मजबूर पर्यटकों को ठगते ऑनलाइन बुकिंग ऐप्स और होटेल वाले

शिमला।। सोचिए आप परिवार के साथ कहीं घूमने का प्लान बनाएं। परिवार को कोई दिक्कत न हो, इसके लिए आप पहले से ही ऑनलाइन ऐप्स की मदद से दो-तीन हजार रुपये में होटेल बुक करवा लेते हैं। लेकिन जप आप उस होटेल में पहुंचते हैं तो होटेल वाले कहते हैं कि ‘सर/मैडम! कमरा उपलब्ध नहीं है। हमारा फ्लां रूम्स या ढिमाका ट्रिप वालों से कॉन्ट्रैक्ट टूट गया है, हमने उन्हें ईमेल भेजा है लेकिन वे रिप्लाई नहीं करते। अगर आप कहें तो एक कमरा उपलब्ध है मगर 5 हजार का मिलेगा।’

ऐसी स्थिति में आप उस फ्लां ऐप या साइट के कस्टमर केयर को कॉल लगाते हैं मगर वे भी आपकी समस्या न सुलझा पाते। ऐसे में आपकी क्या स्थिति होगी? उधर होटेल वाला आपको या तो बाहर जाने के लिए कह रहा होगा या फिर ऑनलाइन वाले रेट से दोगुने रेट पर कमरा दे रहा होगा। पराया शहर, साथ में बच्चे और महिलाएं। आप बेबस होकर इधर-उधर भटकेंगे और हो सकता है टूरिस्ट सीजन पीक पर होने के कारण आपको कहीं और भी कमरा न मिले। या फिर मजबूरी में आपको होटेल वालों के मुंहमांगे रेट पर कमरा लेना होगा।

यह कोई काल्पनिक स्थिति नहीं है। वैसे तो पूरे देश में ऐसा हो रहा है मगर आजकल टूरिस्ट सीजन के दौरान हिमाचल प्रदेश के कई शहरों में पर्यटकों को ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ रहा है। होटेल वाले अपने यहां टूरिस्ट आकर्षित करने के लिए ऐप्स में रजिस्टर करवा लेते हैं। अगर कोई और न आया तो ऐप से बुक करवाने वाला टूरिस्ट तो आ ही रहा है, वरना उनके आने से पहले कोई और डायरेक्ट होटेल आ गया तो उसे महंगे दाम में कमरा दे देते हैं। फिर ऑनलाइन बुकिंग वाला टूरिस्ट आता है तो उससे कहा जाता है कि यहां कमरा उपलब्ध नहीं है। हमें ईमेल नहीं मिला। या हमने तो फ्लां ऑनलाइन बुकिंग कंपनी से नाता तोड़ लिया है।

ताजा मामला महेश सैनी नाम के शख्स का है जिन्होंने दावा किया है कि उनके साथ कुल्लू में ऐसा हुआ। उन्होंने एक ग्रुप में पोस्ट डालकर अपना दर्द बयान किया है। यह पोस्ट वायरल हो गई है और लोग इसे लगातार शेयर कर रहे हैं। बकौल महेश, छह जून की उनकी एक होटल में बुकिंग थी और उन्होंने जाने से पहले होटल और ओयो रूम्स से कन्फर्म करने का भी दावा किया है। मगर कुल्लू पहुंचकर उन्हें पैदल कर दिया गया। ओयो रूम्स से संपर्क करने पर कॉल को होल्ड पर रखा गया और समस्या नहीं सुलझाई गई। उनकी बच्चियां और पत्नी इस दौरान होटेल के बाहर इंतजार करती रहीं। हमेश के मुताबिक ओयो का कहना था कि होटेल को ईमेल भेजा था कन्फर्मेशन का मगर होेटेल वाले कह रहे थे कि हमें ऐसा मेल नहीं मिला।

महेश नाम के शख्स ने बताया है कि छह जून को उनके साथ क्या हुआ।

यह तो बानगी भर है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने अपना दर्द बयां किया है। टूरिस्ट उम्मीदों के साथ हिमाचल आ रहे हैं मगर वे हिमाचल की बुरी छवि अपने साथ ले जा रहे हैं। कुछ होटेल वालों की मनमानी और इन ऑनलाइन बुकिंग कंपनियों की ढीली नीतियों का खामियाजा हिमाचल प्रदेश को भी भुगतना पड़ रहा है जिसकी इमेज को धक्का पहुंच रहा है।

उपलब्धियों की खबरों के नाम पर लोगों को गुमराह करती पत्रकारिता

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश एक छोटा सा राज्य है और यहां पर खबरों की कमी रहती है। ऐसे में छोटी सी उपलब्धि भी अखबारों में जगह पाती है। जैसे कि किसने किस क्लास में कौन सा स्थान प्राप्त किया, कौन विदेश जाकर भाषण दे आया, कौन किस जगह नौकरी लग गया। इसमें कोई बुराई भी नहीं क्योंकि इसी से बाकियों को प्रेरणा मिलती है। मगर इस तरह के मामलों को रिपोर्ट करने में कई बार अखबार और पोर्टल आदि गलती भी कर देते हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है शिमला से जहां पर एक प्रतिष्ठित अखबार ने खबर तो छापी मगर रिपोर्ट में कई सारी तथ्यात्मक गलतियां हैं जिससे समाज में गलत संदेश जा सकता है।

इसमें हिमाचल प्रदेश की एक बेटी की उपलब्धियों का जिक्र किया है जिसने कथित तौर पर 13 साल की पढ़ाई सात साल में पूरी की। इस बेटी ने साढ़े पांच साल का बीएचएमएस कोर्स, तीन साल की बीए, दो साल की एमए और ढाई साल की एमबीए की है।यह उनकी उपलब्धि हो सकती है मगर जो सवाल उठ रहा है, वह है अखबार में लिखी गई बातों पर जिन्हें पब्लिश किए जाने से पहले क्रॉस चेक किया जाना चाहिए था।

1. अखबार लिखता है- ***** का नाम एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के लिए भी नामांकित हुआ है। भारत सरकार ने ***** का नाम इंडिया बुक में दर्ज करने के साथ उन्हें मेडल और प्रशस्ति पत्र जारी किए हैं।

जबकि हकीकत यह है कि भारत सरकार का इंडिया बुक से कोई लेना देना नहीं है। इंडिया बुक ऑफ रेकॉर्ड्स एक प्राइवेट रेफरेंस बुक है जो हर साल भारत में छपती है और इसमें भारत में बनने वाले असामान्य रिकॉर्ड्स को जगह दी जाती है। दूसरी बात यह है कि इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स से ही संबद्ध है।

2. अखबार में यह भी लिखा गया है- उनकी पढ़ाई के प्रति रुचि और कम उम्र में बड़ी उपलब्धि के लिए वर्ल्ड रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी की ओर से डाक्टरेट की डिग्री करने को आमंत्रित किया है।

हकीकत यह है कि वर्ल्ड रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी गैर-मान्यता प्राप्त संगठन है। इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स का भी इससे संबध है। यह कोई स्थापित यूनिवर्सिटी नहीं है जहां आप पढ़ाई करेक किसी तरह की डिग्री करें। बल्कि जो लोग किसी तरह का रिकॉर्ड बनाते हैं और उन्हें इंडिया बुक या ऐसी कुछ अन्य रिकॉर्ड बुकों में जगह मिलती है, वे इसकी वेबसाइट पर जाकर अप्लाई कर सकते हैं और फिर यह तथाकथित यूनिवर्सिटी आपको कुछ शुल्क लेकर डॉक्टरेट की मानद उपाधि दे देती है जिसकी कोई मान्यता नहीं है।

हर कोई नहीं दे सकता मानद डिग्री
बता दें कि अपने क्षेत्रों में बड़ा काम करने वाली हस्तियों को प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय मानद उपाधि देते हैं और उसकी वैल्यु भी होती है क्योंकि यह मानद डिग्री एक स्थापित और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की ओर से दी जा रही होती है। मगर वर्ल्ड रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी  ऐसी स्थापित यूनिवर्सिटी नही है। इसने गुरमीत राम रहीम को भी डॉक्टरेट की डिग्री दी थी जिसे बाद में वापस ले लिया था। उस दौरान भी इसे लेकर काफी सवाल उठे थे।

उस समय टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा था कि यह तथाकथित यूनिवर्सिटी, जिसका लंदन में हेडक्वॉर्टर है, दरअसल गैर-मान्यता प्राप्त है (रिपोर्ट पढ़ें)। उस समय अखबार ने वर्ल्ड रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी के पार्टनर और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स के संपादक बिस्वरूप रॉय चौधरी से बात की थी तो उन्होंने कहा था, “यह यूनिवर्सिटी सिर्फ रिकॉर्ड बनाने और तोड़ने को कवर करती है जिसे पूरी दुनिया में अन्य कोई यूनिवर्सिटी कवर नहीं करती। रिकॉर्ड होल्डर्स को डिग्री तभी दी जाती है जब वे थीसिस में यह बताते हैं कि उन्होंने रिकॉर्ड कैसे बनाया।”

दैनिक ट्रिब्यून ने भी अपनी एक रिपोर्ट में इस तथाकथित यूनिवर्सिटी पर सवाल उठाए थे जिसमें जिक्र था कि कैसे यह ‘उचित मूल्य’ पर डिग्री देती है (रिपोर्ट पढ़ें)। इस रिपोर्ट में स्कॉलर्स के हवाले हरियाणा के फरीदाबाद स्थित ऑफिस से इस तरह मानद डिग्री दिए जाने को लेकर भी प्रशन किए गए थे।

बहरहाल, हिमाचल की बेटी ने जो हासिल किया हो वह उनकी अपनी उपलब्धि है। वह आगे भी तरक्की करें और पहले से अधिक रिकॉर्ड बनाएं, इसके लिए शुभकामनाएं। यह बुक या तथाकथित यूनिवर्सिटी क्या कर रही है, वह भी उसका अपना मामला है। मगर सजग न्यू मीडिया पोर्टल होने के नाते हमारी जिम्मेदारी है कि लोगों को किसी भी तरह के फिजूलखर्च और निरर्थक बात से बचाएं।

परिवहन मंत्री के जिले में सड़कों पर उतरे बस संकट से परेशान स्कूली बच्चे

एमबीएम न्यूज, कुल्लू।। बंजार बस हादसे के बाद प्रशासन द्वारा ओवरलोडिंग को लेकर बरती जा रही सख्ती से हिमाचल प्रदेश की परिवहन व्यवस्था की पोल खुल गई है। परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर के गृह जिले कुल्लू में बड़ी संख्या में लोगों और स्कूली छात्र-छात्राओं को बस सेवा नहीं मिल पा रही है।

बसों में सीट न मिलने के कारण स्टूडेंट्स को कई किलोमीटर सा सफर या तो पैदल तय करना पड़ रहा है तो कई स्थानों पर बच्चों ने स्कूल जाना ही बंद कर दिया है। कुल्लू जिले में पैदा हुई इस स्थिति को लेकर जिला मुख्यालय में कई सरकारी स्कूलों के छात्र-छात्राओं ने विरोध प्रदर्शन किया, रैली निकाली और नारेबाजी की।

स्कूल जाने से पहले प्रदर्शन
प्रदर्शन में शामिल हुए स्टूडेंट्स ने बस सेवा उपलब्ध करवाने की मांग की है। उनका कहना है कि शाम को छुट्टी होने के बाद घर पहुंचना उनके लिए परेशानी का सबब बन गया है। ऐसे में उन्होंने मंगलवार को स्कूल जाने से पहले ढालपुर में एक विशाल रैली निकाली।

क्यों हुए मजबूर
छात्रों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि स्कूली बच्चों के लिए स्कूल तक जाने के लिए बच्चों का इंतजाम करें ताकि स्कूली बच्चे निश्चित होकर स्कूल जा सके। इस दौरान लगवैली, खराहल घाटी भुंतर, मणिकर्ण, सेंस बंजार और आनी जैसे ग्रामीण क्षेत्रों से स्कूली छात्र-छात्राएं पैदल स्कूल तक पहुंचे। जबकि छात्र-छात्राओं के लिए निजी और सरकारी बसें नहीं रोकी गई, जिसको लेकर स्कूली छात्रों में रोष बना हुआ है।

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जिम्मेदार कौन
सरकारी स्कूलों के बच्चे सरकारी बसों में फ्री यात्रा कर सकते हैं। सरकारी बसें कहीं भी जा रही हों, वे वर्दी वाले बच्चों को देखकर उन्हें बिठा लेती थीं और स्कूल तक या फिर स्कूल से उनके घर के पास उतार देती थीं। मगर ओवरलोडिंग को लेकर बरती जा रही सख्ती के कारण बसों में बच्चों को जगह नहीं मिल रही। निजी बसों में किराया देकर वे जा सकते हैं मगर उनकी प्राथमिकता है कि लॉन्ग रूट की सवारी को ही सीट दें। नतीजा यह है कि सरकारी स्कूलों के बच्चे पैदल हो गए हैं।

अब प्रशासन द्वारा बरती जा रही सख्ती से पता चलता है कि पहले इस ओर वह आंख मूंदकर बैठा हुआ था। इतने लोगों का बस विहीन हो जाने का मतलब है कि ये लोग ओवरलोडेड बसों में यात्रा करने के लिए मजबूर थे। बेहतर होता कि इस ओर सरकार पहले ही ध्यान देती और अतिरिक्त बसों की व्यवस्था करती। ओवरलोडिंग कोई नई समस्या नहीं है और पिछली सरकारें भी इस विषय पर आंख मूंदकर बैठी रही थीं।

अब कुल्लू हादसे के बाद हरकत में आए प्रसासन का सख्ती बरतना सही है लेकिन इसके साथ वैकल्पिक व्यवस्था किया जाना जरूरी है ताकि बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हो। यह बताना जरूरी है कि अंदरूनी इलाकों में बच्चियों को स्कूल तक लाने में कई सालों का समय लगा है। अगर उन्हें परिवहन का उचित इंतजाम न होने के कारण घर बैठना पड़े तो यह पूरे देश के लिए शर्म की बात होगी।

(एमबीएम न्यूज नेटवर्क के इनपुट्स सहित)

क्या है आपातकाल? कब और क्यों लगा देश में आपातकाल

राजेश वर्मा।। आपातकाल एक ऐसा शब्द जिसको सुना तो सभी ने होगा लेकिन इसे व्यावहारिक रूप से अपने जीवन काल में झेलने वाले ही इससे भलीभाँति परिचित होंगे। देश अतीत में 3 बार आपातकाल से गुजरा, दो बार पड़ोसी देशों के साथ युद्ध के समय और एक बार देश के भीतर राजनीतिक परिस्थितियों के चलते देश ने आपातकाल का सामना किया। इस आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज भी एक काले अध्याय के रूप में जाना जात है।

आपातकाल है क्या?
आज देश का कोई भी नागरिक स्वतंत्रता को अपनी जिंदगी में सबसे अहम मानता है। वह चाहता है की संविधान ने जो अधिकार दिए हैं उनका बिना किसी अड़चन के उपभोग और उपयोग करे। आज के दौर में प्रत्येक व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार की कोई बंदिशें नहीं चाहता यदि कोई व्यवस्था या सरकार इस पर अंकुश लगाने की सोचती भी है तो देश का नागरिक इस चीज़ का प्रखर विरोध करने पर उतारू हो जाता है। वह इसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।

उसकी स्वतंत्रता पर यदि कोई प्रहार होता भी है तो वह सीधा संविधान को ढाल बनाकर सरकार व व्यवस्था से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। लेकिन जिस संविधान ने हमें यह स्वतंत्रता दी है वही संविधान इस स्वतंत्रता को विशेष परिस्थितियों में छीनने का अधिकार भी सरकार को देता है और उस समय संविधान भी हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता।

आपातकाल की परिस्थितियों में देश का संविधान देश के नागरिकों के अधिकार निलंबित कर देता है। भारतीय संविधान में वर्णित तीन प्रकार के आपातकालों में से पहला है राष्ट्रीय आपातकाल जो संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन है। राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा काफ़ी विकट स्थितियों में होती है जैसे युद्ध, बाह्य आक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा आदि इस आपातकाल के उदाहरण है। एक तरफ आपातकाल के दौरान नागरिकों के अधिकार छीन लिए जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर इस दौरान सरकार के पास असीमित अधिकार आ जाते हैं, जिसका प्रयोग वह किसी भी रूप में करने के लिए स्वतंत्र होती है।

देश के भीतर आपातकाल मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा लागू किया जाता है। इस दौरान संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 19 स्वत: निलंबित हो जाता है जबकि अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 अस्तित्व में बने रहते हैं।

दूसरी प्रकार का आपातकाल है संविधान के अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन अथवा राज्य में उस आपात स्थिति का होना जिसमें किसी राज्य में राजनीतिक संकट के मद्देनज़र देश के राष्ट्रपति संबंधित राज्य में केंद्र की अनुशंसा पर आपात स्थिति की घोषणा कर सकते हैं। अर्थात राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था लागू कर देते हैं। ऐसा तब होता है जब किसी राज्य की राजनैतिक और संवैधानिक व्यवस्था विफल हो जाती है अथवा राज्य सरकार केंद्र की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन या वहां का शासन करने में असमर्थ हो जाता है।

इन परिस्थितियों में राज्य के न्यायिक कार्यों को छोड़कर केंद्र शेष राज्य प्रशासनिक अधिकार अपने हाथों में ले लेती है। इसकी अवधि न्यूनतम 2 माह से लेकर 3 साल तक रहती है। इस स्थिति में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 360 के अनुसार आपातकाल तीसरी प्रकार का आपातकाल वित्तीय आपातकाल है।

वैसे देश के इतिहास में अब तक ऐसी नौबत नहीं आयी जो इसे लागू किया गया हो। इसकी घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब उन्हें पूरी तरह से विश्वास हो जाए कि देश पर ऐसा आर्थिक संकट बन गया है जिसके जिसके कारण देश के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है। साधारण शब्दों में देश दिवालिया होने की कगार पर हो। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से धराशायी हो जाती है तो सरकार आम नागरिकों की संपत्ति व पैसे पर अधिकार कर लेती है व कर्मचारियों के वेतन को कम करना या पूरी तरह बंद भी कर सकती है।

गौरतलब है कि संविधान में वर्णित तीनों आपात उपबंधों में से वित्तीय आपात को छोड़ कर देश अतीत में बाकी दो आपातकाल को झेल चुका है। सबसे पहले देश में चीन के साथ युद्ध के समय 26 अक्टूबर 1962 को आपातकाल लगा जो 10 जनवरी 1968 तक रहा। दूसरा आपातकाल 3 दिसंबर 1971 को तब लगा जब पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ। तीसरा और सबसे चर्चित आपातकाल का दौर वह था जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक शांति के बिगड़ने के नाम पर देश पर यह थोप दिया।

आज से 44 वर्ष पहले घोषित किए गए आपातकाल की घोषणा 25 जून 1975 की आधी रात को की गई और यह 21 मार्च 1977 तक लगा रहा । स्वतंत्र भारत के राजनीति इतिहास में इस आपातकाल को एक काले अध्याय के रूप में भी जाना जाता है। इस आपातकाल में ऐसा क्या था कि 1971 के आम चुनाव में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ 352 सीटें जीत कर प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली कांग्रेस सरकार की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को इसको देश पर थोपना पड़ा जबकि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में बनी इस सरकार ने दिसंबर 1971 में पाकिस्‍तान को युद्ध में ऐसी शिकस्‍त दी और उसके दो टुकड़े कर नया देश बांग्‍लादेश दुनिया के नक्‍शे स्थापित कर दिया।

किसी ने इंदिरा गांधी को ‘मां दुर्गा’ कहा तो कोई उनको ‘आयरन लेडी’ कह कर पुकारने लगा। इस दौरान उन्हें भारत रत्‍न से भी नवाजा गया। लेकिन इंदिरा का यह सुनहरा काल ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया। उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर देश में आपातकाल लगाने के फैसले पर दस्तखत कर दिए।

26 जून 1975 की सुबह समूचा देश रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में आपातकाल की घोषणा को सुनकर स्तब्ध रह गए। लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी के हाथों हारने के बाद राजनारायण इस मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में लेकर चले गए। जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली चुनाव अभियान में इंदिरा को सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का दोषी पाया। उनके चुनाव को खारिज करने के साथ ही इंदिरा पर छह साल तक चुनाव लड़ने व किसी भी तरह के पद संभालने पर भी रोक लगा दी थी।

कहते हैं इस फैसले के बाद इंदिरा हालांकि प्रधानमंत्री की कुर्सी को छोड़ने के लिए तैयार भी हो गई थी लेकिन कांग्रेस पार्टी ने अपने बयान में कहा कि इंदिरा गाँधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है। विपक्ष द्वारा जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में पिछले एक वर्ष से लगातार इंदिरा पर इस्तीफा देने का जो दबाव बनाया हुआ था। इन सब परिस्थितियों के चलते आखिरकार इंदिरा गाँधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया।

इस आपातकाल में सभी चुनाव स्थगित हो गए थे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस समय गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत मांगने का भी अधिकार नहीं था। सरकार ने मीसा (मैंटीनेन्स ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट) के तहत कदम उठा कर सभी विपक्षी दलों के नेताओं को जेलों में बंद कर अज्ञात जगहों पर रखा।

यह आपातकाल इसलिए दुखद था क्योंकि इसमें किसी बाहरी देश से युद्ध के हालात नहीं थे बल्कि आंतरिक शांति के नाम पर देश की जनता पर यह जबरदस्ती थोपा गया आपातकाल था। सबसे ज्यादा दुखद पहलु इस आपातकाल के दौरान यह थे कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई, प्रैस की स्वतंत्रता को कुचला गया, विपक्षी नेताओं, युवाओं व अन्य लोगों को देश भर की जेलों में ठूंसा गया।

देश ने स्वतंत्रता के बाद जिस संविधान को अपना कर लोगों को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया। इस आपातकाल ने वही मौलिक अधिकार नागरिकों से छीन लिए और इनकी रक्षा के लिए जिन लोकतांत्रिक सरकारों को देश के नागरिकों द्वारा चुना गया उसी सरकार ने संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ जाकर लोगों के अधिकारों को छीन लिया। इस बात को बाद में 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना की आपातकाल के दौरान जीने तक का हक अर्थात नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लेने के लिए उससे भी कहीं न कहीं गलती हुई थी।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा लम्बे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे vermarajeshhctu @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

हिमाचल विरोधी है ‘इन हिमाचल’ पोर्टल और ये बातें हैं सबूत

आई.एस. ठाकुर।। ‘इन हिमाचल’ हिमाचल विरोधी पोर्टल है। इसकी वेबसाइट और फेसबुक पेज पर हमेशा हिमाचल विरोधी खबरें होती है। हमेशा नेगेटिव खबरें, नेगेटिव बातें पोस्ट होती हैं। कभी सरकार की आलोचना, कभी मुख्यमंत्री की बात पर सवाल तो कभी मंत्रियों के बयानों पर नुक्ताचीनी। यही नहीं, कई बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पर सवाल उठा देता है ये पोर्टल। पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान वीरभद्र सिंह पर निशाना साधता था। उसके मंत्रियों की योजनाओं की चीरफाड़ करता था और अब मौजूदा सरकार की भी टांग खींच रहा है। यह पोर्टल विपक्ष के नेता प्रेम कुमार धूमल पर सवाल उठाता था। हिमाचल के सांसदों रामस्वरूप शर्मा, अनुराग ठाकुर, शांता कुमार और वीरेंद्र कश्यप की नेगेटिव खबरें छापता था। क्या इसे राजनीति के अलावा और कुछ खबर या मुद्दा नहीं सूझता?

‘इन हिमाचल’ ने हमेशा हिमाचल का विरोध किया है। कितना शांत प्रदेश है ये और हमेशा इसकी छवि बिगाड़ने की कोशिश करता है। हाल ही में जब हिमाचल के अलग-अलग हिस्सों से टूरिस्टों और स्थानीय लोगों की मारपीट के वीडियो आ रहे हैं तो ये पोर्टल हिमाचल के लोगों का पक्ष नहीं ले रहा और टूरिस्टों का हिमायती बन रहा है। हिमाचल का पोर्टल है तो इसे हिमाचल के लोगों की बात करनी चाहिए। हिमाचल वाले गलत हों या सही, ये बात मायने नहीं रखती। अगर ये काम ये पोर्टल नहीं कर सकता तो अपना नाम बदल ले, अपने नाम में हिमाचल न लगाए।

अब हाल ही का मामला देखिए, जब कुल्लू में टिप्पर वाले ने पास को लेकर बहस होने पर टूरिस्ट को पीटने के लिए रॉड निकाली थी और टूरिस्टों ने उसी रॉड को छीनकर टिप्पर वाले का सिर फोड़ दिया था। बाद में टिप्पर वाले के साथियों ने टूरिस्टों को पीटा था। उस समय इन हिमाचल ने स्थानीय लोगों के रवैये पर सवाल उठाए और कहा कि मामले में पुलिस और कानून की मदद लेने के बजाय मारपीट क्यों की गई। जबकि इन हिमाचल को इस वीडियो पर कॉमेंट करने वाले अधिकतर लोगों की तरह कहना चाहिए था- ये हिमाचल है, बाहर के लोग सबक ले लें, हम शरीफ हैं मगर मौका मिलने पर टांग देते हैं। मगर हिमाचल विरोधी पोर्टल ने टूरिस्ट और स्थानीय लोगों दोनों पर बराबर सवाल उठाकर गलत किया।

ऐसा ही इसने एचआरटीसी के ड्राइवरों पर सवाल उठाकर किया जब वे शराबी युवकों को बुरी तरह पीट रहे थे। अब हाल ही में जाम को लेकर जब टूरिस्टों ने स्थानीय जीप चालक को कुल्लू में पीटा तो भी उसने हिमाचल का पक्ष नहीं लिया बल्कि तथ्यों को रिपोर्ट कर दिया। उसे पोस्ट से यह बात छिपा देनी चाहिए थी कि स्थानीय व्यक्ति पर लाइन तोड़कर गाड़ी घुसाने का आरोप है। उसे स्थानीय व्यक्ति द्वारा दी जा रही गालियों और आगे भुंतर में देख लेने वाला हिस्सा भी छिपा देना चाहिए था। और मेरा तो कहना है कि उसे ये वीडियो पब्लिश ही नहीं करना चाहिए था क्योंकि इससे हिमाचल की छवि खराब होती है। और छापना था तो लिखना था- टूरिस्ट पंगें न लें, वरना धुने जाओगे।

और बात मारपीट वाले वीडियो की ही नहीं है। जब नगरोटा बगवां में, पालमपुर में या अन्य हिस्सों पर कुछ लोगों को धर्म के नाम पर पीट दिया जाता है, उसकी साजिश रचने वालों को लेकर भी ये रिपोर्ट छापता है और हिमाचल जैसे शांत प्रदेश का माहौल खराब करता है। यही नहीं, दलित और शोषित वर्ग के खिलाफ होने वाले अन्याय, छुआछूत, मारपीट, भेदभाव और बच्चों तक के साथ गलत व्यवहार की खबरें भी ये छापता है जबकि अन्य अखबार इन्हें तवज्जो नहीं देते। ऐसी खबरें बाहर आती हैं तो हिमाचल की बदनामी ही होती है। हिमाचल में छुआछूत है ही नहीं, इन हिमाचल तो मामूली बातों को उठाकर बदनाम करता है।

इन हिमाचल ने वनरक्षक होशियार सिंह की मौत को लेकर लगातार खबरें छाप, लगातार लेख छापकर गलत किया। गुड़िया मामले में स्थानीय पत्रकारों की रिपोर्टों को प्रकाशित करके और सरकार में बैठे लोगों द्वारा की जा रही लीपापोती को एक्सपोज करके भी गलत किया क्योंकि उससे लोग भड़क गए थे और मजबूरन सीबीआई जांच करवानी पड़ी थी। सोचिए, इस जांच के कारण हिमाचल के काबिल पुलिस अफसर जेल चले गए। इन हिमाचल को पिछली सरकार के दौरान वन मंत्री को लेकर लेख नहीं छापने चाहिए थी। अच्छा ही हुआ था जो इसे ऐसा करने के लिए लीगल नोटिस मिला था। हिमाचल विरोधी पोर्टल के साथ ऐसा ही होना चाहिए।

सोचिए, ये कितना खराब पोर्टल है जिसे कोई पसंद नहीं करता। न राजनेता, न अफसरशाही। और तो और, इसे तो किसी भी राजनीतिक पार्टी के समर्थक पसंद नहीं करते। कांग्रेस वालों ने खूब गालियां दी थीं, अब बीजेपी की सरकार है तो बीजेपी वाले देते हैं। सोचिए, यह कैसे पोर्टल है जो ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं करवाता जिसमें कोई मंत्री शिरकत कर रहा हो। ये किसी को इनाम नहीं देता, कोई कॉन्टेस्ट नहीं करवाता, नेताओं को नहीं बुलाता। क्या फायदा इसका? और पोर्टलों और अखबारों को देखिए, पहले पेज पर हेडिंग ही यह होती है कि सीएम या मंत्री कहां जाएंगे। इसमें ऐसी कोई खबर नहीं होती। उल्टा लेख छपते हैं और वह भी सरकारी योजनाओं की लूपहोल्स वाले।

मैं पिछले कुछ सालों से राष्ट्रीय और हिमाचल के स्थानीय अखबारों और पोर्टलों के लिए लिखता रहा हूं मगर ऐसा पोर्टल कोई नहीं देखा। मेरा अनुभव कहता है कि ये पोर्टल हिमाचल विरोधी ही है। कमबख्त तटस्थ रहता है। हिमाचल के लोगों से लड़ता-भिड़ता है, उन्हें उकसाता है। और तो और, विधानसभा से जब बीजेपी बतौर विपक्ष वॉकआउट करती थी तब उसकी आलोचना करता था और अब वैसी ही आलोचना कांग्रेस के वॉकआउट की करता है। क्या हुआ जो हिमाचल में विपक्ष में सोया है। विपक्ष का काम यह ‘इन हिमाचल’ क्यों करता है? इसे अपने काम से काम रखना चाहिए, नेताओं की प्रेस कॉन्फ्रेंस कवर करनी चाहिए, सरकारी प्रेस रिलीज छापनी चाहिए, दो चार पेड न्यूज करनी चाहिए, सरकारी विज्ञापन लेने चाहिए और अपनी दुकान चलानी चाहिए। हम हिमाचली अपना खुद देख लेंगे, इन हिमाचल हमारी चिंता न करे।

(लेखक देश और हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लंबे समय से लिख रहे हैं, उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

बस मालिक को बचा रहे हैं गोविंद ठाकुर, तुरंत दें इस्तीफा: कुलदीप राठौर

शिमला।। कुल्लू के बंजार में हुए बस हादसे को लेकर कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर ने परिवहन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर पर गंभीर आरोप लगाया है। राठौर का कहना है कि गोविंद ठाकुर बंजार में दुर्घटनाग्रस्त हुई बस के मालिक को बचा रहे हैं। उन्होंने गोविंद ठाकुर से इस्तीफा मांगा है।

राठौर ने कहा कि गोविंद सिंह ठाकुर को नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने कहा, “जब मंत्री क्लीन चिट दे चुके हैं ोत फिर जांच करवाने का कोई औचित्य नहीं है।” गौरतलब है कि गोविंद ठाकुर ने कहा था कि हादसा मानवीय भूल के कारण हुआ था और बस की हालत ठीक थी। बाद में सवाल उठने पर परिवहन मंत्री ने स्पष्ट किया था कि उन्होंने किसी को कोई क्लीन चिट नहीं दी है।

इस बीच कुलदीप राठौर ने सड़कों और यातायात को सुरक्षित बनाने के सरकार के दावों पर सवाल उठाए। उन्होंने नूरपुर में हुए दर्दनाक बस हादसे को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि सरकार बताए कि नूरपुर बस हादसे की जांच रिपोर्ट का क्या हुआ।

नाम तो है मिनी स्विट्ज़रलैंड मगर टूरिस्टों का बज रहा है बैंड

चंबा।। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के पर्यटन स्थल खजियार में बड़ी संख्या में पर्यटक आ रहे हैं। खूबसूरत नजारे और अच्छे मौसम के कारण मिनी स्विट्ज़रलैंड के नाम से प्रसिद्ध इस जगह पर पिछले एक हफ्ते में पर्यटकों की संख्या बढ़ी है।मगर पर्यटकों के लिए यहां पर शौचालय तक की उचित व्यवस्था नहीं है।

खजियार में शौचालय एक ही है और उसकी अवस्था भी ठीक नहीं कही जा सकती। ऐसे में हजारों टूरिस्ट परेशान हो रहे हैं। खासकर महिलाओं को बहुत दिक्कत हो रही है। महिलाओं का कहना है कि शौचालय के लिए एक किलोमीटर दूर आना पड़ता है। पर्यटकों का सुझाव है कि यहां पर शौचालयों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और न हो तो टूरिस्ट सीजन के दौरान अस्थायी व्यवस्था करनी चाहिए।

इसके अलावा यहां एटीएम भी नहीं है जबकि वेंडर्स और अन्य लोगों को पेमेंट कैश से करनी होती है। अगर पैसे निकलवाने हों तो यहां से 25 किलोमीटर दूर चंबा या डलहौजी जाना पड़ता है। पर्यटकों का कहना था कि सरकारें बातें तो करती है मगर सुविधाएं पूरी नहीं होंगी तो किस तरह डिजिटल इंडिया और कैशलेस को पूरा हो पाएगा।

बस खरीद: एक साल में अपनी ही बात से पलट गए परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर?

शिमला।। कुल्लू बस हादसे के बाद हरकत में आई सरकार प्रदेश को यह विश्वास दिलाने में जुटी है कि वह अपनी तरफ से पूरे इंतजाम करने की कोशिश कर रही है। इस बीच परिवहन मंत्री ने कहा है कि प्रदेश सरकार जल्द ही 200 नई बसें खरीदने जा रही है ताकि प्रदेश में बसों की कमी की समस्या को जल्द हल किया जा सके।

परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर ने कहा है कि ‘बसों में ओवरलोडिंग की समस्या का निपटारा करने के लिए हिमाचल सरकार पथ परिवहन निगम के बेड़े को और मजबूत करना की सोच रही है और इसके लिए जल्द ही कदम भी उठाए जाएंगे।’ मगर हैरानी की बात यह है कि कुछ समय पहले परिवहन मंत्री का मानना था कि हिमाचल में एचआरटीसी के पास पर्याप्त बसें हैं और बावजूद इसके कांग्रेस सरकार ने बिना मांग के ही अतिरिक्त बसें खरीद ली थीं और इसकी जरूरत नहीं थी।

अब ओवरलोडिंग के लिए 200 बसों को खरीदने की जरूरत बता रहे परिवहन मंत्री ने एक साल पहले बाकायदा विधानसभा में कहा था कि पर्याप्त बसें होने के बावजूद पिछली कांग्रेस सरकार ने कर्ज लेकर अतिरिक्त बसें खरीद लीं और वह भी बिना मांग के। 13 मार्च, 2018 को सदन की कार्रवाई के दौरान नगरोटा बगवां के विधायक अरुण कुमार के सवाल के जवाब में परिवहन मंत्री ने यह बात कही थी।

विधानसभा में दिए गए परिवहन मंत्री के उत्तर का एक अंश

क्या कहना था परिवहन मंत्री का
प्रश्न संख्या 65 के जवाब में परिवहन मंत्री ने कहा था कि 2012-13 तक 1800 बसों का बेड़ा था तो उसके बाद बसें खरीदने की जरूरत नहीं थी मगर कांग्रेस सरकार ने 2100 बसें अतिरिक्त खरीदीं और वह भी बिना डिमांड के। उनका कहना था कि वित्त विभाग के अनुसार 2500 बसों का बेड़ा उपयुक्त होगा उससे प्रॉडक्टिविटी चलाकर काम करेंगे।

परिवहन मंत्री ने कहा था- ‘माननीय सदस्यों ने इसी क्रम में अपना एक प्रश्न किया है कि कुल कितनी बसें खरीदी गईं? अध्यक्ष जी, मैं आपके माध्यम से माननी सदस्यों को जानकारी देना चाहता हूं कि वर्ष 2011-12 तक परंपरा थी कि कभी भी बसों को खरीदने के लिए अतिरिक्त लोन नहीं लिया जाता था। जो कैपिटल ग्रांट है, उसके अगेंस्ट ही बसें ली जाती थीं परंतु साल 2013-13 से लगातार बसों की खरीद के लिए सैकड़ों करोड़ रुपयों का लोन लिया जाता रहा। हैरानी तो यह है कि साल 2012-13 तक 1800 बसों का टोटल बेड़ा था तो उसक बाद इतनी बसें खरीदने की आवश्यकता ही नहीं थी। लगभग 2100 बसें और अतिरिक्त जो खरीदी गईं वे बिना किसी डिमांड के खरीदी गईं। अभी वर्ष 2017-2018 में 325 बसें और ली गई हैं। अभी वित्त विभाग की ऑब्जर्वेशन थी कि हिमाचल प्रदेश में बसों का बेड़ा 2500 बसों का होगा तो उपयुक्त उनकी प्रोडक्टिविटी चलाकर काम करेंगे।

पूरे सवाल और जवाब को यहां पर क्लिक करके विधानसभा की कार्यवाही के लेखे-जोखे में पढ़ा जा सकता है।

हालांकि उस समय भी बात उठी थी कि हिमाचल प्रदेश में हर जगह हर रूट को मुनाफे के हिसाब से नहीं देखा जा सकता क्योंकि यह जनता को दी जाने वाली सुविधाओं का मामला है। अगर किसी दूर-दरूज के गांव में 10 लोग रोज आते-जाते हैं और वहां के लिए और कोई बस नहीं तो क्या डीजल का खर्च भी पूरा नहीं हो रहा है, यह कहकर उस रूट को बंद कर दिया जाएगा?

अब खुद क्यों खरीद रहे बसें?
एक साल पहले तक बार-बार एचआरटीसी के पास अतिरिक्त और गैर जरूरी बसें होने और आवश्यकता न होने पर भी बसें खरीद लिए जाने की बात कहने वाले परिवहन मंत्री को अब अचानक 200 बसों की जरूरत कहां से महसूस हुई, यह चर्चा का विषय बन गया है। वह भी तब, जब डेढ़ साल बाद भी जेएनएनयूआरएम के तहत खरीदी गई बसों का मसला सुलझा पाने में वह नाकाम रहे हैं।

JNNURM की बसें सड़ती हुईं। (IMAGE: MUNISH DIXIT)

सवाल यह भी उठ रहा है कि राज्य में बसों की जरूरत कितनी है, इसे लेकर एक साल पहले उन्हें गलत आकलन की वजह से अधिकारियों ने गलत जानकारी तो नहीं दी थी।

हिमाचल में क्यों होते हैं इतने हादसे, वजह जानकर हैरान रह जाएंगे आप

तरुण गोयल।।  साल 2014 में हिमाचल सरकार ने रोड एक्सीडेंट डेटा मैनेजमेंट सिस्टम (RADMS) बनाने के लिए TRL लिमिटेड कंपनी से कंसल्टेंसी एग्रीमेंट किया। विदेशी कंपनी, अंग्रेजी ताकतें, महँगा सौदा।

मार्च 2014 में प्रोजेक्ट शुरू हो गया। हेल्थ डिपार्टमेंट, पुलिस महकमा, ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट और क्राइम रिकॉर्ड बयूरो ने मिलकर इस कम्पनी को इनपुट दिए। (क्राइम ब्यूरो और पुलिस विभाग को छोड़ कर अन्य विभागों ने क्या इनपुट दिए, ये कहा नहीं जा सकता।) इस बीच हादसे होते रहे और सरकार ने अक्टूबर 2018 तक दो बार इस कम्पनी का कॉन्ट्रेक्ट रिन्यू किया।

कम्पनी ने एक बहुत अच्छी रिपोर्ट बनाई। 1 अगस्त 2015 से लेकर 30 जून 2018 तक एक्सीडेंट का लेख जोखा तैयार किया। आंकड़ों में अगर ये न लिखा जाए कि ये बस हादसे हैं, तो आपको लगेगा जैसे हिमाचल में हर रोज आतंकी हमले हो रहे हैं और लोगों की जानें जा रही हैं।

पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करके डाउनलोड करें

क्या कहते हैं आंकड़े

  • इस अवधि में 9076 एक्सीडेंट हुए।
  • 13325 गाडियाँ इन हादसों में भिड़ी और गिरी (दुपहिया, चौपहिया, इत्यादि)
  • 3597 लोगों की मौत हुई
  • 3 साल में 3600 लोग, हर साल 1200 लोग, हर महीने 100 लोग मारे गए।
  • सबसे ज्यादा हादसे हुए NH पर क्योंकि लेन सैपरेटर नहीं हैं, स्पीड कंट्रोल नहीं है, दारू पीकर गाड़ी चलाने वालों को आज भी मुहँ या हाथ पर फूंक मरवा कर कंट्रोल किया जा रहा है।
  • सबसे ज्यादा हादसे हुए मंडी और काँगड़ा में, जबकि लाहौल चंबा में सबसे कम।
  • रिपोर्ट में बताया है कि क्रैश बैरियर न होना हादसों का सबसे बड़ा कारण रहा है (मालिक लोग हाल ही में जर्मनी गए थे, क्रैश बैरियर बनाने की ट्रेनिंग भी ले आते)।
  • 1850 गाड़ियां इस अवधि में क्रैश बैरियर न होने की वजह से सड़क से उतर गईं।
  • 33 प्रतिशत हादसों में ड्राइवर बिना लाइसेंस के थे। (ये गैर लाइसेंसी ड्राइवर ही पुलिस पर अपना मोबाइल कैमरा खोल कर धावा बोलते दिखाई देते हैं।)
  • 1868 हादसों में सड़क पर अपना काम कर रहे या बगल में चल रहे पदयात्रियों को पेल दिया गया। इन हादसों में 2380 पदयात्री शामिल थे।

जब 2009 में मेरा एक्सीडेंट हुआ था, तो घायलों को 9 हजार मिला था और मृतकों को 20 हजार। मुझे 9 हजार देने के लिए तत्कालीन मंत्री लाव लश्कर के साथ आये थे और चेक/ड्राफ्ट देते हुए फोटो भी खिंचवाया था।

आज की डेट में रेट जरूर बढ़ गए हैं पर जान बहुत सस्ती हो गयी है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले से हैं और ट्रैवल ब्लॉगर हैं। यह लेख उन्होंने फेसबुक पर भी पोस्ट किया है।)

ये लेखक के निजी विचार हैं

कुल्लू: अब तक 44 लोगों की मौत, जानें हादसे के 5 कारण

कुल्लू।। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के बंजार में गुरुवार शाम चार बजे के करीब हुए बस हादसे में मरने वालों की संख्या 44 पहुंच गई है। 35 लोग घायल हैं और उनका इलाज चल रहा है। बस एक मोड़ के पास अनियंत्रित होकर 500 फुट गहरी खाई में गिर गई थी। बस ओवरलोड थी और इसमें क्षमता से लगभग दोगुने यात्री भरे हुए थे। अब हादसे को लेकर कुछ और बातें भी सामने आ रही हैं। जानें, अब तक मिली जानकारी के अनुसार हादसे के क्या कारण हो सकते हैं-

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1. पुरानी बस
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने हादसे की मजीस्ट्रियल जांच के आदेश दे दिए हैं। मगर इस बीच कुछ और बातें भी सामने आ रही हैं जिससे पता चल रहा है कि हादसा क्यों हुआ। सबसे पहली बात तो यह कि बस पुरानी थी और अक्सर उसमें दिक्कतें आती रहती थी। ऐसा कहा जा रहा है कि गियर फंस जाने के कारण यह हादसा हुआ।

2. ओवरलोडिंग
यह बस ओवरलोडेड थी। जहां पर यह हादसा हुआ, वहां मोड़ के साथ चढ़ाई भी थी। इस बस में लगभग 80 यात्री सवार थे और उनमें से कुछ छत पर भी बैठे थे। इस कारण चढ़ाई में बस अनियंत्रित हो गई। हालांकि पुलिस ने शुरुआती जांच में पाया है कि मोड़ के पास बस की ब्रेक न लगने से यह हादसा हुआ।

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3. अनाड़ी ड्राइवर
इस बस का ड्राइवर नौसिखिया होने की बातें भी सामने आ रही हैं। अमर उजाला ने लिखा है कि ड्राइवर पहली बार इस बस को चला रहा था वह बस से कूद गया था। पंजाब केसरी ने लिखा है- “लोगों का कहना है कि इस प्राइवेट बस में कोई रेगुलर चालक कभी नहीं देखा। कभी जीप चालक उसे चलाता है तो कभी टिप्पर चालक उसे चलाते हुए देखा गया है।”पुलिस ने चालक के खिलाफ मामला दर्ज करके छानबीन शुरू कर दी है। ड्राइवर के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है।

4. सुरक्षा के उपाय नहीं
जहां पर यह हादसा हुआ है, वहां तीखे मोड़ों के पास खड़ी घाटी है। यहां पर हादसे होने की आशंका बनी रहती थी। मगर जहां से बस गिरी, वहां न तो पैरापिट थे और न ही क्रैश बैरियर।

5. प्रशासनिक लापरवाही
हादसे के लिए प्रशासन भी जिम्मेदार माना जा सकता है। दरअसल लोगों का कहना है कि अक्सर ही यह बस ऐसे ही ओवरलोडेड जाती थी मगर किसी ने रोकना उचित नहीं समझा। कुल्लू और मंडी के अंदरूनी इलाकों के लोग मजबूरी में इस बस से यात्रा करते थे।

इस बस में यात्री ज्यादा होने का कारण यह भी बताया जा रहा है कि ग्रामीण इलाकों के लोगों के पास रोजगार के साधन कम हैं इसलिए वे पैसे बचाने के चक्कर में निजी बस से जाते थे क्योंकि सरकारी बसों की तुलना में निजी बस कम किराया लेती थी।

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