किराया बढ़ोतरी: जनता को भरोसे में लिए बिना क्यों किए जाते हैं फैसले

इन हिमाचल डेस्क।। सोमवार को बसों का किराया 25 फीसदी बढ़ाने की घोषणा कर दी गई और इसके साथ ही जनता की नाराजगी फूट पड़ी। समस्या किराया बढ़ाने से नहीं है, समस्या तरीके से है। पहले इस विषय पर परिवहन मंत्री तक गोलमोल बातें करते हैं और फिर अचानक किराया बढ़ोतरी का बम फोड़ देते हैं। ऐसे में जनता अपने मंत्रियों और नेताओं पर यकीन कैसे करेगी?

पिछली बार भी किराया ऐसे ही बढ़ाया गया था। निजी बस ऑपरेटर भी हमारे बीच से ही हैं और उनके हितों का खयाल रखना भी सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन ये भी सरकार को सोचना चाहिए कि उसके कदमों से बार-बार ऐसा संदेश क्यों जा रहा है कि वो जनता की बजाय ऑपरेटरों को तरजीह दे रही है।

इतिहास में जाएं तो मौजूदा परिवहन मंत्री जब विपक्ष में थे, तब भी निजी ऑपरेटरों की आवाज उठाया करते थे। इसमें कुछ गलत भी नहीं था। लेकिन जब तत्कालीन परिवहन मंत्री ने बिना परमिट चलने वाली वॉल्वो बसों पर नकेल कसी थी तो गोविंद ठाकुर ने इसका विरोध किया था और कहा था कि सरकार इन्हें परमिट न देकर अवैध बता रही है जिसमे टूरिज़म भी प्रभावित हो रहा है। वह ऑपरेटरों के प्रतिनिधिमंडल के साथ उस समय के नेता प्रतिपक्ष प्रेमकुमार धूमल से भी मिले थे।

आज गोविंद ठाकुर खुद परिवहन मंत्री बन चुके हैं, मगर बिना परमिट दौड़ने वालीं वॉल्वो बसों के लिए कोई नीति नहीं बना रहे। ये अवैध वॉल्वो लगातार एचआरटीसी की वॉल्वो को नुकसान पहुंचा रही हैं और कई रूट बन्द होने की कगार पर हैं, तब भी मंत्री चुप हैं। आरटीओ ऑफिस के अधिकारियों और अवैध वॉल्वो ऑपरेटरों पर मिलीभगत के आरोप लगते हैं कि कथित सेटिंग के बिना इतनी बड़ी-बड़ी बसें फिक्स्ड रुट पर नहीं चल सकतीं।

ये अधिकतर बसें पर्यटन नगरी मनाली से हैं जहां से गोविंद ठाकुर विधायक भी हैं। जन प्रतिनिधि होने के नाते उनकी जिम्मेदारी है कि अपने लोगों की आवाज उठाएं। मगर उनके मंत्री बन जाने के बाद उनके विभाग के फैसलों का संयोग से ही उनके करीबियों या क्षेत्र को लाभ मिलने लगे तो यह न चाहते हुए भी हितों के टकराव का मामला बन जाता है।

इससे पहले कि ऐसे सवाल भविष्य में पूरी सरकार को मुश्किल में डालें, सीएम जयराम ठाकुर को इस विषय पर सोचना चाहिए। कोई भी कदम उठाने से पहले सरकार को जनता को भरोसे में लेना चाहिए। अगर मंत्री या अधिकारी गोलमोल बातें करके जवाबदेही से बचने लगेंगे तो सीधा नुकसान प्रदेश के मुखिया को उठाना होगा। बेहतर होता सरकार क्रमिक बढ़ोतरी करती। क्योंकि जो लोग सक्षम हैं, उनके पास अपने वाहन हैं। बसों से यात्रा करने वालों में आज भी तबका ऐसा है जिसके लिए एक-एक रुपये की अहमियत है।

बसों का किराया 25% बढ़ाकर बोली सरकार- बाक़ी राज्यों से कम बढ़ाया

शिमला।। हिमाचल प्रदेश कैबिनेट ने आज कई फ़ैसले लिए जिनमें बसों का किराया बढ़ाना भी शामिल है। कैबिनेट ने बसों का किराया 25 प्रतिशत तक बढ़ाने की इजाज़त दी है। यानी अगर कहीं जाने के लिए आपको 100 रुपये का टिकट कटवाना होता था तो अब 125 रुपये देने पड़ सकते हैं। हालाँकि, किराया कब से बढ़ना है और कितना बढ़ना है, एचआरटीसी को यह फ़ैसला लेना है।

लंबे समय से सरकार की ओर से इस तरह के बयान आ रहे थे कि किराया बढ़ाया जा सकता है। मगर जनता के बीच विरोध होने के बाद परिवहन मंत्री इस बात से पलट गए थे। पिछली कैबिनेट बैठक के बाद गोविंद ठाकुर का कहना था कि बैठकों में कई विषयों पर चर्चा होती है मगर ज़रूरी नहीं कि हर बात पर फ़ैसला ले ही लिया जाए। मगर इसके कुछ ही दिन बाद अब किराया वाक़ई बढ़ाने की इजाज़त दे दी गई है।

कैबिनेट के फ़ैसलों की जानकारी देने के लिए बैठक के बाद शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज मीडिया से मुख़ातिब हुए। उन्होंने कहा, “देश के विभिन्न राज्यों, जैसे कि पंजाब ने भी बसों के किराये बढ़ा दिए हैं। उत्तराखंड ने तो बहुत ही ज़्यादा बढ़ाए हैं। हिमाचल में भी आज बसों का किराया बढ़ाने का फ़ैसला किया गया है। कोविड-19 के कारण 33 प्रतिशत बसें नहीं चल पा रही हैं। डीज़ल के रेट भी बढ़े हैं इसलिए 25 प्रतिशत तक किराया बढ़ाने की मंज़ूरी दे दी गई है।”

इसके आगे उन्होंने फिर कहा, “कैबिनेट बढ़ोतरी नहीं करना चाहता था मगर आस पड़ोस के राज्यों ने हिमाचल से ज़्यादा बढ़ोतरियाँ की हैं।” उनकी इस बात का क्या लॉजिक है, यह समझ से परे है। ज़्यादा बढ़ोतरियाँ पड़ोसी राज्यों द्वारा कर दिए जाने से हिमाचल सरकार कैसे किराया बढ़ाने को मजबूर हुई, यह उन्होंने नहीं समझाया और न ही बाद में पत्रकारों की ओर से सवाल पूछा गया।

आगे उन्होंने कहा, “यहाँ पर प्राइवेट ट्रांसपोर्टर्स और एचआरटीसी की बसें आज की कैपेसिटी में चल रही हैं, उसका एक हफ़्ते में पाँच करोड़ के घाटे में पड़ रही हैं। तो सब इस बर्डन को उठाए, इसलिए इसमें ज़्यादा बढ़ोतरी नहीं की गई है। इसलिए सबके ऊपर थोड़ा थोड़ा बर्डन डाला गया है कि सब इस इसे उठाएं। इसका निर्णय लिया गया है।”

ऐसा हाल तब है, जब बसें फ़ुल कैपेसिटी में चल रही हैं यानी यात्री चिपककर बैठ रहे हैं। उसमें दूरी भी उचित नहीं बन पा रही। सवाल ये है कि बसें 33 प्रतिशत ही चल रही हैं तो बाक़ी बसों को क्यों नहीं उतारा जा रहा? जब प्रदेश में लोगों के आय के साधन कम हो गए हैं, उसी दौर में किराये को 25 प्रतिशत तक बढ़ाने का एलान परेशान करने वाला है। हालाँकि, माना जा रहा है कि बाद में किराया 25 प्रतिशत की बजाय कम बढ़ाया जाए और लोगों को ऐसा संदेश देने की कोशिश की जाए कि सरकार ने उन्हें और राहत देकर कम किराया बढ़ाया है।

भारद्वाज ने कहा कि अब वर्तमान विधायक एचआरटीसी की बसों में मुफ़्त यात्रा नहीं कर पाएँगे। हालाँकि यह भी शोध का विषय है कि हिमाचल का कौन सा सिटिंग एमएलए एचआरटीसी की बसों में यात्रा करता है।

बस किराया बढ़ाने के प्रस्ताव पर हिमाचल के परिवहन मंत्री का यू-टर्न

मास्क न पहनने के लिए पहले खुद पर जुर्माना लगाएं हिमाचल के नेता

इन हिमाचल डेस्क।। खबर है कि हिमाचल प्रदेश सरकार आज मास्क न पहनने पर जुर्माने के प्रावधान का फैसला कर सकती है। आज कैबिनेट की बैठक होने वाली है जिसमें कोरोना संकट के अलावा अन्य कई विषयों पर चर्चा होगी। मगर जो खबर सभी का ध्यान खींच रही है, वो है कोरोना से बचने के लिए बनाए गए नियमों का पालन न करने पर सज़ा का प्रावधान।

सरकार का कहना है कि लोग सार्वजनिक स्थानों पर मास्क नहीं पहन रहे और सोशल डिस्टैंसिंग का ख़याल नहीं रख रहे जिससे कोरोना के फैलने की आशंका है। हिमाचल में इस वक्त ऐक्टिव केस 400 के पार हैं। यह स्थिति देश के बाकी प्रदेशों की तुलना में बेहतर लगती है। जितनी बड़ी संख्या में हिमाचल के लोग बाहर से अपने घर लौटे हैं, उसकी तुलना में वाकई ये आंकड़े काफ़ी अच्छे हैं। मगर इसका मतलब यह नहीं कि हिमाचल में कोरोना है ही नहीं।

हिमाचल में आप कहीं पर भी घूमें, ऐसा लगता है कि जन-जीवन सामान्य सा हो गया है। होना भी चाहिए था, क्योंकि जब कोरोना का कोई टीका और इलाज ही नहीं है तो आप घर पर नहीं बैठ सकते। मगर इस दौरान लोगों को देखकर लगता है कि उनके मन से डर ही ख़त्म हो गया है। न तो व सोशल डिस्टैंसिंग का पालन कर रहे है और न ही मास्क पहन रहे हैं। जिन्होंने मास्क पहना भी होता है, वो नाक को बाहर निकालकर सर्फ मुंह को ढकते हैं। कुछ तो जालीदार मास्क पहनने लगे हैं जिसका कोई मतलब ही नहीं है।

बहुत से लोग नाक बाहर निकालकर ऐसे पहन रहे हैं मास्क तो कुछ का मास्क गले में पड़ा रहता है।

बाज़ारों में हालत खराब है। न तो दुकानदारों ने मास्क पहने होते है और नही ग्राहकों ने। अगर आप उनके बीच मास्क पहनकर चले जाएं तो वे आपकी खिल्ली उड़ाते हैं कि आप डरपोक हैं। कुछ लोगों ने मास्क छोड़कर गले में पटका डालना शुरू कर दिया है, जिसे वे तभी लगाते हैं जब किसी दफ्तर जाना हो। बाकी समय वो उसी से पसीना और हाथ पोंछते हैं। जबकि अगर उन्होंने वायरस वाली सतह को छूने के बाद उस पटके से हाथ पोंछा हो और फिर उसी से नाक-मुंह ढक लिया हो तो तुरंत संक्रमित हो जाएंगे। इन्हें कुछ कहें तो बोलते हैं- प्रधानमंत्री भी तो पटका पहनते हैं।

ये लोगों की कैज़ुअल अप्रोच को दिखाता है। ये नेताओं को भी सबक है कि जिस देश में नासमझों की संख्या अच्छी खासी हो, उन्हें संदेश देने के लिए जबरन प्रयोग नहीं करने चाहिए। इससे भी बड़ी बात ये है कि आज जब हर कोई सोशल मीडिया पर है तो वो देख सकता है कि उसके नेता क्या कर रहे हैं। और इस मामले में हिमाचल प्रदेश सरकार से लेकर विपक्ष तक में बैठे नेता गलत उदाहरण पेश करते रहे हैं।

पिछले दिनों हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पर सोशल डिस्टैंसिंग का उल्लंघन कर एक हवन कार्यक्रम में सम्मिलित होने के आरोप लगे। ये एक ग़ैर जरूरी आयोजन था और मुख्यमंत्री का इसमें सम्मिलित होना तो और भी अनावश्यक था। वह भी उस अवस्था में जब बाकी लोगों को मंदिर-मस्जिदों में भीड़ लगाने की इजाजत नहीं, शादी समारोहों में 50 से ज़्यादा मेहमानों को बुलाया नहीं जा सकता।

विपक्ष ने सीएम पर नियमों के उल्लंघन को लेकर ज़ोरदार हमला बोला था

सरकार के कई मंत्री तो अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर बिना मास्क दिखते हैं और लोगों से घुलते-मिलते हैं। शायद उन्होंने प्रण ले लिया है कि वे बिना मास्क ही रहेंगे। ये लोग ही जनता को मास्क आदि न पहनने को प्रेरित कर रहे हैं। यहां तक कि कुछ सांसदों ने तो कोरोना काल में नाटक करने के लिए जबरन आयोजन करवाए ताकि अपनी प्रासंगिकता दिखा सकें। और हंसी की बात ये है कि सत्ताधारी नेताओं पर नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाने वाले विपक्षी नेता भी खुद वही करते नजर आते हैं।

कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन में भी उड़ी थीं नियमों की धज्जियाँ

पिछले दिनों शिमला में कांग्रेस ने सरकार के रवैये के विरोध में प्रदर्शन का तो सोशल डिस्टैंसिंग उसमें कोई नाम न था। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बिना मास्क पहने लोगों के बीच थे। नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री वैसे तो मीडिया के सामने सरकार पर आक्रामक रहते हैं मगर अपने यहां लोगों से मिलते हैं तो सोशल डिस्टैंसिंग और मास्क का उन्हें ख्याल नहीं रहता।

नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री की ऐसी तस्वीरें मौजूद हैं जिनमें वह कोरोना काल में बिना मास्क भीड़ में खड़े हैं।

खुद को अलग स्थापित करने की कोशिश में जुटे रहने वाले शिमला ग्रामीण के विधायक विक्रमादित्य सिंह इन दिनों सोशल मीडिया पर सरकार को घेरते हैं और सीएम पर नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं, मगर उनकी अपनी ही टाइमलाइन में पीछे जाएं तो वह भी कोरोना काल में हुए कई प्रदर्शनों में बिना मास्क नज़र आते हैं।

एक प्रदर्शन के दौरान विक्रमादित्य

कुछ ऐसी तस्वीरें भी हैं, जिनमें वह बिना मास्क के लोगों के साथ खड़े हैं और हाथ भी मिला रहे हैं। जबकि ख़ुद वह सीएम को निशाने पर ले रहे थे कि हवन करके नियम तोड़ा।

यही विक्रमादित्य रविवार को उग्र थे कि सरकार कोरोना के नियमों का पालन नहीं कर रही।

कुल मिलाकर बात ये है कि जिन नेताओं को आदर्श पेश करना चाहिए था, वे ख़ुद गलत उदाहरण पेश कर रहे हैं। जितनी शिद्दत से उन्हें लोगों को जागरूक करना चाहिए था, उसकी जगह वे पूरी ताकत एक-दूसरे पर आरोप लगाने में कर रहे हैं। सरकारी मीटिंगों, बैठकों और मंत्रियों द्वारा विभागों के कामों की समीक्षा की जो तस्वीरें आती हैं, वे दिखाती हैं कि हमारे नेता कितने लावपरवाह हैं। सत्ता और विपक्ष, दोनों के विधायकों की प्रेस कॉन्फ्रेंसों में भी यही आलम दिखता है।

सरकार को मास्क न पहनने पर कार्रवाई के नियम बनाने हैं तो बनाएं। मगर उनमें एक लाइन और जोड़े कि अगर सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या सरकारी पैसा लेने वाले लोग (जिनमें मंत्री, विधायक, निगमों-आयोगों के पदाधिकारी या सदस्य) शामिल हैं, वे इन नियमों को तोड़ेंगे तो उनपर दोगुना जुर्माना होगा। इसके साथ ही सरकार पहले अपने मंत्रियों से कहे कि मास्क लगाएं, हूजूम के साथ न चलें, झुंड बनाकर न बैठें। और विपक्ष भी पहले अपने आप को दुरुस्त करे, फिर खबरों में छपने के लिए सवाल उठाए।

पर्यटकों को आने देने के विरोध में कांग्रेस का प्रदर्शन, लगभग एक दर्जन पर केस

शिमला।। कोरोना काल में ही पर्यटकों के लिए हिमाचल की सीमाएं खोलने और बस किराये में बढ़ोतरी के प्रस्ताव के विरोध में कांग्रेस ने प्रदेश सचिवालय के बाहर प्रदर्शन किया और जमकर नारेबाजी की। इस दौरान प्रदर्शन करने वाले करीब लगभग एक दर्जन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। इस प्रदर्शन के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग की भी धज्जियां उड़ती दिखीं।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब तक कोविड-19 की जांच के लिए प्रदेश की सीमाओं पर व्यवस्था नहीं होती, तब तक इस फैसले पर रोक लगाई जाए। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने फैसला नहीं बदला तो कांग्रेस प्रदेश भर में विरोध प्रदर्शन करेगी। इस संबंध में उन्होंने डीसी शिमला अमित कश्यप के माध्यम से मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को ज्ञापन भी भेजा।

पर्यटकों के आने पर रोक के अलावा कांग्रेस ने बसों में 25 प्रतिशत में किराया वृद्धि का प्रस्ताव रद्द करने, बिजली बिलों में 125 यूनिट के ऊपर की बढ़ोतरी वापस लेने, राशन की सब्सिडी से बाहर किए एपीएल परिवारों को पुन: शामिल करने, कर्मचारी व पेंशन विरोधी निर्णय रद्द करने, कर्मचारियों का भविष्य निधि ब्याज बढ़ाने, सभी कर्मचारियों का डीए बहाल करने, डीजल-पेट्रोल की कीमतें घटाने और बेरोजगारी की मार झेल रहे युवाओं आर्थिक सहायता देने की मांग भी की।

अमर उजाला ने कहा- पवन राणा पर बयान देकर पलटीं इंदु गोस्वामी

शिमला।। हाल ही में हिमाचल से बीजेपी की राज्यसभा सांसद चुनी गईं इंदु गोस्वामी को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। हिंदी अख़बार अमर उजाला में छपे एक बयान को ग़लत बताए जाने के बाद अब अख़बार ने भी लिखा है कि उसके पास सबूत हैं कि गोस्वामी ने ऐसा बयान दिया। अख़बार ने यह भी लिखा है कि जब उसने बीजेपी सांसद को साक्ष्य होने की बात कही तो वह कहने लगीं कि उनका बयान किसी और संदर्भ में था।

क्या है मामला
हाल ही में सोशल मीडिया पर इंदु गोस्वामी को कुछ लोगों ने हिमाचल बीजेपी का अध्यक्ष घोषित कर दिया था मगर ये खबर अफ़वाह निकली। इसके बाद अमर उजाला में एक खबर प्रकाशित हुई थी, जिसका शीर्षक है- इंदु बोलीं- संगठन मंत्री राणा बताएंगे किसने उछाला मेरा नाम।‘ 

इस खबर में लिखा था, “राज्यसभा सांसद इंदु गोस्वामी ने भाजपा प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए अपना नाम उछाले जाने की घटना के बाद पवन राणा को लपेटे में लिया है। उन्होंने कहा कि कैसे उनका नाम सोशल मीडिया में आया, यह संगठन से पूछा जाए। इस बारे में पवन राणा से पूछें। वह इस बारे में कोई बात नहीं करेंगी।”

इसके बाद इंदु गोस्वामी ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल से अमर उजाला की खबर की कटिंग शेयर करते हुए लिखा, “आज जो अमर उजाला जैसे सम्माननीय समाचार पत्र में मेरे नाम से खबर लगी है मैं हैरान हूँ कि मैने ऐसी कोई बात उस पत्रकार से नहीं की , जिस पत्रकार ने मेरे नाम से खबर छापी है। इतने सम्माननीय समाचार पत्र में पत्रकारिता करने वाले पत्रकार अगर इस तरह की पत्रकारिता करेंगे तो उनके खिलाफ कोई कार्यवाही होनी चाहिये या नहीं? मुझे लगता है होनी चाहिये।

आज जो अमर उजाला जैसे सम्माननीय समाचार पत्र में मेरे नाम से खबर लगी है मैं हैरान हूँ कि मैने ऐसी कोई बात उस पत्रकार से…

Posted by Indu Goswami on Saturday, July 11, 2020

इसके बाद इंदु गोस्वामी के समर्थकों ने भी सोशल मीडिया पर अखबार की आलोचना शुरू कर दी। मगर अब नई खबर में अमर उजाला ने बताया है कि उसके पास साक्ष्य हैं कि इंदु गोस्वामी का दावा गलत है। खबर का शीर्षक है- अध्यक्ष पद के साथ विवादों की रेस में शामिल हुईं इंदु गोस्वामी

अमर उजाला के मुताबिक, इंदु गोस्वामी ने उनकी खबर पर सवाल उठाने के बाद रविवार को भेजे बयान में कहा है कि उनकी मंशा ये नहीं थी जिस तरह से खबर लिखी गई है। अखबार ने लिखा है, “खास बात यह है कि इससे पहले तक वह अमर उजाला से किसी तरह की बातचीत से हीं इनकार कर रही थीं लेकिन जब अमर उजाला ने बातचीत के साक्ष्य होने की बात कही तो वह अपनी ही बात से पलट गईं हैं और अब किसी और संदर्भ में बयान देने की बात कह रही हैं।”

क्या है अमर उजाला का दावा
अमर उजाला का कहना है, “हिमाचल अध्यक्ष पद के लिए नाम चलने की ख़बर पर शनिवार को अमर उजाला ने इंदु गोस्वामी से फोन पर बात कर उनका पक्ष जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि इस संबंध में आपको संगठन से पूछना चाहिए। मैं इस विषय पर कुछ नहीं बोलना चाहती हूं। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने खुद कहा कि इस संबंध में पवन राणा जी से पूछो, उनसे पूछो। अमर उजाला ने उनके इस बयान के आधार पर खबर प्रकाशित कर दी। खबर छपने के बाद पार्टी के अंदर ही सियासी भूचाल मच गया। दरअसल, पवन राणा को लेकर कुछ दिन पूर्व विधायक व कुछ नेता मुखर हुए थे। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को यह विवाद सुलझाना पड़ा। अब राणा पर ही बयान देने पर विवाद बढ़ा तो इंदु अपने बयान से पलट गईं।”

बस किराया बढ़ाने के प्रस्ताव पर हिमाचल के परिवहन मंत्री का यू-टर्न

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के परिवहन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने बसों का किराया 25 प्रतिशत बढ़ाने के प्रस्ताव पर यू-टर्न ले लिया है। उन्होंने कहा कि अभी इस पर अंतिम फ़ैसला नहीं किया गया है। इससे पहले ऐसी खबरें आई थीं कि राज्य कैबिनेट ने शुक्रवार को हुई बैठक में किराया बढ़ा दिया है और इसकी अधिसूचना जारी होने वाली थी। इन खबरों का विपक्षी दलों और हिमाचल प्रदेश वासियों ने सोशल मीडिया पर विरोध किया था।

शनिवार को परिवहन मंत्री ने माना कि इस विषय पर कैबिनेट में चर्चा हुई थी। उन्होंने कहा, “जब कभी कैबिनेट की बैठक होती है, कई मुद्दों पर औपचारिक और अनौपचारिक तौर पर बात होती है। बसों के किराये में बढ़ोतरी के मुद्दे पर अनौपचारिक तौर पर चर्चा हुई थी मगर कोई फैसला नहीं लिया गया था।”

उन्होंने कहा कि सरकार को किराया बढ़ाने के सुझाव मिल रहे हैं और ट्रांसपोर्टर्स ने भी इस संबंध में मांग की है। हालांकि, उन्होंने कहा कि कोरोना महामारु के कारण विभिन्न वर्गों को आर्थिक नुकसान हुआ है और सरकार समाज के हर वर्ग के कल्याण को ध्यान में रखते हुए इस संबंध में कोई फैसला करेगी।

गौरतलब है कि बहुत से बस ऑपरेटर किराये में 50 फीसदी तक की बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं। हालांकि, सरकार ने इस मांग को नहीं माना है और इसकी जगह बसों को पूरी क्षमता के साथ चलाने की इजाजत  है। अभी तक बहुत सारे निजी बस ऑपरेटर किराय बढ़ाने की मांग के साथ अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि डीजल का दाम बढ़ने के कारण उन्हें नुकसान हो रहा है और उनकी किराया बढ़ाने की मांग वाजिब है। ऐसी खबरें भी आई थीं कि एचआरटीसी ने भी किराया बढ़ाने का सुझाव दिया है।

 

बाबा! आप कांग्रेसी या भाजपाई, इससे मतलब नहीं…

नवनीत शर्मा।। देसी आम पक रहे हैं। वातावरण में महक है उनकी। धर्मशाला-चंडीगढ़ राजमार्ग पर ढलियारा से डाडासीबा के लिए मार्ग है। उसी पर गुरनवाड़ नाम एक गांव है। वहां से फिर अंदर को चलें। करीब दो ढाई किलोमीटर दूर बाबा पहाड़ी गांधी का गांव। कौन सा घर है, यह धूप के इस मौसम में बताने के लिए कोई नहीं। न कोई बोर्ड, न मील पत्थर। सचिवालय, पंचायत कार्यालय, शराब के ठेके तक के बोर्ड कहीं भी मिल जाते हैं। बाबा के घर का पता कोई बोर्ड नहीं बताता। किसी सरकार ने आजतक यह बीड़ा नहीं उठाया।

क्यों उठाएं? क्या मिलेगा? आखिर क्या खूबी थी बाबा की? यही कि स्वतंत्रता सेनानी कांशी राम को पहाड़ी गांधी नाम पंडित नेहरू ने दिया था? यही कि उन्हें बुलबुल-ए-पहाड़ सरोजिनी नायडु ने कहा था? यही कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी से आहत बाबा ने सारी उम्र काले कपड़े पहनने का प्रण किया और स्याहपोश जरनैल कहाए? या यह कि उन्होंने 730 दिन जेल में काटे? इस पीढ़ी के लिए यह सब क्या है? कुछ होता तो बाबा का घर को संग्रहालय बनाने का संकल्प पूरा हो चुका होता। यह दशा है एक स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार की।

….वातावरण शांत है। किसी पंछी की आवाज सुनाई दी है। पहचानी नहीं गई। शायद बुलबुल ही हो। एक घर आधा गिर चुका है। एक हिस्सा गिरने वाला है। यहां गिरी हुईं ईंटें दिखती हैं। कच्ची दीवारें दिखती हैं। कहीं-कहीं राजनेताओं की घोषणाएं गिरी हुई दिखती हैं। बाबा के आंगन में तुलसी मुस्तैद खड़ी है। जैसे आजादी हो। लेकिन उससे हरे नहीं, सूखे पत्ते मुंह निकाले खड़े हैं।

अचानक आवाज गूंजी, मैं विनोद शर्मा हूं। बाबा जी का पोता। शिक्षा विभाग से बतौर अधीक्षक सेवानिवृत्त हुआ हूं। साथ में पत्नी हैं। उनके हाथ में बाबा के टूटे हुए मकान के ताले की चाबी थी। यह चाबी दरअसल, इतिहास की चाबी थी। ओआन (ऐवान) यानी मुख्य कमरा या बैठक में आते ही जैसे एक ठंडक भरा स्पर्श महसूस होता है। बाबा की पतोहू कहती हैं, ‘पुराने घरों की यही खासियत है। गर्मी में ठंडे, सर्दियों में गर्म।’

दीवार पर बाबा का चित्र है। जैसे बाबा प्रश्नवाचक मुद्रा में हों, ‘ वे लोग नहीं आए जिन्हें मेरे पोते ने ततीमे काट कर दे दिए हैं कि मेरा घर सरकार ले ले?’ इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं था। बोहड़ यानी छत पर जाते ही बाबा की संदूकड़ी दिखती है। वैद्य भी थे। जब जेल या रैलियों से फुरसत मिलती, दवा भी देते थे। एक चरखा भी है। इसी पर सूत काता। जीवन का भी और स्वतंत्रता संग्राम का भी। चरखे ने जैसे उकताए हुए बुजुर्ग की तरह कहा हो, ‘अब क्या लाभ है मेरा।’

क्या यहां कोई नहीं आया? विनोद कहते हैं, ‘आए। बहुत लोग आए।’ पता चला कि पूर्व नगर नियोजन मंत्री सुधीर शर्मा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को लिखा। अफसरों में बड़ी हलचल हुई। हमने घर छोड़ दिया और नया बना लिया ताकि सरकार को घर दिया जा सके। लेकिन नई सरकार ने अब तक कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। यहां के विधायक ने सांसद अनुराग ठाकुर की तिरंगा यात्रा के दौरान यहां जलसा भी किया। सांसद ने दो स्ट्रीट लाइट भी लगवाईं। इसके अलावा कुछ नहीं हुआ।

विकास की दौड़ में पीछे रहने वाले इस महत्वपूर्ण स्थल पर कोई गंभीर नहीं है। विनोद शर्मा कहते हैं, ‘एक बार किसी ने सवाल पूछा कि बाबा तो कांग्रेसी नहीं थे? इस पर मैंने कहा कि वह स्वतंत्रता सेनानी थे। जिन्होंने आजादी के लिए अपनी बहुत सी संपदा कुर्क करवा दी और गरीबी में ही चले गए।

बाहर आकर चलने लगे तो एक सिंदूरी आम टपका पेड़ से। उसकी खुशबू वहां की वनस्पति के साथ और महकी। यकीनन यह खुशबू आठ गुणे छह की उस कोठरी में बाबा को नहीं मिलती होगी जहां अंग्रेज उन्हें कैद करते थे। सुखद यह है कि उन पर तत्कालीन सांसद नारायण चंद पराशर ने 1984 में एक डाक टिकट जारी करवाया था इंदिरा गांधी से। इधर, हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी उनकी जयंती हर साल मनाती है। इस बार यह आयोजन कांगड़ा जिले के नगरोटा बगवां में हो रहा है। बाबा के घर से लौट कर यह सवाल मथ रहा है। बाबा कांग्रेसी थे या भाजपाई? बाबा स्वतंत्रता सेनानी थे…बस!!!

एक नज़र बाबा कांशीराम की जीवनयात्रा पर:
-11 जुलाई, 1882 : पद्धयाली, डाडासीबा, कांगड़ा में जन्म
-1890 : सरस्वती देवी के साथ विवाह
-1893 : पिता लखनू राम का देहांत
-1894 : माता रेवती देवी का देहांत
-1905 : कांगड़ा का भूकंप और लाला लाजपतराय के साथ सेवाकार्य
-1906 : सरदार अजीत सिंह व सूफी अम्बा प्रसाद के साथ लाहौर में भेंट
-1911 : दिल्ली दरबार देखना और लॉर्ड हार्डिंग पर बम
-1919 : सत्याग्र्रह का हल्फ लेना
-1920 : पहली गिरफ्तारी डाडासीबा में
-1920 : पहली कविता…निक्के-निक्के माहणुआ जो…
-1921-22 : धर्मशाला में लाला लाजपतराय के साथ जेल काटी और गुरदासपुर जेल भी लाला जी के साथ काटी
-1924 : लायलपुर कांग्र्रेस इजलास में शामिल
-1927 : दूसरी गिरफ्तारी, लाहौर में जेल काटी
-1928 : कलकत्ता आल इंडिया कांग्र्रेस इजलास में शामिल
-1930 : तीसरी गिरफ्तारी, अटक जेल में काटी
-1931 : सरदार भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव को फांसी। इसके परिणामस्वरूप 23 अप्रैल, 1931 से काले कपड़े पहनना शुरू किए
-1931-32-34 : जुगलेहेड़ (ऊना), दौलतपुर (ऊना) और जनाड़ी कांफ्रेंस में सरोजनी नायडू द्वारा बुल-बुले-पहाड़ का खिताब
-1937 : गढ़दीवाला होशियारपुर कांफ्रेंस, पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा ‘पहाड़ी गांधी’ का खिताब देना
-1939 : नादौन, सुजानपुर टीहरा और हमीरपुर में कांफ्रेंस
-1939 : मंगवाल-धमेटा में कांफ्रेंस
-1940 : ज्वालामुखी-कालेश्वर महादेव कांफ्रेंस
-1943 : 15 अक्तूबर को देहांत

(लेखक दैनिक जागरण के राज्य संपादक हैं. अख़बार में प्रकाशित उनके लेख को अनुमति लेकर जुलाई 2018 में यहां प्रकाशित किया गया था, आज फिर इसे साझा किया जा रहा है।)

HPPS अफ़सरों के तबादले, सीएम के भरोसेमंद सुशील कुमार होंगे शिमला के ASP

शिमला।। हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग ने नए फेरबदल के तहत चार पुलिस अधिकारियों के तबादले किए हैं। ये चारों एचपीपीएस (हिमाचल प्रदेश पुलिस सर्विस) ऑफ़िसर हैं। इससे पहले चार जुलाई को राज्य सरकार ने 35 एसपीपीएस अधिकारियों के तबादले किए थे।

शुक्रवार को बदले गए पुलिस अधिकारियों में सुशील कुमार का नाम अहम है जिन्हें शिमला का एएसपी लगाया गया है। एएसपी सीएम सिक्यॉरिटी रहे सुशील कुमार जल्द ही एचपीपीएस से आईपीएस में जाने वाले हैं।

बिलासपुर से संबंध रखने वाले सुशील कुमार की गिनती मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के भरोसेमंद अधिकारियों में होती है। माना जा रहा है इसीलिए सीएम ने शिमला जैसे बड़े और अहम ज़िले में सुशील कुमार की तैनाती की है। इससे पहले चार जुलाई को उनका तबादला सिरमौर के एएसपी के तौर पर हुआ था।

अभी तक शिमला के एएसपी रहे मनमोहन सिंह अब अडिशनल एसपी सीआईडी होंगे। वहीं मंडी के एएसपी पुनीत रघु अब पंडोह में थर्ड आईआरबीएन के एएसपी होंगे। इससे पहले इनका तबादला फर्स्ट आईआरबीएन बनगढ़ (ऊना) के लिए हुआ था। वहीं 6th आईआरबीएन धौला कुआं बबीता राणा को एएसपी सिरमौर लगाया गया है।

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चार HPPS अधिकारियों के तबादले

दिल्ली से काँगड़ा घूमने आए कपल ने लैपटॉप पर बनाई थी फ़र्ज़ी रिपोर्ट

कांगड़ा।। फर्जी कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट के आधार पर हिमाचल आने वाले दिल्ली के कपल को लेकर पुलिस का कहना है कि इन लोगों ने ये रिपोर्ट लैपटॉप पर तैयार की थी। दरअसल संदेह होने पर काँगड़ा पुलिस ने दिल्ली के आरएमएल अस्पताल की लैब से क्रॉस चेक किया था तो पाया था कि कपल जो रिपोर्ट दिखा रहा है, वह सही नहीं है। हालाँकि, दिल्ली से आए पति-पत्नी अड़े हुए थे कि रिपोर्ट असली है।

ये दोनों छह जुलाई की कोरोना की फर्जी निगेटिव रिपोर्ट बनाकर कांगड़ा जिले में आए थे। रिपोर्ट फर्जी पाए जाने पर इस कपल को पालमपुर के भवारना के गुग्गा सलोह के होटल में ढूंढा और क्वारंटीन सेंटर परौर भेज दिया गया था। दोनों पर नूरपुर पुलिस थाने में धोखाधड़ी और आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट जिसे पुलिस ने फ़र्ज़ी पाया

हालाँकि, इन दोनों को अभी क्वॉरन्टीन रखा गया है और गिरफ़्तारी तभी होगी जब इनका टेस्ट करवाने पर रिपोर्ट नेगेटिव आएगी। हिमाचल प्रदेश ने पर्यटकों के लिए कोरोना नेगेटिव और पाँच दिन की होटल बुकिंग होने पर प्रवेश की इजाज़त दी है। इसके बाद से हिमाचल प्रदेश में पर्यटकों के आने का सिलसिला बढ़ा है। इस बीच ये एक मामला ऐसा आ गया जिसने प्रशासन की चिंता बढ़ा  दी है।

बिना रोक-टोक, बिना कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट हिमाचल पहुँच रहे पर्यटक

सोशल मीडिया ने इंदु गोस्वामी को बना दिया बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष

शिमला।। हिमाचल प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष का पद खाली है मगर सोशल मीडिया पर इसे भर दिया गया है। बीजेपी नेता इंदु गोस्वामी को लोगों ने प्रदेशाध्यक्ष बना दिया है जबकि पार्टी की ओर से ऐसा कोई एलान अभी (गुरुवार शाम चार बजे तक) नहीं हुआ है। किसी ने उनके विकिपीडिया पेज तक को गलत अपडेट कर दिया।

फेसबुक और ट्विटर पर लोग बुधवार शाम ये ही इंदु गोस्वामी को बधाइयां दे रहे हैं। उनकी फेसबुक टाइमलाइन संदेशों से भर गई है। लोग ढूँढकर इंदु गोस्वामी के साथ खींची गई सेल्फियां पोस्ट कर रहे हैं। यहां तक कि बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय ने भी बधाई वाला ट्वीट कर दिया था, बाद में उन्होंने इसके लिए खेद जताया।

हालांकि, हिमाचल बीजेपी के कई बड़े नेता चुप हैं और उनके बीच भी भ्रम की स्थिति है। वे इस संबंध में कोई प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। ऐसा लग रहा है मानो वे भी स्वीकार कर चुके हैं कि सोशल मीडिया में जो चल रहा है, वो सही है। वे इस न्यूज को वेरिफाई करने की भी हिम्मत नहीं जुटा रहे।

उधर इंदु गोस्वामी की ओर से भी इसपर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। ऐसे में पूरा मामला अफवाह प्रतीत होता है। ऐसी अफवाह जो गोस्वामी की सीएम के साथ मुलाकात को लेकर फैली। कुछ खबरनवीसों ने कयास के आधार पर वॉट्सऐप ग्रुपों में ये गप डाली कि इंदु अगली स्टेट प्रेजिटेंड हो सकती हैं और ये बात संभवत: सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

फिलहाल इंदु गोस्वामी के प्रदेशाध्यक्ष बनने की खबर में सच्चाई नहीं है। अगर ऐसी किसी खबर की पुष्टि होगी तो हम उस समाचार को पाठकों से साझा करेंगे।