कोरोना के कारण कई जगह टलीं ग्राम सभाएं

शिमला।। कोरोना संकट के कारण प्रदेश में कई जगह ग्राम सभाओं का आयोजन नहीं हो सका है। ऐसे में कई पात्र परिवारों का चयन नहीं हो पाया है। यह जानकारी हिमाचल प्रदेश पंचायती राज मंत्री वीरेंद्र कंवर ने दी है।
कंवर ने कहा कि कोरोना संकट की वजह से कई जगह ग्राम सभाएं न होने के कारण पात्र परिवारों का चयन नहीं हो सका है। कोरम पूरा होते ही पात्र लोगों का चयन किया जाएगा।

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इसके अलावा विधायक विक्रम जरियाल के सवाल पर मंत्री ने बताया कि मुख्यमंत्री आवास योजना में 10 फीसदी कोटा प्राकृतिक नुकसान से क्षतिग्रस्त होने वाले भवनों के लिए रखा गया है। इस पर विधायक अरुण कुमार ने कहा कि बीते साल जो मकान गिरे थे, उन्हें अभी तक दो लाख की मुआवजा राशि नहीं मिली है।

आउटसोर्स कर्मियों से 24 घंटे डे-नाईट ली जा रही ड्यूटी

एमबीएम न्यूज़, शिमला।। राजधानी शिमला के मशोबरा में महिलाओं की सुरक्षा के लिए संचालित हो रहे वन स्टॉप सेंटर (ओएससी) में आउटसोर्स के तहत सेवा दे रही महिला कर्मचारी के शोषण होने का मामला सामने आया है। इस सेंटर में महिला स्टाफ से लगातार 24 घंटे की ड्यूटी करवाकर श्रम नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। हैरानी की बात यह है कि यह ओएससी सेंटर महिला बाल विकास विभाग शिमला द्वारा संचालित किया जा रहा है।

सेंटर की केंद्रीय प्रबंधक की तरफ से बाकायदा आउटसोर्स महिला कर्मियों की 24 घंटे नाइट ड्यूटी का रोस्टर जारी किया गया है। रोस्टर के अनुसार कर्मियों को 24 घंटे ड्यूटी देने के सख्त निर्देश हैं। पिछले पांच महीनों से इस सेंटर में आउटसोर्स पर सेवारत महिला कर्मी रोस्टर के तहत 24 घंटे ड्यूटी देने को मजबूर हैं। कोरोना कर्फ्यू के दौरान भी आउटसोर्स महिला स्टाफ से इस सेंटर में 24 घंटे ड्यूटी ली गई।

शिमला के जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) के पास इस सेंटर को चलाने का सारा जिम्मा है। डीपीओ दफ्तर शिमला का स्टैटिकल असिस्टेंट द्वारा मशोबरा सेंटर के आउटसोर्स स्टाफ को लगातार चार दिन डे-नाइट ड्यूटी लगाने के सख्त ऑर्डर जारी किए जा रहे हैं, जोकि चौंकाने वाली बात है।

आउटसोर्स पर तैनात एक युवती और स्टैटिकल असिस्टेंट के बीच फोन पर हुई बातचीत का ऑडियो वायरल हुआ है। इस बातचीत में जब युवती ने लगातार चार दिन डे-नाइट ड्यूटी देने पर जब आपत्ति जताई, तो स्टैटिकल असिस्टेंट की तरफ से कहा गया कि जॉब करनी है, तो लगातार चार दिन डे-नाइट ड्यूटी देनी पड़ेगी।

इस पर आउटसोर्स पर नौकरी कर रही युवती रोने लगती है। युवती कहती है कि उसके पिता बीमार हैं। उन्हें लंग्स इन्फेक्शन है। ऐसे में अगर वो चार दिन लगातार ड्यूटी पर रहेगी, तो उसके बीमार पिता की देखभाल कौन करेगा। युवती यह भी कहती है कि वो रोस्टर के हिसाब से डे-नाइट ड्यूटी तो दे ही रही है, लेकिन लगातार चार दिन ड्यूटी कैसे देगी। इस पर स्टैटिकल असिस्टेंट युवती को कहता है कि वह डीपीओ से बात करे।

इसके अलावा ओएससी में सेवारत एक अन्य महिला कर्मी ने आरोप लगाया है कि सेंटर में 24 घंटे ड्यूटी देने के बावजूद उसकी अब्सेंट लगाई गई है। इस महिला कर्मी का कहना है कि 19 जुलाई को उसने दूसरे महिला कर्मी के आग्रह पर उसकी जगह सेंटर में 24 घंटे की ड्यूटी दी थी, लेकिन फिर भी उसकी अब्सेंट लगाई गई। महिला बाल विकास शिमला के कार्यालय का एक अधिकारी उसे ये कहकर धमका रहा है कि अब उसकी सैलरी काटी जाएगी।

इस बारे राज्य में ओएससी की देखरेख का जिम्मा संभाल रहे महिला बाल विकास के उपनिदेशक अर्जुन नेगी का कहना है कि वन स्टॉप सेंटर का 24 घंटे, सातों दिन खुला रहना अनिवार्य है। लेकिन सेंटर में कर्मचारियों की लगातार 24 घंटे ड्यूटी नहीं लगाई जा सकती है। ये नियमों के उलंघन है। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों की रोटेशन के आधार पर 24 घंटे ड्यूटी लगाने का प्रावधान है।

वहीं, इस मामले पर शिमला की डीपीओ वंदना चौहान का कहना है कि मामले की जांच की जाएगी। उनका भी यही कहना है कि वन स्टाप सेंटर में किसी भी आउटसोर्स स्टाफ की लगातर 24 घंटे की ड्यूटी नहीं लगाई जा सकती है।

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बता दें कि वन स्टॉप सेंटर में पीड़िता को एक ही छत के नीचे मेडिकल, लीगल, मनोवैज्ञानिक और साथ में पुलिस की सहायता 24 घंटे सातों दिन निशुल्क सुविधा देने का प्रावधान रहता है। यह शिमला जिला का पहला ओएससी है। चौंकाने वाली बात ये है कि24 घंटे खुले रहने के बावजूद भी यहां सुरक्षा के इंतजाम नहीं हैं। सेंटर में कोई सिक्योरिटी गार्ड भी नहीं है, जबकि ओएससी में रास्त के समय सिक्योरिटी गार्ड का होना जरूरी है। इसके अलावा इस सेंटर में काउंसलर भी नियुक्त नहीं है। साथ ही सेंटर में सीसीटीवी कैमरों व अन्य मूलभूत सुविधाओं की भी कमी है।

(यह खबर एमबीएम न्यूज नेटवर्क के साथ सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

राम सुभाग सिंह होंगे मुख्य सचिव, अनिल खाची बनेंगे राज्य चुनाव आयुक्त

शिमला।। 1987 बैच के आईएएस अधिकारी राम सुभाग सिंह को हिमाचल प्रदेश सरकार नया मुख्य सचिव बनाने जा रही है। वहीं मौजूदा मुख्य सचिव अनिल खाची को राज्य का चुनाव आयुक्त लगाने की तैयारी है। पिछले लगभग छह महीनों से ऐसी अटकलें थीं कि मुख्य सचिव को बदला जा सकता है मगर अब जाकर यह परिवर्तन होता दिख रहा है।

इस संबंध में कार्मिक विभाग की ओर से बुधवार को फाइल्स राजभवन भेजी गई थीं जो देर रात को मंजूर हो गईं। उम्मीद की जा रही थी कि इस संबंध में देर रात को ही अधिसूचना जारी कर दी जाएगी मगर ऐसा हुआ नहीं। अब गुरुवार को सुबह किसी भी वक्त अधिसूचना जारी हो सकती है।

‘आरएसएस’
1987 बैच के आईएएस अधिकारी राम सुभाग सिंह के लिए कई राजनेता, अधिकारी और पत्रकार ‘आरएसएस’ नाम इस्तेमाल करते हैं। अभी वह अतिरिक्त मुख्य हैं। पिछले कई महीनों से ऐसी जानकारियां सामने आ रही थीं कि ढीली पड़ी अफसरशाही पर लगाम लगाने के लिए सरकार मुख्य सचिव को बदल सकती है। नए मुख्य सचिव के लिए राम सुभाग के नाम पर चर्चा तो हो रही थी मगर चर्चाओं का यह दौर लंबा खिंच गया था। अब अचानक लिए गए इस फैसले ने सबको चौंका दिया है।

दरअसल मौजूदा सरकार का कार्यकाल खत्म होने में डेढ़ साल से भी कम समय बचा है। इससे पहले के कार्यकाल के दौरान कई मुख्य सचिव बदल गए। जयराम सरकार के कार्यकाल की शुरुआत में मुख्य सचिव वीसी फारका थे। फिर सरकार ने उनकी जगह विनीत चौधरी को मुख्य सचिव बनाया जो जे.पी. नड्डा के करीबी माने जाते हैं।

उनके रिटायर होने के बाद बी.के. अग्रवाल मुख्य सचिव बनाए गए जो पहले केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर थे। फिर वे दोबारा सेंट्रल डेप्युटेशन पर चले गए। फिर श्रीकांत बाल्दी मुख्य सचिव बने जो 31 दिसंबर 2019 को रिटायर हो गए। उसके बाद 1 जनवरी 2020 को अनिल खाची मुख्य सचिव बने जो 1986 बैच के अधिकारी हैं।

बदलाव की वजह?
अनिल खाची राज्य चुनाव आयुक्त पद पर क़रीब डेढ़ साल रहेंगे, उसके बाद उनकी सेवानिवृति होनी है। खाची को मुख्य सचिव पद से हटाकर चुनाव आयुक्त के पद पर भेजे जाने को लेकर सरकार के जुड़े सूत्रों का कहना है कि मंत्रियों तक में इस बात को लेकर नाराजगी देखी जा रही थी कि कोरोना काल के दौरान सरकारी योजनाओं और फैसलों को धरातल पर उस तरह से नहीं उतारा गया, जिस तरह से उतारा जाना चाहिए था। हाल में एक बैठक के दौरान मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर और अनिल खाची के बीच तनातनी की खबरें भी सामने आई थीं।

मुख्य सचिव प्रदेश का सबसे बड़ा नौकरशाह होता है और सरकार के फैसलों और योजनाओं को जमीन पर लागू करवाने वाले अधिकारियों में सबसे शीर्ष पर होता है। ऐसे में सरकार का इरादा शायद यह है कि आखिर के बचे कुछ महीनों में काम में तेजी लाई जाए और इसी इरादे से राम सुभाग सिंह को मुख्य सचिव बनाया जा रहा है।

 

एचपीयू के कुलपति और रजिस्ट्रार हाई कोर्ट तलब

शिमला।। हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी के कुलपति और रजिस्ट्रार को हिमाचल हाई कोर्ट ने एक मामले में कोर्ट के समक्ष पेश होने के आदेश दिए हैं। यह मामला जवाहर लाल नेहरू कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स शिमला में सुविधाओं और बुनियादी ढांचे की कमी से संबंधित है। दोनों को नौ अगस्त को कोर्ट में तलब किया गया है।

जेएलएन कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स शिमला के छात्रों ने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा था। इस पत्र को स्वतः संज्ञान लेने वाली याचिका मानकर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवि मलिमठ और न्यायमूर्ति ज्योत्सना रिवाल दुआ की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान यह आदेश पारित किए हैं।

पत्र में आरोप लगाया है कि प्रदेश सरकार ने मई 2015 में गवर्नमेंट कॉलेज चौड़ा मैदान शिमला के पांच कमरों में जवाहर लाल नेहरू कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स शुरू किया। इस कॉलेज में लगभग 143 छात्र बीएफए की पढ़ाई कर रहे हैं। छात्रों ने आरोप लगाया है कि कॉलेज में अनुभवी शिक्षक, बुनियादी ढांचा यानी प्रयोगशालाएं, कार्यशालाएं आदि नहीं हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि शिमला के पास ही कॉलेज को पर्याप्त जमीन दी गई है। लेकिन ऐसा लगता है कि कॉलेज अथॉरिटी यहां कॉलेज को स्थानांतरित करने की इच्छुक नहीं है।

वीरभद्र सिंह के खिलाफ सीबीआई, ईडी के मामले बंद, पत्नी सहित अन्य पर चलेगा मुकदमा

नई दिल्ली।। पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के निधन के बाद उनके खिलाफ चल रही आय से अधिक संपत्ति के दो मामलों की सुनवाई बंद कर दी गई है। उनके खिलाफ 10 करोड़ रुपये की आय से अधिक संपत्ति के दो मामले चल रहे थे। सीबीआई और ईडी ने अब इन मामलों की जांच कर दी है।

राउज एवेन्यू कोर्ट की स्पेशल जज गीतांजलि गोयल के समक्ष वीरभद्र सिंह के अधिवक्ता ने उनकी मौत का मृत्यु प्रमाण पत्र पेश किया। अदालत ने उसे स्वीकार करते हुए सुनवाई बंद कर दी। लेकिन वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ मामले जारी रहेंगे।

बता दें कि सीबीआई द्वारा दर्ज मामलों में साक्ष्य दर्ज करने के लिए सुनवे चल रही है, जबकि ईडी द्वारा दायर मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोप तय करने के लिए सुनवाई विचाराधीन है। कांग्रेस के दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह व अन्य लोगों ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए मुकदमा लड़ने का तर्क रखा था।

सीबीआई द्वारा दायर मामले में कोर्ट ने 2019 में वीरभद्र सिंह व अन्य के खिलाफ आरोप तय किये थे।

आय से अधिक संपत्ति केस में फंसे वीरभद्र, सीबीआई ने दर्ज की प्रीलिमनेरी इन्क्वायरी

विधानसभा से बार-बार वॉकआउट का मतलब क्या है?

16 मार्च 2018 को प्रकाशित इस लेख को आज फिर से शेयर किया जा रहा है। कल मॉनसून सत्र के दूसरे दिन विपक्ष ने मंडी के सांसद की मौत की सीबीआई जांच की मांग लेकर वॉकआउट कर दिया था, आज बुधवार को बेरोजगारी और आउटसोर्स पर भर्तियों के विरोध में वॉकआउट कर दिया

आई.एस. ठाकुर।। पिछली सरकार के दौरान जब प्रेम कुमार धूमल नेता प्रतिपक्ष थे, तब बीजेपी के विधायक आए दिन विधानसभा से वॉकआउट किया करते थे। यह बात सही है कि वॉकआउट करना भी विरोध जताने का एक तरीका है। मगर जिस तरह से संसद और विधानसभाओं में विपक्ष में रहते हुए बात-बात पर वॉकआउट करते हैं, उसकी समीक्षा किए जाने की जरूरत है। क्या वॉकआउट करना वाकई इतना जरूरी था? क्या मुद्दा इतना महत्वपूर्ण था कि सरकार सदन में आपकी नहीं सुन रही तो आप बाहर आकर मीडिया के सामने बात रखें ताकि जनता को आपके रुख का पता चले।

मगर आजकल देखने को मिल रहा है कि कमजोर हो चुके विपक्ष ने वॉकआउट को रवायत बना लिया है और ऐसा लगता है कि सदन में बहस करने के बजाय बाहर आकर हो हल्ला करने का मकसद एक ही है, मीडिया का ध्यान खींचकर अगेल दिन सुर्खियां बटोरना- विपक्ष ने किया वॉकआउट। क्या इस वॉकआउट का मकसद वाकई जनता की समस्याओं को उठाना है? मेरा विचार है- नहीं।

जिस तरह से पहले जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब विपक्ष के बीजेपी विधायक आए दिन विरोध स्वरूप वॉकआउट किया करते थे। उस समय मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और संसदीय कार्य मंत्री मुकेश अग्निहोत्री विपक्षी विधायकों को कायदे में रहने की हिदायत दिया करते थे और कहते थे कि भाजपा ने वॉकआउट करने को अपना पेशा बना लिया है (यहां क्लिक करके पढ़ें)। यह भी कहा था कि भाजपा नहीं चाहती की सदन चले (यहां पढ़ें)।

जिस समय वीरभद्र ऐसा कहते थे, मैं उनसे सहमत होता था। सही बात थी, यह क्या तरीका हुआ कि सदन में बहस करने के बजाय, चर्चा के बजाय आप सदन से बाहर जाकर हंगामा करो। लेकिन अफसोस, सत्ता में बैठकर ज्ञान बांटने वाले आज विपक्ष में आकर खुद वही कर रहे हैं, जैसा न करने की हिदायत वह विपक्ष को दिया करते थे।

जबसे सरकार बनी है, तब से एक नहीं, कई बार विपक्ष वॉकआउट कर चुका है। आज की बात करें तो आज भी ऐसा ही हुआ। बजट पर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के जवाब से नाखुश होकर कांग्रेस सदस्यों ने सदन में हंगामा किया। इसके बाद कांग्रेस के विधायक सदन से बाहर चले गए और बाहर सरकार के खिलाफ मीडिया के सामने जमकर नारेबाजी की।

विपक्ष ने सरकार पर बेरोजगारों के साथ धोखा करने व सदन में बजट पर जवाब देने के बजाए से दूसरी दिशा मे मोड़ने के आरोप लगाए। कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि सीएम ने बजट चर्चा के दौरान किसी भी सवाल का कोई जवाब नही दिया है। उनका कहना था कि सरकार कैसे प्रदेश के युवाओं को नौकरी देगी, बेरोजगारी को दूर करने के लिए बजट में कुछ नहीं है और सरकार ने बेरोजगारी भत्ता तक बंद कर दिया। उनका कहना था कि सदस्यों ने पूछा था कि बेरोजगारों को रोजदार देने के लिए सरकार क्या करेगी, इसका मुख्यमंत्री ने बजट भाषण में कोई जवाब नहीं दिया।

यह बात ठीक है कि बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है। मगर क्या यह दो महीनों मे ही खड़ा हो गया? क्या दो महीने पहले तक पांच साल आपकी सरकार रही, तब आप क्या कर रहे थे इस समस्या को दूर करने के लिए? बेरोजगारी का प्रतिशत पूरे देश में सबसे ज्यादा बढ़ गया हिमाचल में। तब आप ही की तो सरकार थी वीरभद्र जी? अग्निहोत्री श्रम एवं रोजगार मंत्री थे, आपने क्या किया पांच साल? आपके ऊपर तो बीजेपी ने सारा फंड अपने इलाके हरोली पर खर्च कर देने का आरोप लगा दिया था।

हिमाचल के राजनेताओं को आदत हो गई है। सत्ता में हो तो समस्याओं को हल करने के लिए कोई गंभीर कदम मत उठाओ और विपक्ष में आते ही उन्हीं समस्याओं को लेकर हो-हल्ला मचाओ, हाहाकार करो, वॉकआउट करो, मानो उनका राज स्वर्णिम काल था और वहां ये समस्याएं थी ही नहीं।

विधायकों का फर्ज क्या है?
सत्ता में बैठे हों या विपक्ष में बैठे हों, विधायक तो जनप्रतिनिधि हैं और उन्हें जनता ने अपनी और प्रदेश की समस्याओं को हल करने के लिए चुना है। खेमों में बंटकर एक-दूसरे की टांग खींचने के लिए नहीं। विरोध करने के लिए विरोध करने के बजाय एक-दूसरे का सहयोग करके मिल-जुलकर समस्याओं का समाधान निकालें। विपक्ष का काम आलोचना करना ही नहीं, सुझाव देना भी है।

और अगर आपको लगता है कि अखबार के फ्रंट पेज पर वॉकाउट करके नारेबाजी करती तस्वीर छपने से लोग आपकी तारीफ करते होंगे या फिर शाम के बुलेटिन में क्लिप और बाइट देखकर लोग आपको अपना हितैषी समझते होंगे तो आप गलतफहमी में हैं। जनता समझदार हो चुकी है, वह सब समझती है। अगर वॉकआउट से राजनीतिक माहौल बनता होता और जीतने की संभावनाएं बनती तो पिछली सरकार के दौरान विपक्षी विधायकों का नेतृत्व करते हुए वॉकाउट करने वाला आज जीता भी होता और मुख्यमंत्री भी होता। ऐसा हुआ क्या?

(लेखक लंबे समय से इन हिमाचल के लिए लिख रहे हैं, उनसे kalamkasipahi @gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

बादल फटने का पूर्वानुमान लगाने वाला उपकरण बनाने की तैयारी

कुल्लू।। एक संस्थान ने दावा किया है कि वो दो साल के अंदर ऐसा उपकरण विकसित करेगा, जिससे यह पता लगाया जा सकेगा कि बादल कहां फट सकता है। जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान ने बताया है कि वह ऐसा यंत्र बनाने की दिशा में काम कर रहा है ताकि भारी बारिश से होने वाले नुकसान से बचा जा सके।

संस्थान का दावा है कि वह दो साल में ऐसा यंत्र बना लेगा, जिससे बादल फटने की घटनाओं का पता 48 घंटे पहले ही चल जाएगा। बादल फटना वास्तव में एक ही जगह पर कम समय में बहुत ज्यादा बारिश होने के कहा जाता है।

इस प्रोजेक्ट पर जीबी पंत संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. रेणुलता, सीएसईआर से डॉ. केसी गौड़ा, डॉ. जीएन महापात्रा, शोधार्थी शायन्ता घोष, रजत ठाकुर काम कर रहे हैं। इसमें सीएसईआर बंगलूरू के आधुनिक तकनीक वाले सुपर कंप्यूटर की भी मदद ली जाएगी।

इस बारे जीबी पंत हिमालयी पर्यावरण संस्थान, मौहल के वैज्ञानिक राकेश कुमार ने बताया कि कुल्लू में वैज्ञानिकों की ओर से एक ऐसा यंत्र बनाया जाएगा। दो साल में यह यंत्र बना लिया जाएगा। इससे हर गांव का एकदम सही तापमान और बारिश का पूर्वानुमान लगाया जा सकेगा। इसके अंतर्गत बादल फटने जैसी घटनाओं का पूर्वानुमान भी लग पाएगा।

कुल्लू जिले में बादल फटने और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं। कुल्लू-मनाली में बरसात हर साल तबाही का मंजर लेकर आती है। हर साल यहां कई लोगों की जानें चली जाती हैं। करोड़ों की संपत्ति को नुकसान हो रहा है। जिला में हर साल बादल फटने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं, जो चिंता का विषय है।

आसान शब्दों मे जानें, आखिर ‘बादल फटना’ होता क्या है

डॉक्टर परमार न होते आप हिमाचल में नहीं, पंजाब में होते

हिमाचल प्रदेश की कहानी का आगाज हुआ था जनवरी 1947 में। राजा दुर्गाचंद (बघाट) की अध्यक्षता में शिमला हिल्स स्टेट्स यूनियन की स्थापना की गई। इसका सम्मेलन जनवरी 1948 में सोलन में हुआ। इसी सम्मेलन में हिमाचल प्रदेश के निर्माण की घोषणा की गई। दूसरी तरफ प्रजा-मंडल के नेताओं का शिमला में सम्मेलन हुआ, जिसमें डॉ. यशवंत सिंह परमार ने इस बात पर जोर दिया कि हिमाचल प्रदेश का निर्माण तभी संभव है, जब प्रदेश की जनता तथा राज्य के हाथों में शक्ति सौंप दी जाए। शिवानंद रमौल की अध्यक्षता में हिमालयन प्लांट गर्वनमेंट की स्थापना की गई, जिसका मुख्यालय शिमला में था।

दो मार्च, 1948 ई. को शिमला हिल्स स्टेट्स के राजाओं का सम्मेलन दिल्ली में हुआ। राजाओं की अगुवाई मंडी के राजा जोगिंदर सेन कर रहे थे। इन राजाओं ने हिमाचल प्रदेश में शामिल होने के लिए 8 मार्च 1948 को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस तरह 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश राज्य का निर्माण किया गया।

मंडी, महासू, चंबा और सिरमौर चार जिलों में बांटकर प्रशासनिक कार्यभार एक मुख्य आयुक्त को सौंपा गया। बाद में इसे ‘ग’ वर्ग का राज्य बनाया गया। भाखड़ा-बांध परियोजना का कार्य चलने के कारण राजा आनन्द चंद के अधीन बिलासपुर रियासत को अलग प्रदेश के रूप रखा गया था। एक जुलाई, 1954 को कहलूर रियासत को हिमाचल प्रदेश में शामिल करके प्रदेश का पांचवां जिला बिलासपुर नाम से बनाया गया। एक मई, 1960 को छठे जिले के रूप में किन्नौर का निर्माण किया गया। इसमें महासू जिले की चीनी तहसील तथा रामपुर तहसील के 14 गांव शामिल किए गये।

कांगड़ा, कुल्लू, लाहौल, स्पीति, शिमला आदि अभी भी पंजाब में थे। 1965 में हिमाचल तथा पंजाब के पर्वतीय क्षेत्रों का एकीकरण करते हुए पंजाब राज्य पुनर्गठन का प्रस्ताव लाया गया लेकिन पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरों किसी भी दशा में पंजाब के पर्वतीय क्षेत्र को हिमाचल में शामिल किये जाने के विरुद्ध थे। कैरों हिमाचल को पंजाब में मिलाकर महापंजाब या विशाल पंजाब (ग्रेटर पंजाब) बनाना चाहते थे। उनकी इस अव्यावहारिक सोच तथा घोर विरोध के कारण डॉ. परमार और कैरों के बीच काफी कड़वाहट आ गई थी।

आखिरकार पंजाब राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1 नवंबर, 1966 को पंजाब राज्य का पुनर्गठन हुआ। इसके बाद पंजाब के कांगड़ा, कुल्लू, शिमला और लाहौल-स्पीति जिलों के साथ ही अंबाला जिले का नालागढ़ उप-मंडल, जिला होशियारपुर की ऊना तहसील का कुछ भाग और जिला गुरुदासपुर के डलहौजी व बकलोह क्षेत्र को हिमाचल में शामिल कर दिया गया।

इसके बाद शुरू हुआ भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों से बनी ‘पहाड़ी एकीकरण समिति के ध्वज तले हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का अभियान जिसका नेतृत्व डॉ. परमार ने किया। फिर जुलाई 1970 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की घोषणा की और दिसंबर 1970 को संसद ने इस आशय का बिल पारित कर दिया। इस तरह से हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा 25 जनवरी 1971 को मिला। हिमाचल को भारत का अठारहवां राज्य घोषित किया गया।

1 नवम्बर 1972 को कांगड़ा जिले को विभाजित कर तीन नए जिले कांगड़ा, ऊना और हमीरपुर बना दिए गए। महासू जिले को विभाजित कर सोलन और शिमला बनाये गए। इस तरह से आधुनिक हिमाचल अपने रूप में आया। डाक्टर परमार कांगड़ा की तहसीलों उना और हमीरपुर को अलग-अलग छोटे जिले बनाने के समर्थन में नहीं थे। वह इन दोनों को मिलाकर शिवालिक के नाम से एक जिला बनांना चाहते थे जिसका हेडक्वॉर्टर बड़सर होता। मगर निचले हिमाचल के नेताओं के दबाब के चलते वह अपनी इस सोच को सिरे नहीं चढ़ा पाए।

हिमाचल प्रदेश बहुत पहले ही अलग राज्य बन गया और इस वजह से आज तरक्की की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। उत्तराखंड को यह सुख मिलने में बहुत देर लग गई। डॉक्टर परमार की कोशिश आज के उत्तराखंड के हिस्सों को भी मिलाकर पहाड़ी राज्य बनाने की थी। उनका यह सपना तो पूरा नहीं हो पाया मगर आज भी उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन करने वाले डॉक्टर परमार का नाम बड़ी इज्जत से लेते हैं। डॉक्टर परमार को उत्तराखंड में विशेष सम्मान प्राप्त है।

(संकलन: आशीष नड्डा)

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हिमाचल में फिर बढ़ने लगे कोरोना के एक्टिव केस

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में एक बार फिर कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। राज्य में एक हफ्ते से कोरोना के नए केस बढ़ रहे हैं। इसे थर्ड वेव के संकेत माना जा रहा है, क्योंकि दूसरी वेव के दौरान भी ऐसे ही संकेत मिले थे।

पिछले एक हफ्ते में कोरोना के 1308 नए पॉजिटिव केस आए हैं। 25 जुलाई को हिमाचल में 841 एक्टिव केस रह गए थे। 26 जुलाई को यह बढ़कर 858 हुए और तब से लेकर अब तक यह लगातार बढ़ रहे हैं। सोमवार को प्रदेश में कोरोना के 208 नए मामले आये, जबकि 132 रिकवर हुए हैं।

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ऐसे में देखें तो पिछले एक हफ्ते दिनों में कोरोना के नए केस ज्यादा हैं, जबकि रिकवर केस कम हैं। जो कि गंभीर संकेत हैं। राज्य के दो जिले मंडी और चंबा लगातार कोरोना संक्रमण के बढ़ने के प्रमाण दे रहे हैं।

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स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी साप्ताहिक समीक्षा में भी पता चला है कि पिछले हफ्ते 26 जुलाई से एक अगस्त 2021 तक कुल 86548 लोगों के कोविड टेस्ट किए गए। इनमें से 1100 व्यक्ति पॉजिटिव पाए गए हैं। राज्य में पिछले हफ्ते कोविड पॉजिटिविटी दर 1.3 प्रतिशत दर्ज की गई है। इसमें कुछ वृद्धि हुई है।

छिड़काव किसका करें, कैसे करें और कहां पर करें, कहां नहीं

सीटू-सीपीएम नेताओं पर आउटसोर्स कर्मचारियों से ठगी का आरोप

हमीरपुर।। मजदूरों के हकों की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाली सीटू और सीपीएम के नेताओं पर आउटसोर्स कर्मचारियों के साथ ठगी करने के गंभीर आरोप लगे हैं। पूर्व में सीपीएम के नेता रहे अनिल मनकोटिया ने यह आरोप लगाए हैं। इस संबंध में उन्होंने एसपी हमीरपुर को एक शिकायत पत्र सौंपकर निष्पक्ष जांच की मांग की है।

मनकोटिया ने कहा कि सीपीएम के नेताओं ने आउटसोर्स कर्मचारियों को रेगुलर करने और कोर्ट में उनके लिए केस लड़ने की बात कहकर कर्मचारियों से लाखों रुपयों की ठगी की है। उन्होंने कहा कि सीटू और सीपीएम के वरिष्ठ नेताओं को भी इस मामले जानकारी थी, बावजूद इसके कोई कार्रवाई नहीं हुई।

आरोपों के मुताबिक 300 से अधिक कर्मचारियों के साथ लाखों रुपयों की ठगी हुई है। कर्मचारियों को नियमित करने का झांसा देकर एक-एक कर्मचारी से 50 हज़ार से एक लाख रुपये तक वसूलने के आरोप हैं।

बता दें कि सीटू के राष्ट्रीय सचिव व सीपीएम के वरिष्ठ नेता डॉ कश्मीर सिंह ठाकुर पहले ही अनिल मनकोटिया के खिलाफ पुलिस को शिकायत सौंप चुके हैं।

अनिल मनकोटिया कई सालों तक संगठन के अहम पदों पर रहने के अलावा दो बार विधानसभा चुनावों में सीपीएम के प्रत्याशी रह चुके हैं। 2020 में उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। मनकोटिया का यह भी कहना है कि उन्होंने जब इस मामले पर सवाल उठाए तो उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।