शिमला।। कुछ समय पहले तक कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के मामले में बेहतर करता दिख रहा हिमाचल अब अचानक महामारी की चपेट में आ गया है। पहले जहां लोकडाउन के बीच जिस तरह कोविड पास और बाद में पंजीकरण की मदद से सरकार को ऐक्टिव केस फाइंडिंग में मदद मिली थी, उससे प्रदेश में संक्रमण की दर को काबू में रखने में मदद मिली थी। मगर अब मामला हाथ से बाहर जाता दिख रहा है।
अब तक प्रदेश में संक्रमितों का कुल आंकड़ा 13,191 पहुंच गया है। इनमें सक्रिय मामले 3,849 हैं। लेकिन चिंता की बात है मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ना। गुरुवार को इस खबर को लिखे जाने तक 8 लोगों की जान जा चुकी है। इसके साथ प्रदेश में अब तक 145 कोरोना संक्रमितों की मौत हो चुकी है। साफ है कि वजह जो भी हो, मामला खराब होता जा रहा है।
इन हालात में जहां सरकार की प्राथमिकता स्थिति पर नियंत्रण हासिल करने की होनी चाहिए, वहां पूरा अमला अटल रोहतांग सुरंग के उद्घाटन में मशगूल नजर आ रहा है। पीएम कब आएंगे, कहाँ चॉपर उतरेगा, कौन शामिल होगा, कंगना आएगी या नहीं, पीएम कहाँ रात गुजारेंगे; इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द चर्चा हो रही है। अब तो बात यह उठने लगी है कि पहले सख्ती बरत रही सरकार ने बॉर्डर पूरी तरह इसीलिए खोले ताकि वह अटल रोहतांग टनल पर ध्यान फोकस कर सके।
पीएम नरेंद्र मोदी तीन अक्टूबर को इस सुरंग का उद्घाटन करने वाले हैं। उधर सीएम ने टनल के उद्घाटन के लिए पीएम के प्रस्तावित दौरे की तैयारियों को लेकर गुरुवार को कुल्लू में जिला अधिकारियों के साथ बैठक की। मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘प्रदेशवासी अटल टनल का उद्घाटन कार्यक्रम लाइव देख सकेंगे। सभी जिला मुख्यालयों में बड़ी-बड़ी स्क्रीनें लगाई जाएंगी।’
सीएम ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया जाएगा। इस बीच कोरोना के बढ़ते मामलों से कैसे निपटा जाएगा, इस बारे में सरकार के पास कोई ठोस योजना नहीं दिखती। विपक्ष भी इसे लेकर हमलावर है।
कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश में अमानवीय व्यवहार की सीमाएं पार हो गई हैं। एक शख्स ने बन्दर के शव की पिटाई की और कॉमेडी करते हुए वीडियो बनाया। यह वीडियो वायरल हो गया है।
और तो और, कुछ पोर्टल भी इसे अमानवीय कैप्शन के साथ शेयर कर रहे हैं। और कुछ लोग मजे लेते हुए शेयर भी कर रहे हैं। समाज पूरी तरह से संवेदनहीन हो चुका है।
गौरतलब है कि यह पशु क्रूरता है वन्य जीव संरक्षण अधिनियम समेत कई धाराओं के तहत दण्डनीय अपराध है। इन हिमाचल की ओर से इस वीडियो की शिकायत संबंधित विभागों से की जा चुकी है।
शिमला।। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा है कि कोरोना वायरस के मामलों में देश की तरह यहां भी लगातार बढ़ोतरी हो रही है। उन्होंने कहा, “मामलों में और भी ज्यादा बढ़ोतरी हो सकती है और ज्यादा सावधानी के साथ काम करने की जरूरत है। आने वाले समय में और अधिक गंभीरता बरतने की जरूरत है।”
मुख्यमंत्री ने कहा, “इस बात को लेकर खेद है कि बहुत सारे लोगों की कोरोना वायरस के कारण मौत हुई है। वह उनके परिजनों से भी गहरी संवेदना जताते हैं। ईश्वर उनके परिवार को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें।”
सीएम ने शनिवार शाम को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रदेश के लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि कोरोना के मामले आशंका से बहुत ज्यादा बढ़े हैं। सीएम ने कहा, “दो-तीन चीजों पर विचार करने की जरूरत है। अनावश्यक रूप से भीड़ वाले इलाकों में जाने से बचना होगा। किसी को भी अगर लक्षण दिखते हैं, तुरंत डॉक्टर के पास रिपोर्ट करें।”
उन्होंने कहा, “जब लगातार मामलों में बढ़ोतरी हो रही है तो अस्पतालों में भी मरीजों को रखा जा रहा है। वे लोग जिनकी उम्र ज्यादा है, शूगर या दिल की बीमारी के मरीज हैं, जिनको अस्पताल ले जाना जरूरी है, वे अस्पताल जाएंगे। जिनमें लक्षण नहीं हैं और कोरोना पॉजिटिव हैं, वे होम आईसोलेशन में रहेंगे। सीएम ने कहा कि भीड़ वाले इलाके में कम से कम जाएं। अगर घर में कोई कोविड का मरीज आता है तो डॉक्टर की सलाह लें।”
सीएम ने कहा कि भीड़ वाले इलाके में कम से कम जाएं। अगर घर में कोई कोविड का मरीज आता है तो डॉक्टर की सलाह लें।
इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश में कोविड-19 से अब तक 113 लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच नेरचौक मेडिकल कॉलेज में तैनात डॉक्टर प्रदीप बंसल का भी चंडीगढ़ में देहांत हो गया। कम्यूनिटी मेडिसन विभाग के एचओडी डॉक्टर बंसल कोरोना संक्रमित पाए गए थे। इसके बाद आईजीएमसी में पांच दिन उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया फिर दो दिन पहले चंडीगढ़ के निजी अस्पताल शिफ्ट किया गया था।
प्रदेश में दिनोदिन कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं और चूंकि प्रदेश की सीमाएं पूरी तरह खुल चुकी हैं और अन्य पाबंदियां भी नरम पड़ी हैं, यह आशंका जताई जाने लगी है कि अभी केस और तेजी से बढ़ेंगे। अब कोरोना से मरने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। वे लोग ज्यादा खतरे में हैं जो पहले से हाई रिस्क में हैं।
चूंकि कोरोना हर व्यक्ति पर अलग असर डाल रहा है, ऐसे में किसी भी तरह का रिस्क नहीं लिया जा सकता। कुछ लोग मामूली जुकाम से पीड़ित होकर ठीक हो जा रहे हैं तो कुछ में लक्षण भी नहीं दिख रहे। जबकि कुछ लोग जो पहले स्वस्थ थे, वे गंभीर रूप से बीमार हो जा रहे हैं। कइयों की जान भी जा रही है। ऐसे में चिंता जताई जा रही है कि स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और पैरामेडिकल स्टाफ की रिटायरमेंट पर लगी रोक कितनी सही है?
मेडिकल स्टाफ की कमी न हो, इसके लिए रिटायरमेंट पर रोक लगाना तात्कालिक उपचार तो है मगर स्थायी समाधान नहीं। मार्च के बाद से लगातार कई बार रिटायरमेंट को टाला गया है। चूंकि हिमाचल में रिटायरमेंट की उम्र 58 साल है, ऐसे में सभी लोग वे हैं जो हाई रिस्क एज (60 साल या इससे अधिक) के करीब हैं। यानी वे भी ज्यादा खतरे में हैं। इनमें भी कई लोग वे हैं जो डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, थायरॉइड और अन्य कई बीमारियों से जूझ रहे हैं।
लगातार अस्पतालों और कोविड सेंटरों में लगने वाली इनकी ड्यूटी इन्हें कभी भी कोरोना संक्रमित कर सकती है और ऐसी स्थिति में इनकी जान को भी खतरा हो सकता है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों में चिंता का माहौल है कि क्यों नहीं सरकार हाई रिस्क वाले कर्मचारियों को रिटायर कर उनकी जगहों पर क्रमबद्ध तरीके से कोई भर्ती करती है। अधिकारियों के पदों को प्रमोशन से भरा जा सकता है और नए कर्मचारी भरने के लिए एक पारदर्शी प्रक्रिया बनाकर भर्ती की जा सकती है।
ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वैक्सीन मिलने और उसे सभी लोगों तक पहुंचाने जाने तक कोरोना संकट खत्म नहीं होगा। तो क्या तब तक हाई रिस्क वाले कर्मचारियों के भरोसे ही अस्पताल चलाए जाएंगे? ऊपर से कोरोना से जान गंवाने वाले स्वास्थ्यकर्मियों का सरकार कोई हिसाब नहीं रख रही है। यह दिखाता है कि सरकारें इस संबंध में जरा भी विचार नहीं कर रही हैं।
यह मुद्दा न तो संसद में उठा न हिमाचल में हाल ही में संपन्न विधानसभा सत्र में कि सरकार के पास कोरोना के कारण रोककर रखे गए कर्मचारियों को रिटायर करने और उनकी जगह भरने को लेकर क्या योजना है।
आई.एस. ठाकुर।। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का विवादों से नाता रहा है। जिस शख्स को कांग्रेस ने लोकसभा में अपने नेतृत्व की जिम्मेदारी दी है, वह अपनी टिप्पणियों के कारण कई बार अपनी ही पार्टी को शर्मिंदा कर चुके हैं। जोश-जोश में वह कई बार ऐसी बातें कह चुके हैं कि या तो उन्हें अपनी बातों पर खेद जताना पड़ा या फिर लोकसभा अध्यक्ष को उनकी टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटाना पड़ा।
संसद के अंदर ही नहीं, बाहर भी वह पार्टी के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। चीन को लेकर उन्होंने एक ट्वीट कर दिया था, जिससे उनकी काफी आलोचना हुई थी। फिर खबर आई थी कि पार्टी ने अधीर रंजन से वह ट्वीट डिलीट करवाया। यह सवाल शुरू से उठ रहे थे कि जो नेता धैर्य, विवेक और जिम्मेदारी से बात नहीं कर सकता, आखिर क्यों कांग्रेस ने उसे लोकसभा में अपनी टीम का नेतृत्व सौंपा। मगर अब, जबसे उन्होंने केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर पर अमर्यादित टिप्पणी की, पार्टी के अंदर से ही मांग उठने लगी है कि अधीर की जगह किसी और को यह जिम्मेदारी दी जाए।
अनुराग ठाकुर भी विवादों से अछूते नहीं रहे हैं। जहां तक विवादित टिप्पणियों की बात है, वह भी इन्हें लेकर मीडिया में सुर्खियां बटोर चुके है। चाहे वह पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान ‘गोली मारो….’ वाला नारा हो, शिमला के अनाडेल में सेना के खिलाफ ‘फ्री अनाडेल’ अभियान चलाना हो या फिर एक चुनावी जनसभा में बंदर के खिलौने की तुलना कांग्रेस के नेता वीरभद्र सिंह से करना हो। यह भी कोई आदर्श आचरण नहीं है। मगर अधीर रंजन चौधरी ने अनुराग की टिप्पणियों से विचलित होकर संसद में जो कहा, उसने तो सारी हदें ही पार कर दीं।
अधीर रंजन चौधरी ने अनुराग के लिए जो शब्द इस्तेमाल किए, वे बेहद आपत्तिजनक हैं। उनका यहां जिक्र नहीं किया जा सकता और न ही उस वीडियो को लगाया जा सकता है। कारण यह है कि संसद या विधानसभा आदि की कार्यवाही के दौरान अगर स्पीकर किसी बात, टिप्पणी आदि को हटा दें तो उसका कहीं और यथावत जिक्र नहीं किया जा सकता। पत्रकार भी अपनी रिपोर्टों में उस वक्तव्य या टिप्पणी का जिक्र नहीं कर सकते।
इस नियम को बनाने का मकसद यह था कि संसद की मर्यादा बनी रहे और अगर कोई ‘असंसदीय’ शब्द कहा जाए तो उसकी बात किसी भी तरह जनता तक न पहुंचे। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि संसद किसी भी लोकतंत्र के शीर्ष संस्थानों में से एक है। ऐसे में वहां होने वाली किसी भी हल्की, गलत या गैरजरूरी या देश के लिए खतरे वाली बात का पूरे देश पर असर पड़ सकता है।
‘असंसदीय’ भाषा
जिस दौर में लाइव प्रसारण की सुविधा नहीं थी और पत्र-पत्रिकाएं आदि ही सदनों की कार्यवाहियों को प्रकाशित किया करते थे, उनके लिए संभव होता था कि इन टिप्पणियों को रिपोर्ट न किया जाए। मगर अब सदनों की कार्यवाहियों का लाइव प्रसारण होता है और उसके वीडियो को डिजिटल प्लैटफॉर्म पर भी डाला जा सकता है। इसलिए भले ही स्पीकर आपत्तिजनक शब्दों को कार्यवाहियों से हटा दें, उन्हें वीडियो से नहीं हटाया जा सकता। समाचार चैनल और पोर्टल आदि हटाए गए हिस्से का प्रसारण नहीं करते मगर सोशल मीडिया पर लोग उन्हीं हिस्सों को किसी खास मकसद से वायरल करते रहते हैं।
आज कुछ लोगों ने अधीर रंजन बनाम अनुराग ठाकुर बहस को बंगाल बनाम हिमाचल की लड़ाई बना दिया है। ऐसी नौबत न आए, इसीलिए आपत्तिजनक टिप्पणियों को कार्यवाही से हटाए जाने का प्रावधान था। यह एक उदाहरण है कि कैसे एक टिप्पणी समाज, देश में विभाजन पैदा कर सकती है। यह बताता है कि जब स्पीकर द्वारा टिप्पणियों को हटाने का कोई मतलब नहीं रह गया है, तब कैसे नेताओं और सांसदों को खुद अपनी जिम्मेदारी समझकर अपनी जुबान संयमित रखनी चाहिए।
संसद ने 2012 में बाकायदा एक लिस्ट छापी थी, जिसमें असंसदीय शब्दों का जिक्र था, जिनका इस्तेमाल संसद में दूसरे नेताओं के लिए नहीं किया जा सकता। ये शब्द अनपार्ल्यामेंट्री या असंसदीय माने जाते हैं। इनमें से कुछ शब्द हैं- बदमाश, गुंडा, अंधा, बहरा, डकैत, अली बाबा और चालीस चोर, झूठा, धोखेबाज, महिला सांसद को डार्लिंग या अनपढ़ सांसद को अंगूठाटेक कहना। ये शब्द पढ़कर समझा जा सकता है कि कैसे किसी और के लिए किसी भी तरह का अपमानजनक शब्द कहना असंसदीय होता है। फिर भी आए दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता एक-दूसरे पर हल्की टिप्पणियां करते हैं।
इसलिए, यह सांसदों या विधायकों की ही नहीं, राजनीति में आने वाले हर शख्स की जिम्मेदारी है कि वह कहीं पर भी ‘असंसदीय’ भाषा इस्तेमाल न करे। न अपने सोशल मीडिया पर, न टीवी चैनलों पर और न राजनीतिक सभाओं में। क्योंकि आपकी ये टिप्पणियां पूरा देश देखता है और फिर आपके नक्शे कदम पर चलता है। हो सकता है कि आप जानबूझकर एजेंडा देकर राजनीतिक लाभ बटोरना चाहते हों या अपने समर्थकों को एक विषय देना चाहते हों; मगर इस तरह का आचरण देश के भविष्य के लिए ठीक नहीं। बहस तथ्यों और तर्कों के साथ की जानी चाहिए, गालियों या लांछनों के साथ नहीं।
(ये लेखक के निजी विचार हैं, उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)
आई.एस. ठाकुर।। किसी महापुरुष ने कहा था- हिपॉक्रसी की भी सीमा होती है। मगर असल बात ये है कि हिपॉक्रसी यानी पाखंड की कोई सीमा नहीं होती। यही बात आजकल कंगणा रणौत और उनका समर्थन क रहे नेताओं, लोगों और खासकर हिमाचल वासियों में देखने को मिल रही है।
कंगना रणौत एक सफल अभिनेत्री हैं और शायद ही कोई होगा जो उनके अभिनय का मुरीद न हो। इस बात में भी कोई शक नहीं कि बॉलिवुड में प्रवेश के बाद आगे का सफर उन्होंने अपने दम पर तय किया है और जिस मुकाम पर वह पहुंची थीं, उसका पूरा श्रेय उन्हीं को जाता है। वह सेल्फ मेड लेडी हैं और एक उदाहरण भी कि जिस जगह सितारों के बच्चों को आराम से काम मिल जाता है, वहां पर कैसे आप प्रतिभा और धैर्य के दम पर अपना मुकाम बना सकते हैं।
मगर पिछले कुछ समय से कंगना ने जिस तरह के बयान देना शुरू किया, खासकर सोशल मीडिया हैंडल्स पर उनके कॉमेंट आए, वे विवादों को जन्म देते गए। बीच-बीच में उनकी बहन रंगोली की ओर से की गई टिप्पणियां भी चर्चा में आती रहीं। अपनी बात रखने में कोई बुराई नहीं और दूसरों की आलोचना या निंदा करना भी एक हद तक ग़लत नहीं। मगर बात तब गलत हो जाती है जब आप इसी में जुटे रहें और आरोप लगाते समय यह भी ध्यान न रखें कि आप जो कह रहे हैं, वह सही है या नहीं।
कंगना रणौत Image Courtesy: Kangana Ranaut
यह हिपॉक्रसी नहीं तो और क्या है?
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद से कंगना ने जो मन में आया, वह कहना शुरू कर दिया। उनकी भाषा भी दिन-ब-दिन खराब होती चली गई। अब तो ऐसा लग रहा है कि कंगना के खुद सोशल मीडिया पर प्रत्यक्ष आने से पहले ‘टीम कंगना’ के नाम से जो ट्वीट आदि किए जाते थे, वे वास्तव में उनकी टीम के नहीं, खुद के अपने ही विचार होते थे।
कंगना ने हाल के दिनों में ऐसी टिप्पणियां की हैं जो शिवसेना नेता संजय राउत की घटिया भाषा से भी गई-गुजरी हैं। नेताओं को बदतमीजी से संबोधित करना, इंडस्ट्री के लोगों पर आरोप लगाना, उनके प्रति अपमानजनक टिप्पणियां करना… यह किसी भी हाल में सही नहीं है। फिर भी लोग उन्हें एक योद्धा की तरह सम्मान दे रहे हैं और हिमाचल के लोग तो इसे अपनी अस्मिता से जोड़ रहे हैं।
पिछले कुछ समय से कंगना उसी राह पर चल रही हैं जिस राह पर अक्षय चले थे। वह जानती हैं कि देश, देशभक्ति, देशप्रेम, हिंदू गौरव आदि जैसे विषयों फिल्में बनाना फायदे का सौदा है। इसीलिए मणिकर्णिका मूवी के बाद वह अयोध्या पर मूवी बनाने का एलान कर चुकी हैं। मगर अक्षय ने देशभक्ति की फिल्में बनाने तक ही खुद को सीमित रखा है। उन्होंने कभी उस तरह से आपत्तिजनक बातें नहीं कीं, जैसी बातें कंगना कर रही हैं। कंगना जानती हैं कि किन विषयों पर बात करना आज तुरंत आपको सुर्खियों में ला सकता है।
कंगना खुद को सबसे बड़ी देशभक्त, हिंदू संस्कृति की रक्षक और ‘क्षत्राणी’ बताने में जुटी हुई हैं। वह बता रही हैं कि वह अकेली बहादुर हैं जो गलत, अन्याय, बुराई और ‘निरंकुश शासन’ से लोहा ले रही हैं। मगर उनकी अधिकतर बातें बेहद छिछली और वाहियात हैं। और ये पसंद भी उन्हीं को आ सकती हैं जो खुद छिछले हों, जिनकी समझ का दायरा संकुचित हो। कंगना के आचरण और उनकी बातों में विरोधाभास है। ऐसा विरोधाभास जो बताता है कि या तो उनके साथ कोई समस्या है या फिर वह पाखंडी हैं, हिपॉक्रसी से भरी हुई हैं।
Image Courtesy: Kangana Ranaut
बिना सबूत आरोप लगाना कितना सही?
कंगना आज कहती हैं कि उन्होंने अपने दम पर जगह बनाई है, उन्होंने इंडस्ट्री को फेमिनिज़म सिखाया और उनसे पहले अभिनेत्रियों को हीरो के साथ सोने पर रोल मिलते थे। वह उर्मिता मातोंडकर को सॉफ्ट पॉर्न स्टाकर करके उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश करती हैं। उन्होंने पिछले कुछ दिनों में कई लोगों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। और मीडिया उन्हें वेरिफाई किए बिना तवज्जो दिए जा रहा है और जनता भी यह मान बैठी है कि जो कंगना कह रही हैं, वह सही है। लेकिन आरोप तो आरोप होते हैं। क्या कंगना रणौत और उनके समर्थक भूल गए कि आदित्य पंचोली की पत्नी ने उनपर क्या आरोप लगाए थे? वे क्या भूल गए कि अध्ययन सुमन ने उनपर कैसे-कैसे आरोप लगाए थे?
कंगना रणौत खुद एकतरफा आरोपों को झेल चुकी हैं। ऐसे में उन्हें तो इस मामले में सजग होना चाहिए। मगर अफसोस, वह खुद लगातार आरोप लगाती जा रही हैं। आज वह संस्कृति की सबसे बड़ी पैरोकार खुद को बता रही हैं। जबकि ज्यादा समय नहीं हुआ है जब कंगना शादीशुदा और दो बच्चों के पिता ऋतिक रोशन को अपना ‘सिली एक्स’ बता रही थीं। यह कोई आरोप नहीं है बल्कि कंगना ने खुद इस बात को साबित करने के लिए जमीन-आसमान एक दिया था कि ऋतिक का उनके साथ ‘अफेयर’ रहा था। क्या यह व्यवहार नैतिकता भरा था? क्या ‘हिंदू क्षत्राणियां’ इस तरह का व्यवहार करती हैं? यह हिपॉक्रसी नहीं तो और क्या है?
कंगना कह रही हैं कि बीएमसी ने उनका ऑफिस का हिस्सा तोड़कर उनका एक तरह से ‘रेप’ किया है। रेप जैसे अपराध की तुलना किसी और बात से करना बहुत ही शर्मनाक और हल्की बात है। कंगना यह तो कह रही हैं कि बीएमसी ने उनका ‘मंदिर’ तोड़ दिया, मगर वह यह क्यों नहीं बतातीं कि इसका निर्माण वैध था या नहीं। बीएमसी ने 2018 में भी इस संबंध में कंगना और उस इमारत के अन्य लोगों को नोटिस जारी किया था। यह सही है कि बीएमसी ने जिस समय यह कार्रवाई की, वह उसकी सिलेक्टिव अप्रोच को दिखाता है। मगर नैतिकता की बात कर रही कंगना को यह बताना चाहिए कि यह निर्माण नियमों के अनुसार था या नहीं? जब जांच हो ही रही है तो यह जांच भी होनी चाहिए कि अगर कंगना का निर्माण अवैध था तो कैसी मिलीभगत या दबाव था जो अब तक कार्रवाई नहीं की गई थी।
बीएमसी ने जो किया, वह बताता है कि कैसे अधिकारी पहले मिलीभगत करके चुप बैठे रहते हैं और फिर कभी भी राजनीतिक कारणों से जाग जाते हैं।
नेताओं की हिपॉक्रसी महाराष्ट्र बीजेपी तो इस पूरे मामले को लेकर बैकफुट पर है क्योंकि कंगना ने मुंबई को पीओके आदि कहकर वहां के लोगों को नाराज किया है। बीजेपी स्थानीय लोगों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती। मगर हिमाचल बीजेपी ने तुरंत इस विषय को ‘हिमाचल की बेटी’ होने से जोड़ा। शिमला में अप्रासंगिक होने लगे कुछ नेताओं और उनके पुत्रों ने तो रैलियां तक निकाल दीं। इनकी लोगों की ऐसी सक्रियता अब कोटखाई के गुड़िया रेंप एंड मर्डर केस को लेकर नहीं दिखती, जिसकी सीबीआई जांच को लेकर अब तक सवाल उठ रहे हैं।
हिमाचल बीजेपी की नेत्रियां कंगना के लिए प्रियंका का घर तोड़ने तक की धमकी देती हैं, बड़ी-बड़ी बातें करती हैं मगर प्रदेश के ही दूसरे हिस्से में किसी बेटी के परिजन कहते हैं कि उनकी बेटी की ससुराल वालों ने हत्या कर खुदकुशी का रंग दे दिया है तो वे चुप रहती हैं। छोटा सा पहाड़ी प्रदेश रोजगार सृजित नहीं कर पा रहा, कोरोना संकट के कारण अब हालात और खराब हो गए हैं, एएचएआई के तहत आने वाली सड़कों की मेनटेनेंस न होने से वे जानलेवा बन गई हैं, मगर हिमाचल के सांसद इन विषयों को संसद में नहीं उठाते। वे संसद में बोलते हैं- कंगना को सुरक्षा देने के लिए प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जी का धन्यवाद।
आज ‘हिमाचल की बेटी’ की रट लगाए ये नेता भूल गए कि इसी बेटी ने उनके सामने कैसे शिगूफा किया था और पूरे देश में यह संदेश दिया था कि वह हिमाचल में सुरक्षित नहीं। जब बागवानों ने चमगादड़ भगाने के लिए पटाखे छोड़े तो इसका भी कंगना की ओर ये यह कहते हुए माइलेज लेने की कोशिश की गई उनके घर के पास गोली चलने की आवाज आई है। जब पुलिस ने जांच की तो पाया कि ऐसा कुछ नहीं था।
फिर भी, केंद्र ने जानबूझकर कंगना को सुरक्षा दी ताकि महाराष्ट्र में अपनी पूर्व सहयोगी शिवसेना को निशाने पर ले सके जो इस बार उसके साथ न होकर कांग्रेस और एनसीपी के साथ सत्ता में है। मगर कंगना हिमाचल लौट आईं, उसी सुरक्षा के साथ, जो केंद्र से मिली है। महाराष्ट्र में तो उन्हें खतरा था मान लिया, मगर हिमाचल में भी खतरा है क्या? एक शब्द उन्होंने इस बारे में नहीं कहा। इनफैक्ट हिमाचल को लेकर तो वह कुछ कहती ही नहीं, यहां के पत्रकारों से बात भी नहीं करतीं।
कंगना रणौत Image Courtesy: Kangana Ranaut
आम लोगों की हिपॉक्रसी ‘आई सपॉर्ट कंगना’ कंगना का अभियान चलाकर अपनी डीपी में यह फ्रेम लगा रहे हिमाचल के लोग भी कम हिपोक्रेट नही हैं। यह तो समझ आता है कि क्यों वे कंगना के ऑफिस के हिस्से के वैध-अवैध होने पर बात नहीं कर रहे। क्योंकि यहां पर तो खुद ही लोगों ने देवदार के जंगलों को साफ करके सेब के बागीचे लगाए हुए हैं। कई जगहों पर अवैध कब्जे करके मकान और खेत बनाए हैं जिस कब्जे को रेग्युलर करने के लिए वीरभद्र सरकार पूरी कोशिश कर रही थी और अभी की सरकार भी खामोश है।
मगर हैरान करता है हिमाचल के लोगों का यह पाखंड कि जिस सीबीआई पर वे गुड़िया केस को सही से न सुलझा पाने का आऱोप लगाते हैं, उसी को सुशांत राजपूत मौत मामले की जांच मिलने का स्वागत करते हैं। हिमाचल के लोग सुशांत की मौत की वजह जानने के इच्छुक हैं मगर वनरक्षक होशियार सिंह को भूल गए जिसके बारे में सीबीआई अब तक सवालों को शांत नहीं कर पाई।
हैरान करती है ये बात कि जिस हिमाचल को मलाणा क्रीम, चरम, गांजे और अब चिट्टे के लिए भी जाना जाने लगा है, जहां नशा स्कूली बच्चों तक को गिरफ्तर में लेने लगा है, वहां के लोग अपने प्रदेश की चिंता करने की बजाय मुंबई और फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग्स की चिंता करने में मशगूल हैं। और सबसे बड़ी हैरानी की बात ये कि वे उस कंगना रणौत का समर्थन कर रहे हैं, जो घोर जातिवादी हैं। जबकि अपने प्रदेश में मिड डे मील में नन्हे बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव, मंदिरों में मंत्रियों तक को आने से टोकने की घटनाएं आए दिन होती हैं। और कंगना का समर्थन करने वालों में वे हिमाचली भी शामिल हैं, जो खुद किसी न किसी तरह इस भेदभाव के शिकार होते हैं।
कंगना रणौत
प्रीति ज़िंटा का भी अपमान
‘हिमाचल की बेटी’ का तमगा देना ठीक है। मगर क्या कंगना के बयान कि उनसे पहले इंडस्ट्री में अभिेनत्रियों को हीरो के साथ सोने पर रोल मिलते थे, हिमाचल की अन्य बेटियों का अपमान नहीं जो इस इंडस्ट्री में काम कर रही हैं या काम कर चुकी हैं? जैसे कि प्रीति ज़िंटा। क्या शिमला में जन्मी हिमाचल की उस बेटी ने अपने दम पर मुकाम नहीं बनाया? क्या कंगना की आज की बातें उनके लिए अपमानजनक नहीं? यह बात हैरान है कि प्रीति जिंटा के ही इलाके के कुछ तथाकथित युवा नेता कंगना के समर्थन में मुहिम छेड़े हुए हैं। कभी ज्ञापन सौंप रहे हैं, कभी इंटरनेट वॉरियर बन रहे हैं तो कभी कोरोना काल में लोगों की रैलियां निकाल रहे हैं। सब इसलिए कि कंगना के नाम पर अपनी राजनीति चमकाई जाए।
कंगना काबिल हैं, अपने दम तक यहां पहुंची हैं और आगे बढ़ने में भी सक्षम हैं। फिर वह राजनीति में जाएं या कुछ और करें, यह उनकी चॉइस है। मगर चिंता की बात है- बीजेपी के नेताओं का इस संकट के काल में कंगना के बहाने असल मुद्दों के बजाय बेवजह राजनीति करना। बीजेपी के समर्थक तो जानते हैं कि कल को फिर शिवसेना-बीजेपी सरकार बना सकती हैं। वे सिर्फ टाइम पास कर रहे हैं। मगर हिमाचली सोचें कि आप जिसे अपने गौरव से जोड़ रहे हैं, हिमाचल की अस्मिता से जोड़ रहे हैं, वह उसके काबिल है भी या नहीं। अपमानजक भाषा और छिछले आरोप लगाकर अनर्गल बातें करने से हिमाचल का गौरव नहीं बढ़ रहा है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं, उनसे kalamkasipahi@gmail.com से संपर्क किया जा सकता है)
इन हिमाचल डेस्क।। अभिनेत्री उर्मिला मातोंडकर ने कंगना रनौत के मुंबई और फ़िल्म इंडस्ट्री को लेकर दिए बयानों पर आपत्ति जताई है। उर्मिला ने कहा कि ड्रग्स के खिलाफ अभियान शुरू ही करना है तो कंगना अपने राज्य से करें।
उर्मिला ने कहा, “पूरा देश ड्रग्स के खतरे का सामना कर रहा है। क्या उन्हें पता है कि जहां से वो आती हैं, यानी हिमाचल प्रदेश खुद ड्रग्स का एक गढ़ है। कंगना को सबसे पहले अपने राज्य से इसकी शुरूआत करनी चाहिए।”
वहीं एक इंटरव्यू में कंगना ने उर्मिला मातोंडकर को सॉफ्ट पोर्न ऐक्ट्रेस कहा। उर्मिला का कहना था कि कंगना बीजेपी का टिकट चाहती हैं, इसलिए ये सब कर रही हैं।
टाइम्स नाउ पर इस बारे में पूछे सवाल के जवाब में कंगना ने उर्मिला पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, ‘मुझे टिकट के लिए ज्यादा काम नहीं करना पड़ेगा। वह खुद एक सॉफ्ट पॉर्न स्टार हैं। जब उन्हें मिल सकता है तो मुझे क्यों नहीं मिलेगा?’
वीडियो देखें-
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मंडी।। हिमाचल प्रदेश में कोरोना काल के दौरान भी सक्रिय नजर आ रहे मंत्री-विधायक नए-नए विवादों में फंस रहे हैं। अब वन विभाग ने एक बीओ और वनरक्षक को निलंबित कर दिया है। बताया जा रहा है कि इसकी वजह यह थी कि पिछले दिनों जब वन मंत्री ने नाचन और सिराज का दौरा किया था, तब उनके स्टाफ और समर्थकों की आवभगत में ‘कमी’ रह गई थी। बीओ और वन रक्षक को निलंबित करने के अलावा वन परिक्षेत्र अधिकारी को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी कर स्पष्टीकरण मांगे जाने की भी खबर है।
बताया जा रहा है कि ‘संबंधित कर्मचारियों की लापरवाही’ के चलते चैलचौक विश्राम गृह में वन मंत्री, उनके स्टाफ और समर्थकों के लिए खाना कम पड़ गया था। अमर उजाला के मुताबिक, ऐसे में कुछ भाजपा नेताओं ने वन विभाग के आला अधिकारियों से इसकी शिकायत की थी और अब यह कार्रवाई हुई है।
उधर, वन विभाग के अधिकारी इसे मामूली कार्रवाई कहकर निलंबित कर्मचारियों के दोबारा जल्द ड्यूटी ज्वाइन करने की बात कह रहे हैं। इससे ऐसा लग रहा है कि उनके ऊपर भी इस कार्रवाई को लेकर दबाव रहा होगा। रिपोर्ट के अनुसार, वन अरण्यपाल मंडी एसके मुसाफिर ने बीओ बासा और वन रक्षक चैलचौक के निलंबन की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि वन परिक्षेत्र अधिकारी को नोटिस जारी किया गया है।
क्या है मामला
वन मंत्री राकेश पठानिया चार और पांच सितंबर को नाचन और सिराज दौरे पर आए थे और चैलचौक वन विश्राम गृह में ठहरे थे। अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि नाचन भाजपा ने वन विभाग को मंत्री और उनके स्टाफ समेत अन्य अतिथियों की खातिरदारी का जिम्मा सौंपा था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि नाचन भाजपा ने वन विभाग नाचन को 30 लोगों के खाने की व्यवस्था का जिम्मा सौंपा था लेकिन मंत्री के तलबगारों की वन विश्राम गृह चैलचौक में लाइन लग गई। इस बीच खाने वालों की संख्या करीब 150 पहुंच गई। इस बीच आनन-फानन में वन विभाग को काफी कसरत करनी पड़ी। कुछ लोग बिना खाए ही चले गए।
नई दिल्ली।। मंगलवार को लोकसभा में मॉनसून सत्र के दौरान ‘मैटर्स ऑफ अर्जेंट पब्लिक इम्पॉर्टेंस’ के तहत मंडी के सांसद रामस्वरूप शर्मा ने अभिनेत्री कंगना रणौत का जिक्र किया। जैसा कि नाम से साफ है, मैटर्स ऑफ अर्जेंट पब्लिक इम्पॉर्टेंस के तहत जनता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए जाते हैं या ऐसे मसले, जिनपर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
बाकी सांसद जहां इस दौरान अपने इलाके के या फिर व्यापक जनहित के मुद्दे उठा रहे थे, उसी दौरान मंडी के सांसद ने हिमाचल से जुड़ा और कोई मसला उठाना उचित नहीं समझा। बल्कि उन्होंने तो कोई मुद्दा ही नहीं उठाया। उन्हें जो समय दिया गया था, उसमें उन्होंने कंगना को सुरक्षा दिए जाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की तारीफ ही की।
यह काम वह उन्हें ट्वीट करके या चिट्ठी लिखकर या मिलकर कर सकते थे मगर संसद जैसे मंच पर उन्होंने अपने लिए मिले वक्त को यूं ही जाया कर दिया। चूंकि कंगना के मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार ने सुरक्षा प्रदान कर दी है, ऐसे में इस मसले में ज्यादा करने के लिए कुछ बचता नहीं है। फिर भी मंडी के सांसद ने संसद में इसका जिक्र किया। पार्टी के नेताओं का ध्यान करने के बाद वह शिवसेना पर वैसे ही निशाना साधने लगे, जैसे आम चैनलों की डिबेट में साधा जाता है।
बीच भाषण में ऑफ किया माइक इस दौरान स्पीकर महोदय सांसद को टोकने लगे कि वह जल्दी अपना वक्तव्य खत्म करें। मगर रामस्वरूप अपने लिखे वक्तव्य को अटकते हुए, गलत-सही वाक्यों के साथ लगातार पढ़ते गए। यही नहीं, उन्होंने संसद में उस शब्द तक का इस्तेमाल कर दिया, जिसे वह खुद आपत्तिजनक बता रहे थे। उन्होंने कहा कि शिवसेना के नेता कंगना के लिए अशोभनीय शब्द इस्तेमाल कर रहे थे। और उन्होंने तुरंत कुछ ही क्षणों बाद उस अशोभनीय शब्द का इस्तेमाल कर दिया (वह शब्द जो संजय राऊत ने इस्तेमाल किया था)।
लेकिन इससे पहले कि वह अपनी बात पूरी कहते, उनका माइक ऑफ कर दिया गया और पूरी बात नहीं हो सकी। इसके तुरंत बाद स्पीकर ने अगले सांसद को अपनी बात कहने के लिए कहा। आपत्तिजनक शब्द किसी और द्वारा ही इस्तेमाल क्यों न किए गए हों, उन्हें कोट करना भी उचित नहीं माना जाता है। जानकारों का कहना है कि अगर रामस्वरूप शर्मा के कहे शब्द पर स्पीकर का ध्यान जाता तो संभव है कि इसे सदन की कार्यवाही से हटाना पड़ता।
रामस्वरूप शर्मा का यह वीडियो चर्चा का विषय बना हुआ है। आप भी देखें-
रितेश चौहान, फ़ॉर इन हिमाचल।। लगभग 27 लाख रुपये की एक गाड़ी अधिशाषी अभियंता (आईपीएच) के नाम पर खरीदी गई और आरोप है कि वह भी मंत्री पुत्र के हवाले कर दी गई जिस पर सवार होकर वह समारोहों में जाते हैं। यह टोयोटा इनोवा क्रिस्टा टॉप मॉडल इसी साल मार्च में पंजीकृत हुई है और इसके लिए एक लाख रुपये देकर वीआईपी नम्बर भी लिया गया है। हालांकि, मंत्री के बेटे रजत ठाकुर ने इन आरोपों को गलत बताया है।
ये हाल तब हैं जब सरकार की ओर से आर्थिक तंगी का ठीकरा कोरोना के सिर फोड़कर हर चीज पर कटौती की कैंची चलाई जा रही है। मगर ऐसा लगता है कि कई विभागों से गाड़ियां लेकर बेटे-बेटियों को सौंपने के आरोपों का सामना कर रहे महेंद्र सिंह ठाकुर की मनमानियों पर लगाम लगाने वाला कोई नहीं।
अभूतपूर्व घटना
जल शक्ति मंत्री के गृह क्षेत्र के एक्सईएन हिमाचल प्रदेश के इतिहास में पहले ऐसे एक्सईएन हैं, जिनके लिए सरकारी खर्च पर 27 लाख रुपये की गाड़ी ली गई है। अन्य उपमंडलों में एक्सईएन को महज सात लाख की महेंद्रा बलेरो दी जाती है।
XEN के नाम ली गई गाड़ी
मगर असल खेल कुछ अलग लग रहा है। आरटीआई के माध्यम से पता चला है कि केंद्र सरकार की जल जीवन मिशन योजना से 27 लाख की एक टोयोटा गाड़ी और दो बोलेरो गाड़ियां खरीदने के लिए 40 लाख से भी अधिक खर्च किए गए हैं। और आरोप लग रहा है कि इनमें से एक महंगी टोयोटा गाड़ी जलशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह के बेटे द्वारा कथित रूप से इस्तेमाल की जा रही है।
आरटीआई एक्टिविस्ट भूपेंद्र ठाकुर ने मुख्यमंत्री से मांग की है जब से उक्त लग्जरी गाड़ी खरीदी गई है, तब से लेकर आज तक धर्मपुर, संधोल, सरकाघाट, मनाली और करसोग से लेकर कई स्थानों पर सीसीटीवी फुटेज चेक की जाए, हर फुटेज में मंत्री का बेटा ही इस गाड़ी में घूम रहा है। उन्होंने कहा कि ‘घर में कई महंगी निजी एयर सरकारी गाड़ियां होने के बावजूद ऐसी कौन सी गरीबी पड़ गई जो एक्सईन धर्मपुर के नाम पर अपने बेटे के लिए जनता के पीने के पानी का बजट खर्च करना पड़ा।’
नम्बर का खेल
भूपेंद्र ने कहा कि ‘महेंद्र सिंह ने अपने काफिले में तीन लग्जरी सरकारी गाड़ियां रखी हैं जबकि एक सरकारी गाड़ी उनके निजी सचिव इस्तेमाल करते हैं। बेटे के पास अपनी फॉर्च्यूनर और स्कोर्पियो गाड़ी होने के बावजूद उनके लिए सरकारी पैसे का दुरुपयोग किसी बुद्धिजीवी की समझ नहीं आ रहा है।’
इलाके में यह भी चर्चा है कि भारी रकम खर्च करके लिया गया 0006 नंबर जनता की आंखों में धूल झोंकने के लिए है ताकि पता न चल सके कि बेटे की गाड़ी गई या मंत्री की। इसके अलावा मन्त्री के पास दो गाड़ियां जिनके नम्बर एच पी 07ई -0006 और एच पी 07 एच 0006 हैं, वे हिमाचल सरकार के जीएडी विभाग की हैं। इनके अलावा एक और गाड़ी आईपीएच विभाग की भी है। आरोप है कि जीएडी विभाग की गाड़ियों के नंम्बर भी एक जैसे ही हैं ताकि देखने वालों को इसकी पहचान न हो सके।
आरएलए एवं एसडीएम धर्मपुर सुनील वर्मा ने कहा कि एचपी 86 0006 के लिए वीआईपी नंबर देने के लिए अधिशासी अभियंता भराड़ी धर्मपुर की और से 1 लाख रुपये जारी किए गए हैं।
आरोप गलत: रजत
जब इस सबन्ध में जलशक्ति मंत्री का पक्ष लेना चाहिए तो उन्होंने फोन नहीं उठाया। वहीं उनके बेटे और बीजेपी महासचिव रजत ठाकुर ने कहा कि यह गाड़ी मंत्री के ओएसडी को मिली है जो कि धर्मपुर में ही रहते हैं। उन्होंने कहा, “उनके साथ मैं अगर कहीं गया तो किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। जो भी आरोप लगाए गए हैं, वे झूठे हैं।”