बिलासपुर।। बिलासपुर से संबंध रखने वाले वकील राजेंद्र हांडा की मौत को लेकर उनके परिजनों ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राजेंद्र के बेटे विपुल ने पत्रकारों से बात करते हुए आरोप लगाया है कि उनके पिता का मोबाइल फोन भी गायब है। अपने पिता की संदिग्ध हालात में मौत को लेकर उन्होंने सवाल उठाए हैं और शिमला के लक्कड़ बाजार थाने में एफआईआऱ दर्ज करवाई है। उनका कहना है कि उनके पिता का मोबाइल फोन आईजीएमसी के कोविड-19 वॉर्ड से बिस्तर से ही गायब कर दिया गया।
परिवार ने शव मिलने पर आंख के पास घाव होने को लेकर भी संदेह जाहिर किया है। बेटे विपुल का कहना है कि इस मामले में अस्पताल प्रशासन ने भी पारदर्शिता नहीं बरती है। विपुल बताते हैं कि उन्हें कोविड-19 सेंटर से एक नर्स ने रात को ही जानकारी दे दी थी कि उनके पिता की मौत हो गई है। उस समय वह पिता के लिए खाने का सामान लेकर पहुंचे थे।
मोबाइल कैसे गायब हुआ?
बकौल विपुल, इस बात के बारे में जानकर हैरान रह किए उनके पिता की मौत उसी दिन दोपहर दो बजे हो चुकी थी मगर उन्हें इसकी सूचना नहीं दी गई थी। उनका कहना है कि उनके पिता की आंख में हल्की चोट आई थी जो अस्पताल लाए जाते वक्त नहीं थी। अब विपुल का आरोप है कि उनके पिता के साथ कुछ ऐसा हुआ है, जो सामान्य नहीं है। उन्होंने शक जताया कि उनके पिता ने अपने मोबाइल में कुछ ऐसा रिकॉर्ड किया होगा, जिसके कारण उनका मोबाइल ही गायब कर दिया गया।
‘चार घंटों में क्या हुआ’
विपुल का कहना है कि उन्होंने सुबह ही अपने पिता से मोबाइल पर बात की थी और उनका कहना था कि तबीयत में सुधार है। ऐसे में विपुल सवाल उठाते हैं कि चार घंटों में ही उनका देहांत हो जाना सवाल उठाता है क्योंकि सीसीटीवी कैमरे की फुटेज भी अब उपलब्ध नहीं है।
विपुल का आरोप है कि उनके पिता की मौत कोविड सेंटर की खामियों और वहां तैनात कर्मचारियों की लापरवाही से हुई है, ऐसे में इस मामले की जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब कोविड-19 सेंटर सो मोबाइल ही गायब हो जा रहा है तो इससे समझा जा सकता है कि वहां पर क्या आलम है। उन्होंने अंदेशा जताया कि किसी बड़ी बात से पर्दा हटने के डर से ही उनके पिता के मोबाइल को गायब किया गया है और उनकी मौत भी असामान्य है।
वहीं, राजेंद्र के बेटे शुभम ने इन हिमाचल को बताया कि वह इस मामले में इंसाफ चाहते हैं। इस संबंध में अस्पताल प्रबंधन का पक्ष अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है।
इन हिमाचल डेस्क।। संकरी सड़क पर तेज गति से स्कूटी और बाइक चलाते हुए वीडियो शूट करने वाले युवकों को धर्मशाला में भारी भरकम जुर्माना भरना पड़ा है। युवकों ने इन हिमाचल से वीडियो हटाने का आग्रह करते हुए बताया कि इस सम्बंध में धर्मशाला पुलिस के आगे उन्हें जुर्माना भरना पड़ा है। हालांकि, खबर लिखे जाने तक पुलिस का पक्ष उपलब्ध नहीं हो पाया है।
इनमें से एक युवक ने पुलिस के सामने जुर्माना भरने की जानकारी देते हुए इन हिमाचल से कहा कि ‘इस घटना से उन्हें एक बड़ा सबक मिला है।’
बता दें कि विभिन्न पेजों पर एक वीडियो शेयर हुआ था जिसमें धर्मशाला की सड़कों पर कुछ युवा दो बाइकों पर सवार होकर एक स्कूटी सवार से होड़ लगा रहे थे। वे तंग सड़क पर तेज रफ्तार बाइक व स्कूटी चलाते हुए ओवरटेक करने की कोशिश में थे। ये वीडियो इन्हीं द्वारा रिकॉर्ड किया गया था, जिसके आखिर में झड़प को भी रिकॉर्ड किया गया था।
युवकों के भविष्य को देखते हुए और पुलिस की ओर से कार्रवाई होने की बात पर विचार करते हुए इन हिमाचल की सम्पादकीय टीम ने वीडियो को हटाने का फैसला किया है। हालांकि, इन हिमाचल टीम न सिर्फ इन युवकों बल्कि सभी नागरिकों से उम्मीद करती है कि कोई भी वाहन जिम्मेदारी से चलाएं। क्योंकि सवाल सिर्फ आपकी जान का नहीं, सड़क पर और जिंदगियों को भी खतरा हो सकता है।
शिमला।। मंडी पुलिस ने अपने फेसबुक पेज पर एक पोस्ट डालकर लोगों को फ्रॉड और स्कैम से बचने के लिए जागरूक करने का अभियान चलाया है। यह अच्छी पहल है मगर एक पोस्ट को लेकर उसपर सवाल उठ रहे हैं।
मंडी पुलिस ने बताया है कि SSL सर्टिफिकेट वाली वेबसाइट पर ही अपनी संवेदनशील जानकारी डालनी चाहिए वरना हैकर्स उसे चुरा सकते हैं। पोस्ट देखें-
इस बीच इन हिमाचल ने चेक करना चाहा कि क्या मंडी पुलिस का पोर्टल सिक्योर है। ऊपर दी गई पोस्ट में इसका यूआरएल mandipolice.in बताया गया है। यह असुरक्षित यानी इनसिक्योर है, इसमें https नहीं है। फिर हमने जानना चाहा कि क्या हिमाचल पोलिस का अपना पोर्टल भी सिक्योर है, तो पाया कि उसमें भी SSL सर्टिफिकेट इंस्टॉल्ड नहीं है। वह भी तब, जब यह सिटीजन्स पोर्टल है जहां लोग अपनी जानकरियाँ डाल सकते हैं।
https की जगह http है एचपी पोलिस सिटीज़न पोर्टल के यूआरएल में
मोबाइल और डेस्कटॉप, दोनों वर्जन्स को ब्राउजर इनसिक्योर बता रहा है। यह बात यूआरएल से भी पता चलती है, जिसमें https की जगह http है। यह बात मंडी पोलिस की हिदायत के अनुरूप नहीं है। मंडी पुलिस का कहना है वेबसाइट के यूआरएल में https जरूर होना चाहिए। जबकि यह उसीकी की वेबसाइट में नहीं है-
शिमला।। देश के लिए सामरिक दृष्टि से अति महत्वूपर्ण अटल टनल, रोहतांग के लोकार्पण के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वन मंत्री राकेश पठानिया से संक्षित बातचीत की। अमर उजाला ने इस वार्ता की अवधि ’99 सेकंड’ बताई है। न एक सेकंड कम, न एक सेकंड ज़्यादा।
बहरहाल, अखबार के अनुसार इस दौरान प्रधानमंत्री ने मजाकिया लहजे में पठानिया से कहा कि ‘1996 में तुम बहुत पतले हुआ करते थे, अब तुम ठीक लग रहे हो।’
प्रधानमंत्री ने इस दौरान राकेश पठानिया से 1996 में नूरपुर में हुए उपचुनाव को लेकर भी बातचीत की। पठानिया ने 1996 में भाजपा प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव लड़ा था और कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी। उपचुनाव में राकेश पठानिया मात्र एक हजार मतों से पराजित हो गए थे। उस समय नरेंद्र मोदी प्रदेश भाजपा के प्रभारी थे और पठानिया को टिकट दिलाने में उनकी भी भूमिका थी।
अखबार के अनुसार, वन मंत्री राकेश पठानिया ने इस मुलाकात को लेकर कहा कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसी बड़ी शख्सियत ने मुझे स्नेह दिया। आज मेरी जिंदगी सफल हो गई।’
शिमला।। शिमला ग्रामीण से कांग्रेस के विधायक विक्रमादित्य ने अटल टनल रोहतांग के लिए अपने माता-पिता को धन्यवाद कहा है। बता दें कि ये वीरभद्र सिंह और प्रतिभा सिंह, दोनों मंडी लोकसभा सीट से सांसद रह चुके हैं।
विक्रमादित्य ने फेसबुक पोस्ट में लिखा है, “रोहतांग ( अटल टनल ) में सभी सरकारों का योगदान है, यह कोई राजनीतिक विषय नहीं है।यह राष्ट्रहित और प्रदेश हित का पल है।”
वह लिखते हैं, “हम पूर्ण प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, डॉक्टर मनमोहन सिंह व श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी व प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का दिल से धन्यवाद करते हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में योगदान दिया है।”
आगे विक्रमादित्य ने लिखा है, “पूर्व मुख्यमंत्री श्री वीरभद्र सिंह व पूर्व सांसद श्रीमती प्रतिभा सिंह का भी हार्दिक धन्यवाद। प्रधानमंत्री जी आज पूर्व प्रधानमंत्रियों का नाम भी अपने भाषण में लेते तो हमें बहुत अच्छा लगता। भारत माता की जय।”
शिमला।। अटल टनल रोहतांग को लेकर श्रेय लेने का सिलसिला थम नहीं रहा है। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह ने शनिवार को जारी बयान में कहा कि 2010 में जब वह केंद्र में मंत्री थे, उन्होंने इसके जल्द निर्माण की आवश्यकता को लेकर प्रभावी ढंग से तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के समक्ष मसला रखा था।
वीरभद्र ने लिखा है, “सुरंग निर्माण का पहला सपना 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने लाहौल स्पीति दौरे के दौरान उस समय देखा था, जब वह केलांग में रात्रि विश्राम को ठहरीं थीं।
बकौल पूर्व सीएम, उसी साल 1972 में इंदिरा गांधी ने यहां की भौगोलिक स्थितियों को देखते हुए रक्षा मंत्रालय को यहां से सड़क या किसी सुरंग निर्माण की संभावनाओं का पता लगाने को कहा था।”
पूर्व सीएम के मुताबिक, 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में तत्कालीन यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस सुरंग की आधारशिला 28 जून को रखी। इस सुरंग के चालू होने से अब लाहुल स्पीति के लोगों को पूरा साल सड़क संपर्क की सुविधा मिलेगी। देश की रक्षा, सुरक्षा में भी यह बहुत ही महत्वपूर्ण साबित होगी।
अटल टनल रोहतांग के लोकार्पण के साथ ही इसकी नींव रखे जाने की कहानी भी लोगों की जुबां पर आ गई है। कैसे लाहौल के टशी दावा ने अपने मित्र अटल बिहारी बाजपेयी को इस सुरंग का महत्व बताया था और कैसे वाजपेयी ने दोस्त की मांग को पूरा किया ताज यह आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं। मगर हिमाचल में एक और कहानी है जो आम आदमी और उसके रसूखदार दोस्त के बीच के रिश्ते की गहराई को बयां करती है। आगे पढ़ें-
डॉ. आशीष नड्डा।। साल 2009 के आसपास की बात है। लोकसभा के चुनाव का दौर चला था। ज़िला हमीरपुर के किसी गाँव में व्यक्तिगत कार्य हेतु मैं गया था। शाम का झुरमुरा अंधेरा था, घर पहुँचने की जल्दी थी पर मोटरसाइकिल का टायर जबाब दे गया। यह बहुत बुरा अनुभव था, एक तो मैं अकेला था ऊपर से पंक्चर ठीक करने का बंदोबस्त लगभग तीन किलोमीटर था, वो भी खड़ी चढ़ाई को पार करते हुए।
ख़ैर काफी हिम्मत का प्रदर्शन करते हुए मैं वहां पहुँच गया। पंक्चर ठीक करने वाला अपने काम में मशगूल हो गया और मैं उसकी दुकान के साथ चबूतरे पर बैठे 65 -70 साल के बुजुर्गों की चुनावी चर्चा को सुनने लगा। उन लोगों की चर्चा चलते-चलते आजकल के नेताओं और पुराने नेताओं के बीच की तुलना पर पहुँच गई। एक सत्तर साल का बुजुर्ग इसी चर्चा को आगे बढाते हुए एक किस्सा सुनाने लगा।
जिस जगह पर मैं पंक्चर ठीक करवा रहा था, उस इलाके में कोई लम्बरदार (नंबरदार) रहा होगा बूढा। उसी लम्बरदार और उधर के किसी नेता के बीच घटित किस्से को सुनाने लगा। बूढ़ा कहने लगा कि इस इलाके में जो नीचे खड्ड है, वहां पहले पुल नहीं होता था। लोग खड्ड के पानी में बीच बीच में बड़े बड़े पत्थर रखकर उनके ऊपर से निकलकर इसे पर किया करते थे। हर बरसात उन पत्थरों को बहा कर ले जाती और नए पत्थर वहां रखने पड़ते। जिस दिन बारिश हो जाती, उस दिन इस इलाके के बच्चे स्कूल नहीँ जाते थे क्योंकि जो स्कूल था वो खड्ड के पार किसी दूसरे गाँव में था।
यह पूरे इलाके के लिए चिंता का विषय था और बच्चों के भविष्य के लिए और भी ज्यादा भारी बरसातों में कई कई दिन तक बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे। सरकारों को कई बार पत्र लिखे गए कई बार नेता लोगों से मांग की गई पर कुछ बन नहीँ पा रहा था। अब यह तो 1970 -1980 के दशक का हिमाचल था जब मेन रोड ही पूरे नहीं बने थे तो गाँवों की सड़कों की ओर भला कौन देखता।
हमीरपुर से उस समय एक बहुत दिग्गज नेता का राज्य राजनीति में उदय हुआ था। बूढ़ा बता रहा था की हमारे लंबरदार की उन नेता के साथ गहरी दोस्ती थी। वैसे कहाँ कोई विधायक-मंत्री और कहाँ लम्बरदार मगर दोस्ती थी तो थी। हिमाचल में 1977 के चुनाव के बाद यह नेताजी मंत्री बन गए। लम्बरदार ने गाँव में कहा कि इस बार हम यह पुल बनवा देंगे, मंत्री जी हमारे परम मित्र हैं।
सांकेतिक तस्वीर
हालाँकि लम्बरदार की विधानसभा अलग थी और माननीय नेता जी कहीं और से चुनाव लड़ते थे। लंबरदार सुबह के समय गाँव से हमीरपुर (नेता जी के घर) के लिए छड़ी लेकर निकल गया। कोई 30 -35 किलोमीटर का रास्ता था परिवहन के साधन भी इतने नही थे न पुराने लोगों को पैदल चलने में परेशानी होती थी। लिफ्ट मांगते हुए या जैसे भी उन्होंने सफर किया।
तड़के निकलकर दोपहर तक लम्बरदार हमीरपुर में अपने मित्र नेता के घर पहुँच गया। लम्बरदार मंत्री के घर पहुंचा अक्खड़ ग्रामीण स्वभाव। आँगन में कोई स्टाफ मिला तो सीधे नेता का नाम लिया और स्टाफ को हुक्म किया जाके मंत्री को बोल दो फलाना राम लम्बरदार आया है। नेता जी बाहर आये गले लगे। लम्बरदार ने न मंत्री बनने की बधाई दी न कुछ बस हाल चाल पूछा।
नेता: चल खाने का समय हो रहा है खाना खा ले लम्बरदार: नहीं मैं किसी काम से आया हूं पहले वो कर लेते हैं।
नेता: अरे काम हो जाएगा इतनी दूर से पैदल आया है पहले खाना खा लेते हैं। लम्बरदार: नहीं, पहले काम फिर भोजन।
हारकर मंत्री जी बोले चल काम ही बता दे। लम्बरदार ने तपाक से सारी समस्या सामने रख दी कि ‘गांव की खड्ड में पुल नहीँ है, लगभग 6 पंचायतों के बच्चे स्कूल जाते हैं, बरसात में बहने का डर बना रहता है। इसलिए पुल बनवा दो।’ मंत्री जी ने कुछ देर सोचा और कहा- हाँ करता हूँ कुछ पर तू खाना खा ले अब। लम्बरदार का खून फिर उबाल मार गया बोला- सोचना नहीं है, खाना बाद में। या हाँ कर अभी या मना कर।
मंत्री साब मनाते रहे पर वो नहीं माना। उन्होंने कहा शिमला जा के मुझे अधिकारियों से पता करना होगा ये करना होगा पर लम्बरदार हाँ या ना के फैसले पर अड़ा रहा। आखिरकर मंत्री जी ने भेद खोल दिया और कहा देख लम्बरदार बात ऐसी है कf इस बार बजट में ज़िला हमीरपुर के ग्रामीण एरिया को एक ही पुल सैंक्शन हो पाया है और वो मैंने अपने पैतृक इलाके के लिए सैंक्शन करवाया है> वहां भी यही समस्या और हजारों की जनता को है।
ये उस दौर की बात है जब हिमाचल सरकार के पास ज्यादा बजट होता नहीं था और कर्ज लेकर काम करने की नेताओं को आदत नहीं थी। बहरहास, मंत्री जी ने कहा कि अगली बार तेरा ही काम होगा, यह मैं आज ही वचन देता हूँ। लम्बरदार बोला मैं समझ गया, तूने वोट तो अपनी सीट से लेने हैं, हमारा इलाका दूसरी सीट में हैं। फिर तूने हमारे काम क्यों करने? कर तूने अपना वोट बैंक पक्का करना।”
नेता जी समझाते रहे मजबूरियां गिनाते रहे। कभी राजनीति प्रशासनिक भाषा में कभी दोस्ती की भाषा में पर लम्बरदार नहीँ माना। छड़ी उठाकर बिना भोजन किये वापिस गाँव के सफर के लिए निकल गया।
बूढ़ा किस्सा सुनाते हुए आगे कहता है कि दो तीन दिन तक लम्बरदार ने गाँव में किसी से बात ही नहीँ की। न किसी को बताया कि पुल के लिए हाँ हुई या न हुई। तीन दिन बाद किसी ने गांव में बताया कि नीचे खड्ड के पास सरकारी जीप खड़ी है और कुछ नाप नपाई का काम कर रहे हैं। सारा गाँव, बच्चा-बच्चा खड्ड की तरफ दौड़ गया। लम्बरदार भी घर से निकला।
नाप-नपाई कर रहे लोगों को देख पूरा गांव जुट गया था (सांकेतिक चित्र)
गावँ में कोई नई चीज होती है तो ऐसा ही माहौल होता है। मैंने खुद देखा है हैंडपंप लगाने की मशीन बिलासपुर में एक गाँव में आई तो बड़े बुजुर्गों के साथ गाँव का बच्चा बच्चा वहीँ खड़ा रहा। लोग खाना खाने घर जाते और फिर वापिस मशीन के मुहाने खड़े हो जाते। ऐसा नहीं है कि उन्होंने मशीन नहीं देखी थी। वो मशीन को लेकर उत्सुक नहीं थे, वे अपनी गांव की जमीन से निकलने वाली पानी की पहली जलधारा के साक्षी बनना चाहते थे। वो जलधारा जोपेयजल की उनकी बरसों से चली आ रही समस्या का एक समाधान होती।
जब आज के दौर में भी गांवों में ऐसा माहौल है तो 70 के दशक के आखिर में सरकारी जीप के खड्ड किनारे पहुंचने और अधिकारियों के नाप-नपाई करने पर क्या माहौल रहा होगा, आप सोच सकते हैं। बहरहाल, वापस लौटते हैं लंबरदार की ओर। तो सब लोग खड्ड किनारे देखकर खड़े रहे, अधिकारी काम करते रहे। न लोग पूछ रहे कि क्या हो रहा, न अधिकारी बता रहे। लम्बरदार के पहुँचने पर दोनों पक्षों की खामोशी टूटी। अपने रौबदार परिचय के साथ लम्बरदार ने पूछा कि आप लोग यहाँ क्या नाम रहे हैं और कौन हैं। तब पता चला कि वो PWD विभाग के SDO हैं और यहाँ पुल बनाना है, उसकी नाप नपाई के लिए आए हैं मंत्रीं साब के आदेश पर।
लम्बरदार ने कहा- मैं राजनीति जानता हूँ, पुल पता नहीं कब बनेगा। आप आ गए नाप-नपाई करने बिना बजट के। इस पूरे साल जिले के लिए एक ही पुल मिला है ग्रामीण एरिया के लिए तो हमारे गांव में कैसे बन जाएगा? अधिकारी ने जबाब दिया- आप ठीक बोल रहे हैं। पुल एक ही है। मंत्री जी का आदेश है कि वो उनके इलाके में नहीं, अब यहां बनेगा। मंत्री जी के इलाके का पुल अगले बजट में देखा जाएगा।
इस कहानी का यह हिस्सा सुनकर मैं हैरान रह गया। यह काल्पनिक कहानी नहीं थी, 1977 के आसपास की बात थी। मैं 2009 में इसे सुन रहा था। मैं उस दौर का व्यक्ति हूँ जिस दौर में राजनीति यहाँ तक चली गयी है कि मंत्री चाहते हैं कि सारा विकास उनके इलाके में हो जाए, भले खड्ड के बीच में इमारतें बना दी जाएं और भले वे अगली बरसात में बह जाएं। यहां मंत्री होते तो राज्य के हैं, मगर अपने मंत्रालय की योजनाओं का फायदा प्रदेश को नहीं, अपने चुनाव क्षेत्र को ही देने की सोचते हैं। आज वो दौर है जब सरकारें अपनी पार्टी के विधायक को सगा और विपक्षी विधायक को सौतेला समझती हैं।
वो महान नेता, जिन्होंने एकमात्र सैंक्शन पुल अपनी विधानसभा छोड़कर दूसरी विधानसभा को दे दिया था, उनका नाम था- “ठाकुर जगदेव चन्द।”
ठाकुर जगदेव
यह कहानी यहीं खत्म नहीं है। आगे भी सुनाई गई। बूढ़े ने बताया कि बरसों बाद 1993 में ठाकुर जगदेव चन्द की जब अचानक मृत्यु हुई तो अंतिम संस्कार पर लकड़ी डालने इस इलाके से बहुत लोग गए। बूढ़े ने कहा- मैं भी लम्बरदार के साथ गया था। कफ़न डालने (हिमाचल में मृतकों पर कपड़ा डालने की परंपरा है) की जब बारी आई तो दिसम्बर की कड़कड़ती ठण्ड में लम्बरदार ने कफन की जगह अपनी ओढी हुई शॉल ठाकुर जगदेव के पार्थिव शरीर पर कफ़न की जगह डाली थी। बूढ़े ने बताया कि ठाकुर जगदेव की मृत्यु के ठीक सात दिन 1993 में ही उनके दोस्त लम्बरदार ने भी प्राण त्याग दिए थे ।
प्रतीकात्मक तस्वीर
इस बातचीत ने भावुक कर दिया था। इस बीच तक पंक्चर ठीक हो चुका था। वर्तमान दौर के नेताओं और उस समय के राजनेताओं के बीच की तुलना करते हुए मैं मोटरसाइकिल पर किक मारकर घर की ऒर चल पड़ा। संयोग से मुझे उसी पुल के ऊपर से गुजरना था, जिसकी यह कहानी थी। उस दिन से पहले भी मैं कई बार उस पुल के ऊपर से गुजरा था। मगर इस बात से मैं अनिभज्ञ था कि यह मात्र एक कंक्रीट और पत्थर से बना स्ट्रक्चर नहीँ बल्कि त्याग और दोस्ती की कहानी का एक प्रतीक है।
मैंने मोटरसाइकिल रोककर पट्टिका को देखना चाहा पर सब कुछ मिट चुका था। हमीरपुर बिलासपुर हाइवे पर उखली स्थान हैं वहां से बाबा बालकनाथ मंदिर दियोटसिद्ध को रास्ता कटता है। उसी लिंक रोड पर थोड़ा आगे जाकर जंगल के बीचोबीच खड्ड पर यह पुल है। 2009 के बाद 2011 में जब मैंने इस किस्से को अपनी डायरी में उतारा तब मैं ठाकुर जगदेव चन्द के पैतृक इलाके पटलांदर गया और कहानी को तारीखों से पुख्ता करने लिए उस पुल पट्टिका पढ़ के आया जो पुल ठाकुर जगदेव चन्द को अपने पैतृक इलाके में पुंघ खड्ड के ऊपर बनवाना था जो फिर कहीं बाद में बना।
1977 से 1993 तक ठाकुर जगदेव चन्द ने हमीरपुर सीट से कोई चुनाव नहीँ हारा। 1993 में बाबरी विध्वंस के बाद हुए चुनावों में शांता कुमार सरकार भी गिर गई शांता कुमार सिटिंग सीएम होते हुए भी चुनाव हार गए। उस समय भी ठाकुर जगदेव चंद लगातार पांचवीं बार जीतकर विधानसभा पहुंचे। परंतु चुनाव की जीत के कुछ दिनों बाद ही उनका दिल का दौर पड़ने से अल्पायु लगभग 62 वर्ष की उम्र में स्वर्गवास हो गया।
कहते हैं कि ठाकुर जगदेव चन्द जिन्दा होते तो तो बीजेपी की राजनीति कुछ अलग होती। हालाँकि मैं इसपर नहीं जाता हूँ। ठाकुर जगदेव क्या होते, क्या न होते वो अलग बात है पर वो क्या थे यह बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसे भाव वाले नेता (किसी भी पार्टी के) हमारे राज्य को मिले इसीलिए हिमाचल पहाड़ी राज्य होने के बावजूद मुलभुत सुविधायों पेयजल सड़क बिजली के मामले में बड़े राज्यों को टक्कर देता है।
यह किस्सा 2011 में मैंने डायरी पर लिखा था लिखा था परंतु इसे सार्वजानिक प्लैटफॉर्म पर रखने के पीछे उम्मीद यह है कि वर्तमान राजनीति में भी प्रदेश को पार्टीबाजी से ऊपर ऐसे रत्न मिलते रहें।
(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं। उनसे aashishnadda @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
इन हिमाचल डेस्क।। अटल टनल रोहतांग का शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकार्पण कर दिया। हर साल लंबे समय तक कठिन मौसम के बीच बुनियादी सुविधाओं के अभाव में रहने वाली आबादी के लिए एक अच्छी खबर है। इस सुरंग की मांग बहुत पहले से हो रही थी मगर इस दिशा में काम नहीं हो पा रहा था। अब, जबकि सुरंग बन गई है तो इसे लेकर क्रेडिट लेने की होड़ मची हुई है।
पंडित सुखराम के पोते आश्रय शर्मा कहते है कि उनके दादा की वजह से सुरंग बनी, कांग्रेस कहती है कि ये सपना सोनिया गांधी ने देखा था, प्रेम कुमार धूमल समर्थक कहते हैं कि उनके प्रयास थे और आज तो खुद पीएम मोदी ने कह दिया कि अटल की जो सुरंग का सुझाव वह देते थे और इसी कारण यह सपना साकार हो पाया।
हो सकता है कि इसमें सभी के प्रयास रहे हों। उनके दावों को कमतर नहीं आंका जा सकता। लेकिन जब भी बात होगी निर्णायक लम्हे की, तब छेरिंग दोरजे और टशी दावा का जिक्र होगा। ये उन हस्तियों में शामिल हैं, अटल जी को टनल बनाने के लिए तैयार करने में जिनकी अहम भूमिका रही है। और अटल ने इनके सुझाव के कारण टनल का सपना ही नहीं देखा बल्कि वास्तविकता में इसकी नींव भी रखी थी। कौन हैं ये लोग, इनकी बात हम आगे करेंगे।
पीएम ने कहा, “मैं और धूमल जी अक्सर वाजपेयी जी को सुरंग का सुझाव देते थे।”
पुरानी मांग और रोपवे बनाने की योजना लाहौल जब पंजाब का हिस्सा था तब यहां के विकास के लिए जनजातीय सलाहकार परिषद बनी थी। साल 1955 की बात है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहलाल नेहरू मनाली आए। लाहौल के लोगों ने अपनी समस्या बताई और कहा कि सुरंग बन जाए तो सब ठीक हो जाएगा। पीएम ने कहा कि देश की माली हालत अभी ऐसी नहीं कि सुरंग बन सके, कुछ और तरीका ढूंढना होगा।
पीएम के दिल्ली लौटने के कुछ दिनों बाद जापानी कंपनी का एक इंजीनियर यहां पहुंचा। यह कंपनी रोपवे बनाने की माहिर थी। इंजीनियर ने शुरुआती मुआयना किया और लौटने लगा तो जीप हादसे की शिकार हो गई और उसकी मौत हो गई। फिर यह मामला यहीं अटक गया। आगे कोई प्रोगेस नहीं हुई।
फिर कई साल बीते। 1972 में लाहौल स्पीति की पूर्व विधायक लता ठाकुर ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को बताया था कि कैसे भारी बर्फबारी के कारण एक बड़ा इलाका बाकी देश से कट जाता है। इससे होने वाली समस्याओं को लेकर उन्होंने इंदिरा गांधी को अवगत करवाया। लता से पहले और बाद में इलाके के विधायक रहे ठाकुर देवी सिंह भी कई बार ये मांग उठाई मगर कुछ नहीं हुआ। कुछ दिन तक सुरंग की चर्चा चलती लेकिन कोई ठोस काम नहीं होता।
कई साल बीत गए। फिर आता है साल 2002. अटल बिहारी वाजपेयी अपने मित्र टशी टावा के निमंत्रण पर केलांग पहुंचे। यहां उन्होंने घोषणा की कि सुरंग बनाई जाएगी। यह इस सुरंग के संबंध में इस तरह की पहली विधिवत और आधिकारिक घोषणा थी। और यह घोषणा भी यूं ही नहीं हो गई। इसकी भी अपनी एक कहानी है।
साल 1998 में उठाई गई वो मांग… लाहौल के टशी दावा आज इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी वाजपेयी से गहरी दोस्ती थी। मित्रता का आगाज हुआ था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कारण। दोनों एक ट्रेनिंग के दौरान मिले, बातों का आदान-प्रदान हुआ और दिल का रिश्ता बन गया। टशी दावा और उनके करीबी सर्कल के लोग जानते थे कि इस सुरंग का लाहुल के लिए कितना महत्व है। इसलिए उन्होंने टशी को तैयार किया कि वह वाजपेयी जी से सुरंग के बारे में कम से कम एक बार मांग अवश्य उठाएं।
टशी ने टनल की मांग को लेकर एक चिट्ठी लिखवाई। यह खत लिखा था जाने-माने साहित्यकार छेरिंग दोरजे ने। फिर, टशी दावा ने चमल लाल से संपर्क किया जो पठानकोट से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे और पांगी में प्रवास कर चुके थे। साथ ही उन्होंने हमीरपुर से संबंध रखने वाले ठाकुर राम सिंह से भी संपर्क साधा। चमन लाल ने इन्हें दिल्ली बुला लिया। तो दिल्ली पहुंचे- टशी दावा, छेरिंग दोरजे और साथ में एक और सहयोगी अभय।
ठाकुर राम सिंह तब दिल्ली के झंडेवालान में संघ के कार्यालय में थे। तो हिमाचल से गई ये टीम उनके वहां पहुंची। वहां तय हुआ कि इस तरह से निजी हैसियत से जाने से बेहतर होगा किसी संस्था या संगठन के प्रतिनिधि के तौर पर एक व्यापक इलाके की मांग उठाई जाए। तो वहीं लाहौल एवं पांगी जनजातीय सेवा समिति का गठन कर दिया गया। अध्यक्ष बने टशी दावा, सचिव बनाए गए छेरिंग दोरजे, अभय को कोषाध्यक्ष और चमन लाल को संरक्षक बनाया गया।
छेरिंग दोरजे Image: Jagran
लद्दाख और कारगिल का जिक्र…
उसी दौरान छेरिंग दोरजे ने सुझाव दिया कि मांगपत्र में लाहुल के लोगों के लिए सुरंग मांगने के बजाय देश की रक्षा के लिए इसकी अहमियत की भी बात होनी चाहिए। सबकी सहमति के बाद उन्होंने मांगपत्र में लिखा कि कैसे चीन और पाकिस्तान से लद्दाख और कारगिल आदि की रक्षा के लिए इस सुरंग का बनना काफी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि यह सुरंग हर मौसम में चालू रहेगी। दोरजे आज वयोवृद्ध हैं मगर उन्हें याद है कि कैसे उन्होंने लाहौल के लोगों की मांग को नीचे रखकर रक्षा ज़रूरतों के हिसाब से सुरंग की अहमियत को मांगपत्र में ऊपर लिखा था।
बाद में छेरिंग ने बताया कि उन्होंने अपने मांगपत्र में कारगिल को क्यों तरजीह दी थी। वह बताते हैं, “मैं लेह होते हुए कारगिल जाता था। वहां जिलाधीश काचो गुलाम मोहम्मद के साथ मित्रता थी। वह कहते थे कि पाकिस्तान बहुत पास है, एक दिन हड़प लेगा इस इलाके को, तुम होटल में छत पर न सोया करो, गोली लग सकती है। मगर मुझे हमेशा लगता था कि चीन जो है, वह पाकिस्तान से कहीं बड़ा शत्रु है। मैंने प्रार्थना पत्र में सुरंग को पाकिस्तान और चीन के कोण से प्रमुखता दी थी। विषय में भी यही लिखा। उसके बाद लाहौल का नाम लिया था।”
सुरक्षा के लिए भी अहम है यह सुरंग
खैर, तीन सदस्यों वाली इस टीम ने पीएम से मुलाकात की। छेरिंग दोरजे को 1998 में वाजपेयी से हुई मुलाकात अच्छी तरह याद है। वह बताते हैं कि वाजपेयी जी प्रतिक्रिया सकारात्मक थी। दोरजे के मुताबिक, वाजपेयी जी ने उस मुलाकात में कहा था कि ‘ये सुरंग महत्वपूर्ण है और काफी पहले ही बन जानी चाहिए थी। अभी खर्च बढ़ेगा मगर बनानी तो पड़ेगी ही।’ तत्कालीन पीएम ने उन्हें रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिज़ से मिलने के लिए कहा था। इस तरह से पहली मुलाकात संपन्न हुई थी। बाद में वे लोग जॉर्ज से भी मिले थो जो उन्हें स्वयं प्रवेशद्वार तक लेने आए थे।
इसके बाद कागरिल में युद्ध छिड़ गया। भारत ने विजय हासिल की और घुसपैठियों को खदेड़कर फिर नियंत्रण रेखा तक अपने हिस्से पर कब्जा किया। युद्ध खत्म होने के बाद साल 1999 में टशी दावा अपने साथ छेरिंग दोरजे को लेकर फिर वाजपेयी से मिलने गए। बकौल दोरजे, तत्कालीन पीएम ने हैरानी जताई कि पिछली मुलाकात में हमने कैसे इस सुरंग की मांग को रखते हुए लद्दाख और कारगिल का जिक्र किया गया था। फिर उन्होंने तुरंत इस सुरंग को बनाने के लिए सहमति दे दी। साल 2002 में जब वाजपेयी अपने मित्र टशी के साथ केलांग आए तो उन्होंने वहीं से लेह और मनाली को जोड़ने की योजना की घोषणा की। तत्कालीन पीएम ने सुरंग के लिए अप्रोच रोड का शिलान्यास भी किया था।
यह शुरुआत थी इस बरसों पुरानी मांग के धरातल पर उतरने की। फिर अगली सरकारों ने लेटलतीफी बरती। यूपीए सरकार ने 2010 में इसका शिलान्यास किया। कछुए की रफ्तार से काम होता रहा और अब जाकर 2020 में यह सुरंग पूरी हुई है। इससे जनजातीय इलाके के लोगों को कितनी सुविधा होगी, इसकी कल्पना बहुत से लोग नहीं कर सकते। कई फुट बर्फ के बीच कई महीनों तक संसाधनों के अभाव में रहना सबके बस की बात नहीं। जो काम सबसे बस में है, वह है- बिना कुछ किए क्रेडिट लेने की कोशिश करना।
केलांग।। अटल टनल रोहतांग के नॉर्थ पोर्टल के पास प्रस्तावित गौतम बुद्ध की 328 फीट ऊंची प्रतिमा के लिए पहाड़ी की टेस्टिंग कर ली गई है। यह काम जीएसआई की एक टीम ने किया है। इस प्रतिमा पर 500 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है।
रॉक की टेस्टिंग में पीर पंजाल रेंज की इस पहाड़ी का हिस्सा प्रतिमा कार्व करने के लिए सही पाया गया है। ऐसी खबर भी है कि बुद्ध की प्रतिमा को तराशने के लिए गुजरात की एक निजी कंपनी के इंजीनियर घाटी पहुंच गए हैं। यह प्रक्रिया कैसे हुई, कैसे टेंडर निकले, कैसे दिए गए, पैसा कौन देगा, इसे लेकर कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है।
अभी तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, जियोग्राफिकल सर्वे ऑफ इंडिया की टीम ने दो बार रॉक टेस्टिंग की प्रक्रिया पूरी कर ली है। अमर उजाला ने दावा किया है कि जीएसआई ने इसकी रिपोर्ट केंद्र को सौंप दी है। प्रस्तावित प्रतिमा निर्माण स्थल मोदी की जनसभा के ठीक दक्षिण दिशा में चंद्रा नदी के पार पीर पंजाल की पहाड़ी में है। जनसभा से यह स्थल सीधे नजर आता है।
इस संबंध में मंत्री डॉ. रामलाल मारकंडा ने कहा है कि अटल टनल के साथ यह ‘दुर्लभ’ बुद्ध की प्रतिमा पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होगी। हालांकि, दुर्लभ का अर्थ होता है जो आसानी से प्राप्त न हो। जो प्रतिमा खुद बनाई जा रही है, वह कैसे दुर्लभ होगी, यह समझ से परे है। बहरहाल, इस प्रतिमा को लेकर केंद्र सरकार से सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है।
कुल्लू।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अटल टनल रोहतांग का लोकार्पण कर दिया है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि आज हिमाचल के करोड़ों लोगों का इंतजार खत्म हुआ है। हालांकि, हिमाचल की आबादी अभी तक एक करोड़ भी नहीं हुई है। बहरहाल, आगे उन्होंने कहा कि जब वह हिमाचल प्रभारी होते थे, तब अटल जी के हिमाचल आने पर उनसे मिलने जाया करते थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के साथ मिलकर अटल जी से बात करते थे तो अक्सर इस टनल का सुझाव रखते थे। पीएम ने कहा, “यही सुझाव न जाने कब अटल जी का ध्येय बन गया।”
…तो 2040 तक पूरा होता काम
पीएम ने कहा कि जिस हिसाब से कांग्रेस के कार्यकाल में इस सुरंग का काम चल रहा था, उस हिसाब से यह 2040 में पूरी होती। पीएम ने कहा कि अटल जी ने 2002 में टनल के लिए अप्रोच रोड का शिलान्यास किया था और फिर इस काम को भुला दिया गया। उन्होंने कहा, 2013-14 तक मात्र 1300 मीटर टनल बनी थी और इसी हिसाब से काम चलता रहता तो 2040 तक पूरा होता।
प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार बनने के बाद काम में तेजी आई और छह साल में 26 साल का काम पूरा कर लिया गया। 950 करोड़ इसकी लागत थी मगर अब देरी के कारण 3200 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद पूरी हुई है। अगर और समय लगता तो और आर्थिक नुकसान होता।
पिछली सरकारों को कोसा
पीएम ने कनेक्टिविटी का महत्व बताते हुए कहा कि देश की रक्षा और विकास के लिए कैसे यह अहम है। उन्होंने कई उदाहरण देते हुए कहा कि पिछली सरकारों ने इसकी महत्ता नहीं समझी, जबकि पिछले छह सालों में (जबसे उनकी सरकार बनी है), दर्जनों प्रॉजेक्ट पूरे किए जा चुके हैं और दर्जनों पर तेजी से काम चल रहा है।
पीएम ने यह भी बताया कि सेना और रक्षा के लिहाज से पिछली सरकारें उदासीन थीं। पीएम ने इसके लिए वन रैंक, वन पेंशन लागू करने के अपनी सरकार के फैसले की उपलब्धियां गिनाईं और कहा कि हिमाचल के एक लाख फौजी साथियों को इसका लाभ मिला है। देश हित से बड़ा हमारे लिए कुछ नहीं मगर देश ने वो दौर देखा है जब देश के रक्षा हितों से समझौता किया गया।”
पीएम ने रफाल लाने को भी सरकार की उपलब्धि बताया। उन्होंने कहा, “सेना संसाधनों और हथियारों के लिए तरसती थीं और फाइलें आगे नहीं बढ़ती थीं मगर कोई सुनवाई नहीं होती थी। इन लोगों ने एचएएल और आयुद्ध निर्माणियों को कमजोर किया, तेजस जैसे स्वदेशी विमान को डब्बे में डालने की तैयारी कर दी थी।” पीएम ने कहा कि अब उनकी सरकार में न सिर्फ ये समस्याएं दूर हुई हैं बल्कि रक्षा क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर बन रहा है और आगे बढ़ रहा है।
डॉक्युमेंटेशन बनाने का सुझाव
आखिर में पीएम ने रक्षा मंत्रालय, बीआरओ और शिक्षा मंत्रालय को सुझाव दिया कि इस सुरंग का काम खुद में मिसाल है। इसलिए इससे जुड़े 1500 लोगों से उनका अनुभव लिखवाया जाए कि इस काम के दौरान क्या चुनौतियां आईं। ये व्यक्ति श्रमिक भी हो सकते हैं, इंजीनियर भी। सबसे अनुभव शामिल होंगे पांच-दस पन्नों के। फिर इसका डॉक्युमेंटेशन किया जाए। पीएम ने कहा- छापने की जरूरत नहीं है, डिजिटल कर दीजिए। फिर इसे देश की टेक्निकल यूनिवर्सिटी के बच्चों को केस स्टडी काम दिया जाए और आठ-दस बच्चों के बैच आकर यहां आकर देखें कि कैसे काम किया।