पच्छाद: दयाल प्यारी ने किया नामांकन वापस न लेने का फैसला, लड़ेंगी चुनाव

एमबीएम न्यूज, शिमला।। बीजेपी से बागी हुईं जिला परिषद की सदस्य दयाल प्यारी ने कहा है कि वह नामांकन वापस नहीं लेंगी। इससे पहले वह कथित तौर पर अपना नामांकन पत्र वापस लेने को राजी हो गई थी। इसके लिए सरकार का जबरदस्त दबाव माना जा रहा था।

मगर वीरवार सुबह करीब 9:45 बजे के आसपास इस मामले ने नाटकीय मोड़ ले लिया। सोलन के एक निजी होटल में मीडिया के सामने दयाल प्यारी ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया।

दयाल प्यारी ने साफ किया कि वह अपना नामांकन पत्र वापस नहीं लेंगी। यहां तक कि जटोली मंदिर से अपना चुनाव प्रचार शुरू करने का भी दावा किया है।

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दरअसल सुबह तड़के से ही दयाल प्यारी के समर्थक सोलन में जुटना शुरू हो गए थे। दयाल प्यारी का पति पृथ्वी सिंह व ससुर माता राम भी सुबह सोलन पहुंच गए थे। माना जा रहा है कि परिवार के सदस्यों ने ही जिला परिषद् सदस्य दयाल प्यारी को इस बात से अवगत करवाया कि नामांकन वापस लेने की सूरत में समर्थकों में बड़ी निराशा होगी।

(यह खबर एमबीएम न्यूज नेटवर्क के साथ सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

दयाली देवी की सादगी भरी मधुर आवाज जो सीधे आत्मा को छू जाती है

इन हिमाचल डेस्क।। ढोलरू परम्परा के बारे में तो आप जानते ही होंगे कि कैसे चैत्र महीने का नाम ढोलरू गाने वालों के मुंह से सुनना हिमाचल में शुभ माना जाता है। अगर जानकारी न हो तो यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं। तो ढोलरू गाने वाली एक ऐसी ही महिला का वीडियो सोशल मीडिया लर खूब पसंद किया जा रहा है।

गायिका हैं दयाली देवी। उनका एक वीडियो ‘जय माँ धारा नागण’ पेज ने शेयर किया है। इतनी मधुर आवाज में वह एक लोकगीत ‘उड़ी जायां काले कागा’ गा रही हैं कि आपकी तबीयत खुश हो जाएगी।

न कोई ढोलक है साथ में न कोई और वाद्य यंत्र। दयाली देवी अकेली ही गाना गा रही हैं। इतनी शानदार हरकतें ले रही हैं, सुरों से बिल्कुल इधर-उधर नहीं हो रहीं। सुनें उनका गाना।

दयाली देवी जी के बारे में मंडी जिले से चलने वाले पेज ‘जय माँ धारा नागण’ ने लिखा है, “चैत्र के महीने में घर घर जाकर चैत्र सूनाती गांव भेई की दयाली देवी।”

आगे पेज लिखता है, “अपनी मधुर आवाज से सबका मन मोह लेने वाली दयाली देवी पेशे से गृहिणी है और पीठ में झुकाव से ग्रसित है। चलने में कठिनाई आने के बावजूद दयाली देवी चैत्र सुनाने घर-घर जाती हैं। इनके इस जज्बे को सलाम🙏🏼”

ढोलरू: प्रकृति को समर्पित हिमाचल प्रदेश का लोक गायन

संजय शर्मा की पत्नी के ट्रांसफर ऑर्डर हाईकोर्ट ने किए खारिज

शिमला।। जगह-जगह घूमकर जरूरतमंद लोगों के साथ फोटो खिंचवाकर सोशल मीडिया पर उनका दर्द बताने वाले कांगड़ा जिला निवासी संजय शर्मा की पत्नी के तबादले को होई कोर्ट ने रद कर दिया है। हाल ही में संजय शर्मा ने विधायकों का यात्रा भत्ता बढ़ने के विरोध में भीख मांगकर विरोध प्रदर्शन किया था।

एक हिंदी अखबार के मुताबिक, कथित तौर पर इससे नाराज होकर प्रदेश के आठ विधायकों ने धर्मशाला में पुलिस के नारकोटिक्स विंग में तैनात संजय शर्मा की पत्नी अनीता शर्मा का तबादला छठी आईआरबी बटालियन में करने के डीओ नोट भेजे थे। इसके आधार पर सीएम ऑफिस से अनीता के तबादले का आदेश जारी हो गया था।

बाद में अनीता शर्मा ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी जहां इस तबादला आदेश को रद्द कर दिया गया। संजय शर्मा ने अदालत के आदेश का स्वागत किया है और कहा है कि “समाजसेवा की मेरी मुहिम जारी रहेगी।” गौरतलब है कि तथाकथित समाजसेवी संजय शर्मा को आजकल उनकी टीम के सदस्य ‘बड़का भाऊ’ के नाम से बुलाने लगे हैं।

वह प्रदेश भर में घूमकर जरूरतमंद लोगों के पास जाकर उनके साथ फोटो खिंचवाते हैं और उनकी मदद करते हैं। वह उन जरूरतमंद लोगों का दर्द और पूरी कहानी भी सोशल मीडिया पर रखते हैं। इससे अन्य लोग भी इन जरूरतमंद लोगों की मदद के लिए आगे आते हैं और प्रशासन भी हरकत में आता है। हालांकि कई बार उनके दावों पर सवाल भी उठे हैं कि कैसे वह किसी एक व्यक्ति के दावे को ही सच मानकर एक ही पक्ष सामने रखते हैं।

‘समाजसेवी’ के दावों पर उठे सवाल, प्रशासन ने कहा- तस्वीरें सही नहीं

हिमाचल कांग्रेस सोशल मीडिया प्रमुख की ‘बचकानी टिप्पणी’ पर सवाल

शिमला।। हिमाचल में संकट के दौर से गुजर रही कांग्रेस ऐसे ऐसे कदम उठा रही है जो उसकी स्थिति खराब कर रहे हैं। आज डिजिटल मीडिया का दौर है सो आज इंटरनेट का दौर है सो हर पार्टी का जोर इंटरनेट के माध्यम से लोगों तक पहुंचना है। मगर हिमाचल कांग्रेस सोशल मीडिया प्रमुख अभिषेक राणा ने फेसबुक पर ऐसी बात पोस्ट की है जो न सिर्फ हास्यास्पद बल्कि मर्यादाहीन भी मानी जा रही है।

टिकट न मिलने पर किसी भी पार्टी के कार्यकर्ताओं का उदास होना और रोना बिलखना नया नहीं है। न ही उनका बागी होकर पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ना नया है। पच्छाद में भी ऐसा ही हुआ जब बीजेपी से टिकट न मिलने पर दयाल प्यारी रोने लगीं।

अभिषेक ने उनका वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “#BJPBhagaoBetiBachao शर्म की बात है मोदी जी की भाजपा में भी बेटियाँ सुरक्षित नही है,भाजपा राज में हिमाचल की भाजपा नेता काली माता का रूप धारण करके भाजपा के ही असुरों को विनाश करने के लिए निर्दलीय चुनाव लड़ रही है”

#BJPBhagaoBetiBachao शर्म की बात है मोदी जी की भाजपा में भी बेटियाँ सुरक्षित नही है,भाजपा राज में हिमाचल की भाजपा नेता…

Abhishek Rana ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಸೋಮವಾರ, ಸೆಪ್ಟೆಂಬರ್ 30, 2019

राजनीति में ऐसे मौकों पर सामने वाली पार्टी को घेरना तो ठीक है। ऐसा कांग्रेस के बागी भी करते रहे हैं मगर नारी, दुर्गा, असुर आदि कहना अजीब है। सोशल मीडिया पर चर्चा हो रही है कि ऐसे प्रतिद्वंद्वी पार्टी के लोगों को असुर कहना और ऐसी भाषा इस्तेमाल करना सरासर मर्यादाहीन और अपरिपक्व है।

कुछ भाजपा समर्थक यह बात भी कह रहे हैं कि अभिषेक राणा के पिता और सुजानपुर से विधायक राजेन्द्र राणा पर भी दल बदल और मौकापरस्ती के आरोप लगते रहे हैं, फिर वह कैसे ऐसी बात कर सकते हैं। हाल ही में इसी मामले पर ऊना के भाजपा कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाए थे।

सत्ती का दावा- सुधीर बीजेपी के संपर्क में थे, सुधीर ने कहा- झूठ है

शिमला।। बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती ने कहा है कि कांग्रेस नेता सुधीर शर्मा बीजेपी के संपर्क में थे मगर पार्टी ने धर्मशाला उपचुनाव में अपने कार्यकर्ता को मौका देना उचित समझा। सुधीर शर्मा के हवाले से मीडिया में बयान आया है कि सत्ती अपने बयान का खंडन करें वरना मानहानि मुकदमे के लिए तैयार रहें।

धर्मशाला उपचुनाव में पूर्व विधायक सुधीर शर्मा ही कांग्रेस के टिकट के प्रबल दावेदार थे मगर उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए चुनाव लड़ने में असमर्थता जता दी। अब पार्टी ने नए चेहरे को मौका दिया है। मीडिया में खबरें आई थीं कि सुधीर बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। इन अटकलों को तब बल मिला था जब धर्मशाला में आयोजित कांग्रेस के कार्यक्रम में सुधीर शामिल नहीं हुए और फिर प्रदेश संगठन के विरोध में उनके हवाले से खबरें छपीं। बाद में सुधीर ने दोनों का खंडन किया था।

अब बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सत्ती ने अब कहा है कि सुधीर का बीजेपी में आने का प्लान था भी और नहीं भी। उन्होंने कहा, “पार्टी ने फैसला किया कि बाहरी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने के बजाय कार्यकर्ता को ही मौका दिया जाए।”

अब सुधीर शर्मा ने सत्ती के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनका मानसिक संतुलन बगड़ गया है। एक अखबार में छपे बयान के अनुसार सुधीर ने कहा, “मुझे चुनाव लड़ना होता तो कांग्रेस से लड़ता। सत्ती पहले भी तथ्यहीन बयान देते रहे हैं। उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। बयान का खंडन नहीं किया तो मानहानि का केस करूँगा।”

सुधीर शर्मा ने क्या अपना राजनीतिक भविष्य खुद ही खत्म कर दिया?

आई.एस. ठाकुर।। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का वह करीबी नेता जिसे कुछ विश्लेषक हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य मानते थे, आज राजनीति में हाशिये पर खड़ा नजर आ रहा है। नाम है सुधीर शर्मा। अपने समय के दिग्गज कांग्रेसी नेता पंडित संतराम के बेटे सुधीर शर्मा को राजनीति बेशक विरासत में मिली मगर उनकी राह कभी आसान नहीं रही। मगर इस राह में उन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया खुद वीरभद्र सिंह ने जो राजनीति के खेल के माहिर खिलाड़ी हैं। मगर जो लोग सुधीर शर्मा को वीरभद्र की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी समझ रहे थे, आज वे निराशा में डूबे हैं। कारण- सुधीर शर्मा का धर्मशाला उपचुनाव लड़ने से इनकार और पार्टी का वहां से नया चेहरा उतारना।

2017 विधानसभा चुनाव में किशन कपूर से हार का सामना करने के बाद सुधीर शर्मा के पास मौका था कि वह फिर से उस जनता से खुद को जोड़ते जिसने चुनावों में उनसे मुंह मोड़ लिया था। राजनीति का चतुर खिलाड़ी यही करता है। वह हार होने पर मनोबल गिराकर बैठ नहीं जाता। वह अपने लोगों की हिम्मत बढ़ाता है, उनके जरिये लोगों से मिलता है और पूरी विनम्रता से यह दिखाने की कोशिश करता है कि उसे जनता का फैसला बेशक मंजूर है मगर वह गलती को नहीं दोहराएगा और कमियों को दूर करने के लिए तैयार है। यह भरोसा हार के साथ ही शुरू हो जाना चाहिए और अगले चुनाव तक चलना चाहिए ताकि फिर चुनाव हो तो आपकी तैयारी पूरी हो।

खो दिया बैठे बिठाए मिला मौका
सुधीर शर्मा सौभाग्यशाली थे कि बीजेपी ने किशन कपूर को लोकसभा का टिकट दिया। अगर सुधीर पहले सक्रिय नहीं हुए थे तो उन्हें उसी समय सक्रिय हो जाना चाहिए था। मगर उस समय सुधीर के लोकसभा चुनाव लड़ने की खबरें आने लगी थीं और उनका भी सुधीर ने खंडन नहीं किया। राजनीतिक आकलन करते तो पता होता कि किशन कपूर का चुनाव जीतना तय है और फिर जो सीट खाली होगी, उस पर उपचुनाव होगा। ऐसा मौका किसे मिलता है? हार के कुछ ही महीनों के बाद फिर से चुनाव लड़ने का अवसर नसीब वालों को ही मिलता है। वरना लोग पांच साल तरसते रह जाते हैं। लेकिन सुधीर तब भी हरकत में नहीं आए। किशन कपूर जीत गए, सीट खाली हो गए, उपचुनाव तय था मगर जो तैयारी उन्हें करनी चाहिए, वह सुधीर ने नहीं की।

फिर चुनाव नजदीक आने लगे तो सुधीर को लेकर ऐसी खबरें आने लगीं कि वह बीजेपी में जा सकते हैं। हो सकता है वह बीेजेपी से मोलभाव भी कर रहे हों। लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि बीजेपी पहले से मजबूत स्थिति में है और वह मोलभाव कर रही है तो सिर्फ आपका टाइम वेस्ट करने के लिए। वह आपको लेगी नहीं क्योंकि उसके अंदर ही विरोध के स्तर उठेंगे कि जब हम पहले ही मजबूत हैं, तो क्यों अपने प्रतिद्वद्वी नेता को मौका दे दें, जिसे हम वैसे ही हरा सकते हैं। लेकिन उसके बाद कांग्रेस के कार्यक्रमों से सुधीर का गायब रहना और फिर कथित तौर पर बहाने बनाना; अब सब समझ आ रहा है।

एक दिन अखबार में एक खबर छपना और फिर अगले दिन उसका खंडन जारी हो जाना। इससे दिनोदिन सुधीर की छवि खराब होती चली गई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं की रहा सहा मनोबल टूटा कि जिस बंदे ने चुनाव लड़ना है, वो तो पार्टी से दूरी बना रहा है और कभी उसके बीजेपी में जाने की खबरें आ रही हैं तो कभी वो प्रदेशाध्यक्ष को ही निशाने पर ले रहा है। आखिरकार वही हुआ, जिसका डर था। सुधीर ने चुनाव लड़ने से हाथ खड़े कर दिए और कांग्रेस ने भी नया चेहरा उतार दिया। विजय इंद्र करण कांग्रेस से चुनाव लड़ेंगे। सुधीर शर्मा ने खराब स्वास्थ्य का हवाला दिया है। ईश्वर करे वह जल्द स्वस्थ हों, जो भी उन्हें समस्या है, वह ठीक हो। मगर उन्हें याद करना चाहिए कि कैसे बेहद बुजुर्ग वीरभद्र ने भी मुश्किल हालात में सेहत एकदम ठीक न होने पर भी चुनाव लड़ा था। इसलिए यह सवाल पूछा ही जाएगा और पूछा भी जा रहा है कि आखिर सुधीर शर्मा ने चुनाव न लड़ने का फैसला क्यों लिया और अब उनका राजनीतिक भविष्य क्या होगा?

राजनीतिक गलतियां
सुधीर शर्मा के लिए धर्मशाला की जमीन आसान नहीं थी। प्रचार करते समय बीजेपी के लिए यह कहना आसान रहता था कि सुधीर शर्मा बाहरी कैंडिडेट है। दरअसल पंडित संतराम बैजनाथ के बड़े नेता थे। सुधीर ने 2003 में पहला चुनाव बैजनाथ से ही लड़ा था और यहीं से जीतकर विधानसभा भी पहुंचे थे। 2007 में भी जीते। मगर फिर पुनर्सीमांकन हुआ और बैजनाथ सीट आरक्षित हो गई। फिर वीरभद्र ने सुधीर को धर्मशाला से उतारा और 2012 में वह धर्मशाला से जीते भी। वीरभद्र सरकार में शही विकास मंत्री भी रहे मगर 2017 में हार का सामना करना पड़ा। हार के कई कारण रहे। बीजेपी की लहर, किशन कपूर के स्थानीय गद्दी समुदाय के मतदाताओं की संवेदना, आसपास के प्रभावी कांग्रेस नेताओं का दखल और अपने रवैये से लोगों में नाराजगी।

वीरभद्र के ख़ास हैं सुधीर शर्मा

अपने इलाके में लोगों का नाराज रहना सामान्य बात है क्योंकि आप हर किसी को खुश नहीं कर सकते, प्रदिद्वंद्वी उम्मीदवार के प्रति संवेदना या उसका समर्थन होना भी स्वाभाविक है क्योंकि वह राजनीति में है तो उसका प्रभाव होगा ही। इन सबसे आप निपट सकते हैं मगर अपनी ही पार्टी के नेता आपकी जड़ें खोदने लगें तो आप नहीं बच सकते। सुधीर शर्मा के साथ ऐसा ही हुआ। सुधीर की हार के कारणों में एक बात यह भी थी कि वह कांगड़ा के नेताओं से अलग हमेशा वीरभद्र के वफादार रहे और इसके लिए उन्होंने अपने आसपास के क्षेत्रों में उभर रहे नेताओं से दुश्मनी मोल ली। बड़े नेताओं का आसपास के क्षेत्रों में प्रभाव होता ही है। 2017 में यही हुआ और उन नेताओं ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए सुधीर शर्मा की जीत की संभावनाओं पर पानी फेर दिया।

हिमाचल की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले वीरभद्र सिंह के प्रति निष्ठा के कारण सुधीर ने क्षेत्रीय नेताओं से यह दुश्मनी मोल ली थी। मगर उसी चाणक्य से वह सही शिक्षा लेते तो उन्हें पता होता कि राजनीति में आगे बढ़ना है तो पहला काम यह कहना है कि कूटनीति के तहत आसपास के नेताओं से ही संबंध ठीक रखने हैं ताकि वे आपकी राह में रोड़े न डालें। मगर सुधीर न पहले इस बात को समझ पाए थे और न अब समझे। उनके फिर से चुनाव न लड़ने के पीछे भी यही कारण था कि उन्हें लगता था कि फिर कांग्रेसी नेता उन्हें हराने में जुट जाएंगे। उनके अंदर जीत के लिए आत्मविश्वास ही पैदा नहीं हुआ। मगर राजनीति में कई बार लंबे गेम के तहत चुनाव लड़ने पड़ते हैं, भले आपको अपनी हार तय दिख रही हो।

धर्मशाला से तोड़ दिया नाता?
एक बार सुधीर शर्मा धर्मशाला से चुनाव हार गए और इस बार उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। यानी उन्हें भरोसा नहीं कि धर्मशाला की जनता उन्हें फिर जिताने के मूड में है। और यही मेसेज आपने जनता को दे दिया कि सुधीर अब धर्मशाला से जीत के लिए आश्वस्त नहीं है। तो अब आप भूल जाइए कि 2022 में आपको पार्टी टिकट दे देगी और अगर कोई गोटी बिठाकर टिकट मिल भी गया तो उम्मीद छोड़ दीजिए कि जनता आपको जिता देगी। बीजेपी के लोग याद दिलाएंगे कि यह वही नेता है जिसने 2019 में चुनाव लड़ने से पहले ही मैदान छोड़ दिया था। और जब धर्मशाला में आप अपनी संभावनाएं अभी खत्म कर रहे हैं तो फिर कहां जाएंगे? बैजनाथ जाने से तो आप रहे। फिर कोई नया इलाका ढूंढेंगे?

धर्मशाला स्मार्ट सिटी है। केंद्र से कई योजनाओं का पैसा इसके लिए आ रहा है जिसके प्रबंधन का वादा करके चुनाव लड़ा जा सकता था।

ऐसा लग रहा है कि सुधीर खुद ही जाकर राजनीतिक कुल्हाड़ी पर कूद गए हैं। अगर वह इस उपचुनाव को लड़ते तो उनके पास मौका होात जनता का विश्वास जीतने का। वो ढंग से कैंपेन करते कि मैं आपकी आवाज रहा हूं पहले भी इस बार भी विधानसभा में आपके मुद्दों के लिए लड़ूंगा। आप कहते कि यहां से अगर बीजेपी का जीतता है तो वह तो मंत्री बनेगा नहीं, तो मुझे ही जिताइए ताकि मैं अपने राजनीतिक अनुभव को इस्तेमाल करते हुए विधायक निधि से भी काम करवा सकूं और स्मार्ट सिटी के लिए केंद्र से आ रहे पैसे का सही उपयोग करवाकर अपने इलाके के लिए बहुत कुछ कर सकूं।

ढंग से चुनाव लड़ा जाता और तैयारी शुरू से की होती तो चुनाव जीतना आसान था। क्योंकि आपके सामने बीजेपी का भी नया ही चेहरा होता। मगर आपने युद्ध से पहले हथियार डाल दिए और धर्मशाला में अपनी जमीन खुद सामने वालों को सौंप दी और शायद इसी के साथ आपने अपनी राजनीतिक पारी का अंत कर लिया। वरना आप चुनाव लड़कर हार भी जाते, तो भी धर्मशाला के लोगों को संदेश जाता कि यह बंदा यहीं से लड़ना चाहता है, यहीं इसका दिल है और यहीं से इसका जुड़ाव है। इसे पता था कि हार होगी, फिर भी लड़ा। लोग इमोशनल होते हैं और भावनाओं के आधार पर नेताओं का चयन करते हैं। सुधीर को तो यह बात याद होनी चाहिए क्योंकि इसी इमोशन के दम पर वह चुनाव जीतते रहे थे।

बहरहाल, सुधीर का भविष्य एक ही स्थिति में उज्ज्वल हो सकता है। वह ये कि बीजेपी में शामिल हो जाएं। मगर बीजेपी भला क्यों एक चूकी हुई तोप को अपने बेड़े में शामिल करना चाहेगी? अगर सुधीर सोच रहे हैं कि अभी हालात अनुकूल नहीं है और जब अनुकूल होंगे तब चुनाव लड़ूंगा तो अफसोस की बात है कि यह उनकी गलतफहमी है। न जाने कल को राजनीतिक हालात क्या हों। कल आलाकमान में उनका समर्थन करने वाले लोग रहें न रहें। हो सकता है इस उपचुनाव में ही धर्मशाला की जनता को ऐसा नेता मिल जाए कि वह उसे अगली बार भी जिताना चाहे।

वीरभद्र से काश सुधीर शर्मा ने यह भी सीखा होता- कुछ भी हो जाए, राजनीति में मैदान को खाली नहीं छोड़ा जाता।

(लेखक लंबे समय से हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं. उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

तय था अरुण का एचपीसीए अध्यक्ष बनना, चुनाव औपचारिकता थे

धर्मशाला।। अरुण ठाकुर एचपीसीए के नए अध्यक्ष चुन लिए गए हैं। अनुराग ठाकुर के छोटे भाई अरुण का अध्यक्ष बनना तय था क्योंकि चाहकर भी कोई और इस संगठन का प्रमुख नहीं बन सकता। वही बनेगा, जिसे अनुराग चाहेंगे।

दरअसल 2000 में HPCA संभालने के बाद अनुराग ठाकुर ने इस संस्था के संविधान में बड़ा बदलाव कर दिया था। पहले 12 डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट असोसिएशन के प्रेजिडेंट और सेक्रेटरीज़ के पास सोसायटी में वोटिंग राइट्स थे।

इसका मतलब हुआ कि 5 साल में एक बार 24 सदस्य (साथ में एग्जिक्यूटिव कमिटी के आउटगोइंग मेंबर्स) ही प्रेजिडेंट और नई एग्जिक्यूटिव कमिटी का चयन करते थे। मगर ठाकुर ने HPCA में वोट देने वालों का विस्तार किया और 25 लाइफ मेंबर्स बनाकर उन्हें वोटिंग राइट दे दिया।

इनकी नियुक्ति प्रेजिडेंट की सहमति से होनी तय की गई और प्रेजिडेंट ही एग्जिक्यूटिव कमिटी को भी नॉमिनेट कर सकता था। इसका मतलब यह हुआ कि अगर सभी जिले (24 वोट) अनुराग ठाकुर का विरोध करते, तब भी अनुराग ठाकुर द्वारा मनोनीत किए गए सदस्य (25) उन्हें दोबारा प्रेजिडेंट चुन सकते थे।

2001 में HPCA ने अपना संविधान बदल दिया। ठाकुर ने इकनॉमिक टाइम्स अखबार को बताया कि यह फैसला सदस्यों द्वारा एकमत से निर्विरोध लिया गया था। यह इसलिए लिया गया था, क्योंकि असोसिएशन को पैसे चाहिए थे। उन्होंने कहा, ‘लाइफ मेंबर्स पर हर सोसायटी की तरह आखिरी फैसला प्रेजिडेंट ने लिया।’

अब इस बार एकमात्र नॉमिनेशन अरुण का हुआ। इस बार एचपीसीए के अध्यक्ष सहित अन्य पदाधिकारियों के चुनाव में 76 सदस्य मतदान कर सकते हैं। एचपीसीए ने 52 मतदाताओं की सूची बीसीसीआइ को भेजी है। 10 जिलों के अध्यक्ष और सचिव, दो जिलों के चेयरमैन और कन्वीनर को मतदान का अधिकार है।

ऐसे में भला कोई और कैसे अध्यक्ष बन पाता?

स्वास्थ्य विभाग की कथित लापरवाही से बीमार हुआ सवा साल का नन्हा बच्चा

धर्मशाला।। जिला मुख्यालय धर्मशाला के साथ लगते क्षेत्र का सवा साल का बच्चा टीकाकरण के बाद गंभीर बीमारी का शिकार हो गया है, जिसकी शिकायत बच्चे के परिजनों ने स्वास्थ्य सचिव प्रदेश सरकार और सीएमओ जिला कांगड़ा से की है।

झिकली बड़ोल निवासी मेघा महाजन ने बताया कि वह अपने बेटे विधान को टीकाकरण के लिए 20 सितंबर को चरान खडड स्थित आंगनबाड़ी केंद्र लेकर गई थी, जहां विधान को मिजल व डीपीटी नामक टीका लगाया गया। डाक्टरों के अनुसार डीपीटी के टीके से सामान्य तौर पर बुखार आना स्वाभाविक है, लेकिन उसी दिन उनके बेटे को लगभग रात्रि 11 बजे तेज बुखार आया, जिसके चलते बच्चे के परिजनों ने उसे क्षेत्रीय अस्पताल धर्मशाला के आपातकालीन विभाग में दिखाया।

डाक्टर के अनुसार मासूम का बुखार 100 डिग्री सेल्सियस होने के कारण दौरा पड़ा था व मौजूद डाक्टर ने बच्चे को अस्पताल में दाखिल करने से मना कर दिया तथा रात्रि करीब दो बजे भेज दिया व रात्रि 3 बजे पुन: दौरा पड़ने की स्थिति में बच्चे को दाखिल कर लिया गया। प्राथमिक जांच के दौरान डाक्टरों ने बताया कि बच्चे को बुखार कम करने के लिए दी गई दवाई की मात्रा 5 मिली दी जानी थी, लेकिन 2 मिली की मात्रा दी गई है जिसके चलते बुखार बच्चे के सिर में चढ़ गया है तथा अब मासूम फैवराइल सीजर नामक बीमारी से ग्रसित हो गया है।

 

उन्होंने कहा कि डाक्टरों के द्वारा किये गए गलत टीकाकरण के कारण अब तक उनका बच्चा अस्पताल में उपचाराधीन है तथा डाक्टरों का कहना है कि बच्चे की कम से कम 5 साल तक परिजनों द्वारा निगरानी में देखभाल करना आवश्यक है। उनका कहना है कि इस मामले में लेकर लापरवाह डाक्टरों के खिलाफ सरकार व विभाग द्वारा कोई नियम कानून नही बनाया गया है। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग शिमला से आग्रह किया है कि संबंधित विषय को लेकर कानून बनाया जाए तथा लापरवाही करने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई की जाए।

सीएमओ कांगड़ा डॉक्टर गुरदर्शन गुप्ता का कहना है कि शिकायतकर्ता की ओर से गलत टीकाकरण और अस्पताल में सही जांच न होने की शिकायत की गई है। जिस पर एमएस और प्रोग्राम ऑफिसर को इन्क्वायरी मार्क कर दी गई है। अभी बच्चा अस्पताल में दाखिल है और ठीक है। तीन दिन में जैसे ही जांच रिपोर्ट आने पर कोई कमी पाई गई तो कार्रवाई की जाएगी।

भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने लगाए नारे- धर्मशाला में नहीं चलेगा बाहरी कैंडिडेट

कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के फतेहपुर में हुए भारतीय जनता युवा मोर्चा के सम्मेलन में जमकर हंगामा हुआ। बुधवार को कुछ कार्यकर्ताओं ने इस सम्मेलन में आउटसाइडर गो बैक के नारे लगाए। सम्मेलन के दौरान कुछ युवाओं ने शिमला में चुनाव समिति की बैठक के बाद हाईकमान को भेजे उम्मीदवारों के पैनल पर आपत्ति जताई।

हंगामा करने युवाओं ने कहां तक कह दिया कि अगर धर्मशाला में किसी बाहरी को उम्मीदवार बनाया तो पार्टी तक छोड़ देंगे। इस दौरान कुछ युवाओं ने भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश सचिव के पक्ष में भी नारेबाजी की। युवाओं ने कहा कि धर्मशाला में सबसे ज्यादा एसटी और ओबीसी वर्ग के वोट हैं मगर बावजूद इसके पैनल में एक भी व्यक्ति इन वर्गों के नहीं है।

इस दौरान हिमाचल विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज और भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष विशाल चौहान, कोषाध्यक्ष विपिन नैहरिया और सचिव विशाल नैहरिया भी मौजूद थे।

हंगामा बढ़ता देख विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज मंच से उतरकर बीच में आ गए। उसके बाद मामला शांत हुआ। भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष विशाल चौहान ने कहा कि कुछ कार्यकर्ताओं ने सम्मेलन में स्थानीय नेता को टिकट देने की पैरवी की है जिसकी जानकारी हाईकमान को दे दी गई है।

कार सवार को लूटने के अभियुक्त पुलिसवाले तीन दिन पहले ही हुए थे तैनात

एमबीएम न्यूज, कांगड़ा।। ड्यूटी के दौरान लूट के आरोप में घिरे चार पुलिसकर्मियों को कोर्ट ने पांच दिन की न्यायिक हिरासत पर भेजा है। इस मामले में एक हेड कॉन्स्टेबल व तीन कॉन्स्टेबल अरेस्ट किए गए हैं। मामला, कांगड़ा के डमटाल से जुड़ा है। इन पुलिस कर्मियों की तीन दिन पहले ही तैनाती हुई थी।

नाका डयूटी पूरी होने के बाद भी आरोपी पुलिस कर्मी मौके पर ही तैनात थे। आरोप है कि इन्होंने एक कार सवार से न केवल मारपीट की, बल्कि मोबाइल भी छीन लिया। इतने में ही संतुष्टि नहीं हुई तो उसे पेट्रोल पंप ले जाकर बाइक में तेल भी भरवाया। बताया यह भी जा रहा है कि चारों पुलिस कर्मियों की तैनाती सकोह बटालियन से की गई थी।

गुरदासपुर के रहने वाले शिकायतकर्ता घनश्याम के मीडिया में दिए गए बयान को सही मानें तो डमटाल के संगहेड पुल पर उसे रोका गया। झूठा मुकदमा दायर करने की धमकी दी गई। पैट्रोल पंप पर कार्ड स्वाइप कर तेल भरवाया गया। 4 हजार रुपये नकद लिए गए। एटीएम ले जाकर 5300 रुपए का कैश लिया गया। पुलिस ने युवक से छीने पैसे व मोबाइल इत्यादि बरामद कर लिया है।

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नूरपुर के डीएसपी डॉ. साहिल अरोड़ा ने कहा कि मामले को पूरी गंभीरता से लिया जा रहा है। जांच में किसी भी मामूली कोताही का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने चारों आरोपियों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजे जाने की पुष्टि की है।

(यह खबर एमबीएम न्यूज नेटवर्क के साथ सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)