शिमला।। विधायकों और पूर्व विधायकों को सस्ती दरों पर जमीन दिए जाने का मुद्दा हिमाचल प्रदेश में छाया हुआ है। एक तरफ जहां बीजेपी नेता प्रेम कुमार धूमल ने इस फैसले का विरोध किया है, सरकार के अंदर भी इसके खिलाफ स्वर उठने लगे हैं। सीपीएस नीरज भारती और परिवहन मंत्री जीएस बाली भी इस फैसले को गलत बता चुके हैं। मगर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कहा है कि जब गरीब और पात्र लोगों को जमीन दी जा सकती है तो विधायकों को क्यों नहीं।
मुख्यमंत्री ने कहा है कि विधायकों को जमीन पट्टे पर देने के लिए अभी केवल पात्र माना है, यह जरूरी नहीं कि सभी को जमीन दी जाए। उन्होंने कहा कि सभी विधायक जमीन नहीं लेते हैं। उन्होंने कहा कि बीजेपी को तो विरोध की राजनीति करने की आदत हो गई है। उधर मुख्यमंत्री के खास माने जाने वाले वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी ने भी सरकार के इस फैसले का समर्थन किया है।
इससे पहले नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल ने कहा था कि मौजूदा सरकार ने गरीब लोगों को 2 बिस्वा जमीन देने का ऐळान किया था मगर उन भूमिहीनों को अब तक जमीनें नहीं मिलीं, जबकि विधायकों और पूर्व विधायकों के लिए पट्टे पर जमीन देने का ऐलान किया है।
पालमपुर।। क्या हिमाचल प्रदेश में भी स्वास्थ्य माफिया है? स्वास्थ्य माफिया यानी मरीज़ों को डराकर, उनका फर्जी इलाज करके, उनसे पैसा एंठना। चौंकाने वाला मामला सामने आया है हिमाचल प्रदेश पालमपुर में। पूर्व सैनिक सूबेदार जगन्नाथ ठाकुर के साथ कुछ ऐसा हुआ, वह दिखाता है कि किस तरह से चिकित्सा के नाम पर लोगों को न सिर्फ ठगा जा रहा है बल्कि उनकी जान भी खतरे में डाली जा रही है। सेना में सेवाएं देते हुए समय बारूदी सुरंग फटने से दाई टांग खो चुके जगन्नाथ का दावा है कि ईसीएचएस होल्टा के डॉक्टरों ने उन्हें धोखे से पंजाब के एक निजी अस्पताल में भेजकर स्टेंट डलवा दिया। उनका दावा है कि इसकी जरूरत नहीं थी। ऐसे में उन्होंने पुलिस में इसकी शिकायत दर्ज करवाई है।
इस मामले में सूबेदार जगन्नाथ ठाकुर ने हिमाचल प्रदेश के पोर्टल ‘समाचार फर्स्ट’ से बात की है। उन्हें किन हालात का सामना करना पड़ा, उन्हीं की ज़ुबानी सुनिए:
जगन्नाथ बताते हैं कि वह सर्दी जुकाम का इलाज करवाने ईसीएचएस होल्टा गए थे, मगर डॉक्टर ने ईसीडी औक एक्सरे करवाया और कहा कि दिल की गंभीर समस्या है। इसके बाद उन्हें चंडीगढ़ के एक अस्पताल में भेजा गया। वहां बताया गया कि हालत गंभीर है और एंजियोग्रफी करनी होगी। एंजियोग्रफी के दौरान बेटे को कहा गया कि 70 फीसदी हार्ट में ब्लॉकेज है और स्टेंट डालना होगा। मजबूरी में इसके लिए बेटे ने पैसे भी दे दिए। मगर बाद में किसी डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि वह सामान्य थे और स्टेंट की जरूरत नहीं थी। यही नहीं, पहले वह ठीक थे मगर अब उन्हें दर्द रहने लगा है।
यह घटना दिखाती है कि कैसे कुछ लोग आम लोगों को जानकारी न होने का फायदा उठा सकते हैं। इसलिए ‘In Himachal’ की गुजारिश है कि आंख मूंदकर किसी एक डॉक्टर की सलाह पर घबराकर कदम उठाने से पहले तुरंत ही किसी अन्य डॉक्टर से भी मशविरा कर लें। इसे ‘सेकंड ऑपिनियन’ कहा जाता है और ऐसा करना ठीक रहता है।
इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने विधायकों और पूर्व विधायकों को सस्ती दरों पर लोन के साथ घर बनाने के लिए पट्टे पर जमीन उपलब्ध करवाने का फैसला किया है। मगर चुनाव करीब आते ही लाखों की सैलरी उठाने वाले विधायकों, जिनमें से ज्यादातर पहले ही करोड़पति हैं, को सस्ती दरों पर जमीन उपलब्ध करवाने का क्या मतलब बनता है?
जानिए, 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे में विधायकों ने अपनी संपत्ति का क्या ब्योरा दिया था। ध्यान देने की बात यह है कि यह जानकारी 5 साल पहले की है और अब तक संपत्ति और बढ़ गई होगी। साथ ही कुछ लोग जो 90 लाख के आसपास थे, उनकी संपत्ति भी बढ़कर करोड़ पार कर गई होगी।
10 करोड़ या इससे ज्यादा
बृज बिहारी लाल बुटेल (पालमपुर) – कांग्रेस- 169 करोड़+
बलबीर सिंह वर्मा (चौपाल) – निर्दलीय- 41 करोड़+
अनिल कुमार शर्मा (मंडी)- कांग्रेस- 29 करोड़+
वीरभद्र सिंह (शिमला ग्रामीण) – कांग्रेस- 34 करोड़+
जीएस बाली (नगरोटा बगवां) – कांग्रेस- 24 करोड़+
रवि ठाकुर (लाहौल स्पीति) – कांग्रेस- 16 करोड़+
राम कुमार (दून) – कांग्रेस- 33 करोड़+
5 करोड़ से 10 करोड़ रुपये के बीच
1. राजीव बिंदल (नाहन) – बीजेपी – 6 करोड़+ 2. सोहन लाल (सुंदरनगर) – कांग्रेस – 7 करोड़+ 3. विद्या स्टोक्स (ठियोग) – कांग्रेस – 8 करोड़+
4. महेश्वर सिंह (कुल्लू) – हिलोपा- 5 करोड़+ 5. अनिरुद्ध सिंह (कुसुम्पटी) – कांग्रेस- 7 करोड़+ 6. राकेश कालिया (गगरेट) – कांग्रेस – 7 करोड़+ 7. सुजान सिंह पठानिया (फतेहपुर) – कांग्रेस – 6 करोड़+ 8. किरनेश जंग (पावंटा साहिब)- निर्दलीय – 5 करोड़+
1 करोड़ से 5 करोड़ रुपये के बीच
1. प्रकाश (बल्ह) – कांग्रेस – 1 करोड़+
2. ठाकुर सिंह भरमौरी – कांग्रेस- 3 करोड़+
3. बंबर ठाकुर (बिलासपुर) – कांग्रेस – 1 करोड़+
4. बालकृष्ण चौहान (चंबा) – बीजेपी- 1 करोड़+
5. आशा कुमारी (डल्हौजी) – कांग्रेस – 2 करोड़+
6. कौल सिंह (द्रंग) – कांग्रेस – 3 करोड़+
7. महेंद्र सिंह (धर्मपुर) – बीजेपी – 1 करोड़+
8. सुधीर शर्मा (धर्मशाला)- कांग्रेस- 2 करोड़+
9. प्रेम कुमार धूमल (हमीरपुर)- बीजेपी- 2 करोड़+
10. मुकेश कुमार अग्निहोत्री (हरोली) – कांग्रेस- 1 करोड़+
इन हिमाचल डेस्क।। दिन 7 अप्रैल, 2016. हिमाचल प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के विधायक शांत बैठे थे। यह नजारा हैरान करने वाला था, क्योंकि बीजेपी के नेता जनता के मुद्दे उठाने और ज़रूरी विधेयकों पर चर्चा करने के बजाय आए दिन सदन से वॉकआउट कर जाते थे। मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगने से उन्हें फुर्सत नहीं होती थी। मगर आज वे शरीफ बच्चों की तरह विधानसभा में बैठे थे। न तो शोर मचा रहे थे, न सीएम का इस्तीफ़ा मांग रहे थे। आज उन्हें सत्ता पक्ष महान और मुख्यमंत्री मसीहा नज़र आ रहा था।
एक बिल पेश हुआ और ध्वनिमत से पारित हो गया। सबके चेहरे खिले हुए थे। मगर यह प्रदेश या जनता के भविष्य को नई दिशा देने वाला बिल नहीं था। यह विधायकों की सैलरी डबल और सुविधाएं बढ़ाने वाला बिल था। आज जब हिमाचल प्रदेश की जनता जाग चुकी है और मौजूदा सरकार द्वारा विधायकों को पट्टे पर जमीन देने के फैसले का विरोध कर रही है, तो चुना नजदीक देखकर विपक्ष नेता प्रेम कुमार धूमल कह रहे हैं कि सरकार ने विधायकों की छवि खराब कर दी है इस फैसले से। मगर आप देखें, जब सरकार ने विधायकों की सैलरी डबल कर दी थी, तब उनके बोल क्या थे-
उस वक्त सरकार ने विधायकों के वेतन और भत्ते को 1.32 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.10 लाख रुपये प्रतिमाह कर दिया था, जबकि दैनिक भत्ता 1500 रुपये से बढ़ाकर 1800 रुपये कर दिया गया था। रेल या हवाई मार्ग से मुफ्त यात्रा की सीमा दो लाख रुपये से बढ़ाकर प्रति वर्ष ढाई लाख रुपये कर दी गई थी। वेतन और भत्तों में वृद्धि से सरकारी खजाने पर 16.45 करोड़ रुपये का वार्षिक वित्तीय बोझ पड़ा है। मगर अब देखें, चुनाव नजदीक आते देख उनके स्वर कैसे बदल गए हैं और जनता के हित नजर आ रहे हैं (वीडियो समाचार फर्स्ट से साभार)–
2016 में सैलरी बढ़ाने का विरोध नहीं हुआ, मगर चुनाव करीब आते ही इन्हें सरकार का कदम गलत लगने लगा। शायद नेताओं को लगता है कि वे जनता को बेवकूफ बना लेंगे। विपक्ष में रहकर टाइमपास करने वाले नेता आज बिना कुछ किए सत्ता में आने का इंतजार लगाए बैठे हैं। इन्हें लगता है कि अब तो अपना नंबर आने ही वाला है। मगर यह मत सोचिए कि हालात बदल जाएंगे। पक्ष बदल जाएंगे, मगर सिलसिला यही रहेगा।अपनी बारी आएगी तो ये लोग सारी बातें भुलाकर एक हो जाएंगे। जनता को कौन पूछेगा?
बीजेपी भले कांग्रेस के 5 साल के शासन का हिसाब मांगने के लिए अभियान चला रही है, मगर प्रदेश की जनता न सिर्फ सरकार, बल्कि विपक्ष से भी पांच साल का हिसाब मांगेगी।
हिमाचल प्रदेश सरकार ने खुली छूट दे दी है, अपने आसपास कहीं पर भी सरकारी जमीन देखें, उसपर तुरंत कब्जा कर लें। ज्यादा नहीं तो कम से कम 5 बीघा तो कर ही लें। अगर कोई आपत्ति करे तो कोर्ट चले जाएं और फिर दुआ करें कि फिर से कांग्रेस की सरकार आ जाए या फिर अगली जो भी सरकार है, वह भी मौजूदा सरकार की तरह अवैध कब्जों को नियमित कर दे।
आज हिमाचल प्रदेश के 60 लाख लोग, जो मेहनत की कमाई खाते हैं, ठगे हुए महसूस कर रहे हैं। पछतावा हो रहा है कि हमने भी क्यों नहीं सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। किया होता तो आज 5 बीघा जमीन के मालिक होते। जी हां, हिमाचल की काबिल सरकार ने 5 बीघा तक के अवैध कब्जों को नियमित कर दिया है। यानी 5 बीघा तक कब्जा करने वालों को उस कब्जाई हुई जमीन का मालिकाना हक मिल जाएगा।
सरकार ने साफ संदेश दिया है कि भैया, आगे भी आप सरकारी जमीन पर कब्जे कर सकते हैं। और नहीं तो क्या? अगर कोई सरकार किसी गैरकानूनी हरकत को कानूनी बना देती है तो इसका यही संदेश जाता है कि आप फिर से वैसा करो।
नैतिकता स्वभाव में होती है। जो एक बार बेईमान होता है वो हमेशा बेईमान रहता है। जो आज 5 बीघा जमीन कब्जाकर बैठा है और उसका वह कब्जा कानूनी हो गया, कागजों के हेरफेर से बाकी की जमीन को वह अपने परिवार के दूसरे सदस्य के नाम कर देगा और इस तरह तरह से एक ही परिवार बीसियों बीघा जमीन का मालिक हो जाएगा।
यही नहीं, जो लोग कानून के डर से घबराए बैठे थे कि यार कैसे गलत काम करें। उन्हें लगेगा कि यार हमें भी कब्जा कर लेना चाहिए था। और अब वो भी खुलकर प्रोत्साहित होंगे सरकारी जमीन पर कब्जा करने के लिए। लूट मचेगी। यह प्रोत्साहन किसी और ने नहीं, सरकार ने दिया है। बहानेबाजी की गई आम और गरीब जनता के मकानों के नाम पर, मगर फायदा पहुंचाया गया अपराधियों को।
क्या आप जानते हैं कि अवैध जमीन के सबसे ज्यादा मामले कहां सामने आए हैं? राज्य सरकार ने इसी साल मार्च में हाई कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दी थी। अतिक्रमण के मामलों में शिमला जिला सबसे आगे था। यहां 3280 मामले सामने आए थे। इसके बाद कुल्लू में 2392, कांगड़ा में 1757, मंडी में 1218, चंबा जिला में 644, सिरमौर में 540 और सोलन में 120 मामले ऐसे पकड़े गए हैं, जिनमें लोगों ने 10 बीघा से कम भूमि पर अतिक्रमण किया हुआ है।
यही नहीं, दस बीघा से अधिक वन भूमि पर कब्जे के 2526 एफआईआर दर्ज हुए थे। इसके अलावा 2522 मामले न्यायिक दंडाधिकारियों के समक्ष पेश कर दिए गए थे। स्टेटस रिपोर्ट के मुताबिक, 933 मामलों में 867 हेक्टेयर से अधिक भूमि से कब्जा हटाया जा चुका था।
रोहड़ू के डीएफओ ने ही कहा था कि अकेले रोहड़ू में 10 बीघा से कम वन भूमि पर कब्जा करने वाले 1481 मामलों में बेदखली आदेश पारित किए जा चुके हैं और 10 बीघा से अधिक 418 मामलों में से 399 का निपटारा कर लिया गया है।
यानी आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितने बड़े स्तर पर अवैध कब्जे हुए हैं। दरअसल चार साल पहले ऊपरी शिमला के एक व्यक्ति ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नाम पत्र लिखकर बताया था कि कई लोगों ने वन भूमि पर कब्जा कर सेब के बागीचे विकसित कर लिए हैं। हाईकोर्ट ने इस पत्र पर संज्ञान लेते हुए सरकार से एक-एक इंच भूमि पर से कब्जा हटाने के लिए कहा था।
क्या अब भी आपको समझ नहीं आया कि यह खेल किसके लिए हो रहा है? मुझे तो लगता है कि यह खेल सीधे तौर पर उन लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए हो रहा है जिन्होंने जंगलों को काटकर, हरे-भरे देवदार को कत्ल करके सेब के पेड़ लगा दिए हैं। पर्यावरण, प्रकृति और कानून से खिलवाड़ करने वाले लोगों को सजा देने के बजाय सरकार संरक्षण दे रही है और वह भी चुनाव से ठीक पहले। यह बात ध्यान देने लायक है कि वीरभद्र सिंह का जनाधार ऐपल बेल्ट में ज्यादा है। और इसलिए उनकी बेचैनी और सरकार के इस मर्यादाहीन कदम की वजह समझना भी मुश्किल नहीं है।
हैरानी तो यह है कि पूरी की पूरी सरकार, जिसमें न सिर्फ चुने हुए प्रतिनिधि बल्कि अफसर शामिल हैं, उन्हें भी कुछ गलत नहीं लगा। खैर, जब प्रदेश का मुखिया ही स्कूटर पर सेब ढोने के आरोपों में घिरा हो, उससे क्या उम्मीद की जा सकती है?
निजी हित में इस प्रदेश का बंटाधार करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे ये नेता लोग। सही कहा है, एक सड़ा हुआ सेब पूरी पेटी को खराब कर सकता है। ऐसे मामलों में विपक्ष की चुप्पी भी शर्मनाक है। वोटों की राजनीति हम सभी को गर्त में ले जाएगी। अगर हम इसके खिलाफ आज आवाज नहीं उठाएंगे तो कोई फायदा नहीं। नैतिकता का झंडा उठाने से कुछ नहीं होगा, आवाज़ भी उठानी होगी।
शिमला।। प्रदेश की राजधानी शिमला में सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के चलते हालात खराब हो चले हैं। हड़ताल को सात दिए हो गए हैं और कई इलाकों में कूड़े के ढेर लगे हुए हैं। आम जनता कुछ इलाकों में खुद ही सफाई का जिम्मा संभाले हुए है। इस बीच सवाल बीजेपी के कार्यकर्ताओं पर खड़े किए जा रहे हैं कि आखिर स्वच्छ भारत का नारा देने वाले नेता और कार्यकर्ता कहां चले गए हैं। लोगों का प्रश्न है कि वैसे तो आए दिन बीजेपी के छोटे-बड़े नेता झाड़ू लिए सफाई अभियान वाली तस्वीरें खिंचवाते हैं, मगर अभी जरूरत है तो वे कहां हैं।
रविवार को जब प्रधानमंत्री मोदी का जन्मदिन था, उस वक्त बीजेपी के कार्यकर्ता फिर से सक्रिय हो उठे। मेयर, डेप्युटी मेयर समेत बीजेपी के पार्षद आए और सफाई करते नजर आए। आरोप हैं कि ज्यादातर कार्यकर्ता सिर्फ फोटो खिंचवाने के लिए सफाई करते नजर आए। वह भी गिने-चुने वॉर्डों में ही यह अभियान चलाया गया।
ऐसे में लोग प्रश्न कर रहे हैं कि क्या ऐसे अभियान कुछ खास दिन या सिर्फ दिखावे के लिए चलाए जाते हैं। इस बीच शहर के इलाकों में लोगों ने खुद ही सफाई अभियान शुरू कर दिया है। छावनी परिषद जतोग और नेरी पंचायत (मशोबरा) में लोग खुद ही सफाई करते दिखे।
एमबीएम न्यूज नेटवर्क, नाहन।। दिन शुक्रवार, वक्त करीब शाम के साढ़े चार बजे… नाहन के बाजार में रोज की तरह ही हलचल थी। पिछले दिनों ही बिलासपुर से यहां ट्रांसफर होकर आए एएसआई पदम देव वर्मा हलवाई की दुकान में बैठे हुए थे। इसी दौरान दुकान से एक लड़के ने सामने से आ रही गाय की तरफ एक रोटी डाल दी। पीछे से एक और गाय इस रोटी की तरफ लपकी। एक बुजुर्ग बीच में खड़े थे। पूरी आशंका थी की तेजी से दौड़कर रोटी की तरफ आती गाय और पहले से पास में खड़ी गाय के बीच में फंसकर बुजुर्ग जख्मी हो सकते हैं और कुछ अनहोनी तक हो सकती थी।
इससे पहले कि कोई कुछ कर पाता, एएसआई पदम देव झटके से उठे और बुजुर्ग से लिपटकर उन्हें सुरक्षित कर लिया। उधर तेजी से आती गाय के खुर से पदम देव के पैर का अंगूठा कुचल गया। गाय ने एएसआई को पीछे धकेलने की कोशिश भी की, मगर गनीमत थी कि गाय के सींग नहीं थे तो नुकसान कम हुआ। अगर बुजुर्ग को या पदम देव को गाय टक्कर मारती तो नुकसान गंभीर हो सकता था।
Image: MBM News Network
चेकअप में पता चला है कि एएसआई के पांव में फ्रैक्चर हुआ है। बाजार में मौजूद कई लोगों ने यह दृश्य देखा। पदम बताते हैं कि लोगों ने बाद में पास आकर उन्हें सराहा तो काफी उत्साह बढ़ा।
जानकारी यह भी है कि एएसआई पदम देव वर्मा ने अपनी बिलासपुर में डयूटी के दौरान एक गोशाला भी चलाई थी।
तस्वीर सांकेतिक है।
इस गोशाला में 35 से 40 बेसहारा गऊओं को रखकर देखभाल की जाती थी। वह इस संस्था के खुद अध्यक्ष हैं। इसके अलावा एएसआई पदम देव स्कूलों में जाकर छात्रों को योग की शिक्षा भी देते हैं।
(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)
एमबीएम न्यूज नेटवर्क, शिमला।। प्रदेश की राजधानी के मुख्य रेलवे स्टेशन के पास फागली क्षेत्र में कल देर शाम गली-सड़ी लाश मिलने से इलाके में सनसनी फैल गई। शव की हालत इतनी बुरी थी कि उसके टुकड़े कर दिए गए थे। शव की हालत से लगता था कि यह काफी दिनों से वहां पड़ा था।
घटनास्थल पर इतनी बदबू आ रही थी कि लोगों का वहां से गुजरना दूभर हो गया था। सूचना मिलते ही थाना बालूगंज पुलिस ने मौके पर पहुंच कर शव को कब्जे में लेकर आगे की कार्रवाई शुरु कर दी है।
वी.पी. शर्मा।। मई 2014 में जब मोदी के नेतृत्व में भगवा सैलाब आया तो दिल्ली के पूरे प्रशासनिक अमले की सूरत बदल गई। सरकारी दायरे के पुराने लोगों का यह पहला सत्ता परिवर्तन नहीं था, मगर बहुत से अधिकारी, कर्मचारी, सलाहकार और नीति निर्माताओं के लिए सरकार बदलाव लेकर आई।
इस बीच एक और ऐतिहासिक चीज़ हुई, जो पहले नहीं हुई थी। डिजिटल युग में भारत के प्रधानमंत्री सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों वगैरह को ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से जनता के सामने रख रहे थे। भारत के इतिहास में पहली बार नई सरकार बनने पर सोशल मीडिया अकाउंट्स का भी हस्तांतरण होना था।
मगर बिना वजह के विवाद को टालते हुए आराम से ट्विटर अकाउंट और फेसबुक अकाउंट, क्रमश @PMOIndia और PMO India को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्रांसफर कर दिया गया।
सरकार के पैसे से चलने वाले आधिकारिक खातों को सरकार बदलने पर नए पदाधिकारी को ट्रांसफर किया जाता है, जैसे मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के मामले में हुआ।
इससे अकाउंट तो ट्रांसफर हुए ही, नई और पुरानी सरकार के बीच फॉलोअर, ब्रैंड वैल्यू और नेटवर्क पावर भी ट्रांसफर हुई। इससे एक तरह से सरकारी पदाधिकारियों द्वारा चलाए जाने वाले अकाउंटों को लेकर एक अलिखित नियम बन गया। नियम यह कि सोशल मीडिया अकाउंट पद पर निर्भर करेंगे और उस पद पर नए आने वाले व्यक्ति के लिए ट्रांसफर होंगे।
इससे राजनेताओं या अधिकारियों के निजी सोशल मीडिया अकाउंट्स और उनके पद से जुड़े आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट्स का फर्क भी स्थापित हो गया। ऐसा करना इसलिए भी जरूरी था ताकि टैक्स देने वालों के पैसे को अपने राजनीतिक अजेंडे के लिए इस्तेमाल न किया जा सके। यानी आधिकारिक अकाउँट्स को सिर्फ सरकार की नीति और जनता के बीच विभिन्न तरह की जागरूकता फैलाने को लेकर ही इस्तेमाल किया जा सकता है। जनता के टैक्स से आई रकम का सही इस्तेमाल करने के लिए ऐसा जरूरी भी है।
भारत समेत पूरी दुनिया में हम देखते हैं कि राजनेता सत्ता में आने पर भी अलग पर्सनल सोशल मीडिया अकाउंट रखते हैं (उदाहरण के लिए प्रधानमंत्री मोदी का एक अकाउंट Narendra Modi नाम से है जबकि उनके कार्यालय का आधिकारिक अकाउंट PMO India के नाम से है)। सरकारी अकाउंट से अलग यह पर्सनल अकाउंट वह खुद अपने पैसे से चलाते हैं। भारत में कई सारे मुख्यमंत्री और मंत्री आज प्रधानमंत्री द्वारा इसी लाइन पर चले हैं। वे अपने विभागों के ऑफिशल सोशल मीडिया अकाउंट के साथ-साथ अपना निजी सोशल मीडिया अकाउंट भी चला रहे हैं।
वैसे भी नैतिक, सैद्धांतिक और कानूनी बातों को ताक पर रखते हुए कुछ लोग चालाकी भी बरत रहे हैं। जब ज्यादातर नेताओं ने निजी और सरकारी सोशल मीडिया अकाउंट में भेद रखा है, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री ने ऐसा नहीं किया है। वीरभद्र और उनके दायरे के लोग पारदर्शिता के इन अलिखित सिद्धांतों की खिल्ली उड़ा रहे हैं। जनता के पैसे को वह अपने प्रमोशन और ब्रैंडिंग में इस्तेमाल कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं का प्रचार भी इसी पेज से हो रहा है और मुख्यमंत्री का विज्ञापन भी इसी पेज से हो रहा है।
पहाड़ी राज्य के मुखिया ट्विटर और फेसबुक पर “virbhadrasingh” और “Virbhadra Singh” नाम से हैं। दोनों मीडिया अकाउंट पिछले दिनों गलत वजह से चर्चा में रहे हैं। पिछले कुछ महीनों से ये तथाकथित ‘ऑफिशल’ अकाउंट, जो कि लगता है कि सोशल मीडिया एक्सपर्ट्स (पेज पर दी जाने वाले जानकारियों को देखकर अनाड़ी करना ज्यादा सही होगा) की एक टीम इसे मैनेज करती है और हर महीने सरकारी खजाने से सोशल मीडिया वालों को करीब ढाई लाख रुपये दिए जाते हैं।
जब इन लोगों जांच के अधीन चल रहे मामले के दौरान कुछ बेकसूर लोगों की तस्वीरें रेपिस्ट बताकर अपलोड कर दी थी, तब ये लोग चर्चा में आए थे। मगर लोगों की निजता के अधिकार का उल्लंघन करने के बावजूद मुख्यमंत्री या उनके पेज को संभावने वाोलं के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई, जबकि आईटी ऐक्ट के सेक्शन 66E के तहत ऐसा करने पर 3 साल की सजा हो सकती है। इससे पता चलता है कि जनता के टैक्स के पैसे से पेमेंट लेने वाले ये पेज मैनेजर कितने काबिल हैं और प्रदेश की पुलिस कितनी स्वतंत्र है।
वीरभद्र सिंह के प्रचार के लिए जनता का पैसा क्यों खर्च हो रहा है?
हैरत की बात यह है कि ट्विटर और फेसबुक पर वीरभद्र सिंह जिन दो अकाउँट्स को चलाते हैं, वे प्राइवेट अकाउंट हैं न कि सरकारी अकाउँट। अगर वे सरकारी अकाउंट होते तो उनका नाम ‘Chief Ministers Office Himachal Pradesh” और “CMOHP” होना चाहिए था। मगर सर्च करने पर ऐसे कोई अकाउंट नहीं मिलते। मुख्यमंत्री और उनके कार्यालय द्वारा जारी जानकारियां मुख्यमंत्री के मौजूदा प्राइवेट अकाउंट्स पर ही दी जाती है।
ऐसे में इस पेज को लेकर सैद्धांतिक रूप से सवाल इसलिए भी खड़े होते हैं क्योंकि सरकारी खजाने के पैसे को मुख्यमंत्री के निजी प्रचार अभियान में खर्च किया जा रहा है। इस ढांचे में कोई ऐसा पैमाना नहीं है जिसके आधार पर सरकार के आधिकारिक संदेशों और निजी राजनीति प्रचार के बीच फर्क किया जा सके।
अगर मौजूदा खातों का उद्देश्य सरकार के पैसे से वीरभद्र सिंह के व्यक्तित्व और उनके बेटे की मार्केटिंग करना है तो मुख्यमंत्री और उनकी टीम न सिर्फ नैतिकता को ताक पर रख रही है, बल्कि आईपीसी के सेक्शन 409 का उळ्लंघन भी कर रही है, जिसके तहत उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
अगर सरकार के पैसे से इस पेज को चलाया जा रहा है तो मुख्यमंत्री के बेटे का प्रमोशन क्यों?
जो प्रदेश पहले से ही भारी-भरकम कर्ज में डूबा हुआ हो, वहां अनुभवी नेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे फिजूलखर्ची पर रोक लगाएं। मगर मुख्यमंत्री और उनके स्टाफ के सदस्य न जाने किस नशे में चूर होकर हिमाचलियों के पैसे पर डाका डालना चाह रहे हैं। पहले से ही खाली होने की कगार पर पहुंचे वित्तकोष से हर साल 30 लाख रुपये निजी विज्ञापन में खर्च करना नैतिकता में इतनी ज्यादा गिरावट है जो भोले-भाले पहाड़ियों ने शायद कभी न देखी हो।
राज्य सरकार के प्रति लोगों के खोए हुए भरोसे को फिर से हासिल करना बहुत मुश्किल काम होगा। शुरुआत ऐसे करनी होगी कि सीएम को यह स्वीकार करना चाहिए कि ये अकाउंट उनके निजी अकाउंट हैं। इसके बाद मुख्यमंत्री को वह सारी रकम सरकारी खजाने में जमा करवानी चाहिए, जो इन सोशल मीडिया अकाउंट्स पर खर्च हुई है। और यह रकम उन्हें अपनी कमाई से भरनी चाहिए।
(एक लॉ फर्म से जुड़े वी.पी. शर्मा विभिन्न समाचार पत्रों के लिए लेख लिखते हैं। उनके लेख राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक मुद्दों पर होते हैं।)
सैर (सायर) पर हार्दिक शुभकामनाएं। खुद जानिए, और शेयर करके दूसरों को भी बताइए कि क्यों मनाई जाती है सैर:
आदर्श राठौर।। आज हिमाचल प्रदेश के मंडी, कांगड़ा, बिलासपुर जिलों समेत हिमाचस प्रदेश के कई इलाकों में ‘सैर’ या ‘सायर’ मनाई जा रही है। यह पर्व हर साल सितंबर महीने में मनाया जाता है। इस दिन सुबह-सुबह ताजा फसल के आटे से रोट बनाए जाते हैं, साथ ही देवताओं को नई फसलों और फलों वगैरह का भोग लगाया जाता है।
पहले इस दिन अखरोट (walnut) से निशाना लगाने वाला खेल भी खेला करते थे। कुछ गांवों में यह परंपरा बची हुई है। इसमें खिलाड़ी जमीन पर बिखरे अखरोटों को दूर से निशाना लगाते हैं। अगर निशाना सही लगे तो अखरोट निशाना लगाने वाले के होते हैं। इस तरह यह खेल बच्चों, बूढ़े और नौजवानों में खासा लोकप्रिय है।
इसी दिन रक्षाबंधन के दिन पहनी गई राखी को भी उतारा जाता है। अखरोट सिर्फ बांटे ही नहीं जाते, इनका खेल भी खेला जाता है। अखरोट सिर्फ बांटे ही नहीं जाते, इनका खेल भी खेला जाता है। मान्यताओं के आधार पर देखें तो आज भादो (भाद्रपद) महीने का भी अंत होता है। भादो के दौरान देवी-देवता बुरी शक्तियों से युद्ध लड़ने देवालयों से चले जाते हैं और सायर वाले दिन लौटते हैं। इस दिन कई ग्रामीण क्षेत्रों के देवालयों में देवी-देवता के गुर खेल के माध्यम से लोगों को देवताओं और बुरी शक्तियों के बीच हुए युद्ध का हाल भी बताते हैं।
वैसे इस त्योहार को मनाए जाने की भी अपनी वजह है। देखा जाए तो यह बरसात का आखिरी दौर है। कई साल पहले भारी बारिश की वजह से लोगों को तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता था। बरसात में कई संक्रामक बीमारियां फैल जाया करती थीं, जिससे कई लोगों को इलाज न मिल पाने की वजह से अपनी जान गंवानी पड़ती थी। कई बार भारी बारिश, बाढ़, बिजलनी गिरने से भी तबाही होती थी। न सिर्फ जान-मान का भारी नुकसान होता था, बल्कि फसलें भी तबाह हो जाया करती थीं। ऐसे में अगर सब कुछ सही से निपटे, तो बरसात के खत्म होने पर लोग ईश्वर का शुक्रिया अदा करते थे कि कोई अनहोनी नहीं हुई। देवताओं को नई फसल जैसे कि धान की बाली, भुट्टा (गुल्लु), खट्टा (सिट्रस), ककड़ी वगैरह का भोग लगाया जाता था। आज भी यह परंपरा जारी है।
साथ ही लोग बारिश की वजह से पहले कहीं जा नहीं पाते थे, ऐसे में इस दिन वे अपने संगे-संबंधियों से मुलाकात करने घर से निकलते थे। इस तरह से सैर पर निकलने की वजह से ही इसे सैर कहा जाना लगा, जो कुछ इलाकों में अपभ्रंस होकर सायर हो गया। संबंधियों और बड़े-बुजुर्गों से मिलने जाने की परंपरा को द्रुब देना कहा जाता है। इस दौरान द्रुब (दूब) देकर बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है। द्रुब देने वाला व्यक्ति अपने हाथ में पांच या सात अखरोट और दूब लेता है। इन्हें बुजुर्गों के हाथ में देकर उनके पांव छूए जाते हैं और बुजुर्ग भी दूब अपने कान में लगाकर आशीर्वाद देते हैं। अगर कोई सायर के पर्व पर बड़े बुजुर्गों को द्रुब न दे तो इसका बुरा माना जाता है। यहां तक कि छोटे-मोटे मन मुटाव भी द्रुब देने से मिट जाते हैं। तो आपको भी सैर मुबारक हो। आने वाला साल आपके लिए संपन्नता और अच्छा स्वास्थ्य लाए।
(लेखक मूलत: मंडी जिले के जोगिंदर नगर से हैं और दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप में वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके फेसबुक पेज से आभार सहित लिया गया है।)