छात्रा को किडनैप करने की कोशिश, कूदकर बचाई जान

शिमला।। रामपुर में एक छात्रा के अपहरण की कोशिश का मामला सामने आया है। खबर है कि राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय रामपुर की छात्रा को स्कूल जाते वक्त किडनैप करने की कोशिश की गई। ऑटो में बैठी छात्रा ने छलांग लगाई और भागकर अपने स्कूल पहुंची। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज करके छानबीन शुरू कर दी है।

 

बताया जा रहा है कि छात्रा नोगली से स्कूल के लिए आटो में बैठी थी। स्कूल पहुंचने पर छात्रा ने आटो चालक को आटो रोकने के लिए कहा लेकिन उसने एक नहीं सुनी। जब आटो नहीं रोका तो छात्रा ने पाट बंगला के पास छलांग लगा दी। भागकर वह स्कूल पहुंची और घटना के बारे में बताया।

 

पुलिस के अनुसार आटो में चालक के अलावा दो और युवक भी सवार थे। ये युवक आटो चालक के जान पहचान वाले बताए जा रहे हैं। छात्रा आटो रोकने के लिए चिल्लाई तो इन युवकों ने भी कुछ नहीं कहा। आटो चालक ने चौधरी अड्डे, पुराना बस अड्डा और कॉलेज के पास आटो नहीं रोका तो छात्रा ने चलते आटो से छलांग लगी दी।

 

छात्रा स्कूल पहुंची और मामला प्रिंसिपल के ध्यान में लाया। इसके बाद छात्रा के पिता को भी सूचना दी गई। मामले की शिकायत प्रिंसिपल ने रामपुर थाना को दी। छात्रा के पिता ने अपहरण का मामला दर्ज करवाया है। आटो चालक के खिलाफ मामला दर्ज रामपुर थानाध्यक्ष संजीव कुमार ने बताया कि आटो चालक पर अपहरण का मामला दर्ज किया है। पोक्सो के तहत भी मामला दर्ज किया है।

 

आरोपी आटो चालक की तलाश की जा रही है। रामपुर आटो यूनियन के सदस्यों को थाना में तलब किया गया है। पुलिस नोगली में सीसीटीवी फुटेज भी खंगाल रही है। आटो चालकों की शिनाख्त परेड भी करवाई गई मगर किसी की पहचान नहीं हो सकी है।

पीड़िता के मुताबिक राम रहीम के डेरे में गंदे काम को ‘माफ़ी’ कहा जाता था

चंडीगढ़।। बाबा राम रहीम आज सलाखों के पीछे है। इस मामले में कई गवाह तो इसलिए पीछे हट गईं क्योंकि उनका कहना था कि हम शादीशुदा हैं और हमारे बयान देने से हमारी जिंदगी पर असर पड़ेगा। मगर दो महिलाओं ने हिम्मत रखी और बाबा को जेल पहुंचाया। इन महिलाओं ने अपने साथ हुई घटनाओं की जो जानकारी दी है, उसे देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उन्हें किस अपमान, दर्द और मुश्किल हालात से जूझना होगा। साध्वियों ने जो बयान सीबीआई कोर्ट में दिया था, उसमें बताया है कि बाबा किस तरह से उन लड़कियों से बलात्कार किया करता था, जिन्हें उनके परिजन डेरे में साध्वी बना दिया करते थे।

 

यही नहीं, अन्य और पुरानी साध्वियां जो खुद इस हरकत की शिकार हो चुकी होती थीं, शायद डेरे के अंदर के सिस्टम ने उन्हें ऐसा बना दिया था कि उन्हें ये चीजें सामान्य लगती थीं। यह अजीब और हैरान करने वाला है कि बाबा की हरकत को उन्होंने क्या नाम दिया था।

 

आश्रम में जहां बाबा रहता है, उसे गुफा नाम दिया गया है। बयानों में महिलाओं ने दावा किया है कि वह खुद भगवान बताता था और उसके चेले बलात्कार को ‘माफी’ कहते थे। जहां बाबा रहता था, वहां सिर्फ महिला साध्वियां तैनात होती थईं। महिलाओं ने अपने बयान में बताया कि अधिकतर लड़कियां डेरे में इसलिए भी रहने के लिए मजबूर थीं क्योंकि उनके परिवार वाले बाबा के अंध भक्त थे। शिकायतों के बावजूद घरवाले उनकी एक नहीं सुनते थे।

 

हरियाणा के यमुनानगर की रहने वाली एक पीड़िता ने स्पेशल सीबीआई जज एके वर्मा के सामने 28 फरवरी 2009 को अपना बयान दर्ज करवाया था। इसके मुताबिक, पीड़िता अपने भाई की वजह से जुलाई 1999 से डेरे में रह रही थी। बाद में अपनी बहन के लिए न्याय पाने के संघर्ष के दौरान इस भाई की हत्या करा दी गई थी। साध्वी के मुताबिक, शुरुआत में तो उसे समझ में ही नहीं आया, जब महिला अनुयायियों ने उससे पूछा कि क्या उसे ‘पिताजी से माफी’ मिली। हकीकत तब सामने आई, जब बाबा ने 28 और 29 अगस्त 1999 की दरमियानी रात उसे अपनी गुफा में बुलाया और उसका रेप किया।

 

9 सितंबर 2010 को एक दूसरी साध्वी ने अपने बयान में बताया कि वह जून 1998 में डेरे से जुड़ी थी। गुरमीत राम रहीम ने उसे नज्म नाम दिया था। पीड़िता सिरसा की रहने वाली थी। वह भी अपने घरवालों के कहने पर डेरे में आई थी। 1999 में जब उसकी ड्यूटी गुफा में लगी थी, उसे अंदर बुलाया गया। इसके बाद राम रहीम ने उसका रेप किया। साथ ही किसी को इस बारे में न बताने की धमकी दी।

 

इसीलिए, ऐसे बाबाओं से बचकर रहें।

लेख: चुनाव आते ही ऐसे पैंतरे क्यों दिखाते हैं वीरभद्र?

आई.एस. ठाकुर।। साल 2012 के आखिर में हिमाचल आया हुआ था। चुनाव नजदीक थे और चारों तरफ चर्चा थी कि वीरभद्र सिंह कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में जा रहे हैं। मेरे कुछ दोस्त हैं जो कांग्रेस के (दरअसल वीरभद्र) के खानदानी समर्थक हैं। वे बड़े परेशान नजर आ रहे थे और रह-रहकर कौल सिंह ठाकुर को कोस रहे थे, जो उन दिनों खुद को सीएम कैंडिडेट बनाने की दावेदारी पेश कर रहे थे। एक दोस्त का कहना था कि अगर हिमाचल में कांग्रेस अगर कुछ है तो वीरभद्र की वजह है और वीरभद्र के बिना कुछ भी नहीं। उसका यह भी कहना था कि अगर वीरभद्र कांग्रेस छोड़कर एनसीपी में जाते हैं तो उनके साथ कई बड़े नेता, पूर्व मंत्री और विधायक भी एनसीपी में चले जाएंगे और चुनाव में उतनी ही सीटें आएंगी, जितनी उनके कांग्रेस में रहते आती।

 

मैं अपने दोस्त की सादगी और भोलेपन पर मुस्कुरा सा दिया था। वह शायद चुनावी राजनीति के गणित को नहीं समझता। वह और उसके जैसे न जाने कितने ही लोग सीटों के आधार पर आकलन करते हैं किसी की कामयाबी का। उसे कितने वोट मिले, वोट शेयर कितना रहा, इसपर ध्यान नहीं देते। अक्सर देखा जाता है कि हिमाचल में सरकारें बदलने में कुछ प्रतिशत वोट का मार्जन ही सरकार पलट देता है। 2007 के विधानसभा चुनावों के बाद जब बीजेपी सत्ता में आई थी, तब उसे वोट प्रतिशत 43.78 पर्सेंट था और कांग्रेस का 38.90 पर्सेंट। मगर 2012 के चुनावों में मामला उलट-पलट हो गया। बीजेपी का वोट शेयर 38.47 पर्सेंट रह गया और कांग्रेस का 42.81 पर्सेंट हो गया। तो इस हालात में देखें पता चलता है कि साढ़े चार से साढ़े 5 फीसदी वोटरों का रुख ही तय करता है कि सरकार किसकी बननी है। अगर वीरभद्र उस वक्त एनसीपी में चले गए होते तो जनता कन्फ्यूज़ होती, आधे वोट कांग्रेस में बंटते, आधे एनसीपी में और फिर वह हो जाता जो हिमाचल में कभी नहीं होता। यानी बीजेपी लगतार दूसरी बार सत्ता में आ गई होती।

 

पिछले चुनावों में कौल सिंह से थी वीरभद्र को दिक्कत
अगर ऐसा होता तो कांग्रेस के लिए चिंता की बात हो जाती क्योंकि वह जानती है कि हिमाचल में बारी-बारी से सरकारें बदलती रही है। अब उसका नंबर आने वाला था, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि बिना वजह यह मौका जाने दिया जाए। चूंकि उस वक्त वीरभद्र विरोधी खेमा मजबूती से एकजुटता दिखा रहा था, अचानक अखबारों में कहीं से खबर आई (शक है कि प्लांट करवाई गई) कि नाराज़ वीरभद्र एनसीपी में जॉइन करने जा रहे हैं। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कौल सिंह ठाकुर खुलकर न्यूज चैनलों को इंटरव्यू दे रहे थे और दावेदारी जता रहे थे। (वीडियो देखें)

पूरे प्रदेश में यह सुगबुगाहट रही कि अब तो तैयारी है। वीरभद्र को चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख तो बनाया ही गया था, आलाकमान ने कई मीटिंगों के बाद उन्हें प्रदेश अध्यक्ष भी बना ही दिया। दरअसल वीरभद्र के सारे करीबी विधायक उनके साथ लामबंद हो गए थे। कांग्रेस आलाकमान नहीं चाहती थी कि यह मौका हाथ से जाए सत्ता में आने का। इसलिए उसने वीरभद्र के आगे घुटने टेक दिए। फिर यह अलग बात है कि वीरभद्र कांग्रेस को सरकार में लाने में कामयाब भी रहे और फिर उन्होंने मुख्यमंत्री बनने पर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पद छोड़ दिया।

 

इस बार सुक्खू को हटाने की जुगत में लगे हैं
आज 2017 है और न जाने क्यों लग रहा है कि हालात 2012 जैसे हैं। पांच साल में वक्त कितना बदल गया, वीरभद्र नहीं बदले। जिस तरह से वीरभद्र के समर्थक उस वक्त के प्रदेशाध्यक्ष कौल सिंह के पीछे पड़े होते थे, इस बार वे मौजूदा प्रदेशाध्यक्ष सुक्खू के पीछे हाथ धोकर पड़े हैं। मुख्यमंत्री खुद कई टिप्पणियां करते रहे हैं उनपर। पिछले दिनों एक चिट्ठी भी लीक हुई थी जो वीरभद्र ने कथित तौर पर आलाकमान को सुक्खू की शिकायत करते हुए भेजी थी। और अब पिछले दिनों उन्होंने संगठन से सहयोग न मिलने की बात कहते हुए कहा कि यही हाल रहा तो मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा। उन्होंने इस संबंध में हाईकमान को सूचित करने की भी बात कही। इसके बाद उनके खास और कैबिनेट मंत्री प्रकाश चौधरी ने कहा कि वह नहीं लड़ेंगे तो मैं भी नहीं लड़ूंगा और बाकी विधायकों की भी यही राय है।

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि दरअसल यह तो होना ही था। लंबे समय से ही सुक्खू और संगठन के खिलाफ बयानबाजी करके वीरभद्र माहौल बना रहे थे कि वह सहयोग नहीं दे रहा। और अब उस पूरी कवायद का क्लाइमैक्स आ गया जब उन्होंने कहा कि मैं चुनाव नहीं लडूंगा। यह ठीक उसी तरह से प्रेशर बनाने की रणनीति है, जिस तरह का प्रेशर उनके 2012 में एनसीपी में जाने की चर्चाओं से बना था।

 

काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती
मगर इस बात आलाकमान उनकी कितनी सुनेगा, यह देखना होगा। क्योंकि अब तक के प्रयास सुक्खू को हिला नहीं पाए, ऐसे में उन्हें हटाना भी कांग्रेस के लिए खतरनाक होगा क्योंकि वह लंबे समय से संगठन को संभाले हुए हैं। कई जगहों पर कांग्रेस संगठन के सामान्य पदाधिकारियों ने बड़े नेताओं और चुनौती दी है और अपना जनाधार बनाया हुआ है। साथ ही कांग्रेस से हिमाचल के मामले में जो चूक हुई है, उसे वह ठीक करना चाहती है। हिमाचल को कम महत्व का राज्य समझती रही कांग्रेस, क्योंकि उसका दखल बड़े-बड़े राज्यों में था। बड़ी पार्टियां हमेशा दो-दो नेताओं को बराबर रखकर चलती है ताकि एक ज्यादा उछले तो दूसरे को चढ़ा दिया जाए। इस तरह से बैलंस बना रहता है। मगर हिमाचल में वीरभद्र को खुला हाथ देने का खामियाजा वह 2012 में भुगत चुकी है, जिसे ब्लैकमेलिंग की तरह लिया गया।

सुक्खू के जरिये बैलंस बना रही है कांग्रेस
यही वजह रही कि उसकी क्षतिपूर्ति की कोशिश कर रही कांग्रेस ने इस बार सुक्खू को भी संगठन में खुला हाथ दिया। वीरभद्र को कहा कि आप सरकार संभालो, सुक्खू को कहा कि आप संगठन संभालो। वीरभद्र छटपटाते रहे, शिकायतें करते रहे, बयान देते रहे… मगर सुक्खू घनी मूछों पर हाथ फेरते हुए खामोशी से मुस्कुराते रहे। शायद संगठन समझ गया है कि एक व्यक्ति को सभी से दिक्कत है तो मतलब बाकियों में नही, उसी में कुछ लोचा है। वैसे बैलंस की यह रणनीति कांग्रेस को तभी बना लेनी चाहिए थी जब सुखराम जैसे नेता कांग्रेस में वीरभद्र को चुनौती देने की हैसियत रखते थे। अब बहुत देर हो चुकी है। अगर वीरभद्र को नहीं मनाया तब नुकसान, सुक्खू को हटाया तब नुकसान और टकराव के साथ चुनाव लड़ा तब नुकसान… मगर सवाल उठता है कि सब मिलजुकर पूरी ताकत से भी चुनाव लड़ लेंगे, तब भी जीत पाएंगे क्या? वहीं अगर सुक्खू को नहीं हटाया जाता है तो क्या वीरभद्र चुपचाप घर बैठ जाएंगे और अपने वादे के मुताबिक चुनाव नहीं लड़ेंगे? दोनों का जवाब है- नहीं.

 

भविष्य के लिए सुक्खू को तैयार कर रही कांग्रेस?
कांग्रेस आलाकमान जानती है कि हिमाचल में नतीजे क्या रहने वाले हैं। उसे पता है कि इस बार शायद उसका नंबर नहीं है सरकार में आने का। इसलिए वह आगे की सोच लेकर चलेगी। वह यथास्थिति बनाए रखते हुए चुनाव लड़ेगी। दरअसल वह सुक्खू को तैयार कर रही है भविष्य के लिए। वीरभद्र के बाद जो लोग कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं, वे देखते रह जाएं और 2022 में जो चुनाव होंगे, उनमें सुक्खू को सीएम कैंडिडेट बनने का मौका मिल जाए।

मगर प्रश्न यह है कि वीरभद्र सब कुछ अपने हाथ में क्यों रखना चाहते हैं? वह ताकत को अपने पास रखने में क्यों यकीन रखते हैं? और उनके ऐसा करने से प्रदेश का कुछ फायदा भी जुड़ा है या नहीं? इन सवालों पर भी बात करेंगे, मगर किसी और दिन। फिलहाल तो इंतजार करके देखते हैं कि वीरभद्र के नए दांव का नतीजा क्या निकलता है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले से संबंध रखते हैं और इन दिनों आयरलैंड में एक कंपनी में कार्यरत हैं। उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

(DISCLAIMER: ये लेखक के अपने विचार हैं, इनके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं)

गुस्से में फूंके प्रदेश के लाखों रुपये, फिर गले मिलकर चल दिए

शिमला।। हिमाचल प्रदेश विधानसभा का चार दिन का मॉनसून सेशन शुक्रवार को खत्म हुआ। चार दिन के सत्र के दौरान विधानसभा की कार्यवाही सिर्फ और सिर्फ सवा 3 घंटे चली। इससे पहले बीजेपी विधायकों का शोर-शराबा, हंगामा, नारेबाजी, वॉकआउट और स्पीकर की तरफ से सदन का स्थगन ही देखने को मिला। मगर इस सेशन में हिमाचल प्रदेश की जनता के लाखों रुपये बर्बाद कर दिए गए। यह सेशन सत्ता और विपक्ष की ज़िद की भेंट चढ़ गया। न तो किसी मुद्दे पर चर्चा हुई, न ही कोई ढंग का काम हो सका। मगर आखिरी दिन दोनों पक्षों के नेता हंसी-खुशी मिले और विधानसभा की कार्यवाही अच्छे से निपटाने के लिए एक-दूसरे का धन्यवाद देते नहीं थके। (कवर इमेज फाइल फोटो है)

 

बीजेपी का हंगामा
सत्र के पहले दिन से ही बीजेपी नियम 67 के तहत काम रोककर गुड़िया केस पर चर्चा करना चाहती थी। स्पीकर ने यह मांग मानी नहीं और गतिरोध बना रहा। चौथे दिन भी यही हुआ। भाजपा के विधायकों ने हंगामा कि या और सीबीआई की तरफ से कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने को लेकर चर्चा की मांग की। सरकार से विपक्ष के फैसले पर कोई निर्णय नहीं आया। बीजेपी के चीफ विप सुरेश भारद्वाज ने मुद्दा उठाया तो स्पीकर बृज बिहारी बुटेल ने यह मांग यह कहते हुए खारिज कर दी मामला कोर्ट में विचाराधीन है। पहले दिन से ही ऐसा होता आ रहा था। बीजेपी का कहना था कि मामले पर चर्चा हो सकती है और इस तरह के मामलों पर पहले भी चर्चा होती रही है। मगर न विपक्ष झुकने को तैयार हुआ, न सत्ता पक्ष।

…और फिर बीजेपी के सुर बदल गए
चौथे दिन की कार्यवाही अभी 15 मिनट ही चली थी कि हंगामा हो गया। स्पीकर ने इसे 12 बजे के लिए स्थगित किया। 12 बजे कार्रवाई शुरू हुई। और अब बीजेपी के सुर बदल गए। संसदीय कार्य मंत्री  मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि आज गणेश चतुर्थी है और आखिरी सेशन का आखिरी दिन है (क्योंकि अब चुनाव होने हैं), इसे खुशी के साथ खत्म किया जाए। बीजेपी विधायक सुरेश भारद्वाज ने आश्वासन दिया कि अब विवाद नहीं होगा। चार दिन बर्बाद करने के बाद बीजेपी के रुख में नरमी आई।

 

इस सेशन में 3 विधेयक हुए पास
आखिर में विधानसभा अध्यक्ष बृज बिहारी लाल बुटेल ने विधानसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने से पहले कहा कि इस सत्र की 4 बैठकों के दौरान कुल 6 विधेयक सदन में विचार के लिए रखे गए, जिनमें से 3 को पास किया गया और 1 को सरकार ने वापस लिया। इसके साथ ही विभिन्न समितियों के प्रतिवेदनों को भी सभा पटल पर रखा गया।

मुख्यमंत्री ने लगाए भारत माता की जय के नारे
सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किए जाने के बाद मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने सदन में भारत माता की जय और हिमाचल की जय के नारे लगाए। सत्तापक्ष के सदस्यों ने भी इस दौरान उनके साथ ये नारे लगाए। इसके बाद नेताओंं ने हाथ मिलाया और आने वाले चुनाव के लिए एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और विदा हो गए।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला- पूर्व सैनिकों को नहीं मिलेगा वरिष्ठता में लाभ

नई दिल्ली।। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिक कोटे से नौकरी पाने वालों की सर्विस में सेना में की गई नौकरी के कार्यकाल जोड़कर वरिष्ठता में लाभ देने का नियम खारिज कर दिया है। अमर उजाला अखबार का कहना है कि इस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने शिमला हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार को आए फैसले के बाद पूर्व सैनिक कोटे में वरिष्ठता लाभ केवल उन्हीं पूर्व सैनिकों को मिल सकता है, जिनकी भर्ती सेना में 1971 से हुई है।

 

यह फैसला हिमाचल सरकार के लिए भी राहत भरा माना जा रहा है। दरअसल कैबिनेट ने 5 अगस्त को लाभ समाप्त कर दिया था। मगर इसके बाद पूर्व सैनिकों के विरोध के चलते मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कैबिनेट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक रोक दिया था।अब 1972 से लागू नियम 5 (1) में पूर्व सैनिक कोटे के तहत जॉइनिंग पर उनकी वरिष्ठता में सैन्य सेवाओं जोड़ने का देय प्रावधान समाप्त हो जाएगा।

 

गौरतलब है कि पहले होता यह था कि अगर कोई सेना से रिटायर होकर सरकार के किसी के विभाग में नियुक्त होता था, तब उसकी सर्विस में आर्मी में रहकर की गई सर्विस को जोड़कर वरिष्ठता में लाभ मिलता था। इससे उसका तो प्रमोशन हो जाता था मगर कई वर्षों से उसी विभाग में काम कर रहे अन्य कर्मचारी प्रमोशन से वंचित रह जाते थे। मगर अब ऐसा नहीं होगा।

जानें, आखिर डेरों के चक्कर मे क्यों पड़ते हैं लोग

आई.एस. ठाकुर।। पंजाब और हरियाणा में एक नहीं, कई सारे डेरे हैं। बहुत सारे धर्मगुरु हैं और उनके समर्थक उन्हें भगवान से कम नहीं समझते। डेरा सच्चा सौदा तो एक चर्चित नाम है, इसके अलावा भी कई ऐसे डेरे चल रहे हैं जिनका नाम आपने शायद न सुना हो। मगर इन डेरों के समर्थकों की संख्या बहुत ज्यादा है। उदाहरण के लिए बहुत कम लोगों ने हरियाणा के उस संत रामपाल का नाम सुना था, जिसके समर्थकों ने कई दिनों तक फायरिंग करके पुलिस की नाक में दम कर दिया था।

 

कौन जुड़ता है डेरों से?
आखिर कौन लोग होते हैं जो इन लोगों से जुड़ते हैं? इसके लिए हमें पहले पंजाब और हरियाणा के समाज का अध्ययन करना होगा। पंजाब, हरियाणा और हिमाचल पहले एक ही राज्य पंजाब के हिस्सा थे। फिर तीनों अलग-अलग राज्य बने। हिमाचल पहाड़ी राज्य था, जहां की जनसंख्या में जाति के आधार पर मिश्रण है। यहां पर समाज जातियों और जनजातियों में बंटा बेशक है, मगर किसी भी जाति समूह का दबदबा नहीं है। मगर पंजाब और हरियाणा में जाट और सिखों की तादाद काफी ज्यादा है और इनका राजनीतिक और सामाजिक दबदबा भी है।

पढ़ें: बीजेपी सरकार चाहती तो टल सकती थी हिंसा और मौतें

डेरों के अंदर नहीं होता भेदभाव
ऐसे में विभिन्न डेरों की तरफ वे लोग आकर्षित होते हैं जो वंचित लोग हैं। इनमें पिछड़े हुए, दलित और उपेक्षित शामिल हैं। ये विभिन्न धर्मों के हैं। डेरा सच्चा सौदा की ही बात करें तो वहां पर जाति को नहीं माना जाता। डेरे के समर्थक खुद को प्रेमी कहते हैं और खुद इंसां कहलाना पसंद करते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे डेरा प्रमुख अपना नाम- गुरमीत राम रहीम इंसां बताते हैं। ऐसे में जो लोग डेरे से जुड़ते हैं, उनका समाज डेरे के सदस्य ही हो जाते हैं। उनमें बड़ी एकता रहती है और वे एक-दूसरे की मदद के लिए उद्यत रहते हैं। समाज में बाहर उन्हें जो भेदभाव का सामना करना पड़ता है, उन्हें यहां वह देखने को नहीं मिलता।

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सहयोग का नेटवर्क
डेरों के प्रति लोगों का झुकाव कैसे होता है, इसे एक उदाहरण से समझते हैं। जिस कंपनी में मैं काम करता हूं, वहां पर एक यंग सॉफ्टवेयर इंजिनियर है और हरियाणा के सिरसा से है। आज चर्चा हुई तो उसने बताया कि अगर किसी डेरा प्रेमी (डेरा सदस्य) के परिजन को अस्पताल में खून की जरूरत पड़ती है तो जैसे ही इसकी सूचना अन्य सदस्यों को मिलती है, वे खून देने सबसे पहले पहुंच जाते हैं। वैसे ही किसी डेरा प्रेमी की बेटी की शादी होनी है और उसके पास पैसा आदि नहीं है तो डेरे के अन्य सदस्य अपनी तरफ से सहयोग करते हैं। ये तो कुछ उदाहरण हैं, एक-दूसरे की दुकानों से सामान खरीदने से लेकर एक-दूसरे को सुविधाएं पहुंचाने तक काम किया जाता है। इससे पता चलता है कि डेरों का एक अपना समाज बन गया होता है।

पढ़ें: इस चिट्ठी ने हटाया था गुरमीत राम रहीम के चेहरे से नकाब

गुरु या बाबा को मानने लगते हैं मसीहा या अवतार
चूंकि डेरे से पहले से ही बहुत लोग जुड़े होते हैं, वे डेरों को चंदा देते हैं, डेरे काफी अमीर हो गए होते हैं। इनके चंदे से डेरे स्कूलों, कॉलेजों, धर्मशालाओं और अस्पतालों को निर्माण करते हैं। डेरा सच्चा सौदा की ही बात करें तो उसने इन चीजों के अलावा कई भव्य स्टेडियम तक बनवाए हैं। ऐसे में लोग जब डेरे के संपर्क में आते हैं तो हैरान रह जाते हैं। साथ ही उन्हें बाकी सदस्यों से जो सहयोग और अपनापन मिलता है, वह उनके लिए अनोखा अनुभव होता है। यह अनुभव उनका दिल जीत लेता है। सुविधाएं आदि मिलने से उनके जीवन स्तर में हल्का ही सही, बदलाव आता है। ऐसे में उनकी आस्था डेरा प्रमुख में बढ़ जाती है। धीरे-धीरे यह आस्था इतनी बढ़ती है कि वे डेरे के प्रमुख को, अपने गुरु को एक मसीहा, एक अवतार मानने लग जाते हैं।

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अंधविश्वास बन जाती है आस्था
यह श्रद्धा अंधविश्वास की हद तक बढ़ जाती है। फिर आप जो मर्जी आरोप लगा लो, उन्हें यकीन ही नहीं होगा। वे अपने डेरे या गुरु के अपराध को अपनी आंखों के सामने भी देख लेंगे, मगर वे उसे नजरअंदाज कर देंगे क्योंंकि वे उस सिस्टम का हिस्सा बन गए होते हैं। विवेकहीन हो जाना इसी को कहते हैं। वे अपने सिस्टम, अपने डेरे के समाज और गुरु के लिए कुछ भी कर सकते हैं। सिस्टम से भिड़ सकते हैं, देश से भिड़ सकते हैं और जान देने और लेने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसा ही डेरा केस में भी देखने को मिला। बलात्कार का दोष सिद्ध होने के बावजूद उन्होंने उपद्रव किया।

 

..तो शायद लोग डेरों की तरफ न जाएं
जैसा कि ऊपर बताया, वे लोग डेरे के अंदर मिलने वाले सहयोग से आकर्षित होते हैं। सोचिए, अगर यही सहयोग उन्हें सामान्य रूप से मिलने लगे तो? अगर उनका पड़ोसी जाति, धर्म, आर्थिक स्तर आदि के आधार पर उनसे भेदभाव न करे तो? उनका पड़ोसी उनके दुख-दर्द में भागीदार बने तो? अगर सरकार ऐसी व्यवस्था बनाए कि नागरिकों को किसी तरह की असुविधा न हो तो? तो क्या लोग इन डेरों की तरफ अपनी समस्याओं का हल ढूंढने जाएंगे? इसका जवाब होगा- नहीं।

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भेदभाव तो हम भी करते हैं
ऊपर जो बातें कही गई हैं, वे सामान्य बातें हैं। हिंदुस्तान का समाज तो इसीलिए अच्छा माना जाता है क्योंकि यहां एक-दूसरे के दुखदर्द को बांटना फर्ज समझा जाता है। मगर अफसोस, इस काम में भी हमारा समाज यह देखता है कि कौन किस जाति का है, मेरा परिचित है या नहीं, या मेरा कितना फायदा होगा… वगैरह-वगैरह। इसी से उपेक्षित होकर लोगों को डेरों में उम्मीद की किरण दिखाई देती है और वे उनकी शरण में चले जाते हैं। फिर उन डेरों में उन भोले-भाले लोगों के साथ क्या होता है, किससे छिपा नहीं है।

 

हम ही ला सकते हैं बदलाव
इन लोगों पर गुस्सा करने या इनसे नफरत करने से कुछ नहीं होगा। बल्कि हमें अपने गिरेबान में झांककर देखना होगा कि उन्हें ऐसा बनाने में हमारी कितनी भूमिका है। सच यह है कि हरियाणा में हुई मौतों के लिए कहीं न कहीं वह समाज जिम्मेदार है, जिसमें हम रहते हैं और जिसे बनाने में हमारा भी योगदान है। जब तक हम खुद को नहीं बदलेंगे, तब तक लोग डेरों की तरफ खिंचते रहेंगे और पंचकुला जैसी घटनाएं होती रहेंगी।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले से संबंध रखते हैं और इन दिनों आयरलैंड में एक कंपनी में कार्यरत हैं। उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

(DISCLAIMER: ये लेखक के अपने विचार हैं, इनके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं)

लेख: बीजेपी सरकार चाहती तो हिंसा और मौतों को टाल सकती थी

आई.एस. ठाकुर।। डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सजा सुनाते ही उनके समर्थक बेकाबू हो गए और हिंसा पर उतारू हो गए। मजबूरन सुरक्षा बलों को बल प्रयोग करना पड़ा और दो दर्जन से ज्यादा की मौत हो गई, कई ज़ख्मी हो गए। यह नौबत न आती अगर अगर हरियाणा सरकार पहले ही कदम उठा लेती। पंचकूला में डेरा समर्थक अचानक नहीं आ गए, वे एक हफ्ते से वहां पर जुटना शुरू हो गए थे। मगर सबकुछ जानते हुए भी खट्टर सरकार ने कुछ नहीं किया। यहां तक कि जब कोर्ट ने कदम उठाने को कहा, तो धारा 144 लगाई जिसमें लोगों के इकट्ठा होने पर नहीं, बल्कि सिर्फ हथियार ले जाने पर रोक थी। बाद में कहा कि ये तो लिखने में गलती हो गई थी।

पढ़ें: इस चिट्ठी ने हटाया था गुरमीत राम रहीम के चेहरे से नकाब

इस तथाकथित गलती का नतीजा यह रहा कि कई परिवार उजड़ गए। मौत हुड़दंगियों की हो या आम लोगों की, मौत तो मौत ही है। यह चर्चा का विषय नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति क्या करता हुआ मारा गया। प्रश्न यह उठता है कि उसकी मौत को टाला जा सकता था या नहीं। और इसका जवाब है- हां, इन मौतों को टाला जा सकता था। अगर हरियाणा सरकार शुरू से ही पार्कों और सड़कों के किनारे जुटे लोगों को उठाकर बाहर भेजना शुरू कर देती, निषेधाज्ञा लगाकर लोगों को इकट्ठा न होने देती, तो कुछ भी होता, फैसले वाले दिन यानी शुक्रवार को इतनी जनता इकट्ठा न होती। साथ ही सरकार की तरफ से मुख्यमंत्री तो क्या, एक भी मंत्री की तरफ से ऐसा बयान नहीं आया कि डेरा सच्चा सौदा समर्थक हदों में रहें, पंचकूला न आएं वरना कड़ाई से निपटा जाएगा। आखिर बीजेपी सरकार क्यों मौत हो गई थी? इसका कारण है।

डेरा समर्थकों ने जगह-जगह आगजनी की है

दरअसल बीजेपी की सरकार हरियाणा में यूं ही नहीं बन गई, उसे डेरा सच्चा सौदा का समर्थन मिला हुआ था। डेरे के भक्त अपने गुरु के कहने पर वोट डालते आए हैं। करीबी लड़ाई में डेरे के समर्थकों के वोट कई बार निर्णायक साबित हो जाते हैं। पहले डेरा प्रमुख का समर्थन कांग्रेस को हुआ करता था। मगर इस बार हरियाणा चुनाव में बीजेपी के सारे उम्मीदवारों ने डेरा सच्चा सौदा सिरसा जाकर हाजिरी भरी थी और जीतने के बाद विधायक चुने गए बीजेपी वालों ने दोबारा वहां जाकर शुक्रिया अदा किया था।

हिमाचल के कई नेता भी राम रहीम के साथ मंच साझा कर चुके हैं।

अब यह समझा जा सकता है कि सरकार क्यों डेरे के समर्थकों के खिलाफ सख्त ऐक्शन नहीं ले पाई और क्यों उसकी बोलती बंद हो गई। मगर उसकी डेरे से करीबी का मनोवैज्ञानिक असर सीधे तौर पर प्रशासन पर भी पड़ा। अधिकारियों और पुलिसकर्मियों को पता है कि जिस सरकार के मंत्री और विधायक बाबा के आगे मत्था टेकते हैं, उसके चेलों को कुछ करना खतरे से खाली नहीं है। सरकारी मुलाजिम क्यों सरकार के बदों से पंगा ले?

यही वजहें रहीं कि न तो प्रशासन ने अपने से कुछ किया और न ही सरकार ने। अब आप यह भी समझ गए होंगे कि धारा 144 में लोगों के इकट्ठा होने के बजाय सिर्फ हथियार ले जाने पर क्यों रोक लगाई गई। यह क्लैरिकल मिस्टेक नहीं बल्कि चालाकी नजर आती है। इसके लिए हाई कोर्ट ने खट्टर सरकार को फटकार भी लगाई है और कहा है कि यह तो डेरे और सरकार की सांठगांठ नजर आ रही है।

(तस्वीर में राम रहीम के बगल में हाथ बांधकर खड़े शख्स नाहन के विधाय राजीव बिंदल हैं)

चलो मान लिया कि सरकार सख्त कदम नहीं लेना चाहती थी तो कम से कम अपने संबंधों का फायदा उठाकर ही डेरे से कहती कि अपने समर्थकों को वहां आने से रोको। हो सकता है कि सरकार ने ऐसा किया भी हो मगर जिसके आगे मंत्री घुटने टेकते हों, उस सरकार की बाबा कहां सुनेगा।

डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के साथ हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के साथ हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल विज

यह वोटों की राजनीति देश को बर्बाद करके रख देगी। हरियाणा सरकार ने पहले बाबा रामपाल के समर्थकों को नाराज न करना चाहा, फिर आरक्षण आंदोलन के चक्कर में जाटों को नाराज नहीं करना चाहा और फिर राम रहीम के समर्थकों को नाराज नहीं करना चाहा। इसका नतीजा यह हुआ कि हिंसा को टाला नहीं जा सका और कई लोगों की जानें यूं ही चली गईं। जो पार्टी परिवर्तन और बेहतर भविष्य और ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नारा लेकर चलती है, उसकी हकीकत बहुत स्याह नजर आती है। बाकी राज्यों में भी हालात ऐसे ही हैं, पार्टी कोई भी हो। न जाने अब ऐसा उपद्रव कहां और किस रूप में देखने को मिलेगा।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले से संबंध रखते हैं और इन दिनों आयरलैंड में एक कंपनी में कार्यरत हैं। उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

(DISCLAIMER: ये लेखक के अपने विचार हैं, इनके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं)

युवती का खून से लथपथ अर्धनग्न शव बरामद

ऊना।। हिमाचल प्रदेश के चिंतपूर्णी में शुक्रवार को एक युवती का शव अर्धनग्न हालत में मिलने से सनसनी फैल गई। घटना भरवाईं की है। युवती की लाश पर चाकू से वार के कई निशान मिले हैं और गर्दन भी कटी हुई है। इस शव को मुख्य सड़क से करीब 200 मीटर नीचे फेंका गया था। स्थानीय लोगों की नजर इसपर पड़ी तो पुलिस को खबर दी गई। इसके बाद पुलिस ने फरेंसिक एक्सपर्ट्स को मौके पर बुलाकर जांच शुरू की।

 

जानकारी के मुताबिक सुबह छह बजे के करीब सुकार गांव के एक व्यक्ति ने सड़क किनारे खून से लथपथ लाश देखी। मृतका की उम्र करीब 25 साल बताई जा रही है। खबर लिखे जाने तक उसकी शिनाख्त नहीं हो पाई थी। पुलिस शुरू में रेप के बाद हत्या की आशंका से भी इनकार नहीं कर रही थी। पुलिस का कहना था कि फरेंसिक जांच पूरी होने के बाद शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा जाएगा।

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डीएसपी लाल मन शर्मा ने बताया कि मामले की छानबीन जारी है। पुलिस ने मौके से खून से सना चाकू भी बरामद किया है। उन्होंने कहा कि होटलों और मंदिर के सीसीटीवी कैमरों को चेक किया जा रहा है।

इस दर्द भरी चिट्ठी से लगे थे राम रहीम पर संगीन आरोप

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डेरा सच्चा सौदा के बाबा राम रहीम पर यौन शोषण के आरोपों की कहानी शुरू होती है 2002 से। जब उन्हीं के डेरे की एक कथित साध्वी ने उन पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को एक गुमनाम चिट्ठी लिखी थी। पीड़िता ने ये चिट्ठी अटल बिहारी बाजपेयी के साथ हरियाणा और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री, कुछ आला अधिकारियों और कुछ मीडिया संस्थानों को भी भेजी थी। इस चिट्ठी के सामने आने के बाद डेरा सच्चा सौदा की प्रबंधन समिति के सदस्य रहे कुरुक्षेत्र के रणजीत सिंह की हत्या हो गई। आरोप डेरा सच्चा सौदा के प्रबंधकों पर लगा क्योंकि चर्चा है कि कि उन्हें यह शक था कि रणजीत ने अपनी बहन से यह गुमनाम चिट्ठी लिखवाई है। रणजीत की बहन भी डेरे में साध्वी रही थी। बहरहाल, आप भी पढ़िए 15 साल पहले लिखी गई इस चिट्ठी में ऐसा क्या था जिसने ख़ुदा समझे जाने वाले बाबा राम रहीम को बलात्कार का आरोपी बना दिया-

 

”मैं पंजाब की रहने वाली हूं और अब पांच साल से डेरा सच्चा सौदा सिरसा (हरियाणा, धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा) में साधु लड़की के रूप में कार्य कर रही हूं। सैकड़ों लड़कियां भी डेरे में 16 से 18 घंटे सेवा करती हैं। हमारा यहां शारीरिक शोषण किया जा रहा है। साथ में डेरे के महाराज गुरमीत सिंह द्वारा योनिक शोषण (बलात्कार) किया जा रहा है। मैं बीए पास लड़की हूं। मेरे परिवार के सदस्य महाराज के अंध श्रद्धालु हैं, जिनकी प्रेरणा से मैं डेरे में साधु बनी थी।

 

साधु बनने के दो साल बाद एक दिन महाराज गुरमीत की प्रमाशया साधु गुरजोत ने रात के 10 बजे मुझे बताया कि महाराज ने गुफा (महाराज के रहने के स्थान) में बुलाया है। मैं क्योंकि पहली बार वहां जा रही थी, मैं बहुत खुश थी। यह जानकर कि आज खुद परमात्मा ने मुझे बुलाया है। गुफा में ऊपर जाकर जब मैंने देखा महाराज बेड पर बैठे हैं। हाथ में रिमोट है, सामने टीवी पर ब्लू फिल्म चल रही है। बेड पर सिरहाने की ओर रिवॉल्वर रखा हुआ है। मैं ये सब देख कर हैरान रह गई… मेरे पांव के नीचे की ज़मीन खिसक गई। यह क्या हो रहा है। महाराज ऐसे होंगे, मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। महाराज ने टीवी बंद किया व मुझे साथ बिठाकर पानी पिलाया और कहा कि मैंने तुम्हें अपनी खास प्यारी समझकर बुलाया है।

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मेरा ये पहला दिन था। महाराज ने मेरे को बांहों में लेते हुए कहा कि हम तुझे दिल से चाहते हैं। तुम्हारे साथ प्यार करना चाहते हैं क्योंकि तुमने हमारे साथ साधु बनते वक्त तन मन धन सतगुरु को अर्पण करने को कहा था। सो अब ये तन मन हमारा है। मेरे विरोध करने पर उन्होंने कहा कि कोई शक नहीं, हम ही खुदा हैं। जब मैंने पूछा कि क्या यह खुदा का काम है, तो उन्होंने कहाः

1. श्री कृष्ण भगवान थे, उनके यहां 360 गोपियां थीं। जिनसे वह हर रोज़ प्रेम लीला करते थे। फिर भी लोग उन्हें परमात्मा मानते हैं। यह कोई नई बात नहीं है।

2. यह कि हम चाहें तो इस रिवॉल्वर से तुम्हारे प्राण पखेरू उड़ाकर दाह संस्कार कर सकते हैं। तु्म्हारे घर वाले हर प्रकार से हमारे पर विश्वास करते हैं व हमारे गुलाम हैं। वह हमारे से बाहर जा नहीं सकते, यह बात आपको अच्छी तरह पता है।

3. यह कि हमारी सरकार में बहुत चलती है। हरियाणा व पंजाब के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री हमारे चरण छूते हैं। नेता हमसे समर्थन लेते हैं, पैसा लेते हैं और हमारे खिलाफ कभी नहीं जाएंगे। हम तुम्हारे परिवार से नौकरी लगे सदस्यों को बर्खास्त करवा देंगे। सभी सदस्यों को मरवा देंगे और सबूत भी नहीं छोड़ेंगे, ये तुझे अच्छी तरह पता है कि हमने पहले भी डेरे के प्रबंधक को खत्म करवा दिया था, जिनका आज तक अता-पता ना है। ना ही कोई सबूत बकाया है। जो कि पैसे के बल पर हम राजनीतिक व पुलिस और न्याय को खरीद लेंगे।

इस तरह मेरे साथ मुंह काला किया और पिछले तीन माह में 20-30 दिन बाद किया जा रहा है। आज मुझको पता चला कि मेरे से पहले जो लड़कियां रहती थीं, उन सबके साथ मुंह काला किया है। डेरे में मौजूद 35 से 40 साधु लड़की 35-40 वर्ष की उम्र से अधिक है, जो शादी की उम्र से निकल चुकी हैं। उन्होंने परिस्थितियों से समझौता कर लिया है, इनमें ज़्यादा लड़कियां बीए, एमए, बीएड पास हैं। घरवालों के कट्टर अन्धविश्वासी होने के कारण नरक का जीवन जी रही हैं। हमें सफेद कपड़े पहनना, सिर पर चुन्नी रखना, किसी आदमी की तरफ आंख ना उठाकर देखना, आदमी से पांच-दस फुट की दूरी पर रहना महाराज का आदेश है। हम दिखाने में देवी हैं, मगर हमारी हालत वेश्या जैसी है।

मैंने एक बार अपने परिवार वालों को बताया कि यहां डेरे में सब कुछ ठीक नहीं है तो मेरे घर वाले गुस्से में कहने लगे कि अगर भगवान के पास रहते हुए ठीक नहीं है, तो ठीक कहां है। तेरे मन में बुरे विचार आने लग गए हैं। सतगुरु का सिमरन किया कर मैं मजबूर हूं। यहां सतगुरु का आदेश मानना पड़ता है। यहां कोई भी दो लड़कियां आपस में बात नहीं कर सकती, घर वालों को टेलीफोन मिलाकर बात नहीं कर सकती….

…पिछले दिनों जब बठिण्डा की लड़की साधु ने जब महाराज की काली करतूतों का सभी लड़कियों के सामने खुलासा किया तो कई साधु लड़कियों ने मिलकर उसे पीटा… …एक कुरुक्षेत्र जिले की एक साधु लड़की जो घर आ गई है, उसने घर वालों को सब कुछ सच बता दिया है। उसका भाई बड़ा सेवादार था जो कि सेवा छोड़कर डेरे से नाता तोड़ चुका है। संगरूर जिले की एक लड़की जिसने घर आ कर पड़ोसियों को डेरे की काली करतूतों के बारे में बताया तो डेरे के सेवादार गुंडे बंदूकों से लैस लड़की के घर आ गए। घर के अंदर कुण्डी लगाकर धमकी दी….

अतः आप से अनुरोध है कि इन सब लड़कियों के साथ-साथ मुझे भी मेरे परिवार के साथ मार दिया जाएगा, अगर मैं इसमें अपना नाम लिखूंगी….हमारा डॉक्टरी मुआयना किया जाए ताकि हमारे अभिभावकों को व आपको पता चल जाएगा कि हम कुमारी देवी साधू हैं या नहीं। अगर नहीं तो किसके द्वारा बर्बाद हुई हैं।”

वीडियो से उठे सवाल- कहां गईं अंग्रेजी शराब की 50 पेटियां?

चंबा।। एक वीडियो की वजह से डलहौजी पुलिस पर सवाल खड़े हो गए हैं। मंगलवार रात पंजाब से हिमाचल लाई जा रही देसी शराब की खेप पकड़ी गई थी। पुलिस ने देसी शराब की 152 पेटियां पकड़ने का दावा किया था। मगर एक वीडियो वायरल हो रहा है उसमें ठेकेदार के कर्मचारी बात कर रहे हैं कि 50 पेटियां अंग्रेजी शराब की भी थी। मगर इन पेटियों का एफआईआर में जिक्र नहीं है। फिर ये पेटियां कहां चली गईं? कहीं कोई गलती तो नहीं हुई? इस वीडियो के आधार पर डीएसपी डल्हौजी सागर चंद्र और एसडीएम डल्हौजी गौरव चौधरी ने मामले की जांच शुरू कर दी है। (कवर इमेज सांकेतिक है)

डलहौजी पुलिस ने मंगलवार को बनीखेत पेट्रोल पंप के पास थाना प्रभारी सन्नी गुलेरिया के नेतृत्व में एक लावारिस ट्रक (HP73 3253) से 152 पेटियां शराब बरामद करने बयान जारी किया था। मगर जो वीडियो शेयर किया जा रहा है, उसमें कहा जा रहा है कि 50 पेटियां अंग्रेजी शराब की पकड़ी गई हैं। इस वीडियो में शराब के ठेकेदारों के कर्मचारियों के अलावा एक खाकी वर्दी वाला भी नजर आ रहा है।

 

इस वीडियो में चार बार जिक्र है कि 150 देसी और 50 अंग्रेजी शराब की पेटियां हैं। हालांकि वीडियो में यह भी सुनाई दे रहा है कि एचएचओ डलहौजी भी आ रहे हैं, मगर इस वीडियो की हम पुष्टि नहीं करते। फिर भी प्रश्न उठने लगा है कि 50 पेटियां कहां गायब हो गईं? पुलिस की देखरेख में सारी कार्रवाई हुई थी तो ऐसा होना सवालों के घेरे में है क्योंकि इन पेटियों में मौजूद शराब का मूल्य ढाई लाख रुपये बताया जा रहा है।