अनुराग ठाकुर vs अधीर रंजन चौधरी: अपनी ज़ुबान से देश को बांटते नेता

आई.एस. ठाकुर।। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी का विवादों से नाता रहा है। जिस शख्स को कांग्रेस ने लोकसभा में अपने नेतृत्व की जिम्मेदारी दी है, वह अपनी टिप्पणियों के कारण कई बार अपनी ही पार्टी को शर्मिंदा कर चुके हैं। जोश-जोश में वह कई बार ऐसी बातें कह चुके हैं कि या तो उन्हें अपनी बातों पर खेद जताना पड़ा या फिर लोकसभा अध्यक्ष को उनकी टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटाना पड़ा।

संसद के अंदर ही नहीं, बाहर भी वह पार्टी के लिए परेशानी का सबब बने हुए हैं। चीन को लेकर उन्होंने एक ट्वीट कर दिया था, जिससे उनकी काफी आलोचना हुई थी। फिर खबर आई थी कि पार्टी ने अधीर रंजन से वह ट्वीट डिलीट करवाया। यह सवाल शुरू से उठ रहे थे कि जो नेता धैर्य, विवेक और जिम्मेदारी से बात नहीं कर सकता, आखिर क्यों कांग्रेस ने उसे लोकसभा में अपनी टीम का नेतृत्व सौंपा। मगर अब, जबसे उन्होंने केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर पर अमर्यादित टिप्पणी की, पार्टी के अंदर से ही मांग उठने लगी है कि अधीर की जगह किसी और को यह जिम्मेदारी दी जाए।

अनुराग ठाकुर भी विवादों से अछूते नहीं रहे हैं। जहां तक विवादित टिप्पणियों की बात है, वह भी इन्हें लेकर मीडिया में सुर्खियां बटोर चुके है। चाहे वह पिछले दिनों दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान ‘गोली मारो….’ वाला नारा हो, शिमला के अनाडेल में सेना के खिलाफ ‘फ्री अनाडेल’ अभियान चलाना हो या फिर एक चुनावी जनसभा में बंदर के खिलौने की तुलना कांग्रेस के नेता वीरभद्र सिंह से करना हो। यह भी कोई आदर्श आचरण नहीं है। मगर अधीर रंजन चौधरी ने अनुराग की टिप्पणियों से विचलित होकर संसद में जो कहा, उसने तो सारी हदें ही पार कर दीं।

अधीर रंजन चौधरी ने अनुराग के लिए जो शब्द इस्तेमाल किए, वे बेहद आपत्तिजनक हैं। उनका यहां जिक्र नहीं किया जा सकता और न ही उस वीडियो को लगाया जा सकता है। कारण यह है कि संसद या विधानसभा आदि की कार्यवाही के दौरान अगर स्पीकर किसी बात, टिप्पणी आदि को हटा दें तो उसका कहीं और यथावत जिक्र नहीं किया जा सकता। पत्रकार भी अपनी रिपोर्टों में उस वक्तव्य या टिप्पणी का जिक्र नहीं कर सकते।

इस नियम को बनाने का मकसद यह था कि संसद की मर्यादा बनी रहे और अगर कोई ‘असंसदीय’ शब्द कहा जाए तो उसकी बात किसी भी तरह जनता तक न पहुंचे। ऐसा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि संसद किसी भी लोकतंत्र के शीर्ष संस्थानों में से एक है। ऐसे में वहां होने वाली किसी भी हल्की, गलत या गैरजरूरी या देश के लिए खतरे वाली बात का पूरे देश पर असर पड़ सकता है।

‘असंसदीय’ भाषा
जिस दौर में लाइव प्रसारण की सुविधा नहीं थी और पत्र-पत्रिकाएं आदि ही सदनों की कार्यवाहियों को प्रकाशित किया करते थे, उनके लिए संभव होता था कि इन टिप्पणियों को रिपोर्ट न किया जाए। मगर अब सदनों की कार्यवाहियों का लाइव प्रसारण होता है और उसके वीडियो को डिजिटल प्लैटफॉर्म पर भी डाला जा सकता है। इसलिए भले ही स्पीकर आपत्तिजनक शब्दों को कार्यवाहियों से हटा दें, उन्हें वीडियो से नहीं हटाया जा सकता। समाचार चैनल और पोर्टल आदि हटाए गए हिस्से का प्रसारण नहीं करते मगर सोशल मीडिया पर लोग उन्हीं हिस्सों को किसी खास मकसद से वायरल करते रहते हैं।

आज कुछ लोगों ने अधीर रंजन बनाम अनुराग ठाकुर बहस को बंगाल बनाम हिमाचल की लड़ाई बना दिया है। ऐसी नौबत न आए, इसीलिए आपत्तिजनक टिप्पणियों को कार्यवाही से हटाए जाने का प्रावधान था। यह एक उदाहरण है कि कैसे एक टिप्पणी समाज, देश में विभाजन पैदा कर सकती है। यह बताता है कि जब स्पीकर द्वारा टिप्पणियों को हटाने का कोई मतलब नहीं रह गया है, तब कैसे नेताओं और सांसदों को खुद अपनी जिम्मेदारी समझकर अपनी जुबान संयमित रखनी चाहिए।

संसद ने 2012 में बाकायदा एक लिस्ट छापी थी, जिसमें असंसदीय शब्दों का जिक्र था, जिनका इस्तेमाल संसद में दूसरे नेताओं के लिए नहीं किया जा सकता। ये शब्द अनपार्ल्यामेंट्री या असंसदीय माने जाते हैं। इनमें से कुछ शब्द हैं- बदमाश, गुंडा, अंधा, बहरा, डकैत, अली बाबा और चालीस चोर, झूठा, धोखेबाज, महिला सांसद को डार्लिंग या अनपढ़ सांसद को अंगूठाटेक कहना। ये शब्द पढ़कर समझा जा सकता है कि कैसे किसी और के लिए किसी भी तरह का अपमानजनक शब्द कहना असंसदीय होता है। फिर भी आए दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता एक-दूसरे पर हल्की टिप्पणियां करते हैं।

इसलिए, यह सांसदों या विधायकों की ही नहीं, राजनीति में आने वाले हर शख्स की जिम्मेदारी है कि वह कहीं पर भी ‘असंसदीय’ भाषा इस्तेमाल न करे। न अपने सोशल मीडिया पर, न टीवी चैनलों पर और न राजनीतिक सभाओं में। क्योंकि आपकी ये टिप्पणियां पूरा देश देखता है और फिर आपके नक्शे कदम पर चलता है। हो सकता है कि आप जानबूझकर एजेंडा देकर राजनीतिक लाभ बटोरना चाहते हों या अपने समर्थकों को एक विषय देना चाहते हों; मगर इस तरह का आचरण देश के भविष्य के लिए ठीक नहीं। बहस तथ्यों और तर्कों के साथ की जानी चाहिए, गालियों या लांछनों के साथ नहीं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं, उनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है)

SHARE