मिलिए पूरे हिमाचल का दिल जीतने वाली असली ‘बांकी बिट्टी’ अंजलि से

इन हिमाचल डेस्क।। वह नटखट है, बातूनी है, नादान है मगर होशियार भी। खाने-पीने की शौकीन है, उसे रड़काटी में मज़ा आता है मगर अपनी प्यारी मां का हाथ बंटाने से कभी पीछे नहीं हटती। सादगी पसंद इतनी कि कपड़े धोने वाला नरोल साबुन ही उसकी महकती त्वचा और चमकते बालों का राज़ है। ख्याली पुलाव बनाने में माहिर, मस्तमौला इतनी कि रास्ते में बिच्छू भी मिल जाए तो एक तरफ़ हटते हुए बोलती है- पहले आप!

FB/Baanki Bitti

कान में बालियां, बालों में रबर बैंड और सूट पहन मुस्कुराती ‘बांकी बिट्टी‘ का व्यक्तित्व ऐसा कि पहली नजर में आप उसके फैन हो जाएंगे। लगेगा नहीं कि ये अलग-अलग रंगों के पिक्सल्स या रेखाओं से बना कोई कैरक्टर है। लगता है कि हमारे आसपास की हर वो बांकी बेटियां इसमें समाहित हो गई हैं जिनकी वजह से हमारी ये दुनिया इतनी खूबसूरत है। किसी को इसमें अपना बीता हुआ बचपन नजर आता है, किसी को अपनी चंचल बहन या दोस्त तो किसी अपनी नटखट और हाजिरजवाब बिटिया।

फेसबुक, इंस्टाग्राम से लेकर वॉट्सऐप तक पर इस शरारती गुड़िया की हरकतों, बातों और ख्यालों की चर्चा है। एक ऐसी लड़की जो आज के इस दौर में रहती है, आधुनिक भी है मगर जड़ों से नाता नहीं टूटा। छोटी-छोटी बातों पर नॉस्टैलजिक हो जाने वाली ये लड़की आपकी मुलाकात आपके ही व्यक्तित्व के उस पहलू से करवा देगी, जो तेजी से हो रहे बदलाव के बीच कहीं गुम हो गया है। मिलिए बांकी बिट्टी से जिसका जिक्र इन दिनों पूरे हिमाचल में हो रहा है।

Image: FB/Baanki Bitti

अंजलि सोहल- बांकी बिट्टी
जो बांकी बिट्टी हिमाचल के लोगों को उनकी भूली हुई परंपराओं और संस्कृति की याद करा रही है, उसे मूर्त रूप देने वाली भी हिमाचल की ही बेटी है। नाम है अंजलि सोहल। कांगड़ा जिले के नगरोटा बगवां की रहने वाली अंजलि सोहल की स्कूलिंग आर्मी स्कूल योल कैंट से हुई और फिर उन्होंने एनआईएफ़टी से फ़ैशन कम्यूनिकेशन की पढ़ाई की। बेंगलुरू, तमिलनाडु, केरल से लेकर यूरोपीय देशों तक ‘रड़काटी’ करने के बाद अंजलि अपने होमटाउन से ही काम कर रही हैं और काम के साथ-साथ ‘बांकी बिट्टी’ की भी देखभाल कर रही हैं।

Image: Anjali Sohal

‘इन हिमाचल’ ने बांकी बिट्टी के जन्म की कहानी, इसके पीछे की सोच और आगे की योजनाओं को लेकर जब अंजलि से बात की तो वह भी बांकी बिट्टी की चंचल मगर आत्मविश्वास से भरी नजर आईं। हालांकि अंजलि कहती हैं कि बांकी बिट्टी का उनके व्यक्तित्व से कोई लेना देना नहीं। वह बताती हैं, “नाम ‘बांकी बिट्टी’ रखा ही इसलिए गया क्योंकि इसका कैरक्टर हिमाचल की संस्कृति के इर्द-गिर्द घूमता है। मैं चाहती थी कि हिमाचल की कोई भी लड़की रिलेट कर सके कि वह बांकी बिट्टी है।”

कैसे अस्तित्व में आई बांकी बिट्टी
लगभग एक महीने में ही बांकी बिट्टी हिमाचल प्रदेश के सोशल मीडिया सर्कल में छा गई है। इसकी वजह है- हिमाचल के लोगों के रोजमर्रा के जीवन से जुड़ी घटनाओं और बातों को बेहद सरलता से कॉमिक रूप में दिखाना। हिमाचल में यह इस तरह का पहला प्रयोग भी है। पहले भी कुछ टून और मीम्स सोशल मीडिया पर शेयर किए जाते रहे थे मगर वे पहले से बनाए गए कॉन्टेंट को एडिट करके बनाए गए होते थे।

बांकी बिट्टी जैसा कैरक्टर बनाने की जरूरत आखिर क्यों महसूस हुई? इस पर अंजलि बताती हैं, “जब आप अपने घर से बाहर निकलकर नई जगहें देखते हैं तो तुलना करने पर आपको काफी कुछ सीखने को मिलता है। मैं कम्यूनिकेशन डिजाइन की पढ़ाई करेन के बाद यूरोप में पांच-छह महीने अलग-अलग देशों में रही, वापस आकर बेंगलुरू में दो साल नौकरी की। तमिलनाडु और केरल में गांव से लेकर शहर तक घूमने का मौका मिला। इस दौरान मैंने देखा कि यहां सभी जगह के कलाकारों ने अपनी संस्कृति को कला के माध्यम से जिंदा रखा है। इसी कारण लोगों में भी आत्मविश्वास बना रहा और वे जड़ों से जुड़े रहे।”

अंजलि कहती हैं कि बाहर उन्होंने देखा कि लोग अपने यहीं रहकर अच्छा काम करने के बारे में सोचते हैं मगर हिमाचल में देखने को मिलता है कि काफी लोग मानते हैं कि यहां कुछ नहीं होगा, बाहर निकला होगा। वह कहती हैं, “बहुत से लोग तो हिमाचल में संभावनाएं तलाशने क कोशिश भी नहीं करते, वे बाहर की ओर भागते हैं। मैं इसी पर सोचती थी हमेशा कि ऐसा क्यों है। इसीलिए जब मैं बेंगलुरु में दो साल काम करने के बाद घर लौट आई और यहीं से काम करना शुरू किया। बीच में खाली समय मिला तो खाली समय में कॉमिक्स या इलस्ट्रेशन बनाना शुरू किया। मैं ऐसा हिंदी और अंग्रेजी में भी कर सकती मगर मैंने अपनी बोली में बनाना शुरू किया, बाहर के उन कलाकारों की तरह जो अपनी भाषा और संस्कृति के लिए काम करते हैं।”

हिमाचल की अलग-अलग बोलियों की बाधा कितनी?
हिमाचल में हिंदी व्यापक स्तर पर बोली और समझी जाती है मगर इसके साथ-साथ यहां पर बहुत सारी बोलियां हैं। बोलियों का अंतर एक ही जिले में बहुत है और पूरे प्रदेश में तो यह फर्क और भी बढ़ जाता है। जरूरी नहीं कि शिमला और कुल्लू के आंतरिक क्षेत्रों की बोलियों के सभी शब्द ऊना और कांगड़ा के लोगों को समझ आएं या चंबा की बोली पूरी तरह से सोलन के लोग समझ सकें। ऐसी परिस्थिति में हिंदी, जो कि पूरे प्रदेश में स्वीकार्य है, उसकी जगह कांगड़ी में बांकी बिट्टी बनाना क्या मुश्किल पैदा नहीं करता? इस सवाल के जवाब में अंजलि बहुत सधा हुआ जवाब देती हैं।

वह कहती हैं, “मुझे पता है कि हिमाचल की कोई एक भाषा नहीं है। कांगड़ी के इस्तेमाल से ऑडियंस छोटी रह जाने की बाधा तो थी मगर मैंने यह काम किसी फायदे के लिए शुरू नहीं किया है। मैंने वही काम करना शुरू किया जो मैं कर सकती थी। मगर अन्य बोलियां बोलने वाले लोग भी जुड़े हैं इससे.”

अंजलि कहती हैं, “शुरू में मैं कॉमिक्स को अंग्रेजी में लिख रही थी फिर हिंदी में शुरू किया। मगर फिर लगा हिंदी और अंग्रेजी में लिखना है तो कॉमिक्स और इसके पात्र और विषय पहाड़ी में क्यों हैं। वैसे कांगड़ी को बहुत लोग समझते हैं। अन्य जिलों के लोग भी, जम्मू के लोग भी। मेरा मकसद था स्थानीय भाषा के लोगों में आत्मविश्वास भरना। उन्हें यह भरोसा देना कि उनकी भाषा, उनकी बोली का भी महत्व है, मीडिया में उस पर बात हो रही है।”

अंजलि का कहना है कि कांगड़ी में कॉमिक्स होने में कोई भेदभाव नहीं, इसमें शिमला औ कुल्लू का कॉन्टेंट भी होगा।

व्यस्तता के बीच कैसे मिलता है समय?
चूंकि अंजलि अधिकतर समय अपने प्रॉजेक्‌ट्स में व्यस्त रहती हैं और फ्रीलांसर होने के कारण हफ्ते में सातों दिन भी काम करना पड़ता है। इतना व्यस्त होने के बावजूद काम से इतर बांकी बिट्टी के लिए समय कैसे मिल पाता है? इस पर अंजलि कहती हैं, “मुझे अपना काम पसंद है। प्लस टू के बाद एनआईटी हमीरपुर के लिए भी चयन हुआ था मगर मैं डिजाइन और कम्यूनिकेशन से कुछ करना चाहती थी। कॉलेज जाकर पता चला कि ये वही है, जो मैं करना चाहती थी। ये मेरी इंटरेस्ट की फील्ड है। मैं अपने प्रॉजेक्ट करती हूं तो उनमें भी मजा आता है। फिर जब फ्री होती हूं तो रीलैक्स होने के लिए कॉमिक्स और इलस्ट्रेशन बनाती हूं।”

Image: Anjali Sohal

अपने इंटरेस्ट और करियर से जुड़ी जो बात अंजलि बताती हैं, उससे आज के छात्रों के लिए भी एक तरह सीख मिलती है। वह बताती हैं, “एनआईएफ़टी जॉइन करते समय मुझे नहीं पता था कि हिमाचल में इस फील्ड में कितना स्कोप है। पापा ने तो कहा था कि निफ्ट जाकर तुम हिमाचल में काम नहीं कर सकती। बाद में हिमाचल में जॉब न मिलने पर बेंगलुरू भी जाना पड़ा। लेकिन जब आप दिल की सुनते हैं और मेहनत करते हैं तो मौके मिलते हैं। वापस हिमाचल न आती तो न बांकी बिट्टी शुरू होती और न करियर में इतना सफल होती। बेंगलुरू से बेहतर आज मैं यहां रहते हुए कमा पा रही हूं. अगर आप अपने जीवन में भी मन की सुनें तो काम कभी बोझ नहीं लगेगा।”

बहरहाल, बांकी बिट्टी के पेज पर आपको हिमाचल से जुड़े कुछ अन्य कैरक्टर, कैरिकेचर और कार्टून मिल जाएंगे। अंजलि कहती हैं उनकी यह पहल कैरक्टर सेंट्रिक नहीं बल्कि कल्चर सेंट्रिक है। वह कहती हैं कि हिमाचल में इतने सारे विषय हैं कि सबपर कोई स्टोरी तो बनाई नहीं जा सकती, इसलिए वह इसी तरह से धीरे-धीरे अलग-अलग विषयों को आने वाली रचनाओं में कवर करती रहेंगी।

बहरहाल, अंजलि सोहल को टीम इन हिमाचल की ओर से शुभकामनाएं। नीचे देखें उनकी कुछ रचनाएं जिन्होंने अंजलि को एक महीने में स्टार बना दिया-

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