देश में ऑक्सीजन और वैक्सीन संकट कैसे पैदा हुआ, क्रोनोलॉजी समझिए

संदीप रांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश समेत भारत के कई राज्य वैक्सीन की कमी से जूझ रहे हैं। महामारी को रोकना है तो अधिक से अधिक आबादी का टीकाकरण ही एक रास्ता है। यह बात दुनिया भर के वैज्ञानिक और WHO तब से कह रहे हैं जब इस आपदा की शुरुआत हुई थी। मगर वैक्सीन बन जाने के बाद भी अब ऐसा क्यों हो रहा है कि भारत जैसे देश में वैक्सीन का संकट खड़ा हो गया है? वह भी तब जब एक महीना पहले तक भाजपा के नेता और उसके समर्थक यह गाते नहीं थक रहे थे कि भारत वैक्सीन के मामले में पूरा दुनिया का भला कर रहा है।

यह पूरा संकट कैसे पैदा हुआ, इसकी क्रोनोलॉजी समझनी पड़ेगी।

बीते साल अप्रैल-मई में ही अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी आबादी के लिए वैक्सीन हासिल करने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। यह प्रक्रिया एडवांस में ही शुरू कर दी गई थी जबकि अलग-अलग कंपनियों की वैक्सीन विकसित हो रही थीं। जब ट्रायल शुरुआती दौर में थे, तब भी बहुत सारे देश पैसा लगा रहे थे। मगर अफ़सोस, भारत में थालियां बजाने और दिया जलाने पर फ़ोकस हो रहा था।

लापरवाही तब भी हुई जब बीते साल अक्तूबर में जीनोम सीक्वेंसिंग कर रही भारत की एक सरकारी लैब ने वायरस के एक डबल म्यूटेंट वायरस के बारे में आगाह किया था। मगर इस बीच जीनोम सीक्वेंसिंग की फंडिंग कम हो गई और रिसर्च ढीला पड़ गया। लेकिन इस ओर ध्यान देना बीते साल के अंत तक सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं था। क्योंकि शायद तब तक केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का ध्यान राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों और कुंभ जैसे आयोजनों पर ज़्यादा था।

ध्यान देने की बात यह है कि जिस फ़ाइज़र की वैक्सीन को सबसे पहले देशों ने मंज़ूरी दी, उसने भारत में भी दिसंबर माह में इमर्जेंसी इस्तेमाल की इजाजत मांगी थी। मगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि सरकार शायद भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनाना चाह रही थी। ये हाल तब थे जब बीते साल नवंबर से कई वायरलॉजिस्ट कह रहे थे कि भारत को सेकेंड वेव के लिए तैयार रहना चाहिए और हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर को तैयार करना चाहिए ताकि सांस लेने में समस्या पैदा करने वाले इस वायरस के मरीज़ों की देखभाल की जा सके।

ध्यान देने की बात यह है कि संसद की एक समीति ने 2020 के अप्रैल में ही ऑक्सीजन की आपूर्ति के मसले को प्राथमिकता देने को कहा था। मगर सरकार की प्राथमिकताएं शायद कुछ और रहीं कि ठीक एक साल बाद हालात बिगड़े और देश ऑक्सीजन की कमी से जूझने लगा।

जनवरी 2021 को याद कीजिए जब भारत के पी एम ने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की वर्चुअल मीटिंग में बताया कि ‘दूसरे देश भारत में विनाश की बात कर रहे थे, जिन देशों ने हमारे प्रबंधन पर उंगली उठाई, उन्हें हमने ग़लत साबित कर दिया।‘

प्रधान मंत्री ने उस समय यह भी कहा था कि ‘हमने 150 देशों को वैक्सीन को एक्सपोर्ट की। ‘ मगर ध्यान रहे उस समय तो दोनों वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को कोई फंड सरकार द्वारा नही दिया गया। यह जानकारी हाल ही में सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए एफिडेविट में दी गई है। कहा गया है कि सरकार ने कोई हेल्प नहीं की। लेकिन सत्ताधारी दल के नेता प्रचार में व्यस्त रहे कि हमने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया। क्या उस समय भविष्य को देखते हुए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों की आर्थिक मदद नहीं करनी चाहिए थी कि अपने देश की वैक्सीन की मांग पूरी हो सके?

इस बीच, फरवरी में चुनाव और कुंभ मेले की शुरुआत हो गई। सरकारों का फ़ोकस इन्हीं पर रहा जबकि महाराष्ट्र और केरल से खतरे की घंटी की आवाज आना शुरू हो गई थी। मगर मार्च आते-आते चुनावों का शोर रहा और सारा मंत्रिमंडल वहीं व्यस्त हो गया। इस बीच कुछ सांसद या सत्ताधारी नेता भारतीयों की मजबूत इम्यूनिटी या फिर गोबर जैसे विकल्पों की बात कर देते थे।

इसके बाद अप्रैल-मई में क्या हुआ, आपने खुद देखा। ऑक्सीजन की जिस कमी को लेकर पहले ही आगाह कर दिया गया था, उसे लेकर कुछ ख़ास नहीं किया गया। हेल्थ इंफ्रा को मज़बूत करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। न तो वैक्सीन उत्पादन में तेज़ी के लिए निवेश किया गया न अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से खरीद की कोशिश की गई। फ़ाइजर और स्पूतनिक को मंज़ूरी दी गई अप्रैल में जबकि इन्हें पहले ही क्लियरेंस दी जा सकती थी।

अब कैसे हालात हैं, उनसे आप वाकिफ़ हैं। सवाल है कि क्या क्या सेकेंड वेव का भयंकर प्रभाव समय रहते रोका जा सकता सकता था? जवाब है – हां। सरकार के पास सारे इनपुट्स थे, एक्सपर्ट्स की चेतावनियां तीं। मगर सरकार की प्राथमिकता में यह सब रहा ही नहीं। वरना हालात शायद अब से बेहतर होते।

(लेखक हमीरपुर जिले के रहने वाले हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

वैक्सीन का विरोध करने वाले कांग्रेसी अब कमी पर शोर मचा रहे: सुरेश कश्यप

शिमला।। हिमाचल प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष सुरेश कश्यप ने कहा है कि कोरोना महामारी के इस दौर में कांग्रेस केवल दुष्प्रचार कर रही है और जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रही है।

कश्यप ने कहा, “कांग्रेसी पहले वैक्सीनेशन का विरोध कर रहे थे और अब कमी पर शोर मचा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस द्वारा बनाई गई टूलकिट का मामला सामने आया है जिससे उसकी कार्यशैली सामने आई है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष ने कहा कि इससे देश को पता चल गया है कि कांग्रेस कैसे देश की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिगाड़ने की कोशिश कर रही है।

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष ने कोरोना काल में कांग्रेस की ओर से चलाई जा रही हेल्पलाइन को भी पूरी तरह से नाकाम करार दिया।

छिड़काव किसका करें, कैसे करें और कहां पर करें, कहां नहीं

तीन महीने से बरगद के पेड़ के नीचे रह रही थी महिला

गगरेट।। ऊना जिले के गगरेट में एक महिला पिछले तीन महीने से इस वटवृक्ष के नीचे ही डेरा जमाए हुए थी। स्थानीय पत्रकार अविनाश विद्रोही द्वारा यह मामला उठाए जाने के बाद अब मवां सिंधिया की इस महिला को वन स्टॉप सेंटर में भेजा गया है।

दरअसल इस महिला का दावा है कि वह पिछले 20 साल से जमीन विवाद में उलझी हुई हैं। कथित तौर पर इनके पति ने जमीन किसी को बेच दी है और इनको इसकी जानकारी नही थी। फिर, 2012 में डीसी ऊना ने लैंडलेस एक्ट के तहत 5 मरले जमीन अलॉट कर दी। उसपर इस महिला ने एक छोटा सा कमरा बनाया। मगर उस कमरे को गाँव के कुछ लोगों ने तोड़ दिया और मारपीट भी की।

उस समय इस महिला की बेटियां इसे अपने साथ पंजाब ले गई लेकिन उसके बाद से ये लगातार अपनी जमीन को लेकर संघर्ष कर रही है और दावा करती है कि ‘मेरे पति ने किसी को जमीन नहीं बेची है और इन लोगों ने धोखे से जमीन अपने नाम करवाई है।’

लेकिन इस विवाद के बीच यह महिला इस वटवृक्ष के नीचे रह रही थी। बेटियां इन्हें अपने पास ले जाना चाहती हैं मगर इनकी जिद है कि अपने पति का गाँव नहीं छोड़ना है।

मवां सिंधिया के जंगल में ये महिला ऐसी स्थिति में रहती थीं कि कोई आम इंसान इस स्थान पर एक घण्टे भी रुक नही सकता। लेकिन इन्होंने वहां बाकायदा एक चूल्हा बनाया हुआ था और जमीन पर बिस्तर बिछाया हुआ था।

अब महिला को वन स्टॉप सेंटर में भेजने के बाद ज़िला प्रशासन इनकी देखरेख करेगा और जमीनी विवाद को भी सुनेगा।

छिड़काव किसका करें, कैसे करें और कहां पर करें, कहां नहीं

इन हिमाचल डेस्क।। कोरोना वायरस के बढ़ते खतरे को देखते हुए देश के अलग-अलग हिस्सों की तरह हिमाचल प्रदेश में भी लोग रोगाणुनाशक रसायनों का छिड़काव कर रहे हैं। मगर यह देखने को मिला है कि कुछ लोग जिन रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे कोरोना वायरस को मारने में बेअसर हैं। तो कुछ रसायनों की मात्रा और घनत्व सही नहीं रख रहे, जिससे छिड़काव करने पर चीजें ही खराब हो जा रही हैं।

इसके अलावा कुछ लोगों को यही मालूम नहीं कि कहां छिड़काव करना जरूरी है और कहां नहीं। कुछ लोग हवा में छिड़काव कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि वायरस हवा से फैलता है। लेकिन हवा में छिड़काव करना और भी घातक है क्योंकि वायरस हो न हो, खतरनाक रसायन की महीन बूंदें सांसों में अंदर जाकर गंभीर समस्या खड़ी कर सकती है।

Spraying of disinfectant on people physically, psychologically harmful: Health ministry - The Economic Times
देश भर में लोग घातक रसायनों को गलत ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं।

जरूरी है कि सही ढंग से, सही रसायन का और सही जगह पर छिड़काव किया जाए। इसीलिए ‘इन हिमाचल’ ने सवाल-जवाब के रूप में समझाने की कोशिश की है कि कोरोना वायरस के खतरे को कम करने का सही तरीका क्या है। आप इसे उन लोगों के साथ शेयर कर सकते हैं, जो मुश्किल की इस घड़ी में सैनिटाइजेशन जैसे काम में सेवाएं दे रहे हैं।

कोरोना वायरस को नष्ट करने के लिए किन जगहों को सैनिटाइज किया जाना चाहिए?

घर, दफ्तर, स्कूल, जिम, सरकारी इमारतों, धार्मिक स्थलों, बाजारों, परिवहन और कारोबारी प्रतिष्ठानों आदि को डिसइन्फेक्ट करना जरूरी है। कीटाणुनाशक इस्तेमाल करने से पहले उन जगहों की पहचान की जानी चाहिए जहां पर लोगों के हाथ ज्यादा लगते हैं। जैसे कि दरवाजों या खिड़कियों के हैंडल, किचन या खाना तैयार करने वाली जगह, काउंटर के ऊपरी हिस्से, बाथरूम, टॉइलट, नल, टचस्क्रीन वाले उपकरण, कीबोर्ड और टेबल के ऊपरी हिस्से आदि।

COVID-19 pandemic: CDC issues interim cleaning, disinfection recommendations after exposure | 2020-04-01 | Safety+Health Magazine
उन्हीं जगहों को रोगाणुमुक्त करने का फायदा है, जहां हाथ ज्यादा लगते हैं।

कीटाणुनाशन यानी डिसइन्फेक्ट करने के लिए क्या इस्तेमाल होना चाहिए?

अस्पतालों आदि से इतर बाकी जगहों पर सोडियम हाइपोक्लोराइट (जिसे ब्लीच या क्लोरीन भी कहते हैं) को इस्तेमाल किया जा सकता है, मगर उसकी मात्रा पानी में मात्र 0.1 प्रतिशत या 1,000ppm होनी चाहिए। ऐसे समझें कि छिड़काव करने के लिए तैयार किए जाने वाले तरल में एक हिस्सा होना चाहिए  पांच प्रतिशत स्ट्रेंग्थ वाले ब्लीच का और 49 हिस्से पानी होना चाहिए।

ब्लीच के इसके अलावा कीटाणुनाशन के लिए 70-90% एल्कॉहल को भी इस्तेमाल किया जा सकता है। किसी भी तरह का छिड़काव या पोछा लगाने से पहले सतहों को पानी और साबुन या डिटर्जेंट से साफ करना चाहिए ताकि धूल आदि हट जाए। ऐसा करते वक्त ध्यान रखें कि सफाई की शुरुआत ज्यादा साफ सतह से गंदी सतह की ओऱ करें ताकि ऐसा न हो कि ज्यादा गंदी सतह के कारण साफ सतह भी ज्यादा खराब हो जाए।

ध्यान दें- अंदरूनी जगहों (कमरों आदि) पर स्प्रे पम्प आदि इस्तेमाल करके डिसइन्फेक्ट करने की सलाह नहीं दी जाती है। कमरों आदि में कीटाणुनाशक में भिगाए कपड़े या वाइप को इस्तेमाल करना चाहिए।

When do common household products go bad?
कमरों आदि में स्प्रे न करें, रोगाणुनाशक से भीगा पोछा इस्तेमाल करें।

कीटाणुनाशक इस्तेमाल करते समय क्या सावधानी बरतें?

  • कीटाणुनाशक रसायन को सही मात्रा में इस्तेमाल करें वरना ज्यादा स्ट्रॉन्ग होने से सतहें खराब हो सकती हैं और लोगों को भी नुकसान पहुंच सकता है।
  • कभी भी दो तरह के कीटाणुनाशक न मिलाएं। जैसे कि ब्लीच और अमोनिया को मिलाने से लोगों को सांस लेने में दिक्कत हो सकती है क्योंकि इनके बीच रिएक्शन होने से जानलेवा गैसें निकलती हैं।
  • जब तक कीटाणुनाशक सूख न जाए, गंध खत्म न हो जाए, बच्चों और पालतू जानवरों को उस जगह से दूर रखें।
  • खिड़कियां खुली रखें, पंखे चलाकर रखें ताकि केमिकल जल्दी सूख जाए। गंध तेज हो तो सूखने तक दूर ही रहें।
  • छिड़काव आदि करने के बाद हाथों को अच्छे से धोएं। बच्चों से छिड़काव न करवाएं। छिड़काव के दौरान पहने गए मास्क और ग्लव्स फेंक दें, इन्हें दोबारा इस्तेमाल न करें।
  • यह सलाह दी जाती है कि रोगाणुनाशक रसायन इस्तेमाल करते समय रबर के ग्लव्स, वॉटरप्रूफ एप्रन और जूते पहनें। आंखों की सुरक्षा के लिए फेस शील्ड इस्तेमाल की जा सकती है।
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आंखों और त्वचा को नुकसान पहुंचा सकते हैं रोगाणुनाशक केमिकल

खुली जगहों जैसे कि बाजारों और सड़कों पर क्या करना चाहिए?

खुली जगहों पर बड़े पैमाने पर कीटाणुनाशन की स्प्रे करना उचित नहीं है (जैसा कि एक व्यक्ति हिमाचल प्रदेश में ट्रैक्टर पर टैंकर लगाकर कर रहा था)। सड़कों, रास्तों और फुटपाथ को कोविड-19 के संक्रमण फैलाने की वजह नही ंमाना जाता। जिन जगहों पर धूल और कचरा होगा, वहां पर छिड़काव करने का कोई मतलब नही है। सड़कों, सीमेंट के रास्तों और कच्चे रास्तों भी छिड़काव का कोई मतलब नहीं क्योंकि अगर धूल या कचरा न भी हो, तो भी केमिकल के छिड़काव से आप पूरी सतह को कवर नहीं कर सकते।

यही नहीं, खुली जगहों पर बड़े स्तर पर छिड़काव करना लोगों की सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है। लोगों की आंखों में जलन हो सकती है, सांस लेने में समस्या हो सकती है और त्वचा को भी नुकसान पहुंच सकता है।

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रोगाणुनाशन का यह तरीका गलत है और चीजों के साथ लोगों के लिए भी खतरनाक हो सकता है।

बाहर से घर लौटने पर क्या करना चाहिए

यह तो आपको मालूम है कि बाहर मास्क पहनकर जाना है और बाकी लोगों से दूरी बनाकर रखनी है। फिर घर लौटने पर जूते बाहर ही उतारें, उन्हें कमरे में न ले जाएं। बाहर से लौटने के बाद कुछ भी छूने से पहले हाथ को साबुन के साथ धोएं या ऐल्कॉहल वाला हैंड जेल इस्तेमाल करें।

क्या ग्लव्स पहनकर जाने से सुरक्षा मिलती है?

नहीं, ग्लव्स पहन लेने से हाथों को साफ रखने के नियमों से छूट नहीं मिल जाती। क्योंकि ग्लव्स में मामूली डिफेक्ट हुआ तो भी वायरस हाथ की त्वचा में लग सकते हैं। ग्लव्स सही ढंग से न उतारें जाएं तो उसमें चिपके वायरस हाथ में लग सकते हैं। इसलिए ग्लव्स उतारने के बाद हाथों को अच्छे से साफ करें।

साथ ही, आप ग्लव्स पहनकर भले खुद को सुरक्षित मानें मगर आप उसके जरिये संक्रमण फैला सकते हैं। अगर एक सतह को छूने पर ग्लव्स में वायरस चिपक गए होंगे तो आप उससे जहां-जहां छूएंगे, वहां आप वायरस फैला रहे होंगे। इसलिए ग्लव्स पहनने के बाद भी नियमों का पालन करें।

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ग्लव्स कहीं से फटे होंगे तो वायरस अंदर घुस सकता है। इसलिए ग्लव्स उतारने के बाद भी हाथ अच्छे से साफ करें।

सब्जियां, फल और पैकेज्ड चीजें कैसे साफ करें?

कोरोनावायरस सब्जियों या खाने में नहीं पनप सकता। उन्हें अगर पनपना है तो इंसान या जानवर चाहिए। जैसा कि स्पष्ट है, सांस लेने पर निकलने वाली महीन बूंदों से वायरस फैलता है। इसलिए सब्जियों और फलों को काटने से पहले साफ पानी से धोकर उनकी सतह सूखने दें, फिर अपने हाथ अच्छी तरह धोकर उन्हें खाएं। ऐसा ही पैकेज्ड आइटम्स के साथ करें। उन्हें खोलने से पहले उन्हें आप वाइप कर सकते हैं और फिर अपने हाथ अच्छे से धो लें।

(विश्व स्वास्थ्य संगठन के परामर्श पर आधारित)

हिमाचल में उठ रही कोविड अस्पतालों में सीसीटीवी लगाने की मांग

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में कोरोना संकट के बीच सरकार के सामने इस तरह की बहुत सारी मांगें और सुझाव आने का सिलसिला तेज हो गया है कि कोविड वॉर्ड में सीसीटीवी इंस्टॉल किए जाएं ताकि बाहर बैठे परिजन देखते रहें कि अंदर उनके परिजनों की क्या स्थिति है और उनकी सही से देख-रेख की जा रही है या नहीं।

दरअसल, कई जगहों पर बगैर पीपीई किट किसी को भी कोविड वॉर्ड में जाने की इजाजत नहीं है। डॉक्टरों और अन्य अधिकृत स्टाफ के अलावा, कोई वहां दाखिल नहीं हो सकता। ऐसे में परिजनों को यह चिंता लगी रहती है कि अंदर उनके मरीज की हालत क्या है।

पिछले दिनों कुछ लोगों की कोरोना से मौत होने के बाद उनके परिजनों ने आरोप लगाए कि कोविड वॉर्ड में सही से उनके मरीज की देखभाल नहीं की गई और यही मौत की वजह भी बन गई। कइयों को आरोप है कि कोविड सेंटर का स्टाफ उन्हें गुमराह करता रहा और यह समय पर यह जानकारी नहीं दी जा रही कि मरीज की हालत क्या है।

ऐसे में कई सारे लोगों ने सुझाव दिए कि अगर कोविड वॉर्ड में सीसीटीवी लग जाए तो यह चिंता थोड़ी दूर हो जाएगी। हालांकि, सरकार का कहना है कि अब यह व्यवस्था कर दी गई है कि कोरोना वॉर्ड के मरीजों का अतिरिक्त ध्यान रखा जाए। पिछले हफ्ते तारीख को सीएम ने कहा था कि आईजीएमसी, टांडा और नेरचौर में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि हर फ्लोर पर एक व्यक्ति मौजूद रहे और किसी मरीज को दिक्कत होने पर नर्स और डॉक्टर को बुला लिया जाए।

हालांकि, इस संबंध में मेडिकल क्षेत्र के कुछ लोगों का कहना है कि सीसीटीवी लगाना सही नहीं होगा क्योंकि यह मरीजों की निजता का उल्लंघन कर सकता है। उनके मुताबिक, कई बार किसी मरीज की जान बचाने में अपनाए जाने वाले जटिल मेडिकल प्रोसीजर्स करने पड़ते हैं जिन्हें बाहर बैठे लोगों को सीसीटीवी के माध्यम से दिखाना उन्हें विचलित कर सकता है।

हालांकि, इस तर्क का विरोध करने वाले कुछ लोगों का कहना है कि अगर विचलित करने की ही बात है तो सबसे ज्यादा सावधानी तो अन्य मरीजों को लेकर बरतनी जानी चाहिए। मगर कोविड वॉर्ड मे ंएकसाथ बहुत से मरीज रखे जाते हैं जो सब कुछ देख सकते हैं। इसलिए निजता और विचलित करने की बात बेमानी है।

बता दें कि भले ही हिमाचल सरकार ने कोविड वॉर्डों में सीसीटीवी लगाने की मांग को अभी तक गंभीरता से नहीं लिया है मगर देश के कई राज्यों में ऐसी जगहें हैं, जहां अस्पतालों में पिछले साल फर्स्ट वेव के दौरान ही सीसीटीवी लगा दिए गए थे। इससे मरीजों ही नहीं, बल्कि डॉक्टरों को भी निगरानी करने में सुविधा होती है।

कोरोना से मृत महिला के बेटे का आरोप- डेढ़ लाख के गहने गायब

कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कागड़ा जिले में कोरोना से जान गंवाने वाली एक महिला के परिजनों का आरोप है कि लगभग डेढ़ लाख रुपये के वे गहने नहीं मिल पाए जो उन्होंने अस्पताल में भर्ती होते समय पहने थे। पालमपुर की पाहड़ा पंचायत के एक शख्स ने कांगड़ा के डीसी से ऑनलाइन शिकायत की है। इस शिकायत को डीसी ऑफिस ने सीएमओ को भेजकर जवाब मांगा है।

पाहड़ा पंचायत के तप्पा में रहने वाले बलवंत की शिकायत है कि उनकी 60 साल की माता चम्पा देवी 14 मई को पालमपुर अस्पताल में भर्ती थीं। कोरोना पॉजिटिव पाए जाने पर उन्हें 15 मई को कोविड केयर सेंटर पपरोला में भर्ती करवाया गया मगर वहां उसी रात उन्होंने दम तोड़ दिया।

क्या है शिकायत
बलवंत ने शिकायत में लिखा है कि 16 मई को सूचना मिलने पर वे पपरोला पहुंचे और फिर पंचायत प्रधान की मौजूदगी में उनकी मां का अंतिम संस्कार किया गया। बलवंत का कहना है कि जब उनकी मां को अस्पताल में एडमिट किया था तब उनके हाथ में तीन सोने की अंगूठियां, कानों में बालियां और मंगलसूत्र था। उनका कहना है कि इन गहनों की कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपये है।

बलवंत ने आशंका जताई है कि इन गहनों को उनकी मां के शरीर से गायब कर दिया गया था। उन्होंने लिखा है कि उन्हें इसका अंदेशा तब हुआ जब अंतिम संस्कार के बाद चिता की राख को धोया जा रहा था। उन्होंने कहा कि उनकी मां के पार्थिव शरीर को कोरोना प्रोटोकॉल के तहत पूरी तरह बॉडी बैग में रखा गया था, इसलिए उन्हें पता नहीं चल पाया कि गहने थे या नहीं।

बलवंत का कहना है कि चिता की राख में सिर्फ पांव के फुलगुट्ठू (बिछुए) ही मिले। उनका आरोप है कि राख में न तो अंगूठियां मिलीं, न मंगलसूत्र न बालियां। उन्होंने कहा कि ये चीजें अस्पताल प्रशासन की ओर से भी उन्हें नहीं लौटाई गईं। इस पूरे मामले की शिकायत उन्होंने जिलाधीश से करके जांग करने की गुजारिश की है।

क्या कहना है प्रशासन का
वहीं, पपरोला कोविड केयर सेंटर का जिम्मा सम्भाल रहे एमएस डॉक्टर कुलदीप बन्याल ने इस घटना पर हैरानी जताई है। उन्होंने कहा कि सीएमओ कांगड़ा की ओर से उन्हें जानकारी मिली है। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैं न तो यह कहने की स्थिति में हूं कि ऐसी घटना हुई है और न ऐसा कहने की स्थिति में हूं कि परिजन झूठ बोल रहे हैं। अगर ऐसा हुआ है तो इससे शर्मनाक कोई बात नहीं हो सकती। मैंने शिकायत मिलने पर उस वक्त ड्यूटी पर तैनात सभी लोगों से पूछा है लेकिन सब ने ऐसा करने से इंकार किया है।”

बलवंत का कहना है कि उनके साथ जो होना था वह हो गया। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “मां के गहने मिलें या न मिलें, कोई बात नहीं। मेरा मकसद सिर्फ इतना है कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति की मौत के बाद ऐसी घटना न हो और अगर ऐसा हो रहा है तो ऐसा करने वालों को सजा मिले।”

उधर डॉक्टर कुलदीप ने कहा कि जब परिजनों को शव की शिनाख्त करवाई थी, अगर उस समय शिकायत की जाती तो सच सामने लाने में आसानी होती। उन्होंने कहा कि इस घटना ने नया सबक सिखाया है। ऐसा दोबारा न हो, इसके लिए मरीज ने क्या-क्या पहना है, इसकी पूरी लिस्ट बनाई जाएगी।

 

श्रद्धालुओं ने भीड़ हटाने पहुंची पुलिस टीम को भागने को किया मजबूर

कुल्लू।। देवभूमि के नाम से पहचाने जाने वाले हिमाचल में पिछले कुछ समय से ऐसी घटनाएं देखने को मिल रही है जो शर्मसार करती हैं। ऐसा ही देखने को मिला कुल्लू में जहां पर कोरोना महामारी के बीच तमाम नियमों को ठेंगा दिखाते हुए भीड़ जुट गई।फिर जब पुलिस वहां पर पहुंची तो देवताओं के कुछ श्रद्धालुओं ने पुलिस को भगा दिया।

घटना कुल्लू के नग्गर गांव की है। हर साल नग्गर में माता त्रिपूरा सुंदरी के प्रांगण में 6 दिन का एक कार्यक्रम होता है। इस साल यह आयोजन 18 से 24 मई तक चल रहा है। गुरुवार को इसका तीसरा दिन था, जिसके लिए नग्गर क्षेत्र के 3 देवी-देवता माता पटंति, माता त्रिपूरा सुंदरी व नाग देवता यहां एकत्रित हुए थे।

मगर आस्था रखने वाले लोगों की भीड़ भी वहां पर पहुंच गई। इनमें से कई लोग ऐसे थे जो न सोशल डिस्टैसिंग का ध्यान रख रहे थे और न ही कुछ लोगों ने सही तरीके से मास्क पहने हुए थे। सूचना मिलने पर  पुलिस टीम इस भीड़ को हटाने वहां पहुंची तो पुलिस टीम को भगा दिया गया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

देवी-देवताओं के पुजारियों का दावा है कि देवताओं को पुलिस की कार्रवाई पर एतराज है। हालांकि प्रबुद्ध वर्ग इस घटना के लिए आलोचना भी कर रहा है कि यह धार्मिक कार्य सिर्फ देवताओं के पुजारियों और चंद देवलुओं के साथ हो सकता था, इसके लिए भीड़ जुटाने की जरूरत नहीं थी, आस्था और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाया जाना चाहिए।

सीएम ने माना, हिमाचल को पड़ रही और वेंटिलेटर्स की जरूरत

शिमला।। हिमाचल के अस्पतालों में सभी तरह की व्यवस्थाएं होने का दावा करने के बाद अब मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने स्वीकार किया है कि प्रदेश को और वेंटिलेटर्स की जरूरत है। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान किए गए सवाल के जवाब में सीएम ने कहा, “हिमाचल प्रदेश को वेंटिलेटर वाले आईसीयू बेड्स की जरूरत पड़ रही है और इस मामले को केंद्र से उठाया गया है।”

दरअसल, इससे पहले कांगड़ा में मृत्यु दर अधिक होने के पीछे यह देखा जा रहा था कि वहां कुछ मरीजों को सही समय पर वेंटिलेटर वाले आईसीयू बेड नहीं मिल पा रहे। इससे तीन दिन पहले सीएम ने कहा था कि प्रदेश में 490 वेंटिलेटर हैं।

सीएम ने एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “वेंटिलेटर की कमी एज़ सच नहीं हैं, ये जरूरतमंद मरीजों के लिए उपलब्ध हैं। फिर भी कांगड़ा जिले में संक्रमितों की संख्या और मृत्यु ज्यादा होने के काऱण हमने वहां से वेंटिलेटर कांगड़ा भेजे हैं, जहां ये इस्तेमाल नहीं हो रहे। शुरू में दिक्कत आई थी लेकिन अब स्टाफ आदि ट्रेन्ड हैं ताकि वेंटिलेटर को इस्तेमाल कर सकें।”

मगर इस बयान के तीन दिन बाद ही मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया प्रदेश को वेंटिलेटर की कमी महसूस हो रही है। दरअसल, इन हिमाचल ने इससे पहले मामला उठाया था कि कैसे प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने खुद माना था कि वेंटिलेटर ऑपरेट करने के लिए ट्रेन्ड स्टाफ की कमी के लिए अधिकारियों से बात की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा था कि प्रदेश में कहां कितने वेंटिलेटर इंस्टॉल हुए, इसकी जानकारी नहीं है।

सेना ने हिमाचल सरकार को सौंपा 60 बिस्तरों वाला कोविड सेंटर

शिमला।। संकट की इस घड़ी में देश में जगह-जगह भारतीय सेना की ओर से भी स्वास्थ्य सुविधाओं को संभालने में योगदान दिया जा रहा है। इसी कड़ी में हिमाचल में भी भारतीय सेना ने शिमला में 60 बिस्तरों वाला कोविड सेंटर बनाकर जिला प्रशासन को सौंपा है।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने पिछले दिनों से सेना से आग्रह किया था कि मिलिट्री अस्पताल को कोविड फैसिलिटी के तौर पर इस्तेमाल करने की इजाजत दें। संजौली के वॉकर अस्पताल में यह सेंटर है। यह जगह संजौली और आईजीएमसी के बीच पड़ती है।

सेना की ओर से दी गई इस जगह का संचालन हिमाचल सरकार को करना होगा और उसी को स्टाफ की व्यवस्था करनी होगी। शिमला के मिलिटरी स्टेशन कमांडर ने इस कोविड सेंटर को जिला प्रशासन को सौंपते हुए कहा कि कोरोना महामारी पर काबू पाने के लिए नागरिक प्रशासन की मदद के लिए सेना पूरी मदद के लिए हमेशा तैयार है।

अब ढाई बजे होगी 18+ के लिए वैक्सीन की ‘फ्लैश’ बुकिंग

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में 18-44 वर्ष की आयु के लोगों को वैक्सीन के लिए अपना स्लॉट बुक करवाने में उसी तरह से मशक्कत करनी पड़ रही है जिस तरह से कुछ साल पहले चीनी स्मार्टफोन कंपनियों का मोबाइल खरीदने के लिए फ्लैश सेल में हिस्सा लेना पड़ता था। पहले सरकार की ओर से स्लॉट बुकिंग के लिए जो समय दिया गया, उससे पहले ही बुकिंग खुलने के आरोप लगे। फिर कुछ ही सेकंड में सभी स्लॉट बुक हो गए।

अब राज्य सरकार की ओर से आदेश जारी हुआ है कि 22, 25 और 29 मई को सभी जिले दोपहर बाद ढाई बजे कोविन पोर्टल पर अपने सेशन पब्लिश करें। यानी 18-44 आयु वर्ग वालों के वैक्सीनेशन के लिए तय दिनों (सोमवार और गुरुवार) से दो दिन पहले। इसलिए आप अगर अपना पंजीकरण करवाना चाहते हैं तो इन तारीखों को ढाई बजे से पहले ही तैयार होकर बैठ जाएं। ढाई से तीन बजे तक पोर्टल खुलेंगे लेकिन चंद सेकेंडों में ही स्लॉट बुक होने की आशंका है।

लॉटरी लगने जैसी स्थिति
देश में अगर वैक्सीन पर्याप्त होती तो प्रदेश में इस तरह से स्लॉट बुक करवाने में मारामारी नहीं होती। सोचिए, जब टेक्नॉलजी, मोबाइल और इंटरनेट की कॉमन समझ रखने वालों को इतनी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है तो गांव और अंदरूनी क्षेत्रों के उन लोगों का तो नंबर आएगा ही नहीं, जो मोबाइल फ्रेंडली नहीं हैं।

देश के दूसरे हिस्सों की तरह हिमाचल में भी वैक्सीन के लिए मारामारी जैसी स्थिति इसलिए पैदा हो गई है क्योंकि केंद्र के आदेश पर हिमाचल ने 18-44 के लिए वैक्सीनेशन शुरू कर दिया। मगर हकीकत यह है कि उसके पास वैक्सीनेशन के लिए पर्याप्त वैक्सीन नहीं है। हाल ही में सीमित मात्रा में आई सप्लाई से हफ्ते में मात्र दो दिन 18-44 के टीकाकरण के लिए रखे गए हैं और उसमें भी कुछ ही लोगों को स्लॉट बुक करवाने का मौका मिल रहा है। स्लॉट बुक होना लॉटरी लगने से कम नहीं है।

भले ही सरकार इस आधार पर पीठ थपथपा रही है कि वह वैक्सीनेशन के मामले में सबसे आगे है, लेकिन हकीकत यह है कि इसमें उसकी कोई उपलब्धि नहीं है। शुरू में वैक्सीन केंद्र के प्रबंधन से आई और अब जाकर राज्यों को अपने स्तर पर वैक्सीन का इंतजाम करना पड़ रहा है। राज्य सरकार की ओर से ऑर्डर की गई वैक्सीन की खेप अभी पहुंची है, इसके पहले ही 31 फीसदी (पुरानी जनगणना के आधार पर) आबादी का वैक्सीनेशन हो चुका था।

हालांकि, राज्य सरकार की, यूं कहें कि स्वास्थ्य कर्मियों की उपलब्धि यह रही कि उन्होंने उपलब्ध वैक्सीन वाइल्स से ज्यादा से ज्यादा लोगों का टीकाकरण किया और वैक्सीन बर्बाद नहीं हुई। लेकिन अब केंद्र सरकार की ओर से सेकंड डोज की अवधि बढ़ा दी गई है जिससे बहुत सारे लोगों को पहले वाले तय समय पर दूसरी डोज नहीं लग पा रही है। जब उनकी ही यह स्थिति है तो 18-44 वालों समेत पूरी आबादी का टीकाकरण करने में कई महीने लग जाएंगे।

कछुए की रफ्तार से हो रहे वैक्सीनेशन से पूरा सुरक्षा चक्र टूट जाएगा क्योंकि कोई अभी तक दावे से नहीं कह सकता कि वैक्सीन से कितने समय तक इम्यूनिटी बन रही है। हो सकता है कि जब तक आबादी के आखिरी हिस्से को वैक्सीन मिले, तब तक सबसे पहले वैक्सीन लगवाने वाले लोगों को वैक्सीन से मिली इम्यूनिटी ही खत्म हो गई है। यानी पूरा सुरक्षा चक्र टूट जाएगा। बेहतर होगा सरकार जिस आयु वर्ग को (जो खतरे में ज्यादा हैं) पहले से वैक्सीन लगवा रही है, उसे समय पर दूसरी डोज देकर सुरक्षित बना दे। वरना ऐसे न युवाओं का ढंग से टीकाकरण हो पा रहा, न उम्रदराज लोगों का।