धर्मशाला।। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अपने धर्मशाला दौरे के दौरान प्रदर्शन कर रहे गद्दी समुदाय के लोगों पर लाठीचार्ज होने का खंडन किया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि गद्दी समुदाय के लोगों पर लाठीचार्ज नहीं हुआ है, यह सब बीजेपी की चाल है।
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के हवाले से ‘समाचार फर्स्ट’ नाम के पोर्टल ने लिखा है, ‘गद्दी समुदाय के लोगों पर कोई लाठीचार्ज नहीं हुआ। यह सब बीजेपी की चाल है इसीलिए बीजेपी के पूर्व धर्मशाला विधायक किशन कपूर अपनी गाड़ी से मेरी गाड़ी को टक्कर मारने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन ड्राइवर ने इसे संभाल लिया।’
गौरतलब है कि मैक्लोडगंज के डल झील इलाके में गद्दी समुदाय के लोगों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ नारेबाजी की थी और गो बैक के नारे लगाए। वे मुख्यमंत्री द्वारा गद्दी समुदाय का हवाला देते हुए की गई टिप्पणी का विरोध कर रहे थे। इस पर पुलिस ने गद्दी समुदाय के लोगों पर लाठीचार्ज कर दिया। लाठीचार्ज में गद्दी समुदाय के सात लोग बुरी तरह जख्मी हो गए हैं। घायल हुए लोगों को धर्मशाला अस्पताल भर्ती करवा दिया गया है।
लाठीचार्ज में जख्मी लोगों की तस्वीरें भी सामने आई हैं।
यह मामला क्या है, जानने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:
धर्मशाला।। मुख्यमंत्री वीरभद्र द्वारा गद्दी शब्द का हवाला देकर की गई टिप्पणी का विरोध कर रहे लोगों पर पुलिस द्वारा लाठीचार्ज करने की खबर है। एक न्यूज पोर्टल ‘समाचार फर्स्ट’ के मुताबिक लाठीचार्ज में गद्दी समुदाय के करीब 7 लोग बुरी तरह घायल हो गए हैं। इसमें एक व्यक्ति के सिर पर गहरी चोट आई है, जबकि एक अन्य के हाथों की उगलियां टूटने की भी खबर है। बताया जा रहा है कि मामले में कई गिरफ्तारियां भी की गई हैं।
पोर्टल के मुताबिक मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कांगड़ा दौरे पर हैं और इस दौरान उनका मैक्लोडगंज के डल झील स्थान पर शिलान्यास का कार्यक्रम था। इस दौरान गद्दी समुदाय के लोगों ने मुख्यमंत्री के खिलाफ नारेबाजी की और गो-बैक के नारे लगाए। मुख्यमंत्री के आगमन पर लोगों ने नारेबाजी तेज कर दी और मुख्यमंत्री के काफिले को रोकने का प्रयास करने लगे। इसपर पुलिस ने लोगों को रोकने का प्रयास किया, जब वह नहीं माने तो पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।
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एक अन्य पोर्टल ‘हिमाचल अभी-अभी’ के मुताबिक एसपी कांगड़ा रमेश छाजटा ने 20-25 लोगों को हिरासत में लेने की पुष्टि की है। उधर ‘समस्त भारत’ मैगज़ीन ने फेसबुक पेज पर तस्वीरें शेयर करते हुए जानकारी दी है कि प्रदर्शनकारी गद्दी समुदाय से थे और शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे।
क्या है मामला ऊना दौरे के दौरान मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री ने बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सत्ती पर बात करते हुए कहा था कि वह प्रेजिडेंट हैं तो क्या हुआ, प्रेजिडेंट तो गद्दी सभा के भी होते हैं। इस टिप्पणी का गद्दी समुदाय के नेताओं ने विरोध किया था और सोशल मीडिया पर भी टिप्पणियां हुई थीं। बीजेपी ने भी मुद्दा बनाया था। मगर मुख्यमंत्री ने कहा है कि उनके बयान को गलत तरह से पेश किया गया है। उनके स्पष्टीकरण को यहां क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।
उधर ख़बर यह भी है कि सीएम के साथ चलने वाले पायलट वाहन निकल जाने के बाद बीजेपी नेता किशन कपूर की गाड़ी मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की गाड़ी बिल्कुल पास घुसा दी गई। बताया जा रहा है कि इस गाड़ी किशन कपूर का ड्राइवर चला रहा था और कपूर ख़ुद भी इस गाड़ी में बैठे थे।
शिमला।। गद्दी समुदाय का हवाला देते हुए बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सत्ती पर दिए बयान पर विरोध के बाद मुख्यमंत्री वीरभद्र ने सफाई दी है। उनका कहना है कि उनके बयान को गलत ढंग से पेश किया गया।
अपने पेज पर डाली पोस्ट में उन्होंने लिखा है- “My statement regarding President of Gaddi Board was misinterpreted by social media. मेरे बोलने का मतलब था की भाजपा अध्यक्ष Satpal Satti से बड़ा अध्यक्ष तो हमारी गद्दी बोर्ड का है जिसकी ज्यादा फॉलोविंग है। जो मैंने कहा उसे तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया ।
हम गद्दी समुदाय के हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है । मेरी सरकार में इस समुदाय से एक वरिष्ठ मंत्री भी है और मेरे निजी जीवन में अनेक मित्र भी गद्दी समुदाय से है । गद्दी कल्याण के लिए बोर्ड का गठन भी हमारी सरकार ने किया उनके कल्याण के लिए हम सदैव समर्पित रहे हैं और रहेंगे ।”
एमबीएम न्यूज, सरकाघाट।। मंडी ज़िले के सरकाघाट में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते हुए कॉलेज के मुख्य गेट पर सुबह दस बजे तालाबंदी कर दी। इस वजह से पूरे दिन पढ़ाई नहीं हो पाई। हालांकि छात्रों की काफी मांगें जायज भी है।
प्रदर्शन कर रहे कॉलेज प्रशासन ने छात्रों को समझाने की कोशिश की लेकिन वे जिद पर अड़े रहे। वे कॉलेज प्रबंधन और प्रदेश सरकार के विरोध में नारेबाजी करते रहे। पुलिस को बुलाया गया तो पुलिस ने भी छात्रों से ताला खोलने का अनुरोध किया मगर छात्रों ने ताला नहीं खोला। सुबह 10 बजे से बंद किए गए गेट को दोपहर बाद 2 बजे खोला गया।
जायज़ हैं छात्रों की काफ़ी मांगें
तरीका बेशक गलत हो, मगर छात्रों की काफी मांगें जायज हैं। इनमें शौचालयों की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करना, अर्थ शास्त्र में छात्रों की बढ़ी संख्या को लेकर दो अन्य पदों का सृजन करना, हर कक्षा के बाहर कूड़ेदान की व्यवस्था करना, पुस्तकालय में अतिरिक्त बैठने की व्यवस्था करना, कॉलेज के रास्तों के कीचड़ से मुक्ति पाने के लिए इंटरलॉकिंग व्यवस्था करना शामिल है। साथ ही दो वर्ष पूर्व सरकार द्वारा स्वीकृत राशि से खेल के मैदान में स्टेडियम निर्माण न होने से भी वे नाराज थे।
ऊपर तस्वीर में देखा जा सकता है कि बच्चे जहां खड़े हैं, वहां क्या हालत है। ईंटें रखकर रास्ता बनाया गया है ताकि पानी से बचाव हो। आसपास घास उगी है और बिल्डिंग की हालत भी ठीक नहीं लगती। कहीं से भी यह ढंग से कॉलेज की इमारत नहीं लगती।
धर्मेंद्र कपूर।। गद्दी जनजाति भारत की सांस्कृतिक रूप से सबसे समृद्ध जनजातियों में से एक है। पशुपालन करने वाले ये लोग वर्तमान में धौलाधर श्रेणी के निचले भागों, खासकर हिमाचल प्रदेश के चम्बा और कांगड़ा ज़िलों में बसे हुए हैं। शुरू में वे ऊंचे पर्वतीय भागों में बसे रहे, मगर बाद में धीरे-धीरे धौलाधार की निचली धारों, घाटियों और समतल हिस्सों में भी उन्होंने ठिकाने बनाए। गद्दी आज पालमपुर और धर्मशाला समेत कई कस्बों में भी अपने परिवारों के साथ रहते हैं।
हिमाचल के चित्रकार सरदार शोभा सिंह जी की अमर कृति- गद्दण
गद्दी जनजाति का उद्गम कहां से हुआ, इसके लिए अलग-अलग कथाएं निकल कर आती हैं। माना जाता है कि इन लोगों ने मध्य एशिया, राजस्थान और गुजरात से हिमालय की तलहटी में प्रवास किया। यह भी माना जाता है कि गद्दी जनजाति की कुछ जातियों ने सत्रहवीं सदी में मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचारों से त्रस्त होकर हिमाचल की पहाड़ियों में शरण ली थी।
गद्दी जनजाति की व्युत्पत्ति के कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते हैं क्योंकि वे खानाबदोश (घुमंतू) प्रवृत्ति के थे और उनका कोई स्थायी निवास नहीं होता था। क्योंकि वे गर्मियों में अपनी भेड़-बकरियों के साथ पहाड़ों पर विचरण करते हैं और सर्दियों में वे मैदानी इलाकों में इधर-उधर घूमते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वे पंजाब के मैदानी इलाकों से आए थे।
कड़ी मेहनत से कमाकर आगे बढ़ने का रहा है इतिहास
गद्दी जनजातियों का मुख्य व्यवसाय भेड़-बकरी पालन है और वे अपनी आजीविका के लिए भेड़, बकरी, खच्चरों और घोड़ों को भी बेचते हैं। यह जनजाति पुराने दिनों में घुमंतू थी लेकिन बाद में उन्होंने पहाड़ों के ऊपरी भाग में अपने ठिकाने बनाना शुरू कर दिया।
मुश्किल से मुश्किल इलाकों में आसानी से रह लेते हैं मेहनती गद्दी
वे गर्मी के मौसम के दौरान चराई के लिए अपने पशुओं को लेकर ऊपरी पहाड़ियों में चढ़ाई करते हैं और सर्दियों में नीचे उतर आते हैं। वे अपनी भेड़-बकरियों की सुरक्षा के लिए कुत्ते भी पालते हैं जो भेड़-बकरियों को खदेड़कर एक जगह पर इकठ्ठा करने में पारंगत होते हैं। वे तेंदुओं तक से भिड़ जाते हैं।
अब गद्दी समुदाय के लोगों ने भी अपनी आजीविका कमाने के लिए कई अन्य व्यवसायों को अपनाना शुरू कर दिया है। कुछ लोग मेहनत वाले काम करके भी आजीविका चलाते हैं तो अब सरकारी नौकरियों समेत विभिन्न क्षेत्रों अच्छे पदों पर आसीन हैं।
संस्कृति से जड़ से जुड़े हैं गद्दी
शायद ही हिमाचल प्रदेश में ऐसी कोई जनजाति अब बची हो जो गद्दियों की तरह जड़ से अपनी संस्कृति से जुड़ी हुई हो। पहनावे से लेकर खानपान हो या धर्म-कर्म, सब में गद्दी लोग आज भी अपने इतिहास से जुड़े हुए हैं। गद्दी भेड़ की ऊन और बकरी के बाल से बना ऊनी पाजामा (पतलून), लंबे कोट, ढोरु (ऊनी साड़ी), टोपी और जूते पहनते हैं। वे भेड़ की ऊन का प्रयोग शॉल, कंबल और कालीन बनाने में करते हैं।
सांस्कृतिक रूप से गहरी हैं जड़ें
वे परंपरागत शैली में अपने घरों में बुनाई करते हैं। गद्दी महिलाएं पत्थर, सोने और चांदी से बने आभूषणों की शौकीन होती हैं। गद्दियों के विभिन्न प्रकार के अपने पहनावों की शैली के आधार पर उनमें अंतर किया जा सकता है। पुरुष गद्दी सिर पर पगड़ी पहनते हैं जिसे वे साफा कहते हैं और डोरा के साथ एक प्रकार का चोला पहनते हैं। गद्दी स्त्रियां लुआंचड़ी नामक परिधान पहनती हैं तथा नाक में नथ, माथे पर टीका और सिर पर दुपट्टा ओढ़ती हैं। गद्दी समूह के पुरुष एवं महिलाएं दोनों कान में बालियां पहनते हैं।
एक पेंटिंग
हिन्दू ही नहीं, मुस्लिम भी हैं गद्दी
गद्दी समुदाय में अधिकतर लोग हिन्दू हैं लेकिन चंबा और लाहौल स्पीति जिलों के ऊपरी क्षेत्रों में मुस्लिम गद्दी भी पाए जाते हैं। मुख्य रूप से स्थानीय बोलियों में बात करते हैं, लेकिन अब हिन्दी में भी बातचीत करने लगे हैं। गद्दी अपनी साधारण जीवन शैली के लिए जाने जाते हैं और धार्मिक होते हैं। महादेव शिव गद्दियों के आराध्य देव हैं लोकल भाषा में चम्बा भरमौर के गद्दी शिव को धूड़ू के नाम से पुकारते हैं। भरमौरी कैलाश मणिमहेश गद्दियों का सबसे पवित्र स्थान है।
मेहनत के लिए जाने जाते हैं गद्दी
ईमानदार और मेहनती हैं गद्दी गद्दी समुदाय के गांवों में अपराध दर न के बराबर पाई जाती है। इन लोगों का स्टेमिना भी अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक होती है। ये लोग आसानी से अपनी पीठ पर भार उठाकर मीलों चल सकते हैं और कठिन से कठिन मौसम को सह सकते हैं।
इन लोगों को मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्र में पैदल चलना होता है और इसीलिए वे आसानी से खड़ी पहाड़ियों को पार कर जाते हैं। गद्दी बेहद ईमानदार माने जाते हैं। वे बहुत मेहनत से काम करते हैं और वे स्नेही और नर्म स्वभाव के होते हैं।
(लेखक कांगड़ा से हैं और एक निजी स्कूल में अध्यापन कार्य करते हैं)
इन हिमाचल डेस्क।। राजस्थान के छोटे से गांव से शुरू हुई महिलाओं के बाल अपने आप कटने की घटना पूरे देश में फैल गई है। अब हिमाचल में भी सोलन और सिरमौर में दो लड़कियों के बाल कटने का मामला सामने आया है। अंधविश्वास की हद देखिए, लोगों को लगता है कि कोई भूत, चुड़ैल या डायन ऐसा कर रही है। कुछ लोगों ने आगरा में एक बुजुर्ग महिला को चोटी काटने के शक में पीट-पीटकर मार डाला। अब तो पुरुषों के बाल भी कटने लगे हैं।
आखिर क्या है बाल कटने का रहस्य? महिलाओं के बाल अपने आप कट जाने की घटनाएं नई नहीं हैं। सदियों से ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। गांव में माना जाता रहा है कि भूत का साया होने पर घर में अपने आप आग लग जाती है, बाल कट जाते हैं या फिर चीजें गुम होने लगती हैं। ऐसे कई मामलों में पहले ही मनोचिकित्सक पाते रहे हैं कि ये घटनाएं कि भूत-प्रेत या दैवीय शक्ति की वजह से नहीं, बल्कि परिवार के ही किसी शख्स या फिर बाल कटने का दावा करने वाले शख्स की ही खुराफात होती है।
हिमाचल में भी बाल कटने का मामला सामने आया है
यह बात अलग है कि कभी ऐसी हरकतें जान-बूझकर की जाती हैं तो कभी मानसिक स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से। ऐसा काम करने वालों को पता नहीं चलता कि सब-कॉन्शियस माइंड यानी अवचेतन मन की वजह से कब वे ऐसा कर बैठते हैं। यह ठीक में नींद में चलने जैसी समस्या की वजह से है जिसमें लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे नींद में चलते हुए कहां पहुंच गए। इसलिए खुद अपने या दूसरों के बाल मानसिक समस्या की वजह से काटने वालों पता भी नहीं चलता कि उन्होंने क्या कर दिया है।
मगर देश के विभिन्न हिस्सों से ऐसी खबरें कैसे आने लगीं? मास मीडिया यानी जनता तक पहुंचने वाले मीडिया, जैसे कि अखबार और टीवी का हम सभी पर गहरा जीवन है। हमारे समाज में बहुत से लोग ऐसे होते हैं जिनकी मेंटल हेल्थ या मानसिक स्वास्थ्य दुरुस्त नहीं होता। मगर जागरूकता के अभाव और समाज में ऐसे लोगों को गलत नजर से देखने की वजह से पैदा होने वाली शर्म की वजह से लोग या तो मनोचिकित्सक की मदद नहीं लेते या फिर उन्हें पता ही नहीं होता कि उनके साथ क्या गलत है। ऐसे में विभिन्न वजह से डिप्रेशन या अन्य मानसिक दिक्कतों से जूझ रहे लोग जल्दी से अफवाहों, ख़ासकर मास हिस्टीरिया की चपेट में आकर वही करने लगते हैं, जिससे उन्हें डर लगता है या जो बात उनके मन में बैठ जाती है।
क्या है मास हिस्टीरिया? आपने विभिन्न धर्मों के धार्मिक आयोजनों में देखा होगा कि शुरू में एक महिला या पुरुष उछल-कूद मचाकर यह दिखाता है कि उसके अंदर कोई दैवीय शक्ति आ गई है। कुछ जगहों पर इसे माता आना कहा जाता है और हिमाचल में खेल आना। कई जगहों पर इसे भूत का आना भी कहा जाता है। इसके बाद भीड़ से बहुत से लोग उसी तरह का व्यवहार करने लगते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे मास हिस्टीरिया की चपेट में आ गए होते हैं। कुछ लोग धार्मिक आधार पर दूसरों को ठगने के लिए मास हिस्टीरिया को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं
आपने सुना होगा कि फ्लां जगह पर स्कूल की बच्चियां एक के बाद एक चीखकर बेहोश होने लगीं। कई बार किसी खास जगह पर कुछ लोग अजीब हरकतें करने लगते हैं। इसके बाद लोग अक्सर ओझाओं और तांत्रिकों की मदद लेने लगते हैं मगर उन्हें पता होना चाहिए कि ऐसा करने से समस्या और खराब हो सकती है। मन में डर और गहरा बैठ सकता है। ऐसा ही मामला बिलासपुर में हुआ था और उस वक्त भी In Himachal ने लोगों को वैज्ञानिक ढंग से सोचने के लिए कहा था। (यहां क्लिक करके पढ़ें)
सामाजिक और मनोविज्ञान में इसे ग्रुप हिस्टीरिया या सामूहिक उन्माद कहते हैं। इसमें बहुत सारे लोग एक साथ भ्रम के शिकार हो जाते हैं। अफवाहों की वजह से होने वाले डर या उत्तेजना की वजह से उनका व्यवहार एक जैसा हो जाता है। दुनिया भर के कई देशों में ऐसे उदाहरण हैं जहां पर कहीं लोगों को लगने लगा कि उनके ऊपर शैतान आ गया है तो कहीं लोगों को लगने लगा कि प्रभु की कृपा उनके ऊपर हो गई है। ऐसे उदाहरण पढ़ने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं।
खास बात यह है कि अफवाहें और डर जितना ज्यादा फैलता है, हिस्टीरिया उतना ही बढ़ता जाता है। यह ठीक कुछ सालों पहले दिल्ली के मंकी मैन जैसा है जहां लोगों को लगता था कि मंकी मैन उनपर हमला कर रहा है। कुछ लोग असली बंदर को देखकर भागने लगे और गिरकर जख्मी हो गए तो कुछ अन्य आदमियों को समझकर भागकर जख्मी हो गए। बाद में मामला कुछ नहीं निकला।
जिस तरह से दिल्ली के मंकी मैन की अफवाह का फायदा शरारती तत्वों ने भी उठाया, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि चोटी काटने की कुछ घटनाओं में मास हिस्टीरिया के अलावा शरारती तत्वों, जो पीड़ित के करीबी ही होंगे, का भी हाथ हो। साथ ही बच्चों की शैतानी भी हो सकती है जो अपने बाल छोटे करवाना चाहते हों मगर घर वाले उसकी इजाजत न देते हों। ऐसे में उनके लिए सही मौका है खुद बाल काटने का।
मीडिया का व्यवहार भी है जिम्मेदार सनसनी के इस दौर में मीडिया कुछ भी अफवाह बिना जांच किए फैला देता है। भले ही वह नकली चावल, अंडे वगैरह की अफवाह हो या फिर नागिन के बार-बार डसने की। कई टीवी चैनल और अखबार ऐसी खबरें चलाते रहे हैं कि उसे 19 बार डस चुकी है नागिन, कुछ देर में उतर जाता है जहर। हिमाचल में भी ऐसा ही एक मामला सामने आया था। मगर मीडिया कॉमन सेंस का इस्तेमाल नहीं करता कि अगर सांप एक बार डसे तो पीड़ित मरता क्यों नहीं और फिर बार-बार उसी को क्यों डसता है। और तो और मीडिया वाले ये भी कहते हैं कि सांप उसी शख्स को दिखता है जिसे काटता है।
ऐसी खबरें छापने से पहले पत्रकार कॉमन सेंस इस्तेमाल नहीं करते
इसका साफ मतलब है कि पीड़ित को सांप नहीं काट रहा बल्कि वह वहम का शिकार है और वह खुद को नुकसान पहुंचाता है और मनगढ़ंत स्टोरी सुनाता है। यह उसका अपना वहम है।(इस खबर को यहां क्लिक करके पढ़ें) वहीं अगर मीडिया 10 दिनों तक देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे ही मानसिक रोगियों की कहानियां लगातार छापे तो पूरे देश में अचानक ऐसे मामलों की बाढ़ आ जाएगी। यह मास हिस्टीरिया बन जाएगा। अफसोस है कि कोई भी मीडिया आउटलेट जिम्मेदारी से इन घटनाओं की वैज्ञानिक वजहों पर बात नहीं कर रहा। मगर In Himachal हमेशा से अपने पाठकों को सूचना और मनोरंजन के साथ शिक्षित भी करने में यकीन रखता है।
क्या करना चाहिए?
बहरहाल, पहले तो यह मान लें कि चोटी काटने की घटनाएं मानव जनित हैं, न कि भूत प्रेत जनित। इसलिए वहम या डर को अपने ऊपर हावी न होने दें और अपने परिवार के सदस्यों को भी इस बारे में बताएं। और अगर किसी परिचित के यहां चोटी काटने की घटना होती है तो पहले देखें कि यह दावा करने वाले शख्य का व्यवहार कुछ दिनों से थोड़ा अलग तो नहीं है। या परिवार में किसी का व्यवहार अलग तो नहीं है। पुलिस के बजाय उसे मनोचिकित्सक के पास जरूर ले जाएं क्योंकि उस शख्स को मदद की जरूरत है। यह शर्म का मामला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का मामला है। इसे प्रतिष्ठा का विषय न बनाएं। मानसिक स्वास्थ्य जरूरी है। ठीक उसी तरह जैसे पेट या सिर में होने वाली समस्या को ठीक करना जरूरी है। यह हम सभी की जिम्मेदारी है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर हम दूसरों पर टिप्पणियां न करें और इसे गंभीरता से लें।
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ऊना।। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, हिमाचल प्रदेश के नेताओं की ज़ुबान से तीखे बयान निकलते जा रहे हैं। अब बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। हिंदी अखबार पंजाब केसरी की रिपोर्ट के मुताबिक सत्ती भाजयुमो की रैली में शब्दों की मर्यादा ही भूल गए।
अख़बार ने लिखा है, ‘ऊना में भाजयुमो की आक्रोश रैली के दौरान सत्ती ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से लेकर पूरे गांधी-नेहरू परिवार पर अशोभनीय टिप्पणी की। अपने जोशीले भाषण के दौरान सत्ती ने गांधी जी को धोती, टोपी और लंगोट वाला कहकर संबोधित किया।’
बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सत्ती (File Photo)
बताया जा रहा है कि परिवारवाद पर बात करते हुए सत्ती ने कहा कि उपराष्ट्रपति पद के लिए कांग्रेस को धोती, टोपी और लंगोटी वाले बापू के घर से ही उम्मीदवार मिला। उनके अलावा पूरे देश में कांग्रेस को कोई दूसरा उम्मीदवार नहीं मिल पाया।
खबर के मुताबिक सत्ती ने महात्मा गांधी के के अलावा पंडित जवाहर लाल नेहरू और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर भी टिप्पणी की। अखबार के मुताबिक उन्होंने कहा, ‘कौन सा बापू, कौन सा चाचा और कौन सी मां। ये सारा कुछ कांग्रेस ने अपने लिए बांट लिया है। कोई चाचा नेहरू बन गया, कोई बापू, कोई राष्ट्र मां और कोई राष्ट्र बेटा।’
गौरतलब है कि ऐसा बयान देने से ठीक एक दिन पहले सत्ती ने मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को असभ्य बताते हुए कहा था, ‘सीएम वीरभद्र को अब उम्र का भी लिहाज नहीं है और शायद अब उनका अपनी भाषा पर भी नियंत्रण नहीं है।’
शिमला।। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के ‘गद्दी’ वाले बयान पर बीजेपी ने पलटवार किया है। बीजेपी के प्रदेश सह मीडिया प्रभारी राकेश शर्मा ने कहा है कि वीरभद्र सिंह ने गद्दी समुदाय पर तंज कसा है। इससे पता चलता है कि वह गद्दी समुदाय का कितना सम्मान करते हैं।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री ने बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि ‘प्रेजिडेंट होने से क्या होता है, प्रेजिडेंट तो गद्दी सभा का भी होता है। इस पर राकेश ने कहा कि सीएम वीरभद्र सिंह की गद्दी समुदाय को लेकर टिप्पणी सम्मानजनक नहीं है।
राकेश ने कहा, ‘गद्दी एक सम्मानजनक शब्द है और भाषा, रहन सहन, रीति रिवाज तथा समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। सीएम का किसी समुदाय को टारगेट करना अशोभनीय है। मुख्यमंत्री को इसके लिए माफ़ी मांगनी चाहिए।’
उधर बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सिंह सत्ती ने भी पलटवार किया है। उन्होंने वीरभद्र को असभ्य बताते हुए कहा, ‘सीएम वीरभद्र को अब उम्र का भी लिहाज नहीं है और शायद अब उनका अपनी भाषा पर भी नियंत्रण नहीं है।(स्रोत)’
मनाली।। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मनाली में 13 साल की एक बच्ची हर साल रक्षाबंधन पर पेड़ को राखी बांधती है।
कल्पना का कोई भाई नहीं है। मगर इसका मतलब यह नहीं कि वह राखी का त्योहार नहीं मनातीं। वह पिछले 10 सालों से पेड़ पर राखी बांधती हैं।
कल्पना बताती हैं कि वे पेड़ों की देखभाल भी करती हैं। कल्पना के पिता किशन का कहना है कि उनकी बेटी 3 साल से ही पेड़ को राखी बांधती आई है।
वह अब तक 50 पौधे लगा चुकी है और उनकी देखरेख भी करती है। कल्पना पर्यावरण प्रेमी हैं और उन्हें कई अवॉर्ड भी मिल चुके हैं।
एमबीएम न्यूज, नाहन।। हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के नाहन में ढाबो मोहल्ले में एक लावारिस गाय पिछले दो दिनों से तड़प रही है। आसपास के लोग इस गाय की सेवा में लगे हुए हैं मगर कोई गोरक्षक इसकी मदद के लिए आगे नहीं आ रहा। हो सकता है कि दूर से ही गो तस्करी का पता लगा लेने वाले गोरक्षकों तक खबर न पहुंची हो।
गाव की सेवा में जुटे आसपास के लोगों इस बात का डर सता रहा है कि कहीं गाय की मौत न हो जाए। गाय अपने पांव पर खड़ी नहीं हो पा रही है। लिहाजा आसपास के लोग चाहकर भी इसे अस्पताल नहीं ले जा पा रहे।
यहां पर पिछले कुछ दिनों से मूसलाधार बारिश हो रही है। ऐसे में गाय की हालत बिगड़ रही है। ढाबो मोहल्ले में लावारिस गाय एमबीएम न्यूज नेटवर्क को पाठकों ने तड़प रही गाय की तस्वीरें भेजी हैं। सवाल इस बात पर उठ रहा है कि गाय का असल मालिक कौन है, जिसने दूध के लिए इस्तेमाल करने के बाद गाय को लावारिस छोड़ दिया है।
इस मामले में पशु अत्याचार निवारण समिति की सचिव डॉ. नीरू शबनम का कहना है कि सूचना मिली है। इसके बाद मौके पर ही गाय को उपचार दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के हालात में गाय को ट्रांसपोर्ट नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि गाय को मौके पर उपचार दिया जाता रहेगा।
(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)