मंत्री के बेटे ने दी थी ट्रांसफर की धमकी, अब पूरे स्टाफ का तबादला

रितेश चौहान, मंडी, फ़ॉर इन हिमाचल।। कुछ समय पहले जिला श्रम कार्यालय मंडी में घटे धमकी प्रकरण का पूरे स्टॉफ की ट्रांसफर के साथ अंत हो गया। हालांकि ये मामला सत्ता के गलियारों में कई सवाल भी खड़े कर गया है। किसी ने नहीं सोचा था कि जलशक्ति मंत्री के पुत्र रजत ठाकुर अपनी धमकी को सच साबित करवाकर ही दम लेंगे। हालांकि, मंत्री ने इन आरोपों को गलत बताया है।

पढ़ें- मंत्री के बेटे ने महिला कर्मचारियों को धमकाया

गत वर्ष मंडी में जिला लेबर कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों के साथ हुई बहस में दो महिला कर्मचारी को व अन्य स्टाफ सदस्यों को धमकाते नजर आए थे और उसका नजला अब पूरा स्टाफ की बदली करके गिरा है। पूरे मंडी जिले में यह वाकया आज चर्चा का विषय बना हुआ है।

मज़दूर संग़ठन सीटू की ज़िला कमेटी ने मंडी लेबर ऑफिस व राज्य श्रमिक कल्याण बोर्ड के सभी कर्मचारियों को एक साथ ट्रांसफर करने की निंदा की है और इसे मज़दूर विरोधी फैसला बताया है। सीटू के ज़िला अध्यक्ष व पूर्व ज़िला परिषद सदस्य भूपेंद्र सिंह व महासचिव राजेश शर्मा ने आरोप लगाया है कि कथित तौर पर ये सब धर्मपुर के विधायक व जलशक्ति मन्त्री के दबाब में किया गया है क्योंकि गत वर्ष मन्त्री के बेटे ने इन कर्मचारियों को दफ़्तर में जाकर धमकी दी थी।

हालांकि, जल शक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा कि ना तो श्रम विभाग मेरे अधीन है और ना ही इन कर्मचारियों के तबादलों में मेरी कोई भी भूमिका है, तबादले श्रम विभाग द्वारा ही किए गए हैं और यह रूटीन प्रक्रिया के तहत किए गए हैं।

सीटू नेताओं ने आरोप लगाया है मंत्री के बेटे ने महिला कर्मचारियों को रोहडु और सिरमौर ट्रान्स्फ़र क़रने की धमकी के अलावा उन्हें अपशब्द भी कहे थे। उस समय मुख्यमंत्री ने मन्त्री पुत्र का बचाव किया था जबकि सोशल मीडिया पर मन्त्री पुत्र के अभद्रतापूर्ण व्यवहार का वीडियो वायरल हुआ था जिसमें महिला कर्मचारियों को रुलाया गया था। उसके बाद जलशक्ति मन्त्री ने धर्मपुर के मनरेगा मज़दूरों को वर्ष 2017 में स्वीकृत सामान को अब तक वितरित नहीं होने दे रहे हैं।

भूपिंदर ने आरोप लगाया, “अब वे मज़दूरों के बच्चों को मिलने वाली छात्रवृति,विवाह शादी व अन्य लाभों को भी बन्द करवाना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने ज़िला परिषद सदस्यों के शपथ ग्रहण समारोह की पूर्वसंध्या पर मंडी सर्कट हाऊस में मुख्यमंत्री जयराम के सामने लेबर ऑफिस के सारे स्टाफ़ को तलब किया गया था और उनकी मर्जी के अनुसार व उनकी पसंद के अनुसार सामान वितरण के लिए दबाब डाला।”

मंत्री महेंद्र सिंह के बेटे ने श्रम ऑफिस जाकर धमकाईं महिला कर्मचारी, वीडियो वायरल

 

नूरपुर: हिंदुत्ववादी संगठन करते रहे हैं नाम बदलने की मांग

इन हिमाचल डेस्क।। नूरपुर का नाम बदलने की पहल को लेकर हिमाचल प्रदेश सरकार को सोशल मीडिया पर भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। दरअसल, स्थानीय विधायक और वन मंत्री राकेश पठानिया ने कहा है कि नूरपुर वीरों की भूमि है और इसका नाम बदल कर वीरपुर रखा जाएगा।

उनके मुताबिक, इसके लिए नगर परिषद की पहली बैठक में इस बारे प्रस्ताव डाला जाएगा। एक खबर के अनुसार, मंत्री ने कहा, “नूरपुर वजीर राम सिंह पठानिया व वीरों की धरती है और इसका बड़ा समृद्ध इतिहास है। इसलिए हम सब ने इसका नाम बदलने का निर्णय लिया है।”

यह पहला मौका नहीं है जब इस तरह की मांग उठी है। दक्षिणपंथी संगठन इस तरह की मांग करते रहे हैं। 2018 में जब शिमला का नाम बदलने की चर्चा छिड़ी थी, तब हिंदुत्ववादी संगठनों ने नूरपुर में एसडीएम के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर नूरपुर का नाम बदलकर वजीर राम सिंह नगर रखने की मांग की थी। ज्ञापन देने वालों की दलील थी कि ‘नूरपुर का नूरपुर नाम नूरजहां के नाम पर रखा गया था जो आज भी मुगलों की दासता का प्रतीक है और इसे शीघ्र बदलना चाहिए।’

क्या है इतिहास
नूरपुर शहर को इससे पहले कई नामों से जाना जाता रहा था। नूरपुर रियासत का उल्लेख एक से ज़्यादा मुग़ल बादशाहों के लेखकों की किताबों में मिलता है। उदाहरण के लिए अकबर द्वारा अधिकृत किताब “तारीख़-ए-अल्फ़ी (1685)” में शहर का नाम “दामल” है। इस किताब में बताया गया है कि यह शहर हिंदुस्तान की सीमाओं पर एक पहाड़ी पर स्थित था। वहीं, जहांगीर की आत्मकथा रूपी किताब “तुज़ुक-ए-जहांगीरी” में शहर का “धमेरी” नाम से उल्लेख है जबकि युरोपीय यायावरों की किताबों में इसका उल्लेख “तेम्मरी” नाम से है।

हालांकि, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मुगल बादशाह जहांगीर के सम्मान में धमेरी का नाम बदलकर नूरपुर कर दिया गया था। तुज़ुक-ए-जहांगीरी और शश फ़तह-ए-कांगड़ा (जिसे बादशाह शाहजहां के समय अधिकृत किया गया था), के अनुसार जहांगीर का काफिला सन 1622 में जब कांगड़ा से वापस आ रहा था तब वह धमेरी से गुज़रा था। कहा जाता है कि जहांगीर इसे देखकर इतना ख़ुश हुआ था कि उसने यहां क़िले के लायक़ और भी भवन बनाने के लिए शाही ख़ज़ाने से एक लाख रुपये दे दिए थे। तभी धमेरी का नाम नूरपुर रखा गया था। (कवर इमेज नूरपुर किले के अवशेषों की है)

लोगों के बीच मान्यता है कि नूरपुर नाम जहांगीर की बेगम नूरजहां के नाम पर रखा गया था। लेकिन तथ्यों के आधार पर ऐसा माना जाता है कि नूरपुर नाम शायद जहांगीर के नाम पर ही रखा गया हो क्योंकि जहांगीर का असली नाम ‘नूरउद्दीन मोहम्मद सलीम’ था।

HRTC की हालत खराब, हर महीने हो रहा 40 से 50 करोड़ का घाटा

शिमला।। घाटे के चंगुल में फंसे हिमाचल पथ परिवहन निगम की हालत सुधरने के कोई संकेत नजर नहीं आ रहे हैं। एचआरटीसी की हालत पहले भी ठीक नहीं थी मगर कोरोना लॉकडाउन के कारण मामला और गंभीर हो गया है। ऐसा देखने को मिल रहा है कि लॉकडाउन से पहले के महीनों से अभी की तुलना करें तो हर महीने 40 से 50 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है।

साल 2019 की आखिरी तिमाही (अक्तूबर से दिसंबर) में एचआरटीसी ने जिसने रुपये कमाए थे, 2020 की आखिरी तिमाही में उससे बहुत कम ही कम कमाए है। 2019 के अक्तूबर में एचआरटीसी ने 72.77 करोड़, नवंबर में 66.4 करोड़ और दिसंबर में 62.29 करोड़ कमाए थे। मगर अक्तूबर 2020 में मात्र 21.71 करोड़, नवंबर 2020 में 28.88 करोड़ और दिसंबर 23.68 करोड़ रुपये ही कमाए।

क्या कहता है निगम?
इस बारे में एचआरटीसी का कहना है कि कोरोना के कारण यह हालत हुई है। निगम के अधिकारियों का कहना है कि अभी भी अधिकतर बसें 40 फीसदी भर रही हैं और लॉकडाउन के बाद लगभग 40 फीसदी रूट ही बहाल हो पाए हैं। अधिकारियों के मुताबिक, भले ही बंदिशें कम हो गई हैं लेकिन बहुत से लोग सार्वजनिक परिवहन साधनों का इस्तेमाल करने से बच रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश पथ परिवहन निगम को लॉन्ग रूट से कमाई की उम्मीद थी, लेकिन किसानों के प्रदर्शन के कारण भी उसकी उम्मीदों को झटका लगा है। इसके अलावा, अवैध ढंग से दौड़ रही निजी बसें भी सरकार को चूना लगा रही है।

धूमल सरकार ने खुलवाई थी मानव भारती यूनिवर्सिटी, आरोपों पर मूंदी थीं आंखें

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में कुकरमुत्ते की तरह उग आई यूनिवर्सिटीज़ को लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। इनमें से ज्यादातर निजी विश्वविद्यालय उस समय खुले हैं जब प्रदेश में प्रेम कुमार धूमल के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार थी। हर कोई पूछ रहा था कि इतनी सारी यूनिवर्सिटीज़ और वह भी चंद जिलों में खोलने का लॉजिक क्या है। इस सवाल के जवाब में धूमल सरकार कहती- हिमाचल को एजुकेशन हब बनाना है और गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा जाएगा। गुणवत्ता का कितना ध्यान रखा गया, यह मानव भारत यूनिवर्सिटी के मामले में सामने आ गया है। अभी तक की जांच के मुताबिक, इसने 36 हज़ार डिग्रीयां बेची हैं और असल संख्या कहीं अधिक हो सकती है।

इस यूनिवर्सिटी के खुलने और काम करने का किस्सा भी रोचक है। गूगल करने पर आ पाएंगे कि शुरू से ही इस पर सवाल उठ रहे हैं। छात्रों के ऑनलाइन डिस्कशन फोरन में 10 साल पहले तक के ऐसे लिंक मिलते हैं, जिसमें वे यूनिवर्सिटी से मिल रही एम. फिल और पीएचडी की डिग्री को लेकर शंका जाहिर करते हैं। ये मामला हिमाचल विधानसभा तक में उठा था मगर हुआ कुछ नहीं। न तो धूमल सरकार ने कोई कार्रवाई की और न ही वीरभद्र सरकार ने एक्शन लिया। आशंका है कि यह खेल सिर्फ मानव भारती यूनिवर्सिटी में नहीं हुआ, बल्कि और भी कई संस्थान ऐसे हो सकते हैं, जिन्होंने ऐसे ही शिक्षा का धंधा करके फर्जी डिग्रियां बेची हों।

अब सवाल उठ रहे हैं कि जो संस्थान इतने बड़े स्तर पर फर्जीवाड़ा कर सकता है, उसने यूनिवर्सिटी खोलने की इजाजत कैसी हासिल की होगी। हिमाचल के डीजीपी संजय कुंडू ने कहा है कि यूनिवर्सिटी कैसे बनी, इसकी जांच की जाएगी और इसके आधार एक और एफआईआर दर्ज की जा सकती है। आइए देखते हैं, क्या है इस यूनिवर्सिटी का इतिहास-

साल 2008: दो बार खारिज हुए प्रपोजल
राज कुमार राणा नाम के शख्स ने 2006 में मानव भारती चैरिटेबल ट्रस्ट का गठन किया। 2006 में राणा ने इस ट्रस्ट के नाम पर सोलन के सुल्तानपुर में 30 बीघा जमीन खरीद ली। यूनिवर्सिटी बनाने के लिए हिमाचल सरकार के पास 2008 में दो बार प्रपोजल आए, मगर सरकार ने मानव भारती ट्रस्ट की फाइनैंशियल और एजुकेशनल बैकग्राउंड न होने के कारण यूनिवर्सिटी खोलने के प्रपोजल को निरस्त कर दिया था।

साल 2009: धूमल सरकार ने दी मंजूरी
इसके बाद ट्रस्ट ने करनाल में चल रहे अपने एक संस्थान के दस्तावेजों के आधार पर दोबारा से आवेदन किया और यूनिवर्सिटी चलाने के लिए एलओआई (लैटर आफ इंटेंट) हासिल कर लिया। फिर, प्रेम कुमार धूमल सरकार ने इसका विधेयक विधानसभा में पेश किया और बीजेपी के बहुमत वाले सदन में यह आराम से पारित हो गया। तो इस तरह 13 अगस्त 2009 को औपचारिक रूप से मंजूरी मिल गई(एक्ट देखें)। कैंपस तैयार नहीं था तो हरियाणा के करनाल से यूनिवर्सिटी अस्थायी तौर पर काम शुरू करने लगी। (ये बात याद रखें, आगे इसका महत्व है)

साल 2010: खुलते ही लगे गंभीर आरोप
3 मार्च 2010 को इस यूनिवर्सिटी को यूजीसी से मान्यता मिल गई। इसे खुले एक साल हुआ नहीं था, कैंपस तैयार था नहीं, स्टाफ पूरा नहीं था, योग्य टीचर नहीं थे और इसने पीएचडी के लिए आवेदन मंगवाना शुरू कर दिए। 12 में से 10 विभागों ने पीएचडी के लिए आवेदन मंगवा लिए जबकि फैकल्टी ही नहीं थी। हर डिपार्टमेंट में 10 सीटों का विज्ञापन निकाला गया था।

सरकार को कोई चिंता नहीं थी, मगर मामला मीडिया में उठ गया। तब यूनिवर्सिटी के चेयमैन राज कुमार राणा से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा- हमने इंटरव्यू लेकर कम से कम 10 टीचर भर्ती किए हैं जो जुलाई में जॉइन करेंगे. जून में पीएचडी के लिए एंट्रेंस टेस्ट होगा। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस से ये भी कहा था कि भर्ती किए गए कुछ टीचर छोड़कर चले गए हैं, हालांकि उन्होंने संख्या नहीं बताई थी।

और पार्टियां तो सोई रहीं, सीपीएम ने इस संबंध में तत्कालीन सीएम धूमल को चिट्ठी लिखी और विजिलेंस जांच की मांग की। तब टिकेंदर पंवर ने लिखा था कि जिस यूनिवर्सिटी में मात्र 25 लेक्चरर हैं, वो कैसे इतने छात्रों को पीएचडी के लिए एनरोल कर रही है। उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी इस संबंध में गलत जानकारियां देकर फ्रॉड कर रही है। मगर सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।

साल 2012: विधानसभा में उठा फर्जी पीएचडी का मामला
धूमल सरकार अंधाधुंध निजी यूनिवर्सिटीज खोलती रही। शिक्षाविद सवाल उठाने लगे कि ये किया क्या जा रहा है। साल 2012 मई तक सरकार 13 ऐसी यूनिवर्सिटीज को मान्यता दे चुकी थी जिनमें से 11 काम करने लगी थीं। धड़ाधड़ दी जा रही मंजूरी को लेकर सवाल उठे तो मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने कहा- सरकार ने तय किया है कि मात्र 20 ही यूनिवर्सिटीज़ को हिमाचल में मंजूरी दी जाएगी। ऐसा तब कहा गया, जब विधानसभा में धूमल सरकार दो और निजी यूनिवर्सिटीज को खोलने के लिए हिमाचल विधानसभा में विधेयक ले लाई थी। इनमें से एक यूनिवर्सिटी आज जांच का सामना कर रही है, दूसरी की बैंक नीलामी करने वाला है।

बहरहाल, कांग्रेस के दो विधायकों सुखविंदर सुक्खू और हर्षवर्धन चौहान ने सवाल पूछा कि इतने विश्वविद्यालय खोलकर करोगे क्या? सुक्खू ने पहले से मौजूद यूनिवर्सिटीज पर नकेल कसने को कहा। वहीं हर्षवर्धन ने आरोप लगाया कि मानव भारती यूनिवर्सिटी पीएचडी की डिग्रियां बेच रही है और मैट्रिक करने वालों को भी दाखिला दे रही है। इस पर मुख्यमंत्री ने उन्हें टोककर कहा- सरकार शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रकने के लिए कई कदम उठा रही है और रेग्युलेटरी बॉडी को शक्तियां दे रही है। उन्होंने कहा कि नियम तोड़ रही यूनिवर्सिटीज के ऊपर कार्रवाई होगी। मगर हुआ कुछ नहीं और उनका कार्यकाल खत्म हो गया।

2012-2017: अंधाधुंध घोषणाओं का साल
जो कांग्रेसी नेता विपक्ष में रहते हुए शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिंतित थे, वे 2012 के चुनावों में सत्ता में आए गए। लेकिन वे भूल गए कि चुनावों से पहले वे क्या आरोप लगा रहे थे। शिक्षा विभाग मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अपने पास रखा और सीपीएस बना दिया नीरज भारती को। उनका पूरा फोकस बिना स्टाफ, बिना बजट की चिंता किए हर कहीं प्राइमरी स्कूल खोलने और एक कमरे के प्राइमरी स्कूल को मिडल स्कूल बनाने, मिडल स्कूल को हाई स्कूल और हाई स्कूल को सीनियर सेकेंडरी स्कूल में अपग्रेड करने में लगा रहा। इस बीच मानव भारती यूनिवर्सिटी और अन्य संस्थान क्या कर रहे हैं क्या नहीं, किसी ने नहीं पूछा।

2020-21: बड़े खेल का पर्दाफाश
पिछले साल हरियाणा की ममता नाम की एक महिला ने आरोप लगाया कि उसके साथ मानव भारती यूनिवर्सिटी ने धोखा करके फर्जी डिग्री उसे दी है। दरअसल ममता मानव भारती यूनिवर्सिटी की एमए साइकॉलजी डिग्री के आधार पर हरियाणा सरकार में असिस्टेंट एंपलॉयमेट ऑफिसर की पोस्ट के लिए आवेदन किया और चुन ली गई। इस बीच ममता की अपनी दीदी-जाजा से अनबन हो गई। उसके जीजा ने हरियाणा सरकार को लगातार खत लिखे कि ममता की डिग्री फर्जी है और यूनिवर्सिटी के पास इस डिग्री को अवॉर्ड करने की पात्रता नहीं है।

हरियाणा सरकार ने जब डिग्री वेरिफाई करवाई तो यूनिवर्सिटी ने कहा कि ये डिग्री सही है। बाद में ममता से ऑरिजनल डिग्री मांगी गई तो उसने कहा कि गुम हो गई है। मामला बढ़ा तो ममता ने मार्च 2020 में सोलन में एफआईआर करवाई और मानव भारती यूनिवर्सिटी पर धोखा देने का आरोप लगाया। उसका कहना था कि उसने एमए साइकॉलजी के लिए मानव भारती यूनिवर्सिटी के करनाल वाले स्टडी सेंटर से पढ़ाई की थी क्योंकि उसे कहा गया था कि अभी हिमाचल वाला कैंपस तैयार नहीं है। उसने शिकायत दी कि उसने दो साल का कोर्स किया और करनाल में ही उसे डिग्री दे दी गई। बाद में उसने जून 2012 में डिग्री वेरिफाई भी करवाई और इस डिग्री के आधार पर उसने नौकरी हासिल की।

बकौल ममता, जब उसकी डिग्री गुम हो गई तो वह फिर से यूनिवर्सिटी गई और वहां से डुप्लिकेट डिग्री इशू करवाई। एफआईआऱ में ममता ने शिकायत दर्ज करवाई है कि यूनिवर्सिटी ने उसे पहले भी फर्जी डिग्री दी थी और बाद में भी फर्जी डिग्री दी। हालांकि, हरियाणा सरकार ने पाया है कि ममता के पास कहीं और से ली गई बी.एड. की भी फर्डी डिग्री है। लेकिन इस बीच मानव भारती यूनिवर्सिटी में चल रहे खेल की जांच शुरू हो चुकी थी। जांच बढ़ी तो मालूम हुआ कि मामला कितना बड़ा है। ऐसा अनुमान है कि फर्जी डिग्रियों के कारोबार से मानव भारती चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष राजकुमार राणा ने सिर्फ 11 साल में 440 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया है और अपने परिजनों को ऑस्ट्रेलिया शिफ्ट कर दिया है। हिमाचल पुलिस के अलावा, ईडी भी यूनिवर्सिटी और इसके मालिक की मनी लॉन्डरिंग को लेकर जांच कर रहा है। 

जवाबदेही किसकी
ये सब होता रहा और किसी को पता ही नहीं चला? इस खेल में आम और ईमानदार बच्चों के भविष्य के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है, क्या उसकी जिम्मेदारी नेताओं और अधिकारियों की नहीं बनती है? जब शुरू में ही आरोप लग रहे थे तो आखिर किस आधार पर जांच नहीं की गई? क्या इन करप्ट लोगों ने सत्ता में बैठे लोगों और अधिकारियों को भी कुछ खिलाया-पिलाया था? जरूरी है कि पूरे मामले की जांच हो कि कहीं पैसे लेकर धड़ाधड़ संस्थान तो नहीं खोले गए। साथ ही, मौजूदा सरकार जागे और अभी जो निजी विश्वविद्यालय मौजूद हैं, उनपर भी नजर रखे कि वे भी ऐसा ही खेल तो नही ंकर रहे। क्योंकि हिमाचल की कुछ अन्य यूनिवर्सिटीज पर भी नियमों का पालन न करने का आरोप लगा है। कुछ पर डिग्री बेचने की जांच चल रही है तो कुछ नियमों का उल्लंघन कर वीसी और अन्य स्टाफ की भर्ती के आरोप लगे हैं।

अब रथ यात्रा के नाम पर करोड़ों खर्च करने की तैयारी में हिमाचल सरकार

शिमला।। “हिमाचल प्रदेश के पूर्ण राज्यत्व के स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर प्रस्तावित रथ यात्रा प्रदेश के 50 वर्षों के शानदार सफर को लेकर लोगों में अपनत्व की भावना उत्पन्न करेगी।” मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने आज यहां प्रस्तावित स्वर्णिम हिमाचल रथ यात्रा के लिए आयोजित बैठक की अध्यक्षता करते हुए यह बात कही।

हालांकि, बेराजगारी और कर्ज से जूझ रहे हिमाचल में ऐसी यात्रा निकालने पर भारी भरकम खर्च होना तय है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वर्णिम हिमाचल रथ यात्रा में प्रदेश के लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। इस आयोजन को सफल बनाने के लिए पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि रथों की बनावट में एकरूपता और आकर्षण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि रथ यात्रा संभवतः हिमाचल दिवस के पावन अवसर पर 15 अप्रैल को आरम्भ होगी, जो प्रदेश के सभी क्षेत्रों से होकर गुजरेगी।

सीएम ने कहा कि यात्रा के दौरान सभी प्रमुख विभागों को अपनी उपलब्धियों को चिन्हांकित करने के लिए सक्रियता से अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। यह रथ यात्रा पिछले 50 वर्षों के दौरान हिमाचल प्रदेश द्वारा हासिल की गई उपलब्धियों पर भी प्रकाश डालेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि रथ यात्रा संबंधित क्षेत्र की दो-तीन पंचायतों के सभी क्लस्टर से होकर निकलेगी, जहां राज्य की उपलब्धियां के बारे में गतिविधियां आयोजित की जाएंगी। उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रदेश सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को विशिष्ट रूप से दर्शाया जाए। उन्होंने कहा कि उन स्थानों की उपलब्धियों को भी उजागर करने के प्रयास किए जाएंगे, जहां से रथ यात्रा निकलेगी।

रथ यात्रा को आकर्षक और सूचनात्मक बनाने के लिए रथ यात्रा समिति गठित की जाएगी। रथ पर लगाई जाने वाली एलईडी स्क्रीनों पर विभिन्न विभाग अपनी विकासात्मक यात्रा पर आधारित छायाचित्र प्रदर्शित करेंगे। सूचना एवं जन सम्पर्क विभाग पिछले 50 वर्षों में राज्य की विभिन्न उपलब्धियों पर प्रकाश डालने के साथ-साथ प्रदेश सरकार की विभिन्न उपलब्धियों पर आधारित विवरणिका और पुस्तिकाएं तैयार करेगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि रथ यात्रा में सांस्कृतिक दल भी शामिल होंगे जो न केवल लोगों का मनोरंजन करेंगे बल्कि गीतों और नाटकां के माध्यम से प्रदेश की स्वर्णिम यात्रा को भी प्रदर्शित करेंगे। इसके अलावा रथ यात्रा में स्वर्णिम हिमाचल विषय पर आधारित जिंगल और गीतों के माध्यम से प्रदेश की विकासात्मक यात्रा को दिखाया जाएगा।

खंड और पंचायत स्तर के एक निर्धारित स्थान पर रथ यात्रा पहुंचने पर स्थानीय पंचायती राज संस्थाओं और क्षेत्र के गणमान्य लोग इसका स्वागत करेंगे। उन्होंने कहा कि इस मौके पर इतिहास पर चर्चा, भाषण और चित्र प्रतियोगिताएं जैसी गतिविधियां आयोजित की जाएंगी, जिसमें विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रस्तावित रथ यात्रा एक सम्बन्धित क्षेत्र में एक दिन निकलेगी जहां रथ को रखा जाएगा और स्थानीय लोग कार्यक्रम आयोजित करेंगे। उन्होंने कहा कि इसमें महिला मण्डलों और युवक मण्डलों की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाएगी। रथ यात्रा संबंधित जिले और क्षेत्र की विशेषताओं को भी प्रदर्शित करेगी। मुख्य सचिव अनिल खाची ने कहा कि इस आयोजन को सफल बनाने के लिए सभी सम्बन्धित विभाग रथ यात्रा के लिए अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें।

सचिव सामान्य प्रशासन देवेश कुमार ने बैठक की कार्यवाही का संचालन किया और इस यात्रा से सम्बन्धित उपायुक्तों के सुझावों पर आधारित प्रस्तुति दी। अतिरिक्त मुख्य सचिव राम सुभग सिंह एवं निशा सिंह, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव जे.सी. शर्मा, सचिव सन्दीप भटनागर एवं अमिताभ अवस्थी, निदेशक उद्योग हंसराज शर्मा, निदेशक पर्यटन यूनुस, निदेशक ग्रामीण विकास ललित जैन, निदेशक सूचना एवं जन सम्पर्क हरबंस सिंह ब्रसकोन, निदेशक भाषा, कला एवं संस्कृति सुनील शर्मा और अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में उपस्थित थे।

बजट में केंद्र ने इस बार घटाया हिमाचल का राजस्व घाटा अनुदान

शिमला।। आम बजट में हिमाचल प्रदेश के राजस्व घाटा अनुदान में 631 करोड़ रुपये की कटौती की गई है। हिमाचल प्रदेश को आगामी वित्त वर्ष के लिए 10,800 करोड़ रुपये मिलेंगे जबकि चालू वित्तीय वर्ष में 11,431 करोड़ रुपये मिले थे।

हिमाचल सरकार अपने वार्षिक बजट में केंद्र से मिलने वाली इसी राशि से घाटे की पूर्ति करती है। एक तरह से हिमाचल प्रदेश को यह झटका लगा है क्योंकि कोरोनाकाल में प्रदेश की अर्थव्यवस्था की हालत खराब होने के चलते हिमाचल प्रदेश ज्यादा राजस्व घाटा अनुदान की उम्मीद लगाए बैठे था।

चालू वित्त वर्ष के लिए पिछले साल पंद्रहवें वित्तायोग ने केरल के बाद हिमाचल को बड़ी राहत दी थी। 11,431 करोड़ रुपये की यह ग्रांट अभूतपूर्व थी। इसे वर्ष 2019-20 की तुलना में 45 फीसदी बढ़ाया गया था। हालांकि, सीएम जयराम ठाकुर ने कहा है कि अगर राजस्व घाटा अनुदान करोना संकट के कारण कम भी मिलता है तो प्रदेश सरकार अपने संसाधनों से आगामी बजट का प्रबंध कर लेगी। उन्होंने कहा, “केंद्र ने हिमाचल प्रदेश को राजस्व घाटा अनुदान देकर राहत दी है।”

बघाट (सोलन ) भारतीय गणराज्य में शामिल होने वाली हिमाचल की प्रथम रियासत

विवेक अविनाशी।। हिमाचल प्रदेश आज विकास की बुलंदियों को छू रहा है।  यह प्रदेश वासियों के लिए तो गौरव की बात है ही लेकिन भावी पीढियां यह भी अवश्य जानना चाहेंगी कि आखिर हिमाचल के गठन से पहले हिमाचल का क्या स्वरूप था और कौन थे  प्रदेश के वो  महारथी जिन के कारण हिमाचल अस्तित्व में आया।

वास्तव में हिमाचल 1948 से पूर्व छोटी-छोटी रियासतों में बटा हुआ था। आजादी  के बाद  सबसे बड़ा सवाल देश की 650 रियासतों के विलय का था जिस के लिए लोहपुरुष सरदार पटेल निरंतर प्रयास कर रहे थे।  इन रियासतों के विलय के लिए 1937 में प्रजा  मण्डल समस्त देश में गठित किये गए  जिस के तहत हिमाचल में भी समस्त रियासतों में  प्रजा मण्डल बनाये गए। हिमाचल का गठन इन्ही छोटी बड़ी 31रियासतों के विलय के बाद किया गया था।

बघाट रियासत के अंतिम राजा  दुर्गा सिंह के वंशजों से प्राप्त जानकारी के अनुसार बघाट हिमाचल की पहली रियासत थी जिसने स्वेच्छा से भारतीय गणतंत्र में विलय को स्वीकार  किया था। “बघाट” नाम दो शब्दों के मिलन से बना है बहु और घाट “बहु” का मतलब बहुत सारे और घाट मतलब “पास”  ऐसा स्थान जहाँ से पानी या हवा का मूवमेंट ज्यादा हो। स्थानीय बोली में इसे घट्टा या घट्टू भी कहते हैं। इसलिए सोलन में आज भी बहुत सारे स्थानों के साथ घाट शब्द लगा है।

रियासत की नींव राजा बिजली देव ने रखी थी। बारह घाटों से मिलकर बनने वाली बघाट रियासत का क्षेत्रफल 36 वर्ग मील में फैला हुआ था। इस रियासत की प्रारंभ में राजधानी जौणाजी, परवाणू के पास कोटी में हुआ करती थी।  कहते हैं किसी पंडित के श्राप से अभिशप्त यह राजधानी तबाह हो गयी  मजबूर होकर बघाट रियासत की राजधानी को वहां से हटाना पड़ा था।

कोटी के बाद बेजा, बोचह, जौणाजी जैसे महत्वपूर्ण स्थलों पर बघाट की राजधानियों को बसाने का प्रयास किया गया। किन्तु सारे प्रयास असफल रहे। अंत में बघाट की राजधानी माता शूलिनी के मदिर के पास बसाई गयी, जिस कारण इसका नाम सोलन पड़ा सोलन में आज का पुराना कचहरी भवन बघाट रियासत का भवन था।

darbar hall solan

बघाट रियासत के अंतिम राजा  राजा दुर्गा सिंह जब तक छोटे थे रियासत का राज काज शिमला से चलता था  जिस के लिए अंग्रेजों ने प्रशासक नियक्त किया था  lबघाट के राजा दुर्गा सिंह ने शिमला हिल्स  की रियासतों के विलय के लिए अहम भूमिका निभाई  था। 26 जनवरी, 1948 को शिमला की सभी रियासतों के प्रजामंडल के नेताओं की बैठक राजा दुर्गा सिंह ने सोलन में बुलाई।

26 रियासतों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। जिसमें सत्यदेव बुशहरी, ठाकुर सेन नेगी, लाला देवकीनंदन और विरजानंद (बुशहर से), जुब्बल से भागमल सोहटा और सालिगराम टेजटा, क्योंथल से दवीराम केवला और विजय राम, धामी से पं. संतराम, ठियोग से सूरतराम, बाघल से हीरासिंह पाल, महलोग से चिंतामणि आदि प्रजामंडल नेताओं ने भाग लिया।इसके संयोजक राजा दुर्गा सिंह ने सर्वप्रथम तिरंगा फहराया और बघाट की पुलिस ने झंडे को सलामी दी।

इसके साथ ही  कॉन्फ्रेंस हॉल में अधिवेशन शुरू हुआ और सभा को संविधान सभा का नाम दिया गया। इसमें राजा दुर्गा सिंह  को अध्यक्ष और महावीर सिंह (आईसीएस) को सचिव चुना गया। सभा में निर्णय लिया गया कि सभी रियासतों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश का नाम दिया जाए। इसके बाद गृहमंत्री सरदार पटेल से निवेदन किया गया कि पंजाब हिल स्टेट की दूसरी रियासतों को भी इनके साथ विलय करके हिमाचल प्रदेश को पूरा प्रांत बनाया जाए।

दूसरी तरफ प्रजा मंडल के नेताओं का शिमला में सम्मेलन हुआ, जिसमें यशवंत सिंह परमार ने इस बात पर जोर दिया कि हिमाचल प्रदेश का निर्माण तभी संभव है, जब शक्ति प्रदेश की जनता तथा राज्य के हाथ सौंप दी जाए। शिवानंद रमौल की अध्यक्षता में हिमालयन प्लांट गर्वनमेंट की स्थापना की गई, जिसका मुख्यालय शिमला में था।

दो मार्च, 1948 ई. को शिमला हिल स्टेट के राजाओं का सम्मेलन दिल्ली में हुआ। राजाओं की अगवाई मंडी के राजा जोगेंद्र सेन कर रहे थे। इन राजाओं ने हिमाचल प्रदेश में शामिल होने के लिए 8 मार्च 1948 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। 15 अप्रैल 1948 ई. को हिमाचल प्रदेश राज्य का निर्माण किया था।

उस समय प्रदेश भर को चार जिलों में बांटा गया और पंजाब हिल स्टेट्स को पटियाला और पूर्व पंजाब राज्य का नाम दिया गया। 1948 ई. में सोलन की नालागढ़ रियासत कों शामिल किया गया। अप्रैल 1948 में इस क्षेत्र की 27,018 वर्ग कि॰मी॰ में फैली लगभग 30 रियासतों को मिलाकर इस राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। उस समय हिमाचल प्रदेश में चार जिला महासू, सिरमौर, चंबा, मंडी शामिल किए गए थे। प्रदेश का कुल क्षेत्रफल 27018 वर्ग किलोमीटर व जनसंख्या लगभग 9 लाख 35 हजार के करीब थी।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के हितों के पैरोकार हैं और जनहित के मुद्दों पर लंबे समय से लिख रहे हैं। इन दिनों ‘इन हिमाचल’ के नियमित स्तंभकार हैं। उनसे vivekavinashi15@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता है)

पहली बार इन हिमाचल पर 23 सितंबर, 2015 को छपे इस लेख को फिर से प्रकाशित किया गया है।

किसान आंदोलन के लिए समर्थन मांगने आए तीन लोग शिमला में गिरफ्तार

शिमला।। किसान आंदोलन के समर्थन में रिज पर प्रदर्शन करने पहुंचे तीन लोगों को पुलिस ने हिरासत में लेकर बाद में जमानत पर रिहा कर दिया। इनकी पहचान करणदीप संधू, हरप्रीत सिंह पंजाब और गुरूप्रीत सिंह चंडीगढ़ के रूप में हुई है। इन लोगों का कहना है कि इन्हें गिरफ्तार करके पुलिस ने ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर वार किया है।

मंगलवार सुबह तीनों प्रदर्शनकारी चर्च के सामने किसान आंदोलन के समर्थन में बैनर लेकर खड़े थे। इस पर पुलिस तीनों को पकड़कर थाने ले गई। दोपहर बाद इन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया। एसडीएम शहरी मंजीत शर्मा ने बताया कि तीनों व्यक्तियों को पांच-पांच हजार रुपये की मुचलका राशि भरने पर जमानत देकर छोड़ा गया है। इन्होंने दोबारा ऐसा नहीं करने के लिए शपथ पत्र दिया है।

पुलिस अधीक्षक मोहित चावला ने बताया कि सूचना मिली थी कि कुछ बाहरी राज्य के लोग रिज मैदान शिमला में धरना, प्रदर्शन करने पहुंचे हैं। उन्होंने कहा, “रिज मैदान पर चर्च के सामने तीन संदेहास्पद लोगों को पूछताछ के लिए रोका। पूछताछ में इन्होंने बताया कि वह किसान आंदोलन के समर्थन में यहां पर लोगों को जागरूक करने आए हैं। लेकिन, रिज पर प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रदर्शन करने के लिए कोई अनुमति नहीं ले रखी थी। इस बीच पुलिस इन्हें पकड़कर सदर थाना ले गई।”

बासा जिला परिषद वॉर्ड में बीजेपी समर्थित मुकेश ने चढ़ाया सियासी पारा

मंडी।। हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों के तहत जिला परिषद के लिए उतरे प्रत्याशियों ने पूरी ताकत झोंक दी है। भले ही ये चुनाव पार्टी सिंबल पर नहीं होते मगर पार्टियां अपने समर्थन वाले उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार कर रही हैं। कुछ जगहों पर पार्टियों के पदाधिकारी भी अपनी क़िस्मत आजमा रहे हैं। इसी तरह से नाचन भाजपा मंडल के महामंत्री मुकेश कुमार चंदेल के चुनाव मैदान में उतरने से सियासी पारा चढ़ गया है।

मुकेश कुमार मंडी जिला परिषद के बासा वॉर्ड नंबर 10 से चुनाव लड़ रहे हैं। बीजेपी समर्थित प्रत्याशी मुकेश कुमार सेरी पंचायत के प्रधान रह चुके हैं और इस दौरान किए गए कामों और उपलब्धियों के आधार पर वह जिला परिषद के लिए वोट मांग रहे हैं।

सीएम जयराम ठाकुर के सिपहसलारों में शामिल मुकेश कई सामाजिक संगठनों से भी जुड़े हैँ। प्रचार के आखिरी दिन इन संगठनों के सदस्य भी उनके साथ नज़र आए। अंतिम चरण में मंडी जिले की 181 पंचायतों मे 21 जनवरी को मतदान होगा।

मुकेश कुमार ने अपील जारी करके बताया कि राज्य की जयराम सरकार ने पंचायती राज को मजबूत किया और इस प्रणाली के माध्यम से विकास की नई इबारत लिखी है। उन्होंने कहा कि जिला परिषद चुने जाने पर वह मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और स्थानीय विधायक विनोद कुमार के विकास के एजेंडे को लेकर ही आगे बढ़ेंगे।

सरकाघाट का विधायक नालायक, हम लगाएंगे आपकी नौकरी: रजत ठाकुर

रितेश चौहान, सरकाघाट, फ़ॉर इन हिमाचल।। सरकाघाट उपमंडल में धर्मपुर के युवाओं को नौकरी देने को लेकर जल शक्ति मंत्री महेन्द्र सिंह से लोगों की नाराजगी ना सिर्फ़ उनके समधी पृथ्वीराज धूमल के चुनाव पर भारी पड़ रही है बल्कि जगह-जगह उनकी जनसभाओं में प्रचार करने पहुंचे उनके पुत्र और प्रदेश भाजपा सह मीडिया प्रभारी रजत ठाकुर का जनता द्वारा जमकर विरोध किया जा रहा है।

एक ही हफ्ते में सोशल मीडिया पर लगातार चौथा वीडियो वायरल हुआ है जिसमें एक जगह रात को उनका घेराव हो रहा है तो दूसरी पंचायत में मंच से उन्हें बोलने से रोक दिया जा रहा है तो आज ससुर के साथ प्रचार पर निकले रजत को लोगों के जमकर विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

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सोशल मीडिया में वायरल गत रात के वीडियो में दर्जनों युवाओं द्वारा उनकी गाड़ी को रोक दिया गया है और उन्हें गो बैक के नारे लगाए जा रहे हैं। बाहरी तत्व नहीं चलेगा, भद्रोता में बाहरी तत्व नहीं चलेगा के नारे भी लगाए जा रहे हैं। वीडियो टिक्कर पंचायत का बताया जा रहा है जबकि आज खाहण पंचायत में ससुर पृथ्वी राज धूमल के साथ प्रचार पर निकलने के दौरान स्थानीय जनता ने उनका काफिला रोक डाला जिसमें बजुर्ग लोग उन्हें कह रहे है की बेरोजगारों को क्या पीड़ा होती है वह वही जानते हैं। ‘हमारे बच्चे आईटीआई होल्डर हैं, घरों में बेकार पड़े हैं।

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वीडियो के दौरान युवा रजत से सवाल कर रहे हैं कि आपने हमारे एरिया में धर्मपुर के लोगों को क्यों तैनात किया है। युवाओं को शांत करते रजत कह रहे हैं- “विधायक का काम होता है रोजगार देना ना कि पंचायत प्रतिनिधियों का। आपका विधायक नालायक है, धर्मपुर के लोग यहां पर हमने नहीं रखे हैं बल्कि यूनिप्रो कंपनी के हैं। अगर आपको नौकरी चाहिए तो आप अपना नाम दो हम आपको भी लगा देंगे।”

वीडियो में उनके ससुर और जिला परिषद प्रत्याशी पृथ्वी राज धूमल इन युवाओं को बाहरी कह रहे हैं जिस पर वहां के लोग काफ़ी ग़ुस्सा हो गए है l साफ़ कह रहे है की ये बच्चे हमारे रिश्तेदार है l गौरतलब है कि जिला परिषद के थौना वार्ड में चंद्र मोहन शर्मा और पृथ्वीराज धूमल आमने सामने टक्कर में है।

इस चुनाव को लेकर विधायक कर्नल इंद्र सिंह और महेंद्र सिंह ठाकुर में लगातार दूरियां बढ़ रही है। दोनों आमने सामने हो चुके हैं। यहाँ पर रजत ठाकुर को लगातार विरोध का सामना करना पड़ रहा है। इससे पहले चौरी पंचायत में उनका काफिला रोक दिया गया था और टिक्कर में गो बैक के नारे लगे थे। लगातार वीडियो जारी होने के बाद सोशल मीडिया में उनकी खासी फजीहत हो रही है।

अपने ही विधायक को बताया नालायक
वीडियो में प्रदेश भाजपा सह मीडिया प्रभारी ने अपने विधायक को ही नालायक कह दिया है l उन्होंने युवाओं को कहा कि आपका विधायक नालायक है तभी यहां पर लोग नहीं लगे हैं l वीडियो वायरल होने बाद नालायक के मुद्दे पर भाजपा में काफी सियासी बवाल उठने वाला है ।

बाहरी तत्व कर रहे हैं विरोध : पृथ्वी राज धूमल
उधर,रजत ठाकुर के ससुर पृथ्वी राज धूमल ने कहा कि दुनिया देख रही है की यह सभी बाहरी तत्व है जो यहां पर लाए गए हैं l यह सब चुनाव में हमारी पक्ष में जाएगा l