मंत्री ने स्कूल में कर दिया कम्युनिटी सेंटर का शिलान्यास, जांच के आदेश जारी

सरकाघाट।। धर्मपुर शिक्षा खंड प्रथम के अंतर्गत आने वाले केंद्रीय प्राथमिक विद्यालय चोलथरा के स्थान पर सामुदायिक भवन बनाने के लिए बिना शिक्षा विभाग की अनुमति के गत 15 दिसम्बर को किया गया शिलान्यास विवादों में घिर गया है। इस शिलान्यास बारे ज़िला पार्षद भूपेंद्र सिंह ने 28 दिसंबर को उपायुक्त मंडी को शिकायत भेजी थी।जिस पर उपयुक्त मंडी द्धारा एस डी एम धर्मपुर को जांच अधिकारी लगाया है और तीस दिनों में रिपोर्ट देने के आदेश दिए हैं।

ज़िला पार्षद ने बताया कि केंद्रीय प्राथमिक स्कूल को वहां से शिफ्ट करने बारे ग्राम पंचायत ने 9 सितंबर को जो प्रस्ताव पारित किया था में बहुत ही गैर जिम्मेदाराना औऱ असवैधानिक भाषा प्रयोग की गई है। जिसमें लिखा गया है कि इस स्कूल में केवल प्रवासी बच्चे ही पढ़ रहे हैं इसलिए इसे बन्द करके यहां से अन्यत्र शिफ्ट कर दिया जाए ताकि ग्राम पँचायत यहां पर सामुदायिक भवन का निर्माण करवा सके औऱ बिना विभागीय अनापत्ति प्रमाण पत्र लिये और शिक्षा विभाग को सूचना दिए बगैर 15 दिसंबर को रविवार के दिन स्कूल परिसर में सामुदायिक भवन का शिलान्यास आई पी एच मन्त्री महेंद्र सिंह ने कर दिया था।

भूपेंद्र सिंह ने बताया कि जिस व्यक्ति ने ज़मीन शिक्षा विभाग को दान की थी उसने यहाँ स्कूल निर्माण के लिए ही ज़मीन दी थी लेकिन उसे भी इस बारे अवगत नहीँ कराया गया और न ही पूछा गया है और शिक्षा विभाग से इसकी एन ओ सी लिए बगैर ग्रामीण विकास और पंचयाती राज विभाग ने वहाँ पर मन्त्री से शिलान्यास करवा दिया औऱ बोर्ड लगवा दिया था।

हालांकि स्कूल की मुख्याध्यापिका ने 16 दिसंबर को ही खंड शिक्षा अधिकारी धर्मपुर प्रथम स्थित सजाओपीपलु को पत्र लिखकर सूचित कर दिया था कि रविवार के दिन स्कूल प्रांगण में जो उदघाटन बोर्ड लगाया गया है उसकी उन्हें भी कोई सूचना और जानकारी नहीं है। सोमवार को स्कूल आने पर वहां लगे बोर्ड को देखने पर ही उन्हें इस बारे पता चला। ज़िला पार्षद भूपेंद्र सिंह ने इस बारे उपयुक्त मंडी से इस सारे प्रकरण बारे दर्ज कराई गई शिकायत पर उपायुक्त मंडी ने एस डी एम धर्मपुर को जांच करने के आदेश जारी कर दिये हैं और 30 दिनों में मौके पर जाकर जाँच रिपोर्ट भेजने के लिए कहा है।

ज़िला पार्षद भूपेन्द्र सिंह ने इस बारे कहा है कि पचास साल पुराने इस स्कूल को यहाँ से बदलना सही नहीं है और पँचायत प्रधान व कुछ सत्ताधारी पार्टी के नेताओं के कहने पर मन्त्री द्धारा बिना विभागीय एन ओ सी के किया गया उदघाटन गैर कानूनी है और मन्त्री भी इस स्कूल को बंद करवाने के पक्षधर लगते हैं जो बहुत ही निंदनीय है। इसलिये स्कूल को वहाँ से न बदलने के लिए और लोगों और संगठनों ने भी मांग की है। इसलिये जनता की मांग को ध्यान में रखते हुए स्कूल बंद नहीँ होना चाहिए।

राजीव बिंदल कैसे और क्यों बनाए गए हिमाचल प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष, जानें

सुरेश चंबयाल।। दर्जन भर नामों की चर्चा मीडिया से लेकर सोशल मीडिया में होने के बाद हिमाचल भाजपा अध्यक्ष का दंगल विधानसभा अध्यक्ष और नाहन से बीजेपी विधायक डॉक्टर राजीव बिंदल के नाम पर मुहर के साथ शांत हो गया। तेजतर्रार बिंदल के नाम की चर्चा कभी मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने को लेकर गाहे बगाहे होती रहती थी परन्तु जयराम सरकार में हाशिये पर चल रहे बिंदल यकायक संग़ठन के सुप्रीमो हो जाएंगे, ऐसा क़यास कोई भी नहीं लगा पाया था। शायद ख़ुद डॉक्टर बिंदल भी नहीं।

पूर्व मख्यमंत्री शांता कुमार के शागिर्द रहे राजीव भारद्वाज, पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के करीबी रणधीर शर्मा और वर्तमान मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की टीम से त्रिलोक जम्वाल और महेंद्र धर्माणी को दरकिनार करते हुए राजीव बिंदल का नाम क्यों परवान चढ़ा, इसके कारणों और पटकथा के लिए इतिहास में झाँकना बहुत आवश्यक है। मगर इसके लिए कुछ हद तक वर्तमान की परिस्थितियों को भी अहम भूमिका है।

20 जनवरी को नड्डा बीजेपी के अध्यक्ष बनने जा रहे हैं, अभी वह कार्यकारी अध्यक्ष हैं। जैसे ही संगठन के शीर्ष पद की कमान नड्डा को मिलने की डेट फ़ाइनल हुई, उसके अगले ही दिन बिंदल का नाम हिमाचल प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में आ गया। मानो अपने औपचारिक राज्याभिषेक का दिन तय होते ही नड्डा ने अपने प्रदेश में अपने सेनापति का भी फ़ैसला कर लिया। ये वह फ़ैसला था जो लंबे समय से लटका हुआ था या फिर लटकाया गया था।

यह मात्र संयोग नहीं है कि नड्डा के अध्यक्ष बनाए जाने के समय अचानक बिंदल का नाम प्रदेश अध्यक्ष के लिए तय हो गया। बल्कि यह इतिहास का मात्र एक दोहराव है और बिंदल की काबिलियत की भी इसमें भूमिका है। इस बात में किसी भी राजनीतिक पंडित को संदेह में नहीं है कि बिंदल को प्रदेश अध्यक्ष की कमान जेपी नड्डा यानी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की विशेष पावर से ही मिली है।

नड्डा-बिंदल संबंध
20 साल पहले बिंदल को सोलन उपचुनाव में टिकट दिलवाने में भी नड्डा की अहम भूमिका रही थी। उस जमाने के युवा तुर्क पूर्व मंत्री शांता कुमार के कट्टर समर्थक महेंद्र नाथ सोफट का टिकट कट गया था और सोलन नगर परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष डॉक्टर बिंदल को मिला था। ये तब हुआ था, जब सोफत ने कोर्ट में केस जीतकर सोलन में हुए चुनाव को रद्द करवाया था और फिर उपचुनाव होने जा रहा था।

क़ानूनी लड़ाई जीतने वाले सोफत ही टिकट से महरूम कर दिए गए थे। पूर्व सगठन महामंत्री महेंद्र पांडे, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं सांसद सुरेश चंदेल और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री शांता कुमार जहाँ सोफत के नाम की पैरवी कर रहे थे, वहीं तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और प्रदेश के प्रभारी व वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी डॉक्टर बिंदल के लिए डटे थे। अंत में जीत बिंदल की हुई और बिंदल ने उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। 20 साल बाद नड्डा ने बिंदल को एकबार फिर बड़े ओहदे पर बिठा दिया।

नड्डा के बिंदल पर विश्वास जताने के और भी बहुत कारण हैं। वर्तमान हालात में जिन नेताओं के नाम अध्यक्ष पद के लिए चल रहे थे, वो चुनाव प्रबंधन और संगठन के मैनेजमेंट में कहीं भी बिंदल के आसपास नहीं ठहरते।

झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में हारने के बाद भाजपा को पहला सबक यह मिला कि जब-जब मुख्यमंत्री का राज्य के संगठन पर कंट्रोल हो यानी कि सीएम का ही करीबी अध्यक्ष हो तो यह पार्टी के लिए ठीक नहीं होता। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार भी उसी की, संगठन भी उसी का। तो कैडर को अगर असंतोष हो तो दोनों जगह उसकी सुनवाई नहीं होती और यही असंतोष चुनावों में महँगा पड़ जाता है। जनता के साथ-साथ अपने लोगों का असंतोष ही है जो सरकारों को सत्ता से हटा देता है।

इसलिए ज़रूरी होता है कि प्रदेश में संगठन का मुखिया चुस्त-दुरुस्त हो और जिनका अपना वजूद हो। अगर प्रभावी शख़्स संगठन का मुखिया होगा तो वह आम कार्यकर्ता की आवाज सरकार के सामने मुखर होकर रख सकता है। अध्यक्ष ऐसा होना चाहिए जो मुख्यमंत्री की छत्रछाया में संग़ठन को बढ़ाने की जगह अपने वजूद से उसका विस्तार करे। साथ ही उसका काम सरकार की कार्यप्रणाली पर नज़र रखना भी है ताकि केंद्रीय आलाकमान के लिए वह आँख-कान बने। अगर सीएम का ही करीबी अध्यक्ष बन जाएगा तो वह सरकार की कमियों को ऊपर नहीं पहुँचाएगा, जिससे सुधार की गुंजाइश ख़त्म हो जाएगी।

यही सब कुछ ऐसे क्राइटेरिया हैं जिनके आधार पर बीजेपी आलाकमान अपने प्रदेश अध्यक्ष के उम्मीदवारों को तौलकर देखने लगा है। बिंदल इसी कारण त्रिलोक जम्वाल, रणधीर, महेंद्र धर्माणी और राजीव भारद्वाज जैसे नामों पर भारी पड़ गए।

नए अध्यक्ष नड्डा पर होगा अपने राज्य हिमाचल में बीजेपी सरकार रिपीट करवाने का प्रेशर

नड्डा पर ख़ुद को साबित करने की ज़िम्मेदारी
अपनी ही पार्टी की सरकार में एक तरह से पावरलेस चल रहे बिंदल को संगठन शीर्ष के रूप में पावर देकर नड्डा ने यह भी उम्मीद जताई होगी कि अपने प्रदेश में सरकार कम से कम उन कारणों से न हारे, जिन कारणों से हर राज्य में सत्ता हाथ से निकलती जा रही है। नए अध्यक्ष के लिए यह ज़रूरी होगा कि बाक़ी प्रदेश तो जीते ही, अपने गृहराज्य में भी सरकार रिपीट करवाए।

प्रदेश में यह भी देखा जा रहा था कि पार्टी का एक धड़ा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के सामने धूमल परिवार को चुनौती के रूप में खड़ा करने की कोशिश में जुटा था। ये वो लोग हैं जिन्हें जयराम दौर में ‘सत्ता की मलाई’ नसीब नहीं हो पाई है। उपचुनावों में भी देखा गया कि सरकार से लेकर और संगठन तक के स्तर पर हर जगह जयराम ही जूझ रहे थे। पर यह भी सच है जयराम भी संगठन के मोर्चे में अपने लोगों को रखने की ताक में थे, जैसा कि हर सीएम चाहता है। इसीलिए अध्यक्ष पद के लिए दो-तीन नाम सीएम जयराम के ख़ेमे से ही आगे किए गए ताकि एक पर तो मुहर लग ही जाए। मगर ऐसा हुआ नहीं।

मुख्यमंत्री के ओएसडी महेंद्र धर्माणी का नाम भी आगे चल रहा था

फिर भी बिंदल के आने से अब कम से कम जयराम एक मोर्चे पर राहत ले सकते हैं क्योंकि बिंदल अब प्रोटोकॉल से नहीं बंधे होंगे और अपने अनुभव के आधार पर विपक्ष के हमलों से सरकार के लिए ढाल बन सकते हैं। इससे जयराम को काम करने की स्वतंत्रता ही मिलेगी।

हालाँकि, ऐसा माना जा सकता है कि बिंदल के अध्यक्ष बनने से भाजपा में अब नए ध्रुव का उदय होगा। बिंदल मीडिया के फोकस में भी रहेंगे और मीडिया को मैंनेज करना भी वो अच्छी तरह जानते भी हैं। पहचान की तलाश में भटकता भाजपा का एक वर्ग बिंदल की तरफ आकर्षित होगा और साथ ही वो लोग भी बिंदल के सामने दुखड़ा रोएंगे, जिनकी अपनी ही सरकार में पूछ नहीं हो पा रही।

अगले चुनावों के दौरान टिकट आवंटन सबसे महत्वपूर्ण काम होगा और उसमें प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी अहम होती है। इसलिए हर ख़ेमा चाहता है कि अध्यक्ष उनका आदमी बने। ऐसे में बिंदल का रोल काफ़ी अहम होने वाला है। साथ ही ऐसा भी नहीं लगता कि बिंदल सरकार की हाँ में हाँ मिलाते रहेंगे और भविष्य में संगठन को लेकर सरकार के अनुसार फ़ैसले लेंगे। वह सरकार के मुखौटा अध्यक्ष नहीं होंगे बल्कि अपनी एक अलग पहचान लेकर चलेंगे। अगले डेढ़ साल में स्पष्ट हो पाएगा कि बिंदल का प्रदेशाध्यक्ष बनना पार्टी के लिए कैसा रहेगा।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विभिन्न मसलों पर लिखते रहते हैं। इन दिनों इन हिमाचल के लिए नियमित लेखन कर रहे हैं।)

ज़िला पार्षद भूपेंद्र सिंह ने मन्त्री के बेटे को भेजा मानहानि का नोटिस

धर्मपुर।। धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक व जयराम सरकार में मन्त्री महेंद्र सिंह के बेटे रजत ठाकुर द्धारा ज़िला पार्षद भूपेन्द्र सिंह पर मज़दूरों से एक एक हज़ार रुपये लेने बारे मीडिया में दिये गए बयान का मामला आज कोर्ट पहुंच गया। ज़िला पार्षद भूपेंद्र सिंह ने मन्त्री के बेटे व युवा मोर्चा के राज्य महासचिव के खिलाफ मानहानि का लीगल नोटिस आज सरकाघाट कोर्ट में एडवोकेट सुरेश शर्मा के माध्यम से भेजा।जिसमें उनोहनें रजत ठाकुर पर झूठा आरोप लगाकर उनकी छवि खराब करने की एवज़ में पन्द्रह दिन में पचास लाख रुपए का हर्जाना देने औऱ सार्वजनिक तौर पर माफ़ी मांगने की मांग की है ताकि उन्हें बदनाम करने के लिए इस प्रकार की बेबुनियादी औऱ झूठी बयानबाजी से बाज आ सकें।

भूपेंद्र सिंह द्धारा भेजे लीगल में बताया है कि वे पिछले पांच साल से धर्मपुर विकास खण्ड में सीटू मज़दूर संगठन से जुड़ी मनरेगा मज़दूर यूनियन के माध्यम से मज़दूरों की समस्याओं को हल करवाने और उन्हें राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड से पंजीकृत करवाने का काम कर रहे हैं।जिसके चलते अभी तक धर्मपुर खंड की 35 पँचयतों के पांच हजार से ज्यादा मज़दूरों का पंजीकरण किया गया है और उन्हेँ बोर्ड से दस करोड़ रुपये के लाभ मिल चुके हैं। ये सारा काम मज़दूर यूनियन के माध्यम से औऱ ज़िला पार्षद होने के नाते कर रहे है और यूनियन ने मज़दूरों की सुविधा के लिए अलग अलग स्थानों पर दफ़्तर भी खोले हैं। 35 पंचायतों में पांच हजार मज़दूरों को यूनियन का सदस्य बनाया गया है और सभी से यूनियन के नियमानुसार वार्षिक सदस्यता शुल्क व मासिक चंदा लिया जाता है।

लेकिन मन्त्री के बेटे ने मंडी लेबर आफ़िस में जाकर और मीडिया में ये झूठा आरोप लगाया है कि भूपेंद्र सिंह एन्ड कम्पनी धर्मपुर में मज़दूरों से एक एक हज़ार रुपये लेते हैं और उसमें से कर्मचारिओं को मंडी जाकर रिश्वत देते हैं।ये सारी बात उनके पास वीडियो रिकॉर्डिंग में उपलब्ध हैऔऱ सोसल मीडया और अखबारों में छपी खबर में दर्ज है।भूपेंद्र सिंह ने ये भी बताया मन्त्री के बेटे ने ये भी आरोप लगाया है कि सारे लाभ सजाओपीपलु ज़िला परिषद वार्ड की पंचायतों को ही मिल रहे हैं जबकि मनरेगा मज़दूर यूनियन धर्मपुर की 35 पँचायतों में इस काम को कर रही है और मन्त्री की पँचायत ध्वाली के कार्ड भी हमने ही बनवाये थे।ज़िला पार्षद ने आरोप लगाया कि जबसे मन्त्री की बेटी ज़िला परिषद का चुनाव हारी है तब से वे सजाओपीपलु वार्ड के साथ भेदभाव कर रहे हैं और अब तो साबित हो गया कि मन्त्री का परिवार इस वार्ड के मज़दूरों के प्रति बदले की भावना से काम कर रहे हैं।

इसी सोच के कारण वे मनरेगा मज़दूरों को मिलने वाले लाभों को वितरित करने में अड़चनें डाल रहे हैं और पिछले छह माह से एक हज़ार से ज्यादा मज़दूरों का सामान धर्मपुर में पड़ा है लेकिन वे उसे बंटने नहीं दे रहे हैं और इसके लिए मज़दूर दो बार प्रदर्शन भी कर चुके हैं। लेकिन सामान वांटने के बजाए वे मज़दूरों और बोर्ड के कर्मचारियों को डराने धमकाने औऱ ट्रांसफर करने की धमकियां दे रहे हैं।जिसके ख़िलाफ़ यूनियन ने आज से सभी पंचायतों में जनजागरण अभियान चलाने का निर्णय लिया है जिसके तहत मज़दूरों की मीटिंगे की जाएंगी और पर्चा वितरण किया जाएगा।

मुरथल टोल बैरियर के गुंडों ने HRTC के ड्राइवर, कंडक्टर और यात्री को पीटा

सरकाघाट।। हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम द्वारा वेट लीजिंग पर ली गई वोल्वो बस के ड्राइवर, कंडक्टर और एक यात्री को परिवहन विभाग के अधिकारियों की लापरवाही के कारण टोल टैक्स बेरियर मुरथल के गुंडों की पिटाई का सामना करना पड़ा।

हिमाचल पथ परिवहन निगम बिलासपुर डिपो की गत रात्रि दिल्ली से सरकाघाट आ रही वोल्वो बस HP 72 B 1315 के चालक परिचालक व एक यात्री को टोल प्लाजा के कर्मचारियों की मार का सामना करना पड़ा है।

जानकारी अनुसार जैसे ही इस मार्ग पर पड़ने वाले पहले टोल प्लाजा मुरथल से वाल्वो बस फ़ास्ट टैग से गुजरने लगी तो टोल प्लाजा कर्मियों ने फ़ास्ट टैग में पैसा न होने की बात कही जिसपर चालक व उनके बीच बहस हो गई।

टोल कर्मियों ने बस को साइड में खड़ा करने को कहा। जैसे ही चालक बस को साइड में करने लगा तभी टोल कर्मियों ने परिचालक का बैग छीन लिया। इसको लेकर करीब 30-40 मिनट तक दोनों और से तकरार होती रही। इस बीच परिचालक की पिटाई भी कर दी। बस चालक जब निगम प्रबंधक से मोबाइल पर बात करने लगा तो उसका मोबाइल छीन लिया गया।

इस घटना का वीडियो बनाने बाले एक यात्री को भी टोल कर्मियों ने बुरी तरह से पीट दिया। हिमाचल पथ परिवहन निगम के प्रबंधन द्वारा फ़ास्ट टैग में पैसा जमा न करने की खामी का खामियाजा तीन लोगों को भुगतना पड़ा और बड़ी मुश्किल से नकद भुगतान करने के बाद आगे बढ़े।

अगले टोल प्लाजा पर जैसे बस खड़ी की तो डिस्प्ले पर ब्लैक लिस्ट लिखा आया तब कैश से भुगतान किया गया। उधर इसे लेकर परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर से लगातार उनके दोनो मोबाइल नंबरों पर संपर्क किया गया परंतु उन्होंने फोन काट दिया और बाद में बात करने का मेसेज भेज दिया।

इस बारे जब परिवहन निगम बिलासपुर के क्षेत्रीय प्रबंधक पवन शर्मा ने कहा कि रात को मुरथल से बस के ड्राइवर अजैब सिंह का फोन आया था। उन्होंने कहा, “मैं उससे फोन पर बात कर ही रहा था कि इसी दौरान लड़ाई-झगड़े की आवाज आने लगी और फोन बंद हो गया।”

उन्होंने कहा, “मैं लगातार ड्राइवर कंडक्टर को फोन करता रहा परंतु किसी ने भी फोन नहीं उठाया। फास्टैग में 1 हफ्ते के लिए ₹1 लाख डालते हैं, शुक्रवार को भी ₹1 लाख बैंक में डाला था परंतु ट्रांजैक्शन नहीं हो पाई थी।”

आरएम सरकाघाट नरेंद्र शर्मा से बात की गई तो उन्होंने कहा कि मामला उनके ध्यान मे लाया गया है, निगम कर्मचारियों की सुरक्षा व्यवस्था को हर हालत में सुनिश्चित किया जाएगा।

उनका कहना था कि फास्टैग में पैसे नहीं डालने वाले कर्मचारी पर अनुशाश्नात्मक कार्यवाही की जाएगी। उधर प्रदेश बस अड्डा प्राधिकरण बोर्ड के सदस्य चंद्र मोहन शर्मा ने कहा कि इस मामले को बीओडी के बैठक में जोर-शोर से उठाया जाएगा तथा वह खुद परिवहन मंत्री से मिलकर बात करेंगे ताकि दोबारा ऐसी घटना ना हो पाए।

दिल्ली के पास हिमाचल की ज़मीन क्यों बेच रही जयराम सरकार?

महेंद्र सिंह धर्माणी बन सकते हैं हिमाचल प्रदेश बीजेपी के नए अध्यक्ष

इन हिमाचल डेस्क।। बिलासपुर से संबध रखने वाले महेंद्र सिंह धर्माणी हिमाचल प्रदेश बीजेपी के नए अध्यक्ष बन सकते हैं। इस समय अगले प्रदेशाध्यक्ष के लिए उनका नाम सबसे आगे चल रहा है। अभी धर्माणी सीएम जयराम ठाकुर के ओएसडी हैं। बीजेपी के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के गृह जिले बिलासपुर से संबंध रखने वाले धर्माणी को संघ के बड़े नेताओं का समर्थन हासिल है।

दरअसल प्रदेश के मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती का कार्यकाल खत्म हो चुका है और लंबे समय से अध्यक्ष बदलने की चर्चा चल रही है। ऐसे में कई नामों को लेकर सोशल मीडिया से लेकर अखबारों तक में बात हो रही है। मगर आलाकमान अभी तक नए पैनल के लिए आए नामों को लेकर संतुष्ट नहीं है।

संघ का समर्थन भी मिला
हाल ही में रणधीर शर्मा, राम सिंह, त्रिलोक जम्वाल, राजीव भारद्वाज, विक्रम सिंह, राकेश जम्वाल, वीरेंद्र कश्यप और त्रिलोक कपूर जैसे कई नाम मीडिया में चर्चा में रहे हैं। मगर इस बीच संघ के कुछ नेताओं ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े रहे धर्माणी के लिए जोर लगाना शुरू कर दिया है।

ऐसी चर्चा है कि दिल्ली में बैठे एक बड़े नेता का समर्थन मिलने के बाद प्रदेश से संबंधित आरएसएस के नेताओं ने भी धर्माणी के नाम को लेकर सहमति जताई है और उनका नाम भेजा है। चूँकि वह सीएम के ओएसडी हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि उनकी तरफ़ से भी धर्माणी को प्रदेशाध्यक्ष नाने के लिए पूरा समर्थन मिलेगा। मगर अब ऐसी भी ख़बरें हैं कि जेपी अड्डा को भी धर्माणी के नाम से कोई आपत्ति नहीं है।

मुख्यमंत्री कार्यालय में ओएसडी रहते हुए धर्माणी संतुलन बनाकर काम करने के लिए जाने जाते हैं। यह बात प्रबंधन के हिसाब से उनके पक्ष में जाती दिखती है। हिमाचल प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि संगठन, क्षेत्र और जाति आधारित समीकरणों को देखें तो ये भी धर्माणी के पक्ष में हैं।

ऐसा कहा जा रहा है कि जब तक कि आख़िरी समय में कोई बड़ा उलटफेर न हो, तब तक धर्माणी का नाम ही अगले प्रदेशाध्यक्ष के लिए तय माना जा सकता है।

सरकाघाट पुलिस ने मंत्री की पत्नी को दे दी एस्कॉर्ट

सरकाघाट।। आर्थिक तंगी के दौरान हिमाचल प्रदेश सरकार ने जहां प्रदेश की आईपीएच मंत्री और उनके परिवार को चार चार गाड़ियां मुहैया करवाई है वहीं पर अब मंत्रियों की पत्नियों को भी पुलिस ने एस्कॉर्ट सुविधा देना शुरू कर दिया है। बीते कल सजाओपीपलू में आयोजित एक संस्था के कार्यक्रम में एक तरफ जहां आईपीएच मंत्री महेंद्र सिंह के परिवार के लिए सरकारी गाड़ी तैनात थी तो वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य मंत्री विपिन परमार की पत्नी के लिए ना सिर्फ स्वास्थ्य मंत्री की सरकारी गाड़ी मुहैया करवाई गई थी बल्कि पुलिस द्वारा एस्कॉर्ट सेवा उपलब्ध करवाकर एक नई प्रथा शुरू कर दी गई है।

एक तरफ केंद्र की मोदी सरकार वीआईपी कल्चर खत्म करने में जुटी है वहीं प्रदेश की भाजपा सरकार इसी वीआईपी कल्चर की धज्जियां उड़ाने में जुटी है। यहां तक कि लाल बत्ती का कानून खत्म तो कर दिया गया है लेकिन आज भी हिमाचल प्रदेश सरकार के मंत्री उनकी धर्मपत्नी और परिवार को पुलिस एस्कॉर्ट प्रदान कर रही है।

शुक्रवार को स्वास्थ्य शिविर में स्वास्थ्य मंत्री विपन परमार की पत्नी बतौर मुख्य अतिथी उपस्थित हुई। मंत्री की पत्नी को सरकाघाट पुलिस की गाड़ी ने अपनी सीमा से लेकर धर्मपुर की सीमा तक बकायदा एस्कॉर्ट किया।

शहर के लोग उस वक्त हैरान रह गए जब स्वास्थ्य मंत्री की फॉरच्यूनर गाड़ी में उनकी धर्मपत्नी को पुलिस विभाग द्वारा एस्कॉर्ट किया गया। पुलिस की पायलत गाड़ी लगातार सायरन बजाते हुए बाजार से गुजरी, जैसे क्षेत्र में मुख्यमंत्री का दौरा हो। स्वास्थ्य शिविर में मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी डॉक्टर साधना ठाकुर को आमंत्रित किया गया था परंतु वह तो नहीं आईं, उनकी जगह स्वास्थ्य मंत्री की पत्नी ने इस स्वास्थ्य शिविर में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की।

गलतफहमी हुई थी: डीएसपी
डीएसपी सरकाघाट चंद्रपाल सिंह ने कहा कि शायद पुलिसकर्मियों को गलती लग गई थी और गलतफहमी में पुलिस की गाड़ी मुहैया की गई थी क्योंकि शहर में ट्रैफिक जाम हुआ था। उन्होंने बताया कि उन्हें भी सूचना थी कि शिविर में रेड क्रॉस की अध्यक्षता मुख्यमंत्री की धर्मपत्नी आ रही है, शायद पुलिसकर्मियों को भी इसकी गलतफहमी हो गई होगी। डीएसपी ने कहा कि अगर गाड़ी हुटर बजाती हुई निकली होगी तो वह इस मामले की जांच करेंगे। उन्होंने कहा कि इसे एस्कॉर्ट नहीं कह सकते है।

मामला उजागर होने के बाद पुलिस इसे मात्र गलतफहमी का बयान देकर पल्ला छुड़ाना चाहती है। वहीं विपक्ष में बैठे कांग्रेस, माकपा और धर्मपुर न्याय मंच ने इस मुद्दे को लेकर सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।

प्रदेश हथकरघा निगम के पूर्व उपाध्यक्ष एवं कांग्रेस नेता चंद्रशेखर ने कहा की सस्ती लोकप्रियता हासिल करने व सरकारी धन के दुरुपयोग धर्मपुर में लगातार किए जा रही है। उन्होंने कहा कि अगर आईपीएच मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर जनसेवा की भावना से तीन दिवसीय स्वास्थ्य लगाते तो ज्यादा अच्छा होता। उन्होंने कहा, “इसमें स्वास्थ्य मंत्री की धर्मपत्नी को अगर बुलाया ही गया था तो उसके लिए वह निजी वाहन उपलब्ध करवाते ना कि स्वास्थ्य मंत्री की सरकारी फॉर्च्यूनर गाड़ी में उन्हें लाते।”

उन्होंने कहा कि इस मामले में साफ दर्शाता है कि मंत्री के परिवार किस तरह सरकारी सुविधा का लुत्फ़ उठा रहे हैं तथा धन का दुरुपयोग किया जा रहा है। चंद्रशेखर ने सवाल उठाया कि महेंद्र सिंह के परिवार की जिस संस्था को चलाया जा रहा है उसे धन कहां से आ रहा है। इसकी फंडिंग करने वाली एजेंसी कौन है, इसकी भी जांच होनी चाहिए।

चन्द्रशेखर ने कहा कि जिस तरह शिविरों के नाम पर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने और सरकारी धन के दुरुपयोग का गोरखधंधा धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में चला है इसे पूरी तरह बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी ने इसके ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरकर आंदोलन शुरू कर दिया है।

उधर ,जिला पार्षद भूपेंद्र सिंह एवं धर्मपुर न्याय मंच ने कहा की प्रदेश की जयराम सरकार जनता के पैसे से मंत्रियों के परिवार के सैर सपाटे और मौज मस्ती के लिए पेसा फूँक रही है। धर्मपुर में मंत्री का पूरा परिवार सरकारी गाड़ियों में घूमता है जिसके बारे में धर्मपुर न्याय मंच पहले भी मुद्दा उठा चुका है, लेकिन मुख्यमंत्री इस परिवार के आगे असहाय नजर आ रहे हैं।

उन्होंने कहा की लोकतंत्र को जिंदा रखना है तो मुख्यमंत्री को मंत्रियों के परिवार को एस्कॉर्ट गाड़ियां मुहैया कराने की प्रथा को ना सिर्फ बंद कर देना चाहिए बल्कि इस मामले की जांच भी की जानी चाहिए तथा दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

हिमाचल सरकार की हर भर्ती पर सवाल क्यों उठते हैं

राजेश वर्मा।। प्रदेश भर में 3 लाख से ज्यादा बेरोजगार अभ्यर्थियों ने 17 नवंबर को 1194 पदों के लिए जैसे ही पटवारी की परीक्षा दी तो तुरंत बाद कहीं प्रश्न पत्र मिलने में देरी, कहीं नकल करने करवाने के आरोप तो कहीं निर्धारित समय के बाद भी परीक्षा जारी रखने आदि के तमाम आरोपों प्रत्यारोपों के बीच यह भर्ती प्रक्रिया का मामला हाईकोर्ट में चला गया और अब हाईकोर्ट ने इसी पटवारी भर्ती परीक्षा की तीन माह के भीतर सीबीआई जांच करवाने का सरकार को निर्देश दे दिया।

यह एक अकेली पटवारी परीक्षा ही नहीं है जिस पर अंगुली उठी हो समय-समय पर प्रदेश में बहुत सी भर्ती परीक्षाओं पर धांधलियों के आरोप लगते रहे हैं। चाहे पुलिस भर्ती हो, शिक्षक भर्ती हो, कंडक्टर भर्ती हो, बैंकों में भर्ती हो, या अन्य विभिन्न विभागों में विभिन्न पदों पर होने वाली भर्तियां हो। ऐसा भी नहीं की यह किसी विशेष सरकार के कार्यकाल में ही हुआ हो, सत्ता में कोई भी दल हो लेकिन ऐसी अंगुलियां उठती ही रही हैं।

आखिर क्यों हर बार उन बेरोजगारों के लिए कोर्ट ही एकमात्र सहारा बनता है जो बेरोजगारी के इस आलम में नौकरी की चाह में अपनी मेहनत से दिन रात एक कर देते हैं लेकिन उन्हें फिर कहीं न कहीं कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने पर मजबूर होना पड़ता है। कोई भी बेरोजगार न्यायालय के चक्कर में नहीं पड़ना चाहता लेकिन फिर भी उसे मजबूरीवश ऐसा कदम उठाना ही पडता है क्योंकि भर्ती प्रक्रियाओं में जब खामियाँ होंगी तो कोई भी अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने से पीछे नहीं हटेगा।

श्रम व रोजगार विभाग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में विभिन्न रोजगार कार्यालयों में 8 लाख से ज्यादा बेरोजगारों की फौज का आंकड़ा दर्ज है। पटवारी परीक्षा में ऐसा लगा मानों पूरा हिमाचल ही परीक्षा देने उतरा हो क्या गांव क्या शहर? सभी मैट्रिक पास और इससे उपर की शैक्षणिक योग्यता रखने वाले बेरोजगार पटवारी बनने की चाह लिए थे, मीडिया हो या सोशल मीडिया सभी जगह पटवारी ही छाए हुए थे। वे पटवारी जिनके दीदार को गांव में लोगों की नजरें तरस जाती हैं उस पटवारी पद के लिए एक ही झटके में इस परीक्षा ने प्रदेश के 11 जिलों में 1194 पदों पर 3 लाख से ज्यादा बेरोजगारों ने पटवारी बनने के लिए आवेदन कर दिया।

पहली बार महसूस हो रहा था कोई भी आपस में छोटा बड़ा नहीं है सब बस पटवारी बनते बनाते ही नजर आ रहे थे, न तो 10 पास बेरोजगार की नजर में एक बीटेक इंजीनियर था और न ही एमफिल- पीएचडी डिग्री धारक की नजर में एमए, बीएड वाला कोई मास्टर, सब एक दूसरे की नजर में पटवारी थे लेकिन जब भी धांधली या इस तरह की घटनाएं देखने सुनने को मिलती हैं तो भले ही ऐसी परीक्षाएं निष्पक्ष आयोजित हों फिर भी लोग इसे शक की निगाह से देखते हैं। भर्ती होंगे सिर्फ़ 1194 लेकिन शेष जो लाखों रह गए उनकी नजर में तो यह चेहतों को लाभ देने वाली बात ही होगी और कोई भी सरकार कभी नहीं चाहेगी की कोई भर्ती परीक्षा ऐसी हो जिसके कारण महज 1 हजार के लिए वह लाखों बेरोजगारों का आक्रोश झेले।

भर्ती प्रक्रिया का अंतिम परिणाम जो जो भी होगा अच्छा ही होगा क्योंकि इन्हीं लाखों बेरोजगारों में से ही ये पटवारी लगेंगे। एक बात और गौर करने वाली है कि आखिर उच्च शैक्षणिक योग्यता रखने वाले युवा भी आखिर पटवारी क्यों बनने की सोचने लगे? तो इसके पीछे की एकमात्र मुख्य वजह है बेरोजगारी। श्रम एवं रोजगार विभाग के नवीनतम आंकड़ें बताते है की पोस्ट ग्रेजुएट या इससे अधिक शैक्षणिक योग्यता रखने वाले लगभग 80 हजार बेरोजगार, ग्रेजुएट 1 लाख 30 हजार के करीब, सीनियर सेकंडरी पास 4 लाख 50 हजार 5 सौ 36 व मैट्रिक के 1 लाख 28 हजार 402 बेरोजगार युवा प्रदेश के विभिन्न रोजगार कार्यालयों में वर्तमान में दर्ज हैं। इन आंकड़ों से साफ पता चलता है की अकेले मैट्रिक से लेकर सीनियर सेकंडरी तक का आंकड़ा 5 लाख से ऊपर है। इसी तरह ग्रेजुएट व पोस्ट ग्रेजुएट का आंकड़ा 2 लाख से उपर है। कुल 8 लाख से उपर बेरोजगारों की फौज को सरकारी क्षेत्र में घटते नौकरियों के मौकों ने इन युवाओं को किसी भी छोटी बड़ी प्रतियोगी परीक्षा में भाग लेने के लिए मजबूर कर दिया है।

आज बेरोजगार अपनी बेकारी से इतना तंग नहीं जितना वह नौकरी के लिए अपनाई जाने वाली ऐसी प्रतियोगी परीक्षाओं की प्रक्रिया से प्रताड़ित होता है। परीक्षा केंद्रों में तैनात स्टाफ़ सदस्यों को उनका मेहनताना मिल जाएगा परंतु किसी ने यह नहीं सोचा की किसी बेरोजगार ने कैसे-कैसे भारी-भरकम आवेदन शुल्क भरा होगा उसके बाद दूर दराज के क्षेत्रों से कोई 50 मील की दूरी तो कोई शख्स 100 मील से ज्यादा की दूरी तय करके बस किराया खाने पीने व रहने का खर्च करके परीक्षा देने पहुंचा होगा लेकिन जब उसे परीक्षा केंद्र में इस तरह के घटनाक्रम से जूझना पड़ा होगा तो उसकी व उसके परिवार की मानसिक पीड़ा को शायद ही कोई समझ सका होगा।

प्रदेश में पढे़-लिखे बेरोजगारों को जितना विश्वास कर्मचारी चयन आयोग व लोक सेवा आयोग पर है उतना भरोसा किसी अन्य ऐंजसी पर नहीं है, हो भी क्यों न? क्योंकि प्रदेश का कर्मचारी चयन आयोग निष्पक्ष व बेहतरीन भर्ती प्रक्रिया आयोजित करने के मामले में आज भी अपनी स्वच्छ छवि के लिए बेरोजगारों के दिलो-दिमाग में है।

प्रश्न यह भी है कि जब हमारी सरकारों ने हम प्रदेश वासियों को सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए कर्मचारी चयन आयोग व लोकसेवा आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाएं दी हैं तो विभिन्न विभाग अपने स्तर पर इन भर्तियों को आयोजित क्यों करवा रहे हैं। कभी पुलिस भर्ती, कभी ड्राइवर- कंडक्टर भर्ती, कभी फाॅरेस्ट गार्ड की भर्ती,कभी लाईन मैन की भर्ती, कभी बैंकों में भर्ती तो कभी अन्य भर्तियां आदि। यह सब भर्तियां कर्मचारी चयन आयोग व लोक सेवा आयोग द्वारा क्यों नहीं की जाती जबकि इनका गठन भी इसी उद्देश्य के लिए किया गया है। इतना तय है यदि इसी तरह कर्मचारी चयन आयोग व लोक सेवा आयोग की बजाए सभी विभाग खुद ही बिना उचित नीति के भर्तियां करते रहे तो ना तो बेरोजगारी कम हो पाएगी और न हीं हम प्रदेश के करीब 8 लाख बेरोजगारों का भरोसा जीत पाएंगे। कभी परीक्षा में धांधली कभी प्रश्न पत्रों में गड़बड़ियां कभी अन्य कारण आदि।

प्रतीकात्मक तस्वीर

रोजगार देना बहुत कल्याणकारी योजना है लेकिन यह तभी अपनी मंजिल पर पहुंच पाएगी जब निष्पक्षता से इसे एक सही समय में पूरा कर लिया जाए। भर्ती प्रक्रिया प्रारंभ करने का मतलब यह नहीं की आपने रोजगार दे दिया। रोजगार देने का उद्देश्य तो तब सार्थक होगा जब इसे पाने वाले के साथ-साथ इस प्रक्रिया में भाग लेने वाले भी इसकी प्रक्रिया से संतुष्ट होंगे। प्रदेश के युवाओं में चेहतों को लगाने का डर खत्म करना होगा। किसी को रोजगार का न मिलना इतना कष्टकारी नहीं जितना की इसकी प्रक्रियाओं में लगने वाले आरोप-प्रत्यारोपों से उसे पीड़ा होती है, तब वह यह नहीं सोचता की उसमें कुछ कमी रह गई होगी तब उसके मन में बस एक ही सवाल उठता है कि नौकरी तो बस अपनों को मिलती है और सिफारिश से मिलती है।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा लम्बे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे vermarajeshhctu @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

सीएम जयराम ठाकुर ने किया अपने मंत्री महेंद्र सिंह के बेटे का बचाव

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने इस वायरल वीडियो को लेकर अपने मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर के बेटे रजत ठाकुर का बचाव किया है, जिसमें वह श्रम कार्यालय में किसी बात को लेकर महिला कर्मचारियों को ट्रांसफ़र की धमकी दे रहे थे।सीएम ने कहा कि उन्होंने पूरी बातचीत सुनी है और यह रूटीन बात थी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि कोई भी शख़्स सरकारी कर्मचारियों से काम के बारे में पूछ सकता है। हालाँकि उन्होंने कहा कि सरकार में बैठे लोगों और उनके क़रीबियों को ज़िम्मेदारी से पेश आना चाहिए। उन्होंने कहा कि वीडियो बनाने की परंपरा ग़लत है और कर्मचारियों को काम करना चाहिए, न कि ऐसे वीडियो बनाने चाहिए। उन्होंने कहा कि यह वीडियो रजत को निशाना बनाने के लिए रिकॉर्ड किया गया था।

सीएम ने कहा कि उनके पास पहले से श्रम कार्यालय को लेकर शिकायतें मिलती रही हैं और यह जाँच का विषय है। पूरा मामला क्या है, जानने के लिए आगे दिए गए लिंक पर आप टैप कर सकते हैं और वीडियो भी देख सकते है-

मंत्री महेंद्र सिंह के बेटे ने श्रम ऑफिस जाकर धमकाईं महिला कर्मचारी, वीडियो वायरल

 

लोकतंत्र में राजशाही की याद दिलाता है जनमंचों में नेताओं का रवैया

इन हिमाचल डेस्क।।  जनमंच में फिर अधिकारी का अपमान। एसडीओ ने बजट की कमी का हवाला देना चाहा तो विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज ने गली-मोहल्लों के दादा की तरह दी धमकी। वह पहले भी इस्तेमाल करते रहे हैं ऐसी भाषा। ताजा मामला पांवटा साहिब के अम्बोया का है। वीडियो देखें-

इस तरह डाँटने का मतलब क्या है?
खुद राजा की तरह मंच पर बैठो, जनता नीचे से हाथ जोड़कर अर्ज करती रहे और आप मंच से अधिकारियों को डाँटो, उनका पक्ष मत सुनो, शाही आदेश जारो करो और फिर कहो कि महान कार्य कर दिया, जनता की समस्याएं सुलझा दी।

मगर ओ नेताओ! इस बात जा जवाब दो कि जनमंचों में इतनी भीड़ जुट क्यों रही है? इसका मतलब है आप सिस्टम को ही नहीं सुधार पा रहे। आपका काम सिस्टम को सुधारना है ताकि जनता को जनमंच जैसे कार्यक्रमों में न आना पड़े।

वास्तव में जनमंच सरकार की विफलता का प्रमाण है कि देखो, हमारा शासन इतना अक्षम है कि खोदल पड़ी हुई है, अधिकारी सुनते नहीं, जनता परेशान होकर रोती रहती है।

जनमंच देर तक चलना अच्छा संकेत नहीं
शुरू में एक-दो साल जनमंच चलाना समझ आता है कि पिछली सरकार की कमियों को आप दूर कर रहे हैं। मगर इन दो सालो में आपने क्या सिस्टम इतना ठीक नहीं किया कि जनता को अपने कामों के लिए जनमंच जैसे आयोजनों में न आना पड़े?

वही सरकार सफल कही जा सकती है जहां लोगों को फरियाद लेकर जनमंच जैसे कार्यक्रमों में न आना पड़े। मगर ऐसा हो गया तो खुद को राजा टाइप फीलिंग कैसे आएगी? अधिकारियों को लताड़कर अपनी धाक दिखाने का अवसर कैसे मिलेगा?

जनमंचों में कुछ नेताओं का ऐसा रवैया लोकतंत्र में भी राजशाही की याद दिलाता है।

चंबा में जनमंच बना रंगमंच, बंद करवाए गए पत्रकारों के कैमरे

विधनासभा उपाध्यक्ष हंसराज ने पद की गरिमा भूल पार्टी की रैली में लगाए नारे

चंबा।। हिमाचल प्रदेश विधान सभा में 68 विधायक है और उनमें से चुने जाने वाले विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद संवैधानिक पद माने जाते हैं। चूँकि विधानसभा उपाध्यक्ष को अध्यक्ष की ग़ैरमौजूदगी में विधानसभा चलानी होती है, इसलिए वह पार्टी की गतिविधि में शामिल नहीं हो सकते। क्योंकि इस पद के साथ निष्पक्षता की ज़िम्मेदारी जुड़ जाती है।

भाजपा ने नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर कांगड़ा के सांसद किशन कपूर की अगुवाई में चंबा के चुराई में रैली निकाली जिसमें स्थानीय विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज ने नारेबाज़ी की।

अक्सर वह मंचों से अधिकारियों को उनके कर्तव्यों की याद दिलाते हुए फटकारते नज़र आते हैं मगर शायद वह ख़ुद भूल गए कि उनका पद उनसे कैसे आचरण की अपेक्षा रखता है। हाल ही में पावंटा साहिब में हुए जनमंच में उनके व्यवहार का एक वीडियो वायरल हुआ था।

नीचे देखें-

डीसी और एसपी से माफी मंगवाने पर तुले विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज

डीसी और एसपी से माफी मंगवाने पर तुले विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज