भेड़चाल में बीपीएल मुक्त क्यों होने लगी हैं हिमाचल की पंचायतें?

राजेश वर्मा।। प्रदेश की कुछेक पंचायतों में आजकल एक नया ही ट्रेंड शुरू हो गया है- “बीपीएल मुक्त।”  समझ से परे है की एकाएक इन पंचायतों में ऐसी क्या क्रांति आ गई। क्या सभी पंचायत वासी गरीबी रेखा से ऊपर उठ गए? क्या इन पंचायतों में सभी पात्रों को नौकरियां मिल गई, क्या सभी को पक्का घर मिल गया? या फिर इन सभी के लिए “कौन बनेगा करोड़पति की स्कीम” लांच हो गई या कोई लाटरी निकल गई ?

हद तो तब है जब पंचायतों द्वारा अपनी मनमर्जी करने के आरोप लग रहे हैं। स्वयं सरकार व मंत्रियों तक को पंचायत सचिवों को फटकार लगानी पड़ रही है। कांगड़ा में तो डीसी ने जांच के आदेश दे दिए हैं। माना कोई पंचायत लोगों की सहमति से बीपीएल मुक्त होना भी चाहती है तो इसका मतलब ये नहीं की अन्य पंचायते भी पब्लिसिटी के लिए, एक दिन की खबर के लिए  बिना किसी ठोस आधार के बीपीएल मुक्त के प्रस्ताव पारित करती रहें।

ये मत भूलिए की भले ही प्रत्येक पंचायत में कुछेक अपात्र  लोग बीपीएल में दर्ज हों लेकिन अभी भी ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं जिनकी पेट की भूख बीपीएल से मिलने वाला राशन ही शांत करता है। बहुतों को इसी बीपीएल से सिर पर छत नसीब हुई है तो कईयों को मिलना शेष है।

सरकार जरूरतमंदों के लिए योजनाओं पे योजनाएं चला रही है और यहां पंचायतें बीपीएल मुक्त से नाम चमका रही हैं। जो भी पंचायतें बीपीएल मुक्त हुई हैं एक बार उन पंचायतों में सरकार व विभाग द्वारा खुद  निरीक्षण करवाना चाहिए ताकि बीपीएल मुक्त का सच सामने आए। माना आज सभी के जीवन स्तर में सुधार हुआ है लेकिन इतना भी नहीं आया की रातों रात सरकारी योजनाओं व जन कल्याण की योजनाओं की जरूरत ही महसूस न हो। बहुत से परिवारों के पास कमाई का जरिया नहीं है।

जो कार्य प्राथमिकता के आधार पर होने चाहिए वह हो नहीं रहे। प्रदेश में बहुत सी पंचायतों में परिवार रजिस्ट्रर अभी तक आनलाईन तक नहीं हो पाए। परिवार रजिस्ट्रर में त्रुटियां होने की संभावना के चलते विभाग ने 31 जुलाई तक प्रदेश वासियों को संबंधित पंचायतों में जाकर अपने-अपने नाम व परिवार रजिस्ट्रर में हुई इन गलतियों को सुधारने का मौका दिया है। वहीं बहुत सी पंचायतों में पहुंच कर पता चल रहा की अभी तक परिवार रजिस्ट्रर आनलाइन ही नहीं हुए। क्या ऐसी कार्यप्रणाली से पंचायतें बीपीएल मुक्त का टैग लगाकर आगे बढ़ पाएंगी?

जो काम करने को है वह करने नहीं और जो करने नहीं उनको देखादेखी करने की होड़ मची है। पंचायत में भले एक ही व्यक्ति बीपीएल के लिए पात्र हो अन्य हजारों चाहे इस दायरे में न आते हो, तो इसका मतलब यह नहीं की आप हजारों के चक्कर में 1 को मिलने वाले लाभों से वंचित कर दें। यदि ऐसा होता है तो यह सरकार के उपर अपनी सरकार चलाने का चलन होगा, जोकि लोकतंत्र का मजाक है।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा लम्बे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे vermarajeshhctu @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज ने जनता को दी पुलिस को पीटने की छूट

चम्बा।। विवादों में रहने वाले चुराह के बीजेपी विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने एक मेले में आए लोगों को खुली छूट दे दी कि अगर पुलिस वाले उन्हें बेवजह तंग करें तो आप उन्हें पीट सकते हैं। मगर सवाल यह है कि जनता को पुलिस वाला तंग ही कर रहा है या नहीं, यह कौन तय करेगा? कैसे संवैधानिक पद पर बैठा एक जन प्रतिनिधि ऐसी गैरकानूनी बात कह सकता है?

दरअसल 11 जुलाई को भजराड़ू मेले में विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज ने स्थानीय बोली में कहा कि पुलिस वाले अगर किसी को तंग करे तो उन्हें मारें, कोई बात नहीं। यह जयराम की सरकार है।

हंसराज ने कहा, “सभी को भारत माता की जय बोलनी है, चाहे वो पुलिस वालों क्यों न हों, उनको भी बोलनी पड़ेगी। सुना है आजकल कई पुलिस वालों को कुटेसरा (मार) भी पड़ी है। अगर आपको या आपके बच्चों को कोई बिना किसी बात के परेशान करता है या तो आप कुट दो (मार दो), कोई चक्कर नहीं। अन्याय होने नहीं देना, ये जय राम की सरकार है।”

विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज ने फिर दिया विवादित बयान, कहा- पुलिस वाले तांग करें तो आप उन्हें पीटें, जय जयराम की सरकार…

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಗುರುವಾರ, ಜುಲೈ 25, 2019

यह पहला मामला नहीं है जब हंसराज ने गैरजिम्मेदाराना बयान दिया है। इससे पहले चुनाव के दौरान उन्होंने कर्मचारियों देख लेने की धमकी दी थी। उन्होंने कहा था- अधिकारियों और पुलिस वालों के दिमाग हो गए हैं खराब, आचार सहिंता के बाद सबका किया जाएगा इलाज।

विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज ने अधिकारियों को खुलकर दी धमकी। कहा- अधिकारियों और पुलिस वालों के दिमाग हो गए हैं खराब, आचार सहिंता के बाद सबका किया जाएगा इलाज।

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಸೋಮವಾರ, ಏಪ್ರಿಲ್ 29, 2019

उससे पहले डीसी और एसपी के पीछे पड़ गए थे। मामला क्या था, पढ़ें-

डीसी और एसपी से माफी मंगवाने पर तुले विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज

गायों के लिए मंदिरों और शराब से लिया जा रहा पैसा कहां जा रहा है?

अमित पुरी, धर्मशाला।। हिमाचल में प्रदेश में बेसहारा गायों के मरने की घटनाएं आम होती जा रही हैं।हिमाचल प्रदेश सरकार ने गाय और गोवंश को बचाने के लिए दावे तो बहुत किए मगर जमीन पर हालात कुछ और ही हैं। हिमाचल में शराब की बोतल पर एक रुपया सेस लगाया जा रहा है, मंदिर के चढ़ावे का 15 प्रतिशत हिस्सा लिया जा रहा है मगर इसके बाद से गायों के लिए काम होना चाहिए था, शायद सरकार उसे भूल गई है।

हिमाचल प्रदेश के अधिकतर गौ सदनों की हालत इस समय बुरी है। कहीं चारा उपलब्ध नहीं है तो कहीं पानी की किल्लत है। डॉक्टरों की सुविधा मिल जाए तो बड़ी बात। धर्मशाला के एकमात्र गोसदन की बात करें तो यहां पर 65 की क्षमता वाले सदन में 90 से ज्यादा गायें हैं।

जिस समय हम वहां पहुंचे, दो गाएं मृत मिलीं जिन्हें उठाया नहीं गया था। इनमें कीड़े तक पड़ते नजर आ रहे थे। प्रशासन की सुस्ती के कारण अन्य जानवरों के बीमार होने का भी खतरा बना हुआ था। इन गायों की देखभाल के लिए यहां मात्र तीन कर्मचारी हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं।

धर्मशाला नगर निगम के मेयर देवेन्द्र जग्गी का कहना था कि मामला उनके ध्यान में आया है। उनका कहना था कि दो गायों के मरने की जांच होगी यह भी पता किया जाएगा कि उन्होंने अधिकारियों को सही समय पर इसकी सूचना क्यों नहीं दी।

मगर सवाल ये है कि जब धर्मशाला जैसे बड़े शहर, जिसे दूसरी राजधानी के तौर पर प्रचारित किया जाता है, वहां की गोशाला की ऐसी हालत है तो अन्य जगहों पर क्या हालत होगी। वैसे भी गोसदनों की गायों की पूछ तो गाहे-बगाहे हो जाती है। मगर प्रदेश की सड़कों पर चक्कर काटती हजारों गायों के बारे में कोई सोचता तक नहीं।

क्या आप हिमाचल प्रदेश के उस वायरल वीडियो को ढूंढ रहे हैं?

इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल में वायरल हुए लड़का-लड़की के वीडियो को या उसमें दिख रहे लोगों की तस्वीरें और नाम शेयर कर रहे लोग ध्यान दें। वे भी ध्यान दें, जिन्हें इन लोगों और इस वीडियो के बारे में जानने में बड़ी दिलचस्पी है।

कुछ समय पहले हिमाचल के एक नेता का कथित तौर पर किसी महिला से संवाद का ऑडियो को लीक हुआ था। उस समय भी इन हिमाचल ने उस संबंध में खबर नहीं छापी थी क्योंकि यह उन दोनों के बीच का निजी संवाद था। उसमें अगर कुछ आपत्तिजनक था तो उसे रिकॉर्ड करना और उसे जारी करने का मकसद। इसके बाद कई ऐसे मौके आए। एक फर्जी पेज ने महिला और उसके पति की कथित प्रेमिका का संवाद ही सोशल मीडिया पर डाल दिया। ऐसे कई मौके आए जब इन हिमाचल ने इस तरह के मामलों में कोई खबर नहीं छापी और न ही आगे छापने की योजना है।

अब हिमाचल प्रदेश में किन्हीं दो नेताओं का वीडियो लीक हुआ है। वे उस वीडियो में क्या कर रहे हैं, यह उनका आपस का मसला है। इसमें कोई दो राय नहीं कि उन दोनों ने इसे रिकॉर्ड करके बेवकूफी की और वे इसी बेवूकफी का खामियाजा भी आज भुगत रहे हैं। मगर सोचिए कि हमें क्यों उनके वीडियो को लेकर या उनकी पहचान को लेकर दिलचस्पी हो रही है?

हम-आप नहीं जानते कि ये वीडियो किस समय का है और किसने किस मकसद से लीक। इतना तय है कि दोनों मे से किसी ने एक से लीक हुआ या लीक किया गया। इसका मकसद भी हमें नहीं मालूम। मगर इतना तय है कि इस वीडियो के कारण इन दोनों के निजी और राजनीतिक जीवन तबाह हो चुके हैं।

उनके गृह जिले के ही और उन्हीं की ही पार्टी के कुछ लोग फेसबुक पर उनकी असली पहचान जाहिर कर रहे हैं, उनकी तस्वीरों को शेयर कर रहे हैं। हमारे बीच भी बहुत पढ़े हुए लोग इस मामले पर टिप्पणी कर रहे हैं और लिख रहे हैं- इन्हें ऐसा काम करने वक्त सोचना चाहिए था कि क्या कर रहे हैं। लोगों की ये हरकतें और बातें दिखाती हैं कि उन्हें कैसे एक मौका मिल गया है अपनी हताशा निकालने का। मगर वे सोच नहीं रहे कि उनकी हरकत के कारण दोनों में से कोई खुदकुशी कर ले तो क्या होगा।

यह हमारे मतलब का विषय नहीं होता कि दो लोग क्या कर रहे हैं। नैतिकता के लिहाज से उन्हें जज करने का हमें भी अधिकार नहीं क्योंकि इंसान होने के नाते हम असंख्य गलतियां करते हैं, बहुत से ऐसे काम करते हैं जो नैतिकता या कानून सही नहीं कहे जा सकते। भले वे आपको मामूली लगें मगर होते तो वे गलत हैं।

ऐसे में दो पल के लिए ठहरकर जरा आत्ममंथन कीजिए कि जैसे ही आपको इस वीडियो के बारे में पता चला तो क्या आपके मन में जिज्ञासा हुई कि आप भी उसे देखें और नाम जानें कि कौन है लड़की? अगर हां तो आपको पता चल जाएगा कि यही वो सोच है जिस कारण आज भी यौन अपराधों के पीड़ितों का भी नाम सार्वजनिक नहीं किया जाता।

पीड़ितों को समाज की जिस सोच से बचाने की कोशिश होती है, वह है कि पीड़ितों के बारे में फैंटसाइज़ करने लगना। जी हां, यौन अपराधों जैसे कि बला त्कार की घटनाओं के बाद हमारे बीच के ही लोग यह सोचने लगते हैं कि लड़की देखने में कैसी थी। इसी सोच से ग्रस्त लोग टिप्पणियां करते हैं कि इसमें क्या देखा होगा जो इसका बला त्कार कर दिया। अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप का उदाहरण देखिए जिसमें उन्होंने हाल ही में यौन शोषण का आरोप लगने पर कहा- शी इज़ नॉट माइ टाइप यानी वो मेरे टाइप की है ही नहीं जो आरोप लगा रही है।

बहरहाल,  हिमाचल की इस घटना से सबक लीजिए। सेक्स अपराध नहीं है। मगर सावधान रहिए कि एक्साइटमेंट में आप कुछ ऐसा न कर रहे हों कि कल को आपको मुश्किल न हो। हिंदुस्तान की पॉर्न साइट्स में 1 प्रतिशत भी प्रफेशनल पॉर्न नहीं है। यानी जैसे अमरीका और अन्य देशों में प्रफेशनल पॉर्न ऐक्टर ऐक्ट्रेस होते हैं, जैसे सनी लियोनी, वैसा भारत में नहीं है। भारत की पॉर्न साइटें इसी तरह के वीडियो से भरी हैं जिन्हें दो लोगों ने आपसी सहमति से बनाया या दोनों में से एक ने वीडियो बना लिया और फिर बाद में वह लीक हो गया।

इसलिए इंटरनेट पर उस लड़का-लड़की के बारे में लिखना, उनके ऊपर लिखी पोस्ट्स को लाइक करना, ढूंढना या वीडियो फॉरवर्ड करना बंद कर दीजिए। क्योंकि ऐसा कोई वीडियो आपका भी हो सकता है, आपके परिवार के करीबी सदस्य का हो सकता है। जरूरी नहीं कि सेक्स का ही हो। किसी ने बाथरूम में या चेंजिंग रूप में हिडन कैमरा करके रिकॉर्ड कर लिया हो। इसलिए हमेशा दूसरों की जगह खुद को रखकर सोचें। नैतिकता से बड़ी चीज़ है विवेक। विवेक का इस्तेमाल करें। वे अगर बेवकूफी कर गए तो आप तो कम से कम समझदारी दिखाइए।

शांता-अटल से सीखें सत्ता के लिए पागल हो चुके नेता और दल

इन हिमाचल डेस्क।। पिछले कुछ समय से देखने को मिल रहा है कि विपक्षी दलों के विधायक बड़ी संख्या में पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। चुने हुए प्रतिनिधियों का पाला बदल लेना नई बात नहीं है और ऐसा पहले भी होता रहा है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दल भी इस खेल में शामिल रहे हैं। मगर ‘द पार्टी विद अ डिफरेंस’ के साथ हाल में यह सिलसिला तेज हुआ है।

2015 में असम में कांग्रेस के नौ विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे और ऐंटी डिफेक्शन प्रावधानों के चलते उनकी सदस्यता रद हो गई थी। हाल ही में गोवा में कांग्रेस के दस विधायक बीजेपी में आ गए। चूंकि दल बदलने वाले विधायकों की संख्या दो तिहाई से अधिक थी, इसलिए वे ऐंटी डिफेक्शन की जद में नहीं आए। मगर जिस तरह से कर्नाटक में हुआ, वह ऐंटी डिफेक्शन प्रावधानों की काट है।

कांग्रेस जेडीएस के विधायकों ने पार्टी नहीं बदली, सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इससे सदन में सत्ताधारी गठबंधन की सीटें घट गईं और बहुमत का आंकड़ा घट गया। नतीजा- कांग्रेस-जेडीएस की सरकार गिर गई और बीजेपी के सत्ता में आने का रास्ता साफ हो गया।

आज जो ये खेल हो रहा है, वह 1985 में संविधान संशोधन के बाद दल बदल रोकने के लिए किए गए प्रावधानों को धता बताते हुए किया जा रहा है। इस पूरे खेल के लिए बीजेपी पर आरोप लग रहे हैं। मगर एक दौर था जब बीजेपी में ऐसे लोग थे जो विधायकों को प्रलोभन देने और खरीदने के बजाय सत्ता से दूर रहना पसंद करते थे। ये थे- हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के संस्थापक सदस्य- शांता कुमार और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी।

शांता सरकार में मंत्री रहे बीजेपी के वरिष्ठ नेता मोहिंदर नाथ सोफत ने यही किस्सा साझा किया है कि कैसे शांता कुमार सरकार बचाने में जोड़ तोड़ करने के बजाय त्याग पत्र देकर फ़िल्म देखने चले गए थे। हालांकि सोफत ने सवाल कुमारस्वामी पर उठाए हैं कि कैसे वह अल्पमत में आने के बावजूद सरकार बचाने की कोशिश करते रहे। मगर सीख वे भी ले सकते हैं जो सरकार को अल्पमत में लाने और अपनी सरकार बनाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाते हैं।

सोफत लिखते हैं– “कुमारस्वामी सरकार 23 जुलाई को हुए फ्लोर टैस्ट मे फेल हुई और उसके साथ ही कर्नाटक का राजनीतिक नाटक भी समाप्त हो गया है।वेन्टीलेटर पर पडी सरकार को जाना ही था। हालांकि मुख्यमंत्री और विधानसभा के अध्यक्ष की जोड़ी ने राज्यपाल के आदेशो की अनदेखी कर एक स्वस्थ परम्परा को तोड़कर सरकार को तीन-चार दिन जीवन दान दे कर रखा। परन्तु इस प्रकार सरकार को बचाए रखने से यह सिद्ध हो गया कि कुमारस्वामी और कर्नाटक का कांग्रेस नेतृत्व यह जानते हुए कि वह अल्पमत मे है फिर भी सत्ता के साथ चिपके रहना चाहते थे। फ्लोर टेस्ट के लिए तीन डेडलाइन देनी पडी।

221 सदस्यो के सदन मे टेस्ट के समय केवल 204 विधायक उपस्थित थे। मुख्यमंत्री के पक्ष मे99 और विरोध मे 105 वोट पडें। तब जाकर मुख्यमंत्री ने अपने पद से त्याग पत्र दिया। ऐसे ही हालात हिमाचल प्रदेश मे जनता पार्टी के समय भी हुए थे। जब जनता पार्टी मे विभाजन हुआ था। उस समय शांता कुमार जी प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। विभाजन के साथ भारी बहुमत वाली सरकार अल्प मत मे आ गई थी।

गैर जनसंघ के अधिकांश विधायक कांग्रेस मे शामिल हो गए थे। गैर जनसंघ के कुछ लोग जैसे शयमा शर्मा जी और ठाकुर रणजीत सिंह जी ने जनता पार्टी मे ही रहना पंसद किया था। जैसे ही यह बात शांता जी को पता चली कि उनकी सरकार अल्पमत है उन्होंने बिना विचलित हुए अपना त्यागपत्र राज्यपाल जी को सौंप दिया। इससे भी बड़ी बात और दिलचस्प बात है कि मुख्यमंत्री के पद से त्यागपत्र दे कर प्रसन्नचित्त भाव से राज भवन सीधे जूगनू फिल्म देखने अपने साथियो के साथ चले गए।

कांग्रेस के नेता ठाकुर रामलाल जी दल बदल के सहारे दुसरी बार हिमाचल के मुख्यमंत्री बने। 1982 हिमाचल मे फिर विधानसभा के चुनाव हुए। तब देश मे भाजपा पार्टी का गठन हो चुका था। 1982 के चुनाव के परिणाम भी बहुत दिलचस्प आकड़ो के साथ आए थे। कांग्रेस को और गैर कांग्रेसी पार्टीयो को 31-31सीटें मिली थी। सरकार बनाने की चाबी 6 निर्दलीय विधायको के पास थी।

भाजपा के कुछ लोग निर्दलीय विधायको के समर्थन के साथ सरकार बनाना चाहते थे। परन्तु शांता जी मन से इस बात के लिए तैयार नही थे और उन्होंने अटल जी को दूरभाष पर अपने मन की बात बताई और अटल जी दिल्ली से बाहर भोपाल में थे उन्होंने वही से ब्यान जारी कर कह दिया कि हमे जनता ने स्पष्ट बहुमत नही दिया है इसलिए हम हिमाचल मे विरोधी दल की भूमिका अदा करेंगे।

Prime Minister Atal Bihari Vajpayee. Express archive photo by Mohan Bane

अटल जी ने स्वंय भी 13 मास की सरकार मे जब एक मत से अपना बहुमत सिद्ध नही कर पाये तो लोकसभा मे कहा था कि हम संख्या बल के आगे अपना सिर झुकाते है और कहा मै अभी अपना त्याग पत्र राष्ट्रपति जी को सौंपने जा रहा हूँ । यह थी राजनेताओ की शालीनता और परिपक्वता। आज के सभी पार्टीयो के नेता इन राजनेताओं के जीवन से बहुत कुछ सीख सकते है।”

आप भी उन पलों का वीडियो तो नहीं बनाते? भूलकर भी न करें ऐसा

हिमाचल में एक तथाकथित अश्लील वीडियो शेयर किया जा रहा है और कुछ पोर्टल्स आदि भी चटखारे लेकर खबर प्रकाशित कर रहे हैं। लेकिन यह दूसरों की निजता का उल्लंघन है। हालांकि इसमें गलती उस जोड़े की भी है, जिसने यह बेवकूफाना हरकत की। बहरहाल, इस विषय से जुड़ा यह आर्टिकल जरूर पढ़ें और सबक लें। यह कुछ समय पहले “जानू तुहां गल्त हन” नाम से चर्चित वीडियो पर लिखा गया था। इसमें उस वीडियो को ताजा वीडियो से रिप्लेस करें और ऐसे मामलों की संवेदनशीलता को समझने की कोशिश करें।

आई.एस. ठाकुर।। क्या आपने भी प्रेमिका से बात कर रहे हिमाचल प्रदेश के शख्स का वीडियो देखा है? देखा होगा तो शेयर भी किया होगा। अगर आपको इस वीडियो को देखकर मजा आया तो आपको अपने अंदर झांकने की जरूरत है। अगर आपने वॉट्सऐप पर अपने दोस्तों और परिजनों को मजे लेते हुए ये वीडियो भेजा तो आपको वाकई शर्म आनी चाहिए, क्योंकि आपने एक भोले से शख्स की प्राइवेसी का हनन किया है, आपने उसका मजाक बनाया है। कल को शर्मिंदा होकर वह शख्स आत्महत्या कर ले तो आप भी उतने ही जिम्मेदार होंगे, जितना जिम्मेदार इस वीडियो को बनाकर लीक करने वाला शख्स होगा।

क्या आपने कभी ऐसे किसी से बात नहीं कही?
इस दुनिया में कौन ऐसा है जो इश्क के हाथों विवश न हुआ हो और इस तरह से जिसने बात न की हो। वह कौन होगा जिसने एक तरफा इश्क में ही सही, दो आंसु न बहाए हों। मगर यह मामला हर किसी का निजी और पर्सनल मामला होता है। हममें से किसी को अधिकार नहीं कि हम उसे जगजाहिर करें। आज स्मार्टफोन हाथ में आ जाने पर हम सब कुछ रिकॉर्ड करने लग जाते हैं। सोचिए जिस शख्स ने इस व्यक्ति का वीडियो बनाकर आगे बढ़ाया होगा, उसने कितना बड़ा विश्वासघात किया है यानी भरोसे का कत्ल किया है।

उस आदमी की जगह खुद को रखिए
हंसी-मजाक अपनी जगह है, इस तरह से वायरल हुए वीडियो से कोई भी शख्स शर्म के मारे डिप्रेशन में जा सकता है और कोई कदम उठा सकता है। हालांकि इस वीडियो में ऐसा कुछ नहीं है क्योंकि हम सभी ऐसे अपने प्रेमी या प्रेमिका या पति-पत्नी से बातें करते हैं या करते रहे होंगे। मगर चूंकि वे बातें पब्लिकली सामने नहीं आईं, इसलिए किसी को नहीं पता। मगर इस आदमी की बातें सामने आ गईं तो आपको मजा आने लगा? इस आदमी की जगह खुद को रखिए औऱ सोचिए कि आपकी अंतरंग बातों को कोई लीक कर दे तो आज आपकी क्या स्थिति होती।

आपका पॉर्न भी ऐसे ही होता है लीक
बहुत समय से मैं इस बात पर भी लिखना चाह रहा था कि कैसे आजकल युवाओं के पॉर्न क्लिक लीक होने लगे हैं। होता यह है कि आज के स्वतंत्र युवा जब अंतरंग रिश्ते बनाते हैं तो उनमें से कोई, ज्यादातर बार लड़के, जिद करने लगते हैं कि आओ हम अपनी ऐक्टिविटी रिकॉर्ड करें। ना-नुकर करते हुए लड़की भी वीडियो बनवा लेती है और वही वीडियो एक दिन लीक होकर पॉर्न वेबसाइट्स पर पहुंच जाता है। कई बार स्मार्टफोन चोरी होने के कारण तो कई बार लड़के ये कहकर अपने दोस्तों को भेज देते हैं कि देखो मैंने किसके साथ क्या गतिविधि की।

मानिए या न मानिए, न जाने कितनी ही जिंदगियां स्मार्टफोन्स के कारण तबाह हो चुकी हैं। ऐसे वीडियो लीक हो ही जाते हैं और फिर आसपास के समाज के लोग भी तो माशाअल्लाह कमाल हैं। वे भी ताने मारकर और ब्लैकमेल करके वीडियो में दिखने वालों का जीन दूभर कर देते हैं। कई आत्महत्या के केस इसी कारण हो चुके हैं और कई बार तो परिजनों ने ही अपने बच्चों को लोकलाज के कारण मार डाला।

इसलिए आग्रह है कि जिम्मेदारी के साथ व्यवहार करें, समार्टफोन को अपने काम में इस्तेमाल करें, किसी को परेशान करने में नहीं। वरना आज जिस तरह से उस भोले इंसान का वीडियो लीक होने पर आप मजे ले रहे हैं, कल को नंबर आपका होगा। सब लोग मजे ले रहे होंगे और आप बंद कमरे में डिप्रेशन से जूझ रहे होंगे।

(लेखक लंबे समय से इन हिमाचल के लिए लिख रहे हैं, उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

हिमाचल में बसते हैं महादेव, ये हैं प्रदेश के 12 जिलों के प्रमुख शिव मंदिर

सुरेश शर्मा।। हिमाचल प्रदेश में भगवान शिव के ऐसे कई स्थान हैं जिनके साथ भगवान शिव से संबंधित कोई न कोई घटना या यूं कहें कि दंतकथा जुड़ी हुई है। कुछ ऐतिहासिक मंदिर हैं तो कुछ नए मगर। हिमाचल के कुछ ऐसे ही प्रमुख मंदिरों या स्थानों और उनसे जुड़ी बातों को आगे पेश किया जा रहा है। जाहिर है, इनके अलावा और भी बहुत सारे मंदिर या स्थान हैं जिनकी बहुत मान्यता है। अगर हम उन्हें यहां सम्मिलित नहीं कर पाए हैं तो आप कॉमेंट करके उनकी जानकारी दे सकते हैं।

किन्नर कैलाश (किन्नौर)
तिब्बत किन्नौर सीमा पर स्थित किन्नर कैलाश को मानसरोवर कैलाश के बाद दूसरा स्थान प्राप्त है। किन्नर कैलाश किन्नौर के कल्‍पा की एक प्रख्यात पर्वत चोटी है जो 6500 मीटर ऊंची है। इसी पर शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है कि किन्नर कैलाश पर्वत दिन में सात बार रंग बदलता है। शिवलिंग के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। किन्नर कैलाश स्थित शिवलिंग की ऊंचाई 40 चालीस फीट और चौड़ाई 16 फीट है। हिंद्युओं के साथ साथ यह बौद्ध धर्म मत वालों के लिए भी आस्था के प्रतीक हैं।

भरमौरी कैलाश (चम्बा)
धौलाधार, पांगी व जांस्कर पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा यह कैलाश पर्वत मणिमहेश-कैलाश के नाम से प्रसिद्ध है और हजारों वर्षो से श्रद्धालु इस मनोरम शैव तीर्थ की यात्रा करते आ रहे हैं। यहां मणिमहेश नाम से एक छोटा सा पवित्र सरोवर है जो समुद्र तल से लगभग 13,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इसी सरोवर की पूर्व की दिशा में है वह पर्वत जिसे कैलाश कहा जाता है। इसके गगनचुम्बी हिमाच्छादित शिखर की ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 18,564 फुट है। मणिमहेश-कैलाश क्षेत्र हिमाचल प्रदेश में चम्बा जिले के भरमौर में आता है।

श्रीखंड कैलाश (कुल्लू)
श्रीखंड महादेव हिमाचल के ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क से सटा है। श्रीखंड महादेव के दर्शन के लिए 18570 फीट ऊचाई पर चढ़ना होता है।स्थानीय लोगों के अनुसार, इस चोटी पर भगवान शिव का वास है। इसके शिवलिंग की ऊंचाई 72 फीट है। यहां तक पहुंचने के लिए सुंदर घाटियों के बीच से एक ट्रैक है। । श्रीखण्ड का रास्ता रामपुर बुशैहर से जाता है। यहां से निरमण्ड, उसके बाद बागीपुल बेस कैम्प सिंहगाड से श्रीखंड कैलाश तक कुल 30 कि.मी. के कठिन और ग्लेशियरयुक्त रास्ते को पार करना पडता है।

श्रीखंड की पौराणिकता मान्यता है कि भस्मासुर राक्षस ने अपनी तपस्या से शिव से वरदान मांगा था कि वह जिस पर भीअपना हाथ रखेगा तो वह भस्म होगा। राक्षसी भाव होने के कारण उसने माता पार्वती से शादी करने की ठान ली। इसलिए भस्मापुर ने शिव के ऊपर हाथ रखकर उसे भस्म करने की योजना बनाई लेकिन भगवान विष्णु ने उसकी मंशा को नष्ट किया। विष्णु ने माता पार्वती कारूप धारण किया और भस्मासुर को अपने साथ नृत्य करने के लिए राजी किया। नृत्य के दौरान भस्मासुर ने अपने सिर पर ही हाथ रख लिया और भस्म हो गया। आज भी वहां की मिट्टी व पानी दूर से लाल दिखाई देते हैं।

बिजली महादेव (कुल्लू)
प्रदेश के कुल्लू में स्तिथ बिजली महादेव। कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली महादेव से जुड़ा हुआ है। कुल्लू शहर में ब्यास और पार्वती नदी के संगम के पास एक ऊंचे पर्वत के ऊपर बिजली महादेव का प्राचीन मंदिर है। पूरी कुल्लू घाटी में ऐसी मान्यता है कि यह घाटी एक विशालकाय सांप का रूप है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था। जिस स्थान पर मंदिर है वहां शिवलिंग पर हर बारह साल में भयंकर आकाशीय बिजली गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है।

यहां के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित कर मक्खन के साथ इसे जोड़ देते हैं। कुछ ही माह बाद शिवलिंग एक ठोस रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। कुल्लू घाटी के लोग बताते हैं कि बहुत पहले यहां कुलान्त नामक दैत्य रहता था। दैत्य कुल्लू के पास की नागणधार से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्घरधार से होता हुआ लाहौल स्पीति से मथाण गांव आ गया। दैत्य रूपी अजगर कुण्डली मार कर ब्यास नदी के प्रवाह को रोक कर इस जगह को पानी में डुबोना चाहता था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि यहां रहने वाले सभी जीवजंतु पानी में डूब कर मर जाएंगे।

भगवान शिव कुलान्त के इस विचार से से चिंतित हो गए। बड़े जतन के बाद भगवान शिव ने उस राक्षस रूपी अजगर को अपने विश्वास में लिया। शिव ने उसके कान में कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है। इतना सुनते ही जैसे ही कुलान्त पीछे मुड़ा तभी शिव ने कुलान्त के सिर पर त्रिशूल वार कर दिया। त्रिशूल के प्रहार से कुलान्त मारा गया। कुलान्त के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में बदल गया। उसका शरीर धरती के जितने हिस्से में फैला हुआ था वह पूरा की पूरा क्षेत्र पर्वत में बदल गया। कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है। कुलान्त से ही कुलूत और इसके बाद कुल्लू नाम के पीछे यही किवदंती कही जाती है। बिजली महादेव- कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली

पूरी कुल्लू घाटी में ऐसी मान्यता है कि यह घाटी एक विशालकाय सांप का रूप है। इस सांप का वध भगवान शिव ने किया था। जिस स्थान पर मंदिर है वहां शिवलिंग पर हर बारह साल में भयंकर आकाशीय बिजली गिरती है। बिजली गिरने से मंदिर का शिवलिंग खंडित हो जाता है। यहां के पुजारी खंडित शिवलिंग के टुकड़े एकत्रित कर मक्खन के साथ इसे जोड़ देते हैं। कुछ ही माह बाद शिवलिंग एक ठोस रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस शिवलिंग पर हर बारह साल में बिजली क्यों गिरती है और इस जगह का नाम कुल्लू कैसे पड़ा इसके पीछे एक पौराणिक कथा है जो इस प्रकार है

कुल्लू घाटी के लोग बताते हैं कि बहुत पहले यहां कुलान्त नामक दैत्य रहता था। दैत्य कुल्लू के पास की नागणधार से अजगर का रूप धारण कर मंडी की घोग्घरधार से होता हुआ लाहौल स्पीति से मथाण गांव आ गया। दैत्य रूपी अजगर कुण्डली मार कर ब्यास नदी के प्रवाह को रोक कर इस जगह को पानी में डुबोना चाहता था। इसके पीछे उसका उद्देश्य यह था कि यहां रहने वाले सभी जीवजंतु पानी में डूब कर मर जाएंगे। भगवान शिव कुलान्त के इस विचार से से चिंतित हो गए।

बड़े जतन के बाद भगवान शिव ने उस राक्षस रूपी अजगर को अपने विश्वास में लिया। शिव ने उसके कान में कहा कि तुम्हारी पूंछ में आग लग गई है। इतना सुनते ही जैसे ही कुलान्त पीछे मुड़ा तभी शिव ने कुलान्त के सिर पर त्रिशूल वार कर दिया। त्रिशूल के प्रहार से कुलान्त मारा गया। कुलान्त के मरते ही उसका शरीर एक विशाल पर्वत में बदल गया। उसका शरीर धरती के जितने हिस्से में फैला हुआ था वह पूरा की पूरा क्षेत्र पर्वत में बदल गया। कुल्लू घाटी का बिजली महादेव से रोहतांग दर्रा और उधर मंडी के घोग्घरधार तक की घाटी कुलान्त के शरीर से निर्मित मानी जाती है। कुलान्त से ही कुलूत और इसके बाद कुल्लू नाम के पीछे यही किवदंती कही जाती है। कुलान्त दैत्य के मारने के बाद शिव ने इंद्र से कहा कि वे बारह साल में एक बार इस जगह पर बिजली गिराया करें। हर बारहवें साल में यहां आकाशीय बिजली गिरती है। इस बिजली से शिवलिंग चकनाचूर हो जाता है। शिवलिंग के टुकड़े इकट्ठा करके शिवजी का पुजारी मक्खन से जोड़कर स्थापित कर लेता है। कुछ समय बाद पिंडी अपने पुराने स्वरूप में आ जाती है।

बैजनाथ महादेव (कांगड़ा)
बैजनाथ १३वीं शताब्दी के बने शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. बैजनाथ अर्थात “वैद्य + नाथ” जिसका अर्थ है चिकित्सा अथवा ओषधियों का स्वामी. भगवान् शिव, जिन्हें यह मंदिर समर्पित है, को वैद्य + नाथ भी कहा जाता है. यह मंदिर बैजनाथ में पठानकोट-मंडी नेशनल हाईवे के बिलकुल बगल में स्थित है। बैजनाथ का पुराना नाम ‘कीरग्राम’ था परन्तु समय के यह मंदिर के प्रसिद्ध होता गया और ग्राम का नाम बैजनाथ पड़ गया. मंदिर के उतर-पश्चिम छोर पर बिनवा नदी, जो की आगे चल कर ब्यास नदी में मिलती है, बहती है.दशहरा उत्सव, जो परंपरागत रूप से रावण का पुतला जलाने के लिए मनाया जाता है लेकिन बैजनाथ में इसे रावण द्वारा की गई भगवान शिव की तपस्या ओर भक्ति करने के लिए सम्मान के रूप में मनाया जाता है. बैजनाथ के शहर के बारे में एक और दिलचस्प बात यह है कि यहाँ सुनार की दुकान नहीं है। बिनवा खड्ड के दूसरी ओर बसा पपरोला सोने की दुकानों के लिए प्रसिद्ध है।

काठगढ़ महादेव (कांगड़ा)
कांगड़ा जिले के इंदौरा उपमंडल में काठगढ़ महादेव का मंदिर स्थित है। यह विश्व का एकमात्र मंदिर है जहां शिवलिंग ऐसे स्वरुप में विद्यमान हैं जो दो भागों में बंटे हुए हैं अर्थात मां पार्वती और भगवान शिव के दो विभिन्न रूपों को ग्रहों और नक्षत्रों के परिवर्तित होने के अनुसार इनके दोनों भागों के मध्य का अंतर घटता-बढ़ता रहता है। ग्रीष्म ऋतु में यह स्वरूप दो भागों में बंट जाता है और शीत ऋतु में पुन: एक रूप धारण कर लेता है। चूंकि शिव का वह दिव्य लिंग शिवरात्रि को प्रगट हुआ था, इसलिए लोक मान्यता है कि काठगढ महादेव शिवलिंग के दो भाग भी चन्द्रमा की कलाओं के साथ करीब आते और दूर होते हैं। शिवरात्रि का दिन इनका मिलन माना जाता है।

यह पावन शिवलिंग अष्टकोणीय है तथा काले-भूरे रंग का है। शिव रूप में पूजे जाते शिवलिंग की ऊंचाई 7-8 फुट है जबकि पार्वती के रूप में अराध्य हिस्सा 5-6 फुट ऊंचा है। मान्यता है, त्रेता युग में भगवान राम के भाई भरत जब भी अपने ननिहाल कैकेय देश (कश्मीर) जाते थे, तो काठगढ़ में शिवलिंग की पूजा किया करते थे। महाराजा रणजीत सिंह ने जब गद्दी संभाली, तो पूरे राज्य के धार्मिक स्थलों का भ्रमण किया। वह जब काठगढ़ पहुंचे, तो इतना आनंदित हुए कि उन्होंने आदि शिवलिंग पर तुरंत सुंदर मंदिर बनवाया और वहां पूजा करके आगे निकले। मंदिर के पास ही बने एक कुएं का जल उन्हें इतना पसंद था कि वह हर शुभकार्य के लिए यहीं से जल मंगवाते थे।

त्रिलोकीनाथ (लाहौल स्पिति)
ट्रायबल ज़िला लाहौल स्पिति के त्रिलोकपुर गाँव में स्थित भगवान शिव का यह अकेला मंदिर है जहां पर‌ त्रिलोकीनाथ के शीश पर महात्मा बुद्ध विराजमान है। यहां छह भुजाओं वाली भगवान त्रिलोकी नाथ की मूर्ति है जिसके सिर पर बौद्ध की आकृति है। बौद्ध त्रिलोकीनाथ की प्रतिमा को अवलोकितेश्वर के रूप में तो हिंदू शिव के रूप में पूजते हैं। यानी हिंदुओं और बौद्धों के लिए यह स्थान साझा आध्यात्मिक स्थल है। मंदिर से जुड़ी अपनी गाथा है। भगवान शिव यहां तपस्या में मग्न रहे। मान्यता है कि वे यहां अज्ञात रूप से रहते हैं। पार्वती शिव से मिलने के लिए बेचैन थीं तो नारद और पार्वती ने उन्हें ढूंढा। लोककथा है कि शिव ने पार्वती को यहां अपने तीन विराट रूप दिखाए थे। तभी स्थान की मान्यता त्रिलोकीनाथ के तौर पर है। गांव त्रिलोकपुर के नाम से जाना जाता है।

भूतनाथ महादेव (मंडी)
भूतनाथ महादेव का मंदिर छोटी काशी के नाम से विख्यात मंडी ज़िला में मुख्या शहर में ब्यास नदी के किनारे है। रिकार्ड के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण 1527 ई. में राजा अजवेर सेन ने करवाया था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर को उस काल में बनवाया गया था जब राज्‍य की राजधानी को मंडी से भिउली में स्‍थानांतरित कर दिया गया था। मंदिर में स्‍थापित नंदी बैल की प्रतिमा बुर्ज की ओर देखती प्रतीत होती हे।

विद्वानों के अनुसार, राज माधव जो उस काल में राजा हुआ करते थे उन्‍होने इस मंदिर में आकर शिवरात्रि से पूर्व पूजा की थी और प्रार्थना भी की थी। यहां हर साल शिवरात्रि पर उत्‍सव मनाया जाता है जिसमें हजारों श्रद्धालु भाग लेते है, यह उत्‍सव पूरे एक सप्‍ताह तक चलता है। इस दौरान मंदिन जनपद के सभी स्‍थानीय देवता यहां पधारतें हैं।

शिरगुल महादेव (शिमला – सिरमौर)
सिरमौर व शिमला की सीमा पर करीब 11,969 फुट की ऊंचाई पर स्थित पौराणिक एवं ऐतिहासिक श्री शिरगुल महाराज चूड़धार की चोटी पर पूजे जाते हैं। चूड़धार में जहां अब विशालकाय शिव प्रतिमा हैं वहां पर प्राकृतिक शिवलिंग होता था। ऐसा भी कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने अपने हिमाचल प्रवास के दौरान यहां शिव की आराधना के लिए शिवलिंग की स्थापना की थी।पुराने जमाने में जब पहाड़ी राज्यों के लोग दिल्ली जाते थे, तो वहां पर मुगल शासक व उनकी सेना के लोग पहाड़ी लोगों को लूट लेते थे। यह सुनकर शिरगुल महाराज दिल्ली गए थे तथा मुगलों को अपनी शक्ति का प्रदर्शन देकर ऐसा करने से चेताया।

मुगल सेना ने शिरगुल महाराज को बंदी बनाया तथा चमड़े की बेडि़यों के बीच जकड़ दिया। बताया जाता है कि शिरगुल महाराज की सहायता हेतु बागड़देश से गुग्गा आए थे, परंतु उन्हें दिल्ली में यह मालूम नहीं हो रहा था कि शिरगुल महाराज को कहां बंदी बनाया गया है। ऐसे में मुगल शासन में भंगायण ने गुग्गा को शिरगुल महाराज के बंदी वाले स्थान के बारे में संकेत दिया, जिसके बाद गुग्गा ने शिरगुल महाराज को मूगलों की कैद से मुक्त करवाया। तब से यह भी मान्यता है कि शिरगुल महाराज एक पहाड़ी पर तथा माता भंगायण देवी को हरिपुरधार की पहाड़ी पर आमने-सामने बसाया गया। यही नहीं शिरगुल महाराज मानवीय संघर्ष के बाद देव स्थान तक पहुंचे। यह भी किंवदंति है कि पांडव भी अज्ञात वास के दौरान चूड़धार पहुंचे थे। शिरगुल महाराज के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह अपने भक्तों से जल्दी नाराज नहीं होते हैं। चूड़धार पहुंचने के लिए जिला सिरमौर के नौहराधार, शिमला जिला के चौपाल उपमंडल के अंतर्गत आने वाले सराहन से श्रद्धालु पहुंच सकते हैं। सराहन से करीब पांच घंटे का पैदल मार्ग चूड़धार पहुंचने का है, जबकि नौहराधार से करीब आठ घंटे का पैदल मार्ग चूड़धार पहुंचने का है।

रंगनाथ महादेव (बिलासपुर)
एक हजार वर्ष पुराना रंगनाथ मंदिर शिव को समर्पित था। रंगनाथ मद्रास (तमिलनाडु) में श्रीरंगम देवता के नाम से विष्णु कहे गए हैं पर बिलासपुर के रंगनाथ महादेव हैं 9वीं शताब्दी में बने रंगनाथ महादेव के मंदिर को महाराजा एलदेव ने बनवाया था। इसके आधार पर प्रतिहार शैली की झलक थी। हालांकि इसके परिसर में कई लघु मंदिर भी थे। लोगों के अनुसार, जब बारिश के लिए इस शिव मंदिर स्थित शिव लिंग पर जलधारा डालते थे और वह सतलुज नदी में मिलती थी तो एकाएक बारिश शुरू हो जाती थी। यह एक पुरानी मान्यता थी । सतलुज की गहराईयों में डूबने से पहले शिव पार्वती नंदी की मूर्तियां नए शहर के रंगनाथ मंदिर में रख दी गयी हैं। आज भी पुराने मंदिर के अवशेष हर साल जल समाधि लेते हैं और पानी उतरने पर फिर बाहर आते हैं अब इस मंदिर की कहानियां लोक गायकों, कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं तक ही सीमित रह गई हैं।

गसोतेश्वर महादेव (हमीरपुर)
कहा जाता है कि गसोता शब्द गोस्नोत को मिलाकर बना है यानि गउओं के लिए पानी का स्नोत। पांडवों को अज्ञात वास के दौरान छिपाने के लिए जगह की तलाश कर रहे थे। वहां पर भीम ने घराट चलाने की सोची और रात को ब्यास के पानी को मोड़ कर कूहल से घराट की तरफ लाने लगे तो किसी के आने की आवाज का आभास हुआ। उन्होंने सोचा कि सुबह हो गई है। भीम सामान यहां फेंक कर चल दिए। पांडव गसोता पहुंचे तो यहां पर भयंकर सूखा पड़ गया और पानी के बिना गायें तड़पने लगीं। भीम ने भूमि पर गदा से प्रहार किया और वहां पर जल स्नोत फूट पड़ा। यह जलस्नोत आज भी यहां हैं।गसोता महादेव में शिवलिंग हजारों साल से स्थापित है। कहते हैं कि एक किसान इसी गांव में खेत में हल जोत रहा था। इस प्रक्रिया के दौरान हल खेत में किसी वस्तु से टकराया तो उससे जल धारा निकली, दोबारा टकराया तथा उससे दूध निकला। तीसरी बार भी जब यह क्रम जारी रहा तो उससे खून निकला तथा किसान की आंखों की ज्योति बुझ गई। किसान को इस संदर्भ में आए स्वप्न के आधार पर वहां स्वयं भू शिवलिंग निकला तथा उसे स्थापित करने के लिए कहा गया। पुराणों के अनुसार पांडव अज्ञातवास के दौरान गसोता में रुके थे और कुछ समय यहां व्यतीत किया था। इसके प्रमाण हजारों सालों से आज भी मौजूद हैं।

शिव बाड़ी (ऊना)
ज़िला ऊना के गगरेट उपमंडल में सोमभद्रा नदी के किनारे जंगल में स्थित भगवान शिव का यह स्थान अति रमणीक है। मान्यता है कि किसी समय यह जंगल गुरु द्रोणाचार्य की नगरी हुआ करता था और यहीं पर पांडवों ने गुरु द्रोणाचार्य से धनुर्विद्या के गुर सीखे। इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। दंत कथा के अनुसार गुरु द्रोणाचार्य प्रतिदिन कैलाश पर्वत पर शिव जी की आराधना करने जाया करते थे। उनकी एक पुत्री थी जिसका नाम जज्याति था। उसने पिता से पूछा कि वह प्रतिदिन कैलाश पर्वत पर क्या करने जाते हैं तो गुरु द्रोणाचार्य ने कहा कि वह प्रतिदिन पर्वत पर शिव की आराधाना करने जाते हैं। जज्याति भी एक दिन उनके साथ जाने की जिद करने लगी। गुरु द्रोणाचार्य ने कहा कि वह अभी छोटी है इसलिए वह घर पर ही शिव की आराधना करें। जज्याति शिवबाड़ी में ही मिट्टी का शिवलिंग बना कर भगवान शिव की आराधना करने लग पड़ी। लोभ रहित बालिका की निस्वार्थ तपस्या देख भगवान शिव बालक के रूप में रोजाना उसके पास आने व उसके साथ खेलने लगे। जज्याति ने यह बात अपने पिता को बताई।

अगले दिन गुरु द्रोणाचार्य कैलाश पर्वत पर न जाकर वहीं पास में छिप कर बैठ गए। जैसे ही वह बालक जज्याति के साथ खेलने पहुंचा तो गुरु द्रोणाचार्य उस बालक के प्रकाश को देख कर समझ गए कि यह तो साक्षात भगवान शिव हैं। गुरु द्रोणाचार्य बालक के चरणों में गिर गए और भगवान ने साक्षात उन्हें दर्शन दे दिए। भगवान ने कहा कि यह बच्ची उनको सच्ची श्रद्धा से बुलाती थी इसलिए वह यहां पर आ जाते थे। जब जज्याति को इस बात का पता चला तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना न रहा। जज्याति ने भगवान शिव से वहीं रहने की जिद कर डाली। उसकी जिद पर भगवान शिव ने स्वयं वहां पिंडी की स्थापना की और वचन दिया कि हर वर्ष बैसाखी के दूसरे शनिवार यहां पर विशाल मेला लगा करेगा और उस दिन वह इस स्थान पर विराजमान रहा करेंगे। तत्पश्चात इस मंदिर की स्थापना हुई। बैसाखी के बाद आने वाले दूसरे शनिवार को वह दिन माना जाता है जब भगवान शिव पूरा दिन यहां रह कर भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

कांगड़ा के बैजनाथ में उड़ती परी के वीडियो के नाम पर बेवकूफ बन रहे लोग

इन हिमाचल डेस्क।। स्मार्टफोन हाथ में होने से हर कोई इंटरनेट इस्तेमाल करने लगा है मगर ज़रूरी नहीं कि हर ऐसा शख्स समझदार ही हो। तकनीक की कम जानकारी रखने वाले लोग अक्सर झूठी जानकारियों को एक समझ लेते हैं। जैसे फोटोशॉप या अन्य ऐप के माध्यम से बादलों में भगवान दिखाना, कमरे में भूत दिखाना या सड़कों पर एलियन दिखाना।

ऐसे ही लोगों की नासमझी का फायदा उठाने के लिए कुछ लोग फेसबुक पर पेज बनाकर फर्जी वीडियो बनाते हैं। वे जानते है कि बहुत से लोग नासमझी में इसे शेयर करेंगे और उनके वीडियो की रीच बढ़ेगी। हिमाचल में अब एक वीडियो शेयर किया जा रहा है जिसमें बहुत ही खराब एडिटिंग करके एक धुंधली सी आकृति को आसमान में उड़ते दिखाया है। बैकग्राउंड में बोल रहे लोग हैरानी जताते हुए बातें कर रहे हैं मानो वाकई कुछ आसमान में देख रहे हों।

कैप्शन है- कांगड़ा के बैजनाथ में परी।

आस्माँ मै परी,,मेने पहली बार dekhi aap भी देखें। viral video काँगड़ा के बेज्नाथ का है

Adm News ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಭಾನುವಾರ, ಜುಲೈ 21, 2019

बहुत से लोग इस वीडियो को शेयर कर रहे हैं जिनमें शिक्षित लोग भी शामिल हैं। उन्हें बता दें कि यह वीडियो फर्जी है। कोई भी कॉन्टेंट आगे शेयर करने से पहले कृपया सोच विचार करें कि क्या वाकई ऐसा हो सकता है। खुद निष्कर्ष पर न पहुंचे तो किसी जानकार की सलाह लें। प्ले स्टोर पर ऐसे कई ऐप्स हैं जिनकी मदद से ऐसे फन फ़ोटो और वीडियो बनाए जा सकते हैं।

रामस्वरूप शर्मा ने उठाया फोरलेन में देरी और कंपनी के भागने का मुद्दा

इन हिमाचल डेस्क।। कीरतपुर-नेरचौक फोर लेन के अटके काम और निर्माण कर रही कंपनी के भागने का मुद्दा लोकसभा में गूंजा है। मंडी के सांसद रामस्वरूप शर्मा ने क्या कहा, सुनिए-

Devraj Chauhan ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಭಾನುವಾರ, ಜುಲೈ 21, 2019

 

नाटकीय वीडियो वायरल होने का असर, कुफरधार में मिलेगा पानी

मंडी।। कुछ दिन पहले वायरल हुए नाटकीय वीडियो का असर हुआ है और अब मंडी के दरंग में कुफरधार में खेती करने जाने वाले लोगों के लिए नल लगाया जाएगा। इस जगह पर स्थायी आबादी नहीं है मगर यहां पर लोगों की जमीनें हैं जहां वे कुछ समय के लिए खेती करने आते हैं। मगर पानी की व्यवस्था न होने के कारण उन्हें दिक्कत होती थी।

नल लगाने की पुरानी मांग पूरी न होने पर यहां इन लोगों ने नाटकीय वीडियो बनाया और बच्चों को पशु बनाते हुए गंदला पानी डायरेक्ट मुंह लगाकर पिला दिया। वीडियो बनाने से पहले इस छपड़े के पास बहुत सी महिलाओं को बर्तनों के साथ बिठा दिया। फिर नाटकीय ढंग से सवाल जवाब किए गए।

देखिए, वीडियो बनाने के लिए कैसे बच्चों को जानवरों की तरह मुंह लगाकर गंदला पानी पिलाया गया।जिला मंडी के द्रंग इलाके के…

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಗುರುವಾರ, ಜುಲೈ 18, 2019

इस वीडियो में नल के लिए लगा चबूतरा भी दिख रहा था। यह नल 1996 में लगा था मगर स्थायी आबादी न होने की वजह से कम इस्तेमाल होने के कारण पाइपलाइन और नल की हालत खराब हो गई। ग्रामीणों का कहना है कि वे 1999 से वे कई बार गुहार लगा चुके थे मगर किसी ने उनकी नहीं सुनी, इसलिए उन्हें ऐसा वीडियो बनाकर शेयर करना पड़ा।

लोगों का दावा है कि वे जनवरी महीने में मधरण गांव से कुफरधार के लिए शिफ्ट हो जाते हैं। लगभग 8 महीने तक उनका कुफरधार में ही बसेरा रहता है। वे अपने मवेशियों और परिवार सहित खेती-बाड़ी के काम के लिए उधर पहुंचते हैं लेकिन सबसे बड़ी समस्या पीने के पानी की सताती है। इनके अस्थायी डेरों के लिए बिजली की भी व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण कहते हैं कि वे मिट्टी के तेल के लैंप जलाकर काम चलाते हैं।

बहरहाल, एसडीएम और आईपीएच विभाग के अधिकारियों ने इस जगह का दौरा किया है। उनका कहना है कि मंडी के डीसी को रिपोर्ट भेजी गई है और वहां से अप्रूवल मिलने की स्थिति में फिर से यहां पानी की व्यवस्था की जाएगी।