3 अक्टूबर को एम्स का शिलान्यास करेंगे प्रधानमंत्री मोदी

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित एम्स का शिलान्यास होने जा रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से जानकारी दी है कि प्रधानमंत्री 3 अक्टूबर को शिलान्यास करेंगे। नड्डा ने लिखा है कि यह देवभूमि के लिए सौगात है और यह पहाड़ी राज्यों के लिए वरदान साबित होगा। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री का आभार भी व्यक्त किया है।

 

इसके साथ ही कांग्रेस के उन आरोपों को को भी बल मिल गया है कि केंद्र सरकार जानबूझकर एम्स का शिलान्यास का काम लटका रही है ताकि उसका शिलान्यास चुनाव से ठीक पहले करके क्रेडिट लिया जा सके। गौरतलब है कि पिछले कुछ समय तक जेपी नड्डा खुद कह रहे थे कि एम्स कहां खुलेगा, यह निश्चित नहीं हुआ है। प्रदेश सरकार एक साल से भी ज्यादा वक्त से कह रही थी कि जमीन दी जा चुकी है, मगर नड्डा इस मामले को लेकर शामोशी बरत रहे थे कि एम्स का शिलान्यास क्यों नहीं हो पा रहा।

 

इस संबंध ने इन हिमाचल ने प्रश्न उठाया था तो उसके बाद नड्डा ने कहा था कि इस मामले में कुछ टेक्निकैलिटी है, जिसमें मैं जाना नहीं चाहता। फिर उन्होंने इसी साल बयान दिया कि चार राज्यों ने एम्स के लिए जमीन नहीं दी है, जिनमें हिमाचल भी शामिल है। फिर नड्डा ने ठीक एक महीना पहले कहा कि अभी यही तय नहीं है कि एम्स कहां बनेगा(पढ़ें)। इस ढील को लेकर बीजेपी सांसद अनुराग ठाकुर ने केंद्रीय मंत्री और राज्य सरकार को चिट्ठी लिखकर सवाल भी उठाए थे (पढ़ें)। मगर एक महीने में ऐसा क्या हो गया कि सारी चीजें सही हो गईं और वह भी इलेक्शन से ठीक पहले।

भारत में इलेक्शन से ठीक पहले काम करने की आदत रही है राजनेताओं को। बड़े स्तर क्या, छोटे स्तर पर भी सा ही होता है। सड़कें चुनाव से पहले पक्की होती हैं, प्रॉजेक्टों या कार्यालयों उद्घाटन और लोकार्पण  चुनाव से ठीक पहले होते हैं ताकि जनता को याद रहे कि ये काम इस सरकार ने करवाया है। कहीं न कहीं एम्स भी इसी तरह की राजनीति की भेंट चढ़ा और शिलान्यास देर से हुआ।

 

ऐसे बड़े प्रॉजेक्टों में बजट का प्रावधान होने पर जो भी तकनीकी अड़चने हों, उन्हें तुरंत निपटाया जान चाहिए। क्योंकि इन्हें बनने में वैसे भी देर होती है। समय पर तो भारत में वैसे ही काम पूरे नहीं होते। इसलिए शिलान्यास पहले होता तो इसके उद्घाटन में भी जल्दी होती, जिसका फायदा जनता को होता। मगर नेताओं के लिए शायद राजनीति जरूरी है।

पुलिस की लापरवाही से दागदार हुआ पवित्र रिश्ता: हाई कोर्ट

शिमला।। अपनी 2 साल की बच्ची के रेप के आरोप में जेल में बंद चंबा के एक शख्स को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने निर्दोष बताते हुए रिहा करने के आदेश दिए हैं। इससे पहले निचली अदालत ने आरोपी को दोषी मानते हुए 10 साल के कारावास की सजा सुनाई थी। मगर हाई कोर्ट ने पाया कि न सिर्फ पुलिस ने बल्कि ट्रायल कोर्ट ने भी मामले में तथ्यों को नहीं परखा। हाई कोर्ट ने कहा कि इस लापरवाही की वजह से निर्दोष पिता के पवित्र रिश्ते पर सवाल खड़ा हो गया। (कवर इमेज प्रतीकात्मक है)

 

हाई कोर्ट ने पाया कि इस मामले में शिकायत करने वाली बच्ची की मां ने अपने पति को झूठे केस में फंसा दिया और पुलिस ने भी उसका साथ दिया तथा बारीकियों की जांच करने की जहमत नहीं उठाई। कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने यह नहीं देखा कि शिकायतकर्ता अपने पति से अलग क्यों रह रही थी और उसने अपने पति के परिजनों पर भी यौन शोषण की झूठी शिकायतें करवाई थीं। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों मे पुलिस, अभियोजन पक्ष और जज को कानून के सिद्धांतों का पालन करेंगे, ऐसी उम्मीद की जाती है।

अदालत ने पिता को रिहा करने के आदेश दिए हैं। (तस्वीर प्रतीकात्मक है)

पुलिस पर सवाल उठाते हुए कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने केवल शिकायतकर्ता की बातों पर विश्वास किया और निचली अदालत ने भी महत्वपूर्ण सवालों की अनदेखी करके ऐसे मामले में बेकसूर को सजा सुना दी, जिसमें कोई सबूत ही नहीं थे।

हिमाचल सरकार फिर लेगी 700 करोड़ रुपये का कर्ज

शिमला।। हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार चुनावी साल में चौथी बार कर्ज लेने जा रही है। पहले ही भारी-भरकम कर्ज में डूबी सरकार अब 700 करोड़ रुपये का कर्ज लेगी। सरकार ने पिछले तीन महीनों में ही 2000 करोड़ रुपये का कर्ज लिया है। जुलाई में 500 करोड़, अगस्त में 800 करोड़ रुपये और अब सितंबर में 700 करोड़ का कर्ज लिया जाएगा। इस तरह से हिमाचल प्रदेश पर अब कुल अनुमानित कर्ज 43 हज़ार करोड़ रुपये (440000000000) से ज्यादा होने जा रहा है।

 

खास बात यह है कि सरकार अपने खर्च काबू नहीं कर पा रही है, चुनावी साल में घोषणाओं पर घोषणाएं कर रही है। ध्यान यह भी देना है कि इतना सारा कर्ज सरकार कैसे चुकाएगी, इसकी भी कोई ठोस योजना नजर नहीं आ रही है। एक तरफ तो सरकार अपने चहेते कारोबारियों की देनदारी माफ कर रही है, दूसरी तरफ कर्ज के आवेदन कर रही है।

 

हिमाचल प्रदेश सरकार की कमाई कम है और खर्च ज्यादा हैं। अब आमदनी के नए तरीके ढूंढने के बजाय सरकारें यहां पर लोन लेने पर फोकस करती रही हैं। ऐसा नहीं है कि मौजूदा कांग्रेस सरकार ही कर्ज ले रही है। बीजेपी सरकार के दौरान भी कर्ज पर कर्ज लिए गए थे। आज देखें तो हिमाचल के हर व्यक्ति के ऊपर अगर 57 हज़ार रुपये (लगभग) कर्ज है तो 2011-12 (जब बीजेपी सरकार थी) यह कर्ज लगभग 40 हज़ार रुपये प्रतिव्यक्ति था। अब प्रतिव्यक्ति यह कर्ज आपको सिर्फ 10 हज़ार रुपये ही ज्यादा लग सकता है मगर कुल मिलाकर पूरे प्रदेश के लिए अब यह बोझ बन चुका है। यानी सरकार का कार्यकाल शुरू होने के वक्त प्रदेश पर जितना कर्ज था, आज वह कर्ज 40 प्रतिशत बढ़ गया है।

 

ध्यान देने की बात यह भी है कि इस लोन पर सरकार को ब्याज भी देना पड़ता है। मगर पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश सरकार ने अपने चहेते कारोबारियों का टैक्स माफ कर दिया था। सोने के इन कारोबारियों की प्रदेश सरकार पर करोड़ों की देनदारी बनती थी।

इससे पता चलता है कि हमारी सरकारें कितनी गैर-जिम्मेदारी से काम करती हैं। पिछले कई दशकों से प्रदेश की इनकम बढ़ाने की ठोस योजना लाने में ये सरकारें नाकाम रही हैं। और अब इस फाइनैंशल इयर में ही सरकार ने 3500 करोड़ रुपये का लोन ले लिया है। नेता अपनी राजनीति के लिए बिना प्लानिंग खर्च करते हैं और खामियाजा पूरे प्रदेश की जनता को भुगतना पड़ता है। सरकार की फिजूलखर्ची और वित्त प्रबंधन में गड़बड़ी पर सीएजी ने भी सवाल उठाए थे। मगर नेता हैं कि हिमाचल के भविष्य को गिरवी रखने से बाज़ नहीं आ रहे।

यहां सबके अंदर छिपा है एक नीरज भारती, फिर बवाल क्यों?

0

जीशान अली।। हिमाचल प्रदेश के शिक्षा विभाग के संसदीय सचिव और ज्वाली के विधायक नीरज भारती की टिप्पणियों को लेकर सोशल और प्रिंट मीडिया में बढ़ती ख़बरों की तरफ मेरा भी ध्यान आकर्षित हुआ। मैंने सोचा कि क्यों न मैं भारती की फेसबुक टाइमलाइन पर जाकर खुद देखूं कि वह ऐसा क्या लिखते हैं कि बवाल मच जाता है। मैंने करीब एक घंटा लगाकर भारती की फेसबुक वॉल का मुआयना किया।

भारती के कटाक्ष संघ, भाजपा, बाबा रामदेव और प्रधानमंत्री मोदी से लेकर हिन्दूवादी संगठनों पर थे। भारती बेबाकी से वही सब लिखते हैं, जो सोशल मीडिया और वॉट्सऐप के संदेशों पर हम दिन-रात सुनते-पढ़ते आ रहे हैं। भारती संघ परिवार के धुर विरोधी हैं, ऐसा उनकी वॉल देखकर लगता है। जब कांग्रेसी हैं तो उनका ऐसा होना लाजिमी है।

भारती की हिम्मत देखकर मैं हैरान हुआ। राजनीति में बेबाकी चलती है, पर अपने आप को इस कदर प्रस्तुत कर देना कहां की समझदारी है भाई? आखिर भारती से इतनी चिढ़ क्यों पैदा हो रही है लोगों को? भारती भी तो उसी भीड़ की तरह रिऐक्ट कर रहे हैं, जो सोसल मीडिया पर दिन-रात एक-दूसरे के खिलाफ कीचड़ फेंकने में लगी रहती है। क्या भारती उन लोगों से सिर्फ इसलिए अलग हैं कि वह एक विधायक हैं और इस नाते वह ऐसा नहीं लिख सकते? दरअसल दिक्कत और चिढ़ यह है कि समाज में हर तीसरा आदमी नीरज भारती है, मगर वह मौका और मंच देखकर अपना चेहरा बदल देता है। मगर भारती ऐसा नहीं कर रहे।

संघवाद के एजेंडे को राष्ट्रवाद का नारा मान चुके कुछ युवा सुबह से लेकर शाम तक फेसबुक पर अर्जी-फर्जी आर्टिकलों और फोटोशॉप्ट तस्वीरों को फैलाने में लगे रहते हैं। नेहरू गाजी का बेटा था, इंदिरा का पति वो था, राजीव फलाणे का बेटा था, सोनिया ऐसा करती थी, वैसा करती थी… वगैरह। क्या इस तरह की मानसकिता वाले लोग भी भारती नहीं हैं? यही लोग अपनी पार्टी की विचारधारा वाले संगठनों में काम करते हुए कल को किसी संवैधानिक पद पर भी पहुंचेंगे। तब वे एकदम से अपनी जुबान और चेहरा बदल लेंगे।

ऐसी फर्जी तस्वीरें वही बना सकता है, जिसके पास किसी चीज का विरोध करने के लिए तर्क और तथ्य न हों। ये लोग जिस पार्टी के समर्थक हैं, वह पार्टी महात्मा गंधी के अंत्योदय के नारे को आगे ले जाने का संकल्प लेती है और हर मंच से कहती है कि हम उनके सपनों को साकार करेंगे। मगर उसी गांधी को उस पार्टी का काडर सोशल मीडिया पर दिन-रात बेआबरू करने में जुटा होता है।

दाएं वाली तस्वीर असली है, जिसमें गांधी जी पंडित नेहरू के साथ हैं। कुछ लोगों ने फोटोशॉप की मदद से इसमें लड़की की तस्वीर लगाकर बापू को बदनाम करने की कोशिश की है।

जब सभी भारती जैसे हैं और अपनी-अपनी विचारधाराओं के लिए किसी भी स्तर पर उतरकर सभ्य समाज के ढांचे को चकनाचूर करने में लगे हैं, तो बवाल सिर्फ नीरज भारती को लेकर क्यों है? भारती की हिम्मत है कि उसने अपने आप को, अपनी मानसिकता को, अपने विचारों को सरेआम जनता के सामने प्रस्तुत कर दिया है। अब जो प्रत्यक्ष है, उसका हिसाब-किताब तो जनता देख रही है। मगर जो अंडर-कवर ऑपरेशन के तहत देश के महानायकों को अनर्गल बातें करके बदनाम करने में तुले हुए हैं, उनका क्या?

नीरज भारती

बहरहाल, मैं भारती की टाइमलाइन का अध्ययन करते हुए आगे बढ़ा। भारती एक तरफ अपनी वॉल पर दबंग नेता और बेबाक वक्ता की छवि को परिभाषित करते हुए निकलते हैं। वह यह जताना चाहते हैं कि मैं नेता नहीं, नॉर्मल आदमी हूं और राजनीति नहीं करता। पर उनकी दो पोस्ट्स मुझे ऐसी दिखीं कि उनके अंदर का घाघ नेता और दोहरे मापदंड मेरी पकड़ में आ गए।

एक पोस्ट में भारती लिखते हैं कि देश में ऐसे भी लोग हैं, जो बैडमिन्सटन स्टार पीवी सिंधु की कास्ट गूगल पर पता कर रहे हैं। इसके लिए वह बाकायादा गूगल का स्क्रीनशॉट शेयर करते हैं और इस तरह की जातिवादी मानसिकता पर दुख और गुस्सा प्रकट करते हैं। मगर जैसे ही मैं आगे स्क्रॉल करते हुए उनकी दो दिन आगे की पोस्ट पर पहुंचता हूं, तो भारती किसी मुद्दे पर जय ओबीसी, जय ओबीसी के नारे लगाते हुए मुझे मिलते हैं। जिस बेबाक युवा भारती को अपनी इमेज को लेकर यह चिंता नहीं कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं, उसे मैं यहां ट्रैक से उतरता देखता हूं। मुझे यहां भारती के दोहरे मापदंड नजर आते हैं। भारती जय ओबीसी, जय हिमाचल, जय हिंद और जय राजा वीरभद्र लिखते हैं। इसमें मुझे जय ओबीसी खटकता है। यह स्टेटस डालने वाला भारती मुझे वीपी सिंधु को लेकर पोस्ट करने वाले भारती से अलग जान पड़ता है। यहां मुझे चुनावी राजनीति की सांठ-गांठ वाला तिकड़मी भारती मुझे नजर आता है। यहं भारती मुझे दुविधा में डाल देते हैं।

राजनिति हो, व्यक्तिगत जिंदगी या फिर कोई और स्पेस, गाली देना गलत है। किसी को कटु वचन कहना, किसी की व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में, किसी के चरित्र के बारे में सवाल उठाना या कहानियां फैलाना गलत है। यह शास्त्र कहता है, धर्म कहता है और सेन्स भी कहती है। यह सबके लिए गलत है और यह गलत सिलेक्टिव नहीं है। हर मानव के लिए गलत है। राजा के लिए भी, रंक के लिए भी। नेता के लिए भी, कार्यकर्ता के लिए भी। अब भारती मोदी और ईरानी पर उंगली उठाएं या कोई आम भाजपा कार्यकर्ता सोनिया के बारे में गलत प्रचार करे, ये दोनों समान रूप से गलत बातें हैं। इसकी परिभाषा इस तरह से नहीं हो सकती कि भारती विधायक है तो उसके लिए गलत है और बाकी कोई कुछ भी लिख सकता है।

सबके अंदर एक भारती है। कोई छुपकर भारती है, कोई सरेआम भारती है। देखो भैया, हम ठहरे आम आदमी। राजनीति धूमल को करनी है, वीरभद्र, अनुराग, विक्रमादित्य, बाली, भारती, सुक्खू आदि को ही करनी है। इन्हीं की पार्टिया बारी-बारी चुनाव जीतेंगी। इनपर ही प्रदेश का दारोमदार टिका है। हम आम जनता, तो उस चातक की तरह है, जो सावन के बादलों की बूंद के लिए आसमान की तरफ देखता रहता है। उसी तरह सरकारें, मंत्री-संत्री बदलने पर हम नई उम्मीद पाले रखते हैं। हमें उम्मीद होती है प्रदेश के भले की, नई नौकरी की, नई दिशा की, नई दशा की। तुम्हीं इस व्यवस्था के माई हो, तुम्हीं बाप हो, तुम्हीं लोग बंधू हो और तुम्हीं सखा भी।

जब अलग-अलग समय पर सबकुछ तुम्हीं लोगों पर टिका है तो प्रदेश का भला ही कर दो। यह ऊर्जा, यह तर्कक्षमता, यह बेबाकियां दोनों पक्ष प्रादेशिक मुद्दे पर फोकस कर दो। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे मामलों पर आप क्या सोचते हैं, फेसबुक पर कभी यही डाल दिया करो। यही डाल दो कि आपका क्या विजन है अपने इलाके अपने प्रदेश के लिए।

भारती जी भी थोड़ा ऐसा ज्ञान बीच-बीच में डालें तो हम चातक लोग धन्य हो जाएंगे। आपका जो भी अपनी पार्टी या विचारधारा को लेकर श्रद्धा है या विरोधी को लेकर जो बैर है, उसे अपने तक सीमित रखो। या फिर किसी सार्वजनिक मंच पर एक हफ्ते की बहस आयोजित कर लो और एक ही बार सारे मुद्दे सुल्टा लो। फिर प्रदेश के मुद्दों पर फोकस हो जाओ।

नेहरू का या गांधी का इतिहास छोड़ दो, बाबा रामदेव का कानापन या मोदी के जुमले भूल जाओ; प्रदेश के लिए चुने गए हो तो थोड़ा समय यहां के लिए भी निकाल दो।

(लेखक नाहन के रहने वाले हैं। 15 वर्षों तक विभिन्न मल्टीनैशनल कंपनियों में सेवाएं देने के बाद इन दिनों पैतृक गांव में बागवानी में जुटे हैं।)

Disclaimer: ये लेखक के अपने विचार हैं और इनके लिए वह स्वयं उत्तरदायी हैं।

इस लेख को फिर से शेयर किया जा रहा है, मूलत: यह Sep 1, 2016 को प्रकाशित हुआ था।

जानें, शिमला में एक उंगली पर नीला नेल पेंट क्यों लगा रही हैं महिलाएं

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, शिमला।। अगर आप शिमला में किसी युवती या महिला की एक उंगली में नीले का रंग नेल पेंट देखें तो हैरान न हों। इस साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव में मतदान के लिए युवाओं को प्रोत्साहित करने के लिए यह अभियान शुरू किया गया है।

 

इसके तहत युवतियां और महिलाएं अपनी एक उंगली के नाखून पर नीला नेलपेंट कर रही हैं। इसी अभियान के तहत एचएएस और सहायक आयुक्त ज्योति राणा ने शिमला की एसपी सौम्या सांबशिवन की उंगली पर नीला नेल पेंट लगाया।

एसपी सौम्या को ब्लू नेल पेंट लगातीं ज्योति राणा। (image: MBM News Network)

बताया जा रहा है कि इस ‘गो ब्लू’ अभियान के पीछे शिमला के डीसी रोहन ठाकुर की सोच है। इस अभियान की शुरुआत गुरुवार को कई गई थी।

एमबीएम न्यूज नेटवर्क का फेसबुक पेज लाइक करे

सहायक आयुक्त ज्योति राणा ने बताया कि युवतियां व महिलाएं अपनी एक उंगली पर तब तक नीले रंग का इस्तेमाल करेंगी, जब तक मतदान नहीं होता। उन्होंने बताया कि दूसरे दिन अभियान को काफी सफलता मिली है।

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

‘हिमाचल में धूमल के नेतृत्व में परिवर्तन होकर रहेगा’

हमीरपुर।। अभी तक हिमाचल प्रदेश में सीएम कैंडिडेट को लेकर बीजेपी की तरफ से किसी के नाम का ऐलान नहीं हुआ है, मगर बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने एक बयान दिया है। हमीरपुर के बिझड़ी में आयोजित एक कार्यक्रम, जिसमें सांसद अनुराग ठाकुर भी थे, में निरंजन ज्योति ने कहा, “मुझे विश्वास है कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में प्रदेश में परिवर्तन होगा और हर हाल में परिवर्तन होकर रहेगा।”

 

कुछ समाचार पत्रों के मुताबिक चुनावी वर्ष में साध्वी निरंजन ज्योति के इस बयान को प्रदेश भाजपा अधिक महत्वपूर्ण मान रही है। मगर हकीकत यह है कि राजनीतिक समझ रखने वाले लोग इस बयान को नजरअंदाज़ कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि साध्वी निरंजन ज्योति के बयान को कोई गंभीरता से नहीं लेता, क्योंकि उनके कई बयान उटपटांग होते हैं। कई मौकों पर तो साध्वी ऐसे-ऐसे बयान दे चुकी हैं जिनसे भारतीय जनता पार्टी की फजीहत हो चुकी है। पार्टी को उनके बयानों से किनारा भी करना पड़ा था।

प्रधानमंत्री को देनी पड़ी थी सफाई
दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान साध्वी ने कहा था कि जनता ‘रामजादों’ या ‘ह*#जादों’ में से चुनाव करे। इस बयान को लेकर काफी आलोचना हुई थी और उन्हें संसद में अपने बयान के लिए माफी मांगनी पड़ी थी। प्रधानमंत्री ने भी यह कहते हुए सभी से इस विवाद को भुलाने की अपील की थी कि वह नई हैं, गांव से आई हैं। प्रधानमंत्री का कहना था कि उन्हें समझ नहीं है कि क्या कहना है, क्या नहीं।

बयान से किनारा कर सकती है पार्टी
जानकारों का कहना है कि हमीरपुर में साध्वी का बयान या तो उन्होंने नासमझी में दिया है या उनसे दिलवाया गया है, मगर पार्टी का इससे कोई संबंध नहीं है। हो सकता है कि पार्टी इस बयान से किनारा कर ले।

45 साल के शख़्स पर 9 साल की बच्ची के रेप का आरोप

कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के नूरपुर में 45 साल के एक शख्स पर 9 साल की बच्ची से रेप करने का आरोप आया है। बच्ची बेहद गरीब परिवार की है। परिजनों ने पुलिस को शिकायत दी है कि आरोपी ने टोफी का लालच देकर यह हरकत की। उनका दावा है कि उन्होंने 20 सितंबर को आरोपी को इस अपराध को अंजाम देते हुए पकड़ा।

 

आरोप है कि पिछले डेढ़ महीने से वह यह ऐसा कर रहा था और बच्ची के स्कूल आते-जाते वक्त अपराध को अंजाम दे रहा था। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और बच्ची का मेडिकल करवाया जा रहा है। पुलिस के मुताबिक परिजनों की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज करके छानबीन शुरू कर दी गई है।

…जब होटल से चार लड़कियों को थाने ले गई पुलिस

कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के ज्वालामुखी में पुलिस ने नादौन मार्ग स्थित एक होटल पर दबिश दी और वहां मौजूद चार लड़कियों को पुलिस स्टेशन ले गई। पुलिस ने पूछताछ की, उनसे पता पूछा। बाद में पुलिस ने इन लड़कियों को छोड़ दिया और कहा कि इस मामले में कुछ भी गलत नहीं पाया गया। लड़कियों का कहना था कि वे होटल में खाना खाने के लिए रुकी थीं। अगर कुछ नहीं था, तो सवाल उठ रहा है कि क्या हिमाचल में अब चार लोग कहीं इकट्ठे नहीं जा सकते, खासकर होटल में?

 

पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश पुलिस ने ऊना के होटल में छापा मारा था और वहां से कुछ जोड़ों को पकड़ा था। कानूनन पुलिस को मोरल पुलिसिंग का अधिकार नहीं है, फिर भी यह कार्रवाई की गई। मगर अब तक हद यह है कि लड़के-लड़कियों से ही नहीं, शायद पुलिस को लड़कियों के भी साथ घूमने से आपत्ति है।

 

दरअसल इस कार्रवाई के पीछे पुलिस किसी गुप्त सूचना को बता रही है। खबर है कि पुलिस किसी ‘गुप्त’ जानकारी के आधार पर दबिश देकर होटल से चार युवतियों को ले गई। होटल के मैनेजर को भी तलब किया गया था। पूछताछ में लड़कियों ने जो अपना बता बताया, वह सही पाया गया। तीन लड़कियां नगरोटा की थीं और एक जालंधर की।

सभी तस्वीरें प्रतीकात्मक हैं

पुलिस अधिकारियों को उन्होंने बताया कि वे कुछ खाने के लिए होटल में आई थीं। इसी बीच किसी ने पुलिस को खबर कर दी। ख़बर के मुताबिक ज्वालामुखी संदीप पठानिया ने बताया है कि कुछ भी गलत नहीं पाया गया है और लड़कियों को परिजनों के हवाले कर दिया गया है।

 

इस तरह के घटनाक्रम हिमाचल प्रदेश जैसे पर्यटन स्थल की साख को धक्का पहुंचाते हैं। अगर पुलिस इसी तरह से कार्रवाई करती रहेगी तो कल को नई-नई शादी होने के बाद हनीमून मनाने हिमाचल आए कपल भी तथाकथित “रंगरलियां” मनाने के आरोप में पकड़े जा सकते हैं, क्योंकि जरूरी नहीं कि वे शादी का सर्टिफिकेट लेकर घूमने आए हों।

 

 

गुड़िया केस में सीबीआई ने जांच पूरी करने के लिए फिर मांगी मोहलत

शिमला।। कोटखाई रेप ऐंड मर्डर केस की जांच कर रही सीबीआई को हाई कोर्ट से जांच पूरी करने के लिए एक बार फिर मोहलत मिल गई है। सीबीआई ने गुरुवार को बंद लिफाफे में हाईकोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट दायर की। सीबीआई के वकील ने ब्रेन मैपिंक और अन्य साइंटिफिक इन्वेस्टिगेशन के लिए कोर्ट से और समय मांगा। कोर्ट ने फटकार लगाई और फिर 21 दिन की मोहलत भी दे दी।

 

हाई कोर्ट ने सीबीआई से कहा है कि अपनी रिपोर्ट और स्पष्ट करे। अब अगली सुनवाई 11 अक्टूबर को होगी। कोर्ट ने सीबीआई को जल्दी से जांच पूरी करने को कहा। गौरतलब है कि सीबीआई इससे पहले तीन बार स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर चुकी है। हर बार वह जांच पूरी करने के लिए और समय मांगती रही। इससे पहले 2 अगस्त, 17 अघस्त और 6 सितंबर को उसने स्टेटस रिपोर्ट फाइल की थी।

 

सुनवाई के बाद सीबीआई के वकील अंशुल बंसल ने कहा कि जांच एजेंसी साइंटिफि इन्वेस्टिगेशन कर रही है, इसमें समय लगेगा। उन्होंने कहा कि जिस स्थिति में सीबीआई को पुलिस से जांच हस्तांतरित हुई थी, उसमें समय लगना लाजिमी है।

वीरभद्र या विक्रमादित्य में से कोई एक लड़ेगा चुनाव?

इन हिमाचल डेस्क।। क्या विक्रमादित्य नहीं चाहते कि वीरभद्र चुनाव लड़ें? यह प्रश्न सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। हिमाचल यूथ कांग्रेस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने एक एक बयान दिया और ‘एक परिवार-एक टिकट’ की वकालत की। यानी उनका कहना था कि एक परिवार में एक ही व्यक्ति को चुनाव में टिकट मिलना चाहिए। अब वह ऐसी मांग कर रहे हैं तो इसका मतलब यह निकलता है कि वह अपने परिवार में भी एक ही टिकट चाहते हैं। यानी या तो वह खुद चुनाव लड़ेंगे या फिर उनके पिता वीरभद्र चुनाव लड़ेंगे। मगर वीरभद्र सिंह ने अपने बेटे के बयान के ठीक उलट कहा- कांग्रेस में एक ही परिवार को एक ही टिकट दिया जाए, ऐसा कोई नियम नहीं है।

 

शिमला रूरल पर बहुत सक्रिय हैं विक्रमादित्य
अभी वीरभद्र सिंह शिमला ग्रामीण से विधायक हैं मगर इस सीट पर उनके बेटे विक्रमादित्य सक्रिय हैं। वह लगातार यहां पर कई कार्यक्रम कर चुके हैं और इस सीट पर हुए विकास और सरकार की उपलब्धियां गिनाने वाले वीडियो बनाकर लगातार प्रचार कर रहे हैं। शिमला ग्रामीण के लिए बने हर वीडियो में विक्रमादित्य का बड़ा सा पोर्ट्रेट होता है।

 

जब लाखों रुपये खर्च करके इतना प्रचार किया जा रहा है तो इसके यही सियासी मायने निकलते हैं कि वह खुद यहां से उतरने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। फिर अगर वह एक परिवार के लिए एक टिकट की वकालत करने हैं तो इसका मतलब कहीं न कहीं यही निकलता है कि वह चुनाव लड़ेंगे तो उनके पिता चुनाव नहीं लड़ेंगे। क्योंकि ऐसा तो होगा नहीं कि पार्टी पूरे प्रदेश में एक परिवार एक टिकट की नीति अपनाए, मगर मुख्यमंत्री और उनका बेटा दोनों चुनाव लड़ें। वैसे भी पूरे प्रदेश में, बीजेपी हो या कांग्रेस, वीरभद्र और विक्रमादित्य के अलावा कहीं पर भी ऐसे हालात नहीं है कि एक ही पार्टी से दो लोग अलग-अलग सीटों पर टिकट मांग सकते हों।

 

बेटे के बयान को वीरभद्र ने किया खारिज
भले ही विक्रमादित्य परिवार में एक ही व्यक्ति को टिकट दिए जाने के हिमायती हैं, वीरभद्र कहते हैं कि कांग्रेस में ऐसा कोई नियम नहीं है। साथ ही कांग्रेस के वरिष्ठ मंत्री कौल सिंह ठाकुर ने भी विक्रमादित्य पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उन्होंने यह बयान अपने पिता से पूछकर दिया था या नहीं।

 

सभी बातों को मिला दिया जाए तो इन बयानों से दो संकेत मिलते दिखते हैं- विक्रमादित्य चाहते हैं कि एक ही व्यक्ति को टिकट मिले- या तो वह चुनाव लड़ें या फिर उनके पिता। दूसरी सूरत यह कि विक्रमादित्य जिस तरह से शिमला रूरल में ऐक्टिव हैं, यहां से वह खुद चुनाव लड़ना चाहते हैं और शायद नहीं चाहते कि उनके पिता इस बार चुनाव मैदान में उतरें। मगर वीरभद्र ने अपने बयान में स्पष्ट कर दिया कि ऐसी कोई बंदिश नहीं है यानी वह और उनका बेटा दोनों चुनाव लड़ सकते हैं।

‘नई राजनीति की समझ रखते हैं विक्रमादित्य’
ऐसा भी हो सकता है कि परिवार में एक ही व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर सहमति बन गई हो। मगर इन बयानों का असल मतलब क्या है, चुनाव आने पर ही साफ हो पाएगा। तब तक सिर्फ कयास लगाए जा सकते हैं। हालांकि राजनीतिक पंडितों का यह भी कहना है कि विक्रमादित्य युवाओं के सेंटिमेंट सी समझ ररखते हैं। वह जानते हैं कि अब जनता क्या चाहती है, जबकि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अभी भी चुनावी समय में पुराने ढर्रे पर घोषणाएं करके सत्ता की राह देख रहे हैं और अपने पुराने साथियों को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं विक्रमादित्य मौजूदा हालात की समझ रखते हुए युवाओं को आगे लाने के हिमायती हैं।