प्रतिभा सिंह वाले ऑडियो टेप की जांच करवाए सरकार: आश्रय शर्मा

मंडी।। कांग्रेस नेता आश्रय शर्मा ने मांग की है कि मंडी लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी प्रतिभा सिंह के उस ऑडियो टेप की जांच होनी चाहिए जिसमें कथित तौर पर पैसों के लेन-लेन की बात की जा रही है। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव आश्रय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि वह इस संबंध में विक्रमादित्य सिंह की मांग का समर्थन करते हैं।

आश्रय ने कहा कि इस बात का पता लगाया जाए कि किसने ऑडियो को वायरल करके प्रतिभा सिंह और दिवंगत वीरभद्र सिंह की छवि को खराब करने की साजिश रची। आश्रय ने प्रदेश सरकार से इस प्रकरण की जांच उच्च स्तरीय जांच एजेंसियों से करवाने की मांग करते हुए कहा, “जिन लोगों ने इस हरकत को अंजाम दिया है उनका भी पर्दाफाश होना चाहिए।”

कांग्रेस महासचिव ने कहा, “ऑडियो क्लिप में हिमाचल के संसाधनों को बेचने की बातें भी सुनाई पड़ रही हैं। ऐसे में इस बात की जांच भी होनी चाहिए कि क्या हिमाचल के संसाधनों को बेचा गया है। प्रदेश में चाहे किसी भी दल की सरकार हो प्रदेश के संसाधनों को बेचने का अधिकार किसी को भी नहीं है।”

आश्रय ने कहा कि प्रदेश सरकार घटनाक्रम को हल्के में न लेकर उच्च स्तरीय जांच करवाए। उन्होंने कहा, “प्रदेश के करदाताओं और प्रबुद्ध लोगों को इस बात को जानने का अधिकार है। मामले में सरकार समय रहते उच्च स्तरीय जांच करवाए।”

केंद्र से नहीं आया पैसा, तीन महीने से नहीं मिली मनरेगा की दिहाड़ी

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में मनरेगा के तहत काम करने वालों को करीब तीन महीनों से मेहनताना नहीं मिला है। ऐसी जानकारी है कि केंद्र सरकार ने करीब 200 करोड़ रुपये का बजट रोका है जिस कारण लेबर के साथ मटीरियल का भी बजट नहीं आया है। इस वजह से कुछ जगहों पर तीन महीने से भुगतान नहीं हो पाया है।

इस स्थिति के कारण आम लोग तो परेशान हो ही रहे हैं, देरी से भुगतान करने पर राज्य सरकार को ब्याज भी देना होगा। मनरेगा एक्ट में लिखा है कि अगर 15 दिनों के अंदर भुगतान नहीं किया गया तो बाद में ब्याज सहित रकम देनी होगी।

इस संबंध में हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण विकास विभाग के निदेशक ऋग्वेद मिलिंद ठाकुर का कहना है कि लक्ष्य से अधिक काम होने के कारण मनरेगा के भुगतान में देरी हो रही है। उन्होंने कहा कि इस मामले को केंद्र के सामने उठाया गया है और उम्मीद है कि जल्द ही इसका कोई हल निकल आएगा।

नशा न किया जाए तो इंसान के लिए कुदरत का वरदान है भांग

इन हिमाचल डेस्क।। इस बात में कोई शक नहीं है कि भांग, चरस या गांजे की लत शरीर को नुकसान पहुंचाती है. लेकिन इसकी सही डोज कई बीमारियों से बचा सकती है. इसकी पुष्टि विज्ञान भी कर चुका है.

ध्यान रहे, डोज का मतलब नशे की डोज नहीं बल्कि डॉक्टर की सलाह और देखरेख में ली जाने वाले भांग के औषधीय स्वरूप से है। इसलिए नशेड़ी भांग के औषधीय फायदों को अपने बचाव में या अपनी लत को जस्टिफाइ करने में न गिनाएं। वैसे भी भारत में भांग अभी औषधीय उद्देश्य से इस्तेमाल नहीं की जा रही और न ही आप किसी बीमारी के इलाज के लिए भांग के उत्पादों का सेवन कर रहे हैं।

तो डालिए एक नजर शोध से पता चले भांग के 10 फायदों पर-

1. मिर्गी से बचाव
2013 में वर्जीनिया की कॉमनवेल्थ यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने यह साबित किया कि गांजे में मिलने वाले तत्व एपिलेप्सी अटैक को टाल सकते हैं. यह शोध साइंस पत्रिका में भी छपा. रिपोर्ट के मुताबिक कैनाबिनॉएड्स कंपाउंड इंसान को शांति का अहसास देने वाले मस्तिष्क के हिस्से की कोशिकाओं को जोड़ते हैं.

2. ग्लूकोमा में राहत
अमेरिका के नेशनल आई इंस्टीट्यूट के मुताबिक भांग ग्लूकोमा के लक्षण खत्म करती है. इस बीमारी में आंख का तारा बड़ा हो जाता है और दृष्टि से जुड़ी तंत्रिकाओं को दबाने लगता है. इससे नजर की समस्या आती है. गांजा ऑप्टिक नर्व से दबाव हटाता है.

3. अल्जाइमर के खिलाफ
अल्जाइमर से जुड़ी पत्रिका में छपे शोध के मुताबिक भांग के पौधे में मिलने वाले टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल की छोटी खुराक एमिलॉयड के विकास को धीमा करती है. एमिलॉयड मस्तिष्क की कोशिकाओं को मारता है और अल्जाइमर के लिए जिम्मेदार होता है. रिसर्च के दौरान भांग का तेल इस्तेमाल किया गया.

4. कैंसर पर असर
2015 में आखिरकार अमेरिकी सरकार ने माना कि भांग कैंसर से लड़ने में सक्षम है. अमेरिका की सरकारी वेबसाइट cancer.org के मुताबिक कैनाबिनॉएड्स तत्व कैंसर कोशिकाओं को मारने में सक्षम हैं. यह ट्यूमर के विकास के लिए जरूरी रक्त कोशिकाओं को रोक देते हैं. कैनाबिनॉएड्स से कोलन कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर और लिवर कैंसर का सफल इलाज होता है.

5. कीमोथैरेपी में कारगर
कई शोधों में यह साफ हो चुका है कि भांग के सही इस्तेमाल से कीमथोरैपी के साइड इफेक्ट्स जैसे, नाक बहना, उल्टी और भूख न लगना दूर होते हैं. अमेरिका में दवाओं को मंजूरी देने वाली एजेंसी एफडीए ने कई साल पहले ही कीमोथैरेपी ले रहे कैंसर के मरीजों को कैनाबिनॉएड्स वाली दवाएं देने की मंजूरी दे दी है.

 

6. प्रतिरोधी तंत्र की बीमारियों से राहत
कभी कभार हमारा प्रतिरोधी तंत्र रोगों से लड़ते हुए स्वस्थ कोशिकाओं को भी मारने लगता है. इससे अंगों में इंफेक्शन फैल जाता है. इसे ऑटोएम्यून बीमारी कहते हैं. 2014 में साउथ कैरोलाइना यूनिवर्सिटी ने यह साबित किया कि भांग में मिलने वाला टीएचसी, संक्रमण फैलाने के लिए जिम्मेदार मॉलिक्यूल का डीएनए बदल देता है. तब से ऑटोएम्यून के मरीजों को भांग की खुराक दी जाती है.

7. दिमाग की रक्षा
नॉटिंगम यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों ने साबित किया है कि भांग स्ट्रोक की स्थिति में मस्तिष्क को नुकसान से बचाती है. भांग स्ट्रोक के असर को दिमाग के कुछ ही हिस्सों में सीमित कर देती है.

8. एमएस से बचाव
मल्टीपल स्क्लेरोसिस भी प्रतिरोधी तंत्र की गड़बड़ी से होने वाली बीमारी है. फिलहाल यह असाध्य है. इसके मरीजों में नसों को सुरक्षा देने वाली फैटी लेयर क्षतिग्रस्त हो जाती है. धीरे धीरे नसें कड़ी होने लगती हैं और बेतहाशा दर्द होने लगता है. कनाडा की मेडिकल एसोसिएशन के मुताबिक भांग एमएस के रोगियों को गश खाने से बचा सकती है.

9.दर्द निवारक
शुगर से पीड़ित ज्यादातर लोगों के हाथ या पैरों की तंत्रिकाएं नुकसान झेलती हैं. इससे बदन के कुछ हिस्से में जलन का अनुभव होता है. कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की रिसर्च में पता चला कि इससे नर्व डैमेज होने से उठने वाले दर्द में भांग आराम देती है. हालांकि अमेरिका के एफडीए ने शुगर के रोगियों को अभी तक भांग थेरेपी की इजाजत नहीं दी है.

10. हैपेटाइटिस सी के साइड इफेक्ट से आराम
थकान, नाक बहना, मांसपेशियों में दर्द, भूख न लगना और अवसाद, ये हैपेटाइटिस सी के इलाज में सामने आने वाले साइड इफेक्ट हैं. यूरोपियन जरनल ऑफ गैस्ट्रोलॉजी एंड हेपाटोलॉजी के मुताबिक भांग की मदद से 86 फीसदी मरीज हैपेटाइटिस सी का इलाज पूरा करवा सके. माना गया कि भांग ने साइड इफेक्ट्स को कम किया.

स्रोत: DW

हिमाचल को मालामाल कर सकती हैं इंडस्ट्रियल भांग की खेती

‘बूटी’ को लेकर आखिर क्यों बदल रही है पूरी दुनिया की सोच

पूरी दुनिया का नज़रिया भांग को लेकर बदल रहा है। लातिन अमरीकी देश मेक्सिको में हाल ही में नई सरकार बनी है और वह भांग को मनोविनोद यानी मस्ती के उद्देश्य से इस्तेमाल करने लिए कानूनी रूप से वैध करने की योजना बना रही है। ऐसा ही लक्समबर्ग की सरकार भी कर रही है। न्यूजीलैंड में तो नेता चाह रहे हैं कि भांग का इस्तेमाल किस तरह से होना चाहिए, इसके लिए जनमतसंग्रह करवाया जाए।

जनता और उनकी सरकारों के बदलते नजरिए के बीच ऐसी संभावना दिख रही है कि अन्य देश भी इसी रास्ते पर बढ़ेंगे। लेकिन सवाल उठ रहे हैं कि वे भांग की सप्लाई और इसके इस्तेमाल का प्रबंधन कैसे करेंगे? सवाल यह भी उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है कि कई देश भांग से जुड़े कानूनों को बदल रहे हैं? कई देशों ने तो इसे कानूनी रूप से वैधता दे दी है।

शुरुआत कहां से हुई
साल 2012 में उरुग्वे ने एलान किया था कि वह दुनिया का पहला ऐसा देश बनने जा रहा है जहां भांग का इस्तेमाल वैध होगा। यह कदम इसलिए उठाया गया था कि ताकि वहां पर भांग के कारोबार से जुड़े संगठित अपराधों की कड़ियां तोड़ी जा सकें और इसके कारोबार को सरकारी नियमों के तहत लाकर जवाबदेही तय की जा सके।

इसी साल बाद में वॉशिंगटन और कोलोराडो राज्य अमरीका के शुरुआती ऐसे राज्य बने जिन्होंने भांग को दवा के उद्देश्य से इस्तेमाल किए जाने के अलावा भी अन्य कामों में इस्तेमाल करने को कानूनी इजाजत दी।

पश्चिमी देशों का नजरिया बदल रहा है

जिस समय बराक ओबामा अमरीका के राष्ट्रपति थे, अमरीकी सरकार ने भांग को लेकर संघीय कानून लागू करने में नरमी बरती थी और राज्यों को विकल्प तलाशने की हरी झंडी दिखा दी थी। वॉशिंगटन डीसी और अन्य आठ राज्यों ने मनोविनोद के लिए भांग के इस्तेमाल को वैध करने का समर्थऩ किया है और अन्य राज्यों में इसके इस्तेमाल पर बरती जाने वाली सख्ती भी कम हुई है। वहीं 50 में से 33 राज्यों में मेडिकल उद्देश्यों के लिए दवा के रूप में भांग का इस्तेमाल वैध है।

कहां-कहां नरम पड़ी हैं सरकारें

  • अमरीका के पड़ोसी देश कनाडा ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए इसी साल अक्तूबर में पूरे देश में मनोरंजन के मकसद से भांग रखना, खरीदना और बेचना कानूनन वैध कर दिया।
  • अब अमरीका का दूसरा पड़ोसी देश मेक्सिको भी इसी दिशा मे बढ़ता नजर आ रहा है। नए राष्ट्रपति आंद्रे मैनुएल लोपेज ओब्राडोर की सरकार ने एक विधेयक पेश किया है जिसमें भांग को मेडिकल और रीक्रिएशनल इस्तेमाल के लिए वैध करने की व्यवस्था है। यह कदम सरकार उस समय उठा रही है जब देश के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में भांग पर लगाए गए प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया था।
  • अन्य देश भी इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ब्राजील, जमैका और पुर्तगाल में हालांकि भांग की बिक्री गैरकानूनी है, मगर थोड़ी मात्रा में भांग रखना अपराध नहीं है।
  • स्पेन में निजी रूप से भांग का इस्तेमाल जायज है जबकि नीरदलैंड में कॉफी शॉप तक में खुलेआम भांग के उत्पादों की बिक्री होती है।
  • अन्य कई देशों में बदलाव हो रहे हैं। ब्रिटेन में डॉक्टरों को इजाजतहै कि वे अपने मरीजों को भांग से बने उत्पाद लेने की सलाह दे सकते हैं।
  • नवंबर से दक्षिण कोरिया ने भी कड़े नियमों के तहत मेडिकल कारणों के लिए भांग के इस्तेमाल की इजाजत दे दी है।
  • मलेशिया में एक युवक को कैनबिस ऑइल बेचने पर मौत की सजा सुनाए जाने पर भांग को लेकर बहस छिड़ी हुई है।
  • इसी तरह से दक्षिण अफ्रीका के सर्वोच्च न्यायालय ने निजी स्थानों पर व्यस्क लोगों को भांग के इस्तेमाल की इजाजत दे दी है।
  • लेसोथो पहला ऐसा अफ्रीकी देश बन गया है जहां पर मेडिकल उद्देश्यों के लिए मैरवाना की खेती लीगलाइज़ कर दी गई है।
  • लेबनान भी ऐसा ही करने पर विचार कर रहा है ताकि अपने अर्थव्यवस्था को रफ्तार दे सके।

मेडिकल यूज़ से बदली सोच

कई जगहों पर मैरवाना ऑइल से मिर्गी से जूझ रहे बच्चों को राहत मिलने का दावा किया गया है।

कई देशों में लोगों के रुख को देखते हुए भांग को वैध करने की दिशा में नरमी बरती गई है। अमरीका और कनाडा में उन बीमार बच्चों की तस्वीरों ने लोगों के दिलों में बदलाव किया, जिनके लिए और कोई दवा काम की साबित नहीं हो पाई। इससे लोगों के विचार बदले और वे मेडिकल उद्देश्यों के लिए भांग के इस्तेमाल के हिमायती हो गए। जैसे कि कई जगह मिरगी के मरीजों को कैनबिस ऑइल दिया गया।

ब्रिटेन में 12 साल के बिली काल्डवेल ने लोगों का नजरिया बदला। गंभीर रूप से मिर्गी से जूझ रहे इस बच्चे को दिया जाने वाला मेडिकल कैनबिस ऑइल जब जब्त कर लिया गया तो उसे अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा। एक महीने बाद ही  आठ साल के एल्फी डिंगले को कैनबिस ऑइल इस्तेमाल करने के लिए खास लाइसेंस दिया गया था। यह बच्चा भी मिर्गी की एक गंभीर किस्म से जूझ रहा है। इस तरह की कई कहानियां हैं।

2012 को छपी खबर के मुताबिक उस समय आठ साल के रहे फॉरेस्ट स्मेलसर को मेडिकल मैरवाना के चलते मिर्गी से राहत मिली थी। Imgae: Facebook/Tanesha Smelser

बड़े स्तर पर चले अभियानों के बाद ब्रितानी सरकार ने कानून बदला और डॉक्टरों को इजाजत दे दी कि वे मरीजों को कैनबिस के उत्पादन खाने का प्रिस्क्रिप्शन दे सकते हैं। अमरीका में कैलिफोर्निया में 1990 से 2000 के बीच मेडिकल यूज के प्रति नरमी दिखाई थी और बाद में मनोरंजन के लिए भांग के इस्तेमाल की इजाजत दे दी। मगर ब्रितानी गृह मंत्रालय कहता है कि उनके यहां मनोविनोद के लिए भांग का इस्तेमाल प्रतिबंधित ही रहेगा। हालांकि कई नेता इस मामले में नरम रुख भी रखते हैं।

मेक्सिको में भांग को लीगलाइज करने का काम इसलिए चलाया जा रहा है ताकि ड्रग्स के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान में हो रही हिंसा को कम किया जा सके। वहां भले ही ड्रग गिरोहों के कारोबार में मैरवाना की हिस्सेदारी कम है, मगर इस पर लगे प्रतिबंध ने हालात खराब कर दिए हैं। मेक्सिको ने पहले ही कहा था कि चूंकि उसकी सीमा से लगते अमरीका के राज्य कैलिफोर्निया ने इसके मनोरंजन के लिए इस्तेमाल की छूट दे दी है, ऐसे में उसके लिए कैनबिस के खिलाफ लड़ाई लड़ना मुश्किल होगा।

बाजार में हैं असीम संभावनाएं
पूरी दुनिया में जहां भांग को कानूनी मान्यता देने की तैयारियां हो रही हैं, वहीं लातिन अमरीकी देशों की सरकारें चाहती हैं कि किसान भांग उगाएं ताकि कैनबिस के उभरते हुए व्यापार पर पहले से ही उनकी पकड़ हो जाए। इस दिशा में बड़ी कंपनियों ने भी रुचि दिखाई है। उदाहरण के लिए अल्ट्रिया नाम की कंपनी, जो मार्लबोरो सिगरेट भी बनाती है, उसने कनाडा की एक कैनबिस कंपनी में निवेश किया है।

सिगरेट कंपनियां भी इस कारोबार में उतर आई हैं

अमरीका से सबक लें तो लगता है कि जहां-जहां पहले मेडिकल यूज़ के लिए इजाजत मिलेगी, बाद में वहां धीरे-धीरे भांग को मनोविनोद या मस्ती के लिए इस्तेमाल करने को लेकर भी नरमी बढ़ती जाएगी। इसकी राह में दिक्कत यही है कि मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाली भांग को देश अपने स्तर पर इधर से उधर ट्रांसपोर्ट नहीं कर सकते। उन्हें इसके लिए लाइसेंस लेना होगा और इंटरनैशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड की निगरानी मे यह काम करना होगा।

मोरक्को और जमैका में किसान भले ही कैनबिस उगाने के लिए चर्चित हैं, लेकिन मगर वे उन बाजारों में अपना माल नहीं भेज सकते, जहां इसकी जरूरत है और वह जरूरत स्थानीय सप्लायर पूरी नहीं कर पा रहे। ऐसा ही कनाडा में भी देखने को मिला, जब वहां भांग को लीगलाइज किया गया। इसकी डिमांड स्थानीय उत्पादक पूरी नहीं कर पाए।

(लंदन स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स के डॉक्टर जॉन कॉलिन्स के लेख पर आधारित)

हिमाचल को मालामाल कर सकती हैं इंडस्ट्रियल भांग की खेती

हिमाचल को मालामाल कर सकती हैं इंडस्ट्रियल भांग की खेती

हिमाचल को मालामाल कर सकती हैं इंडस्ट्रियल भांग की खेती

शिमला।। हिमाचल के पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में भांग की खेती को इजाजत मिली तो सवाल उठा कि हिमाचल में ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता। मगर चूंकि हिमाचल प्रदेश पहले से ही भांग के नशीले उत्पादों के कारण देशभर में चर्चा में है, ऐसे में यहां के बाशिंदों का सावधान होना स्वाभाविक है। लेकिन रोचक बात यह है कि उत्तराखंड ने जिस भांग की खेती की इजाजत दी है, वह अलग तरह की भांग है और उसे नशे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

नशे के लिए इस्तेमाल होने वाली भांग को अंग्रेजी में मैरवाना कहा जाता है। इसमें तथाकथित नशीले रसायनों की मात्रा ज्यादा होती है जबकि उत्तराखंड में जो भांग उगाई जा रही है और जिसे हिमाचल में भी उगाने जाने की मांग की जा रही है, वह अलग तरह की भांग है। इसे अंग्रेजी में हेम्प कहते हैं। अगर इसके पत्तों की बनावट को नजरअंदाज कर दिया जाए तो यह ठीक जूट (पटसन) जैसा पौधा है और जूट की ही तरह कई सारे इंडस्ट्रियल कामों में इस्तेमाल होता है।

हेम्प वह भांग नहीं है जो कहीं भी उग आती है। यह खास तरह की किस्म है जिसमें रेशों की भरपूर मात्रा होती है और पौधे भी ऊंचे होते हैं।

क्या है इंडस्ट्रियल हेम्प (Hemp)
यह सबसे तेजी से उगने वाले पौधों में से एक है। इंसान आज से 10 हजार साल पहले इसके रेशों को इस्तेमाल करना शुरू किया गया था। कागज बनाने, कपड़े बनाने, बायोडीग्रेडेबल प्लास्टिक, पेंट, पशुओं के लिए चारा, बायोफ्यूल और इंसुलेशन बनाने जैसे कई काम इससे किए जा सकते हैं।

हालांकि नशे या दवा के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली भांग और इंडस्ट्रियल हेम्प दोनों ही Cannabis sativa स्पीशीज से संबंध रखते हैं और दोनों में ही साइकोएक्टिव (मस्तिष्क के व्यवहार को प्रभावित करने वाला) पदार्थ टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल (THC) पाया जाता है। मगर खास बात यह है कि दोनों में कई बातें अलग हैं।

हेम्प में THC यानी दिमाग़ के व्यवहार को बदलने वाले या यूं कहें की नशीले पदार्थ की मात्रा बहुत कम होती है और कैनाबिडिऑल (CBD) की मात्रा ज्यादा होती है। कैनाबिडिऑल या CBD के कारण नशे वाला प्रभाव कम हो जाता है। हेम्प की इस तरह की प्रजातियां भी उपलब्ध हैं, जिनमें THC की मात्रा और भी कम होती है।

हेम्प की जो किस्में इंडस्ट्रियल यूज के लिए उगाई जाती है, उनमें THC (नशीले पदार्थ) की मात्रा 0.3 प्रतिशत से भी कम होती है। यही कारण है कि इन्हें चरस और गांजा बनाने में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जबकि चरस, गांजा आदि बनाने के लिए जो किस्में उगाई जाती हैं, उनमें दो प्रतिशत से लेकर 20 प्रतिशत तक THC होता है।

फायदे क्या हैं
चूंकि हेम्प को नशे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, तो सवाल उठ रहा होगा कि इसके फायदे क्या हैं? जानें, दुनिया में किन-किन कामों में इस्तेमाल हो रहा है हेम्प का-

खाने के तौर पर
खाने में यह कई तरह से इस्तेमाल किया जाता है। हेम्प के बीजों को कच्चा खाया जा सकता है, अंकुरित करके खाया जा सकता है या फिर पाउडर के रूप में खाया जा सकता है। इनमें नशा नहीं होता। हेम्प ऑइल, हेम्प मिल्क और हेम्प जूस भी बनाया जा सकता है। इसमें पोषक तत्वों की भी भरमार रहती है।

हेम्प के बीजों को खाया जा सकता है, इसके बीजों के तेल को भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

रेशों का इस्तेमाल
हेम्प के रेशों को कई तरह से इस्तेमाल किया जाता रहा है। कपड़े, पर्दे, मैट, शॉल, बोरे और जूते तक इससे बनते हैं। हेम्प के रेशों से प्लाई बोर्ड भी बनाया जा सकता है। इंसुलेशन के लिए गत्तों को इस्तेमाल किया जाता है। सीलिंग तक बनती है इसके रेशों से।

हेम्प के रेशों से बना कपड़ा

कारों में फाइबर ग्लास के साथ
हेम्प फाइबर को वाहनों में भी इस्तेमाल किया जाता है। फाइबर ग्लास के साथ इसे मिक्स करके इंटीरियर बनाए जाते हैं। ऑडी, फोर्ड, जीएम, होंडा, मर्सेडीज़, बीएमडब्ल्यू और फोक्सवागन जैसी कंपनियां इसे इस्तेमाल कर रही हैं। ये सोचिए कि एक मर्सेडीज़ कार में (सी क्लास) लगभग 20 किलो मटीरियल हेम्प का बना हुआ होता है।

हल्का और मजबूत होने के कारण इस्तेमाल किया जा रहा हेम्प

बैंकनोट का कागज
इससे कागज भी बनाया जा सकता है। फिल्टर पेपर, सिगरेट में इस्तेमाल होने वाला पेपर और कुछ देशों के बैंक नोट में भी इसे इस्तेमाल किया जाता है। मजबूती के कारण इसका चुनाव किया जाता है।

1914 में हेम्प से नोट बनाने की शुरुआत हुई थी.

गहने और जूते
हेम्प के रेशों से नेकलेस, ब्रेसलेट, चूड़ियां आदि भी बनाई जाती है। कई बार ग्लास और स्टोन की मदद भी ली जाती है।

हेम्प से बना ब्रेसलेट

इसके मजबूत रेशों से न सिर्फ सैंडल्स और फैंसी जूते बन सकते हैं बल्कि ऐथलेटिक शूज में भी इन्हें इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे कॉटन, पॉलिएस्टर आदि के साथ मिक्स किया जाता है। खास बात यह है कि इसके बने जूतों में बदबू नहीं आती। वैसे हिमाचल में भी पारंपरिक रूप से भांग के पौधों की छाल से पैरों में पहनने वाली पूलें और बिन्ने आदि बनाए जाते थे।

रस्सियां और चारा
जाहिर है, ऊपर हमने इसके रेशों की मजबूती का जिक्र किया है। इससे रस्सियां बनाई जाती हैं जो काफी मजबूत होती हैं। गायों और घोड़ों आदि को हेम्प की भूसी खिलाई जा सकती है। ठीक उसी तरह, जैसे पशुओं को गेहूं की भूसी और धान का पुआल खिलाया जाता है।

बायोफ्यूल
बायोफ्यूल या जैव ईंधन भी हेम्प के बीजों से बनाया जा सकता है। इसे कई बार हेम्पोलीन भी कह दिया जाता है। पौधे की फर्मेंटेसन करके एल्कॉहल बना दिया जाता है जिसे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे सीधे ही डीज़ल इंजन में डाला जा सकता है।

इसके अलावा हेम्प को उगाने से अन्य खरपतवार भी नहीं उगती।

पिछड़ न जाए हिमाचल
चूंकि हिमाचल के पड़ोसी राज्य उत्तराखंड ने हेम्प की खेती की शुरुआत कर दी है, यह संभव है कि वह बड़े पैमाने पर इसे उगाना शुरू करके मार्केट में कब्जा जमा ले। चूंकि भांग के पौधों की पैदावार के लिए हिमाचल प्राकृतिक रूप से आदर्श रहा है, इसलिए जाहिर है अगर हिमाचल में हेम्प की खेती की जाने लगे तो उसकी पैदावार उत्तराखंड से भी बेहतर होगी।

हिमाचल का वातावरण भांग प्रजाति के पौधों के लिए इतना अनुकूल है कि हर कहीं इसके पौधे उग जाते हैं। ऐसे में जब बिना नशे वाली हेम्प प्रजाति की वैज्ञानिक विधि से खेती की जाएगी तो उसके अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे। चूंकि बंदरों और सुअरों से भी भांग को खतरा नहीं है, इसलिए वे किसान भी अपने यहां हेम्प उगाकर अच्छी कमाई कर सकेंगे जिन्होंने खेती बंद कर दी है।

साथ ही इससे भविष्य में और भी ज्यादा संभावनाओं के द्वार खुलेंगे क्योंकि भांग के मेडिकल इस्तेमाल के लिए कई तरह के शोध हुए हैं और कई बीमारियों और डिसऑर्डर्स से लड़ने में इसके औषधीय गुण प्रभावी साबित हुए हैं। ऐसे में संभव है कि भविष्य में सरकार दवा आदि बनाने के लिए लाइसेंस्ड फार्मिंग की इजाजत देगी। ऐसा हुआ तो पहले से भांग उगाने का अनुभव रख रहे हिमाचलियों को लाभ मिलेगा।

भांग पर In Himachal की इस खास सीरीज की अगली कड़ी में बात मेडिकल कैनबिस या मेडिकल मैरवाना पर-

नशा न किया जाए तो इंसान के लिए कुदरत का वरदान है भांग

45 दिनों में सवा लाख से ज्यादा पशुओं का होगा टीकाकरण

ऊना।। हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में पशुपालन विभाग ने बड़े पैमाने पर पशुओं के टीकाकरण की योजना बनाई है। पालतू और बेसहारा पशुओं को खुर और मुंह के रोग (Foot and mouth disease or FMD) से बचाने के लिए यह अभियान चलाया जाएगा। स्थानीय भाषा में इस रोग को खुरमुंही भी कहा जाता है।

FMD बेहद संक्रामक बीमारी होती जो एक वायरस के कारण फैलती है। यह वायरस अक्सर खुर वाले जीवों को प्रभावित करता है। इससे पशुओं को तेज बुखार होता है जो दो से छह दिन तक रह सकता है। इसके साथ ही पशुओं के मुंह के अंदर और खुरों में छाले हो जाते हैं। कई बार यह बीमारी जानलेवा भी बन जाती है।

इसी को देखते हुए ऊना पशुपालन विभाग ने 3,255 पशुओं को वैक्सीन लगाई। संयुक्त निदेशक डॉक्टर सुरेश धीमान ने पत्रकारों को जानकारी दी कि एक लाख 35 हजार पशुओं को यह टीका लगना है। यह टीका न सिर्फ लोगों के पालतु पशुओं (गायों और भैंसों) को लगेगा बल्कि गोअभ्यारण्यों और अन्य स्थानों के साथ बेहसाहारा गायों आदि को भी लगाया जाएगा।

इस लक्ष्य को 45 दिनों के अंदर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

आजादी के बाद राष्ट्रवाद की भावना में कमी आई: राज्यपाल

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने कहा है कि राष्ट्रवाद की भावना स्वतंत्रता से पहले प्रखर थी मगर स्वतंत्रता के बाद इसमें कमी नजर आ रही है और इसपर आत्ममंथन होना चाहिए। सुनील उपाध्याय एजुकेशन ट्रस्ट की ओर से स्वतंत्रता के 75 वर्षों पर आयोजित सेमिनार के दौरान राज्यपाल ने यह बात कही।

सुनील उपाध्याय की पुण्य तिथि पर आयोजित कार्यक्रम में राज्यपाल ने कहा, “उनके सपनों को पूरा करने के लिए हमें आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर किसी न किसी तरह के योगदान देने की शपथ लेनी चाहिए।”

राज्यपाल ने प्रसन्नता जताई कि देश में आज उत्साह का माहौल है। उन्होंने कहा, ‘लेकिन हमें समीक्षा करनी चाहिए कि इन 75 वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया। भारत की संस्कृति हजारों सालों तक समृद्ध रही लेकिन स्वतंत्रता के बाद हमने दूसरे देशों की ओर देखना शुरू कर दिया और उनकी शैली को अपनाने लगे।”

आर्लेकर ने कहा कि यह हर किसी की जिम्मेदारी है कि इस माहौल को बदले और अपने स्तर पर योगदान दे। उन्होंने ट्रस्ट की ओर से तैयार स्मारिका को जारी किया और सात स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित किया।

इस अवसर पर मौजूद रहे शहरी विकास मंत्री सुरेश भारद्वाज ने कहा कि उपाध्याय ने समाज के लिए बड़ा योगदान दिया और हिमाचल प्रदेश में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संगठन को मजबूती से स्थापित किया।

हमीरपुर के सरकारी स्कूल में छात्र से कार धुलवाने का आरोप

हमीरपुर।। सोशल मीडिया पर हमीरपुर का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें छात्र को कार धोते देखा जा सकता है। आरोप लगाया जा रहा है कि यह वीडियो राजकीय बाल वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला हमीरपुर का है जहां पर अध्यापकों ने छात्र से कार धुलवाई। हालांकि वीडियो से स्पष्ट नहीं हो पा रहा कि छात्र कौन है और कार किसकी है। मगर यह वीडियो स्कूल परिसर का ही है।

इस संबंध में स्कूल का कहना है कि इस तरह का कोई मामला उनके ध्यान में नहीं है, फिर भी जांच की जाएगी। डेप्युटी डायरेक्टर हायर एजुकेशन ने भी कहा है कि इस मामले की जांच की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि संभव है कि ऑटोमोबाइल (वोकेशनल)  विषय वाला छात्र कार की सफाई कर रहा हो।

लंबे अरसे बाद स्कूल खोले जाने के बाद इस तरह का वीडियो सामने आने पर लोगों में गुस्सा और नाराजगी है। लोगों का कहना है कि एक तो सरकारी स्कूलों की दशा पहले से ही खराब है और ऊपर से इस तरह के वीडियो सरकारी स्कूलों और अध्यापकों की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं।

हकीकत क्या है, यह जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा।

मलाणा नहीं पहुंच पाए थे धूमल मगर की थी एक जरूरी अपील

कुल्लू।। कुल्लू का एक पुरातन गांव जो पूरी दुनिया में मशहूर है; कुछ लोगों के बीच यहां की खूबसूरती के लिए, कुछ के लिए यहां की संस्कृति और रीति-रिवाजों के लिए तो कुछ के लिए तथाकथित ‘मलाणा क्रीम’ के लिए। चरस के कारोबार के लिए मलाणा की आलोचना भी होती है तो कुछ कहते हैं कि यहां के लोगों के पास और कोई विकल्प ही नहीं है। अगर वे चरस का कारोबार नहीं करेंगे तो उनके पास और रास्ता क्या है? लेकिन डिपेल्पमेंट थिंकर्स यानी विकास संबंधित सिद्धांतों का अध्ययन करने वाले समाजशास्त्रियों का कहना है कि जब तक यह गांव शेष हिमाचल के साथ सड़क मार्ग से नहीं जुड़ेगा, तब तक यहां विकास होना असंभव है और लोग भी पैसा कमाने के लिए पहले वाले तौर-तरीकों को आजमाते रहेंगे।

हैरानी की बात तो है ही कि इतना प्रसिद्ध होने के बावजूद आज तक यह गांव सड़क मार्ग से नहीं जुड़ पाया है। इसे सड़क से जोड़ने का काम जारी है और शुक्रवार को मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि जल्द से जल्द सड़क बनाई जाए और साथ ही एक शॉर्ट कट जीप योग्य मार्ग भी बनाया जाए ताकि बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने में देरी न हो।

दरअसल, यहां के लोग सड़क का विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि इससे उनकी संस्कृति और धार्मिक परंपराओं को आघात पहुंचेगा। लेकिन कुछ लोगों का यह मानना है कि चरस के कारोबार से जुड़े लोग ही सड़क नहीं पहुंचने देना चाहते ताकि पुलिस व प्रशासन को गांव का ईज़ी ऐक्सेस न मिल सके। अब सच्चाई क्या है, इसके दो पहलू हो सकते हैं। लेकिन यह तो तय है कि यहां के लोग सड़क मार्ग का विरोध करते हैं और इसका ही खामियाजा है कि आग आदि लगने की घटनाओं पर फायर ब्रिगेड तक यहां नहीं पहुंच सकती।

हाल ही में हुए अग्निकांड में यहां दर्जनों मकान जल गए और दर्जनों परिवार बेघर हो गए। उन्हीं को सांत्वना देने और राहत के लिए योजनाओं का एलान करने मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर भी पैदल यात्रा करके गांव पहुंचे। उन्होंने राहत राशि देने का एलान तो किया ही, स्थानीय लोगों से भी अपील की कि वे सड़क बनाने के काम में सहयोग करें। ऐसी ही अपील साल 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने भी की थी। उस समय भी बड़ा अग्निकांड हुआ था। जनवरी का महीना था। अहम मंदिरों समेत 120 मकान जल गए थे। 150 परिवारों के 650 लोगों के सिर से छत छिन गई थी। नए साल के पहले हफ्ते में प्रचण्ड ठंड और बर्फबारी के बीच लोगों ने आग बुझाने के लिए बर्फ तक को पिघलाने की कोशिश की थी।

राहत कार्य का जायजा लेने मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल इस गांव की ओर निकल पड़े मगर भारी बर्फबारी ने उनका रास्ता रोक लिया। ताजा बर्फबारी के बीच गांव के लिए पैदल चढ़ाई करना मुश्किल था और उन्हें गांव के केंद्र से पांच किलोमीटर पहले से ही लौटना पड़ा था। उस समय मुख्यमंत्री ने गांव के लिए तीन करोड़ रुपये की राहत का एलान किया था जिसमें से 1 करोड़ 82 लाख रुपये इमारती लकड़ी के लिए रखे गए थे जो लोगों को घर बनाने के लिए दी जानी थी।

बीच रास्ते से लौटे मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल ने कुल्लू के डीसी को उसी समय 85 लाख रुपये का चेक सौंपा था ताकि हर प्रभावित परिवार को 65 हजार रुपये बतौर राहत दिए जा सकें। उस समय उनके साथ विधायक गोविंद ठाकुर और खीमी राम भी मौजूद थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने मलाना वासियों से अपील की थी कि वे गांव के लिए बन रहे लिंक रोड का विरोध न करें और इसमें सहयोग करें।

सोचिए, यह 2008 की बात है। अगर गांव वालों ने उनकी बात मान ली होती तो अब तक सड़क भी बन गई होती और आग लगने की ऐसी अप्रिय स्थिति में फायर ब्रिगेड पहुंचने से इतना नुकसान न हुआ होता। मगर आज 13 साल बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। गांव के बीच पहुंचने वाले पहले मुख्यमंत्री बनने वाले जयराम ठाकुर ने भी आज लोगों से यही कहा कि वे सड़क मार्ग बनाने में सहयोग करें। सड़क बनेगी तो इससे स्थानीय लोगों को ही फायदा होगा। बीमार लोगों को समय पर इलाज मिलेगा, पर्यटन को नए पंख लगेंगे और गांव की आर्थिकी और बेहतर होगी।

“अब सरकार को महंगाई भी नजर आ रही और मुख्यमंत्री को सड़कों के गड्ढे भी”

शिमला। हिमाचल में उपचुनावों की हार का मंथन अभी भी बीजेपी कर रही है तो कांग्रेस भी गाहे-बगाहे हर मोर्चे पर अपनी जीत के कारणों को गिनवाने से पीछे नहीं हट रही। सोमवार को शिमला में आयोजित पत्रकार वार्ता में एक बार फिर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर ने लगे हाथ उपचुनाव में हुई जीत के कराण गिनवाए।

हिमाचल कांग्रेस अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर ने कहा कि हमने महंगाई, बेरोजगारी और जीरो डिवेल्पमेंट जैसे मुद्दे उठाए। इन मुद्दों का व्यापक असर रहा। कुलदीप सिंह राठौर ने कहा कि हम मुद्दों को लोगों के बीचे ले जाने में कामयाब रहे। उपचुनावों में कांग्रेस की एकजुटता रही बहुत बड़ा फैक्टर रही। उपचुनाव के समय मुद्दों के भटकाने की कोशिश की गई, लेकिन हमने मुद्दों को नहीं भटकने दिया। अब सरकार को महंगाई भी नजर आ रही और मुख्यमंत्री को गड्ढे भी नजर आ रहे हैं।

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इसके अलावा कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ने एक बार फिर कांग्रेस विधायकों के शपथ ग्रहण समारोह में सरकार की ओर से मुख्यमंत्री और मंत्रियों की गैरमौजूदगी पर भी सवाल उठाया। कुलदीप सिंह राठौर ने कहा कि लोकतंत्र में जीत और हार चलती रहती है, लेकिन हमें स्वस्थ परंपरा का पालन करना होता है। हार से बीजेपी और सरकार को बहुत बड़ा झटका लगा। फिर भी जो परंपराएं हैं उनका पालन होना चाहिए।

 

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