देश में ऑक्सीजन और वैक्सीन संकट कैसे पैदा हुआ, क्रोनोलॉजी समझिए

IMAGE: AMAR UJALA

संदीप रांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश समेत भारत के कई राज्य वैक्सीन की कमी से जूझ रहे हैं। महामारी को रोकना है तो अधिक से अधिक आबादी का टीकाकरण ही एक रास्ता है। यह बात दुनिया भर के वैज्ञानिक और WHO तब से कह रहे हैं जब इस आपदा की शुरुआत हुई थी। मगर वैक्सीन बन जाने के बाद भी अब ऐसा क्यों हो रहा है कि भारत जैसे देश में वैक्सीन का संकट खड़ा हो गया है? वह भी तब जब एक महीना पहले तक भाजपा के नेता और उसके समर्थक यह गाते नहीं थक रहे थे कि भारत वैक्सीन के मामले में पूरा दुनिया का भला कर रहा है।

यह पूरा संकट कैसे पैदा हुआ, इसकी क्रोनोलॉजी समझनी पड़ेगी।

बीते साल अप्रैल-मई में ही अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी आबादी के लिए वैक्सीन हासिल करने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। यह प्रक्रिया एडवांस में ही शुरू कर दी गई थी जबकि अलग-अलग कंपनियों की वैक्सीन विकसित हो रही थीं। जब ट्रायल शुरुआती दौर में थे, तब भी बहुत सारे देश पैसा लगा रहे थे। मगर अफ़सोस, भारत में थालियां बजाने और दिया जलाने पर फ़ोकस हो रहा था।

लापरवाही तब भी हुई जब बीते साल अक्तूबर में जीनोम सीक्वेंसिंग कर रही भारत की एक सरकारी लैब ने वायरस के एक डबल म्यूटेंट वायरस के बारे में आगाह किया था। मगर इस बीच जीनोम सीक्वेंसिंग की फंडिंग कम हो गई और रिसर्च ढीला पड़ गया। लेकिन इस ओर ध्यान देना बीते साल के अंत तक सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं था। क्योंकि शायद तब तक केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का ध्यान राज्यों के आगामी विधानसभा चुनावों और कुंभ जैसे आयोजनों पर ज़्यादा था।

ध्यान देने की बात यह है कि जिस फ़ाइज़र की वैक्सीन को सबसे पहले देशों ने मंज़ूरी दी, उसने भारत में भी दिसंबर माह में इमर्जेंसी इस्तेमाल की इजाजत मांगी थी। मगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि सरकार शायद भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनाना चाह रही थी। ये हाल तब थे जब बीते साल नवंबर से कई वायरलॉजिस्ट कह रहे थे कि भारत को सेकेंड वेव के लिए तैयार रहना चाहिए और हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर को तैयार करना चाहिए ताकि सांस लेने में समस्या पैदा करने वाले इस वायरस के मरीज़ों की देखभाल की जा सके।

ध्यान देने की बात यह है कि संसद की एक समीति ने 2020 के अप्रैल में ही ऑक्सीजन की आपूर्ति के मसले को प्राथमिकता देने को कहा था। मगर सरकार की प्राथमिकताएं शायद कुछ और रहीं कि ठीक एक साल बाद हालात बिगड़े और देश ऑक्सीजन की कमी से जूझने लगा।

जनवरी 2021 को याद कीजिए जब भारत के पी एम ने वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की वर्चुअल मीटिंग में बताया कि ‘दूसरे देश भारत में विनाश की बात कर रहे थे, जिन देशों ने हमारे प्रबंधन पर उंगली उठाई, उन्हें हमने ग़लत साबित कर दिया।‘

प्रधान मंत्री ने उस समय यह भी कहा था कि ‘हमने 150 देशों को वैक्सीन को एक्सपोर्ट की। ‘ मगर ध्यान रहे उस समय तो दोनों वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को कोई फंड सरकार द्वारा नही दिया गया। यह जानकारी हाल ही में सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दिए एफिडेविट में दी गई है। कहा गया है कि सरकार ने कोई हेल्प नहीं की। लेकिन सत्ताधारी दल के नेता प्रचार में व्यस्त रहे कि हमने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया। क्या उस समय भविष्य को देखते हुए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों की आर्थिक मदद नहीं करनी चाहिए थी कि अपने देश की वैक्सीन की मांग पूरी हो सके?

इस बीच, फरवरी में चुनाव और कुंभ मेले की शुरुआत हो गई। सरकारों का फ़ोकस इन्हीं पर रहा जबकि महाराष्ट्र और केरल से खतरे की घंटी की आवाज आना शुरू हो गई थी। मगर मार्च आते-आते चुनावों का शोर रहा और सारा मंत्रिमंडल वहीं व्यस्त हो गया। इस बीच कुछ सांसद या सत्ताधारी नेता भारतीयों की मजबूत इम्यूनिटी या फिर गोबर जैसे विकल्पों की बात कर देते थे।

इसके बाद अप्रैल-मई में क्या हुआ, आपने खुद देखा। ऑक्सीजन की जिस कमी को लेकर पहले ही आगाह कर दिया गया था, उसे लेकर कुछ ख़ास नहीं किया गया। हेल्थ इंफ्रा को मज़बूत करने के लिए पर्याप्त प्रयास नहीं हुए। न तो वैक्सीन उत्पादन में तेज़ी के लिए निवेश किया गया न अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से खरीद की कोशिश की गई। फ़ाइजर और स्पूतनिक को मंज़ूरी दी गई अप्रैल में जबकि इन्हें पहले ही क्लियरेंस दी जा सकती थी।

अब कैसे हालात हैं, उनसे आप वाकिफ़ हैं। सवाल है कि क्या क्या सेकेंड वेव का भयंकर प्रभाव समय रहते रोका जा सकता सकता था? जवाब है – हां। सरकार के पास सारे इनपुट्स थे, एक्सपर्ट्स की चेतावनियां तीं। मगर सरकार की प्राथमिकता में यह सब रहा ही नहीं। वरना हालात शायद अब से बेहतर होते।

(लेखक हमीरपुर जिले के रहने वाले हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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