कैग रिपोर्ट: कई विभागों, HPU में अनियमितताएं, हेलिकॉप्टर पर फिजूलखर्ची

शिमला।। भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल सरकार के कई विभागों में करोड़ों का गबन हुआ है। कई विभागों में अनियमितताएं पाई गई है। रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न विभागों में 2.12 करोड़ रुपये के गबन और 116 करोड़ रुपये की फिजूलखर्ची का खुलासा हुआ है।

मानसून सत्र के अंतिम दिन मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कैग की रिपोर्ट को सदन में प्रस्तुत किया। इस रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी और पशुपालन विभाग में करोड़ों के गबन की बात सामने आई है। इसके अलावा स्कूल वर्दी के परीक्षण में लैब को अनुचित लाभ पहुंचाने की बात सामने आई है।

कैग की रिपोर्ट के मुताबिक पशुपालन विभाग में सरकारी प्राप्तियों व लाभार्थी अंश को न तो रोकड़-बही में लेखांकित किया गया है और न ही सरकारी खाते में जमा किया गया है। रिपोर्ट में पशुपालन विभाग में 99.71 लाख के गबन का खुलासा हुआ है।

रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में भी 1.13 करोड़ रुपये का गबन हुआ है। कैग की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल यूनिवर्सिटी के प्राधिकारियों द्वारा पंजिकाओं व अभिलेखों में प्राप्तियों की बैंक विवरण में प्रदर्शित प्राप्तियों के साथ तुलना के लिए सामयिक मिलान और आवश्यक जांच करने में विफलता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सरकाए द्वारा लीज पर लिए गए पवन हंस कंपनी के हेलीकॉप्टर में फिजूलखर्ची हुई है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि इस मामले में मैसर्ज पवन हंस लिमिटेड के खराब सुरक्षा रिकॉर्ड को अनदेखा किया गया। इसके अलावा मनमाने ढंग से दरों में सालाना दस फीसदी की बढ़ोतरी की गई। नतीजतन सरकार का 18.39 करोड़ रुपए बेवजह खर्च हुआ।

कैग की रिपोर्ट में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को दी जाने वाली निशुल्क वर्दी की जांच में।कम्पनी को अनुचित लाभ देने की भी बात कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-17 और 2017-18 में कपड़े की जांच का कार्य कम्पनियों के चयन किये बिना एक ही कंपनी को देने का फैसला किया गया। जिससे 1.62 करोड़ बेवजह खर्च हुए और कंपनी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।

महेंद्र सिंह ने प्रश्न की रूपरेखा में उलझाए रमेश धवाला

शिमला।। शुक्रवार को विधानसभा के मॉनसून सत्र के अंतिम दिन जलशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर भाजपा के ही वरिष्ठ विधायक रमेश धवाला को प्रश्न की रूपरेखा में उलझाते नज़र आए। धवाला के सवाल का जवाब देते हुए मंत्री ने कहा कि जलशक्ति विभाग में कोई भी कर्मचारी आउटसोर्स आधार पर नियुक्त नहीं है।

इसके आगे मंत्री ने जोड़ा कि शायद विधायक पैरा फिटर, पंप ऑपरेटर, जल रक्षक और मल्टीपर्पज वर्करों के बारे में पूछना चाहते हैं। लेकिन उन्होंने सवाल में कर्मचारियों के बारे में पूछा है। जिसका जवाब दे दिया गया है।

इस पर धवाला ने कहा कि मंत्री इंकार कर रहे हैं। पता नहीं अफसर इन्हें सही सूचना दे रहे हैं या नहीं। लेकिन मंत्री जी हमारे मित्र हैं। सुन लेते हैं क्या जवाब देते हैं। जवाब में महेंद्र सिंह बोले मित्रता निभा लेते हैं। मैं क्या जवाब दूँ। इस बारे में बैठकर बात कर लेंगें।

इसके बाद रमेश धवाला ने कहा कि क्या हुआ अगर कर्मचारी शब्द सवाल पूछने के लिए सही नहीं है। लेकिन है तो ये भी विभाग में ही। इसके जवाब में मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा कि इस संबंध में आपको पूरी जानकारी दे दी जाएगी।

सीएम ने विपक्ष को बताया बिखरा हुआ कुनबा

शिमला।। विधानसभा के मॉनसून सत्र के आखिरी दिन भी विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर दिया। विपक्ष ने प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष के इस्तीफे को लेकर सदन से वाकआउट किया। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सीएम जयराम ठाकुर ने विपक्ष को बिखरा हुआ कुनबा बताया है।

सीएम ने सदन में कहा कि विपक्ष बिखरा हुआ कुनबा है। सभी में नेता बनने की होड़ लगी है। विपक्ष के नेता अपने दूसरे सदस्यों को बोलने का मौका नहीं देना चाहते हैं। जबकि उन्हें दूसरे सदस्यों को बोलने का मौका देना चाहिए।

सीएम ने कहा कि वे विपक्ष की कार्यप्रणाली को जानते हैं। उन्होंने वर्षों तक सदन में विपक्ष की कार्यप्रणाली देखी है। अनावश्यक और ज्यादा बोलने से कोई नेता नहीं बन जाता है। विपक्ष का काम सुझाव देना होता है। लेकिन यहां विषय कुछ और होता है और विपक्ष कुछ और ही बोलता है।

विपक्ष द्वारा विधानसभा अध्यक्ष के इस्तीफे की मांग पर सीएम ने कहा कि विधानसभा अध्यक्ष संवैधानिक पद है। उनकी ओर से जो व्यवहार किया गया, सत्ता पक्ष को उस पर आपत्ति है। सीएम ने कहा कि अध्यक्ष को हटाने के लिए 14 दिन पहले नोटिस दिया जाता है। जैसा प्रावधान है, उसके अनुसार इसमेें 14 दिन चाहिए। लेकिन यह नोटिस सत्र के अंतिम दिन दिया गया है। इसके अलावा इसमें एक तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है, जो विपक्ष के पास नहीं है। ऐसे में तकनीकी तौर पर यह नोटिस खुद ब खुद खारिज हो जाता है।

चाय के बागान न बेचने का बिल नहीं हुआ पारित

शिमला।। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मामला लंबित होने के कारण हिमाचल प्रदेश भू-जोत अधिकतम सीमा अधिनियम, 1973 संशोधन बिल विधानसभा की प्रवर समिति को भेजा गया है। यह विधेयक चाय बागानों को बेचने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने को लेकर था। सत्ता पक्ष व विपक्ष के कई विधायकों ने इस पर आपत्ति जताई। जिसके बाद इसे प्रवर समिति को भेजने का निर्णय लिया गया।

राजस्व मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने विधानसभा में इस बिल को संशोधन के लिए पेश किया था। इस मुद्दे पर विस्तृत चर्चा के बाद सीपीएम विधायक राकेश सिंघा, भाजपा विधायक अरुण कुमार और कांग्रेस विधायक आशीष बुटेल ने आपत्ति जताई। उसके बाद मंत्री ने इसे विधानसभा की प्रवर समिति को सौंपने पर सहमति व्यक्त की।

बिल में कहा गया था कि इस समय सरकार की पूर्व अनुमति से चाय बागान के तहत भूमि उपयोग में परिवर्तन और भूमि के हस्तांतरण का प्रावधान है। लेकिन जब से यह प्रावधान आया है, तब से देखा गया है कि चाय बागान के तहत भूमि का उपयोग चाय बागान के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिए किया गया है। उन्होंने कहा कि प्रावधानों का सहारा लेकर बिक्री आदि के माध्यम से इन बागानों को स्थानांतरित किया जाना कानून की भावना और मंशा के खिलाफ है।

इस पर कई विधायकों ने आपत्ति जताई। कांग्रेस विधायक आशीष बुटेल ने कहा कि चाय बागानों के मालिक जिन्होंने निर्धारित सीमा से अधिक भूमि रखने के लिए भूमि सीमा अधिनियम का लाभ नहीं लिया था, उन्हें इस संशोधन के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए। जिन लोगों के पास सीलिंग से कम जमीन है, उन्हें चाय बागानों को उस सीमा तक जो कानून के तहत मान्य है रखने की इजाजत दी जानी चाहिए।

सीपीएम विधायक राकेश सिंघा ने कहा कि आज चाय बागानों से आय न के बराबर हो रही है। ऐसे में अगर कोई वहां पर सेब या अन्य कुछ और चीज उगाना चाहता है तो उसे इसकी इजाजत नहीं है। भाजपा विधायक अरुण कुमार ने भी इस पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि उनके क्षेत्र में छोटे-छोटे चाय के बागान है। कई परिवारों ने इन्हें बेच दिया है। तो कइयों ने इन पर मकान बना दिये है। ऐसे में यह कानून पास आ जाता है तो इन परिवारों को मुश्किलें आ जायेगी।

इन सभी विधायकों ने इस बिल को विधानसभा की प्रवर समिति को भेजने की सिफारिश की। जिसके बाद इसे प्रवर समिति को भेजने का फैसला किया है।

हिमाचल में बढ़ेगा आशा वर्करों का मानदेय, प्रदेश सरकार केंद्र को भेजेगी प्रस्ताव

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में जल्द ही आशा वर्करों को बढ़ा हुआ मानदेय जारी किया जाएगा। इसके साथ ही कोरोना काल का विशेष इंसेंटिव भी जारी कर दिया जाएगा। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. राजीव सैजल ने यह जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि हिमाचल में आशा वर्करों का मानदेय बढ़ाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जाएगा।

माकपा विधायक राकेश सिंघा और भाजपा विधायक अरुण कुमार ने विधानसभा में यह सवाल पूछा था जिसके जवाब में स्वास्थ्य मंत्री ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य विभाग को 24 करोड़ की राशि मिली है। इसमें से 14 करोड़ जारी कर दी है। उन्होंने कहा कि सीएम जयराम ठाकुर ने बजट भाषण में आशा वर्करों के मानदेय में 750 रुपये बढ़ोतरी की घोषणा की है, उसे भी जारी किया जा रहा है। इससे प्रदेश की 7964 आशा वर्करों को फायदा होगा।

इस पर माकपा विधायक राकेश सिंघा ने कहा कि अभी तक आशा वर्करों के मानदेय नहीं बढ़ाया गया है। उन्हें कोरोना वॉरियर्स का दर्जा दिया गया है। क्यों इन्हें नजरअंदाज किया जा रहा है। इसके पीछे क्या कारण है। इसके जवाब में स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि आशा वर्करों को बहुत जल्द बढ़ा हुआ मेहनताना मिलेगा। साथ ही कोरोना काल में इंसेंटिव की 1500-1500 राशि भी जल्द जारी की जाएगी।

जलवायु परिवर्तन भी पहाड़ दरकने का मुख्य कारण

शिमला।। हिमाचल में आए दिन भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रहीं हैं। लगातार पहाड़ दरकने की घटनाएं सामने आ रही है। हिमाचल प्रदेश के अलावा अन्य पहाड़ी राज्यों में भी पहाड़ दरक रहे हैं। इससे जानमाल का नुकसान हो रहा है। विद्युत प्रोजेक्ट इसके पीछे एक बड़ा कारण है। लेकिन जलवायु परिवर्तन को भी इसका कारण माना जा रहा है।

बरसात का मौसम आते है पहाड़ी राज्यों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। बरसात और सर्दी के मौसम में बड़ा बदलाव आया है। असमय बर्फबारी और बरसात हो रही है। तेज बारिश पहाड़ों के दरकने की एक वजह है।

यह बात गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान अल्मोड़ा के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जगदीश चंद्र कुनियाल ने कही है। डॉ कुनियाल ढाई दशक से भी अधिक वर्षों तक जिला कुल्लू के मौहल स्थित गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान में सेवाएं दे चुके हैं।

डॉ कुनियाल का कहना है कि अब बारिश का स्तर बढ़ने लगा है। जो बारिश 24 घंटे तक होनी चाहिए, वह मात्र तीन से चार घंटे में हो जा रही है। जलवायु परिवर्तन हो रहा है। बारिश का पानी जमीन में रसने के बजाय पहाड़ों व कंदराओं में घुस रहा है। यही वजह है कि मौसम साफ होने पर पहाड़ों में दरारें होने से ये गिर पड़ते हैं।

डॉ कुनियाल ने कहा कि विकास जरूरी है। सड़कें निकालना भी जरूरी है। विकास को रोका नहीं जा सकता है। लेकिन यह सब वैज्ञानिक आधार पर होना चाहिए। सड़कें और टनल बनाने के बाद पहाड़ों का सरंक्षण भी जरूरी है, ताकि भूस्खलन को रोका जा सके। इसके लिए घास लगाने के साथ झाड़ियां और पौधारोपण किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि इन पहाड़ दरकने और भूस्खलन की घटनाओं को रोकने के लिए वैज्ञानिक ढंग से कदम उठाने की जरूरत है। समय-समय पर संवेदनशील जगहों पर वैज्ञानिक आधार पर निरीक्षण होता रहना चाहिए। चार से पांच साल बाद निरीक्षण होना चाहिए। इससे पहाड़ की स्थिति को भांपा जा सकता है। जिससे लोगों की ज़िंदगी और अन्य नुकसान को बचाने में मदद मिलेगी।

किन्नौर: पास लेने को लेकर बहस से लगा था जाम, ऊपर से गिरा पहाड़

एमबीएम न्यूज़, किन्नौर।। निगुलसरी में हुए हादसे में प्राकृतिक आपदा के साथ-साथ मानवीय चूक भी एक कारण है। अगर ये  मानवीय चूक नहीं होती तो कई जानें बच सकती थी। कुदरत ने पहले ही आने वाले खतरे के संकेत दिए थे। अगर कोई उन संकेतों को समझ लेता तो मृतकों के आंकड़ा कम हो सकता था।

दरअसल, जिस स्थान पर ये भूस्खलन हुआ, वहाँ पहले से ही सड़क पर छोटे-छोटे पत्थर गिरे हुए थे। सड़क पर बिखरे यह पत्थर आने वाले बड़े खतरे का संकेत दे रहे थे। लेकिन कोई इन संकेतों को समझ नहीं पाया।

घटनास्थल का जायजा लेने के दौरान जब जानकारियां जुटाने का प्रयास किया गया तो कई बारीक जानकारियां सामने आई। इन जानकारियों से इस बात का खुलासा हुआ कि वहां दो वाहन चालकों के बीच पासिंग को लेकर बहसबाजी हो रही थी। अगर, चालकों के बीच बहसबाजी नहीं होती तो हादसे में मृतकों की संख्या इतनी नहीं होती।

हालांकि सड़क पर पहले से ही छोटे-छोटे पत्थर बिखरे पड़े थे। ये पत्थर आने वाले खतरे का भी संकेत दे रहे थे। लेकिन पासिंग को लेकर चल रही बहस के दौरान कई अन्य वाहनों को भी ब्रेक लगानी पड़ी। इसी बीच अचानक पहाड़ी से चट्टानें गिरीं और पलक झपकते ही कई वाहन चट्टानों की चपेट में आ गए।

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उधर, ऐसा भी माना जा रहा है कि चट्टानों की चपेट में आई एचआरटीसी बस को तलाशने में भी गलतफहमी हुई। पहले तो सर्च ऑपरेशन शुरू होने में ही कई घंटे लग गए। सर्च ऑपरेशन की शुरुआत से ही यही माना गया कि बस सड़क पर ही मलबे के नीचे हो सकती है। लेकिन जब देर शाम तक पूरे हाईवे से मलबा हटाने में कामयाबी मिली तो बस का कोई सुराग नहीं लगा। उसके बाद बस को खाई में ढूंढा गया। वीरवार सुबह बस का पता चल पाया। जिस हालत में शव बरामद किए गए, वो तस्वीरें विचलित करने वाली हैं।

(यह खबर एमबीएम न्यूज नेटवर्क के साथ सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

किन्नौर में बढ़ती भूस्खलन की घटनाओं पर क्या है विशेषज्ञों की राय

किन्नौर।। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में एक महीने के भीतर भूस्खलन की दो बड़ी घटनाएं देखने को मिली हैं। पहले 25 जुलाई को सांगला-छितकुल मार्ग पर बटसेरी के पास भूस्खलन से बड़ा हादसा हुआ था। अब इसके 16 दिन बाद ही जिले के निगुलसरी में बड़ा भूस्खलन हुआ है। इन दोनों घटनाओं में कई लोगों को अपनी जान गवानी पड़ी।

अंधाधुंध जल विद्युत दोहन हो रहा है। इस वजह से किन्नौर के पहाड़ दरकने लग गए हैं। भूकंप की दृष्टि से भी यह क्षेत्र सिस्मिक जोन पांच के तहत आता है। ऐसे में जान और माल का नुकसान लगातार बढ़ रहा है। सतलुज नदी यहां की मुख्य नदी है। यही किन्नौर की जीवन रेखा है। लेकिन यही जीवन रेखा अब अंधाधुंध विद्युत दोहन के कारण 150 किलोमीटर में दम घोटकर भूमिगत सुरंगों में बह रही है।

किनौर जिले में भूस्खलन की घटनाएं लगातर बढ़ रही हैं। इन बढ़ती घटनाओं पर विशेषज्ञों समेत अन्य लोगों ने चिंता जताई है। हिमाचल प्रदेश के प्रथम डीजीपी रहे 89 वर्षीय विद्वान-चिंतक आईबी नेगी ने इन घटनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। नेगी मूल रूप से किन्नौर जिले के सांगला के रहने वाले हैं, मगर शिमला के खलीणी में उनकी अपनी कोठी है।

किन्नौर में बढ़ती भूस्खलन की घटनाओं पर आईबी नेगी का कहना है कि शांत किन्नौर ने विकास के नाम पर बहुत कुछ खोया है। नेगी ने किन्नौर में हो रही इन घटनाओं को ब्लास्टिंग का नतीजा बताया है। आईबी नेगी कहते हैं कि जब ये सब कुछ नहीं था तो विकास बेशक कम था। मगर उस दौरान इस तरह के बड़े हादसे नहीं होते थे। नेगी ने यह भी कहा कि पहाड़ों के दरकने से किन्नौरवासी भयभीत हैं। और इसे ही उन्होंने किन्नौरवासियों के विस्थापन का कारण बताया है।

हिमाचल के पहले डीजीपी आईबी नेगी ने यह बात बुधवार को एक समाचार पत्र से विशेष बातचीत में कही है। नेगी ने कहा कि निगुलसरी का यह हादसा बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। उन्होंने किन्नौर जिले के बड़े-बड़े बिजली प्रोजेक्टों को इसका इसका कारण बताया। नेगी ने कहा कि बिजली प्रोजेक्ट यहां की पारिस्थितिकी का ठीक से अध्ययन कर नहीं लगाए गए हैं।

उन्होंने कहा कि यहां स्विट्जरलैंड की तर्ज पर तीन या पांच मेगावाट के पावर प्रोजेक्ट लगाने चाहिए थे। लेकिन इसके विपरीत यहां हजारों मेगावाट के बड़े प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं। उन्होंने इस बात पर अफसोस जताया कि थोड़े से पैसों के लिए बहुत बड़ा नुकसान किया गया है। लाहौल स्पीति वाले इस बारे में ठीक विरोध कर रहे हैं कि वे किन्नौर की तरह पहाड़ों को खत्म नहीं करना चाहते।

नेगी ने कहा कि पिछले कुछ सालों में किन्नौर बहुत बदला है। यहां सड़कें बननी हैं, ये तो सही है। पर अब वहां फोरलेन बनाए जाने की बातें होने लगी हैं, जिसकी जरूरत नहीं है। यहाँ जो सड़कें हैं उन्हें ठीक से मेंटेन किया जाना चाहिए। उन्होंने पुराने समय का ज़िक्र करते हुए कहा कि पचास-साठ साल पहले किन्नौर बहुत शांत क्षेत्र था। यहाँ कभी भी इस तरह के हादसे नहीं होते थे। उन्होंने कहा कि सतलुज के साथ जो सड़क बनी है, इसमें काफी लोगों की मृत्यु हुई थी और यह उस समय का बड़ा हादसा था।

उन्होंने उस समय का भी ज़िक्र किया जब वह पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उस समय तो यह सड़क थी ही नहीं। उन्हें सांगला से शिमला पहुंचने में पांच दिन लगते थे। तीन दिन में वह सांगला से रामपुर पहुंचते थे। वहां से दो दिन शिमला पहुंचने में लगते थे। उन्होंने कहा यह अच्छी बात है कि सड़के बनने से किन्नौर की दूरी घट गई है। इससे समय बच रहा है। विकास हुआ है। लोग भी पढ़-लिख गए हैं। बिजली प्रोजेक्टों से रोजगार भी मिला है। पर अब किन्नौर पहले जैसा नहीं रहा है। ब्लास्टिंग ने इसे बहुत कमजोर कर दिया है।

इस बारे पन बिजली विशेषज्ञ और बिजली बोर्ड से सेवानिवृत्त अतिरिक्त अधीक्षक अभियंता इंजीनियर आरएल जस्टा लिखते हैं कि किन्नौर के पहाड़ कच्चे, खुरदरे और संवेदनशील हैं। इस कारण ये अपनी वास्तविक अवस्था से हिल-ढुल गए हैं। पन बिजली परियोजनाओं के बारे में शुक्ला कमेटी की रिपोर्ट को सरकार को ठंडे बस्ते से निकाल लेना चाहिए। उस पर सरकार को अमल करना चाहिए। इस रिपोर्ट के मुताबिक ट्री लाइन से ऊपर कोई भी पन विद्युत परियोजनाएं नहीं बननी चाहिए। प्रोजेक्टों के बीच में भी एक निश्चित दूरी होनी चाहिए।

35 वर्षों से पशुशाला में रह रही महिला पंचायत की नज़र में गरीब नहीं

एमबीएम न्यूज़, सिरमौर।। एक महिला 35 वर्षों से पशुशाला में जीवनयापन कर रही हैं, लेकिन स्थानीय पंचायत की क्या मज़ाल जो महिला को गरीब मान लें। मामला सिरमौर जिले के विकास खंड संगड़ाह के अंतर्गत आने वाली रेड़ली पंचायत का है।

यहां एक 70 वर्षीय महिला पिछले 35 वर्षों से पशुशाला में रह रही है, लेकिन स्थानीय पंचायत उसे गरीब मानने को राजी ही नहीं है। महिला का नाम पुनो देवी है। न तो महिला को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान स्वीकृत हुआ है। न ही उसका नाम बीपीएल सूची में शामिल किया गया है। हैरानी की बात ये है कि तीन दिन पहले ही बीपीएल की सूची तैयार हुई है।

पंचायत द्वारा तैयार बीपीएल सूची में कई असली गरीब शामिल न होने को लेकर स्थानीय निवासी देवेंद्र सिंह ने एसडीएम संगड़ाह को लिखित में शिकायत सौंपी है। देवेंद्र सिंह की मानें तो पंचायत में असली गरीबों के बजाय कुछ प्रभावशाली लोगों को बीपीएल में शामिल किया गया है।

पुनो देवी को जोड़ों में दर्द रहता है, जिस कारण वह काम करने में सक्षम नहीं है। करीब 850 रुपये मासिक पेंशन पेंशन मिलती है। इसी के सहारे इनकी दो वक्त की रोटी चल रही है। एक गाय व एक बकरी के साथ पशुशाला में रह रही इस वृद्धा को जवान बेटी की शादी की चिंता भी सताए जा रही है।

पिछले पंचायत चुनाव के दौरान हालांकि एक उम्मीदवार द्वारा इन्हें वोट डालने के लिए पीठ पर उठा कर लाया गया, मगर वर्तमान पंचायत प्रधान के अनुसार उन्हें यह याद नहीं है। यहाँ एक और हैरानी की बात ये है कि मीडिया की सुर्खियां बटोरने के शौकीन क्षेत्र के नेता भी पुनो देवी के विषय को लेकर प्रतिक्रिया देने को राजी नहीं है।

इस विषय पर पंचायत सचिव चंपा देवी व प्रधान का कहना है कि रविवार को जब ग्राम सभा की बैठक हुई, तो उसमें पुनो देवी उपस्थित नहीं हुई। किसी ने उनका नाम भी प्रस्तावित नहीं किया। वहीं इस मामले की एसडीएम से शिकायत कर चुके देवेंद्र सिंह का कहना है कि अपने वाहन रखने वाले कुछ लोग भी बीपीएल में हैं। पंचायत सचिव व प्रधान उनकी बात को अनसुना कर रहे हैं।

मामले पर एसडीएम संगड़ाह डॉ विक्रम नेगी ने बताया कि देवेंद्र सिंह नामक शख्स द्वारा की गई बीपीएल सूची संबंधी शिकायत आगामी कार्यवाही के लिए बीडीओ संगड़ाह को भेजी गई है।

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कार्यवाहक बीडीओ संगड़ाह हरमेश ठाकुर का कहना है कि विभाग हालांकि बीपीएल सूची में चयनित किए गए अपात्र लोगों के नाम काट सकता है, मगर पुनो देवी अथवा किसी अन्य शख्स का नाम शामिल करने के लिए केवल ग्राम सभा ही अधिकृत है।

(यह खबर एमबीएम न्यूज नेटवर्क के साथ सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

बैजनाथ-भरमौर को सीधे जोड़ने वाली सड़क बनाने की तैयारी

कांगड़ा।। बैजनाथ से चम्बा की दूरी अब घटने वाली है। सरकार ने 114 किलोमीटर लंबी बैजनाथ-भरमौर-होली सड़क परियोजना को मंजूरी दे दी है। जालसू दर्रे के रास्ते बैजनाथ को भरमौर से जोड़ते हुए धौलाधार की पहाड़ियों से होकर सड़क का निर्माण किया जाएगा। यह प्रोजेक्ट पिछले 30 साल से लटका हुआ था।

हिमाचल प्रदेश राज्य ऊन महासंघ के अध्यक्ष त्रिलोक कपूर ने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा कि सड़क परियोजना के पूरा होने के बाद बैजनाथ और भरमौर के बीच की दूरी 200 किमी कम हो जाएगी। यह परियोजना नाबार्ड द्वारा होगी। पहले चरण में 15 किलोमीटर सड़क के निर्माण के लिए 13 करोड़ रुपये जारी किए हैं। उन्होंने केंद्र से परियोजना को मंजूरी दिलाने में रुचि लेने के लिए मुख्यमंत्री जय राम ठाकुर का भी धन्यवाद दिया।

कपूर ने कहा कि पिछले साल उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की थी और उनसे बैजनाथ-भरमौर सड़क परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करने का अनुरोध किया था। उन्होंने कहा कि केंद्र ने राज्य सरकार की परियोजना रिपोर्ट को मंजूरी दे दी है और पहले चरण के लिए 13 करोड़ रुपये भी जारी किए हैं।

उन्होंने कहा कि यह सड़क बनने से चंबा और कांगड़ा जिलों के आदिवासी लोगों को फायदा होगा, जो साल में नौ महीने धौलाधार के बर्फीले इलाकों में रहते हैं और सर्दियों के दौरान निचले इलाकों में चले जाते हैं।