स में व्यस्त रहती हैं और फ्रीलांसर होने के कारण हफ्ते में सातों दिन भी काम करना पड़ता है। इतना व्यस्त होने के बावजूद काम से इतर बांकी बिट्टी के लिए समय कैसे मिल पाता है? इस पर अंजलि कहती हैं, “मुझे अपना काम पसंद है। प्लस टू के बाद एनआईटी हमीरपुर के लिए भी चयन हुआ था मगर मैं डिजाइन और कम्यूनिकेशन से कुछ करना चाहती थी। कॉलेज जाकर पता चला कि ये वही है, जो मैं करना चाहती थी। ये मेरी इंटरेस्ट की फील्ड है। मैं अपने प्रॉजेक्ट करती हूं तो उनमें भी मजा आता है। फिर जब फ्री होती हूं तो रीलैक्स होने के लिए कॉमिक्स और इलस्ट्रेशन बनाती हूं।”

Image: Anjali Sohal

अपने इंटरेस्ट और करियर से जुड़ी जो बात अंजलि बताती हैं, उससे आज के छात्रों के लिए भी एक तरह सीख मिलती है। वह बताती हैं, “एनआईएफ़टी जॉइन करते समय मुझे नहीं पता था कि हिमाचल में इस फील्ड में कितना स्कोप है। पापा ने तो कहा था कि निफ्ट जाकर तुम हिमाचल में काम नहीं कर सकती। बाद में हिमाचल में जॉब न मिलने पर बेंगलुरू भी जाना पड़ा। लेकिन जब आप दिल की सुनते हैं और मेहनत करते हैं तो मौके मिलते हैं। वापस हिमाचल न आती तो न बांकी बिट्टी शुरू होती और न करियर में इतना सफल होती। बेंगलुरू से बेहतर आज मैं यहां रहते हुए कमा पा रही हूं. अगर आप अपने जीवन में भी मन की सुनें तो काम कभी बोझ नहीं लगेगा।”

बहरहाल, बांकी बिट्टी के पेज पर आपको हिमाचल से जुड़े कुछ अन्य कैरक्टर, कैरिकेचर और कार्टून मिल जाएंगे। अंजलि कहती हैं उनकी यह पहल कैरक्टर सेंट्रिक नहीं बल्कि कल्चर सेंट्रिक है। वह कहती हैं कि हिमाचल में इतने सारे विषय हैं कि सबपर कोई स्टोरी तो बनाई नहीं जा सकती, इसलिए वह इसी तरह से धीरे-धीरे अलग-अलग विषयों को आने वाली रचनाओं में कवर करती रहेंगी।

बहरहाल, अंजलि सोहल को टीम इन हिमाचल की ओर से शुभकामनाएं। नीचे देखें उनकी कुछ रचनाएं जिन्होंने अंजलि को एक महीने में स्टार बना दिया-

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(पहली बार 3 जून, 2019 को प्रकाशित लेख को फिर से अपडेट किया गया है)

किन्नौर: बिलखते परिजन कर रहे हैं सवाल- कहां है सोनम?

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, रिकॉन्गपिओ।। किन्नौर जिले के पूह उपमंडल में आने वाले खाब गांव के एक युवक सोनम के करीब एक सप्ताह से लापता होने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। वह एक हफ्ते से पूह थाना के तहत भगत नाला के पास से लापता है। बतौर ड्राइवर काम करने वाले सोनम का सतलुज किनारे रेत निकाल रहे अन्य लोगों से कथित तौर पर विवाद हो गया था। बाद में वह लापता हो गया जबकि घटनास्थल पर खून के निशान मिले थे। आशंका जताई जा रही है कि कहीं सोनम की हत्या करके शव नदी में न बहा दिया गया हो।

पुलिस की तफ्तीश से नाराज पूह उपमंडल के नमज्ञा, लियो, हंगरंग घाटी, पूह सहित जिला के सैकड़ों ग्रामीणों ने शनिवार को रिकॉन्गपिओ में रैली निकालकर पुलिस के खिलाफ रोष जताया। परिजन व ग्रामीण मामला सीबीआई को सौंपने व सतलुज नदी में युवक को ढूंढने के लिए एनडीआरएफ की मांग कर रहे हैं।

ग्रामीणों ने शनिवार सुबह ही रिकॉन्गपिओ में रैली निकाली व रामलीला मैदान के मुख्य द्वार पर धरना दिया। इस बीच सहायक आयुक्त हर्ष अमनेंद्र नेगी व उप पुलिस अधीक्षक विपन कुमार ने ग्रामीणों को समझाने की कोशिश की। लेकिन ग्रामीण मामला सीबीआई को देने पर अड़े रहे।

इमेज: MBM News Network

कई घंटों तक जिला प्रशासन, पुलिस व ग्रामीणों के बीच नोकझोंक होती रही व मामला खत्म नहीं हुआ। इस बीच ग्रामीणों ने राष्टीय उच्च मार्ग 5 पवारी के पास चक्का जाम किया। कई घण्टों तक चक्का जाम रहने पर आखिर प्रशासन को ग्रामीणों के आगे झुकना पड़ा। ग्रामीणों व लापता युवक के परिजनों की मांग पर जिला प्रशासन की तरफ से सहायक आयुक्त हर्ष अमनेंद्र ने ग्रामीणों को लिखित रूप में सीबीआई को मामला देने की सिफारिश का वादा करने और एनडीआरएफ को बुलाने के बाद मामला शांत हुआ।

क्या है मामला
7 सितम्बर की देर रात सोनम पुत्र प्रकाश चंद उर्फ रिगजिन दोर्जे गांव खाब जिला किन्नौर अपने भवन निर्माण के लिए 2-3 मजदूरों के साथ भगत नाला नामक स्थान पर सतलुज किनारे रेत निकालने पहुंचा। इस दौरान सोनम व घटनास्थल पर अन्य लोगों के बीच बहस हो गई। मामला बढ़ता देख सोनम के मजदूर घटना स्थल से भाग खड़े हुए।

इस दौरान एक मजदूर ने सोनम के साथ मारपीट होने की सूचना सोनम के रिश्तेदार राजू को मोबाइल पर दी। राजू ने मामले की जानकारी पुलिस को दी। लेकिन जब पुलिस व परिजन मौके पर पंहुचे तो वहां पत्थरों पर खून के धब्बे व चप्पल मिले। तब से लेकर सोनम का कोई पता नहीं चल पा रहा है।

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वहीं, 10 सितम्बर को किन्नौर पुलिस ने 9 लोगों के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज कर हिरासत में ले लिया था। पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए लोगों में कलजंग, शशी भूषण, सडुप दोर्जे, दिले राम, नुप राम, दलीय, गोरब, शंकर, दीपक चारो नेपाली शामिल हैं। जिन्हें न्यायालय ने 18 सितम्बर तक पुन: पुलिस रिमांड पर रखने के आदेश दिए हैं।

(यह खबर सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

सीएम ने लाला लाजपत राय के नाम पर किया धर्मशाला जेल का नामकरण

धर्मशाला।। स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ब्रिटिश हुकूमत काल के समय धर्मशाला जेल में रहे थे। आजादी की लड़ाई में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा था। धर्मशाला जेल में कैदी के रूप में लाला लाजपत राय ने बी क्लॉस बैरक में लगभग 9 माह बिताए थे। अब हिमाचल सरकार ने धर्मशाला जेल का नाम बदलकर लाला लाजपत राय जिला एवं मुक्त सुधार गृह कर दिया है।

इस मौके पर हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा, “लाला लाजपत राय के नाम पर धर्मशाला जेल का नाम होना चाहिए था। जो विषय काफी अरसे से चल रहा था, जिसे आज पूरा किया गया है।” सीएम ने यहां जेल में नवनिर्मित प्रशासनिक ब्लॉक का भी शुभारंभ किया।

इसके बाद पत्रकारों से बातचीत में सीएम ने कहा कि देश की आजादी में लाला लाजपत राय का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस जेल में वह कैदी के रूप में रहे थे, उस दौरान रहे जब देश आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था और लंबे संघर्ष के बाद देश आजाद हुआ। उनकी स्मृति में धर्मशाला जेल का नाम लाला लाजपत राय जिला एवं मुक्त सुधार गृह किया गया है।”

सीएम ने यहा कि यह आजादी के आंदोलन में योगदान के लिए लाला लाजपत को यह सही मायनों में हमारी तरफ से श्रद्धांजलि है।

महिला कांग्रेस ने मनकोटिया को भेजी चूड़ियां, कहा- घर बैठो

धर्मशाला।। पूर्व मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया द्वारा गत दिवस धर्मशाला को यतीमखाना कहने पर धर्मशाला कांग्रेस ने सख्त रुख अख्तियार किया है। शहरी व यूथ कांग्रेस पहले ही मनकोटिया के बयान पर अपना विरोध दर्ज करवा चुकी है। रविवार को महिला कांग्रेस ने भी धर्मशाला को यतीमखाना कहने पर मनकोटिया के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। महिला ब्लॉक कांग्रेस धर्मशाला एवं शहरी महिला कांग्रेस ने मनकोटिया को चेताया है कि यदि उन्होंने इस तरह की बयानबाजी दोबारा की तो उसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

महिला ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष निशा देवी और शहरी कांग्रेस अध्यक्ष स्नेहलता डोगरा ने दाड़ी कांग्रेस कार्यालय में संयुक्त बैठक करके अपनी संपूर्ण महिला कमेटी की तरफ से मेजर विजय सिंह मनकोटिया को चूड़ियां भेजी हैं। उन्होंने कहा कि पहले मनकोटिया शाहपुर में क्या किया, इसकी जानकारी दें, फिर धर्मशाला के बारे में जानकारी मांगें अन्यथा चूड़ियां पहनकर घर पर बैठें।

गलत मुहावरा
यह कितनी हास्यास्पद बात है कि महिलाएं ही किसी को चूड़ियां पहनकर घर बैठने की सलाह दे रही हैं यानी महिलाओं का ही अपमान कर रही हैं। ‘चूड़ियां पहनना’ वह मुहावरा है जो बहुत अपमानजनक है। यानी जब आप किसी को कहते हैं चूड़ियां पहन लो तो आप कह रहे होते हैं कि जैसे महिलाएं, जो चूड़ियां पहनती हैं, नकारा होती हैं और काम से बचती हैं, उनकी तरह चुपचाप घर बैठो।

जब यह कहा जाता है कि मैने चूड़ियां नहीं पहन रखीं, तब यह दिखाने की कोशिश होती है कि मैं महिलाओं की तरह कमजोर नहीं। यह महिलाविरोधी और अपमानजनक मुहावरा है जो हमारा अपना, हमारे समाज की महिलाओं के लिए बेहद अपमानजनक है और इसका इस्तेमाल छोड़ना चाहिए। मगर देखिए, महिला कांग्रेस ही किसी को नीचा दिखाने के लिए चूड़ियां भेज रही है कि इन्हें पहन घर बैठो।

क्या चूड़ियां पहनने वाली बेटियां, माताएं, बहनें सिर्फ घर बैठी रहती हैं? क्या वे दीनहीन, मामूली या नकारा हैं जो आप किसी को उनकी तरह खामोश बैठने को कह रहे हैं? क्या वे आज हर क्षेत्र में झंडे नहीं गाड़ रहीं? दरअसल यह महिला कांग्रेस की बेहद हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण हरकत है। यह दिखाता है कि हमारे नेताओं की सोच कितनी पुरातन है और उन्हें बुनियादी चीजों तक की समझ नहीं।

महिला कांग्रेस ने मनकोटिया द्वारा सुधीर शर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर की गई टिप्पणी पर चूड़ियां भेजी हैं और यह भी कहा कि यदि दोबारा इस तरह की टिप्पणी प्रेसवार्ता में की तो उनका विरोध उसी प्रेसवार्ता में किया जाएगा। महिलायों ने मेजर मनकोटिया मुर्दाबाद व मेजर मनकोटिया शर्म करो के नारे भी लगाए।

जब उल्टा पड़ गया दांव तो डैमेज कंट्रोल में जुटे विक्रमादित्य सिंह?

शिमला।। हिमाचल सरकार से अपनी करीबी दिखाने और कई अहम मुद्दों पर अपनी पार्टी के स्टैंड से बाहर जाने वाले शिमला ग्रामीण से कांग्रेस के विधायक विक्रमादित्य इन दिनों डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं। जब उनके बयानों और सोशल मीडिया पर डाले पोस्ट्स के खिलाफ पार्टी के अंदर से ही आवाज आने लगी तो अब वह हिमाचल सरकार और सीएम जयराम पर सीधा निशाना साधने लग गए हैं। हालांकि इस बेचैनी में वह मजाक का पात्र भी बन रहे हैं क्योंकि जिन मुद्दों पर वह सवाल उठा रहे हैं, उन्हें लेकर बीजेपी को पूर्व सीएम और विक्रमादित्य के पिता वीरभद्र पर काउंटर अटैक का मौका मिल रहा है।

पहले तारीफें
ज्यादा समय नहीं हुआ है जब विक्रमादित्य प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सरकार के दौरान अपने इलाके में हो रहे विकास की तारीफ करते नहीं थकते थे। उन्होंने इस संबंध में पत्रकारों को बयान भी दिए और फिर खबरें छपीं तो कटिंग्स भी फेसबुक पेज पर शेयर कीं।

“सोच सकारात्मक हो तो अच्छे कार्य में कोई बाधा नहीं आती”हमारा लक्ष शिमला ग्रामीण का विकास करवाना है जिसके लिए हम सरकार के अच्छे कार्य का समर्थन वह कमियों का विरोध करने में कभी पीछे नहीं हटेंगे ।

Vikramaditya Singh ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಮಂಗಳವಾರ, ಆಗಸ್ಟ್ 13, 2019

ऐसा एक नहीं, कई मौकों पर हुआ।

”लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती , कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती“मुख्यमंत्री श्री जयराम ठाकुर से मुलाक़ात कर…

Vikramaditya Singh ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಸೋಮವಾರ, ಜುಲೈ 22, 2019

इसके बाद जब भारत ने जम्मू कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा वापस लिया और कांग्रेस ने संसद में इसका विरोध किया तो विक्रमादित्य पार्टी के रुख से अलग गए और इस कदम का स्वागत किया। यहीं से उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की नाराजगी मोल ली। चर्चा होने लगी कि क्यों विक्रमादित्य अचानक बीजेपी की तरफ नरम पड़ रहे हैं। आलम यह हुआ कि विक्रमादित्य को खंडन करना पड़ा कि वह बीजेपी में नहीं जा रहे।

कुछ लोग ऐसी अफ़वा फैला रहे है की विक्रमादित्य सिंह ने धारा 370 और 35A के जाने का समर्थन इसलिए किया की वह भाजपा में जा…

Vikramaditya Singh ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಶನಿವಾರ, ಆಗಸ್ಟ್ 10, 2019

जब इन सब बातों को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा हुई तो अचानक विक्रमादित्य का अंदाज बदल गया। वह अचानक राज्य सरकार, खासकर सीएम जयराम पर हमलावर हो गए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना कि विक्रमादित्य जब सीएम से अपनी करीबी की खबरें सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे थे, तब उनका इरादा सीएम को लेकर बीजेपी में असंतोष पैदा करना रहा होगा मगर हुआ इसका उल्टा। बड़े नेताओं का भले इसमें कोई बयान नहीं आया मगर ब्लॉक स्तर के नेताओं में दबी जुबान में चाहा कि विक्रमादित्य अपना रुख साफ करें और इसकी खबरें भी छपीं।

पढ़ें- विक्रमादित्य ने किया सरकार में अपनी पहुंच का प्रदर्शन

अब क्या कर रहे हैं
विक्रमादित्य मौजूदा सरकार को घेरने के लिए अलग अलग मामलों में बयान दे रहे हैं मगर सोशल मीडिया पर लोग उन्हें पिछली सरकार की याद दिला रहे हैं। उदाहरण के लिए जब उन्होंने 118 का मुद्दा उठाया तो लोगों ने पूछा कि आपके पिता के सीएम रहते कितने लोगों को जमीन खरीदने की मंजूरी मिली और लैंड सीलिंग ऐक्ट के तहत कुछ चाय बागानों का लैंड यूज क्यों बदला गया।

जब राजनीतिक नियुक्तियों पर उन्होंने प्रश्न किया तो जनता ने पूछा- आप भी तो कौशल विकास निगम के निदेशक रहे थे, तब क्यों यह पद लेने से इनकार नहीं किया। इसके बाद जब उन्होंने आर्थिक संकट और प्रदेश पर कर्ज का हवाला दिया तो उनसे पूछा गया कि वीरभद्र सरकार ने कितने करोड़ रुपये का कर्ज लिया था और वह कहाँ-कहाँ खर्च हुआ। फिर उन्होंने सरकारी वाहनों के दुरुपयोग का मुद्दा उठाया तो इसपर भी उनसे सवाल किए गए।

हाल ही में उन्होंने प्रदेश की खराब आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए विधायकों का भत्ता बढ़ाने का विरोध किया तब फेसबुक पेज पर कमेंट करके लोगों ने उनसे सवाल किया गया कि क्या पिछली सरकार ने ही विधायकों के वेतन-भत्तों को दोगुना नहीं बढ़ाया था जब प्रदेश पर 45000 करोड़ का कर्ज था।

हाल ही में उन्होंने सीएम जयराम को हेलीकॉप्टर वाला सीएम कहा तो सवाल उठे कि क्या वीरभद्र पैदल यात्राएं किया करते थे और क्या उनके परिजनों ने कभी सरकारी हेलीकॉप्टर की सैर नहीं की।

अब उन्होंने एक बार फिर सचिवालय में अन्य राज्यों के लोगों की भर्ती को लेकर सवाल पूछा है।

मुख्यमंत्री जी , हिमाचल मैं क्या पढ़े लिखो की कमी है ? आपको याद दिलाना चाहेंगे हिमाचल देश के सबसे शिक्षित राज्यों में से एक है ।

Vikramaditya Singh ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಬುಧವಾರ, ಸೆಪ್ಟೆಂಬರ್ 4, 2019

मगर यह सवाल मौजूदा सरकार के बजाय पिछली सरकार के लिए ज्यादा प्रासंगिक है क्योंकि वीरभद्र सरकार चुपके से नियम बदल गई थी।

यानी लगातार वह ऐसे सवाल पूछ रहे हैं जो सत्ताधारी बीजेपी को पिछली सरकार और उसके मुखिया वीरभद्र सिंह पर पलटवार करने का मौका दे रहे हैं। कांग्रेस के लिए असहज करने वाली स्थिति है क्योंकि पहले विक्रमादित्य मौजूदा सरकार की तारीफ कर रहे थे और अब उसपर हमला कर रहे हैं तो अपनी ही पार्टी की पिछली सरकार की खामियों को सामने ला दे रहे हैं जिनका बचाव करना पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

कांग्रेस सरकार के दौरान खुला था गैर-हिमाचलियों की भर्ती का रास्ता

गुरु रंधावा का कुल्लू-मनाली में शूट नया गाना ‘इश्क़ तेरा’ रिलीज

कुल्लू।। जाने माने पंजाबी गायक गुरु रंधावा का नया गाना ‘इश्क तेरा’ आज सुबह रिलीज किया गया है। यह एक रोमांटिक गाना है जिसमें गुरु रंधावा एक्ट्रेस नुसरत भरुचा के साथ नजर आ रहे हैं।

खास बात यह है इसे कुल्लू-मनाली में शूट किया गया है और दोनों कलाकार हिमाचली परिधानों में नजर आ रहे हैं।

देखें म्यूजिक वीडियो:

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तो क्या सरकार ने महज 7 विधायकों की मांग पर बढ़ा दिया यात्रा भत्ता?

धर्मशाला।। कांगड़ा दौरे पर पहुंचे सीएम जयराम ठाकुर ने मंत्रियों व विधायकों के भत्ते बढ़ाने के मामले पर कहा, “मुझे लगता है कि सारे कॉन्सेप्ट को स्पष्ट नहीं किया गया है। विधानसभा के भीतर सत्ता पक्ष व विपक्ष के विधायकों की ओर से आग्रह था। पहले जो ढाई लाख रुपये सालाना यात्रा भत्ता मिलता था, उसे सिर्फ चार लाख किया गया है।”

सीएम ने कहा कि जो विधायक चार लाख के भत्ते को यूटीलाइज करेगा, उसे ही मिलेगा। ऐसा नहीं होगा कि चार लाख विधायक के खाते में चले गए।

‘यूज नहीं कर पाते विधायक’
मुख्यमंत्री ने कहा, “कुछ जगह गलत धारणा बनाने की कोशिश की जा रही है। 90 फीसदी विधायक इसका उपयोग ही नहीं कर पाते। जब उपयोग ही नहीं होता है तो पैसा लैप्स हो जाता है। रहता है सरकार के पास ही। इसलिए बहुत दिया, ऐसा नहीं है। कुछ दिया है, इतनी ही बात है। मुझे लगता है कि इन सब बातों को लेकर जन प्रतिनिधियों के प्रति सम्मान का भाव रहना चाहिए।”

7 विधायकों की मांग पर बढ़ाया भत्ता?
लेकिन सीएम के बयान को लेकर अहम सवाल यह उठता है कि जब अधिकतर विधायक इसे इस्तेमाल ही नहीं कर पाते तो चंद विधायक ही होंगे जो इसकी मांग कर रहे होंगे। सीएम के मुताबिक 90 फीसदी विधायक मौजूदा अढ़ाई लाख को भी यूज नहीं कर पाते। वे तो मांग कर नहीं रहे होंगे। फिर 68 विधायकों में बाकी बचे महज 10 फीसदी। अधिकतम 7 मान लीजिए। उनमें भी सब मांग कर रहे हों, यह हो नहीं सकता लेकिन मान लेते हैं कि वे सभी भत्ता बढ़ाने की गुजारिश कर रहे थे। तो भी, इस 7 विधायकों की मांग पर यात्रा भत्ता बढ़ाने और सरकार को असहज स्थिति में डालने की क्या ज़रूरत आ गई थी?

बहरहाल, सीएम ने धर्मशाला में यह माना कि प्रदेश की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी नहीं है। उन्होंने कहा, “पूर्व कांग्रेस सरकार की दौरान हमें 46 हजार करोड़ का ऋण मिला है, जिसे हमने काफी हद तक रोका है। कांग्रेस जितना लोन हर वर्ष लेती थी, उसका तुलना में हमने काफी कम ऋण लिया है।”

‘अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर आएगा कांगड़ा’
सीएम ने कहा कि ग्लोबल इन्वेस्टर मीट के माध्यम से कांगड़ा अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर पहुंचेगा। देश-विदेश से यहां लोग इन्वेस्ट करने के लिए आ रहे हैं। सीएम ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी के भी आने की संभावना है, क्योंकि सरकार की ओर से पीएम से आग्रह किया गया है।

जब वीरभद्र सरकार ने दोगुनी की थी विधायकों की सैलरी, बेहद खुश थी बीजेपी

इन हिमाचल डेस्क।। दिन 7 अप्रैल, 2016. हिमाचल प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के विधायक शांत बैठे थे। यह नजारा हैरान करने वाला था, क्योंकि बीजेपी के नेता जनता के मुद्दे उठाने और ज़रूरी विधेयकों पर चर्चा करने के बजाय आए दिन सदन से वॉकआउट कर जाते थे। मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगने से उन्हें फुर्सत नहीं होती थी। मगर आज वे शरीफ बच्चों की तरह विधानसभा में बैठे थे।

न तो शोर मचा रहे थे, न सीएम का इस्तीफ़ा मांग रहे थे। आज उन्हें सत्ता पक्ष महान और मुख्यमंत्री मसीहा नज़र आ रहा था। एक बिल पेश हुआ और ध्वनिमत से पारित हो गया। सबके चेहरे खिले हुए थे। मगर यह प्रदेश या जनता के भविष्य को नई दिशा देने वाला बिल नहीं था। यह विधायकों की सैलरी डबल और सुविधाएं बढ़ाने वाला बिल था।

उस वक्त सरकार ने विधायकों के वेतन और भत्ते को 1.32 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.10 लाख रुपये प्रतिमाह कर दिया था, जबकि दैनिक भत्ता 1500 रुपये से बढ़ाकर 1800 रुपये कर दिया गया था। रेल या हवाई मार्ग से मुफ्त यात्रा की सीमा दो लाख रुपये से बढ़ाकर प्रति वर्ष ढाई लाख रुपये कर दी गई थी। वेतन और भत्तों में वृद्धि से सरकारी खजाने पर 16.45 करोड़ रुपये का वार्षिक वित्तीय बोझ पड़ गया था।

उस समय सैलरी डबल होने पर नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल के बोल क्या थे, सुनें-

तारीख 31 अगस्त, 2019– यानी आज का दिन। सत्ता पक्ष वाले विपक्ष में हैं और विपक्ष वाले सत्ता में। हालांकि कुछ हार चुके हैं तो कुछ नए चेहरे सदन में हैं। जो अप्रैल 2016 में हुआ ताज वैसा ही नजारा विधानसभा में देखने को मिला। सत्ता पक्ष ने विधायकों आदि का ट्रैवल अलाउंस बढ़ाने के बिल पेश किए, हो-हल्ला करके वॉकआउट करने वाला विपक्ष खुश होकर बैठा रहा और सबकी सहमति से बिल पारित हो गए।

अब कुछ कांग्रेस के नेता सोशल मीडिया पर कह रहे हैं कि प्रदेश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए भत्ते बढ़ाना उचित नहीं। इनमें शिमला रूरल के एमएलए विक्रमादित्य भी शामिल हैं। मगर वे भूल गए कि जब उनकी पार्टी की सरकार थी तो सीएम वीरभद्र सिंह ने ही विधायकों की सैलरी लगभग दोगुनी कर दी थी और उस समय भी प्रदेश पर लगभग 45000 करोड़ रुपये का कर्ज था।

दिखावे में चूक गई कांग्रेस
राजनीति में समय के हिसाब से पाखंड या दिखावा करना महत्वपूर्ण चाल मानी जाती है। जब जनता को पता चला कि भत्ते बढ़ाने वाले बिल सदन में रखे हैं तो सोशल मीडिया पर खूब विरोध हुआ। कांग्रेस चाहती तो आज विरोध कर देती और जनता कुछ भी समझती, रिकॉर्ड में रहता कि आपने इस बात का विरोध किया था। मगर शायद अतिरिक्त पैसों का मोह जनता की नाराजगी पर भारी पड़ गया और इस बिल का समर्थन कर दिया।

इस मामले में बीजेपी होशियार थी। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वीरभद्र सरकार ने विधायकों को पट्टे पर जमीन देने का फैसला किया। इन हिमाचल ने उस समय इसपर सवाल उठाए और सोशल मीडिया पर एक मूवमेंट सा खड़ा हुआ। इसका असर यह हुआ कि बीजेपी ने जनता का मूड भांपते हुए इस फैसले का विरोध शुरू कर दिया।

ऊपर वीडियो में आपने देखा कि जो प्रेम कुमार धूमल अप्रैल 2016 में विधायकों का वेतन दोगुना होने पर खुश थे, वह चुनाव नजदीक देख सितंबर 2017 में विधायकों को जमीन दिए जाने के खिलाफ हो गए थे। उस समय विपक्ष के नेता प्रेम कुमार धूमल नेे विधायकों को जमीन पट्टे पर दिए जाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा था कि सरकार ने विधायकों की छवि खराब कर दी है इस फैसले से। (वीडियो समाचार फर्स्ट से साभार)

यानी 2016 में सैलरी बढ़ाने का विरोध नहीं हुआ था, मगर चुनाव करीब आते ही बीजेपी को कांग्रेस सरकार का कदम गलत लगने लगा था। लेकिन अभी चुनाव को समय हैं, शायद इसीलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष को कोई चिंता नहीं है जनता की नाराजगी की।

हमने 2017 को अपने लेख के आखिर में जो लिखा था, वो आज सही साबित हो गया। आखिरी पंक्तियां थीं-

मगर यह मत सोचिए कि हालात बदल जाएंगे। पक्ष बदल जाएंगे, मगर सिलसिला यही रहेगा। अपनी बारी आएगी तो ये लोग सारी बातें भुलाकर एक हो जाएंगे। जनता को कौन पूछेगा?

विधायकों के वेतन से किसी को आपत्ति नहीं होती अगर…

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश सरकार 50 हज़ार से ज़्यादा के कर्जे में डूबी हुई है। बाबजुद इसके सरकार ने माननीयों के टूर भत्ते अढ़ाई लाख से 4 लाख तक बढ़ा दिए। आए दिन सरकार को घेरने के नाम पर विधानसभा से वॉकआउट करने वाली कांग्रेस ने भी इसका समर्थन किया।

सबकी सहमति से बढ़े विधायकों के भत्ते, बस सिंघा ने किया विरोध

विधायकों के वेतन या भत्ते बढ़ने से किसी को आपत्ति नहीं होती अगर हिमाचल प्रदेश में…

1. लगभग 9 लाख बेरोजगार न होते
2. बाकियों को रोजगार के लिए बड़ी संख्या में बाहरी राज्यों में न जाना पड़ता
3. सरकारी मुलाजिमों को भी ऐसे वेतन या भत्ते मिलते
4. कोई भी व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे न होता
5. किसान और कारोबारी अच्छी आमदनी कर रहे होते
6. किसी को राशन में सब्सिडी न देनी पड़ती
7. सरकारी स्कूलों की पढ़ाई निजी स्कूलों से बेहतर होती
8. अस्पतालों में सब सुविधाएं होतीं, दवा-डॉक्टर सब होते
9. हर गांव में सड़क होती, अच्छा पब्लिक ट्रांसपोर्ट होता
10. ऐसे जरूरतमंद न होते जिनकी मदद करके समाजसेवी फ़ोटो खिंचवा सकें
11. किसी को मिडडे मील या आंगनवाड़ी वर्कर जैसा मामूली मानदेय वाला काम न करना पड़ता
12. अगर हिमाचल पर 50,000 करोड़ का कर्ज न होता
13. सरकार के पास अथाह राजस्व होता
14. हिमाचल में विकास की गंगा बह रही होती
15. किसी क्षेत्र में कोई कमी नहीं होती, हिमाचल की मिसाल दी जा रही होती

और सबसे बड़ी बात, अगर जनता को यह भरोसा होता कि उनके प्रतिनिधि जो कर रहे हैं, जनता और प्रदेश की भलाई के लिए कर रहे हैं, दिन-रात अच्छी नीतियां बनाने में लगे रहते हैं।

आप भी कॉमेंट करके कुछ और कारण जोड़िए कि किसी को विधायकों के वेतन या भत्ते बढ़ने से क्यों और किस स्थिति में कोई आपत्ति नहीं होती।

सबकी सहमति से बढ़े विधायकों के भत्ते, बस सिंघा ने किया विरोध

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार 50 हज़ार से ज़्यादा के कर्जे में डूबी हुई है। बाबजुद इसके सरकार ने माननीयों के टूर भत्ते अढ़ाई लाख से 4 लाख तक बढ़ा दिए। इसमें सत्ता पक्ष एवम विपक्ष दोनों ही एक जुट दिखे। उल्टा माकपा को छोड़कर सभी सदस्यों ने इसका समर्थन किया। इतना ही नही कांग्रेस के सुक्खू, हर्षबर्धन , राम लाल ठाकुर ने इसको कम बताया और इससे अधिक सुविधाओं की मांग कर डाली।

सरकार विधानसभा सदस्यों के भत्ते और पेंशन संसोधन विधेयक 2019, अध्यक्ष और उपाध्यक्ष वेतन (संसोधन) विधेयक 2019 व मंत्रियों के वेतन और भत्ता संसोधन विधेयक सदन में लाई है। तीनों ही विधेयक विधानसभा के माननीयों से जुड़े है। सरकार फ़िर से माननीयों के वेतन भत्ते को बड़ा दिया।

माकपा नेता ठियोग के विधायक राकेश सिंघा ने माननीयों के पेंशन भत्तों के बिल का विरोध किया ओर कहा कि सरकार जब कर्जे में डूबी है ऐसे में इन बिलों को वापिस ले लिया जाए। राकेश सिंघा ने कहा कि कांग्रेस व भाजपा दोनों प्रदेश कीआर्थिक स्थिति का रोना रोते रहते है। लेकिन जब वेतन भत्तों की बात आती है तो दोनों ही एकजुट हो जाते हैं। इसी बीच वेतन भत्ता बिल को पास करना उचित नही।

इस पर कांग्रेस के विधायक सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि बिल का नाम बड़ा और दर्शन छोटे है। पहले भी जो ढाई लाख सदस्यों को टूर के लिए मिलता था उसमें भी 90 फ़ीसदी सदस्यों ने उपयोग ने किया है। सुक्खू ने विधायकों का समर्थन किया और कहा कि विधायकों को सुविधाएं मिलनी चाहिए। पंजाब का उदाहरण देते हुए सुक्खू ने हिमाचल में भी सदस्यों के लिए ज़्यादा सुविधाएं देने की मांग उठाई।

सुक्खू ने कहा कि कांग्रेस पार्टी इसका समर्थन करती है। सुक्खू ने अगली बार सदस्यों के लिए गाड़ी की भी मांग कर डाली । कांग्रेस के हर्षबर्धन ने भी इसका समर्थन किया ओर कहा कि मीडिया इसको बढ़ाचढ़ा कर लिख रही है ये भत्ते ओर अधिक बढ़ने चाहिए। राम लाल ठाकुर ने तो अपने लिए मुख्य सचिव के जितनी वेतन की मांग कर डाली।

उधर विधानसभा अध्यक्ष डॉ राजीव बिन्दल ने भी सदस्यों की बातों का समर्थन किया और कहा कि सदस्यों के लिए स्थाई नीति बनाई जाए। दिल्ली विधानसभा तो 3 लाख से ज्यादा वेतन विधायकों को दे रही है। ये तो बहुत छोटा विषय है। इसके बाद सिंघा को छोड़कर सर्वसम्मति से तीनों बिलों को पास कर दिया गया।