कुल्लू: वनरक्षकों पर हमला कर ग्रामीणों ने जलाए ज़ब्त किए स्लीपर

कुल्लू।। वन मंत्री गोबिंद सिंह ठाकुर के ज़िले कुल्लू में पेड़ों का अंधाधुंध कटान जारी है और पेड़ काटने वालों के हौसले दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं। ताज़ा मामला लग घाटी का है जहां पर पेड़ काटने वालों ने वन रक्षकों पर हमला किया और उन्होंने जो स्लीपर ज़ब्त किए थे, उन्हें आग लगा दी।

माशणा गाँव के साथ लगते वन में फ़ॉरेस्ट गार्डों की एक टीम गश्त पर निकती थी। इसमें सात लोग थे जिनमें दो महिला वनरक्षक और एक बीओ शामिल थे। इस दौरान उन्होंने 35 स्लीपर ज़ब्त किए। मगर पेड़ काटने वाले वहाँ से भागने में सफल रहे।

इस टीम ने ज़ब्त किए हुए स्लीपरों को ढोया और एक जगह पर इकट्ठा किया। अंधेरा होने के कारण वन विभाग की टीम ने रात भर स्लीपरों की रखवाली करने का फ़ैसला किया। मगर रात दो बजे वन विभाग की टीम पर पथराव शुरू हो गया। जान बचाने के लिए वन विभाग की टीम वहाँ से भागी तो हमला करने आए लोगों ने स्लीपरों को आग लगा दी गई।

उधर वन विभाग के लोग पास के गाँव के लोगों के पास गए और अपने साथ हुई घटना की जानकारी दी। प्रधान आदि वहाँ पहुँचे और पुलिस को भी सूचना दी गई। पुलिस का कहना है कि मामले की जाँच शुरू कर दी गई है।

हमीरपुर के विधायक ने की बाहर फंसे लोगों को लाने की तैयारी

हमीरपुर।। हमीरपुर के विधायक ने लॉकडाउन के चलते हिमाचल से बाहर फँसे अपने यहाँ के लोगों को लाने के लिए अभियान शुरू करने की जानकारी दी है। उन्होंने फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा है कि चंडीगढ़ या अन्य जगहों पर फंसे बच्चों का वर्तमान और स्थायी पता मोबाइल नंबर सहित भेजें ताकि उन्हें वापस लाया जा सके।

हालाँकि, हिमाचल सरकार की ओर से इस तरह का अभियान चलाए जाने की आधिकारिक सूचना जारी नहीं हुई है। नरिंदर ठाकुर ने सुबह ही यह पोस्ट डाल दी थी मगर शाम सात बजे (इस ख़बर को प्रकाशित किए जाने का समय) तक मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के फ़ेसबुक पेज पर इस तरह के किसी प्लान की जानकारी नहीं दी गई थी।

मगर बीजेपी विधायक नरिंदर ठाकुर ने पूरे हमीरपुर ज़िले के लोगों के नाम संदेश जारी किया है और वॉट्सऐप नंबर भी दिए हैं, जिनपर उन्होंने ये जानकारियाँ भेजने के लिए कहा गया है।

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उन्होंने लिखा है, “मैं नरेंद्र ठाकुर आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि कोरोना महामारी के चलते इस संकट की घड़ी में हिमाचल सरकार सदैव आपकी सहायता के लिए प्रयासरत है। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मैं आपसे आह्वान करता हूं कि जिन अभिभावकों के बच्चे चंडीगढ़ या हिमाचल के बाहर किसी अन्य स्थान पर फंसे हैं, उन्हें घर वापस लाने के लिए तुरंत प्रभाव से अभियान चलाने का फैसला किया गया है।”

अपने फ़ेसबुक पेज पर डाले मेसेज में उन्होंने शुक्रवार शाम चार बजे तक उन लोगों की डीटेल्स भी इन नंबरों पर देने को कहा था, जो अपनी गाड़ी से वापस आना चाहते हैं।

कोटा प्रकरण: सीधे फ़ैसले न लेकर गोलमोल बातें क्यों करती है सरकार

कोटा प्रकरण: सीधे फ़ैसले न लेकर गोलमोल बातें क्यों करती है सरकार

आशीष नड्डा।। डरे-डरे से सरकार, जाने कौन सलाहकार और माशा अल्लाह चाटुकार… कमोबेश यही हालत हिमाचल प्रदेश सरकार की कोटा प्रकरण में नज़र आई। कोटा प्रकरण यानी कोटा में कोचिंग लाने गए बच्चों को वापस हिमाचल लाने के लिए बसों का इंतज़ाम करने को लेकर पूरे प्रदेश में भ्रम की स्थिति पैदा करना। इस पूरे मामले में जनता को भ्रमित करके रखा गया जबकि बात को सीधे, बिना किसी लाग-लपेट के जनता के सामने रखा जा सकता था।

पर यह कोई पहला मामला नहीं है। पहले भी मामूली सी बातों को सरकार ने अपने ही कर्मों से विवाद में बदल दिया। इश बार भी ऐसा ही किया गया। साधारण सी बातों को डेढ़ा करके उन्हें विवादों में तबदील कर देने में सरकार में बैठे सीएम जयराम के राजनीतिक कुनबे और बेलगाम सी नज़र आती अफ़सरशाही को जाने क्या मज़ा आता है।

इस पूरे मामले में सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है और सीएम की छवि भी एक कमजोर और समय पर फ़ैसले लेने में असमर्थ सीएम की छवि पनप रही है। कोटा में बसें भेजने के निर्णय पर सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी मगर चाटुकारों ने शुक्रवार की दोपहर को ही फ़ेसबुक पर इसे सरकार का ऐतिहासिक कदम बताकर 105 बच्चों को लाए जाने का आँकड़ा जारी करके बधाइयाँ देना शुरू कर दिया।

बाक़ी राज्यों ने भी कोटा से लाए हैं अपने यहाँ के छात्र

लेकिन सोशल मीडिया पर ही इसका प्रचण्ड विरोध शुरू हो गया कि कोटा ही क्यों? इस बाबत सरकार के मुखिया जयराम ठाकुर से शाम उनके रोज़ के बुलेटिन के बाद पत्रकारों ने सवाल पूछा कि कोटा से बच्चे लाए जाने को लेकर जो ख़बरें आ रही हैं, उनका क्या है। तो सीएम ने इसका खंडन करते हुए गोलमोल का जवाब देकर पल्ला झाड़ लिया। जबकि परिवहन विभाग के निदेशक जेएम पठानिया पहले ही बता चुके थे कि कितनी बसें जाएंगी।

मगर रात होते-होते फिर से पुष्टि हो गई कि बसें जा रही हैं और लाए जाने वालों का आँकड़ा 105 से 172 हो गया। अगर यही काम करना था तो सीएम क्या शाम के अपने संबोधन में कह नहीं सकते थे कि राजस्थान की सरकार ने हाथ खड़े कर दिए हैं, कोटा से हर राज्य अपने छात्रों को लाने में लगा है तो हम भी अपने यहाँ के छात्रों को लाने के लिए बसें भेज रहे हैं।

अगर सीएम साफ़ ये बात कहते तो क्या बवाल मचता? और ऐसा कहने से कौन सा घाटा हो रहा था जब गहलोत सरे आम ये कह रहे थे कि इस संबंध में बाक़ी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से उनकी बात हुई। बाक़ी राज्यों ने भी तो इसी कारण अपने यहाँ के छात्रों को लाने का इंतज़ाम किया था। आगे ट्वीट देखें।

सबसे अहम बात ये है कि वे कौन से चाटुकार हैं जिनके पास सरकार के प्रस्तावित प्लान पहले ही पोस्टर बनकर पहुँच जाते हैं और आधिकारिक घोषणा होने से पहले ही सोशल मीडिया पर फैल जाते हैं? जिस फ़ैसले को लेकर पूछे गए सवाल पर मुख्यमंत्री अनभिज्ञता जताते हैं, वह उन्हीं की पार्टी के लोगों द्वारा बाक़ायदा बधाई संदेशों के साथ वायरल किया पड़ा होता है।

कुलमिलाकर यह सरकार कॉन्फ़िडेंस की कमी से जूझती दिखाई देती है। मंत्रिमंडल पूरा नहीं है, जो हैं वे भी छाप छोड़ते नज़र नहीं आ रहे। 2017 में जब नया चेहरा प्रदेश में आया था तो जनता को उम्मीदें थीं। मगर जनता की उम्मीदों का शीघ्र ही यह पतन हो जाना और वह भी फ़ालतू के मुद्दों पर, भविष्य के लिए सुखद संदेश नहीं है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर से हैं और लंबे समय से हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। यह लेख उनकी फेसबुक टाइमलाइन से साभार लिया गया है।)

लॉकडाउन में बच्चों को लाने एसपी किन्नौर ने भेजे थे सरकारी कर्मचारी

शिमला।। जिस समय पूरे देश में लॉकडाउन है, उस समय कुछ लोग अपनी पहुँच का इस्तेमाल करते हुए नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। पहले काँगड़ा और मंडी के सांसद लॉकडाउन में दिल्ली से हिमाचल आए, अब किन्नौर के एसपी ने अपने बच्चों को दिल्ली से घर बुला लिया।

इस संबंध में पास की प्रति सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रही है। हिमाचल सरकार की ओर से जारी इस पास में एसपी के बच्चों का नाम लिखा है जिन्हें लाया जाना है और कारण बताया गया है संबंधी की मौत। लाने वालों में जिन दो लोगों का नाम है वे सरकारी कर्मचारी हैं। इनमें से एक पुलिसकर्मी ही है।

सोशल मीडिया पर इस पास को लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं कि कर्मचारियों को किस आधार पर निजी काम के लिए भेजा। (हमने बच्चों के नाम छिपा दिए हैं)

अब सवाल उठ रहे हैं कि अगर निजी वाहन पर सरकारी कर्मियों को एसपी साजू राम राणा ने निजी काम के लिए क्यों भेजा। बता दें कि एसपी के पीएसओ या उनके मातहत आने वाले कर्मचारी सरकारी काम ही कर सकते हैं। उन्हें अधिकारी अपने निजी कामों में इस्तेमाल नहीं कर सकते।

अभी ऐसी जानकारी सामने आ रही है कि कथित तौर पर पुलिस मुख्यालय ने इस संबंध में एसपी से जवाब माँगा है। मगर हिमाचल प्रदेश  के लोगों में इस मामले और अन्य लोगों द्वारा लॉकडाउन के उल्लंघन को लेकर ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है। दरअसल हिमाचल के कई परिवारों के अपने अन्य राज्यों में फँसे हुए हैं जिनके लिए डीजीपी हिमाचल सीताराम मरडी और सीएम जयराम ठाकुर ने कहा है- जहां हैं, वहीं रहें।

शराब पर हिमाचली जनता, मीडिया और सरकार के दोहरे मापदंड क्यों

प्रणव घाबरू।। लॉकडाउन के दौरान हिमाचल प्रदेश सरकार ने शराब की दुकानों को बंद रखने का फैसला किया है। कुछ देर के लिए नैतिकता को परे रख दें तो इस विषय पर गंभीरता से विमर्श करने की जरूरत है। इन दुकानों को बंद रखने का फैसला लेने के पीछे जो कारण बताए गए हैं वे बहुत अस्पष्ट हैं।

सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठाने लगे थे कि आख़िर क्या सोचकर शराब को ज़रूरी वस्तु बताते हुए ठेके खोलने का फ़ैसला किया सरकार ने। अख़बारों ने भी ऐसी सुर्ख़ियाँ लगाईं मानो सरकार ने ग़लत काम कर दिया हो। फिर सरकार ने भी प्रेशर में आकर शराब की दुकानें बंद रखने का फ़ैसला कर दिया।

ये वही सरकार है जिसने पिछली सरकार में एक परिवार द्वारा अपने हिसाब से बनाई गई आबकारी नीति में सुधार लाने की हिम्मत दिखाई थी और शराब के अत्यधिक बढ़े मूल्यों को सही स्तर पर लाने का फ़ैसला किया था। मगर सरकार के इसी फैसले से शराब के दाम कम होने की ख़बर को अख़बारों ने ऐसे पेश किया मानो जबरन सबको शराब पिलाई जानी हो। इसी दबाव में आकर सरकार ने अपना फ़ैसला पलटा और शराब महँगी कर दी थी।

कुछ अख़बारों द्वारा अजीब ढंग से सनसनी फैलाने और सरकार के बैकफ़ुट पर आने की बात समझ से परे है। अगर नैतिकता की इतनी ही चिंता है तो हिमाचल प्रदेश में शराब बेची ही क्यों जा रही है? महँगी शराब अच्छी और सस्ती शराब ख़राब कैसे हो जाती है? कोरोना काल में शराब की बिक्री अगर ग़लत है तो बाक़ी दौर में ठीक कैसे?

हिमाचल प्रदेश की सरकारों, मीडिया संस्थानों और जनता के इन्हीं दोहरे मापदंडों के कारण प्रदेशभर में शराब की कालाबाज़ारी हो रही है और साथ ही नशे के अन्य साधन भी पनप रहे हैं।

नैतिकता नहीं, व्यावहारिकता ज़रूरी
लॉकडाउन के दौरान शराब की बिक्री पर रोक के फ़ैसले से साफ दिखा कि सरकार ने सोशल मीडिया पर हुए हो-हल्ले के आगे घुटने टेक दिए। सरकार ने ये भी नहीं सोचा कि अगर शराब की दुकानें खुली रहतीं तो उससे क्या फायदा हो सकता था।

जीएसटी लागू होने के बाद से राज्यों के लिए शराब की बिक्री पर रोक लगाना महंगा सौदा साबित हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि जीएसटी लागू होने के बाद से राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता काफी हद तक कम हो गई है। सरकारों को टैक्स से मिलने वाले कुल राजस्व में से राज्यों का अपना राजस्व घट गया है।

शराब और पेट्रोलियम पदार्थ उन वस्तुओं में से हैं जिनपर राज्य सरकारों को अभी भी अपने टैक्स लगाने का अधिकार है। इसमें भी पेट्रोलियम उत्पादों के दाम अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करते हैं और उनपर राज्य सीमित मात्रा में ही टैक्स लगा सकते हैं। जबकि शराब ऐसी चीज़ है जो राज्य के लिए राजस्व यानी आमदनी का महत्वपूर्ण स्रोत है।

राज्य के खजाने में आने वाले पैसे का बड़ा हिस्सा शराब से होने वाली कमाई का ही होता है। यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि पिछले वित्त वर्ष में हिमाचल प्रदेश ने शराब की बिक्री से लगभग 1500 करोड़ रुपये की कमाई की थी और इस वित्त वर्ष के लिए उसने 1840 करोड़ रुपये के राजस्व का लक्ष्य रखा है।

संकट के इस दौर में राज्यों को ख़ुद जुटाना होगा पैसा
आज कोरोना के कारण अभूतपूर्व संकट खड़ा हो गया है। जो हालात पैदा हुए हैं, उनकी उम्मीद किसी ने भी नहीं की होगी। देश में डेढ़ अरब की आबादी लॉकडाउन के कारण घर पर है और उनमें भी लाखों लोग खाने और अन्य जरूरी चीज़ों के लिए पूरी तरह सरकार पर निर्भर हैं। ग़रीब और वंचित तबके की देखरेख का जिम्मा सीधे राज्य सरकारों पर आ चुका है जिससे वे भारी दबाव का सामना कर रही है।

राज्य कितना कर्ज ले सकते हैं, इसकी भी सीमा तय कर दी गई है। इस बात को लेकर भी अनिश्चितता है कि राज्यों को केंद्र से ग्रांट और जीएसटी में अपनी हिस्सेदारी की रकम कब मिलेगी। ऐसे में अपने यहाँ बढ़ रही मांग को पूरा करने के लिए राज्यों को अपने स्तर पर राजस्व जुटाने की नीतियां अपनानी चाहिए ताकि वहां से आए पैसे को ताकि आपात स्थिति से निपटने में खर्च किया जा सके।

कोविड 19 के कारण राज्य सरकारों को जनता के लिए पहले के मुकाबले बहुत ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ सकता है। ऐसे में इस तरह की नीतियां संकट से जूझने और राज्य की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने में मददगार साबित हो सकती हैं। अभी हिमाचल सरकार संकेत दे रही है कि आने वाले समय में कर्मचारियों का वेतन काटा जा सकता है। अगर सरकार अपने स्तर पर पैसा कमा रही होती तो उसके सामने ऐसी नौबत न आती।

जब वेतन कटेगा तो उसका नुक़सान कर्मचारियों के साथ-साथ सरकार को भी होगा। सैलरी कम मिलने से जब लोगों की परचेजिंग पावर कम होगी तो सरकार का राजस्व और घटेगा। फिर भी, सैलरी कटने से कर्मचारी तो परेशान होंगी मगर नेताओं और सत्ता में बैठे लोगों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। दो महीने की सैलरी दान करके जो हीरो बन रहे हैं, उनके टेलिफ़ोन बिल से लेकर हेल्थ सुविधाएँ तक फ़्री हैं और बिल भी रीइंबर्स हो जाते हैं। मगर क्या आम जनता और आम कर्मचारियों के पास अपने फ़ोन और बिजली बिल रीइंबर्स करवाने की सुविधा होगी?

अवैध कारोबार को मिल रहा बढ़ावा
ध्यान देने की बात यह है कि लॉकडाउन पीरियड के कारण शराब की बिक्री पर लगी रोक से एक और बड़ी समस्या उभर रही है। बहुत सारी जगहों पर प्रतिबंध के बावजूद कुछ ठेकेदार शराब को मुंहमांगे दामों पर बेच रहे हैं। सरकार भले ही आँखें मूँदकर बैठी रहे मगर जनता जानती है कि उनके इलाक़े में कौन-कौन शराब अवैध ढंग से मुहैया करवा रहा है।

इसके अलावा बहुत सारे लोगों ने घर पर देशी शराब निकालना शुरू कर दिया है। घर पर निकाली अवैध शराब लोगों का कितना नुक़सान कर सकती है, यह कल्पना से भी परे है। दरअसल, जो शराब ठेकों में बिकती है, वह किसी भी ब्रैड की क्यों न हो, उसमें एल्कॉहल की मात्रा तय मानकों के अनुरूप होती है। साथ ही वह इथनॉल ही होती है जबकि घर पर या अवैध ढंग से निकाली गई शराब में मीथेनॉल (ज़हरीला अल्कॉहल) की मात्रा अधिक हो जाती है। यह ज़हरीली शराब किडनी, लिवर, ब्रेन और अन्य अंगों को तुरंत नुक़सान पहुँचाती है। अगर मौत न भी हो तो अंधे होने से लेकर शरीर में कई तरह की स्थायी समस्याएँ हो जाती हैं।

वैध शराब की बिक्री बंद होने से प्रदेश में अवैध या मिलावट वाली ज़हरीली शराब की खपत बढ़ेगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। साथ ही कुछ लोग जो कालाबाज़ारी में लगे हैं, उससे सरकार को राजस्व का नुक़सान अलग से हो रहा है। इसलिए, सरकार को अपने फैसले पर एक बार फिर विचार करना चाहिए। इसलिए ज़रूरी है कि संकट के इस दौर में नैतिकता को छोड़ व्यावहारिकता अपनाई जाए।

(लेखक प्रणव घाबरू हिमाचल प्रदेश के पपरोला से हैं और दिल्ली हाई कोर्ट में अधिवक्ता हैं।)

कुल्लू: शिकारियों ने मार डाला भालू, पुलिस पर किया पथराव

कुल्लू।। हिमाचल प्रदेश में लॉकडाउन के बीच पेड़ों का कटान करने वाले और जीव-जंतुओं का शिकार करने वाले भी सक्रिय हो गए हैं। निरमंड के कुशवा और खरगा के बीच मावा खड्ड में कुछ लोगों ने एक भालू को मार दिया। जब पुलिस की टीम यहां पहुंची तो इन लोगों ने पथराव किया।

अभी यह पता नहीं चल पाया है कि हमला किसने किया। इस घटना में पुलिसकर्मियों को कुछ छोटें भी आने की खबर है। पुलिसकर्मी किसी तरह जान बचाकर वहां से भागे। पुलिस का कहना है कि अंधेरा होने के कारण शिकारियों को पकड़ा नहीं जा सका। हालांकि, मामला दर्ज कर लिया गया है।

डीएफओ लूहणी चंद्रभूषण शर्मा ने कहा है कि उन्हें सूचना मिली थी कि खड्ड में भालू मरा है। उन्होंने कहा कि विभागीय जांच भी शुरू है। उधर, इस संबंध में आनी के डीएसपी अनिल कुमार ने बताया है कि भालू के शव को बरामद कर लिया गया था और उसका पोस्टमॉर्टम करवाया गया है। इसके बाद घटना को अंजाम देने वालों की तलाश जारी है।

लॉकडाउन में दिल्ली से लौटे सांसदों पर शांता कुमार की टिप्पणी

धर्मशाला।। भाजपा के संस्थापक सदस्य और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने मंडी और कांगड़ा के सांसदों के लॉकडाउन के दौरान दिल्ली से हिमाचल लौटने पर टिप्पणी की है। पूर्व सांसद ने कहा है कि कानून सबके लिए बराबर होता है।

फेसबुक पर एक पोस्ट के शुरुआती हिस्से में शांता कुमार ने लिखा है, “कुछ मित्रों ने ठीक सवाल किया हमारे दो सांसदों के बारे में। इस बारे में मेरा स्पष्ट कहना है- कानून सब के लिए होता है और कानून निभाने के लिए होता है। उनका यह कहना है कि उन्होंने विधिवत अनुमति ली थी।”

वरिष्ठ भाजपा नेता लिखते हैं, “सभी कायकर्ता सावधान रहें क्योंकि ..बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी।” उन्होंने इस संबंध में ट्वीट भी किया है।

शांता कुमार ने तब्लीगी जमात के सदस्यों द्वारा दुर्व्यवहार को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने लिखा है,”तबलीग़ ज़मात के कारण लगभग आधे देश में बीमारी फैल गयी है। सैंकडों मरेंगे। हैरानी इस बात की है कि इनकी बदतमीज़ी अभी भी रूकी नहीं। स्वास्थ्य कर्मियों पर पत्थर बरसाये जा रहे हैं। मैं सरकार से कहूंगा बहुत सहन हो गया अब पानी सिर के ऊपर से निकल गया।अब तुरत इस ज़मात पर पाबंदी लगाई जाए।”

डीपीआरओ मंडी ने जारी की थी कोरोना पर भ्रामक हेडिंग वाली खबर

मंडी।। जिले के जोगिंदर नगर में कोरोना संक्रमण का मामला पाए जाने की अफवाह फैलने के तार डीपीआरओ ऑफिस मंडी से जुड़ते नजर आ रहे हैं। गौरतलब है कि एक पोर्टल ने मॉकड्रिल की खबर का शीर्षक ऐसे लगाया था जैसे वाकई कोई मामला पाया गया हो। अंदर भी बाद में लिखा गया था कि यह मॉकड्रिल हो रही थी, न कि असली मामला पाया गया।

पढ़ें- पोर्टल ने फैला दी मंडी में कोरोना फैलाने की झूठी खबर

पोर्टल का कहना था कि उनके ट्रेनी रिपोर्टर की गलती को वजह से ऐसी हेडिंग लगी है। अब साफ हुआ है कि हिमाचल प्रदेश जनसंपर्क विभाग की ओर से भी गड़बड़ी हुई है। डिस्ट्रिक्ट पब्लिक रिलेशन ऑफिसर मंडी की ईमेल आईडी से पत्रकारों को प्रकाशन के लिए मॉकड्रिल की जो खबर भेजी गई थी, उसमें एक शीर्षक था-

“जोगिंदर नगर के डोहग में सामने आया कोरोना पॉजिटिव मामला”

स्क्रीनशॉट देखें-

बता दें कि डीपीआरओ के काम में जिले में हुए सरकारी कार्यक्रमों की खबरें मीडिया तक पहुंचाना भी शामिल है। इसके लिए वे संस्थानों के पत्रकारों को प्रकाशन के लिए प्रेस रिलीज वगैरह भेजते हैं। हालांकि, मीडिया संस्थानों को कोई भी खबर सावधानी से अपनी जिम्मेदारी पर छापनी होती है मगर यहां बड़ी लापरवाही डीपीआरओ ऑफिस की ओर से भी हुई है।

डीपीआरओ मंडी के नाम से फेसबुक प्रोफाइल भी है जिसपर ऐसी खबरें शेयर की जाती हैं। वहां भी इस खबर को पहले इसी हेडिंग के साथ डाला गया था, बाद में उसमें मॉकड्रिल ऐड किया गया। एडिट हिस्ट्री चेक करने पर यह बात साफ हो जाती है।

इसमें भी मॉकड्रिल की बात बाद में लिखी गई है

इस विभाग का काम समाज में जागरूकता लाना भी है मगर अफसोस, इस मामले में यह खुद फेक न्यूज फैलाने का स्रोत बन गया। विभाग को अति सावधानी बरतने की जरूरत है और कर्मचारियों को ट्रेनिंग देने की भी आवश्यकता है। विभाग का काम सही जानकारी लोगों तक पहुंचना है, सनसनीखेज शीर्षक देना नहीं।

हिट लाने के लिए पोर्टल ने फैला दी मंडी में कोरोना की अफवाह

मंडी।। कोरोना संकट के इस दौर में सोशल मीडिया पर उभर आए पेजों और फर्जी न्यूज पोर्टलों ने भी लोगों के बीच भ्रम फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। ऐसे ही एक पेज ने सोशल मीडिया पर खबर फैला दी कि जोगिंदर नगर में कोरोना संक्रमण का मामला पाया गया है। इस पोर्टल ने खबर के शीर्षक में भी यही लिखा और फेसबुक पर शेयर करते समय भी। अंदर एक जगह बताया कि यह सब मॉक ड्रिल का हिस्सा था।

इस मामले में अपडेट पढ़ें-

डीपीआरओ मंडी ने जारी की थी कोरोना पर भ्रामक हेडिंग वाली खबर

अब इस पोर्टल की आधिकारिक ईमेल आईडी के माध्यम से हमें एक संदेश प्राप्त हुआ है। इस संदेश में कहा गया है कि यह हेडिंग पब्लिसिटी के लिए नहीं लगाया गया था बल्कि इलाके से उनके ट्रेनी रिपोर्टर की गलती से लगा है।

क्या है मामला
दरअसल शनिवार को मंडी जिले के जोगिंदर नगर में प्रशासन ने कोरोना के दौरान किसी आपात स्थिति से निपटने की तैयारियों की समीक्षा के लिए मॉक ड्रिल का आयोजन किया। इसी की खबर को इस पोर्टल ने गलत ढंग से पेश किया। लोगों ने इसकी खबर को शेयर करना शुरू कर दिया।

लोग इस खबर को सच समझकर शेयर करने लगे

क्लिक करने पर कई जगह पूरी खबर नहीं खुल पा रही थी क्योंकि सिक्यॉरिटी वॉर्निंग आ रही थी। सोशल मीडिया पर यह खबर तेजी से फैली। इस कारण जोगिंदर नगर में पैनिक की स्थिति पैदा हो गई।

 

देखते ही देखते सोशल मीडिया पर शेयर होने लगी खबर

माना जा रहा है कि इस पोर्टल ने खबर का ऐसा शीर्षक जानबूझकर लगाया था। संभवत: यह कदम पैनिक फैलाकर लोगों से क्लिक लेने के लिए उठाया गया था। हालांकि, पोर्टल ने कहा है ऐसा नहीं है और ट्रेनी रिपोर्टर की गलती के कारण ऐसा हुआ है।

हालांकि, अब मामला उठने पर पोर्टल ने अंदर की खबर बदल दी है। पहले अंदर भी इस तरह से दिया था शीर्षक

खबर में पहले पैरा में भ्रामक जानकारी दी गई थी। दूसरे पैराग्राफ में बताया गया कि बात मॉकड्रिल की हो रही है।

दूसरे पैरा में लिखा गया कि यह असल घटना नहीं बल्कि मॉकड्रिल को लेकर गढ़ी गई कहानी है।

फेसबुक पर शेयर करते समय भी मर्यादा का ख्याल नहीं रखा गया और लोगों में डर पैदा करने की कोशिश की गई।

फेसबुक पर शेयर की गई खबर के साथ भी भ्रामक जानकारी लिखी गई

गौरतलब है कि अक्सर अखबार इस तरह की हेडिंग लगाते हैं ताकि लोग आकर्षित हों। वे स्कूलों में एनएसएस के छात्रों की मॉकड्रिल और भूकंप या आग आदि से बचने के लिए की जाने वाली ड्रिल के शीर्षक भी ऐसे लगाते हैं। मगर चूंकि अखबारों की खबरों को सोशल मीडिया की तरह शेयर नहीं किया जाता और विस्तृत खबर हेडिंग के ठीक नीचे होती है, इसलिए उसमें भ्रम की स्थिति जल्द दूर हो जाती है।

मगर सोशल मीडिया पर अधिकतर लोग हेडिंग देखकर ही अधारणना बनाते हैं, वे खबरों के लिंक पर टैप करें और अंदर पढ़ें, यह जरूरी नहीं है। ऐसे में बहुत सारे पोर्टल ऐसे शीर्षक लगाते हैं कि जिनका अंदर के कॉन्टेंट से कोई लेना देना नहीं होता। यह एक तरह से फेक न्यूज फैलाना ही है।

अभी तक मिली जानकारी के अनुसार प्रशासन इस खबर को लेकर जानकारी जुटा रहा है और इसके बाद कार्रवाई करने पर विचार कर रहा है।

हमीरपुर में सैम्पल लेने गए स्वास्थ्यकर्मियों पर थूकने की कोशिश

हमीरपुर, एमबीएम न्यूज नेटवर्क।। कोरोना वायरस के दो मामले सामने आने के बाद हमीरपुर में प्रशासन और हरकत में आ गया है। इस दौरान वॉर्ड नम्बर 1 बड़ू में एक शख्स ने कथित तौर पर स्वास्थ्य विभाग की टीम पर थूकने की कोशिश की। स्वास्थ्यकर्मी थूक के सम्पर्क में आने से बच गए। बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश से सम्बन्ध रखने वाले इस शख्स ने शराब पी थी।

स्वास्थ्य विभाग की इस स्क्रीनिंग टीम को डॉक्टर नेहा लीड कर रही थीं। उन्होंने किसी तरह से इस व्यक्ति से खुद को और अपनी टीम को बचाया। फिर पुलिस को सूचित किया गया। मगर जब तक पुलिस के जवान मौके पर पहुंच पाते, तब तक व्यक्ति ने खुद को घर के अंदर बंद कर लिया। यूपी से बताया जा रहा यह शख्स किराए के कमरे में रहता है।

इमेज: MBM News Network

इस घटना की जानकरी डॉक्टर तरह ने क्षेत्र में अन्य जगह कार्य कर रही स्वास्थ्य विभाग की टीम को दी। इसके बाद डॉक्टर सत्येंद्र सिंह डोगरा मौके पर पहुंचे। डॉ सत्येंद्र सिंह डोगरा ने बताया कि यह व्यक्ति जुकाम और बुखार से पीड़ित है और इसमें लक्षण नजर आ रहे थे। उन्होंने बताया कि इस शख्स ने शराब भी पी रखी थी।

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जब स्वास्थ्य विभाग की टीम ने इसके सैंपल लेने चाहे तो उसने टीम पर थूक दिया। महिला डॉक्टर नेहा ने किसी तरह से अपनी टीम और खुद को बचाया, बाद में भी उसने सैंपल नहीं लेने दिया।
पुलिस अधीक्षक अर्जित सेन ठाकुर से बात की गई तो उन्होंने कहा कि सूचना मिली है, अतिरिक्त पुलिस बल मौके पर भेजा गया है।

(यह खबर सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

लॉकडाउन के बीच दिल्ली से घर पहुँचे सांसद रामस्वरूप शर्मा, उठे सवाल