MWC 2017 में लॉन्च हुआ मोबाइल फोनों का बाप Nokia 3310

रविवार को HMD GLobal ने इसे ‘मॉडर्न ट्विस्ट’ के साथ Nokia 3310 को फिर से लॉन्च किया। इसकी कीमत 49 यूरो यानी करीब 3500 रुपये रखी गई है। भारत में इसकी बिक्री 2017 की दूसरी तिमाही यानी अप्रैल के बाद कभी भी शुरू हो सकती है।

कंपनी का दावा है कि यह 22 घंटे का टॉकटाइम देगा और 1 महीने तक स्टैंडबाइ मोड में रह सकता है। यह वॉर्म रेड और पीले रंगों में ग्लॉस फिनिश में मिलेगा। डार्क ब्लू और ग्रे कवर्स में यह मैट फिनिश में होगा इसमें माइक्रो-यूएसबी पोर्ट लगा है जिसके जरिए चार्जिंग की जा सकती है। इसमें स्नेक गेम भी है।

Nokia 3310 (2017) में 2 मेगापिक्सल का बैक कैमरा दिया गया है जिसके साथ फ्लैश है। 2.4 इंच का QVGA डिस्प्ले वाला यह फीचर फोन Nokia Series 30+ ऑपरेटिंग सिस्टम पर रन करता है। इसकी स्टोरेज 16MB है और 32 जीबी तक का कार्ड इसमें लगाया जा सकता है। 1200 mAh की रिमूवेबल बैटरी इसमें लगी है।

मंडी शिवरात्रि मेले की पहली स्टार नाइट में सुखविंदर का फ्लॉप शो

मंडी।। हिमाचल प्रदेश के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में स्थानीय कलाकारों को नजरअंदाज करके पंजाब या अन्य जगहों से कलाकारों को बुलाने का सिलसिला नया नहीं है। अक्सर प्रशासन स्थानीय कलाकारों को कम पैसे देता है और उनके कार्यक्रम में जल्दी ही निपटा देता है। स्टार नाइट्स में अन्य राज्य के कलाकारों को लाखों रुपये देकर बुलाया जाता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि बड़े स्टार अपने साथ पूरा सिस्टम लेकर चलते हैं और ज्यादातर वक्त पहले से रेकॉर्ड गाने पर होंठ हिलाकर जनता को उल्लू बनाते हैं। अगर इनका सिस्टम बिगड़ जाए तो कलई खुल जाती है। प्रदेश के लगभग सभी अंतरराष्ट्रीय मेलों में स्थानीय प्रशासन हिमाचल के कलाकारों को बजाय बाहर के कलाकारों को प्राथमिकता देता है। ऐसा मंडी में भी किया गया और बुरी तरह कार्यक्रम फ्लॉप हो गया।

अखबारों ने भी लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव की पहली सांस्कृतिक संध्या में शोर-शराबा ज्यादा रहा और मनोरंजन कम। पहला संध्या में पार्श्व गायक सुखविंदर सिंह को बतौर स्टार कलाकार बुलाया गया था। जैसे ही सुखविंदर सिंह मंच पर आए तो साउंड में दिक्कत आ गई। सिर्फ इंस्ट्रूमेंट का ही साउंड सुनाई दिया और गायक की आवाज गायब ही हो गई।

यह सिलसिला काफी देर चलता रहा और बीच में एक बार तो सुखविंदर ने ट्रैक ही सुना दिया और अपने सिर्फ होंठ हिलाते रहे। जब जनता ने हूटिंग की तो सुखविंदर ने इस बात को कबूल भी कर दिया और अपने साउंड असिस्टेंट को जमकर लताड़ लगाई। सुखविंदर ने बताया कि उनके साउंड इंजीनियर की तबीयत खराब हो गई और उनका असिस्टेंट सही ढंग से साउंड मैनेज नहीं कर पा रहा है।

पंजाब केसरी अखबार ने लिखा है कि माहौल को देख मायूस दर्शकों ने अपने घर का रूख करना बेहतर समझा दर्शक इस बीच ऐसे बैठे रहे जैसे किसी सत्संग में आए हों। बाद में मायूस दर्शकों ने अपने घर का ही रूख करना बेहतर समझा। बताया जा रहा है कि जिला प्रशासन ने सुखविंदर सिंह पर लाखों रूपए खर्च किए हैं लेकिन बदले में जो मनोरंजन होना चाहिए था वह नहीं हुआ और सिर्फ शोर-शराबा ही सुनाई दिया।

यही नहीं, बीच में सुखविंदर के पैर के नीचे मंच पर कुछ आया तो उन्होंने ढंग से मंच बनाने की सलाह दे डाली। कोई शख्स फोटो खींच रहा था तो उसे उन्होंने कैमरा बंद करने की नसीहत दे डाली। कुल-मिलाकर कार्यक्रम में रायता फैला रहा।

हालांकि तकनीकी गड़बड़ी कभी भी किसी के भी साथ हो सकती है और यह भी संभव है कि इंतजाम सही न हों। मगर सोशल मीडिया पर चर्चा है कि हिमाचल के कलाकारों को प्रोत्साहन देना चाहिए क्योंकि वे बिना किसी आधुनिक साउंड सिस्टम के सिर्फ अपनी आवाज और वाद्य यंत्रों से समां बांधने की काबिलियत रखते हैं। अब सबको इंतजार है शिवरात्रि मेले की उस सास्कृतिक संध्या का जिसमें लमन बैंड प्रस्तुति देगा।

किन्नौर के शोंगटोंग प्रॉजेक्ट के मजदूरों ने बंद की अधिकारियों की बोलती

किन्नौर।। किन्नौर में बन रहे शोंगटोंग पावर प्रॉजेक्ट से जुड़े मजदूरों का एक वीडियो वायरल हो गया है। इसमें मजदूर अधिकारियों को घेरकर खड़े हैं और अपनी मांग रख रहे हैं। प्रॉटेस्ट में वामपंथी संगठन CITU की भूमिका रही है और वामपंथी विचारधार से जुड़े एक यूजर ने इस वीडियो को शेयर किया है।

हालांकि बहुत से लोगों का मानना है कि प्रदेश में प्रॉजेक्टों के लटने के पीछे मजदूर संगठनों की राजनीति जिम्मेदार है। मगर इन आरोपों के बीच मजदूरों की समस्याओं और वाजिब मांगों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वीडियो देखें:

जानें, HPCA जमीन अतिक्रमण मामले में क्या था विजिलेंस की चार्जशीट में

इन हिमाचल डेस्क।। HPCA स्टेडियम धर्मशाला के जुड़ी सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के मामले में अनुराग समेत 7 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की याचिका रद हो गई है (खबर पढ़ने के लिए क्लिक करें)। जमीन अधिग्रहण का यह मामला हिमाचल पुलिस देख रही। प्रदेश सरकार का कहना है कि हिमाचल प्रदेश विजिलेंस डिपार्टमेंट का मामला अभी बाकी, जो अभी कोर्ट में है। इस मामले की छानबीन के बाद विजिलेंस डिपार्टमेंट ने अपनी रिपोर्ट में क्या पाया था, इस बारे में पत्रिका ‘आउटलुक’ ने एक विस्तृत आर्टिकल छापा था। हम उसका हिंदी अनुवाद नीचे दे रहे हैं।इंग्लिश में मूल रिपोर्ट का लिंक इस आर्टिकल के आखिर में दिया गया है।

आउटलुक की रिपोर्ट:
‘हिमाचल में 1960 से ही क्रिकेट असोसिएशन थी, मगर नाम भर की थी। इसीलिए अनुराग ने पंजाब की तरफ से खेलना पसंद किया। कुछ दिनों बाद उन्होंने क्रिकेट के बिज़नस में शिफ्ट होने का फैसला लिया। पंजाब के एक स्पोर्ट्स राइटर का कहना है कि अनुराग ने पंजाब की क्रिकेटिंग बॉडी में शामिल होने की कोशिश भी की थी 90 के दशक में, मगर बाहरी होने की वजह सफलता नहीं मिली। अनुराग का लक्ष्य बीसीसीआई था। पंजाब का रास्ता उनके लिए लंबा पड़ता क्योंकि जिस लॉबी का पंजाब क्रिकेटिंग बॉडी पर कब्जा था, उसके रहते यह काम मुश्किल था। इसी दौरान, अनुराग के पिता प्रेम कुमार धूमल हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए 1998 से 2003 तक। अनुराग ने वक्त नहीं गंवाया और 2000 में असोसिएशन के प्रेजिडेंट चुने गए। उनके पिता पैट्रन इन चीफ बन गए। उनका पहला प्रॉजेक्ट था- धर्मशाला में क्रिकेट स्टेडियम बनाना।

विजिलेंस की चार्जशीट के मुताबिक इस प्रस्ताव को राज्य के यूथ सर्विसेज़ और स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट के सामने रखा गया। फाइनैंस डिपार्टमेंट ने इसे ओके कह दिया, मगर सुझाव दिया कि लीज रेंट देने के लिए मार्केट रेट अप्लाई किया जाए, क्योंकि टिकट की बिक्री और स्पॉन्सरशिप वगैरह से स्टेडियम को इनकम होगी। बीसीसीआई प्रेजिडेंट अनुराग ठाकुर। बीसीसीआई प्रेजिडेंट अनुराग ठाकुर। मगर जब मामला कैबिनेट के पास पहुंचा- HPCA प्रेजिडेंट के पिता होने के बावजूद- प्रेम कुमार धूमल ने उस मीटिंग की अध्यक्षता की, जिसने 16 एकड़ जमीन को 99 साल तक 1 रुपये प्रति माह की दर से लीज़ पर देने को मंजूरी दी। HPCA ने और भी चालाकी दिखाई और लीज़ पर मिली ज़मीन को दो निजी कंपनियों सब-लीज़ पर दे दिया, ताकि स्टेडियम के सामने पहाड़ियों के नजारे दिखाते दो होटेल पविलियन और अवेडा (अब दोनों बंद हैं) बनाए जा सकें।

अवेदा को क्लबहाउस के ऊपर बनाया गया था और उससे ग्राउंड का बड़ा हिस्सा नजर आता था। स्टेडियम के अलावा, कैबिनेट ने खिलाड़ियों के लिए रेजिडेंशल क्वार्टर बनाने की लीज़ भी दे दी। विजिलेंस ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक दोनों होटलों को 2012-2013 में 2 करोड़ रुपये का टर्नओवर हुआ, मगर हिमाचल सरकार को उस जमीन के बदले सिर्फ साल के 12 रुपये ही मिले। हालांकि अनुराग ठाकुर इसका खंडन करते हैं। ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि HPCA ने कानून लीज़ पर मिली 50 हजार स्क्वेयर फुट जमीन के अलावा 3000 स्क्वेयर फुट एक्स्ट्रा जमीन पर एनक्रोचमेंट कर ली। यह जानकारी बाहर नहीं आती, अगर यूजीसी से फंडेड सरकारी कॉलेज इस स्टेडियम से न सटा होता।

2002 में धूमल सरकार अतिरिक्त जमीन अधिग्रहित करने में नाकाम रही, क्योंकि गवर्नमेंट पीजी कॉलेज के पास वह जमीन थी। मगर अपनी सेकंड टर्म (2008-12) में मुख्यमंत्री रहते हुए अपने बेटे के लिए इस समस्या का समाधान भी प्रेम कुमार धूमल ने कर दिया। जब स्टेडियम बन रहा था, कॉलेज ने निर्माण के लिए NOC दे दिया था, मगर तीन शर्तें रखी थीं। पहली यह कि भविष्य में कॉलेज के विस्तार के लिए पर्याप्त जगह रखी जाए। दूसरी यह कि कॉलेज के स्टूडेंट्स को स्डेडियम इस्तेमाल करने की इजाजत हो और तीसरी यह कि कॉलेज के लिए अलग से एंट्री रखी जाए ताकि इसकी पनी ऐक्टिविटीज़ में कोई दिक्कत न हो।

विजिलेंस के मुताबिक 2008 में धूमल ने अपने दूसरे कार्यकाल में कांगड़ा के डीसी के.के. पंत के साथ स्पेशल मीटिंग की, जिसका मकसद पीजी कॉलेज को खंडित और इस्तेमाल के लिए असुरक्षित घोषित करवाना था कि यह खिलाड़ियों के लिए भी खतरनाक है। पंत और जिले के अन्य अधिकारियों ने मार्च 2008 में मीटिंग की और कॉलेज प्रिंसिपल को बिल्डिंग को अन्य जगह पर शिफ्ट करने का आदेवन करने को कहा। सरकारी कॉलेज में अब तक किसी ने शिकायत नहीं की थी कि बिल्डिंग जीर्ण हो चुकी है। मगर HPCA के अधिकारियों, जो उस मीटिंग में थे, ने कहा कि हम लोग बिल्डिंग की वजह से क्रिकेटर्स की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। इसके तुरंत बाद जिले के अधिकारियों ने बिल्डिंग को असुरक्षित घोषित कर दिया, जबकि यह 25 साल ही पुरानी थी और 2 साल पहले ही इसकी मरम्मत हुई थी। एजुकेशन डिपार्टमेंट ने कोई दखल नहीं दिया (इन्हें भी चार्जशीट में नामजद किया गया है)।

जुलाई 2008 में अनुराग ठाकुर ने स्टेडियम के साथ 720 स्क्वेयर मीटर और जमीन मांगी, मगर इस जमीन पर कॉलेज की इमारत खड़ी थी। इस जमीन के लिए फॉरेस्ट डिपार्टमेंट द्वारा दी गई मंजूरी पर भी सवाल उठे हैं। चार्जशीट में कहा गया है कि वन विभाग ने 1980 में यहां 2000 पेड़ लगाए थे। मगर क्लियरेंस देते वक्त वन विभाग ने कहा कि जमीन बंजर है। (एचपीसीए पर 500 पेड़ काटने का आरोप है)।

पढ़ें: अनुराग ठाकुर ने ऐसे तय किया BCCI अध्यक्ष पद का रास्ता

नोट: उपरोक्त बातें आउटलुक के आर्टिकल का हिंदी अनुवाद है, इसमें अपनी तरफ से कोई बात नहीं जोड़ी गई। इस आर्टिकल में सारी बातें विजिलेंस डिपार्टमेंट द्वारा दाखिल चार्जशीट पर आधारित हैं। मूल आर्टिकल पर जाने के लिए यहां क्लिक करें। मामला कोर्ट में लंबित है।

अनुराग ठाकुर को सुप्रीम कोर्ट से राहत, वीरभद्र सरकार को झटका

शिमला।। व्यवसायी, क्रिकेट प्रशासक और हमीरपुर से बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर को बड़ी राहत मिली है। एचपीसीए स्टेडियम धर्मशाला को लेकर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के मामले में अनुराग समेत 7 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की याचिका रद हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करने के हिमाचल सरकार के फैसले को गैरकानूनी भी करार दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश जहां अनुराग के लिए राहत भरा है, वहीं वीरभद्र सरकार के लिए एक झटका है। गौरतलब है कि इससे पहले हाईकोर्ट ने भी अनुराग ठाकुर के हक में फैसला दिया था। इसके बाद इस फैसले को हिमाचल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

यह है मामला
दरअसल एचपीसीए स्टेडियम के गेट नंबर एक के साथ लगती भूमि पर शिक्षा विभाग का दो मंजिला रिहायशी भवन था। भवन का निर्माण 720 वर्ग मीटर में हुआ था। यहां कॉलेज प्राध्यापकों की रिहायशी के लिए टाइप-4 सेट बने हुए थे। पहले भूमि शिक्षा विभाग के नाम थी। आरोप है कि बाद में इस खेल विभाग को सौंपा गया। भूमि लीज पर भी नहीं है।

बिना अनुमति भवन गिराने का आरोप
इस मामले में एक फाइल भी गुम हई है। आरोप है कि स्टेडियम के निर्माण के दौरान बिना किसी अनुमति भवन को गिराया गया था। कांग्रेस चार्जशीट में इस मामले का उठाया गया था। हिमाचल प्रदेश विजिलेंस ने इस मामले पर धर्मशाला में 447,120 बी और पीडीपी एक्ट 13 (2) के तहत मामला दर्ज किया था।

अनुराग समेत 7 लोग थे आरोपी
सरकारी जमीन पर अतिक्रमण करने के इस मामले में एचपीसीए अध्यक्ष अनुराग ठाकुर, पूर्व डीसी कागड़ा केके पंत, पूर्व प्रिसिंपल ललित मोहन शर्मा, धर्मशाला कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य नरेंद्र अवस्थी, पूर्व एक्सईएन देवी चंद चौहान, पूर्व एसडीओ एमएस कटोच, एचपीसीए पीआरओ संजय शर्मा, अतर नेगी और गौतम ठाकुर का नाम शामिल था।

छात्रा ने PM मोदी को लिखी चिट्ठी, पीएमओ ने हिमाचल सरकार से मांगा जवाब

करसोग (मंडी)।। हिमाचल प्रदेश की सड़को की खस्ताहालत किसी से छिपी नहीं है। गौरतलब है कि यह महकमा मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अपने पास रखा हुआ है। इस बीच मंडी जिले के करसोग की एक बेटी ने देखा कि जब उसके गांव की सड़क की हालत सुधारने की कोशिश नहीं की जा रही तो उसने पीएम नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भेज दी। अब पीएमओ ने प्रदेश के मुख्य सचिव से जवाब मांगा है।

मेगली गांव की 23 साल की छात्रा कुसुम शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर लोगों की दिक्कतों से अवगत करवाया था। पत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जिला मंडी के दूरदराज के क्षेत्र करसोग उपमंडल में सड़कों को दुरुस्त करने के लिए गुहार लगाई गई थी। कुसुम ने लिखा था कि नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री को पाकर हम जैसे नागरिकों का मनोबल बढ़ा है। उम्मीद है कि समस्या का समाधान जरूर करेंगे। कुसुम ने ग्रामीणों की तरफ से पीएम को यह पत्र भेजा था। 23 दिसंबर को भेजे गए पत्र पर पीएमओ ने संज्ञान लेकर प्रदेश के मुख्य सचिव से जवाब मांगा है।
Image courtesy: MBM News Network

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कुसुम शर्मा का कहना है कि मेगली गांव उपमंडल मुख्यालय से मात्र एक किलोमीटर दूर है और यहां से गुजरने वाली कच्ची सड़क कई गांवों को जोड़ती है। न सिर्फ इस सड़क की हालत बहुत खराब है बल्कि बाकी सड़कों का भी यही हाल है। पहाड़ी क्षेत्र की सड़कों की दुर्दशा के कारण हादसों में कई लोग जान गंवा चुके हैं। धूल-मिट्टी के कारण लोगों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है। प्रशासनिक व विभागीय अधिकारी सड़कों की समस्या पर कोई गौर नहीं कर रहे हैं। कुसुम ने कहा है कि प्रधानमंत्री के माध्यम से करसोग की सड़कों की बदहाली सुधर जाए तो करसोग क्षेत्र के लोगों के मुरझाए चेहरों पर आशा की किरण जाग उठेगी।

करसोग के एमएलएल मनसा राम प्रदेश सरकार में सीपीएस भी हैं। अब वह कहते हैं कि करसोग के युवा भी जागरूक हैं। समय-समय पर लोक निर्माण विभाग से सड़कों की बदहाली को लेकर बात की जाती है। खस्ताहाल सड़कों के बारे में मेंटेनेंस करने के आदेश दिए जाते हैं। उधर पीडब्ल्यूडी के मुख्य अभियंता करतार चंद ने कहा कि इस बारे में अधिशासी अभियंता करसोग से सारी जानकारी प्राप्त करने के बाद उचित कार्यवाही की जाएगी और मार्च महीने से करसोग की सड़कों का पैच वर्क व टारिंग की जाएगी।

‘इन हिमाचल’ कुसुम को बधाई देता है और शुभकामनाएं भी। अन्य युवाओं के लिए कुसुम ने उदाहरण पेश किया है कि कैसे हार नहीं माननी चाहिए और अपने इलाके के विकास और बेहतरी के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। लेटर की कॉपी नीचे दी गई है:

कुसुम द्वारा लिखे गए लेटर का हिस्सा
कुसुम द्वारा लिखे गए लेटर का हिस्सा

अपने बेटों के चक्कर में नूरा कुश्ती कर रहे नेताओं के बीच पिस रहा है हिमाचल

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आई.एस. ठाकुर।। कोई भी व्यक्ति राजनीतिक रूप से तटस्थ नहीं हो सकता। उसकी कोई न कोई विचारधारा या पसंद होती है। हिमाचल प्रदेश में भी ऐसा ही है। कुछ लोग बीजेपी को पसंद करते हैं, कुछ कांग्रेस को, कुछ वीरभद्र को, कुछ धूमल को, कुछ शांता कुमार को तो कुछ नड्डा को। अपनी राजनीतिक पसंद के मामले में हम इतने पक्के हो जाते हैं कि हमें अपनी पार्टी या अपने नेता के खिलाफ कही जाने वाली सभी बातें झूठी लगती हैं और ऐसा करने वाला हमें या तो विरोधी पार्टी का एजेंट लगता है या फिर बेवकूफ। यह सही है कि जिन नेताओं के आप समर्थक हों, उन्होंने आपके लिए बहुत काम किए होंगे और आपका उनसे अच्छा रिश्ता होगा। अच्छी बात है, होना भी चाहिए और ऐसा होता भी है। मगर आज वक्त आ गया है कि हमें शांत मन से सोचना होगा कि क्या हमारे लिए अच्छा है, क्या हमारे लिए खराब।

प्रदेश का हित सीधे तौर पर हरेक व्यक्ति के हित से जुड़ा है। यानी प्रदेश अगर तरक्की करता है तो यह हर व्यक्ति की तरक्की है। प्रदेश का नुकसान हर व्यक्ति का नुकसान। चूंकि यह चुनावी साल है और इस साल के आखिर में विधानसभा चुनाव हो जाएंगे, इसलिए प्रदेश की जनता का खुले मन सोचना विचारना बहुत जरूरी हो जाता है। हमें यह तय करना होगा कि प्रदेश के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। बड़े ही अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि प्रदेश के मौजूदा नेतृत्व में कोई भी बात ऐसी नहीं दिखाई देती, जो हिमाचल को नई दिशा दे सकती है। प्रदेश की राजनीति नूरा-कुश्ती यानी फिक्स्ड मैच सा लगने लगी है। कभी एक पार्टी सत्ता में आती है और कभी दूसरी पार्टी। नेताओं ने मानो सोच लिया हो कि बारी-बारी नंबर आना है, टेंशन क्यों ली जाए। इसलिए सत्ताधारी पार्टी अपने हिसाब के ऊल-जुलूल कदम उठाती रहती है और विपक्ष सुस्त पड़ा ऊंघता रहता है।

Dhumalइस वक्त प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है इसलिए शुरुआत सत्ताधारी पार्टी और इसके नेताओं से ही करूंगा। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का बयान आता है कि प्रदेश जुगाड़ से चला रहा हूं। उनका आरोप है कि केंद्र से पैसा नहीं आता और बड़ी मुश्किल से प्रदेश चलाना पड़ रहा है। मगर हैरानी होती है उनके इस बयान से क्योंकि वह इधर का पैसा उधर खर्च कर रहे हैं। ऐसी-ऐसी घोषणाएं की जा रही हैं जिनका कोई तुक नही ंहै। पहले से ही स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने के बजाय नए स्कूल खोलने के ऐलान किए जा रहे हैं। वह भी तब जब आज या कल में ही शिक्षा विभाग 5 से कम छात्रों वाले 99 स्कूलों को बंद करने की सिफारिश कर चुका है। 99 स्कूल बंद करने का मतलब है कि यहां के लिए बने भवन और संसाधनों पर खर्च करोड़ों रुपया जीरो। क्यों बिना प्लैनिंग के ये ऐलान कर दिए जाते हैं राजनेताओं द्वारा? कहीं गए तो स्थानीय नेता ने मांगपत्र पकड़ाया तो ऐसे ऐलान कर दिया मानो राजा रेवड़ियां बांट रहा हो। मुख्यमंत्री या मंत्री या विधायक जनता के सेवक होते हैं और जनता के टैक्स के पैसे को खर्च करने का अधिकार रखते हैं। यह उनका पुश्तैनी धन नहीं कि इसे लुटाते रहें।

यही नहीं, पटवारखाने खोले जा रहे हैं, जब साइबर लोकमित्र केंद्रों से नक्शे लिए जा सकते हैं। कॉलेज खोले जा रहे हैं, जब मौजूदा कॉलेजों में बच्चों की संख्या कम है, क्योंकि वे प्रफेशनल कोर्स करना चाहते हैं। इन हिमाचल पर ही एक अच्छा लेख पढ़ा था जिसमें खूबसूरती से लिखा गया है कि हिमाचल के नेताओं ने हिमाचल में वक्त पर बीएड कॉलेज और इंजिनियरिंग कॉलेज और यूनिवर्सिटियां नहीं खोलीं और नतीजा यह रहा कि कई सालों तक प्रदेश के बच्चे बीएड करने के लिए, नर्सिंग करने के लिए या अन्य प्रेफेशनल कोर्सों के लिए पड़ोसी राज्यों का रुख करते रहे। मगर सबक अब तक नहीं सीखा। जहां जाओ, वहां नए कॉलेज का ऐलान कर दो। यह भी मत सोचो कि बच्चों को इससे फायदा होगा या नहीं।

न जाने जातियों के आधार पर कितने बोर्डों का ऐलान कर दिया मुख्यमंत्री ने। ब्राह्मण बोर्ड, राजपूत बोर्ड, धीमान बोर्ड, फ्लां बोर्ड ढिमकाणा बोर्ड। कुछ दिन पहले मंडी में मुख्यमंत्री जाति की राजनीति पर ज्ञान दे रहे थे। उनसे कोई पूछे कि सरकार का काम सभी जातियों का मिलकर विकास करना है तो अलग से बोर्ड बनाकर रेवड़ियां क्यों बांटी जा रही हैं? किसी जाति के भवन के नाम पर पैसा दिया जा रहा है जहां उस जाति के लोग शादी आदि के आयोजन करवा सकें और इसी तरह से अन्य जातियों को भी दिया जा रहा है। यह कदम न सिर्फ समाज में खाई पैदा करने वाला है बल्कि सरकार के पैसे की बेकद्री भी है। अरे बनवाना ही है तो एक सामुदायिक केंद्र बनाओ जहां किसी से जाति न पूछी जाए। मगर नहीं, जाति की राजनीति से बाज नहीं आना है।

कुछ दिन पहले ही इन हिमाचल पर टांडा मेडिकल कॉलेज की दुर्दशा की तस्वीरें देख सिर चकरा गया। अस्पताल के नाम पर क्या बना डाला है? प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल की यह दुर्दशा है तो अन्य छोटे अस्पतालों की क्या होगी। दांतों का इलाज करवाने सीएम पीजीआई जाते हैं, स्वास्थ्य मंंत्री पर फोन पर कुछ अभद्र बातों का आरोप लगता है तो दिल का दर्द होने पर पीजीआई जाते हैं, परिवहन मंत्री और आईपीएच मिनिस्टर तक इलाज के लिए प्रदेश से बाहर का रुख करते हैं। क्या इस सरकार को शर्म नहीं आती कि प्रदेश के बड़े मंत्री भी इलाज करने बाहर जाते हैं तो प्रदेश की जनता को प्रदेश के अस्पतालों के भरोसे क्यों छोड़ा है? लापरवाही का आलम यह है कि कहीं कोई ऑक्सिजन की कमी से मर जाता है तो कोई पीजीआई जाते-जाते। एक हादसा हो जाए तो रेफर करने की गेम चलती है और आखिर में पीड़ित इस दुनिया को छोड़कर चला जाता है। ये निष्ठुर नेता क्या समझेंगे जनता का दर्द? अपनों को बेवक्त किसी मामूली हादसे या बीमारी की वजह से खोना पड़े तब पता चलता है। जनता की याद्दाश्त कमजोर है। भूल जाती है कि कितने कष्ट सहे हैं। सत्ताधारी ही नहीं, आज जो विपक्ष में बैठे हैं, वे भी इस दुर्दशा के जिम्मेदार हैं क्योंकि सत्ता में वे भी रह चुके हैं।

रोजगार नहीं मिल रहा युवाओं को। बैकडोर से भर्तियां हो रही हैं। हिमाचल प्रदेश मे सब जानते है कि चिट पर भर्तियां कौन करवाता है। 4 साल तक सरकार में रहकर इन नेताओं को पता नहीं चलता कि किन विभागों में कर्मचारियों की जरूरत है। सरकार जाने वाली होती है तो भर्तियां निकालते हैं, रिटन लेते हैं और इंटरव्यू लटका देते हैं ताकि बहुत से परिवार इस लालच में सत्ताधारी पार्टी को वोट दे दें कि दोबारा आएंगे तो हमारा कुछ हो जाएगा। यही नहीं, कमिशन बोर्ड से किसी भी भर्ती का टेस्ट नहीं लिया जा रहा। प्रतिभावान युवा इंतजार करते हैं कि भर्तियां निकलेंगी तो हम टेस्ट देंगे औऱ कुछ होगा। मगर नहीं, विभिन्न तरीकों से अपने बंदों को टेंपररी रखवा दो और बाद में उन्हें पक्का कर देंगे जब 5 साल बाद सरकार आएगी। अयोग्य व्यक्ति भी तरीके से नौकरी लग जाता है और योग्य व्यक्ति हताश होता रहता है।

दरअसल इस प्रदेश के नेताओं ने लोगों के मन में सरकारी नौकरी का जहर भर दिया है। जहर इसलिए कि हर कोई सरकारी नौकरी करना चाहता है। दोष सरकार का इसलिए है, क्योंकि वह युवाओं को बताती नहीं है कि प्राइवेट सेक्टर में कितना स्कोप है और स्वरोजगार कैसे पाया जा सकता है। हिमाचल की तो खरपतवार भी करोड़ों में बिक जाए, हिमाचल में क्षमता इतनी है। अऱे युवाओं को बताओ कि कैसे खेती की जा सकती है, बागवानी की जा सकती है आधुनिक तरीकों से। लोग मशरूम उगाकर, फूलों की बागवानी से और जड़ी-बूटियां उगाकर अपनी ही नहीं बल्कि हिमाचल और भारत तक की तस्वीर बदल सकते हैं। युवाओं के कौशल यानी स्किल का विकास करना चाहिए। एक कौशल विकास निगम तो बनाया मगर उसमें भी मुख्यमत्री ने अपना बेटा बिठा दिया। उनका बेटा तो सेट हो गया मगर प्रदेश के बेटे आज भी बेरोजगारी की फ्रस्ट्रेशन में नशे की तरफ रुख कर रहे हैं।

नशे की बात आई तो यह बात किसी से छिपी नहीं है। लोग पूरी दुनिया से हिमाचल आ रहे हैं नशा करने के लिए। मिनी इजरायल कहलाने में न जाने किसी गर्व होता होगा, मुझे तो शर्म आती है। सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है क्या? जब सबको पता है कि कहां से क्या मिलता है तो पुलिस तंत्र क्यों कुछ नहीं कर रहा? ऐसे में वे लोग गलत नहीं हैं जो कहते हैं कि नशे के कारोबारियों को नेताओं का संरक्षण मिला है।

पॉलिसी ऐंड प्लानिंग के नाम पर ठप हो चुका है प्रदेश। सड़कों की हालत खराब, बसों की हालत माड़ी, अस्पताल बीमार, शिक्षण संस्थानों में सुविधाओं का अभाव, विभिन्न विभागों में स्टाफ की कमी। मैं तो सोचकर हैरान होता हूं कि पिछले 5 सालों मे इस सरकार ने क्या पॉलिसी बनाई? बस ये कि 5 बीघा तक सरकारी जमीन पर कब्जे को रेगुलर कर दिया जाएगा? अपराधियों को बढ़ावा देने वाली नीति बनाई? प्रदेश की वन संपदा मैच्योर हो चुकी है और उसके दोहन का वक्त है। वरना पेड़ सड़ जाएंगे और करोड़ों का नुकसान। मगर वन मंत्री को नाचने से फुरसत नहीं। वह जरूर नाचें मगर अपना काम भी तो करें। शहरी विकास मंत्रालय की क्या उपल्बधि रही? स्मार्ट सिटी का क्रेडिट लेने वाले ये न भूलें कि यह केंद्र की योजना है और इसमें किसी न किसी शहर का नंबर तो प्रदेश में पड़ना ही था। यह आपकी अचीवमेंट नहीं है। टूरिजम में क्या नया काम हुआ, कौन सी नई जगह विकसित हुई या पहले वाली जगहों का उद्धार हो गया? आईपीएस मंत्री ने क्या काम ऐसा कर दिया कि जहां पहले लोग पानी की कमी से जूझते थे, वहां पानी आ गया? परिवहन मंत्रालय ने प्रदेश में परिवहन के वैकल्पिक साधनों के बारे में क्या नया किया?

अगर कोई मंत्रालय सही से काम नहीं करता है तो उसके मंत्री की ही नहीं, मुख्यमंत्री की भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। क्यों मुख्यमंत्री जो सरकार का मुखिया है, अपने मंत्रि्यों को नहीं कसता। इसका मतलब साफ है कि मुख्यमंत्री कमजोर हैं। कमजोर इसलिए भी, क्योंकि 82 साल की उम्र हो चुकी है। आए दिन अजीब और अमर्यादित बयान दे रहे हैं। इससे पता चलता है कि अब इस उम्र में तो वह कुछ नया देने से रहे। अब भी वो सोचते है कि वह दौर है जब मंच से भाषण देकर घोषणा कर दो कहीं स्कूल या कॉलेज खोलने की तो जनता खुश हो जाती थी। उन्हें दरअसल पता ही नहीं है कि अब प्रदेश के युवाओं की जरूरतें क्या हैं। हिमाचल प्रदेश युवाओं से भरा प्रदेश है। इसे युवा नेता की जरूरत है जो समझे आज के दौर को। ऐसा नहीं कि दूसरी राजधानी का ऐलान करे। यह बाद मौजूदा मुख्यमंत्री और कांग्रेस पर ही लागू नहीं होती बल्कि विपक्षी पार्टी और विपक्ष के नेता पर भी लागू होती है।

4 साल तक मै हिमाचल प्रदेश के अखबारों में विधानसभा सत्र के दौरान यही पढ़ता रहा कि बीजेपी ने किया वॉकआउट, बीजेपी ने किया वॉकआउट। फालतू-फालतू बातों पर वॉकआउट। प्रेम कुमार धूमल के नेतृ्तव में बीजेपी वॉकाउट पार्टी बनकर रह गई। अरे विपक्ष का काम होता है सरकार की खबर लेना। सवाल पूछना जनता से जुड़े हुए और काम करवाना। मगर नौटंकी और करतब का अड्डा बना दिया विपक्ष ने विधानसभा को। कभी कोई विधायक खुद ही  स्पीकर की कुर्सी पर बैठ जाता तो कभी कुछ। सवाल-जवाब सत्ता और विपक्ष में विधानसभा में नहीं, मीडिया के जरिए हुए। औऱ इन सवालों मे भी जनता के मुद्दे नहीं, पर्सनल मुद्दे हावी रहे। वीरभद्र और धूमल की बयानबाजी 50 पर्सेंट अनुराग को लेकर हुई है और 50 पर्सेंट करप्शन केस को लेकर। जनता की फसलों को सुअर और बंदर खा गए, सीमेंट प्रदेश में ही बनता है फिर भी महंगा मिलता, अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं, सरकारी स्कूल बदहाल हैं, सड़कें उखड़ गई हैं, रोजगार नहीं मिल रहे– ये सब मुद्दे विपक्ष उठाना ही भूल गया।

ऐसा इसलिए क्योंकि पता है इन्हें कि सरकार कुछ भी करे, अगला नंबर हमारा आना है। जब नंबर बिना कुछ किए आ जाएघा तो कुछ क्यों किया जाए। यही सोच इस प्रदेश का बेड़ा गर्क कर रही है। इन नेताओं ने इस प्रदेश को अपनी जागीर समझ लिया है औऱ जनता को ढक्कन। पहले एक जनता को बेवकूफ बनाता है फिर दूसरा। एक को अपने बेटे को सेट करने की चिंता है तो दूसरे को अपने बेटे के स्टेडियम की चिंता। कुलमिलाकर हिमाचल की राजनीति अपने बेटों के लिए जूझ रहे दो पिताओं की राजनीति बन गई है। इन लोगों ने अब तक ऐसा क्या किया प्रदेश के लिए, जिसे देखकर लगता हो कि अभी कुछ और करना बाकी रह गया है? मेरा मानना है कि दोनों पार्टियों में बदलाव की लहर बहे या न बहे, हिमाचल में बदलाव की हवा चलनी चाहिए। बाकी इन पार्टियों या नेताओं के मसर्थकों को इनका झंडा उठाना है तो उठाएं, कम से कम मैं तो इन बूढ़े और नकारा हो चुके नेताओं को अपने हिमाचल का भविष्य नहीं सौंपना चाहता। हमें ऐसे नेता चाहिए जो अपने बच्चों के लिए नहीं, हिमाचल के बच्चों के लिए लड़ें, उनके भविष्य के लिए जूझें, उनके भविष्य के लिए समर्पित हों।

(लेखक आयरलैंड में रहते हैं और ‘इन हिमाचल’ के नियमित स्तंभकार हैं। उनसे kalamkasipahi@gmail.com से संपर्क किया जा सकता है।)

पढ़ें: क्यों हिमाचल अभी तक वहां नहीं पहुंच पाया, जहां इसे होना चाहिए था

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वीडियो गेम्स और क्रिकेट से पहले इन गेम्स को खेलकर बड़े होते थे बच्चे

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इन हिमाचल डेस्क।। टेक्नॉलजी के इस दौर में गेम्स अब मैदान से कंप्यूटर और स्मार्टफोन्स पर खेले जाने लगे हैं। एक्सबॉक्स, प्लेस्टेशन के इस दौर में आजकल के बच्चे अगर रियल लाइफ में जो गेम खेलते हुए दिख जाते हैं, वह है क्रिकेट। मगर क्रिकेट के अलावा भी बहुत से गेम्स थे जो हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर और अन्य प्रदेशों में बच्चे चाव से खेलते थे।

शायद ही आज इन गेम्स को कोई जानता हो। सोशल मीडिया पर किसी कलाकार ने इन गेम्स को संजोने की कोशिश की है। देखें और नीचे कॉमेंट करके बताएं अगर कोई गेम छूट गया हो, जिसे आप बचपन में खेला करते थे:

1
गिट्टियां
2
गिल्ली डंडा
3
पतंगबाजी
4
पिट्ठू
5
कोटला छिपाकी, जिम्मे रात आई-ए, जिहड़ा मेरे आगे पीछे देखे उहदी शामत आई ऐ
7
लट्टू घुमाना
8
किस-किसने चलाया है गड्ढा
6
🙂
पिट्ठू
सीपी (Chindo, Stapoo or Kidi Kada)
सीपी (Chindo, Stapoo or Kidi Kada)

14 साल की इस बेटी पर डाला जा रहा था शादी का दबाव, विरोध कर पेश की मिसाल

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, चंबा।। आप जो तस्वीर देख रहे हैं, वह है चंबा जिले की बेटी बीना कुमारी  (बदला हुआ नाम) की। 14 साल की बीना कुमारी की शादी की जा रही थी 35 साल के शख्स से। मगर बीना ने हिम्मत का परिचय देते हुए अपने अध्यापकों को सूचना दी, प्रशासन ने दखल देकर बीना को मुश्किल हालात में फंसने से बचा लिया।

नानी के दवाब के बावजूद इस छात्रा ने हार नहीं मानी थी और स्कूल में जाकर अध्यापकों को बताया कि शादी के दबाव बनाया जा रहा है। बीना ने बाल विवाह का विरोध करके मिसाल कायम की है। अब जिला प्रशासन इस बहादुर छात्रा को महिला दिवस पर सम्मानित करेगा।

बीना कुमारी ने बताया कि वह अब स्वतंत्र महसूस कर रही हैं। उसका कहना है कि वह आत्मनिर्भर बनने के साथ-साथ अपने लक्ष्यों को पूरा करेगी। बकौल बीना उसकी माता ने दो शादियां की हैं और नानी के साथ मिलकर एक 35 वर्षीय के साथ उसकी शादी तय कर दी। इसका विरोध जब किया तो नानी दवाब डालने लगी। लेकिन, बीना ने हिम्मत ना हारी और बड़ा खुलासा कर खुद को एक नई जिंदगी दी।

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बीना पढ़ाई में भी अव्वल है। जिस स्कूल में वह पढ़ती है, वहां के अध्यापकों का कहना है कि बीना पढ़ने में अच्छी है। कक्षा में अनुशासन में रहती है।

बीना तो बच गई, मगर इससे संकेत यह भी मिलते हैं कि हिमाचल के दूर-दराज इलाकों में हो सकता है कि अभी भी कम उम्र में बेटियों की शादी की जा रही हो। प्रशासन को सजग तो रहना ही चाहिए, अध्यापकों को भी चाहिए कि बच्चों को गाइड करें कि ऐसे कोई प्रेशर डाले शादी के लिए तो तुरंत सूचित करें।

घोटाले से पर्दा उठाने का दावा करने वाला कर्मचारी नेता सस्पेंड

शिमला।। कर्मचारी परिसंघ के अध्यक्ष विनोद कुमार को हिमाचल प्रदेश सरकार ने सस्पेंड कर दिया है। गौरतलब है कि कुछ दिन पहले विनोद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कुछ घोटालों से पर्दा उठाने का दावा किया था। बागवानी निदेशक डॉक्टर एच.एस. बाजवा ने शुक्रवार को विनोद कुमार के सस्पेंशन ऑर्डर जारी किए थे।

निलंबन के साथ ही सरकार ने विनोद कुमार को चंबा स्थित डेप्युटी डायरेक्टर ऑफिस से अटैच कर दिया है। खास बात यह है कि उनके सस्पेंशन से पहले ही बागवानी निदेशालय ने शिमला से उन्हें सिरमौर ट्रांसफर कर दिया था।

अपने ट्रांसफर के खिलाफ विनोद हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक ट्रिब्यूनल चले गए। अभी मामला निपटा भी नहीं है कि उन्हें सस्पेंड कर दिया गया । अमर उजाला के मुताबिक इससे पहले साल 2013 में विनोद को पांगी स्थानांतरित किया गया लेकिन वहां से भी कोर्ट के आदेश पर ऑर्डर कैंसल कर दिया था। इसके बाद 2015 में भी उन्हें किन्नौर भेजा गया था और इस आदेश को भी वापस लेना पड़ा था।

क्या है विनोद का दावा
विनोद कुमार ने आरोप लगाया था कि गैर कृषि एवं बचत सहकारी सोसायटी में गत चार वर्षो में करीब 90 लाख रुपये का गोलमाल किया गया है। उन्होंने कहा था कि उनके पास गोलमाल के पूरे दस्तावेज हैं और जल्द इसकी चार्जशीट तैयार कर राज्यपाल को सौपेंगे।