बघाट (सोलन ) भारतीय गणराज्य में शामिल होने वाली हिमाचल की प्रथम रियासत

विवेक अविनाशी।। हिमाचल प्रदेश आज विकास की बुलंदियों को छू रहा है।  यह प्रदेश वासियों के लिए तो गौरव की बात है ही लेकिन भावी पीढियां यह भी अवश्य जानना चाहेंगी कि आखिर हिमाचल के गठन से पहले हिमाचल का क्या स्वरूप था और कौन थे  प्रदेश के वो  महारथी जिन के कारण हिमाचल अस्तित्व में आया।

वास्तव में हिमाचल 1948 से पूर्व छोटी-छोटी रियासतों में बटा हुआ था। आजादी  के बाद  सबसे बड़ा सवाल देश की 650 रियासतों के विलय का था जिस के लिए लोहपुरुष सरदार पटेल निरंतर प्रयास कर रहे थे।  इन रियासतों के विलय के लिए 1937 में प्रजा  मण्डल समस्त देश में गठित किये गए  जिस के तहत हिमाचल में भी समस्त रियासतों में  प्रजा मण्डल बनाये गए। हिमाचल का गठन इन्ही छोटी बड़ी 31रियासतों के विलय के बाद किया गया था।

बघाट रियासत के अंतिम राजा  दुर्गा सिंह के वंशजों से प्राप्त जानकारी के अनुसार बघाट हिमाचल की पहली रियासत थी जिसने स्वेच्छा से भारतीय गणतंत्र में विलय को स्वीकार  किया था। “बघाट” नाम दो शब्दों के मिलन से बना है बहु और घाट “बहु” का मतलब बहुत सारे और घाट मतलब “पास”  ऐसा स्थान जहाँ से पानी या हवा का मूवमेंट ज्यादा हो। स्थानीय बोली में इसे घट्टा या घट्टू भी कहते हैं। इसलिए सोलन में आज भी बहुत सारे स्थानों के साथ घाट शब्द लगा है।

रियासत की नींव राजा बिजली देव ने रखी थी। बारह घाटों से मिलकर बनने वाली बघाट रियासत का क्षेत्रफल 36 वर्ग मील में फैला हुआ था। इस रियासत की प्रारंभ में राजधानी जौणाजी, परवाणू के पास कोटी में हुआ करती थी।  कहते हैं किसी पंडित के श्राप से अभिशप्त यह राजधानी तबाह हो गयी  मजबूर होकर बघाट रियासत की राजधानी को वहां से हटाना पड़ा था।

कोटी के बाद बेजा, बोचह, जौणाजी जैसे महत्वपूर्ण स्थलों पर बघाट की राजधानियों को बसाने का प्रयास किया गया। किन्तु सारे प्रयास असफल रहे। अंत में बघाट की राजधानी माता शूलिनी के मदिर के पास बसाई गयी, जिस कारण इसका नाम सोलन पड़ा सोलन में आज का पुराना कचहरी भवन बघाट रियासत का भवन था।

darbar hall solan

बघाट रियासत के अंतिम राजा  राजा दुर्गा सिंह जब तक छोटे थे रियासत का राज काज शिमला से चलता था  जिस के लिए अंग्रेजों ने प्रशासक नियक्त किया था  lबघाट के राजा दुर्गा सिंह ने शिमला हिल्स  की रियासतों के विलय के लिए अहम भूमिका निभाई  था। 26 जनवरी, 1948 को शिमला की सभी रियासतों के प्रजामंडल के नेताओं की बैठक राजा दुर्गा सिंह ने सोलन में बुलाई।

26 रियासतों के प्रतिनिधियों ने इसमें भाग लिया। जिसमें सत्यदेव बुशहरी, ठाकुर सेन नेगी, लाला देवकीनंदन और विरजानंद (बुशहर से), जुब्बल से भागमल सोहटा और सालिगराम टेजटा, क्योंथल से दवीराम केवला और विजय राम, धामी से पं. संतराम, ठियोग से सूरतराम, बाघल से हीरासिंह पाल, महलोग से चिंतामणि आदि प्रजामंडल नेताओं ने भाग लिया।इसके संयोजक राजा दुर्गा सिंह ने सर्वप्रथम तिरंगा फहराया और बघाट की पुलिस ने झंडे को सलामी दी।

इसके साथ ही  कॉन्फ्रेंस हॉल में अधिवेशन शुरू हुआ और सभा को संविधान सभा का नाम दिया गया। इसमें राजा दुर्गा सिंह  को अध्यक्ष और महावीर सिंह (आईसीएस) को सचिव चुना गया। सभा में निर्णय लिया गया कि सभी रियासतों को मिलाकर हिमाचल प्रदेश का नाम दिया जाए। इसके बाद गृहमंत्री सरदार पटेल से निवेदन किया गया कि पंजाब हिल स्टेट की दूसरी रियासतों को भी इनके साथ विलय करके हिमाचल प्रदेश को पूरा प्रांत बनाया जाए।

दूसरी तरफ प्रजा मंडल के नेताओं का शिमला में सम्मेलन हुआ, जिसमें यशवंत सिंह परमार ने इस बात पर जोर दिया कि हिमाचल प्रदेश का निर्माण तभी संभव है, जब शक्ति प्रदेश की जनता तथा राज्य के हाथ सौंप दी जाए। शिवानंद रमौल की अध्यक्षता में हिमालयन प्लांट गर्वनमेंट की स्थापना की गई, जिसका मुख्यालय शिमला में था।

दो मार्च, 1948 ई. को शिमला हिल स्टेट के राजाओं का सम्मेलन दिल्ली में हुआ। राजाओं की अगवाई मंडी के राजा जोगेंद्र सेन कर रहे थे। इन राजाओं ने हिमाचल प्रदेश में शामिल होने के लिए 8 मार्च 1948 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। 15 अप्रैल 1948 ई. को हिमाचल प्रदेश राज्य का निर्माण किया था।

उस समय प्रदेश भर को चार जिलों में बांटा गया और पंजाब हिल स्टेट्स को पटियाला और पूर्व पंजाब राज्य का नाम दिया गया। 1948 ई. में सोलन की नालागढ़ रियासत कों शामिल किया गया। अप्रैल 1948 में इस क्षेत्र की 27,018 वर्ग कि॰मी॰ में फैली लगभग 30 रियासतों को मिलाकर इस राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। उस समय हिमाचल प्रदेश में चार जिला महासू, सिरमौर, चंबा, मंडी शामिल किए गए थे। प्रदेश का कुल क्षेत्रफल 27018 वर्ग किलोमीटर व जनसंख्या लगभग 9 लाख 35 हजार के करीब थी।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के हितों के पैरोकार हैं और जनहित के मुद्दों पर लंबे समय से लिख रहे हैं। इन दिनों ‘इन हिमाचल’ के नियमित स्तंभकार हैं। उनसे [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है)

पहली बार इन हिमाचल पर 23 सितंबर, 2015 को छपे इस लेख को फिर से प्रकाशित किया गया है।

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