लेख: जनता को महंगी पड़ रही है कौल सिंह और गुलाब सिंह की ऐसी राजनीति-1

(लेख लंबा है, इसलिए दो हिस्सों में बांट दिया गया है। आगे वाले हिस्से का लिंक नीचे दिया गया है।)

  • भूप सिंह ठाकुर

ठाकुर कौल सिंह और ठाकुर गुलाब सिंह, ये दोनों हिमाचल प्रदेश की राजनीति के बड़े नाम हैं। एक कांग्रेस के बड़े नेता हैं तो दूसरे बीजेपी के। यह दिलचस्प है कि दोनों के विधानसभा क्षेत्र अगल-बगल हैं और दोनों ने राजनीति की शुरुआत एकसाथ की है। दोनों वकालत से राजनीति में आए। दोनों ने कई पार्टियों का दामन बदलते हुए कांग्रेस जॉइन की थी। फिर गुलाब सिंह ने आखिरकार बीजेपी का दामन थाम लिया। आज ये दोनों नेता बेशक अलग-अलग पार्टियों में हैं, मगर दोनों की जुगलबंदी यानी आपसी तार-तम्य बहुत जबरदस्त है। भले ही लोग उन्हें एक-दूसरे का कट्टर समझें, मगर दोनों के बीच गजब की मूक सहमती है। एक दौर था, जब दोनो एक-दूसरे की जड़ें काटने पर उतारू थे, मगर आज दोनों एक-दूसरे को सहारा दे रहे हैं।

कौल सिंह ठाकुर

सबसे पहले बात करते हैं कौल सिंह की। कौल सिंह द्रंग से विधायक हैं और 8 बार विधायक चुने जा चुकेहैं। वह सिर्फ एक बार चुनाव हारे हैं, जब 1990 में दीनानाथ यहां से चुने गए थे। इसके बाद 1993 के चुनावों में उन्होंने फिर से वापसी की थी। उनका विधानसभा क्षेत्र बड़ी विविधताओं से भरा है। पुनरसीमांकन के पहले भी स्थितियां पेचीदा थीं और अब भी। ऊपर की तरफ जाएं तो पूरा ट्राइबल इलाका इनकी तरफ है, तो नीचे मंडी से लेकर जोगिंदर नगर तक फैलाव है। ऊपर के जंगल संरक्षित हैं और वहां पर कोई ज्यादा कंस्ट्रक्शन नहीं करवाया जा सकता। इसीलिए आप जब झटिंगरी से ऊपर बरोट की तरफ चलना शुरू करेंगे तो वहां का अंदाजा लगा सकते हैं। न कोई विकास हुआ है न कुछ। वहां के भोले-भाले लोग ज्यादा कुछ चाहते भी नहीं, मगर वे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं।

नीचे द्रंग के सभी अहम ऑफिस पद्धर में हैं। पद्धर का हाल में विकास हुआ है, मगर उस स्तर पर नहीं, जितना होना चाहिए। प्रदेश का इतना कद्दावर नेता, जो मुख्यमंत्री बनने का सपना संजो रहा हो, प्रदेश कांग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा चुका हो, कई बार मंत्री रह चुका हो, उसके इलाके का इतना पिछड़ा होना हैरान करता है। हर बार चिकनी-चुपड़ी बातों के अलावा लोगों को कुछ नहीं मिलता और बावजूद इसके लोग वोट देते हैं। शायद यही उनकी रणनीति हो कि लोगों को मोहताज रखो, ताकि वे हर चीज़ के लिए आपके पास आएं, आप उन्हें कृतार्थ (Oblige) करें और फिर वे बदले में आपको वोट दें। न तो कोई अच्छा संस्थान द्रंग में बन पाया है न ही कुछ और ऐसा, जिसपर गर्व किया जा सके।

द्रंग में बिना प्लैनिंग के नाले में बनाया गया OBC हॉस्टल। संस्थान आसपास कोई नहीं और कई सालों से यूं ही सड़ रहा है।
द्रंग में बिना प्लैनिंग के नाले में बनाया गया OBC हॉस्टल। संस्थान आसपास कोई नहीं और कई सालों से यूं ही सड़ रहा है।
जवाहर ठाकुर।

अब सवाल उठता है कि जब इतने खराब हालात हैं तो जनता किसी और नेता को क्यों नहीं चुन लेती? हिमाचल प्रदेश में दो ही पार्टियां प्रमुख हैं- कांग्रेस और बीजेपी। तो इस सीट पर कांग्रेस के कौल सिंह ठाकुर को कई सालों टक्कर दे रहे हैं- जवाहर ठाकुर। जवाहर ठाकुर बहुत डाउन टु अर्थ आदमी माने जाते हैं और चुनाव-दर-चुनाव उनका वोटर बेस बढ़ता जा रहा है। कई बार गिनती में पीछे चलने के बावजूद आखिर में कौल सिंह जीतते रहे। जवाहर शायद जीत जाते, अगर उन्हें अपनी पार्टी का साथ मिलता। जोगिंदर नगर के गुलाब सिंह के साथ शायद कोई गुप्त समझौता है कौल सिंह का। ऐसा ही बीजेपी के पहले के उम्मीदवारों रमेश चंद और दीना नाथ के साथ होता रहा।

सुरेंदर पाल ठाकुर।

अगर बीजेपी की सरकार आने पर सीनियर मंत्री गुलाब सिंह ठाकुर चाहें तो वह पड़ोसी कॉन्सिचुअंसी के जवाहर ठाकुर को आग ेबढ़ने में मदद कर सकते थे। वह चाहते तो घोषणाएं कर सकते थे, जवाहर के कहने पर कुछ काम करवा सकते थे और जमीनी स्तर पर काम कर सकते थे। यही होता भी है। इससे जनता में विश्वास बनता है कि यह नेता अभी ही इतने काम करवा रहा है तो चुने जाने पर कितने ज्यादा काम करवाएगा। अगर गुलाब सिंह ऐसा करते तो सीधा नुकसान कौल सिंह ठाकुर हो जाता। इसलिए आज तक उन्होंने जवाहर को हमेशा नजरअंदाज किया। इस तरह का फेवर मिलने पर अहसान तो चुकाना ही है। इसलिए कौल सिंह ठाकुर भी यही करते हैं। अभी कांग्रेस की सरकार है, मगर जोगिंदर नगर में कोई काम नहीं करवा रहे। वह चाहते तो यहां से कांग्रेस के हारे हुए प्रत्याशियों का समर्थन करके उनके काम करवाके जीतने में मदद कर सकते थे। मगर ऐसा नहीं करते।

गुलाब सिंह ठाकुर।

भले ही जोगिंदर नगर से हारे हुए कांग्रेस प्रत्याशी सुरेंदर पाल आज वीरभद्र सिंह के करीबी हैं, मगर कौल सिंह से शुरू में उनके रिश्ते खराब नहीं थे। मगर कौल सिंह दरअसल असुरक्षा से भरे हुए हैं। वह कभी नहीं चाहते कि कोई और नेता मंडी से उनके बराबर उठे। उन्होंने कभी भी जोगिंदर नगर से कांग्रेस के उम्मीदवारों की की मदद नहीं। उल्टा उन्होंने कांग्रेस कैंडिडेट को हराने की ही कोशिशें कीं। सुरेंदर पाल से पहले जोगिंदनर नगर में वह गुलाब सिंह ठाकुर को टक्कर देते रहे ठाकुर रतन लाल के साथ भी ऐसा करते रहे। फिर जिस वक्त गुलाब सिंह ठाकुर कांग्रेस में थे, उन्हें हरवाने के लिए भी पूरे जतन किया करते थे। ये तो आज जाकर दोनों नेताओं ने आपसी हित में सीज़ फायर किया है।

दरअसल असुरक्षा की भावना मंडी के हर नेता में रही है। इसीलिए यहां से कई बड़े नेता हुए और उनकी असुरक्षा की भावना और बड़ा पद पाने के लालच ने उन्हें कभी उठने नहीं दिया। पहले कर्म सिंह ठाकुर इस तरह की राजनीति के शिकार हुए थे। बाद में जब सुखराम बड़े नेता बनकर उभरे और शायद मुख्यमंत्री भी बनते, मगर कौल सिंह ठाकुर ने पाला बदलकर वीरभद्र सिंह का दामन थाम लिया। बाद में वीरभद्र सिंह के खिलाफ बगवात की और खुद को सीएम कैंडिडेट बनाने का दावा पेश कर दिया। मगर वह भूल गए कि उनके पास कोई भी एक विधायक ऐसा नहीं, जो उनके साथ चल सके। कोई विधायक तो तब साथ होता, जब किसी की मदद की होती। मगर असुरक्षा की भावना से जनाब ने यह सोचकर किसी को उठने ही नहीं दिया कि कल को कहीं मेरे लिए मुश्किल खड़ी न कर दे।

व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में ये नेता भूल गए कि जनता की जरूरतें क्या हैं, उनके लिए भी कुछ करना है। यही हाल रहा तो मुख्यमंत्री बनने का सपना किसी भी जन्म में पूरा होने से रहा। नीयत साफ रखकर अगर चलते तो शायद कामयाबी मिलती।

यह लेख का पहला भाग है। अगले हिस्से में चर्चा गुलाब सिंह ठाकुर की राजनीति पर की गई है। क्लिक करके पढ़ें।

(लेखक मंडी के रहने वाले हैं और आयकर विभाग से सेनानिवृति के बाद विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिख रहे हैं।)

Disclaimer: यह लेखक के अपने विचार हैं, इनसे ‘इन हिमाचल’ सहमति या असहमति नहीं जताता। 

गडकरी से मिले ‘तोहफे’ का क्रेडिट लेने की कोशिश में अनुराग ठाकुर?

शिमला।।

पिछले दिनों केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी निजी दौरे पर हिमाचल आए थे। धर्मशाला में उन्होंने प्रदेश में अपने समकक्ष जी.एस. बाली के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की और हिमाचल प्रदेश के लिए नए नैशनल-हाइवेज़ समेत कई ऐलान किए। जाहिर है, केंद्र सरकार इस तरह के फैसले किसी तरह का सपना आने पर नहीं लेती। प्रदेश की सरकारों और वहां के सांसदों से सिफारिश मिलने के बाद उसकी प्रांसगिकता वगैरह का सर्वे करने के बाद इस तरह के फैसले लिए जाते हैं। मगर हिमाचल प्रदेश के बीजेपी सांसदों में गडकरी के ऐलानों का क्रेडिट लेने की होड़ मच गई है। सबसे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति में नजर आ रहे हैं- बीसीसीआई सेक्रेटरी और हमीरपुर के सांसद अनुराग ठाकुर।

अनुराग ठाकुर ने अपने फेसबुक पेज पर गडकरी से आया लेटर शेयर करते हुए जो लिखा है, वह गौर करने लायक है। वह लिखते हैं (हिंदी में अनुवाद)- अपने राज्य हिमाचल प्रदेश में नए नैशनल हाइवेज़ बनाने को लेकर चर्चा करने के लिए मैं माननीय सड़क परिवहन, हाईवेज़ और शिपिंग मिनिस्टर श्री नितिन गडकरी से मिला। केंद्र सरकार ने नीचे शेयर किए गए लेटर में लिखे गए प्रॉजेक्ट्स और फंड्स को अप्रूव कर दिया है।

अनुराग बताना चाहते हैं कि उन्होंने गडकरी से मुलाकात की, हाइवे को लेकर चर्चा की और उन्होंने इसे अप्रूव कर दिया। वह जताना चाहते हैं कि ये हाइवेज़ और प्रॉजेक्ट्स उनके चर्चा करने की वजह से ही अप्रूव हुए हैं। लेटर को ध्यान से देखें तो इसमें 11 मई  लिखा हुआ है। मगर इसी तरह का एक लेटर 10 मई को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा ने भी शेयर किया है। वह भी उन्हें संबोधित करके लिखा गया है। नीचे देखें

जाहिर है, यह विभागीय पत्र है जो संबंधित सांसदों को भेजा गया है। यह सामान्य विभागीय प्रक्रिया है। इस तरह के मेसेज सभी सांसदों को भी भेजे जाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इस बारे में सांसदों ने बात की होगी, जिनमें अनुराग ठाकुर भी शामिल होंगे, मगर लेटर को अलग अंदाज में श्रेय लेने की भाषा में पोस्ट करना अखरता है। एक अन्य सांसद ने भी ऐसा लेटर अपने फेसबुक पेज शेयर किया था, बाद में उसे डिलीट कर दिया गया।

यह बात सोशल मीडिया पर भी चर्चा का विषय बनी रही और लोगों ने सांसदों का मजाक बनाया। कुछ यूजर्स ने कहा कि जब गिनाने के लिए वास्तविक उपलब्धियां न हों, तभी डेस्परेशन में इस तरह के कदम उठाए जाते हैं। तो कुछ लोगों का यह भी कहना था कि अनुराग ठाकुर को राजनीति के बजाय क्रिकेट पर ही ध्यान फोकस कर लेना चाहिए। कुछ लोग बचाव करते हुए भी नजर आए, जिनका कहना था कि अनुराग दोनों भूमिकाओं को बखूबी निभा रहे हैं।

जनता चाहे तो विक्रमादित्य मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं: प्रतिभा सिंह

शिमला।।

हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पत्नी और मंडी की पूर्व सांसद प्रतिभा सिंह ने कहा है कि जनता चाहे तो विक्रमादित्य सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री बन सकते हैं। गौरतलब है कि विक्रमादित्य सिंह उनके बेटे हैं और हिमाचल युवा कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं।

हिमाचल में कांग्रेस और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह पर वंशवाद के आरोप लगते रहे हैं, मगर ऐसा पहली बार हुआ है जब विक्रमादित्य को मुख्यमंत्री बनाने की बात कही गई है। पिछले दिनों सिरमौर दौरे के दौरान प्रतिभा सिंह ने कहा, ‘विक्रमादित्य हर तरह से काबिल हैं और जनता चाहे तो आने वाले समय में वह राज्य के मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं।’

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विक्रमादित्य सिंह पच्चीस साल के हो चुके हैं और संभव है कि इस बार वह चुनाव भी लड़ें। मगर खुद मुख्यमंत्री वीरभद्र ने कभी इस तरह का संकेत नहीं दिया कि अपने बेटे को वह प्रदेश की राजनीति के शीर्ष पर देखना चाहते हैं। मगर प्रतिभा सिंह की जुबान पर दिल की बात आ ही गई।

गौरतलब है कि अभी तक विक्रमादित्य सिंह खुद को साबित नहीं कर पाए हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि उनका युवा कांग्रेस प्रदेशाअध्यक्ष होना है, मगर यह उपलब्धि भी मेहनत की नहीं, बल्कि उनके पिता वीरभद्र सिंह के राजनीतिक कद की देन है।

एग्ज़ाम में फेल हुए या कम नंबरों से पास हुए छात्रों और उनके पैरंट्स के नाम एक ख़त

आई.एस. ठाकुर।।

सबसे पहले तो हिमाचल प्रदेश के बोर्ड एग्ज़ाम्स में पास होने वालों को बधाई और साथ ही इन हिमाचल को भी, जिसने इस बार दसवीं के टॉपर्स की कोई फोटो नहीं डाली। दरअसल मेरे लिए यह खबर अहमियत नहीं रखती कि किसने टॉप किया और कितने नंबर लाए। मेरे लिए वह खबर झकझोर देने वाली थी, जिसमें पढ़ा कि एक बच्ची ने नंबर कम आने पर खुदकुशी कर ली। वही नहीं, हर साल न जाने कितने ही बच्चे कम नंबर आने पर डिप्रेशन में चले जाते हैं और इस तरह के कदम उठाते हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि मेरिट में आने वाले बच्चे बधाई के पात्र हैं और उन्हें सम्मान मिलना चाहिए। इसके लिए उन्होंने जो मेहनत की है, उसके लिए वे इस लाइमलाइट के हकदार भी हैं। मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इसी लाइमलाइट को देखते हुए कुछ पैरंट्स अपने बच्चों से भी ऐसी ही उम्मीदें पालने लगते हैं। वे अपनी इच्छाएं और सपने अपने बच्चों पर थोप दिया करते हैं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे भी शानदार नंबर लाएं और इस तरह उनका ”नाम रोशन” करें।

बहुत से पैरंट्स इसके लिए अपने बच्चों को हर वक्त पढ़ने के लिए कहते हैं। कुछ बच्चे तो पढ़ाई में रम जाते हैं, लेकिन जिस तरह हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं, सभी बच्चों की नेचर एक जैसी नहीं होती। हर कोई पढ़ाई में उतना तेज नहीं होता। हो सकता है कि किताबें पढ़ने में उसकी रुचि न हो, मगर वह किसी अन्य मामले में बहुत होशियार हो। हो सकता है कि वह गणित में उतना अच्छा न करता हो, मगर भाषा और साहित्य पर उसकी पकड़ अच्छी हो। हो सकता है उसकी साइंस में रुचि न हो, मगर इतिहास में बड़ा मन लगता हो। हो सकता है वह इस सब के इतर खेलकूद में ज्यादा रुचि रखता हो। इस तरह के बच्चे बार-बार पढ़ाई के लिए कहे जाने पर प्रेशर में चले जाते हैं। न तो वे अपना मनपसंद ही कुछ पाते हैं औऱ न ही पढ़ाई में ही अच्छा कर पाते हैं।
कई पैरंट्स को तो मैंने देखा है कि वे अपने बच्चों के अंकों की तुलना अन्य रिश्तेदारों के बच्चों के अंकों से करते हैं। वे अपने बच्चों का डांटते हैं, उसे सजा देते हैं और कई बार पिटाई भी करते हैं। सोचिए, बाल मन पर इसका क्या असर पड़ता होगा। साथ ही हमें यह भी समझना होगा कि बहुत ज्यादा अंक लाने बच्चों में से कुछ ”पढ़ाकू” और ”रट्टामार” भी होते हैं। भले ही वे इस तरह की परीक्षाओं में नंबर ले आते हों, मगर उनका व्यवहारिक ज्ञान ज़ीरो होता है।  इस तरह के अंक लाने का फायदा भी क्या है?आपने देखा होगा कि बहुत नंबर लाने वाले बच्चे आगे चलकर कई बार फिसड्डी भी साबित होते हैं तो कई बार औसत प्रदर्शन करने वाले बच्चे आगे चलकर बहुत कामयाब हो जाते हैं।
मेरी गुजारिश है अध्यापकों, अभिभावकों और पत्रकारों से कि मेरिट और ज्यादा नंबर लाने को इस तरह से ग्लैमराइज न करें। और अपने बच्चों को नंबर लाने के बजाय उसकी रुचि को समझें। देखें कि वह क्या करना चाहते हैं। उस ओर ज्यादा ध्यान दें। पढ़ाई पर भी ध्यान दें, मगर उसकी रुचि का ख्याल रखें। अगर बच्चा अपनी मर्जी से कुछ कर रहा होगा तो पढ़ने में भी वह जरूर ध्यान देगा। उसे ज्यादा नंबर लाने वाले बच्चों का नहीं, उन लोगों का उदाहरण दीजिए जो जीवन में कामयाब हैं। उन्हें बताइए कि वे कैसे उस स्तर तक पहुंचे। साथ ही बच्चों को अपनी इच्छा के हिसाब से सब्जेक्ट न पढ़ाएं। उससे पूछें कि रुचि किसमें है। जबरन डॉक्टर या इंजिनियर बनाने की न सोचें। अब दौर गया कि यही दो प्रफेशन थे। अब हजारों प्रफेशन हैं, जहां पर सम्मान और खूब पैसे वाली नौकरियां मिलती हैं। बच्चों को बच्चे ही रहने दें, उन्हें मशीन न बनाएं।

सबूत: इसलिए हुआ जोगिंदर नगर बस हादसा, कोई ऐक्शन लेगा?

  • आई.एस. ठाकुर
  • मंडी जिले के जोगिंदर नगर में बस हादसे की खबर ने हिलाकर रख दिया। खासकर उस तस्वीर में, जिसमें एक बच्चे का शव फर्श पर गिरा हुआ था। पिछले दिनों मैं भारत आया हुआ था और कांगड़ा से जोगिंदर नगर होते हुए मनाली गया था। सड़क की हालत ऐसी थी कि खुद हमारी गाड़ी कई जगहों पर हादसों की शिकार होने से बाल-बाल बची। जोगिंदर नगर से मंडी की सड़क की हालत तो ऐसी है कि इससे बेहतर कच्ची सड़क ही होती। मगर कच्ची सड़क के अलावा और भी चीज़ें देखने को मिलीं, वे थीं मोड़ों पर की गई बेतरतीब खुदाई या फिर पत्थरों के ढेर। कई जगहों पर पेड़ों की टहनियां सड़क पर झुकी हुई हैं तो कई जगहों पर रिफ्लेक्टर नहीं लगे। रात को गाड़ी चलाते वक्त रिफ्लेक्टर न होने पर आप सीधे खाई से नीचे गिरेंगे, इसकी संभावनाएं ज्यादा हैं।पढ़ें: हिमाचल में कब तक होती रहेंगी सड़क दुर्घटनाएंमैंने जोगिंदर नगर हादसे की खबर आने के बाद पड़ताल करना शुरू किया तो पाया कि जोगिंदर नगर में पिछले कुछ महीनों में दर्जन भर सड़क हादसे हो चुके हैं और इतने ही लोग जान भी गंवा चुके हैं। कई जगहों पर तो परिवार के परिवार खत्म हो गए। अधिकतर जगहों पर हादसों की वजह थी- खराब सड़कें। यानी PWD विभाग द्वारा आधी-अधूरी बनाई गई सड़कें या फिर गलत ढंग से बनाई गई सड़कें। आप यकीन नहीं करेंगे कि कुछ जगहों पर तो खड़ी ढलान पर सड़क बना दी गई है। जिस किसी अधिकारी ने उस सड़क को बनाने की परमिशन दी होगी या तो उसने भांग खाई होगी या फिर वह नंबर वन नालायक रहा होगा। इन बातों पर बाद में आएंगे, पहले देखते हैं कि जोगिंदर नगर में बस खाई में क्यों गिरी। नीचे दिख रही तस्वीर पर जरा गौर करें-

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    यहीं से नीचे गिरी थी बस। (साभार: फेसबुक)
    यही वह जगह है, जहां से पास लेते वक्त धर्मशाला से रिकॉन्गपिओ जा रही बस खाई से नीचे गिर गई।- आप देख सकते हैं कि इस जगह पर पहले सड़क चौड़ी है और फिर अचानक चौड़ाई खत्म हो गई है।- यहां पर लोगों के पैरों के नीचे आपको नाली खुदी हुई दिख रही होगी।- सड़क किनारे कोई पैरापिट और रिफ्लेक्टर (जो लाइट पड़ने पर चमकते हैं) नहीं हैं।- सड़क की हालत भी खस्ता है।यह सही है कि ड्राइवर ने अधीरता दिखाते हुए गलत जगह पर पास लेने की कोशिश की। मगर उसने पहले चौड़ी जगह देखी होगी और इसी वजह से यह फैसला लिया होगा। मगर कंडक्टर ने बताया है कि जैसे ही पास लेने की कोशिश की, बस दाहिनी तरफ को झुकी और खाई में गिर गई। साफ है कि बस के दाहिनी तरफ के टायर इस नाली में गिरे और बस एक तरफ झुक गई। फिर जब तक ड्राइवर ने संभले की कोशिश की, आगे सड़क खत्म हो गई और बस सीधे नीचे जा गिरी। दिन में तो अंदाजा हो जाता है कि सडक कहां खत्म हो रही है और कहां पर खाई है। मगर रात को रिफ्लेक्टर या चूने वाले पत्थर न हों तो पता नहीं चलता। इसी वजह से ड्राइवर ने गलत जगह पर पास लेने की कोशिश की।साथ ही आप ये जो नाली देख रहे हैं, दरअसल यह ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC) बिछाने के लिए की गई खुदाई है। नियम कहते हैं कि सड़क पर ढांग की तरफ केबल नहीं बिछाए जा सकते, उन्हें सिर्फ वैली साइड में बिछाया जा सकता है। मगर इस जगह पर केबल को दाहिनी तरफ यानी ढांक की तरफ बिछाया गया था, जो नियमों का साफ उल्लंघन है। यही नहीं, केबल बिछाने के बाद सही से लेवलिंग (भरान) नहीं की गई थी, जिस वजह से नाली बन गई थी। इसमें रात को क्या, दिन में भी कोई बस हादसे की शिकार हो सकती है।- क्या PWD विभाग की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वह केबल बिछाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करे?-  क्या PWD विभाग खुद दोषी नहीं है, जो सड़कों के पैचवर्क और इसका ख्याल रखने के लिए उत्तरदायी है?- क्या इन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी या अब तक हुए हजारों हादसों के बाद इस हादसे को भी भगवान की मर्जी समझकर और मुआवजा बांटकर भुला दिया जाएगा?दरअसल हम कभी ऐसे हादसों पर सख्त कदम नहीं उठाते और इसी वजह से लापरवाहियां होती हैं। मैं दुनिया के कई देशों में देख चुका हूं कि सड़कों को लेकर वे बड़े संजीदा होते हैं। कहीं पर भी बिना प्लैनिंग और सही तैयारी के सड़कें नहीं बनतीं। काम होता है तो प्रॉपर होता है। केयर प्रॉपर होती है और हादसे होने पर जांच होती है और जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलता है और सजा भी होती है। मगर अपने यहां कोई कुछ नहीं पूछता। और जो लोग कहते हैं कि आप हमेशा बाहर का उदाहरण देकर भारत को नीचा दिखाते हैं, उन्हें पहले ही कह दूं कि सच को स्वीकार करना चाहिए और दूसरों की अच्छाइयों को अपनाना चाहिए।क्यों आज तक किसी भी हादसे के कारणों को ढूंढने की कोशिश नहीं की गई और क्यों आज तक किसी को दोषी नहीं पाया गया और क्यों सजा नहीं हुई? यही रवैया है कि सड़कें बनाने वाले इंजिनियर अपने दफ्तरों में मौज काटते हैं और अनपढ़ लेबर और मेट वगैरह के हाथों जिम्मा दे देते हैं। न तो वे चेकिंग करते हैं कि क्या बन रहा है, न कोई सुझाव देते हैं। इसीलिए कहीं पर ढलान में सड़क बन जाती है तो कहीं पर बैंकिंग गलत कर दी जाती है। क्योंकि इन बाबुओं को पता है कि कुछ भी हो जाए, इन पर कोई आंच नहीं आने वाली। सरकारें मुआवजा देंगी और अपने राजनीतिक दांव-पेंच में लग जाएंगी। इस मामले में भी ऐसा ही होगा। सबूत सामने हैं, मगर सब कोई आंखें मूंदकर बैठे रहेंगे।(लेखक हिमाचल प्रदेश से संबंद्ध रखते हैं और इन दिनों आयरलैंड में हैं। उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

    पालमपुर बाइकर क्लब ने स्वच्छ्ता के लिए बाइक रैली से दिया सन्देश

    इन हिमाचल डेस्क
    समाजसेवा एवं पर्यावरण सरंक्षण के क्षेत्र में पालमपुर क्षेत्र में पहचान बना चुके  युवा प्रोफेसनल युवकों के संगठन पालमपुर बाइकर क्लब ने स्वछता के प्रति जागरूकता का सन्देश देने के लिए पालमपुर कस्बे में बाइक रैली का आयोजन किया।  इस मौके पर बहुत से स्थानीय एवं बाहर से आये लोगों ने भी भाग लिया।
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    ऐतिहासिक न्यूगल कैफे से शुरू हुई यह रैली पुरे शहर का चक्कर लगाते हुए सुभाष चौक पर खत्म हुई।  युवा वर्ग की इस मुहीम को इलाके में सराहा जा रहा है।  गौरतलब है की इस से पहले भी पालमपुर बाइकर क्लब पर्यावरण सरंक्षण ख़ास कर पालमपुर शहर और आस पास के इलाकों को स्वच्छ रखने के लिए स्वछता अभियान चलाता रहा है।  इसी कड़ी में क्लब ने निटवर्ती सौरभ वन विहार में अपने स्तर पर डस्टबीन स्थापित किये थे।
    क्लब के मेंबर विजयन्द्र्र चौहान ने इन हिमाचल को बताया की।  बाइक रेल्ली से हमारा उद्देश्य इस क्षेत्र में लोगों को अपने आसपास की स्वछता के लिए जागरूक एवं संवेदनशील बनाना है  उन्होंने कहा पालमपुर हिमाचल प्रदेश के सबसे खूबसूरत कस्बों में से एक है।  कुदरत ने इसे बहुत सुंदरता बक्शी है।  यहाँ के नागरिक होने के नाते हमारा फर्ज है हम इसे बनाए रखें।  सरकार के साथ साथ हर जन की यह ड्यूटी है इसी सन्देश के तहत यह रैली निकली गयी थी।  ऐसे युवा अगर हर शहर गावं में अपना अपना संगठन बनाए और इस दिशा में कार्य करे तो हमारा हिमाचल सुंदर रहेगा
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    उन्होंने कहा भविष्य में भी हम ऐसे अभियानों को बढ़ावा देते रहेंगे और  क्षेत्र के लिए कुछ नया करते रहेंगे।
    हम यहाँ बताना चाहते हैं की पालमपुर बाइकर क्लब पालमपुर क्षेत्र के युवकों की एक संस्था है।  जो अड्वेंटर ट्रेकिंग आदि गतिविधियों में  विस्वास रखने के साथ साथ  सामाजिक क्षेत्र में भी भागिदार होते रहते हैं।

    मंत्री की पोस्ट पर पत्रकार का अभद्र कॉमेंट, OSD ने दिया जवाब

    शिमला।।

    सोशल मीडिया पर ऐक्टिव रहने वाले हिमाचल प्रदेश के परिवहन मंत्री जी.एस. बाली के फेसबुक पेज पर एक पत्रकार और मंत्री के ओएसडी के बीच तू-तू, मै-मैं का मामला सामने आया है। मंत्री की पोस्ट पर दैनिक भास्कर के पत्रकार अधीर रोहाल ने एक कॉमेंट किया, जिसकी भाषा एक पत्रकार होने के नाते शालीन नहीं कही जा सकती।

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    इस  कॉमेंट में उन्होंने शिकायत भरे लहजे में कहा कि मंत्री का फोन उठाने वाला हमेशा मंत्री के मीटिंग में होने की बात कहता है और उनका एक चमचा लाल बत्ती की गाड़ी में आकर वॉल्वो को लेट करवाता है। यही नहीं, इस कॉमेंट में मंत्री के OSD (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) विकास सिंघा का नाम लिखकर उन्हें चमचा कहा गया है और मंत्री को अपने स्टाफ को सुधारने की नसीहत दी गई है।

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    इस कॉमेंट पर करारा जवाब देते हुए खुद विकास सिंघा कॉमेंट किया और पूछा कि आप सबूत पेश करें कि कब ऐसा हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि जब मंत्री मीटिंग में होंगे तो यही कहा जाएगा कि मीटिंग में होंगे। साथ ही सिंघा ने बताया कि मैं OSD हूं और कानूनन हमें मंत्री के साथ ट्रैवल करने का अधिकार है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि मैं खुद पत्रकारिता की पढ़ाई कर चुका हूं और प्रतिष्ठित इंग्लिश अखबारों के लिए काम कर चुका हूं। इसलिए मुझे आप ठीक उसी तरह से चमचा नहीं कह सकते, जैसे आपको फ्लां अखबार का टट्टू नहीं कहा जा सकता।

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    मंत्री के OSD ने लिखा है कि फोन न उठाने की बात गलत है और अपने ऑफिस के लोगों से पूछ सकते हैं, जो रोज अपडेट लेते हैं। आखिर में पत्रकार को नसीहत देते हुए कहा गया है कि कृपया रात के 1 बजे के बजाय दिन में कॉमेंट करें ताकि आपकी कॉमेंट लिखने की मानसिक अवस्था पर कोई संदेह नहीं कर सके।

    गौरतलब है कि पत्रकारों के बीच यह कॉमेंट चर्चा का विषय बन गया है।  एक वरिष्ठ पत्रकार ने ‘इन हिमाचल’ को बताया कि अनुभवी पत्रकार द्वारा इस तरह की भाषा इस्तेमाल करना और यह भी न जानना कि कोई अधिकारी है या नहीं, उसका क्या काम होता है और फिर उसे चमचा कह देना गलत है। उन्होंने कहा कि यह व्यक्तिगत खुन्नस का मामला ज्यादा प्रतीत हो रहा है।

    मंत्री बसें खरीदने में व्यस्त डिप्पुओं में एक के बाद एक खाद्यान के सैंपल फेल !

    इन हिमाचल डेस्क
    हिमाचल प्रदेश की आम ग्रामीण जनता के स्वास्थय के साथ खिलवाड़ की इंतहा हो गई है।  सरकारी डिप्पों से एक के बाद एक खाद्यान आइटम के सैंपल फेल पाए जा रहे हैं अभी कुल्लू के डिप्पुयों से  चावल के  सेम्पल फेल होने की खबर खत्म नहीं हुई थी की अब लेवि चीनी के लिए गए 17 सेम्पल  के भी फेल होने की खबर अख़बारों में प्रमुखता से छपी है।
    हिमाचल प्रदेश की 90 % जनता डिप्पों से राशन लेती है जिस गति से हर वस्तु के सेम्पल फ़ैल होने  की ख़बरें आ रहीं है इस से जनता के बीच डर की स्थिति बानी हुई है साथ ही सरकार और खाद्यान विभाग की  टेन्डर प्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है।  आखिर ऐसे कैसे लोगों को टेंडर मिल रहे हैं जो हिमाचल के भोले भाले लोगों को खाद्य वस्तुयों के नाम पर कुछ भी खिला दे रहे हैं।
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    गौरतलब है की इस से पहले भी प्रदेश में तेल आदि के सैंपल फेल होते रहे हैं। इन मामलों में अभी तक विभाग की कारवाई संतोषजनक नहीं पाई गई है।  मिलावटी सामान बेचने के कड़े प्रावधान कानून में दर्ज हैं परन्तु छोटे मोठे फाइन और टेंडर लेने वाली फर्म को ब्लैकलिस्ट करने का आश्वासन  देने के अलावा विभाग कुछ ख़ास नहीं कर पाया है।
    ऐसा उस विभाग में हो रहा है जो सरकार में सबसे तेज़ तर्रार माने जाने वाले मंत्री जी एस बाली के पास है।  खाद्य आपूर्ति के साथ परिवहन और टेक्नीकल एजुकेशन देखने वाले बाली शायद इस मंत्रालय की जिम्मेदारी से न्याय नहीं कर पा रहे हैं उनकी अधिक दिलचस्बी परिवहन निगम के सुधारों में ज्यादा नजर आ रही है।  जो भी है लेकिन आम जनता के  स्वास्थ्य से  प्रदेश में खुला  खिलवाड़ हो रहा है परन्तु कोई भी कार्रवाई अभी तक शून्य पाई गई है।  लोगों का कहना है की जब कानून में मिलावट करने वालों के लिए सख्त  प्रावधान हैं तो  सरकार को टेंडर लेकर मिलावटी सामान सप्लाई करने वाली फर्मों के खिलाफ जुर्माने के साथ साथ कानूनी कार्रवाई भी अमल में लानी चाहिए

    सरकार गिरने के धूमल के कयासों को जयराम ने बताया बेवजह का राग !

    सरकार गिरने के धूमल के कयासों  को जयराम ने बताया बेवजह का राग  !

    मंडी

    भाजपा के धड़ेबाजी समय समय पर बाहर निकलती आती रही है।  इसी कड़ी में मंडी के कद्दावर नेता पूर्व मन्त्रीं एवं सिराज से भाजपा विधायक जय राम ठाकुर ने मंडी में पत्रकार वार्ता के दौरान कुछ ऐसा कहा की भाजपा काडर में खलबली मच गई।

    पत्रकार ने जब प्रदेश में  सरकार गिरने की स्थिति में जल्द चुनाव होने के आसार पर पूछा तो जयराम तपाक से बोले कार्यकर्ता चुनाव होने का इंतज़ार कर रहे है सरकार गिरने का नहीं। जय राम यहीं नहीं रुके साथ में यह भी कहा की कुछ लोग बेवजह कई सालों से सरकार गिरने की अफवाह फैला रहे हैं।   विदित है की नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल अक्सर यह कहते हुए आ रहे है की सरकार कार्यकाल पूरा नहीं करेंगे और गिर जाएगी।
    अब इसका क्या मतलब निकाला जाए की धूमल जो अक्सर कहते हैं उसे जयराम ने बेवजह की बयानबाज़ी का तमगा दे दिया है।
    इसके बाद मुख्यमंत्री कैंडिडेट के बारे में जब जय राम से पुछा गया तो यहाँ भी पूर्व मुख्यमन्त्रीं और नेता प्रतिपक्ष का नाम लेने से जयराम ने परहेज किया और कहा की   भाजपा आलाकमान तय करेगा मुख्यमन्त्रीं कौन होगा।  जयराम ठाकुर के इन बयनों की राजनीति  क्षेत्र में बहुत चर्चा है।  गौरतलब है की प्रदेश राजनीति में जय राम ठाकुर को शांता कुमार और जे पी नड्डा का करीबी माना जाता रहा है।
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    भाजपा की नई पीढ़ी में जयराम ठाकुर सबसे कद्दावर नेता है जो लगतार चुनाव जीतकर आ रहे हैं और प्रदेश भाजपा के अद्यक्ष तक रह चुके हैं।  मुख्यमंत्री के लिए भी उनके नाम पर चर्चा चलती रही है।  हालाँकि जय राम ठाकुर ने खुद इसकी रफ इशारा भी किया और कहा की इस बार जिला मंडी प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करेगा।

    प्रदेश राजनीति में बाली शांता जुगलबंदी के मायने !

    सुरेश चंबयाल

    हिमाचल की राजनीति में आजकल खासे किस्से उभर कर सामने आ रहे हैं एक तरफ धूमल एवं वीरभद्र परिवारों की आपसी खींचतान चरम पर है तो दूसरी तरफ टांडा मेडिकल कालेज में सराय के शिलान्यास कार्यक्रम में वीरभद्र शांता कुमार की जुगलबंदी अलग ही कहानी ब्यान करती है।  वीरभद्र धूमल को घेरने के लिए शांता कुमार की शालीनता के तीर को हमेशा तरकश में रखते हैं।  वहीँ शांता कुमार बेशक मुख्यमंत्री से इस्तीफा मांग चुके हों परन्तु शिलान्यास के लिए उन्हें ही बुलाते हैं।
    खैर यह तो काफी पहले से चल रहा है वैसे भी बुढ़ापे में बुजुर्गों का आपसी प्रेम बढ़ ही जाता है , शांता कुमार कांगड़ा घाटी से एकछत्र नेता रहे हैं।  बेशक उन्होंने चुनाव हारे भी हो फिर भी कांगड़ा में जितना असर शांता कुमार का रहा है उतना किसी का नहीं रहा है।  हालाँकि भाजपा कांग्रेस में भी  कंवर दुर्गा चंद. जी एस बाली  रविंदर सिंह रवि , चन्द्र कुमार सत महाजन पंडित संत राम जैसे दिग्गज कांगड़ा से निकल कर  आये हैं या हैं परन्तु इन सबका प्रभाव एक विधानसभा क्षेत्र तक ज्यादा सीमित रहा है।  पिछले 50 वर्षों की राजनीति पर अगर नजर दौड़ाई जाएँ तो दोनों दलों में से शांता कुमार ही ऐसे नेता रहे हैं जिन्हे किसी ख़ास क्षेत्र का न कहते हुए विशुद्ध कांगड़ा का सर्वमान्य लीडर कहा जा सकता है इसी कांगड़ा के दम पर शांता कुमार दो बार प्रदेश के मुख्यमन्त्रीं भी बने।
    अब बात करते हैं मोजुदा दौर की शांता कुमार अब बुजुर्ग हो चले  हैं सम्भवत् राजनितिक सक्रियता के रूप में उनकी यह अंतिम पारी है।  शांता कुमार के बाद ऐसा कोई नहीं दिखता जो दोनों दलों में पुरे कांगड़ा का नेता माना जाए।   तमाम विरोध के बावजूद पिछले चुनाव में देखा गया की कांग्रेस जनों के अंदर भी शांता के लिए इमोशनल फेवर था।  शांता कुमार को वर्तमान राजनीति के परिपेक्ष में आदर्श नेता माना जाता रहा है।  इसलिए विरोधी भी उनकी इज़्ज़त लगातार करते रहे हैं।
    शांता कुमार के बाद एक नेता जो नूरपुर से लेकर ज्वालाजी और देहरा से लेकर बैजनाथ तक फैली कांगड़ा सल्तनत के दम पर हिमाचल का मुख्यमन्त्रीं बंनने का सपना संजोए हुए दिख रहा है तो वो नगरोटा के क्षत्रप लीडर जी एस बाली हैं।  1998 में शांता कुमार की प्रदेश राजनीति से  विदाई के बाद धूमल वीरभद्र के हाथों में बंटती आ रही मुख्यामंत्री की कुर्सी पर अब कांगड़ा से जी एस बाली ने दावेदरी ठोकने का अभियान शुरू  कर दिया है।  इसी तर्ज में बाली सिर्फ  नगरोटा का लीडर होने की अपनी इमेज को तोड़कर कम से कम कांगड़ा चम्बा का लीडर होने के बाद इस छवि को प्रदेश स्तर पर ले जाने के लिए दिलोजान से लगे हुए  हैं।  इसी कड़ी में बाली ने सोसल मीडिया के उन अस्त्रों का सहारा ठोक बजाकर लेना शुरू कर दिया है जिनपर कांग्रेस जन ज्यादा विस्वास नहीं करते हैं।  बाली इस समय सोशल मीडिया पर प्रदेश के सबसे एक्टिव नेता है जो समस्याओं का समाधान भी इसी प्लेटफॉर्म से कर रहे हैं। बाली कहीं न कहीं चाहते हैं की जनता यह न सोचे वो सिर्फ नगरोटा के नेता है बल्कि कम से कम उनके गृह जिले के लोग उन्हें पार्टीबाजी से ऊपर उठकर ऐसे नेता के रूप में देखें जो राजनीति में हाशिये पर गए इस जिले को मुख्यमंत्री पद भी दिलवा सकता है।
    यूँ तो बाली के सबंध  विपक्ष के हर नेता से ठीक रहे हैं चाहे वो प्रेम कुमार धूमल हों या शांता कुमार हों। परन्तु कांगड़ा में बाली अब शांता कुमार का स्थान विशेष रूप से लेने के लिए उनके ऊपर ज्यादा मेहरबान हैं इसी कड़ी में टांडा मेडिकल कालेज की सराय निर्माण के लिए धन उपलब्ध करवाने के लिए बाली का शांता को लीक से हटकर  धन्याबाद देना हो या नए चलने वाले वॉल्वो रुट श्रीनगर धर्मशाला बस को शांता से झंडी दिखलाकर  विदा करवाने की रणनीति हो।  इसे सम्मान  कहें या स्वार्थ   बाली भविष्ये में शांता काडर को और शांता कुमार के मौन फेवर को अपने लिए भी प्रयोग करना चाहते हैं।  कहा जाता रहा है की शांता कुमार कांगड़ा में जब चन्द्र कुमार से हारे थे उस समय ओ बी सी वोटर्स का बहुत बड़ा रोल था।  बाली हैं तो ब्राह्मण पर उनका नगरोटा मॉडल आफ डेवलपमेंट ओ बी सी मतदाता पर ही चला है 70 % OBC बाहुल्य सीट से बाली लगातार जीतकर आ रहे हैं शांता का मौन समर्थन अगर मिलता है तो ब्राह्मण वोट बैंक भी बाली के साथ जा सकता है।
    हालंकि यह सब इतना आसान भी नहीं है बाली को टक्कर विपक्ष से इतनी नहीं है जितनी अपनी पार्टी के सेनापतियों से है।  राजा के ख़ास प्यादे मजबूती से बाली के आसपास मोर्चों पर घाटी में मौजूद हैं चाहे वो सुधीर शर्मा हों , पवन काजल हों नीरज भारती हो या संजय रतन हो।  कांगड़ा किले के सेनापतियों में नूरपुर के किले से बाली को थोड़ी बहुत मदद है थोड़ा बाली पालमपुर से भी आशा रख सकते हैं बाकी कांगड़ा की हमीरपुर मंडी और ऊना से लगती सीमायों पर बैठे राजा के प्रहरी क्या बाली को पुरे  कांगड़ा का सर्वमान्य लीडर होने देंगे जो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने के लिए बहुत जरुरी है इस पर संदेह है।  नगरोटा में बाली की सोनिया के स्वागत में होने वाली प्रस्तावित रैली राजनीति में इस दबंग नेता के अरमानों का पहला शक्ति प्रदर्शन होगी.. . . ऐसा राजनीतिक पंडित कह रहे हैं।
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    बाकी लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है कांगड़ा की जनता क्या बाली में अपने अरमानों को शिमला की सरदारी के रूप में देखती है या नहीं यह आने वाला वक़्त ही बताएगा।  परन्तु फिलहाल के क्रियाकलाप और शांता कुमार के प्रति बाली के हालिया सम्मान से यह पता जरूर चलने लगा है की २०१७ में अगर कांग्रेस हाई कमान ने हरी झंडी दे दी तो बाली पुरे बल प्रयोग के साथ कांगड़ा दुर्ग के दम  पर शिमला के लिए चढ़ाई को तैयार होने वाले हैं।  और ऐसा तो राजा वीरभद्र सिंह  की बाली के रास्ते में  आने वाली कूटनीति का तोड़ बाली भी कांगड़ा से शांता की शालीनता और मौन फेवर से देने की सोच रहे है , यही इसी जुगलबंदी के मायने फिलहाल लग रहे हैं।