नए जिले नहीं, नई राजधानी और प्रशासनिक दफ्तर हैं हिमाचल की ‘संजीवनी’

कुमार अनुग्रह।। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर लेकिन संसाधनों के तथाकथित अभाव वाले राज्य हिमाचल प्रदेश को नए जिले नहीं नई राजधानी और प्रशासनिक दफ्तर ही संजीवनी दे सकते हैं। हिमाचल जैसे ही चुनावी वर्ष में प्रवेश करता है नए जिले बनाने की चर्चाएं, अटकलें और अफवाहें तेज हो जाती हैं। नए जिलों को लेकर जितने मुंह उतनी बातें जैसा हाल रहता है। यानी जितने बड़े उपमंडल, उतने ही नए जिले बनाने की बातें।

खैर, हिमाचल का मुद्दा जिलों को लेकर है ही नहीं। हिमाचल जैसे बेहद छोटे राज्य में नए जिले बनाने की चर्चा उतनी ही बेमानी है जितना विक्रमादित्य का यह कहना कि केंद्र ने कृषि कानून इसलिए वापस लिए क्योंकि हिमाचल में कांग्रेस उपचुनावों में जीती।

नए जिले बनाने के राजनीतिक शिगूफे

राजनीतिक नजरिए से बात करें तो नेता जरूर नए जिलों की पैरवी करते मिलेंगे। उनके नजरिए से ये वाजिब है क्योंकि चुनाव जीतने के लिए कोई न कोई वादा किया जाता है और उसके सपने दिखाए जाते हैं। साम, दाम, दंड, भेद वाली राजनीति में नए जिलों का सपना दिखाना इतना भी बुरा नहीं माना जा सकता। पालमपुर, नूरपुर, सरकाघाट, रामपुर, बद्दी, सुंदरनगर, देहरा को नए जिले बनाने के सपने दिखाए जाते और लोगों द्वारा देखे भी जाते रहे हैं। इसलिए ‘ख्वावी’ नए जिलों की लिस्ट में और भी नाम जुड़ जाएं तो क्या फर्क पड़ता है।

फर्क तो इस बात से पड़ता है कि हिमाचल प्रदेश और उसके लोगों के लिए सही क्या है? इस बात पर चर्चा हो भी रही है या नहीं। यहीं सबसे ज्यादा निराशा देखने को मिलती है। किसी नए जिले के समर्थक से पूछें कि इससे फायदा क्या होगा तो वो आपको ठीक वैसे ही फायदे गिनवाएगा जैसे गोबर खाने के फायदे गिनवाकर एक डॉक्टर साहब फेमस हुए थे।

नए जिलों के गठन के पीछे क्या हैं तर्क?

असल में नए जिलों का गठन आमदनी अट्ठनी और खर्चा रुपैया से ज्यादा कुछ नहीं है। हालांकि कुछ सर्मथक कहेंगे- ‘अरे क्या बात कर रहे हो, जनता को ज्यादा सुविधा मिलेगी।’ मेरी नजर में ये बात ठीक उतनी ही दिलासा देने वाली है जितनी इंडियन क्रिकेट टीम की हार सामने होने के बाद भी फैन का ये सोचकर आखिरी बॉल तक मैच देखना कि अब शायद कुछ ‘चमत्कार’ हो सकता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि अभी तक जो सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली रही है, उसमें नए जिलों के गठन से बदलाव कैसे आ जाएगा? नए जिले में भी एक डीसी दफ्तर ही बनेगा। उस एक डीसी दफ्तर के बनाने में भी करोड़ों के बजट का प्रावधान करना होगा, जबकि कानून भी रहेंगे और प्रावधान भी। हां वो करोड़ों रुपये किसी पुल, सड़क या दूसरे जरूरी कार्य पर जरूर खर्च किए जा सकते हैं, जिसकी उस क्षेत्र के लिए ज्यादा जरूरत है।

काम की रफ्तार के कानून और प्रावधान तो वही रहेंगे

अभी भी नए जिले के समर्थक एक और बाण अपने तरकश से निकाल कर दागेंगे और कहेंगे, ‘नए जिले बनने के बाद लोगों को अपने कार्यों के लिए ज्यादा दूर नहीं जाना पड़ेगा।‘

इन बुद्धिजीवियों को ये समझना चाहिए कि आखिर नया जिला बनने के बाद भी उस जिले का कोई आखिरी छोर तो होगा ही। जैसे मंडी जिला के लिए करसोग और लड-भड़ोल है। चंबा के लिए भरमौर औऱ द्रमण है। यानी वो लॉजिक धराशाई हो जाता है, जिसके दम पर नए जिले बनाने की बात की जाती है।

इससे भी बढ़कर बात करें तो किन्नौर और लाहौल स्पीति को ही देख लीजिए। एक-एक-एक ही विधानसभा क्षेत्र है और वो भी पूरा का पूरा जिला। फिर भी कहें कि हर घर तक सड़क पहुंच गई होगी तो सच आप जानते हैं। जबकि इन दोनों ही जिलों के लिए तो जनजातीय क्षेत्र का फंड अलग से केंद्र सरकार देती है।

नए जिलों से ज्यादा जरूरी हैं कुछ खास दफ्तर

नए जिलों के गठन से विकास तो पता नहीं किस किताब में होगा बल्कि आर्थिक बोझ जरूर पड़ेगा। आप अपने दिल पर हाथ रखें-  यदि आप एक 30 से 35 साल या उससे ज्यादा की उम्र के व्यक्ति हैं तो जरा अपनी स्मृतियों को ताजा करें। अब बताएं कि जीवन में कितनी मर्तबा आप डीसी दफ्तर गए और किस काम के लिए?

दरअसल मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों वाले हिमाचल में नए जिलों की जगह जिला मुख्यालयों से दूरस्थ क्षेत्रों में नए पटवार सर्किल, उपतहसीलें, तहसीलें और एसडीएम ऑफिस और संबंधित विभागों के दफ्तर खोलने की ज्यादा जरूरत है। एक आम व्यक्ति को सबसे ज्यादा कार्य तहसील, पटवार सर्किल, एसडीएम दफ्तर और अन्य संबंधित विभागों में ही पड़ते हैं।

आप एक और उदाहरण से समझ सकते हैं कि आज जमीन के कार्य करवाने के लिए आपको कितनी मर्तबा पटवार खाने और तहसील के चक्कर काटने पड़ते हैं। नए जिले बनने से उन कार्यों में किसी तरह से तेजी आ जाएगी।

क्या है मौजूदा राजधानी की स्थिति?

ये तो बात हुई नए जिलों की अब बात करते हैं राजधानी की। नई राजधानी का शिगूफा भी किसी न किसी सरकार में गाहे-बगाहे छूटता रहता है। लेकिन यह हकीकत है कि शिमला की हालत पतली हो चुकी है और उस शहर के विस्तार की अब और कोई संभावना नहीं है। संसाधन कम हैं और राजधानी होने के नाते हर साल इस शहर पर आबादी और इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर वर्टिकल कंस्ट्रक्शन का बोझ बढ़ता जा रहा है। तीखी ढलान वाली पहाड़ियों पर एक के ऊपर एक बन रही इमारतें भूकंप के लिहाज से भी खतरनाक हैं।

लेकिन हम तो मानते हैं कि हिमाचल की राजधानी शिमला, पहाड़ों की राजधानी शिमला, अंग्रेजों की राजधानी शिमला की कुछ अलग ही बात है। यानी शिमला को राजधानी के लिहाज से बेस्ट जगह बताया जाता रहा है। लेकिन हमें इस सोच से बाहर आने की नितांत आवश्यकता है। अगर राजधानी को शिमला से कहीं और शिफ्ट करने की बात की जाएगी तो शिमला वालों से ज्यादा इधर-उधर के लोग विरोध करने लगेंगे।

लेकिन विरोध तो देश की आजादी का भी होता था। आज की राजनीति में विरोध की कोई परिभाषा नहीं है। विरोध तब भी हुआ जब देश में पहली बार कंप्यूटर आया, ये तब भी हुआ जब देश में पहली मेट्रो चली। ये तब भी हो रहा है जब हम नई शिक्षा नीति पर पग धर रहे हैं।

राजनीति का दूसरा नाम विरोध है। लेकिन हिमाचल को एक नई राजधानी की उतनी ही जरूरत है जितनी जरूरत राजस्थान के रेगिस्तान को पौंग के पानी की। इस जरूरत को दो दशकों से राजनीति की चक्की में पीसा गया। हालांकि उस चक्की से राजधानी नामक आटे की जगह उसके भीतर का धुआं ही निकला। जैसे चक्की में घुसने पर हवा में धुएं की शक्ल में आटा तैरता हुआ दिखता है।

शिमला! बहुत कड़े शब्दों में कहा जाए तो हिमाचल की इस राजधानी पर अंग्रेजों के बाद प्रदेश के प्रशासकों से लेकर हर वो व्यक्ति हमला करता रहा है जो यहां रहता है। हां, ये बात अलग है कि यहां रहने वाले भी अधिकतर यहां के मूल निवासी नहीं हैं। शिमला के लिए उसके आत्मीय भाव उतने ही गहरे हैं जितने आपके अपने पड़ोसी के लिए। हकीकत यह है कि शिमला शहर अब रहने लायक बचा ही नहीं है। सुबह-शाम केवल जाम ही जाम और टूरिस्ट सीजन में पत्रकारों के लिए खबरें छापने का आम काम।

जिस ऐतिहासिक शहर शिमला के रिज का एक छोर वर्षों से धंसता रहे और उसे ठीक करना ही चुनौती बन जाए उस शहर के लिए हम और व्यवस्थाएं बोझ नहीं तो हम क्या बन चुके हैं? ढली से विश्वविद्यालय और बालूगंज से सचिवालय के लिए निकला हर व्यक्ति अपना ट्रैफिक का रंज बसों और गाड़ियों के एक्सलरेटर की तरह खुद को दबाते मिलता है। यहां की पानी का कहानी तो पूरी दुनिया जानती है। प्रदेश की राजधानी में कई इलाके आज भी पानी के लिए अपने आंसू और पसीना दोनों बहाते हैं। ऐसी राजधानी जहां सुविधाओं के नए निर्माण के लिए फाइलों के चक्कर में ही सरकारें उलझ कर रह जाती हैं, क्या वो राजधानी अब रहने लायक है?

खर्च और सुविधाओं के बीच का टकराव

शिमला में कमरों का किराया भी हिमालय से ज्यादा ऊंचाइयां छू रहा है, लेकिन सुविधाओं की बात करें तो लगता है ये हैंडपंप के लिए हुई खुदाई से भी नीचे जा चुकी हैं। देश की राजधानी और सिटी ब्यूटीफुल से ज्यादा महंगी हमारी पहाड़ों की रानी हो चुकी है, जबकि दिल्ली और चंडीगढ़ जैसी टैक्सी (ओला, ऊबर) फूड होम डिलीवरी की सुविधाएं यहां नगण्य है। टैक्सी वाले तो ऐसे किराया मांगते हैं जैसे उसी कस्टमर से गाड़ी की किस्त पूरी करेंगे। बरसात में आए दिन जमींदोज होती इमारतों की क्या ही बात की जाए।

शिमला के पास क्या नहीं है? अगर इस बात पर विचार करेंगे तो हर वो सही खाने का टिक मार्क होगा जो किसी भी क्षेत्र की आर्थिकी की जरूरत हो सकता है। पर्यटन, राज्य विश्वविद्यालय, ऐतिहासिक ईमारतें,सरकारी कार्यलय, हर वो ऐतिहासिक स्थल जिसे रिसर्च और डॉक्यूमेंनटेरियन खोजते हुए यहां पहुंचें।

इसलिए शिमला पर और अत्याधिक दबाव बढ़ाने की जगह इसे दबाव से मुक्त करने की जरूरत है। ठीक वैसे ही जैसे हम अपनी किसी दिल अजीज पुरानी चीज को सहेज कर उसे नई से बदलते हैं।

नई राजधानी के लिए कितना फिट है धर्मशाला?

अब गंभीर सवाल यह होगा कि नई राजधानी हो तो कहां? कुछ लोगों के दिमाग में जवाब धर्मशाला होगा, जोकि उतना ही गलत जवाब है जितना किसी परीक्षार्थी के लिए सही जवाब का पता होने के बाद भी गलत पर टिक कर देना।

धर्मशाला को राजधानी बनाना ठीक वैसा ही है जैसे किसी संपन्न परिवार को बीपीएल श्रेणी में डाल देना। अथार्त शिमला के बाद 12 महीने ट्रैफिक की समस्या में धर्मशाला को उलझाना। अभी धर्मशाला की जनता केवल टूरिस्ट सीजन में ही व्यवधानों को झेलती है। फिर उन्हें हर उस सरकारी चोंचलों के व्यावधान भी झेलने होंगे जो अत्यधिक ट्रैफिक के कारण शिमला झेल रहा है।

हालांकि, कागजी तौर पर धर्मशाला भी एक राजधानी है। जहां हिमाचल विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित होता है, लेकिन इस फैसले का जनता को क्या लाभ हुआ इसकी विवेचना राजनीतिक कारणों से नहीं हो पाता। दस दिनों के लिए जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों के वहां पहुंचने से सरकारी खर्च ही बढ़ सकता है। जनता के मर्ज नहीं दूर हो सकते।

राजधानी शिफ्ट हुई तो शिमला का क्या होगा?

शिमला से राजधानी जाने के बाद भी यहां का टूरिस्ट सीजन सदाबहार रहेगा। धर्मशाला में राजधानी न बनाने के बाद भी वहां का टूरिस्ट सीजन सदाबहार रहेगा। इन दोनों ही क्षेत्रों में आईटी हब विकसित किए जा सकते हैं।

कोरोना के बाद वर्क फ्रॉम होम ने एक नई व्यवस्था को जन्म दिया। आज बहुत सी कंपनियां और उसके कर्मचारी शिमला और धर्मशाला में काम करना पसंद कर रहे हैं। हां, यहां थोड़ी और सुविधाएं बढ़ाई जाए तो बहुत संभावनाएं हैं। तो हमें राजधानी के लिए उस क्षेत्र को देखना होगा जिस क्षेत्र में अनुकूल वातावरण भी हो जगह भी हो और जरूरत भी। इसलिए हमें नए जिले नहीं नई राजधानी की बहुत ज्यादा जरूरत है। एक नए सिरे से बसी व्यवस्थित राजधानी। अगर यह भी संभव न हो तो सरकारें शिमला के दबाव घटाने के लिए विभागों के कार्यालयों की विकेंद्रीकरण कर सकती है। लेकिन सवाल वही है, बिल्ली के गले में घंटी आखिर बांधेगा कौन? जवाब है- साहसी और दूरदर्शी नेतृत्व।

Emergency फिल्म का टीजर जारी, इंदिरा गांधी की भूमिका में दिखीं कंगना रणौत

डेस्क।। हिमाचल में जन्मीं अभिनेत्री कंगना रणौत ने अपनी आने वाली फिल्म इमर्जेंसी का फर्स्ट लुक जारी किया है। यूट्यूब पर जारी टीज़र में कंगना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की भूमिका में नजर आ रही हैं। देखें, टीजर और बताएं, किस हद तक देखने में इंदिरा जैसी लग रही हैं कंगना।

श्रीखंड यात्रा पर अस्थायी रोक, भीम डवारी के पास नाले का जलस्तर बढ़ा

कुल्लू ।। जिला प्रशासन ने श्रीखंड यात्रा पर अस्थाई रोक लगा दी है। भारी बारिश के कारण भीम डवारी के पास भूस्खलन और नाले में आई बाढ़ के बाद प्रशासन ने यात्रा पर रोक लगा दी है। भीम डवारी के पास भूस्खलन होने की वजह से वहां खड़ी यात्रियों की गाड़ियों को भी नुकसान हुआ है।

जिला प्रशासन का कहना है कि जैसे ही मौसम साफ होता है उसके बाद श्रीखंड यात्रा को फिर से शुरू कर दिया जाएगा। बता दें कि कुल्लू जिले के आनी उपमंडल में बीती रात भारी बारिश के कारण नाले उफान पर हैं। भीम डवारी के पास नाले का भी जलस्तर बढ़ गया है और बाढ़ जैसे हालात हो गए हैं। जिस वजह से प्रशासन ने एहतियातन यात्रा पर अस्थाई रोक लगाई है।

डीएसपी आनी रविन्द्र सिंह नेगी ने बताया कि रात को हुई बारिश के बाद नाले में बाढ़ और मलबा आ गया। इस कारण श्रीखंड यात्रियों को भीम डवारी में रोक दिया गया है। पार्वती बाग से रेस्क्यू टीमों को भीम डवारी बुलाया गया है। वहीं नाले में आए पानी और मलबे की चपेट में आकर ठारला मोड़ पर खड़ी यात्रियों की दो गाड़ियों को नुकसान पहुंचा है।

बाढ़ के कारण ठारला की ओर जाने वाला रास्ता पूरी तरह से बंद हो गया है। फिलहाल किसी के हताहत होने का अभी तक कोई समाचार नहीं है। उन्होंने बताया कि नाले में पानी का बहाव कम हो जाने पर यात्रा को फिर से शुरू कर दिया जाएगा।

 

हिमाचल में बसते हैं महादेव, ये हैं प्रदेश के 12 जिलों के प्रमुख शिव मंदिर

 

 

तो क्या फिर ‘आप’ में जाएंगे राजन सुशांत? पार्टी ने डाला बेटे का वीडियो

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में इस वर्ष के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में दल-बदलने का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। पहले आम आदमी पार्टी के हिमाचल अध्यक्ष अनूप केसरी बीजेपी में शामिल हुए थे तो अब बीजेपी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष खीमी राम शर्मा कांग्रेस में शामिल हो गए। उधर, अब राजनीतिक गलियारों में अटकलें लगाई जा रही हैं कि पूर्व सांसद डॉ. राजन सुशांत की भी आम आदमी पार्टी में वापसी हो सकती है।

यह चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि आम आदमी पार्टी के आधिकारिक फेसबुक पेज पर डॉ. राजन सुशांत के बेटे धैर्य सुशांत का वीडियो अपलोड किया गया है। इस वीडियो का बाकायदा पेड प्रमोशन भी किया जा रहा है। इस वीडियो में डॉ. राजन सुशांत भी दिख रहे हैं।

वैसे, यह वीडियो पुराना है जिसमें धैर्य सुशांत किसी अधिकारी के दफ्तर पहुंचे हैं। इस वार्तालाप के वीडियो को अब आम आदमी पार्टी हिमाचल के फेसबुक पेज पर प्रमोट किया जा रहा है।

AAP के हिमाचल संयोजक रह चुके हैं राजन सुशांत               

राजन सुशांत आम आदमी पार्टी के हिमाचल संयोजक रह चुके हैं। करीब दो साल तक वह इस पद पर बने रहे। 2014 में उन्होंने कांगड़ा लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी के टिकट से चुनाव भी लड़ा था मगर मात्र 24 हजार वोट ले पाए थे। बाद में 2016 में उन्होंने पार्टी से किनारा कर लिया था। 

‘क्षमतावान नेता’

राजन सुशांत की गिनती एक समय हिमाचल बीजेपी के उन नेताओं में होती थी जिनमें पार्टी अपना भविष्य देखती थी। शांता कुमार ने भी ऐसे नेताओं की श्रेणी में जेपी नड्डा और राजन सुशांत का नाम गिनाया था। मगर वक्त ने ऐसी करवट ली कि राजन सुशांत ने न सिर्फ अपना राजनीतिक करियर पटरी से उतार दिया बल्कि भाजपा को भी आज तक इसका नुकसान झेलना पड़ रहा है।

छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे राजन सुशांत 1982 में पहली बार ज्वाली विधानसभा सीट से विधायक बने। वह उस समय तक के सबसे युवा विधायक थे। फिर 1985 के चुनावों में इसी सीट से विधायक चुने गए। 1993 में इसी सीट पर सुजान सिंह पठानिया से हारे। फिर 1998 में जीते और धूमल सरकार में मंत्री बने। 2003 के विधानसभा चुनाव में दूसरी बार सुजान सिंह पठानिया से हारे मगर 2007 के चुनावों में फिर जीतकर विधानसभा पहुंचे। यानी वह चार बार विधायक रहे।

परिवार के लिए पार्टी से रार

2009 में राजन सुशांत को भारतीय जनता पार्टी ने कांगड़ा लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ाया और वह जीते भी। उनकी जगह खाली हुई ज्वाली सीट पर उपचुनाव हुए। कांग्रेस से सुजान सिंह पठानिया ही मैदान में थे और भाजपा ने बदलेव राज को टिकट दिया। मगर इस बीच राजन सुशांत के भाई मदन शर्मा ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। नतीजा- कांग्रेस के सुजान सिंह पठानिया की जीत हुई।

इसके बाद परिसीमन हुआ तो ज्वाली से लड़ने वाले नेता नई सीट फतेहपुर शिफ्ट हो गए। 2012 के विधानसभा चुनाव आए तो सुशांत अपनी पत्नी सुधा सुशांत के लिए फतेहपुर से टिकट की मांग करने लगे। मगर ऐसा नहीं हुआ और उनकी पत्नी ने निर्दलीय पर्चा भर दिया। वह तीसरे स्थान पर रहीं और भाजपा के उम्मीदवार की भी हार हुई।

इस बीच भाजपा से बागी हुए महेश्वर सिंह ने हिमाचल लोकहित पार्टी ने नाम से नया दल बनाया था जिसके यूथ विंग की जिम्मेदारी राजन सुशांत के बेटे धैर्य सुशांत ने संभाली थी। बाद में महेश्वर सिंह भाजपा में लौट आए और हिमाचल लोकहित पार्टी का अस्तित्व मिट सा गया।

AAP का दामन

2014 के लोकसभा चुनाव आने वाले थे। चुनाव से ठीक पहले भाजपा के सांसद होते हुए जनवरी में उन्होंने पार्टी और लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। हालांकि हिमाचल बीजेपी लगातार हाईकमान को उनको पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते कार्रवाई के लिए लिख रही थी। सुशांत ने 2014 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले आम आदमी पार्टी की सदस्यता ले ली और उन्हें पार्टी का संयोजक बनाया गया। फिर 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने AAP के टिकट से लड़ा और उन्हें मात्र 24 हजार वोट मिले। फिर राजन सुशांत ने जनवरी 2016 में पार्टी के संयोजक पद से इस्तीफा दे दिया। ये इस्तीफा पार्टी हाईकमान ने नामंजूर कर दिया। इसके बाद कुछ ही महीनों में आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई। इस बैठक फिर से राजन सुशांत को हिमाचल प्रदेश के संयोजक बनाए रखा गया, लेकिन पार्टी की हिमाचल में गतिविधियां नगण्य ही रही। इसी के चलते उन्होंने फिर से पार्टी  से किनारा कर लिया।

2017 के विधानसभा चुनाव में राजन सुशांत फतेहपुर से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़े और तीसरे नंबर पर रहे। जैसा कि इस सीट पर होता आया था, इस बार भी वही हुआ। जब-जब राजन सुशांत या उनके परिवार के सदस्यों ने निर्दलीय चुनाव लड़ा, भाजपा की हार हुई। यही सिलसिला यहां से कांग्रेस विधायक चुने गए सुजान सिंह पठानिया के निधन के बाद हुए उपचुनावों में भी जारी रहा। नवंबर 2021 में हुए उपचुनाव में राजन सुशांत निर्दलीय लड़ते हुए तीसरे नंबर पर रहे और कांग्रेस के उम्मीदवार भवानी सिंह पठानिया की जीत हुई।

खास बात यह है कि 2020 में राजन सुशांत ने ‘हमारी पार्टी हिमाचल पार्टी’ नाम से दल के गठन का एलान किया था। शिमला में विजयदशमी के मौके पर उन्होंने पार्टी का नामकरण किया था। इसमें राजन सुशांत ने दावा किया था कि यह दल सबसे हटके होगा। हालांकि 2021 में फतेहपुर विधानसभा उपचुनाव में उन्होंने बतौर निर्दलीय प्रत्याशी ही नामांकन दाखिल किया था।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चूंकि इस पार्टी को समर्थन नहीं मिला, इसीलिए राजन सुशांत ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और संभव है कि इसी कारण वह आम आदमी पार्टी का रुख कर सकते हैं। अपने लिए नहीं तो अपने बेटे धैर्य सुशांत के लिए जो लंबे समय से अग्रिम पंक्ति पर खड़े होकर अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। और आम आदमी पार्टी द्वारा धैर्य सुशांत के वीडियो को प्रमोट करना, इसी कड़ी का हिस्सा हो सकता है।

भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष खीमी राम शर्मा कांग्रेस में शामिल

नई दिल्ली।। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और धूमल सरकार में मंत्री रहे खीमी राम शर्मा ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। 2017 में भारतीय जनता पार्टी की ओर से टिकट न मिलने के बाद वह नाराज चल रहे थे। उन्होंने अपनी नाराजगी कई मौकों पर खुलकर जाहिर की थी और कई बार पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने उनसे मुलाकात भी की थी। मगर अटकलें सही साबित हुईं और मंगलवार को वह दिल्ली मे कांग्रेस में शामिल हो गए।

बंजार के पूर्व विधायक खीमी राम शर्मा पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के करीबी माने जाते हैं। 2012 में जब जेपी नड्डा ने मंत्री पद से इस्तीफा देकर पार्टी मुख्यालय का रुख किया था तब उनकी जगह खीमी राम को मंत्रिमंडल में जगह दी गई थी।

उस समय खीमी राम शर्मा ने कहा था, “मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की कृपा व आशीर्वाद से आज तक इस पद पर पहुंचा हूं। मुख्यमंत्री ने मंत्री पद सौंपकर मुझमें जो विश्वास जताया है, उस कसौटी पर खता उतरने का प्रयास करूंगा। संगठन में भी धूमल के आशीर्वाद से ही अध्यक्ष पद पर काबिज हुआ था। धूमल के प्रति निष्ठा हमेशा बनी रहेगी।”

खीमी राम शर्मा का राजनीतिक करियर:
1993-95 जिला कार्यकारिणी सदस्य
1995-98 प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य
2001 जिला परिषद अध्यक्ष
2003-07 बंजार विधानसभा क्षेत्र से विधायक
2005-07 कुल्लू जिला भाजपा अध्यक्ष
2007-12 बंजार विधानसभा क्षेत्र से विधायक
2008-09 विधानसभा उपाध्यक्ष
2009 से फरवरी 2012 तक प्रदेश भाजपा अध्यक्ष
फरवरी 2012 से दिसंबर 2012 तक मंत्री
2012 में बंजार से विधानसभा चुनाव हारे
2017 में बीजेपी का टिकट नहीं मिला
जुलाई 2022 में कांग्रेस में शामिल

ऊना के लालसिंगी में बच्चा चुराने की कोशिश के आरोप में तीन लोग पकड़े गए

ऊना।। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले के लालसिंगी में एक बच्चे को चुराने की कोशिश में पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया है। साढ़े तीन साल के एक बच्चे की दादी ने बताया कि कुछ बाइक सवार घर के बाहर खेल रहे बच्चे को अपने साथ ले जाने की कोशिश कर रहे थे। दादी ने शोर मचाया तो आसपास के लोग इकट्ठा हुए और उन्होंने इन तीन लोगों को पकड़ लिया।

इस बीच किसी ने पुलिस को खबर की और भीड़ भी इकट्ठा हो गई। भीड़ ने इन तीनों के साथ मारपीट भी की। पुलिस से पहले मीडियाकर्मी मौके पर पहुंचे और घटना की लाइव रिपोर्टिंग भी की। लोगों की भीड़ जमा होने से मुख्य सड़क पर जाम भी लग गया।जब तक पुलिस पहुंची, तब तक आते-जाते लोग इन तीनों को पीटते रहे।

बाद में पुलिस ने मौके पर पहुंच इन तीनों को भीड़ से छुड़ाकर अपने साथ ले गई। कुछ समय में स्थिति साफ होगी कि मामला क्या है।

हरोली कांग्रेस नेता पंजाब में 24 किलो नशीले पदार्थ के साथ गिरफ्तार

ऊना।। पंजाब पुलिस ने हिमाचल प्रदेश के दो व्यक्तियों को 24 किलो नशीले पदार्थ के साथ गिरफ्तार किया है। ये व्यक्ति ऊना जिले के हरोली के रहने वाले हैं। इनमें से एक हरोली कांग्रेस का पदाधिकारी बताया जा रहा है। गढ़शंकर पुलिस का कहना है कि रात को नंगल रोड पर गश्त के दौरान दो लोग पकड़े गए जिनके पास 12-12 किलो डोडा चूरा-पोस्त बरामद किया गया।

गढ़शंकर पुलिस स्टेशन के एसएचओ करनैल सिंह ने बताया कि रात को गश्त के दौरान पकड़े गए राकेश कुमार और अमरीक सिंह ऊना के बाथड़ी गांव से संबंध रखते हैं। उन्होंने बताया कि दोनों के खिलाफ एनडीपीएस के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है और पूछताछ जारी है।

भाजपा ने उठाए सवाल
मंगलवार रात पकड़े गए युवकों में से एक राकेश कुमार हरोली कांग्रेस के एससी सेल का उपाध्यक्ष बताया जा रहा है। इस मामले को लेकर अब राजनीति भी तेज हो गई है। हरोली से भाजपा नेता प्रोफेसर राम कुमार ने इसे शर्मनाक घटना बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछली कांग्रेस की सरकार के दौरान हरोली नशे का गढ़ बन गया था और नशा माफिया को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ था।

प्रो. राम कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर डाले वीडियो में पंजाब में नशीले पदार्थ के साथ पकड़े गए व्यक्ति की नेता प्रतिपक्ष और स्थानीय कांग्रेस विधायक मुकेश अग्निहोत्री से करीबियों पर सवाल उठाए और कहा कि मुकेश अग्निहोत्री के फेसबुक पेज में डाली गई तस्वीरों में यह व्यक्ति उनके साथ दिखता है।

प्रो. राम कुमार ने कहा कि पहले अवैध शराब कारोबारी नीरज ठाकुर और अब डोडा चूरा-पोस्त तस्कर राकेश कुमार के साथ नजदीकियों पर मुकेश अग्निहोत्री को जवाब देना चाहिए।

काली माता विवाद में महुआ मोइत्रा के बचाव में उतरे शशि थरूर

डेस्क।। एक ओर जहां मां काली पर दिए टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा के बयान का विरोध हो रहा है, वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने उनका समर्थन करते हुए कहा है कि महुआ मोइत्रा ने वही कहा जो हर हिंदू जानता है।

दरअसल, एक डॉक्युमेंट्री फिल्म के पोस्टर में काली मां की वेशभूषा में दिख रही कलाकार को सिरगेट पीते दिखाए जाने पर हुए विवाद के बाद महुआ मोइत्रा ने कहा था, “काली के कई रूप हैं। मेरे लिए काली का मतलब मांस और शराब स्वीकार करने वाली देवी है। लोगों की राय अलग होती है और मुझे इसे लेकर कई परेशानी नहीं है।”

उनके इस बयान का विरोध होने के बाद तृणमूल कांग्रेस ने उनके इस बयान को निजी राय बताकर पल्ला झाड़ दिया है। बदले में महुआ ने अभी ट्विटर पर अपनी पार्टी के हैंडल को अनफॉलो कर दिया है। इस बीच भारतीय जनता पार्टी समेत अन्य संगठनों और समूहों ने भी महुआ मोइत्रा के बयान पर आपत्ति जताते हुए टीएमसी से कार्रवाई की मांग की है। वहीं मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में महुआ के बयान को लेकर एफआईआर भी दर्ज हुई है।

इस बीच कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने ट्वीट करके कहा है, “महुआ पर हो रहे हमलों ने मुझे हैरान कर दिया है। उन्हें वह बात कहने के लिए निशाने पर लिया जा रहा है जिसे हर हिंदू जानता है। हिंदू जानते हैं कि हमारी पूजा का तरीका देश के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग है। देवी को कोई क्या चढ़ाता है, यह देवी से ज्यादा तो भक्त के बारे में बताता है।”

उन्होंने सभी से माहौल ठंडा करने की गुजारिश करते हुए कहा, “हम ऐसी स्थिति में पहुंच घए हैं जब सार्वजनिक रूप से कुछ कहेंगे तो किसी न किसी को तो ठेस पहुंचेगी। यह पक्की बात है कि महुआ किसी को अपमानित नहीं करना चाहती थीं। मैं गुजारिश करता हूं कि माहौल को हल्का करें। धर्म को कौन किस तरह से मानता है, उसपर ही छोड़ दें।”

हिमाचल में बढ़ने लगा कोविड संक्रमण, लाहौल के स्कूल में 36 पाए गए संक्रमित

डेस्क।।  हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति के सेंट्रल स्कूल में 30 छात्र और 6 अध्यापक कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। मंगलवार को लाहौल में लिए गए 145 सैंपल्स में 39 पॉजिटिव निकले जिनमें से 36 केंद्रीय स्कूल के थे। इसके बाद स्कूल को 12 जुलाई तक बंद कर दिया गया है।

नए आंकड़ों के बाद अब लाहौल स्पीति में कोरोना संक्रमितों की संख्या 53 पहुंच गई है। इसी तरह कुल्लू में भी मंगलवार को 10 नए मामले सामने आए। इससे यहां मरीजों की संख्या 39 हो गई है। कुल्लू के भुट्टी सरकारी स्कूल में पहले पांच छात्र और एक अध्यापक संक्रमित पाए गए थे। अब मंगलवार को इसी स्कूल के 5 और विद्यार्थी संक्रमित मिले।

मंगलवार को राजधानी शिमला में 23, कांगड़ा में 66, चंबा में 10, किन्नौर में 12, हमीरपुर में 15 और सिरमौर में 12 नए मामले सामने आए हैं। कुल मिलाकर हिमाचल में 204 नए केस सामने आए।

भगवंत मान गुरुवार को करेंगे डॉ. गुरप्रीत कौर से शादी, राघव चड्ढा कर रहे तैयारियां

चंडीगढ़।। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान गुरुवार को डॉक्टर गुरप्रीत कौर से शादी करने जा रहे हैं। यह शादी सिख रीति-रिवाज के साथ एक सादे समारोह में होने जा रही है।

चड्ढा कर रहे तैयारियां
भगवंत मान की शादी की तैयारियां उनके आधिकारिक आवास पर की गई है। खबरों के अनुसार आम आदमी पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष राघव चड्ढा समारोह के आयोजन की तैयारियों में जुटे हैं।

बच्चों संग अमेरिका में रहती हैं पूर्व पत्नी
भगवंत मान जब 2014 में संगरूर लोकसभा से सांसद चुने गए थे, तब उनकी पहली पत्नी इंद्रजीत ने भी प्रचार किया था। मगर उसके बाद 2016 में तलाक हो गया था। मान के दो बच्चे भी हैं जो अमेरिका में अपनी मां के साथ रहते हैं।

भगवंत मान और उनकी पूर्व पत्नी की फाइल फोटो

पंजाब और परिवार में से चयन
तलाक से समय जब पत्रकारों ने सवाल किए थे तो भगवंत मान ने कहा था कि उन्हें पंजाब और परिवार में से एक को चुनना था, ऐसे में उन्होंने पंजाब को चुनने का फैसला किया।

कौन हैं डॉक्टर गुरप्रीत
जिन डॉक्टर गुरप्रीत कौर से मान की शादी हो रही है, बताया जा रहा है कि वह उनके परिवार की करीबी हैं। दोनों लंबे समय से एक-दूसरे को जानते थे।

केजरीवाल भी होंगे शामिल
इस समारोह में परिवार के लोग और कुछ अन्य विशेष लोग ही शामिल होंगे। ऐसी जानकारी है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी शादी में पहुंचेंगे।