विधानसभा से बार-बार वॉकआउट का मतलब क्या है?

16 मार्च 2018 को प्रकाशित इस लेख को आज फिर से शेयर किया जा रहा है। कल मॉनसून सत्र के दूसरे दिन विपक्ष ने मंडी के सांसद की मौत की सीबीआई जांच की मांग लेकर वॉकआउट कर दिया था, आज बुधवार को बेरोजगारी और आउटसोर्स पर भर्तियों के विरोध में वॉकआउट कर दिया

आई.एस. ठाकुर।। पिछली सरकार के दौरान जब प्रेम कुमार धूमल नेता प्रतिपक्ष थे, तब बीजेपी के विधायक आए दिन विधानसभा से वॉकआउट किया करते थे। यह बात सही है कि वॉकआउट करना भी विरोध जताने का एक तरीका है। मगर जिस तरह से संसद और विधानसभाओं में विपक्ष में रहते हुए बात-बात पर वॉकआउट करते हैं, उसकी समीक्षा किए जाने की जरूरत है। क्या वॉकआउट करना वाकई इतना जरूरी था? क्या मुद्दा इतना महत्वपूर्ण था कि सरकार सदन में आपकी नहीं सुन रही तो आप बाहर आकर मीडिया के सामने बात रखें ताकि जनता को आपके रुख का पता चले।

मगर आजकल देखने को मिल रहा है कि कमजोर हो चुके विपक्ष ने वॉकआउट को रवायत बना लिया है और ऐसा लगता है कि सदन में बहस करने के बजाय बाहर आकर हो हल्ला करने का मकसद एक ही है, मीडिया का ध्यान खींचकर अगेल दिन सुर्खियां बटोरना- विपक्ष ने किया वॉकआउट। क्या इस वॉकआउट का मकसद वाकई जनता की समस्याओं को उठाना है? मेरा विचार है- नहीं।

जिस तरह से पहले जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब विपक्ष के बीजेपी विधायक आए दिन विरोध स्वरूप वॉकआउट किया करते थे। उस समय मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और संसदीय कार्य मंत्री मुकेश अग्निहोत्री विपक्षी विधायकों को कायदे में रहने की हिदायत दिया करते थे और कहते थे कि भाजपा ने वॉकआउट करने को अपना पेशा बना लिया है (यहां क्लिक करके पढ़ें)। यह भी कहा था कि भाजपा नहीं चाहती की सदन चले (यहां पढ़ें)।

जिस समय वीरभद्र ऐसा कहते थे, मैं उनसे सहमत होता था। सही बात थी, यह क्या तरीका हुआ कि सदन में बहस करने के बजाय, चर्चा के बजाय आप सदन से बाहर जाकर हंगामा करो। लेकिन अफसोस, सत्ता में बैठकर ज्ञान बांटने वाले आज विपक्ष में आकर खुद वही कर रहे हैं, जैसा न करने की हिदायत वह विपक्ष को दिया करते थे।

जबसे सरकार बनी है, तब से एक नहीं, कई बार विपक्ष वॉकआउट कर चुका है। आज की बात करें तो आज भी ऐसा ही हुआ। बजट पर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के जवाब से नाखुश होकर कांग्रेस सदस्यों ने सदन में हंगामा किया। इसके बाद कांग्रेस के विधायक सदन से बाहर चले गए और बाहर सरकार के खिलाफ मीडिया के सामने जमकर नारेबाजी की।

विपक्ष ने सरकार पर बेरोजगारों के साथ धोखा करने व सदन में बजट पर जवाब देने के बजाए से दूसरी दिशा मे मोड़ने के आरोप लगाए। कांग्रेस विधायक दल के नेता मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि सीएम ने बजट चर्चा के दौरान किसी भी सवाल का कोई जवाब नही दिया है। उनका कहना था कि सरकार कैसे प्रदेश के युवाओं को नौकरी देगी, बेरोजगारी को दूर करने के लिए बजट में कुछ नहीं है और सरकार ने बेरोजगारी भत्ता तक बंद कर दिया। उनका कहना था कि सदस्यों ने पूछा था कि बेरोजगारों को रोजदार देने के लिए सरकार क्या करेगी, इसका मुख्यमंत्री ने बजट भाषण में कोई जवाब नहीं दिया।

यह बात ठीक है कि बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है। मगर क्या यह दो महीनों मे ही खड़ा हो गया? क्या दो महीने पहले तक पांच साल आपकी सरकार रही, तब आप क्या कर रहे थे इस समस्या को दूर करने के लिए? बेरोजगारी का प्रतिशत पूरे देश में सबसे ज्यादा बढ़ गया हिमाचल में। तब आप ही की तो सरकार थी वीरभद्र जी? अग्निहोत्री श्रम एवं रोजगार मंत्री थे, आपने क्या किया पांच साल? आपके ऊपर तो बीजेपी ने सारा फंड अपने इलाके हरोली पर खर्च कर देने का आरोप लगा दिया था।

हिमाचल के राजनेताओं को आदत हो गई है। सत्ता में हो तो समस्याओं को हल करने के लिए कोई गंभीर कदम मत उठाओ और विपक्ष में आते ही उन्हीं समस्याओं को लेकर हो-हल्ला मचाओ, हाहाकार करो, वॉकआउट करो, मानो उनका राज स्वर्णिम काल था और वहां ये समस्याएं थी ही नहीं।

विधायकों का फर्ज क्या है?
सत्ता में बैठे हों या विपक्ष में बैठे हों, विधायक तो जनप्रतिनिधि हैं और उन्हें जनता ने अपनी और प्रदेश की समस्याओं को हल करने के लिए चुना है। खेमों में बंटकर एक-दूसरे की टांग खींचने के लिए नहीं। विरोध करने के लिए विरोध करने के बजाय एक-दूसरे का सहयोग करके मिल-जुलकर समस्याओं का समाधान निकालें। विपक्ष का काम आलोचना करना ही नहीं, सुझाव देना भी है।

और अगर आपको लगता है कि अखबार के फ्रंट पेज पर वॉकाउट करके नारेबाजी करती तस्वीर छपने से लोग आपकी तारीफ करते होंगे या फिर शाम के बुलेटिन में क्लिप और बाइट देखकर लोग आपको अपना हितैषी समझते होंगे तो आप गलतफहमी में हैं। जनता समझदार हो चुकी है, वह सब समझती है। अगर वॉकआउट से राजनीतिक माहौल बनता होता और जीतने की संभावनाएं बनती तो पिछली सरकार के दौरान विपक्षी विधायकों का नेतृत्व करते हुए वॉकाउट करने वाला आज जीता भी होता और मुख्यमंत्री भी होता। ऐसा हुआ क्या?

(लेखक लंबे समय से इन हिमाचल के लिए लिख रहे हैं, उनसे kalamkasipahi @gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

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