केंद्र सरकार हिमाचल से वापस मंगवा सकती है 250 वेंटीलेटर

शिमला।। देश में कोरोना के मामलों में उछाल को देखते हुए केंद्र सरकार ने हिमाचल को कहा है कि वह 250 वेंटिलेटर इस्तेमाल न करे।

ईमेल के माध्यम से केंद्र से मिले इस निर्देश के बाद 250 वेंटिलेटर अलग से स्टोर में सुरक्षित रख लिए गए हैं। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार इन्हें हिमाचल से लेकर कहीं और भेज सकती है, जहां वेंटिलेटर्स की कमी है।

हालांकि, जिस रफ्तार से हिमाचल में भी कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, उससे भविष्य में गंभीर स्थितियां पैदा हो सकती हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से आई इस ईमेल के बाद से चिंता का माहौल देखा जा रहा है।

दरअसल, अब तक केंद्र की ओर से हिमाचल को 750 वेंटीलेटर मिले हैं। 500 वेंटीलेटर पिछले साल सितंबर तक ही हिमाचल आ गए थे। बाकी 250 दो महीने पहले आए थे।

पहले वाले 500 वेंटीलेटर अलग अलग मेडिकल कॉलेजों और जोनल अस्पतालों में लगा दिए गए थे। बाकी के 250 के लिए सरकार ने जिला अस्पताल प्रशासनों से रिक्वायरमेंट पूछी थी। मगर अब शायद ही ये वेंटिलेटर उन्हें मिल पाएं।

राकेश पठानिया ने कहा- नूरपुर को जिला बनाऊंगा, फिर चुनाव लड़ने आऊंगा

कांगड़ा। हिमाचल के एक छोटा राज्य है। सरकार अकसर अपने कम संसाधनों की दुहाई देती है। हिमाचल पर करीब 60 हजार करोड़ रुपए का कर्ज पहले ही चढ़ चुका है। अब जयराम सरकार में वन और खेल मंत्री राकेश पठानिया ने एक बार फिर नए जिले बनाने का राग छेड़ दिया है। जी हां, नूरपुर में एक कार्यक्रम में फिर से वन मंत्री राकेश पठानिया ने कहा कि वो नूरपुर को जिला बनाकर रहेंगे। यही नहीं, साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि नूरपुर को जिला बनाने के बाद ही चुनाव लड़ने आउंगा।

बकौल राकेश पठानिया, मैंने फिन्ना सिंह नहर वादा किया था मैंने पूरा किया, मैं आपको नूरपुर जिला बनाकर भी दिखाउंगा उसके बाद अगला चुनाव लड़ने आउंगा। एडिशनल एसपी का दफ्तर हमने खोल दिया, ट्रांसपोर्ट, एक्साइज और रेवेन्यू का जिला नूरपुर बन चुका हैं। हम अगली लड़ाई लड़ रहे हैं। आपको बता दें कि इससे पहले वन मंत्री राकेश पठानिया नूरपुर का नाम बदलने की बात भी कई बार कह चुके हैं।

कहां-कहां उठती रही है जिला बनाने की मांग

आपको बता देंं कि हिमाचल में पालमपुर को जिला बनाने की मांग लंबे समय से चली आ रही है। इसके अलावा मंडी जिला के सरकाघाट को भी जिला बनाने की मांग उठती है। इसके अलावा मंडी जिला के ही करसोग को भी जिला बनाने की मांग गाहे बगाहे उठती रहती है।

क्या है सीएम जयराम ठाकुर का स्टैंड

अब बात करते हैं सरकार के मुखिया जयराम ठाकुर की। जयराम ठाकुर से हाल ही में पालमपुर को जिला बनाने का सवाल किया गया था तो उन्होंने कहा था कि छोटे से राज्य में और जिला बनाने की जरूरत नहीं है। इससे वित्तीय बोझ ही बढ़ता है। ऐसे में साफ है कि हिमाचल में और नए जिला बनाना प्रासंगिक नहीं है, लेकिन फिर भी नेता जनता को सब्जबाग दिखाते रहते हैं।

फायदा नहीं, वित्तीय बोझ बनते हैं जिला

जैसे की हम ऊपर भी बात कर चुके हैं कि हिमाचल छोटा राज्य है और इसके अपने संसाधन भी कम हैं। ऐसे में यहां नए जिला की बात करना बेमानी सा लगता है, क्योंकि नए जिला बनने से वहां के डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन के लिए आपको वित्तीय खर्च भी बढ़ाने पड़ेंगे। हां यह बात दीगर है कि जिल जिलों में के दूर के एरिया हैं वहां सुविधाएं बढ़ाई जाए ताकि लोगों को अपने काम के लिए डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर के चक्कर ना काटने पड़ें।

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हिमाचल कोरोना अपडेट : 16 कोरोना संक्रमितों की मौत, लगातार बढ़ रहा कोविड का ग्राफ

शिमला। हिमाचल में भी कोरोना ने बड़े स्तर पर कहर बरपाना शुरू दिया है। इसके वनस्पत हिमाचल सरकार खास सख्तियां नहीं कर रही। प्रदेश में लगातार कोरोना के एक्टिव केस और संक्रमितों की मौते के आंकड़े बढ़ रहे हैं। बीते रोज हिमाचल में 16 कोरोना संक्रमित जान गंवा चुके हैं। इसके अलावा 600 से ज्यादा नए मामले भी हिमाचल में दर्ज किए गए थे। ऐसे में देखना होगा कि हिमाचल में आज कोरोना के कितने मामले रिपोर्ट होते हैं।

आपको बता दें कि अप्रैल में ही कोरोना का ग्राफ देश के दूसरे राज्यों की तरह हिमाचल में भी तेजी से बढ़ा है। कोरोना के आंकड़ों की बात करें तो हिमाचल में मंगलवार को 16 कोरोना संक्रमितों की मौत हुई। हालांकि सरकार की ओर से बीते रोज जारी कोरोना बुलेटिन में मौतों का आंकड़ा 14 ही थी। ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोना के आंकड़ो की डिटेल शिमला से जारी की जाती है। ऐसे में सभी जिला से पहले रिपोर्ट भेज दी जाती है।

इन जिलों के कोरोना संक्रमितों की मौत

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते 14 कोरोना संक्रमितों में कांगड़ा के 6, मंडी और शिमला के 3-3 और ऊना के दो व्यक्ति शामिल हैं। कांगड़ा में मनियारा पालमपुर के 65 वर्षीय व्यक्ति, भरोली ज्वालामुखी की 46 वर्षीय महिला और पनियाल ऊना की 57 साल की महिला, कंगल कोहाला की 70 साल की महिला, भंपू इंदौरा के 74 साल के व्यक्ति और सिद्धबाड़ी धर्मशाला की 57 साल की महिला, मंडी में 65, 42 साल के व्यक्ति और 68 साल की महिला, शिमला में 70 वर्षीय महिला, 52 और 38 वर्षीय पुरूष, ऊना में 73 और 78 साल के बुजुर्ग की मौत हुई है।

इसके अलावा बीते रोज हिमाचल में 619 नए कोरोना केस भी दर्ज किए गए हैं। साथ ही बीजेपी के जुब्बल कोटखाई से विधायक नरेंद्र बरागटा और सरकाघाट से विधायक कर्नल इंद्र सिंह भी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। हिमाचल में बीते कुछ दिनों से लगातार 600 से ज्यादा मामले दर्ज किए जा रहे हैं, लेकिन इसके साथ ही चिंता का विषय यह है कि कोरोना संक्रमितों की मौत का ग्राफ भी ऊपर जा रहा है।

कोरोना वैक्सीन की डोज लगवाने के बाद मौत

एक बार फिर कोरोना वैक्सीन की डोज लेने के बाद व्यक्ति की मौत का मामला सामने आया है। हालांकि अभी तक यह साफ नहीं कि व्यक्ति की मौत कैसे हुई, लेकिन व्यक्ति ने मौत से दस घंटे पहले ही कोरोना वैक्सीन की डोज ली थी। मामला मंडी जिला के जंजहैली के भनवास का है। यहां कोरोना वैक्सीन की डोज लेने के करीब 10 घंटे के भीतर 60 वर्षीय वृद्ध की मौत हुई। मौत का पता लगाने के लिए व्यक्ति के शव का पोस्टमार्टम और पैथोलॉजी टेस्ट लिए गए हैं, जिनकी रिपोर्ट आने में अभी वक्त लगेगा।

अब तक हिमाचल में कोरोना का स्टेटस

बीते रोज सरकारी कोरोना बुलेटिन के मुताबिक कांगड़ा में 148, सोलन में 104, शिमला में 74, ऊना में 70, मंडी में 59, हमीरपुर में 44, कुल्लू में 38, सिरमौर में 32, बिलासपुर में 22, चंबा में 15, लाहुल स्पीति में 9 व किन्नौर में चार कोरोना के मामले रिपोर्ट हुए हैं। नए मामलों के साथ हिमाचल में कोरोना संक्रमितों का आंकड़ा 71394 पहुंच गया है, जबकि सक्रिय मामलों की संख्या 6269 पहुंच गई है। अब तक 63966 संक्रमित ठीक हो चुके हैं और 1122 की मौत हुई है।

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हिमाचल में भी होटल पॉलिटिक्स, फूट के डर से सोलन नगर निगम पार्षदों की बाड़बंदी

शिमला। हिमाचल में भी होटल पॉलिटिक्स शुरू हो गई है। जी हां, आपने कर्नाटक, राजस्थान, हरियाणा में देखा होगा कि सरकार बचाने के लिए कैसे राजनीतिक दलों द्वारा अपने ही विधायकों को होटल में कैद कर लिया जाता है, लेकिन यह होटल पोलीटिक्स अब हिमाचल में भी एंटर कर चुकी है। बेशक हिमाचल में नगर निगम के चुनाव पार्टी सिंंबल पर हुए हैं, लेकिन अपने पार्षदों की टूट के डर से कांग्रेस ने सोलन नगर निगम के नवनिर्वाचित पार्षदोंं को होटल में ठहराया है।

दरअसल, हिमाचल में इस बार नगर निगम के चुनाव पार्टी सिंबल पर हुए हैं। निगर निगम के नतीजों के बाद मंडी, धर्मशाला और पालमपुर में मेयर और डिप्टी मेयर की ताजपोशी भी हो गई है। मंंडी नगर निगम में साफ तौर पर बीजेपी ने बहुमत हासिल किया था। यहां से दीपाली जसवाल को मेयर और वीरेंद्र भट्ट को डिप्टी मेयर की कुर्सी मिली है। धर्मशाला नगर निगम में 17 वार्ड में बीजेपी के 8 पार्षद जीते थे। यहां बहुमत से बीजेपी मात्र एक नंबर पीछे थी।

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निर्दलियों का साथ पाकर यहां भी बीजेपी ने बिना किसी दिक्कत के अपने मेयर और डिप्टी मेयर बनवा लिए। धर्मशाला में महापौर पद पर ओंकार नैहरिया तो उपमहापौर पद पर सर्वचंद गलोटिया की ताजपोशी हुई है। इसके अलावा पालमपुर नगर निगम में कांग्रेस 11 वार्ड जीतकर एकतरफा जीती थी। यहां से कांग्रेस की पूनम बाली मेयर और अनीश नाग डिप्टी मेयर चुने गए हैं। यहां तक तो ठीक है, लेकिन असल सुर्खियां तो सोलन नगर निगम बना रहा है।

क्या हैं सोलन के समीकरण

वैसे तो सोलन नगर निगम में कांग्रेस के 9 पार्षद जीते हैं और बहुमत के लिए भी 9 पार्षदों का ही आंकड़ा था, लेकिन यहां अब कांग्रेस को अपने ही पार्षदों में टूट का डर है। यही वजह है कि जीत के बाद से ही सभी पार्षदों को कांग्रेस द्वारा एकसाथ निगरानी में रखा जा रहा है। दरअसल पार्टी सिंबल से चुनाव होने पर अब कोई भी पार्षद ऐसे ही किसी दूसरे दल को समर्थन नहीं दे सकता।

क्यों सहमी है कांग्रेस

ऐसा करने पर उसकी पार्षद की सदस्यता रद्द हो सकती है। यदि दूसरे दल में शामिल भी होना है तब भी कांग्रेस के कम से कम तीन पार्षदों को एकसाथ बीजेपी में जाना होगा। बस इसी डर से कांग्रेस सहमी हुई है। बीते रोज सभी नगर निगम में मेयर और डिप्टी मेयर चुन लिए गए, लेकिन सोलन नगर निगम में तो बीजेपी और एक निर्दलीय पार्षद शपथ के लिए भी नहीं पहुंचे। अब सोलन नगर निगम के मेयर और डिप्टी मेयर का फैसला 16 को होगा।

तो फिर पार्टी सिंबल और विचारधारा का क्या मतलब

दरअसल, यह पहला मौका नहीं जब होटल पॉलिटिक्स सुर्खियों में आई हो। हां, यह जरूर है कि हिमाचल में इस कल्चर की आदत नहीं, लेकिन जिस तरह से हालात बन रहे हैं हिमाचल में भी आने वाले दिनों में यह चलन शुरू होने वाला है। अब सवाल उठता है कि आखिर फिर पार्टी सिंबल पर चुनाव करवाने का मतलब ही क्या बचता है और राजनीतिक दल किस बात की विचारधारा की बात करते हैं। जब दूसरा दल किसी पार्षद को हलके प्रलोभन देकर खरीद सकता है तो फिर किसी विचारधार की बात पॉलिटिकल पार्टियां करती हैं। खैर, वैसे बीजेपी विपक्षी खेमे में टूट डालने में कितनी माहिर है इसके बीते कुछ सालों में काफी उदाहरण हैं।

 

क्या ये हैं नगर निगम चुनावों में कांग्रेस की ‘जीत’ के सूत्रधार

 

हिमाचल में डराने लगा कोरोना, भरने लगे अस्पताल, डेथ रेट बढ़ा

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में कोरोना की स्थिति लगातार डरावनी होती जा रही है। यहां अब एक दिन में पांच सौ से ज्यादा नए मामले सामने आ रहे हैं। हर दिन कोरोना की वजह से जान गंवाने वालों की भी संख्या बढ़ती जा रही है। इससे प्रदेश में डेथ रेट बढ़ गया है और रिकवरी रेट में कमी आई है।

हिमाचल प्रदेश में इस समय कोरोना के लगभग सात हज़ार ऐक्टिव केस हैं। डेथ रेट 1.8 प्रतिशत है और रिकवरी रेट 93 प्रतिशत है। इस बीच, प्रदेश के दो बड़े अस्पतालों पर भी कोरोना के मामलों का बोझ बढ़ने लगा है। दरअसल, हर रोज जितने भी लोग कोरोना संक्रमित पाए जा रहे हैं, उनमें लगभग 10 फीसदी की हालत गंभीर हो रही है। ऐसे में इन्हें अस्तपाल में भर्ती करना पड़ रहा है।

अभी स्थिति ऐसी है कि शिमला में आईजीएमसी का कोविड वॉर्ड और अस्थायी कोविड अस्पताल मरीजों से भर गया है। धर्मशाला के कोविड सेंटर और अस्थायी कोरोना हॉस्पिटल में आने वाले दिनों में स्थिति गंभीर हो सकती है। अगर केस इसी रफ्तार से बढ़ते गए तो डेडिकेटेड कोरोना अस्पतालों की जगह दूसरे अस्पतालों में भी कोरोना के मरीजों को भर्ती करना पड़ेगा।

मंत्री महेंद्र सिंह ने सपरिवार तोड़े नियम, प्रधानों को बुलाकर पहनाई टोपी, मास्क गायब

रितेश चौहान, फॉर इन हिमाचल, सरकाघाट।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के धर्मपुर विकास खण्ड में 7 अप्रैल को हुए पँचायत प्रधानों के चुनावों में चुने गए प्रधानों को एसडीएम धर्मपुर ने 9 अप्रैल को शपथ दिलाई थी। लेकिन प्रधानों की ‘राजनीतिक शपथ’ एक दिन पहले 11 अप्रैल को हुई जब जलशक्ति मंत्री और उनके परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में नवनिर्वाचित प्रधानों की विश्राम गृह ध्वाली में परेड की गई। यही नहीं, उन्हें भाजपा के चुनाव चिह्न वाली टोपियाँ पहनाकर भाजपा के प्रधान के रूप में घोषित किया गया।

ध्यान दें, सरकार पहले ही कोविड पर लगाम लगाने के लिए दिशा निर्देश जारी कर चुकी है जिसके तहत सबके लिए मास्क पहनना अनिवार्य है, भीड़ जुटाने पर रोक है और दूरी बनाकर रखना अनिवार्य है। यहां तक कि निजी कार में अकेले चलने पर भी मास्क पहनना जरूरी है लेकिन धर्मपुर में जलशक्ति मंत्री सपरिवार इन सब नियमों को तोड़ते नजर आए।

ऊपर कवर इमेज में आप देख सकते हैं कि भाजपा की टोपियाँ पहने इन प्रधानों के साथ खिंचवाये गये फ़ोटो में मन्त्री उनकी पत्नी, बेटी और बेटा जो पहली पंक्ति में बिना मास्क लगाये खड़े हुए हैं। उनके पीछे नवनिर्वाचित प्रधान खड़े हुए हैं और उन्होंने भी मास्क नहीँ लगाये हैं। सवाल उठ रहे हैं कि इस तरह सरकार के मन्त्री ही नियमों को तोड़ते हैं तो वे आम जनता के लिए क्या संदेश देंगे।

इस संबंध में पूर्व ज़िला परिषद सदस्य भूपेंद्र सिंह ने आरोप लगाया कि धर्मपुर में जो भी पँचायत प्रतिनिधि चुने जाते हैं उन्हें भाजपा की टोपियाँ पहनना अनिवार्य बना दिया गया है। ऐसा ही दो माह पूर्व हुए पँचायत समिति सदस्यों के साथ किया गया था कि जिन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और जीते थे उन्हें कथित तौर पर सम्मानित करने के बहाने परिणाम घोषित होने के बाद धर्मपुर में ही भाजपा के कार्यालय में ले जाया गया और वहां पर उन्हें भाजपा के चुनाव चिन्ह वाली टोपियाँ पहना कर औऱ सत्ता व सरकार के प्रभाव में भाजपा का प्रतिनिधि घोषित कर दिया गया था और सभी 22 सदस्यों को भाजपा का ही कह दिया गया था।

भूपेंद्र ने आरोप लगाया कि इसी तर्ज पर पिछले कल नवनिर्वाचित प्रधानों को भी मंत्री, उनके बेटे, पत्नी, बहु और बेटी के सामने ध्वाली विश्राम गृह में इकठ्ठा किया गया था और उन्हें भी भाजपा की टोपियाँ पहना कर पार्टी का पधाधिकारी घोषित कर दिया गया। भूपेंद्र सिंह ने कहा, “कुछ प्रधान जो मन्त्री और उनके परिवार द्वारा बुलाई गई इस परेड में शामिल नहीँ हुए, उन्हें अप्रत्यक्ष रूप में बोला जा रहा है कि उनकी पंचायतों में विकास कार्य नहीं होंगे। जबकि ये सबको मालूम है कि पँचायत के लिए मनरेगा व वितायोग का बजट सरकार से मनरेगा के जबकार्डों व उस पँचायत की जनसंख्या के आधार पर जारी होता है और इसमें कौन किस दल का है या नहीं, इसके अनुसार नहीं होता है। इसमें विधायक व मन्त्री का कोई रोल नहीं होता है और सब ग्राम सभा में पारित सेल्फ़ पर आधारित होता है।”

पूर्व जिला परिषद सदस्य ने कहा, “लेकिन धर्मपुर में मन्त्री और उनके बेटे व बेटी के दबाब में सभी को अपना प्रतिनिधि घोषित करने की कर्यप्रणाली प्रचलित है जो पंचायती राज क़ानून और जनतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है और यहां पर लोकतंत्र के बजाये राजतंत्र व परिवारराज क़ायम हो रहा है। जो भी प्रतिनिधि इस परिवारराज व राजतंत्र का विरोध करने की कोशिश करता है उसे कई तरह से प्रताड़ित करने का काम किया जाता है।”

क्या ये हैं नगर निगम चुनावों में कांग्रेस की ‘जीत’ के सूत्रधार

(नगर निगम चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस के प्रदर्शन की समीक्षा पर दूसरी और अंतिम कड़ी) इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल कांग्रेस खुश है नगर निगम चुनावों में उसका प्रदर्शन अच्छा रहा। इसका श्रेय बहुत से लोग प्रदेश कांगेस अध्यक्ष कुलदीप राठौर को दे रहे हैं। मगर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बयानबाजी से बढ़कर निगम चुनावों में राठौर का खास रोल नहीं दिखा। उनके बयानों में अक्सर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ही मेन टारगेट पर रहे। चारों निगमों के प्रचार में भी उन्होंने ज्यादा समय नहीं गुजारा।

हालाँकि राठौर कभी फायरब्रांड नेता नहीं रहे है, इसलिए जनता के बीच उनके दौरे का कोई ख़ास फर्क पड़ता, यह मानना मुश्किल है। भाजपा की तरह कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष का भी कोई ख़ास रोल निगम के चुनावों में नहीं रहा। हालाँकि, आलाकामन की नजर में बतौर अध्यक्ष उनके हिस्से क्रेडिट जरूर जुड़ा है।

आशीष बुटेल का उभार
पालमपुर नगर निगम की बात करें तो यहाँ बुटेल परिवार के कारण कांग्रेस ने भाजपा का सूपड़ा साफ़ करते हुए जीत का परचम लहराया है। पालमपुर में बुटेल खासकर विधायक आशीष बुटेल के सौम्य व्यव्यहार और पार्टी लाइन से बाहर भी लोगों के मध्य छवि ने कांग्रेस को आशातीत सफलता के पार पहुँचाया है।

आशीष बुटेल कांगड़ा में एक अलग पहचान और कद्दावर नेता के रूप में अब उभर कर आए हैं और भविष्य में भाजपा को उनके सामने चुनौती पेश करने में खासी मशक्कत करनी पड़ सकती है। वहीं, उनके परिवार से ही युवा नेता और चुनावी राजनीति में अपनी संभावनाएं तलाश रहे, पूर्व कांग्रेस सरकार में आईटी सलाहकार रहे गोकुल बुटेल को भी पालमपुर से अपनी जगह बनाने में लम्बा इंतज़ार करना पड़ सकता है। कुल मिलाकर आशीष बुटेल इस छवि से अपने आप को बाहर निकाल पाएं है कि वो अपने पिता और दिग्गज नेता बीबीएल बुटेल की वजह से ही राजनीति में सफल हैं।

सुधीर के लिए चिंता
धर्मशाला नगर निगम के नतीजे भाजपा कांग्रेस से ज्यादा सुधीर शर्मा के लिए ज्यादा चिंताजनक है। शुरू के प्रचार में चुप्पी साधे रहे सुधीर अंत में जोश खरोश और डिजिटल मैनजमेंट के तहत चुनाव प्रचार में उतरे। टिकट आबंटन में सुधीर बनाम नान सुधीर दो धड़े मैदान में उतरे। ध्यान देने वाली बात है कांग्रेस के जीते 5 जीते उम्मदवारों में से सुधीर विरोधी तबके के चार जीते है और इन सब ने चुनाव प्रचार में सुधीर की फोटो लगाना भी मुनासिब नहीं समझा था। सुधीर विरोधी धड़े के अगुआ जग्गी भी इनमे एक है वही दो निर्दलीय कांग्रेस विचारधारा के जीते है वो भी जग्गी के गुट के ही माने जा रहे हैं।

धर्मशाला सिटी जो कभी सुधीर का गढ़ माना जाता था वहां यह हालत उनके भविष्य के लिए निसंदेह चिंता की स्थिति पैदा करती है। यह तय है सुधीर को धर्मशाला से अब चुनौती बढ़ चढ़ कर मिलने की सम्भावना है। वहीं, उनके गुट से रजनी व्यास का जीतकर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से मिलने जाना भी कई कयासों को जन्म दे रहा है।

सुखराम के बोझ तले दबी कांग्रेस
मंडी नगर निगम की बात करें तो कांग्रेस कांग्रेस यहाँ चार सीट निकाल पाई है। जानकारों के अनुसार कांग्रेस का टिकट आबंटन सही था पर सुखराम परिवार के आया राम, गया राम की छवि और आजकल कांग्रेस से नजदकियां, कौल सिंह की बेटी चंपा ठाकुर और आश्रय की बहस, अनिल शर्मा का मुख्यमंत्री जयराम को टारगेट करना…. ये सब भाजपा को फायदा दे गया। खुद कांग्रेस कैडर का यह मानना है कि सुखराम परिवार से दूरी बनाकर कांग्रेस यह चुनाव लड़ती तो और बेहतर प्रदर्शन कर सकती थी।

राणा की मेहनत लाई रंग
सोलन नगर निगम में जीत का श्रेय कांग्रेस में लोकल विधायक धनी राम शांडिल्य की जगह सुजानपुर के विधायक और प्रभारी राजिंदर राणा को मिलता दिख रहा है। बात में दम भी है राणा ने यहाँ खूब मेहनत की और माइक्रो मैनजेमेंट से भाजपा के दिग्गज बिंदल को फेल किया। सोलन प्रवासी लोगों का शहर है। यहाँ बिलासपुर, हमीरपुर, ऊपरी शिमला, सिरमौर और किन्नौर के लोग बहुत बड़ी तादाद में है। भाजपा ने सोलन को जहाँ राजीव बिंदल और सहजल के भरोसे छोड़ा था, वहीं राणा ने यहाँ प्रचार में बिलासपुर से रामलाल ठाकुर, सिरमौर से हर्षवर्धन, विक्रमादित्य अदि नेताओं की पूरी मदद लेकर हर क्षेत्र के लोगों में समर्थन जुटाने को सेंध लगाई।

कुलमिलाकर आशीष बुटेल, राजिंदर राणा के रूप में कांग्रेस में यहाँ नए रणनीतिकारों का उदय इस चुनाव में हुआ। वहीं, सुधीर शर्मा के भविष्य के लिए ये नतीजे चिंता की रेखाएं पैदा करते हैं। कुलदीप राठौर चूंकि लीडर हैं तो उनके क्रेडिट में यह सब तो जुड़ना ही है। सबसे सुखद कांग्रेस के लिए यह बात है कि अक्सर आपसी ईगो-क्लैश में उलझे रह जाने वाले कांग्रेसी दिग्गज इस चुनाव में चुपचाप अपने अपने हिस्से का काम करते गए और बेहतर परिणाम से कुछ सबक भी भविष्य के लिए ले पाए।

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क्या ये हैं नगर निगम चुनावों में कांग्रेस की ‘जीत’ के सूत्रधार

अब हिमाचल आना है तो लानी होगी कोविड नेगेटिव रिपोर्ट

शिमला।। हिमाचल सरकार ने 16 अप्रैल के बाद से पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से आने वालों के लिए 72 घँटों के अंदर जारी कोरोना की RT-PCR नेगेटिव रिपोर्ट होना जरूरी। सरकार जारी करेगी नोटिफिकेशन।

बस किराया बढ़ने पर ढाई साल बाद आहत हुए कांग्रेस नेता निगम भंडारी

शिमला।। हिमाचल प्रदेश यूथ कांग्रेस अध्यक्ष हिमाचल में बसों का न्यूनतम किराया बढ़ने पर ढाई साल बाद आहत हुए हैं। दरअसल उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर एक खबर की कटिंग शेयर की है जिसमें बसों का न्यूनतम किराया बढ़ने की सूचना है। साथ में उन्होंने लिखा है- बहुत दुखी हूं इस फैसले से।

दरअसल यह पुरानी खबर है जब सरकार ने सितंबर 2018 में किराया बढ़ाने का फैसला किया था। खबर में लिखा है- न्यूनतम किराया 6 रुपये किया जाएगा। हालांकि, बाद में 2020 में फिर सरकार ने किराया बढ़ाया था और तभी से न्यूनतम किराया 7 रुपये है।

लोग भी उनकी इस फेसबुक पोस्ट पर सवाल उठा रहे हैं। वे कह रहे हैं कि यह बताता है कि निगम भंडारी की संवेदना झूठी है; इसलिए, क्योंकि न तो वह खबरें पढ़ते हैं और न जमीनी सच्चाई से वाकिफ हैं। अगर होते तो जानते कि पहले ही किराया जब 7 रुपये है तो उसके 6 रुपये होने की खबर शेयर न करते।

नगर निगम चुनावों में बीजेपी की ‘हार’ के लिए कौन है जिम्मेदार?

(नगर निगम चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस के प्रदर्शन की समीक्षा पर पहली कड़ी) आई.एस. ठाकुर।। सोलन, मंडी, पालमपुर और धर्मशाला नगर निगम के लिए हुए चुनावों के नतीजों की समीक्षा का दौर अभी थमा नहीं है। कांग्रेस इन चुनावों में जहां अच्छे प्रदर्शन से उत्साहित है, वहीं बीजेपी के अंदर समीक्षा चल रही है कि आखिर चूक कहां हुई जो मंडी के अलावा बाकी जगहों पर मतदाताओं ने उस पर विश्वास नहीं जताया। कुछ विश्लेषक इसे सरकार विरोधी लहर मान रहे हैं। हालांकि, मतदान प्रतिशत को देखते हुए यह नहीं लगता कि लोगों ने बीजेपी को किसी तरह का संदेश देने के लिए घरों से बाहर निकलने की कोशिश की। विधानसभा और लोकसभा चुनावों में औसतन 75 फीसदी मतदान करने वाले हिमाचल के इन चार नगर निगमों में औसतन 66 फीसदी मतदान ही हुआ। वहीं कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि स्थानीय निकाय चुनावों में क्षेत्रीय मुद्दे हावी रहते हैं और इसी वजह से नतीजों की व्याख्या किसी पार्टी की लहर या किसी से नाराजगी के तौर पर करना सही नहीं है। लेकिन जब चुनाव ही पार्टी सिंबल पर चुनाव हुए हों, तब चुनावों की समीक्षा पार्टियों, उनके संगठन और नेताओं को किनारे रखकर भला कैसे की जा सकती है?

बीजेपी का प्रदर्शन ऐसा क्यों रहा?
जब विधानसभा चुनाव को मात्र डेढ़ साल का समय बचा हो, उस दौर में चार नगर निगमों के चुनाव पार्टी सिंबल पर करवाना कोई आसान फैसला नहीं था। सीएम को कुछ लोगों ने सलाह भी दी होगी कि ऐसा करने से बचें क्योंकि चुनाव के नतीजे अगर पक्ष में नहीं आए तो लोग आपकी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाएंगे। इस रिस्क को समझते हुए भी जयराम ने पार्टी सिंबल पर चुनाव करवाए। नतीजे पक्ष में नहीं रहे तो अब वही हो रहा है, जिसका डर उनके सलाहकार जताते रहे होंगे। पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए राज्य सरकार की नीतियों के प्रति जनता के असंतोष और जयराम ठाकुर के नेतृत्व को दोष दिया जाने लगा है। कहा जा रहा है कि सीएम ने मंडी, पालमपुर, सोलन और  धर्मशाला की गलियों में उतरकर प्रचार किया, फिर भी मंडी के अलावा बाकी जगह पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा।

इन आलोचनाओं से वैसे एक बात तो साफ हो जाती है कि विपक्ष और बाकी नेता यह मानते हैं कि हिमाचल में इस वक्त बीजेपी का एक ही सर्वमान्य नेता है और वह है जयराम ठाकुर, इसलिए हार की जिम्मेदारी भी उन्हीं की होनी चाहिए। जिस तरह कांग्रेस अपने अच्छे प्रदर्शन का सेहरा अपने प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप राठौर के सिर बांध रही है, उस तरह हिमाचल प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष सुरेश कश्यप को बीजेपी के प्रदर्शन के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा रहा। क्योंकि प्रदेश में संगठन को संभालना और किसी भी तरह के चुनावों या उपचुनावों की कमान संभालना प्रदेशाध्यक्ष का काम है। लेकिन इन चुनावों में सुरेश कश्यप कहीं पर भी सक्रिय नहीं दिखाई दिए।

संगठन के मुखिया को संभालता सरकार का मुखिया
सुरेश कश्यप की छवि एक शर्मीले स्वभाव के नेता की है जो कभी खुलकर किसी मामले में लीड लेते नहीं दिखते। प्रेस कॉन्फ्रेंस वगैरह में भी उनकी असहजता नजर आ जाती है। वह हर सवाल का डिफेंसिव जवाब देते हैं और कहीं भी उनकी बातों में किसी कार्ययोजना या एक्शन की ललक और झलक नहीं दिखती। 2019 लोकसभा चुनाव जब हो रहे थे, तब सतपाल सत्ती बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष थे। भले ही वो अपने बयानों के लिए विवादों में रहे हों, लेकिन हर जगह वह न सिर्फ ऐक्टिव रहे बल्कि तेजतर्रार तरीके से प्रचार करते नजर आए। उसके बाद कुछ समय के लिए प्रदेशाध्यक्ष बने बिंदल ने भी ऐक्टिव होकर बीजेपी काडर में उत्साह का संचार करने की कोशिश की थी। मगर सुरेश कश्यप पद संभालने के इतने महीनों बाद भी खुद को स्थापित नहीं कर पाए हैं। ऐसे में वह निगम चुनावों में पार्टी के लिए क्या ही कर पाते और वो कुछ कर भी नहीं पाए।

पार्टी आलाकमान को उनकी जवाबदेही लेना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि टिकट आवंटन, प्रचार, चुनाव प्रबंधन आदि की जिम्मेदारियां अध्यक्ष की होती हैं। सब काम सरकार का मुखिया नहीं कर सकता, इसलिए सत्ताधारी पार्टी का बहुत कुछ संगठन के नेताओं को संभालना पड़ता है। मगर हिमाचल में हुआ यह कि राजीव बिंदल के इस्तीफे के बाद आनन-फानन में अध्यक्ष बनाए गए सुरेश कश्यप के काम भी सरकार के मुखिया को संभालने पड़ रहे हैं। अगर संगठन काबिल होता यूं सीएम को प्रचार के लिए गलियों में नहीं उतरना पड़ता। प्रचार तो फिर भी बाद की बात है, पहला काम होता है चुनाव के लिए रणनीति बनाना। यह बात हैरान करती है कि जिन राजीव बिंदल को गंभीर आरोपों की वजह से पार्टी प्रदेशाध्यक्ष पद छोड़ना पड़ा, आपने उन्हीं को सोलन चुनावों की कमान सौंप दी। बिना यह देखे कि राजीव बिंदल को लेकर अब लोगों की राय क्या है। सोलन में चुनाव को पूरी तरह राजीव बिंदल के हवाले करने के अलावा पालमपुर में सौम्य कांग्रेसी विधायक आशीष बुटेल के सामने ‘अलोकप्रिय’ त्रिलोक कपूर को कमान सौंपने और धर्मशाला में विशाल नहरिया-किशन कपूर की खींचतान पर लगाम न लगा पाने के लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है?

नकारा मंत्री, पिछलग्गू पदाधिकारी
जयराम ठाकुर के सीएम बनने के बाद उनकी छवि को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने का काम किया है ऐसे मंत्रियों ने जो मंत्री बनते ही भूल गए कि उनका काम क्या है। सरकार की छवि को बेहतर बनाना, अच्छे काम करवाना तो दूर, वे अपने महकमे तक को नहीं संभाल पाए। बीच में मंत्रिमंडल में फेरबदल भी हुआ मगर इससे कुछ असर नहीं हुआ। कांगड़ा से तीन मंत्री हैं मगर तीनों की ही भूमिका अजीब रही है। नगर निगम चुनावों के दौरान जहां उन्हें आगे आकर मोर्चा संभालना चाहिए था, वहीं वे किन्ही और कामों में व्यस्त रहे।उदाहरण के लिए धर्मशाला में उतनी कोशिश नहीं की गई, जितनी की जानी चाहिए थी। सरवीण चौधरी पहले शहरी विकास मंत्री थीं। वह चाहतीं तो धर्मशाला के विकास को पंख लगा सकती थीं लेकिन उनका फोकस कहीं और ही रहा। और तो और, चुनाव प्रचार जब चरम पर थे तो धर्मशाला बीजेपी के नेता और कांगड़ा के ही एक मंत्री प्रचार छोड़ केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर की अगवानी में लगे रहे। क्या चुनाव ऐसे जीते जाते हैं? पालमपुर में तो किसी का फोकस रहा ही नहीं। ऐसे मंत्री किस काम के?

मंडी में बीजेपी का इतनी सीटें जीतना हैरान करता है क्योंकि लोगों में वहां महेंद्र सिंह ठाकुर के प्रति भारी नाराजगी है। जिस तरह के पक्षपात के आरोप महेंद्र सिंह पर लगे हैं, वह न तो सीएम के लिए अच्छे हैं न पार्टी के लिए। कई मंचों से महेंद्र सिंह यह कहते हैं कि ‘मंडी से सीएम मिला है, मंडी से सीएम मिला है।’ सीएम बनने के एक आध महीने तक तो ये बातें ठीक हैं मगर चार साल बाद भी ऐसी रट लगाना सही संदेश नहीं देता। पूरे प्रदेश में आपकी छवि बनती है कि आप प्रदेश के नहीं, एक जिले के सीएम हैं। और फिर ये छवि और गहरी हो जाती है कि जब आपकी ही पार्टी के विधायक विधानसभा में आपके पूछें कि आप मंडी पर ही विकास कार्यों में इतना पैसा क्यों खर्च कर रहे हैं और वह भी दो विधानसभा क्षेत्रों में।

मंडी के लोगों में भी यह चिंता थी कि महेंद्र सिंह उनके यहां अपने क्षेत्र के लोगों को नौकरियां लगा देंगे। हिमाचल की राजनीति पर नजर रखने वालों का कहना है कि भले ही महेंद्र सिंह यह दावा कर रहे हों उनके प्रचार की वजह से मंडी में बीजेपी जीती, मगर हकीकत यह है कि उन्होंने नुकसान किया है। वरना बीजेपी और बेहतर प्रदर्शन करती। स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि महेंद्र सिंह से बेहतर काम तो राकेश जमवाल करते नजर आए, जिन्होंने महेंद्र सिंह ठाकुर के अक्खड़ और मुंहफट तरीके से उलट विनम्रता से डोर टु डोर कैंपेन किया और लोगों की नाराजगी दूर करने की कोशिश की।

इन चुनावों के नतीजे बीजेपी ही नहीं, सीएम जयराम ठाकुर के लिए भी ‘वेक अप कॉल’ हैं। अभी वक्त है कि जयराम ठाकुर जानें कि कौन उनका असल हितैषी है। ऐसा कैसे हो सकता है कि जनता को यह पता हो कि कौन सीएम की तारीफ करने की आड़ में असल में अपने हित साध रहा है, लेकिन यही बात सीएम को मालूम न हो।

लॉबी जो जयराम ठाकुर को ‘फेल’ देखना चाहती है

चुनाव के नतीजों की व्याख्या हर कोई अपने हिसाब से करता है। जैसे कि कहा जा रहा है कि ये नतीजे बताते हैं कि जनता जयराम और उनकी सरकार से खुश नहीं है। वैसे, सीएम जैसे ही नगर निगम चुनाव के प्रचार में जुटे थे, 2019 लोकसभा चुनावों और पच्छाद उपचुनाव के बाद चित्त पड़ी भाजपा की एक ख़ास लॉबी अचानक अंडरटेकर की तरह उठ खड़ी हो गई। ये वह लॉबी है जो चाहती है कि जयराम ठाकुर ‘फेल’ हो जाएं। 2017 विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा आलाकमान या यूं कहिए कि तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह समझ गए थे कि हिमाचल के लोग, जिनमें भारतीय जनता पार्टी के वफादार, ईमानदार और सिद्धांतवादी कार्यकर्ताओं का भी बड़ा वर्ग शामिल है, चाहते हैं कि इस बार नेतृत्व परिवर्तन हो। इसीलिए चुनावों से एन वक्त पहले तक बीजेपी ने सीएम कैंडिडेट की घोषणा नहीं की। लेकिन प्रेम कुमार धूमल का खेमा सक्रिय हो गया और ऐसा संदेश देने की कोशिश की गई कि अगर धूमल को कैंडिडेट नहीं बनाया गया तो इससे बीजेपी नुकसान हो सकता है।

बीजेपी जानती थी कि नुकसान होगा भी तो इसलिए कि धूमल समर्थक पार्टी के खिलाफ काम करेंगे। इसलिए नहीं कि कोई मतदाता ये सोचेगा कि धूमल सीएम नहीं बनेगा, इसलिए वीरभद्र को ही जिताना चाहिए। अप्रत्यक्ष ब्लैकमेल के आगे पार्टी को घुटने टेकने पड़े और आखिरी समय में धूमल को सीएम कैंडिडेट घोषित कर दिया गया। मगर कमाल यह हुआ कि धूमल खुद चुनाव हार गए। जब सीएम पद के लिए नया चेहरा चुना जाना था, तब फिर धूमल समर्थकों की लॉबी ने हंगामा शुरू कर दिया। कुछ तो अपनी सीट छोड़ने को तैयार हो गए कि धूमल जी को सीएम बना दीजिए, मैं इस्तीफा दे देता हूं और मेरी सीट पर होने वाले उपचुनाव में धूमल जी जीत जाएंगे। न तो ऐसा होना था, न ऐसा हुआ। नया मुख्यमंत्री बनाया गया- सराज के विधायक जयराम ठाकुर को।

लेकिन अब तक यह साफ हो चुका था कि प्रदेश भाजपा के किन नेताओं और विधायकों की वफादारी प्रदेश या पार्टी की बजाय एक नेता विशेष- प्रेम कुमार धूमल के प्रति थी। वे आलाकमान के फैसले के आगे खामोश तो हो गए, लेकिन उनका दिल धूमल के लिए धड़कता रहा और आज भी धड़क रहा है। संगठन से लेकर विधानसभा के अंदर तक, कई ऐसे नेता हैं जिनकी आज तक यह तमन्ना है कि कब नेतृत्व परिवर्तन हो और कब जयराम की जगह धूमल और धूमल न सही तो अनुराग ठाकुर को सीएम बना दिया जाए। यह लॉबी शुरू से इन कोशिशों में जुटी रही कि कैसे जयराम ठाकुर को फेल किया जाए। इनमें से कुछ ऐसे थे जो मंत्री पद न मिलने पर बौर्राए रहे। इनमें से कुछ को जैसे-तैसे कुछ जिम्मेदारियां दी गईं मगर मंत्री पद तो मंत्री पद होता है। इसलिए नाराजगी गई नहीं। इन चुनावों में यह भी देखने को मिला कि जयराम ठाकुर विरोधी यह लॉबी पूरी तरह ऐक्टिव थी। अब चुनाव के नतीजे पक्ष में नहीं रहे हैं तो सोशल मीडिया पर यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि अब तो सीएम बदल देना चाहिए। इन लोगों पर लगाम लगाने का एक ही तरीका है- काम से जवाब देना।

जल्द ही हिमाचल में दो उपचुनाव होने वाले हैं। फतेहपुर विधानसभा और मंडी लोकसभा सीट पर। वही 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले जयराम सरकार की असल परीक्षा होंगे। यही चुनाव उनका और भाजपा का भविष्य तय करेंगे। 2019 में जयराम ठाकुर सीएम बने थे तो लोगों को लगा था कि अब तो कुछ बेहतर होगा। उन्हें उम्मीद थी बेहतर नेतृत्व की। बिना भेदभाव या पक्षपात वाले शासन की। अभी भी एक साल का समय बचा है, जयराम ठाकुर को पूरा ध्यान इस पर लगाना चाहिए कि कैसे वह इन उम्मीदों को पूरा कर सकते हैं। अपने मंत्रियों को कसें। जरूरी हो तो नकारा मंत्रियों को हटाकर नए लोगों को मौका देना चाहिए। सुस्त प्रशासनिक अधिकारियों को कसना चाहिए जो हर चीज़ को लालफीताशाही में उलझाने में माहिर हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

लेखक लंबे समय से हिमाचल प्रदेश और देश-दुनिया के विषयों पर लिख रहे हैं, उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

दूसरी कड़ी-

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