क्या है आपातकाल? कब और क्यों लगा देश में आपातकाल

राजेश वर्मा।। आपातकाल एक ऐसा शब्द जिसको सुना तो सभी ने होगा लेकिन इसे व्यावहारिक रूप से अपने जीवन काल में झेलने वाले ही इससे भलीभाँति परिचित होंगे। देश अतीत में 3 बार आपातकाल से गुजरा, दो बार पड़ोसी देशों के साथ युद्ध के समय और एक बार देश के भीतर राजनीतिक परिस्थितियों के चलते देश ने आपातकाल का सामना किया। इस आपातकाल को स्वतंत्र भारत के इतिहास में आज भी एक काले अध्याय के रूप में जाना जात है।

आपातकाल है क्या?
आज देश का कोई भी नागरिक स्वतंत्रता को अपनी जिंदगी में सबसे अहम मानता है। वह चाहता है की संविधान ने जो अधिकार दिए हैं उनका बिना किसी अड़चन के उपभोग और उपयोग करे। आज के दौर में प्रत्येक व्यक्ति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी भी प्रकार की कोई बंदिशें नहीं चाहता यदि कोई व्यवस्था या सरकार इस पर अंकुश लगाने की सोचती भी है तो देश का नागरिक इस चीज़ का प्रखर विरोध करने पर उतारू हो जाता है। वह इसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता।

उसकी स्वतंत्रता पर यदि कोई प्रहार होता भी है तो वह सीधा संविधान को ढाल बनाकर सरकार व व्यवस्था से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है। लेकिन जिस संविधान ने हमें यह स्वतंत्रता दी है वही संविधान इस स्वतंत्रता को विशेष परिस्थितियों में छीनने का अधिकार भी सरकार को देता है और उस समय संविधान भी हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता।

आपातकाल की परिस्थितियों में देश का संविधान देश के नागरिकों के अधिकार निलंबित कर देता है। भारतीय संविधान में वर्णित तीन प्रकार के आपातकालों में से पहला है राष्ट्रीय आपातकाल जो संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन है। राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा काफ़ी विकट स्थितियों में होती है जैसे युद्ध, बाह्य आक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा आदि इस आपातकाल के उदाहरण है। एक तरफ आपातकाल के दौरान नागरिकों के अधिकार छीन लिए जाते हैं तो वहीं दूसरी ओर इस दौरान सरकार के पास असीमित अधिकार आ जाते हैं, जिसका प्रयोग वह किसी भी रूप में करने के लिए स्वतंत्र होती है।

देश के भीतर आपातकाल मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा लागू किया जाता है। इस दौरान संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों का अनुच्छेद 19 स्वत: निलंबित हो जाता है जबकि अनुच्छेद 20 और अनुच्छेद 21 अस्तित्व में बने रहते हैं।

दूसरी प्रकार का आपातकाल है संविधान के अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन अथवा राज्य में उस आपात स्थिति का होना जिसमें किसी राज्य में राजनीतिक संकट के मद्देनज़र देश के राष्ट्रपति संबंधित राज्य में केंद्र की अनुशंसा पर आपात स्थिति की घोषणा कर सकते हैं। अर्थात राष्ट्रपति शासन की व्यवस्था लागू कर देते हैं। ऐसा तब होता है जब किसी राज्य की राजनैतिक और संवैधानिक व्यवस्था विफल हो जाती है अथवा राज्य सरकार केंद्र की कार्यपालिका के किन्हीं निर्देशों का अनुपालन या वहां का शासन करने में असमर्थ हो जाता है।

इन परिस्थितियों में राज्य के न्यायिक कार्यों को छोड़कर केंद्र शेष राज्य प्रशासनिक अधिकार अपने हाथों में ले लेती है। इसकी अवधि न्यूनतम 2 माह से लेकर 3 साल तक रहती है। इस स्थिति में नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 360 के अनुसार आपातकाल तीसरी प्रकार का आपातकाल वित्तीय आपातकाल है।

वैसे देश के इतिहास में अब तक ऐसी नौबत नहीं आयी जो इसे लागू किया गया हो। इसकी घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब उन्हें पूरी तरह से विश्वास हो जाए कि देश पर ऐसा आर्थिक संकट बन गया है जिसके जिसके कारण देश के वित्तीय स्थायित्व या साख को खतरा है। साधारण शब्दों में देश दिवालिया होने की कगार पर हो। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से धराशायी हो जाती है तो सरकार आम नागरिकों की संपत्ति व पैसे पर अधिकार कर लेती है व कर्मचारियों के वेतन को कम करना या पूरी तरह बंद भी कर सकती है।

गौरतलब है कि संविधान में वर्णित तीनों आपात उपबंधों में से वित्तीय आपात को छोड़ कर देश अतीत में बाकी दो आपातकाल को झेल चुका है। सबसे पहले देश में चीन के साथ युद्ध के समय 26 अक्टूबर 1962 को आपातकाल लगा जो 10 जनवरी 1968 तक रहा। दूसरा आपातकाल 3 दिसंबर 1971 को तब लगा जब पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ। तीसरा और सबसे चर्चित आपातकाल का दौर वह था जब देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक शांति के बिगड़ने के नाम पर देश पर यह थोप दिया।

आज से 44 वर्ष पहले घोषित किए गए आपातकाल की घोषणा 25 जून 1975 की आधी रात को की गई और यह 21 मार्च 1977 तक लगा रहा । स्वतंत्र भारत के राजनीति इतिहास में इस आपातकाल को एक काले अध्याय के रूप में भी जाना जाता है। इस आपातकाल में ऐसा क्या था कि 1971 के आम चुनाव में ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ 352 सीटें जीत कर प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली कांग्रेस सरकार की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को इसको देश पर थोपना पड़ा जबकि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में बनी इस सरकार ने दिसंबर 1971 में पाकिस्‍तान को युद्ध में ऐसी शिकस्‍त दी और उसके दो टुकड़े कर नया देश बांग्‍लादेश दुनिया के नक्‍शे स्थापित कर दिया।

किसी ने इंदिरा गांधी को ‘मां दुर्गा’ कहा तो कोई उनको ‘आयरन लेडी’ कह कर पुकारने लगा। इस दौरान उन्हें भारत रत्‍न से भी नवाजा गया। लेकिन इंदिरा का यह सुनहरा काल ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया। उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर देश में आपातकाल लगाने के फैसले पर दस्तखत कर दिए।

26 जून 1975 की सुबह समूचा देश रेडियो पर इंदिरा गांधी की आवाज में आपातकाल की घोषणा को सुनकर स्तब्ध रह गए। लोकसभा चुनाव में इंदिरा गाँधी के हाथों हारने के बाद राजनारायण इस मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में लेकर चले गए। जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रायबरेली चुनाव अभियान में इंदिरा को सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करने का दोषी पाया। उनके चुनाव को खारिज करने के साथ ही इंदिरा पर छह साल तक चुनाव लड़ने व किसी भी तरह के पद संभालने पर भी रोक लगा दी थी।

कहते हैं इस फैसले के बाद इंदिरा हालांकि प्रधानमंत्री की कुर्सी को छोड़ने के लिए तैयार भी हो गई थी लेकिन कांग्रेस पार्टी ने अपने बयान में कहा कि इंदिरा गाँधी का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है। विपक्ष द्वारा जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में पिछले एक वर्ष से लगातार इंदिरा पर इस्तीफा देने का जो दबाव बनाया हुआ था। इन सब परिस्थितियों के चलते आखिरकार इंदिरा गाँधी ने देश पर आपातकाल थोप दिया।

इस आपातकाल में सभी चुनाव स्थगित हो गए थे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस समय गिरफ्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश करने और जमानत मांगने का भी अधिकार नहीं था। सरकार ने मीसा (मैंटीनेन्स ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट) के तहत कदम उठा कर सभी विपक्षी दलों के नेताओं को जेलों में बंद कर अज्ञात जगहों पर रखा।

यह आपातकाल इसलिए दुखद था क्योंकि इसमें किसी बाहरी देश से युद्ध के हालात नहीं थे बल्कि आंतरिक शांति के नाम पर देश की जनता पर यह जबरदस्ती थोपा गया आपातकाल था। सबसे ज्यादा दुखद पहलु इस आपातकाल के दौरान यह थे कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता छीन ली गई, प्रैस की स्वतंत्रता को कुचला गया, विपक्षी नेताओं, युवाओं व अन्य लोगों को देश भर की जेलों में ठूंसा गया।

देश ने स्वतंत्रता के बाद जिस संविधान को अपना कर लोगों को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया। इस आपातकाल ने वही मौलिक अधिकार नागरिकों से छीन लिए और इनकी रक्षा के लिए जिन लोकतांत्रिक सरकारों को देश के नागरिकों द्वारा चुना गया उसी सरकार ने संविधान की मूल भावना के खिलाफ़ जाकर लोगों के अधिकारों को छीन लिया। इस बात को बाद में 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना की आपातकाल के दौरान जीने तक का हक अर्थात नागरिकों के मौलिक अधिकार छीन लेने के लिए उससे भी कहीं न कहीं गलती हुई थी।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा लम्बे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे vermarajeshhctu @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

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