क्यों और कैसी होनी चाहिए कर्मचारियों के लिए ट्रांसफर पाॅलिसी

राजेश वर्मा।। प्रदेश में जब जयराम सरकार बनी तो सरकार ने आते ही घोषणा कर कहा था कि जल्द ही प्रदेश के कर्मचारियों के लिए एक उपयुक्त स्थांतरण नीति बनाई जाएगी जिसके लिए उन्होंने आमजन व कर्मचारियों से भी इस दिशा में सुझाव आमंत्रित किए। प्रदेश में जब भी सत्ता परिवर्तन होता है कर्मचारी वर्ग के लिए एक बेहतर स्थांतरण नीति बनाई जाने की बातें सामने आती है। इस बार भी सरकार बने डेढ़ वर्ष हो चला है लेकिन आजदिन तक स्थानांतरण नीति पर बातें ही होती आई, धरातल पर कुछ नहीं हुआ।

पिछले कुछेक दिनों से एक बार फिर यह मुद्दा सुर्खियों में बना हुआ है कि “स्थानांतरण नीति बनेगी” लेकिन बनी क्यों नहीं? सच माना जाए तो इसके न बनने के पीछे वजह चाहे सरकारों में इच्छाशक्ति की कमी रही हो, कर्मचारियों का दबाव रहा हो या फिर कुछ और कारण, इन सब कारणों का बहाना भले ही सरकारों को नीति न बनाने दे लेकिन छोटे से प्रदेश में बदला-बदली की चर्चा सभी जगह होती है। प्रत्येक सरकार कहती है कि बदला-बदली नहीं करेंगे लेकिन बदला-बदली न हो यह असंभव है। कारण- कर्मचारी वर्गों का राजनीतिक धड़े में बंटा होना। सत्ता परिवर्तन के साथ ही कर्मचारी भी “तेरी-मेरी सरकार” की नीति पर सरकार को चलने के लिए मजबूर कर देते हैं।

खैर बात चली है स्थांतरण नीति की तो यह सत्य है घर और अपनों से दूर जाने का ख्याल सभी को कचोटता है। हमारे प्रदेश की भौगोलिक स्थितियां ऐसी है की जहां अन्य पड़ोसी राज्यों में 50 किलोमीटर का सफर करने के लिए मात्र 40-45 मिनट लगते हैं तो वहीं यहाँ बहुत से क्षेत्रों में 3 से 4 घंटे तक लग जाते हैं। प्रदेश में सबसे ज्यादा शिक्षक वर्ग को तबादलों की मार झेलनी पड़ती है। अन्य विभागों के ज्यादातर कार्यालय जिला स्तर, मंडल स्तर या फिर उप-मंडल स्तर पर स्थित होते हैं इसलिए उन्हें उतनी मार नहीं झेलनी पड़ती जितनी शिक्षकों को इस चीज से जूझना पड़ता है।

एक शिक्षक व अन्य कर्मचारी भले ही घर से दो सौ किलोमीटर दूर कार्यरत हो लेकिन शिक्षक का स्कूल फिर भी सड़क से 10 किलोमीटर की पैदल दूरी पर स्थित हो सकता है जबकि अन्य सार्वजनिक कार्यालय सड़क के साथ ही स्थित होगा। एक कर्मचारी के नजरिए से देखा जाए तो एक प्रभावशाली स्थानांतरण नीति बनाते समय कुछेक चीजें अवश्य होनी चाहिए।

भविष्य में होने वाले तबादलों के लिए “स्थानांतरण नीति” नहीं “स्थानांतरण एक्ट” बनना चाहिए नीति के स्थान पर नियम बनाए जाएं। प्रदेश के क्षेत्र ट्राईबल व हार्ड एरिया के आधार पर ही तय न हों। भविष्य में स्थानांतरण दूरी के हिसाब से हों न की क्षेत्र व जोन के आधार पर। अभी तक देखा है कि क्षेत्र विशेष के कर्मचारी अपना पूरा सेवाकाल एक ही क्षेत्र में पूरा कर लेते हैं उनके लिए दुर्गम क्षेत्र, सामान्य क्षेत्र उनका गृह क्षेत्र ही रहता है जबकि अन्य क्षेत्रों के कर्मचारियों को पूरे सेवाकाल के दौरान बहुत सी जगहों के लिए स्थानांतरित होना पड़ता है।

स्थानांतरण नियमों में दूरी को ही पैमाना बनाना चाहिए। यह नहीं की एक कर्मचारी या शिक्षक घर से 250 किलोमीटर दूर रहे है तो वहीं अन्य सदैव अपने घर के चंद मीलों की दूरी पर ही सेवाकाल पूरा कर दें। चाहे जोन के आधार पर तबादले हों या जिलों के आधार पर, हर जगह दूरी को ही मुख्य शर्त रखा जाए क्योंकि जोन और जिले तो एक किलोमीटर की कम दूरी पर भी बदल जाते हैं।

कई कर्मचारी, जिनकी सिफारिश करने वाला कोई नहीं, फुटबॉल की तरह ट्रांसफर झेलते हैं

सामान्य 3 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर चुके कर्मचारी से आनलाइन आवेदन आमंत्रित किए जाएं जिसमें पिछले स्टेशनों की जानकारी भी मांगी जाए जैसे की क्या वह दुर्गम क्षेत्र में अपना कार्यकाल पूरा कर चुका है या नहीं? क्या वह शहर या नगरों में या अपने गृह क्षेत्र में भी सेवा कर चुका है या नहीं? वहीं किसी कर्मचारी ने अपना दुर्गम क्षेत्र का कार्यकाल पूरा नहीं किया तो दुर्गम क्षेत्र में अपना कार्यकाल पूरा कर चुके कार्यरत कर्मचारी से उसे स्थानांतरित कर दिया जाए। यह सुनिश्चित हो की प्रत्येक कर्मचारी को अपने पसंद के स्टेशन पर अपने सेवाकाल में कम से कम एक बार तैनाती मिली या नहीं?

तबादलों के इच्छुक कर्मचारियों से तीन स्टेशन की आप्शन मांगी जाए, प्रत्येक कर्मचारी को एक यूनिक कोड आवंटित किया जाए किसी भी कर्मचारी का स्थानांतरण उसके नाम से न हो बल्कि उसी यूनिक कोड के आधार पर हो जो उसे दिया गया है। यह इतने गोपनीय तरीके से हो की किसी भी संबंधित कर्मचारी या अधिकारी को इसकी जानकारी न मिल पाए की फंला कर्मचारी का स्थांतरण साफ्टवेयर द्वारा उस यूनीक नंबर के आधार पर किया गया है। वह साफ्टवेयर ही संबंधित विभाग व कर्मचारी को मेल या अन्य किसी साधन द्वारा सूचित करे। स्थांतरण करने की प्रक्रिया वर्ष में केवल विशेष माह में ही शुरू व संपन्न हो जैसे शिक्षा विभाग में शैक्षणिक सत्र की शुरूआत होने से पहले संपन्न हो जाए।

यह नियम पूरी तरह खत्म किया जाए की प्रथम नियुक्ति दुर्गम व जनजातीय क्षेत्र में हो क्योंकि कहीं सिफारिश तो कहीं रिक्तियां न होने के कारण यह नियम आधा अधूरा ही लागू हो पाता है। यदि कोई कर्मचारी या उसका पारिवारिक सदस्य पति-पत्नी, बच्चे व बूढ़े माता-पिता आदि में से कोई गंभीर बीमारी से लंबे समय से ग्रसित है तो ऐसी परिस्थितियों में स्थांतरण करते समय इन सामजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखा जाए। उन्हें किसी तरह से परेशान नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें इच्छानुसार स्टेशन मिलना चाहिए। बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल के लिए पुरुष व महिला कर्मचारी में से किसी एक को उनके घर के नजदीक तैनाती दी जाए। बशर्ते वह उनकी देखभाल करते हों।

विवाहित महिला कर्मचारियों के मामले में यदि पति कर्मचारी हो तो दोनों को एक ही मंडल या उपमंडल पर तैनात किया जाए। अविवाहित महिला कर्मचारियों को कोशिश की जाए की उनको उनके गृह क्षेत्र में ही तैनाती मिले, गृह क्षेत्र की परिधि की सीमा तय कर ली जाए वह 15 से 20 किलोमीटर के दायरे में हो, यदि किसी विद्यालय या कार्यालय से संबंधित स्थानीय लोग या स्कूल प्रबंधन समिति के ज्यादातर सदस्य किसी शिक्षक/कर्मचारी को उसके कार्य की वजह से उसी विद्यालय/कार्यालय में लंबे समय तक रखना चाहते हैं तो जनहित को देखते हुए उस शिक्षक/कर्मचारी की तैनाती ज्यादा से ज्यादा एक वर्ष तक बढ़ा दी जाए। सेवानिवृत्त को 5 वर्ष रहने पर कर्मचारियों को गृह क्षेत्र या पसंद के किन्हीं दो स्टेशनों पर समायोजित किया जाना चाहिए जो गृह क्षेत्र से 15-20 किलोमीटर की परिधि में हो।

जिस तरह केन्द्रीय कर्मचारियों के लिए आवास, चिकित्सा व बच्चों की शिक्षा के लिए उचित प्रबंध होता है इसी तर्ज पर प्रदेश के उन कर्मचारियों के लिए भी प्रावधान हो जो कर्मचारी घर से बाहर सेवारत हों। सरकार भले ही कोई हो, तबादला सभी का होना चाहिए लेकिन बदले की भावना से न हो इस बात पर जरूर गौर करना चाहिए क्योंकि स्वच्छ राजनीति और समाज के लिए यह जरूरी है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के नेतृत्व में बनी इस सरकार से कर्मचारियों को स्थांतरण नीति को लेकर बहुत उम्मीदें हैं। अब समय आ गया है या तो सरकार कारगर स्थानांतरण नियम बनाए या फिर इस विषय को उठाना ही बंद कर दे क्योंकि मात्र खबरों में ही स्थानांतरण नीति पर बात करने से सरकार की इच्छा शक्ति पर ही प्रश्नचिह्न लगता है।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा लम्बे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे vermarajeshhctu @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

जयराम जी, केवल ‘लगाने’ भर से नहीं लग जाते हैं पौधे

0

चिरंजीत परमार।। जयराम जी, आप तो किसान परिवार से हैं। आपको इस बात से बखूबी वाकिफ होना चाहिए के पौधे केवल “लगाने” भर से ही नहीं लग जाते। रोपने के बाद इनकी समुचित देखभाल भी होनी चाहिए। क्या आपने (मेरा मतलब सरकार ने) यह भी सुनिश्चित किया है कि इन पौधों की बाद में देखभाल भी जाएगी?

कोई कर्मी यहाँ नियमित रूप से जाया करेगा, इनके तौलिये आदि बना कर इनकी गुड़ाई करेगा? जब जरूरत होगी तो इनकी सिंचाई करेगा? इनको जंगली जानवरों से बचाएगा? कीड़े या बीमारी का प्रकोप होने पर इनका समुचित बचाव करेगा, बाद में इनके खाद आदि भी दी जाएगी?

खबर

अगर ऐसा नहीं होगा तो इन पौधों का भी वही हश्र होगा जो पिछले साठ वर्षों से वन महोत्सवों या अन्य पौधारोपण समारोहों में लगाए गए अरबों-खरबों पौधों का हुआ है। कहीं नजर आते हैं वे पौधे?

ऐसे समारोहों का कोई लाभ नहीं है जब तक यह सुनिश्चित न कर लिया जाये कि रोपने के बाद इन पौधों के समुचित देख भाल की जाएगी और इनको किसी भी हालत में मरने नहीं दिया जाएगा।

आप तो जानते हैं कि नया रोपा हुआ पौधा छोटे बच्चे के तरह देखभाल मांगता है जो कम से कम चार साल तक चलनी चाहिए। तभी इन आयोजनों का लाभ हो सकेगा वरना ये पैसे की बरबादी के सिवाय कुछ नहीं हैं।

जय राम जी, आप अन्य नेताओं से अलग पृष्ठ भूमी के नेता हैं। आप इन कार्यक्रमों में बदलाव लाएँ ताकि वास्तव में परिणाम मिल सकें। यह आपकी बहुत उपलब्धि लोगी और इसके लिए आप याद रखे जाएँगे।

मेरा मित्रों से अनुरोध है कि वे इस पोस्ट को इतना शेयर करें कि यह माननीय मुख्य मंत्री महोदय तक पहुँच जाये और वे इस पर कारवाई कर लें।

(लेखक जानेमाने फ्रूट साइंटिस्ट हैं। लेख उनकी फेसबुक टाइमलाइन से आभार सहित लिया गया है)

इंदु गोस्वामी का इस्तीफा मंजूर, धनेश्वरी ठाकुर संभालेंगी महिला मोर्चा

शिमला।। इन्दु गोस्वामी के भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के बाद मनाली से धनेश्वरी ठाकुर को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है।

बता दें कि लंबे समय से कथित तौर पर अपनी अनदेखी से नाराज चल रही इंदु गोस्वामी ने गुरुवार को भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया था। इसे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने स्वीकार कर लिया है।

इंदु गोस्वामी

शुक्रवार को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की ओर से जारी बयान में बताया गया कि महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्षा इंदू गोस्वामी ने स्वेच्छा से अपने पद से त्याग पत्र दिया है जिसे मंजूर कर लिया गया है। यह जानकारी भी दी गई है को उनके स्थान पर धनेश्वरी ठाकुर को भाजपा महिला मोर्चा की कार्यकारी प्रदेश अध्यक्षा नियुक्त किया गया है और यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होगी।

धनेश्वरी ठाकुर

कौन हैं धनेश्वरी
धनेश्वरी ठाकुर प्रदेश सरकार में मंत्री और मनाली के विधायक गोविंद ठाकुर की बहन हैं। वह प्रदेश भाजपा महिला मोर्चा की महासचिव हैं और महिला आयोग की अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।

ड्रग्स पर लगाम के लिए यह है कांगड़ा के नए पुलिस कप्तान का प्लान

धर्मशाला।। जिला कांगड़ा में गुरुवार को एसपी विमुक्त रंजन ने पदभार संभाला। पदभार संभालने उपरांत पत्रकारों से बातचीत में एसएसपी ने कहा कि जिला कांगड़ा प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है, ऐसे में यहां चैलेंज भी होगा।

उन्होंने कहा कि समस्याएं हैं तो उनका समाधान किया जाएगा। जिला में उनकी काफी प्राथमिकताएं रहेंगी। सबसे बड़ा चैलेंज धर्मशाला में ट्रैफिक कंट्रोल रहेगा, धर्मशाला टूरिस्ट डेस्टीनेशन है। एसपी ने कहा कि यहां पर ट्रैफिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करना उनकी प्राथमिकता रहेगी, ताकि बाहर से आने वाले लोगों को कोई परेशानी न हो।

इसके अतिरिक्त नशे और खनन पर भी फोकस किया जाएगा। उन्होंने कहा कि वर्तमान में ड्रग्स का प्रचलन है, इसके मामले काफी ज्यादा बढ़ गए हैं, इस पर फोकस किया जाएगा। ड्रग्स माफिया पर लगाम कसने के लिए रणनीति के तहत कार्य किया जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था की जाएगी कि पुलिस में शिकायत करने वाले को उसके केस की अपडेट मिलती रहे।

विमुक्त रंजन ने कहा कि यहां पर जिस तरह की परिस्थितियां सामने आएंगी, उसके आधार पर ही जो समस्याएं पेश आती जाएंगी, उनके समाधान को कदम उठाए जाएंगे। नशा कारोबार में संलिप्त लोगों को इससे दूर करने के लिए इसका स्थायी समाधान करने की जरूरत है। ड्रग्स पर एसपी ने कहा कि ड्रग पेडलर्स को पुलिस के साथ नहीं पकड़ा जा सकता, बल्कि इसके लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान होना जरूरी है, न कि मैन पावर।

विभिन्न पुलिस थानों में स्थापित नशा निवारण समितियों को प्रोत्साहित करते हुए स्कूल व गांवों तक ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि हम जनता के लिए हैं। स्टाफ की कमी को समय-समय पर दूर करने के प्रयास किए जाते हैं और हमारा प्रयास रहेगा कि कम स्टाफ में भी हम बेहतर रिजल्ट दे सकें। एसपी ने कहा कि वह पहले भी जिला कांगड़ा में सेवाएं दे चुके हैं, ऐसे में यहां की परिस्थितियों से भली भांति परिचित हैं।

मंडी के धर्मपुर में कथित पाइप घोटाला बना चर्चा का विषय

मंडी।। हिमाचल प्रदेश के सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर के इलाक़े में 25 सार्वजनिक नल लगाने में 12296 पाइपें इस्तेमाल होने की बात सामने आई है। आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर दावा किया जा रहा है कि आईपीएच विभाग मंडल धर्मपुर ने 25 सार्वजनिक नल कनेक्शन के लिए आधे और पौने इंच की हज़ारों पाइपें लगा दी हैं, जिसे कीर्तिमान बताया जा रहा है। अब विभाग के एक्सईएन का कहना है कि इतनी ज्यादा पाइप इस्तेमाल नहीं हो सकतीं। उनका कहना है कि एक बार आरटीआई को चेक करना पड़ेगा कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई।

एक नल के लिए 491 पाइप?
दरअसल आरटीआई से मिली जानकारी के आधार पर गड़बड़झाले का आरोप लगाने वाले जिला परिषद सदस्य भूपेंद्र सिंह ने इस मामले में उच्च स्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि इस मामले में विभाग का पूरा हाथ है। उन्होंने कहा कि पूरे प्रदेश की पाइप धर्मपुर में लाकर उनका दुरुपयोग करना कहां तक जायज है। उन्होंने आरटीआई से मिली जानकारी का हवाला देते हुए कहा है कि मंडल में 25 उपभोक्ताओं के लिए सार्वजनिक नल लगाए गए जिनके लिए सरकारी पाइपें लगाने का प्रावधान है। अगर कुल 12296 पाइपों में देखें तो एक नल लगाने में औसतन 491 पाइपें इस्तेमाल हुईं।

इसका मतलब हुआ कि उस नल और जल के मुख्य स्रोत या पाइपलाइन के बीच की दूरी औसतन साढ़े नौ किलोमीटर बनती है जो कि संभव नहीं है। इस हिसाब से लाखों रुपये की गड़बड़ की आशंका जताते हुए भूपेंद्र का कहना है कि एक नल लगाने में 10-12 पाइप तो लग सकते है मगर 491 पाइप लगाना हज़म नहीं होता।

क्या कहता है विभाग
उधर भराड़ी में बैठने वाले आईपीएच के एक्सईएन मुकेश हीरा ने दैनिक भास्कर अखबार को बताया है कि बीते साल 25 पब्लिक टैप और 146 प्राइवेट नल धर्मपुर उपमंडल में लगे। उनका कहना है कि जितनी पाइपों की जरूरत थी, उतनी ही लगाई गई है। उन्होंने यह भी कहा कि जिला परिषद सदस्य को आरटीआई के माध्यम से जानकारी दे दी गई है। उन्होंने कहा, “मुझे आरटीआई एक बार फिर चेक करनी पड़ेगी कि कहीं कोई गलती तो नहीं हुई है। इतनी ज्यादा पाइप नहीं लग सकते।”

महेंद्र सिंह ठाकुर को ‘क्षमतावान’ बताने वाले सर्वे पर उठे सवाल

महेंद्र सिंह ठाकुर को ‘क्षमतावान’ बताने वाले सर्वे पर उठे सवाल

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश के लगभग सभी अखबारों में खबर छपी है कि हिमाचल प्रदेश के सिंचाई एवं जन स्वास्थ्य मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर को श्रेष्ठ मंत्री चुना गया है। जिस मैगजीन के हवाले से यह खबर छापी गई है, दरअसल वह न तो टाइम्स पत्रिका है और न फोर्ब्स, जिसकी किसी सूची में मंत्री जी को जगह मिली है। बल्कि यह ऐसी पत्रिका है, जिसका काम चर्चित लोगों के साक्षात्कार और उनकी कहानियां छापना है।

इसके ट्विटर हैंडल और फेसबुक पेज पर नेताओं की खुशामद वाली कहानियों की भरमार है। यही नहीं, जिस कथित सर्वे के आधार पर मैगजीन ने महेंद्र ठाकुर को ‘क्षमतावान’ चुना है, वह खुद में संदिग्ध है।

अखबारों और उनके पोर्टलों में छाई है खबर

 

फेम इंडिया मैगजीन ने फेसबुक पोस्ट में लिखा है- देश के सभी राज्य के मंत्रियों का 21 अलग-अलग कैटगरी में आकलन किया गया। देश के 12700 प्रबुद्ध लोगों की राय ली गई।

अब इस लाइन पर जाएं तो 127,00,00,000 से ज्यादा आबादी वाले देश में मामूली सा सैम्पल साइज है। इसमें भी हिमाचल की बात करें तो इनके सैम्पल साइज 12700 को 30 राज्यों (जहां सरकारें हैं) से भाग करने पर आ जाता है 423 लोग। यानी हिमाचल में इन्होंने औसतन 423 लोगों से बात की होगी। सर्वे ऑनलाइन हुआ तो कहां हुआ, ग्राउण्ड पर हुआ तो कहां हुआ, स्पष्ट नहीं।

अब बड़ा सवाल ये कि कैटिगरी तो 21 थी जबकि 30 राज्यों के बहुत सारे मंत्री थे। अब इन्होंने सवाल कैसे पूछे होंगे। क्या इन्होंने यह पूछा कि आपके राज्य का कौन सा मंत्री 21 कैटिगरी में किस लायक है। क्या यह पूछा होगा कि महेंद्र सिंह को आप इन 21 कैटिगरी में किसमे रखेंगे। एक प्रबुद्ध बोला होगा- विकासशील है, दूसरा बोला होगा बेजोड़, तीसरा बोला होगा क्षमतावान। फिर पूछा होगा विपिन परमार को किस कैटिगरी में रखते हैं। यह बहुत ही हास्यास्पद और अव्यावहारिक रहा होगा।

या ये पूछा कि हमने इस कैटिगरी में देश के 30 राज्यों के इन मंत्रियों को नॉमिनेट किया है, आप बताइए किसे चुनेंगे। ऐसा था तो हिमाचल के मंत्री को क्या पता कर्नाटक के मंत्री क्या कर रहा है।

या तो ये हुआ होगा कि इन्होंने राज्यों में लोगों से पूछा होगा कि कौन सा मंत्री बेस्ट है और जिसे सबसे ज्यादा लोगों ने चुना, उसे अपनी मर्जी से लिस्ट में क्षमतावान, बेजोड़, साधु, महात्मा जैसे तमगे दे दिए। यह आकलन इसलिए किया जा रहा है क्योंकि मैगजीन ने अभी तक हमारे सवाल का जवाब दिया नहीं है, जवाब मिलते ही उनका पक्ष छाप दिया जाएगा।

फेम इंडिया और इससे सम्बद्ध सर्वे एजेंसी एशिया पोस्ट इसी तरह से सांसद अवॉर्ड भी देती रही है। जैसे पप्पू यादव 2018 में बेजोड़ संसद रहे थे। बेजोड़ किस मामले में थे, यह तो पत्रिका ही बता सकती है। हालात यह हैं कि इस पत्रिका के फेसबुक पेज के पोस्ट्स को मेसेज करके मैसेंजर पर भेजा नहीं जा सकता क्योंकि फेसबुक इसे स्पैम मान रहा है। जब हमने खुद को हिमाचल में फेम इंडिया मैगजीन की सदस्य बता रहीं अंजू भरमौरिया से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि यह सर्वे उन्होंने खुद नहीं किया, बल्कि एजेंसी से करवाया है। उन्होंने और जानकारी सर्वे एजेंसी से जुटाने के लिए कहा। मगर जब हम सर्वे एजेंसी एशिया पोस्ट की वेबसाइट पर गए तो वह खुल नहीं रही। उसपर सिक्यॉरिटी को लेकर वॉर्निंग आ रही है।

बहरहाल, पत्रिका को जो करना है करे, वह उसका अपना काम है। मगर हैरानी है कि हिमाचल का मेन स्ट्रीम मीडिया ऐसी अजीब खबरों को बिना क्रॉस चेक किए छाप देता है। बिना यह जाने या सोचे कि सूचना का आधार क्या है। ऐसी खुशामद भरी खबरें क्या पेड न्यूज से कम हैं?

क्या अखबारों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि कोई भी खबर छापने से पहले उसके स्रोत और खबर में दी जानकारी की विश्वसनीयता की जांच करे? पढ़ें।

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಗುರುವಾರ, ಜುಲೈ 18, 2019

नगरोटा बगवां: नशे में हमला करके बेटे ने ले ली पिता की जान

कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के नगरोटा बगवां बाप-बेटे का रिश्ता एक बार फिर तार-तार हो गया है। यहां नशे में धुत एक बेटे ने अपने पिता की जान ले ली। साल 2016 में भी यहां एक ऐसा ही मामला सामने आया था।

सरकारी मदद बनी विवाद की वजह
ताजा मामले में पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। जानकारी के मुताबिक पिता व पुत्र दोनों ने शराब पी रखी थी। जानकारी के अनुसार मकान का एक भाग गिरने पर सरकार द्वारा परिवार को राहत के रूप में 10,000 मिले थे, जो विवाद का कारण बने।

विवाद इतना बढ़ गया कि तैश में आकर बेटे अमन कुमार ने अपने पिता रवि कुमार (55) पर हमला कर बुरी तरह घायल कर दिया। पड़ोस के लोगों ने मौके पर पहुंच कर रवि कुमार को सिविल अस्‍पताल नगरोटा बगवां पहुंचाया,जहां चिकित्‍सकों ने उन्‍हें मृत घोषित कर दिया।

पुलिस ने मौके पर पहुंच कर बेटे को गिरफ्तार कर मामले की जांच शुरू कर दी है। घर में मृतक रवि कुमार की बूढ़ी मां, पत्नी, दो बेटे थे, छोटा बेटा बाहर गाड़ी चलाता है, वह बड़ा बेटा अमन मेहनत मजदूरी करता था।

जब प्रशासन हुआ नाकाम तो देवताओं ने भगाए अवैध कब्जाधारी

कुल्लू।। हिमाचल प्रदेश की देव परंपरा के सांस्कृतिक पहलू से जुड़ी खबरें अक्सर आती हैं मगर इन देवी-देवताओं की सामाजिक भूमिका भी है। जैसे कई जंगल हैं जो देवताओं के नाम पर हैं और वहां कोई शिकार या पेड़ों को काटने का काम नहीं करता। देवताओं के डर से लोग झूठी कसमें खाने से भी डरते हैं। आस्था के दम पर ये देवता समाज सुधारक की भूमिका भी निभा सकते हैं। इसकी मिसाल देखने को मिली कुल्लू में।

हिमाचल के जिला कुल्लू की बंदरोल सब्जी मंडी में देव स्थल पर अवैध कब्जा छुड़ाने करीब एक दर्जन देवी-देवता शुक्रवार को खुद उतर आए। देवताओं ने करीब पौने घंटे में अवैध कब्जाधारियों को वहां से खदेड़ा और गूर के माध्यम से कहा कि भविष्य में ऐसा किया तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

दरसअल बीते दिनों जिला प्रशासन दल-बल के साथ अवैध कब्जा हटाने पहुंचा था लेकिन लोगों के राजनीतिक रसूख के चलते बैरंग लौट आया था। ब्यासर मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान तमाम देवी-देवताओं ने इस स्थल को खाली करने के आदेश दिए थे।

पिछले लगभग एक महीने में देव स्थल पर कुछ लोगों ने कब्जा कर खोखे व स्टोर बना दिए थे। ऐसे में देवी-देवताओं का पवित्र स्थल अशुद्ध हो रहा था। जब देव आदेशों की पालना न हुई तो घाटी के 11 देवी-देवता खुद बंदरोल पहुंच गए और देव स्थल को कब्जा मुक्त करवाया। देवी-देवताओं की इस मुहिम से घाटी के देव समाज से तमाम लोग काफी खुश हैं। बंदरोल सब्जी मंडी में चिह्नित देवस्थल का अपना महत्व है। यहां पर कुल्लू-मनाली आते-जाते, तीर्थ स्थल और दशहरा के समय देवी-देवता ठहराव करते हैं।

हिंदी अखबार अमर उजाला की खबर के मुताबिक बंदरोल सब्जी मंडी के पास अवैध कब्जे को हटाने में देवता वीरनाथ बदंरोल, काली माता ओढी शिरढ़, वीरनाथ पनगां, नाग देवता शिरढ़, काली माता ओढी बंदरोल, देवता काली नाग कराल, देवता थान शिम, काली ओढ़ी शिम आदि देवता मौजूद रहे।

विडियो: जब दुखी होकर देवता ने कहा- मैं ये तबाही नहीं देख सकता

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई ने की बगलामुखी मंदिर में पूजा

अमित पुरी, धर्मशाला।। विश्व प्रसिद्ध प्राचीन सिद्ध पीठ मां बगलामुखी के दरबार में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी ने मां बगलामुखी से लिया आशीर्वाद।

सर्वप्रथम उन्होंने पूजन किया उसके उपरांत यज्ञ भी किया। गौरतलब है कि श्री बगलामुखी माता को शत्रु विनाशनी व मनोकामना पूर्ति माता माना जाता है। देश की कई बड़ी राजनीतिज्ञ हस्तियां इस मंदिर में शीश नवा चुकी हैं।

इसी कड़ी में अब पीएम नरेंद्र मोदी के भाई प्रह्लाद मोदी ने बगलामुखी मंदिर में आकर पूजा अर्चना की और मनोकामना पूर्ती की कामना करते हुए शत्रु नाशनी यज्ञ भी किया। मां के दर्शनों उपरांत इस यज्ञ का महत्व अधिक रहता है।

संस्कृत को जरूर बढ़ावा दे हिमाचल प्रदेश सरकार मगर…

यह लेख 18 जनवरी 2018 को प्रकाशित हुआ था। यह हमें एक पाठक ने भेजा था जो उस समय हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित संस्कृत विश्वविद्यालय को लेकर छपे एक लेख- “संस्कृत विश्वविद्यालय क्यों खोलना चाहती है हिमाचल सरकार?” का जवाब था। दूसरी क्लास के बच्चों को संस्कृत पढ़ाए जाने के प्रस्ताव पर छिड़ी बहस के बीच हम इसे पुनः प्रकाशित कर रहे हैं। 

मनोज चौधरी।। आज सुबह ही इन हिमाचल पर लेख पढ़ा जिसमें हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा संस्कृत विश्वविद्यालय खोलने के प्रयास की आलोचना की गई थी। लेखक ने जो तर्क दिए थे, उनमें से कुछ तो अच्छे हैं मगर लगता है कि उन्होंने दूसरे पहलू को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है।

लेखक का कहना सही था कि भाषा इसलिए विलुप्त होती है क्योंकि वह बोलचाल से गायब हो जाती है और उसकी जगह अन्य प्रचलित भाषाएं ले लेती है। कई सारी भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं आज और वैश्वीकरण के दौर में जिस तरह से अंग्रेजी पूरी दुनिया में बोली जा रही है, भाषाओं के लुप्त होने की रफ्तार बढ़ी है और आने वाले समय में और भाषाएं भी लुप्त हो जाएंगी।

अन्य देशों से सीखना चाहिए हमें
मगर हमें सीखना चाहिए चीन, कोरिया, रूस, जापान, जर्मनी, फ्रांस और स्पेन समेत कई देशों से जिन्होंने अपनी भाषाओं को बरकरार रखा है। जहां तक बात है संस्कृत की, हमें यह मानना पड़ेगा कि संस्कृत आज से लुप्तप्राय नहीं है, बल्कि बहुत पहले से ही यह कभी व्यापक जनसमूह की भाषा नहीं रही। यह भाषा अपने आदिकाल से समानांतर चलती आ रही है और एक वर्ग ही इसे इस्तेमाल करता आ रहा था। दूसरी तरफ कई भाषाएं और बोलियां बनती-बिगड़ती रहीं और नई भाषाएं उनकी जगह लेती रहीं। ऐसे ही, जैसे कि हिंदी एक नई भाषा के रूप में उभरी।

जनभाषा न रहकर भी महत्वपूर्ण रही है संस्कृत
तो बहुत से पाठक जो टिप्पणियां कर रहे थे कि संस्कृत आज लुप्त हो रही है, यह बात सही नहीं है। यह पहले कभी भी व्यापक स्तर पर जनभाषा नहीं रही। मगर हिंदू, बौद्ध, जैन समेत कई धर्मों की भाषा यही रही है। देवनागरी के अलावा अन्य लिपियों में भी यह लिखी जाती रही मगर भाषा बरकरार रही। लेखक का कहना सही है कि सरकारी तौर पर पहचान मिलने के बावजूद इसे सरकारी कामकाज में इस्तेमाल नहीं किया जाता और कई कार्यक्रम चलाए जाने के बवाजूद व्यापक स्तर पर लोग इसे बोलचाल में इस्तेमाल नहीं कर रहे।

संस्कृत को लेकर कुछ समस्याएं तो हैं
इसकी भी व्यावहारिक दिक्कते हैं क्योंकि भारत में कई बोलियां और क्षेत्रीय भाषाएं हैं। अपनी बोलियों से उठकर कोई पहले अपने राज्य में प्रचलित भाषा सीखे या अंग्रेजी सीखे या फिर संस्कृत? उदाहरण के लिए हिमाचल का एक बच्चा कांगड़ी बोलता था। स्कूल में जाकर उसने हिंदी सीखी। फिर इंग्लिश सीखी। साथ में उसे और विषय भी तो पढ़ने हैं। फिर जब संस्कृत एक विषय के तौर पर आता है तो उसे धातु और शब्द आदि को रटना पड़ता है। अध्यापकों का रवैया ऐसा होता है कि इस रटने-रटाने से नफरत ही हो जाती है। फिर जहां विकल्प मिलते हैं तो संस्कृत के अलावा आर्ट्स या होमसाइंस का रुख करने लग जाते हैं बच्चे। फिर कैसे आप संस्कृत की तरफ बच्चों की रुचि जगाएंगे?

और मान लीजिए मैं संस्कृत में पढ़ाई करता हूं, एमए, एमफिल कर लेता हूं तो सभी को टीचर या अकादमिक क्षेत्रों में नौकरी तो मिलेगी नहीं। मैं किसी सस्कृत विश्वविद्यालय से वैदिक संस्कृत या अन्य विषयों में पढ़ाई करता हूं तो उसके बाद मेरे लिए रोज़गार के अवसर क्या हैं? जरूरी नहीं कि मैं धार्मिक रीति-रिवाजों को अंजाम देने वाला पुरोहित बन जाऊं। यह जरूर है कि मैं संस्कृत को जानूं और ग्रंथों के अध्ययन में मुझे सुविधा होगी। मगर व्यावहारिक दिक्कतें तो होंगी की।

फिर रास्ता क्या है?
मैंने देखा है कि जितने भी संस्कृत विश्वविद्लाय हैं, वहां पर एक जैसे कोर्स हैं। इसलिए अगर सरकार हिमाचल प्रदेश में संस्कृत यूनिवर्सिटी खोलती है तो उसे कोर्स अलग ढंग से डिजाइन करने होंगे। और फॉरमैलिटी के लिए एक और खोल देनी हो तो पहले के संस्थानों जैसी तो कोई फायदा नहीं है। उदाहरण के लिए उसे ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि छात्र इंडो-यूरोपियन स्टडीज़ पर काम करें। उदाहऱण के लिए इटैलियन और संस्कृत में कितनी समानताएं हैं, या अन्य भाषाओं में क्या-क्या समानताएं हैं। उस लिहाज पर काम करें। इससे यूरोपीय देशों के लोगों में भी इस यूनिवर्सिटी की तरफ आकर्षण पैदा होगा। और यहां से छात्र निकलेंगे, उनके लिए उन यूरोपीय देशों के विश्वविद्यालयों में भी जगह मिलेगी। दुनिया भर की यूनिवर्सिटीज़ में इसके सेंटर्स हैं।

अन्य विदेशी भाषाएं भी पढ़ाई जाएं
कहने का अर्थ यह है कि संस्कृत यूनिवर्सिटी को सिर्फ पुरातन ग्रंथों के अध्ययन तक सीमित न रखा जाए। इसे शोध पर आज के समय के आधार पर नया बनाया जाए। साथ ही विदेशी भाषाओं को भी सिखाया जाए यहीं पर। यानी संस्कृत मे तो निपुण हों ही छात्र, कोई विदेशी भाषा जैसे कि इटैलियन, फ्रेंच, जर्मन भी सीखें। ऐसा करेंगे तो संस्कृत में नहीं तो कम से कम उन भाषाओं में तो रोज़गार मिलेगा ही। शोध में मदद मिलेगी सो अलग। वैसे भी दुनिया भर से स्कूलों में संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है। हमारे यहां से निकले बच्चे उस देश की भाषा जानेंगे, तभी उनके लिए वहां रोज़गार के अवसर खुलेंगे।

यूरोप में पैदा होगा संस्कृत के लिए आकर्षण
और जहां तक पिछले लेख में लेखक ने कहा है कि रोजगार वाली भाषा को ही प्राथमिकता देनी चाहिए, मैं उनसे पूछना चाहूंगा कि एमबी बीए किसी अन्य विषय में करने वालों के पास कितनी नौकरियां हैं? कितने इंजिनियरिंग करके आज घर बैठे हैं? मेरा मानना है कि जिस कॉन्सेप्ट की मैंने ऊपर बात की है, अगर हिमाचल प्रदेश संस्कृत यूनिवर्सिटी उसी तर्ज पर चलेगी तो यहां से निकलने वाले छात्र यूरोप और पश्चिमी देशों के लिए संस्कृत के ध्वजवाहक होंगे। वे वहां पर संस्कृत के प्रति जिज्ञासा पैदा करेंगे।

स्कूलों में संस्कृत को मिले प्रोत्साहन
बाकी सरकार को भी चाहिए कि स्कूलों में संस्कृत को सहज बनाने के लिए अध्यापकों को ट्रेनिंग दे। अच्छा प्रदर्शन करने वालों को छात्रवृत्ति मिलनी चाहिए और अच्छी खासी मिलनी चाहिए। वरना मुझे याद है कि पठ धातु सही से न सुना पाने पर शास्त्री जी ने हमारी ऐसी धुनाई की थी कि नौवीं क्लास में मैंने संस्कृत छोड़कर उर्दू रख ली थी। खैर, उर्दू सीखने का तो फायदा मुझे हुआ ही मगर मेरे जैसे कई सहपाठी थे जो शास्त्री जी की मार से बचने के लिए संस्कृत छोड़ गए थे। कोई आसान तरीका इजाद किया जाना चाहिए जिससे संस्कृत आसान और रुचिकर लगे बच्चों को।

संस्कृत में टैटू बनवाने का चलन बढ़ा है।

और आखिर में यह भी बता दूं कि कुछ पाठक टिप्पणी कर रहे ते नासा में संस्कृत को प्रोग्रामिंग के लिए इस्तेमाल किया जाता है या फिर वहां पर शोध हो रहा है। यह सिर्फ अफवाह है और इस तरह की कोई प्रोग्रामिंग नहीं हो रही। जो लोग हीनभावना से ग्रस्त होते हैं, जिन्हें अपने ऊपर विश्वास नहीं होता, वे ही अपनी चीज़ों को बेहतर दिखाने के लिए ऐसे हथकंडे अपनाते हैं। वॉट्सऐप और फेसबुक ने ऐसे अफवाह फैलाने वालों को बल दिया है। और आज की पीढ़ी को पढ़ने-लिखने की आदत तो है नहीं, जो वॉट्सऐफ फेसबुक पर जो कूड़ा आए, उसे सच मान बैठते हैं और फिर कोई टोके तो उसे मानने को तैयार नहीं होते। संस्कृत एक भाषा है, इसे भाषा रहने दिया जाए। फिर भी अगर लोगों की भावनाएं इससे जुड़ी हैं और इसे बनाए रखना है तो उसके लिए प्लानिंग की जरूरत है। अफवाहों और झूठी बातों की नहीं।

(लेखक कांगड़ा के शाहपुर से हैं और एक निजी स्कूल में हिंदी के अध्यापक हैं।)