नीरज भारती पर शिकायतकर्ता महिला ने फेंका जूता, ‘पिटाई’ का दावा

शिमला।। शिमला की महिला नेता के लिए फेसबुक पर अपशब्द इस्तेमाल करने को लेकर दर्ज मामले में शिमला पहुंचे कांग्रेस के पूर्व विधायक नीरज भारती पर जूता फेंकने की कोशिश हुई है और पीटने की कोशिश भी हुई है। शिकायत करने वाली महिला, जिनके प्रति कथित तौर पर बेहद अपमान जनक शब्द इस्तेमाल किए थे, उन्होंने नीरज भारती को सामने देखकर आपा खो दिया।

उन्होंने एक वीडियो डाला है कि जिसमें चीख-पुकार, जूता मारो, साले और मारो-मारो जैसी आवाज सुनाई दे रही है और भगदड़ सी नजर आ रही है। मगर मौके पर मौजूद पुलिसकर्मी मुस्तैद थे और उन्होंने महिला को ऐसा करने से रोक दिया।

हालांकि इसके बाद शिकायतकर्ता महिला नेता ने यह पोस्ट किया है

हैरानी की बात यह है कि वीडियो में नजर आ रहा है कि यह सब पुलिस के सामने ही हो रहा है। प्रश्न यह भी उठ रहा है कि पुलिस स्टेशन में जाकर इस तरह की हरकत करने की जरूरत क्या थी। अब यह मामला और तूल पकड़ सकता है।

सिरमौर में रहस्यमय हालात में मृत मिले दलित अधिकार कार्यकर्ता

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, नाहन।। शिलाई उपमंडल के बकरास से में करीब 40 से 45 साल के केदार सिंह जिन्दान की मौत हो गई है। दलितों के मुद्दों को उठाने वाेल केदार सिंह की मौत स्कॉर्पियो के नीचे कुचले जाने से हुई है जो घटनास्थल से कुछ दूरी पर मिली है। जिन्दान का शव भी सड़क पर पाया गया।

पुलिस अभी इस नतीजे पर नहीं पहुंची है कि जिन्दान की मौत हादसे के कारण हुई है या जानबूझकर कुचलकर उन्हें मार डाला गया। अभी तक जानकारी मिली है कि यह स्कॉर्पियो इलाके के ही उप प्रधान के नाम पर पंजीकृत है।

Image may contain: 1 person, outdoor and closeup

पुलिस को 12 बजे के आसपास घटना की सूचना मिली जिसके बाद पांवटा साहिब के डीएसपी प्रमोद चौहान भी इस तरफ रवाना हुए। अंतिम समाचार के मुताबिक डीएसपी मौके पर नहीं पहुंचे थे।

पहले हुई थी पिटाई
कई सालों से केदार सिंह जिन्दान दलितों के मुद्दे उठाते रहे हैं। करीब एक साल पहले सतौन में भी जिन्दान के साथ जमकर मार-पिटाई की गई थी। इसके अलावा भी कई जगहों पर केदार सिंह जिन्दान के साथ मारपीट की घटनाएं होती रही हैं।

हाल ही में शिमला की एक पत्रकारवार्ता में जिन्दान ने शर्ट खोलकर अपना रोष प्रकट किया था। उधर एसपी रोहित मालपानी ने हादसे की पुष्टि करते हुए कहा कि फिलहाल यह बात अभी स्पष्ट नहीं हुई है कि असल में हत्या है या फिर दुर्घटना।

एमबीएम न्यूज नेटवर्क का फेसबुक पेज लाइक करें

एसपी ने कहा कि इतना जरूर साफ हुआ है कि स्कार्पियो के नीचे आने से केदार सिंह जिन्दान की मौत हुई है। उन्होंने कहा कि पूरी जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो पाएगी। उन्होंने स्कॉर्पियो को कब्जे में लेने की बात भी स्वीकार की है।

बदतमीजी के लिए कुख्यात नीरज भारती को शिमला पुलिस ने रोका

शिमला।। आपत्तिजनक पोस्टों के लिए बदनाम कांग्रेस के पूर्व विधायक नीरज भारती ने दावा किया है कि वह ढली पुलिस स्टेशन जा रहे थे मगर उन्हें रास्ते बीसीएस के पास रोक दिया। एक लाइव वीडियो में वह कहते नजर आए कि एएसआई उनके साथ ऐसे बात कर रही हैं जैसे मैं अपराधी हूं। वह कह रहे हैं कि मैं अपराधी नहीं हूं।

इस संबंध में नीरज भारती ने खुद लाइव वीडियो डाला है और कुछ नियम-कायदों का हवाला देते हुए बता रहे हैं कि मैं पुलिस के आदेश पर ढली पुलिस स्टेशन जा रहा था मगर मुझे बीच में ही रोक लिया।

अक्सर ललकारते हुए अमर्यादित भाषा इस्तेमाल करने वाले नीरज भारती वीडियो में विक्टिम कार्ड खेलते नजर आए। वीडियो में वह पुलिस, प्रशासन और सरकार को भी धमकी दे रहे हैं कि वक्त बदलने पर सबको पता चलेगा। अक्सर नियमों, मर्यादा की धज्जियां उड़ाने वाले पूर्व सीपीएस पुलिसवालों को नियमों की दुहाई भी देते नजर आए।

बाद में उन्होंने मोबाइल एक अन्य शख्स को पकड़ा दिया और उसे सबकुछ लाइव करने को कहा। गौरतलब है कि एक महिला नेता ने शिकायत दर्ज कराई थी कि नीरज भारती ने फेसबुक पर उनके लिए आपत्तिजनक शब्द लिखे थे।इस शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआऱ पर नीरज भारती को ढली पुलिस स्टेशन में आना था।

अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक पुलिस ने पूछताछ करने के बाद नीरज भारती को जाने दिया है।

हिमाचल के कई देव-दरबारों में चमत्कारी रिश्वत है बकरा

दीपक शर्मा की फेसबुक टाइमलाइन से साभार।। क्या जालपू राम का डर और बेबसी आपके भीतर कुछ नहीं पिघलाते? ज़ाहिर है रिकॉर्डिंग उसके अपने लोगों के बीच लौटने के बाद की है. काबिल-ए-ग़ौर है कि वीडियो में महिलाएं ही इस वाकये से आक्रोश में दिखती हैं. मर्द आउट ऑफ फोकस आराम से खड़े नज़र आते हैं. बल्कि एक जगह बैकग्राउंड से महिला को चुप हो जाने के कहती पुरुष आवाज़ सुनी जा सकती है. हालांकि महिला की बात में तर्क था. (वीडियो देखें)

ये तो बुज़ुर्ग थे. कल को बच्चे अगर गुग्गा महाराज के दर्शनों की भूल कर बैठें तो क्या उनके साथ भी यही सुलूक होगा? देवताओं की मंडलियां यूं भी हमारे गांवों में सबसे प्रिय तमाशों में एक होती हैं. ईश्वर के रूप भले ही कहलाते हों लेकिन बच्चे क्या जानें देवता की पवित्रता की महानता?

पढ़ें- कब थमेगा बकरे खाने के लिए देवता का डर दिखाने का सिलसिला

हालांकि हिमाचल के ज़्यादातर गांवों में बच्चों का बपतिस्मा कम ही उम्र में हो जाता है. खेलते कदम अपनी जाति के दायरों को कभी ग़लती से भी लांघ जाएं तो मां-बाप खुद ही टोक देते हैं. वैसे तो स्कूल में ही ये दीक्षा हो जाती है. इसीलिए हमारे कुछ स्कूलों में दलित बच्चों को प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए दहलीज़ से बाहर बैठना पड़ता है. दोपहर का सरकारी खाना अलग कतार में बैठकर खाना पड़ता है. लेकिन जब ख़बर बनती है तो चुभती है. क्योंकि एक सुंदर प्रदेश के सुंदर नागरिक होने का इगो आहत होता है.

हालांकि सामूहिक पहचान के दायरे सिर्फ हिमाचल में ही तंग नहीं हो रहे. सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक..नोंचने का चलन है. फिर भी ये वीडियो कभी सुर्खी नहीं बनेगा. क्योंकि हिमाचल से टीआरपी नहीं आती,, ना ही ये सियासी कुर्सी का अखाड़ा है. कुछ जगहें इन दोनों के अभाव में भी ख़बर बनते हैं क्योंकि वहां संविधान के दायरे के भीतर या बाहर, जैसा भी, संघर्ष है. पहाड़ों के बीच बदलावों की बयार से इतना दूर रहे कि हमारे यहां के दलितों में संघर्ष की चेतना अब तक नहीं है.

आप कई बार ख़ुद एक दलित को अपने घर के भीतर चलने के लिए राज़ी नहीं कर सकते, अगर आप  ऊंची जाति से हैं तो. वीडियो में महिला भी कह रही है कि अगर रसोई में गए होते तो फिर भी एक बार पिटाई को जायज़ मान लेते. हमारे यहां के बुद्धिजीवी, जिनमें अधिकांश प्रगतिशील भी शामिल हैं, यूं नज़रअंदाज़ कर जाते हैं मानो ये समस्या है ही नहीं. नेता सदियों से चली आ रही व्यवस्था को छेड़ना नहीं चाहते क्योंकि इसी से उनका हित सधता है.

हिमाचल के समाज में जातिवाद पर चुप्पी संपूर्ण है. इसकी एक वजह देव परंपरा में गहरी आस्था है. प्रदेश के एक बड़े हिस्से में देवता हर इंसान की ज़िंदगी में सुबह-शाम पूजी जाने वाली मूर्तियों से कहीं ज़्यादा जीवंत भूमिका निभाते हैं. मज़ेदार बात ये है कि जिन मामलों में सहूलियत हो उनमें इंसान देवता को हमेशा मनाते आए हैं. उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ भीड़ और धूल से भरे मेलों में ले जाना, आमदनी के लिए उनके सदियों से सहेजे मंदिरों का बाज़ारीकरण, देवताओं की कमेटी में पुजारी से लेकर भंडारी तक के चयन में देवताओं से ज़्यादा इंसानों की ही चलती है.

कमरूनाग के आसापास के बड़े इलाके में हर देवी-देवता के रूठकर ‘उन्हीं के पास जाने की प्रथा है. यकीन मानिए हर बीतते साल के साथ कमरूनाग के यहां रूठे मेहमानों की तादाद बढ़ती ही जा रही है. लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ जब कारदार उन्हें वापस चलने के लिए राज़ी करने में नाकाम रहे हों.

जब बलि प्रथा पर कोर्ट का डंडा चला तो सुनने को मिला कि कई देवी-देवता अब सिर्फ नारियल की बलि या पशु बलि को महज़ सांकेतिक बनाने के ऐसी ही किसी उपाय के लिए मान गए हैं. ये देवी-देवता अमूमन किसी शहर के आसपास के इलाकों में बसे गांवों के ही अधिष्ठाता थे. वो जगहें जहां पुलिस से लंबे वक्त तक कुछ भी छिपाए रखना मुमकिन ना हो. दूर-दराज के इलाकों में ये प्रथा कभी नहीं रुकी. वहां की दैवीय शक्तियों को ‘नश्वर’ अदालतों की नाफरमानी से कभी गुरेज़ ना हुआ.

बात बलि की चली है तो ये बकरे का किस्सा भी दिलचस्प है. कई देव-दरबारों में ये बकरा वाकई चमत्कारी रिश्वत है. आपकी आस्था को ठेस लगती हो तो दंड कह लें. अक्सर बकरा देव परंपरा में संगीन से संगीन जुर्म की भी ज़मानत बन जाता है. मंदिर में दलित घुस आया है तो शुद्धि के लिए बकरा काट दो, देवता का कोई वायदा पूरा नहीं हुआ और दैव प्रकोप सता रहा है तो बकरा काट दो, घर की लड़की नीची जाति के लड़के के संग हो ली तो बकरा काट दो…

animal sacrification in himachal

कुछ ऐेसे देवी-देवता भी हैं जो पॉपुलर हिंदू मान्यताओं के मुताबिक शुचिता के लिए जाने जाते हैं. कई बार उनके मामले में सफाई दी जाती है कि बलि दरअसल उनके साथ मौजूद गण चाहते हैं. बलि से जो मटन बनता है वो बिना जातिभेद के बंटता है. लेकिन कई जगहों पर सबसे लजीज़ माने जाने वाले हिस्सों पर गूर या पुजारी का अधिकार होता है.

हम मांस तो बांट लेते हैं लेकिन जिसके साथ ज़िंदगी के हर मेले-मरग, खेत-खलिहान, ब्याह-कारज में रहे होते हैं उसके साथ सम्मान नहीं बांट सकते. मैं नहीं जानता देवी-देवता होते हैं या नहीं. चाहता हूं कि होते हों. ताकि पूछने की गुंजाइश बनी रहे कि क्या ऐसी संतानों पर उन्हें गर्व होता होगा?

(लेखक हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले से हैं और विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर लिखते रहते हैं। यह टिप्पणी उनकी फेसबुक टाइमलाइन से ली गई है)

हिमाचल में घर, गांव और राजनीति से लेकर देव परंपरा तक फैला है जातिवाद

कब थमेगा बकरे खाने के लिए देवता का डर दिखाने का सिलसिला

2

आदर्श राठौर की फेसबुक टाइमलाइन से साभार।। एक वीडियो देखा जिसमें एक व्यक्ति बता रहा है कि कैसे कुछ लोगों ने उसकी पिटाई की और फिर बकरे की मांग की। यह मंडी जिले के वीडियो सियाज गांव का बताया जा रहा है जहां पर जालपू राम जी ने कथित तौर पर ओबीसी समाज के बरामदे में रखे गुग्गा महाराज के आगे शीश नवाने की कोशिश की तो वहां मौजूद लोगों ने उनकी पिटाई की। कथित तौर पर इसलिए कि जालपू अनुसूचित जाति से हैं।

वीडियो में वह बता रहे हैं कि कैसे उनसे बकरे की भी मांग की गई। बाद में वह किसी तरह वहां से बचकर आए। अब कहा यह जा रहा है कि पुलिस ने मामला तो दर्ज किया है मगर उसमे जाति के आधार पर दुर्व्यवहार और बकरे की मांग का कोई जिक्र नहीं है।

वैसे इस वीडियो में दिख रहे बाकी लोगों को सुनें तो वे कह रहे हैं- सीधे बकरा मांग लेना चाहिए था, पीटने की क्या जरूरत थी। यानी वे स्वीकार कर चुके हैं कि पिटाई करना गलत है मगर बकरा दिया जाना गलत नहीं। इसीलिए वे कह रहे हैं कि अगर कोई ‘अपराध’ हुआ था तो ‘बकरा’ दे देना चाहिए था। यानी उनके हिसाब से ऐसे तथाकथित ‘अपराध’ पर बकरा दिया जाना सही है।

हिमाचल प्रदेश शिक्षा और जीवनस्तर के मामले में भले ही देश के कई राज्यों से आगे है मगर यहां अभी तक जातिवाद और छुआछूत जैसी कुप्रथाएं बनी हुई हैं। ऐसी खबरें तो अक्सर पढ़ने-देखने को मिल जाती हैं कि फ्लां जगह के स्कूल में तथाकथित अगड़ी जातियों के बच्चों ने अनुसूचित जाति के बच्चों के साथ बैठकर मिड डे मील लेने से इनकार किया।

मंडी का ही एक मामला यह था कि जब इस तरह के मामले में प्रशासन ने हस्तक्षेप किया तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को ही स्कूल से हटा लिया क्योंकि उन्हें यह मंजूर नहीं था कि वे तथाकथित ‘नीची’ जातियों के बच्चों के साथ खाना खाएं। यानी बच्चों के मन में ही ऊंच-नीच, छुआछूत का बीज बो दिया गया।

इस समस्या से बढ़कर एक और समस्या है- देवताओं के प्रकोप का डर दिखाकर शोषण। हिमाचल प्रदेश के कई मंदिर ऐसे हैं जहां पर दलितों का जाना वर्जित है। हाल ही में सरकाघाट क्षेत्र में एक पंडित ने एक जोड़े की मंदिर से बाहर ही पूजा करवाई थी। मंडी की चौहार घाटी में एक देवता के मंदिर के बाहर बोर्ड में साफ लिखा था कि ‘अनुसूचित जाति के भाइयों’ का आना वर्जित है। और तो और, ये शब्द घोड़े और डंगरों के साथ लिखे गए थे। हालांकि अब इस शब्द को हटा दिया गया है मगर अलिखित नियम बरकरार हैं।

Image may contain: plant, tree and outdoor
अब इस बोर्ड से ‘अनुसूचित जाति के भाई’ शब्दों को हटा दिया गया है। (Image: Tarun Goel)

इस मंदिर के अलावा भी बहुत सारे पुराने देवी-देवता ऐसे हैं जिनके पुजारी या कारदार कहते हैं कि देवता को ‘छोत’ या ‘छूत’ लगती है। यानी कोई दलित गलती से मंदिर, मूर्ति या अन्य साजो सामान को छू जाए तो इन लोगों के हिसाब से देवता रुष्ट हो जाता है। बदले में ऐसा करने वाले व्यक्ति से हर्जाने के रूप में बकरे की मांग की जाती है या बकरे की कीमत के बराबर धन की।

फिर डरा हुआ व्यक्ति देवप्रकोप के भय से बकरा दे देता है और फिर उस बकरे की बलि देकर देवता के पुजारी और कारदार चाव से खाते हैं। क्या देवता आदमी-आदमी में भेद कर सकते हैं? अगर वे करते हैं तो उनको देवता माना ही नहीं जाना चाहिए। दरअसल यह देवता की बनाई व्यवस्था नहीं, बल्कि देवता के आसपास रहकर अपना तंत्र चलाने वाले लोगों की बनाई व्यवस्था है। लेकिन हम इसलिए इस पर यकीन कर लेते हैं क्योंकि हमें लगता है कि ये देवता प्रत्यक्ष हैं और अपने गुर के माध्यम से हमसे संवाद करते हैं।

लेकिन देवताओं के इन पुजारियों आदि से पूछा जाना चाहिए दलित को छू लेने से इनकी और इनके मंदिर की पवित्रता नष्ट कैसे हो जाती है जबकि दलित द्वारा लाए गए बकरे को काटकर खाने में इन्हें कोई दिक्कत नहीं?

न जाने कितने ही सालों से लोगों को इस तरह से दबाकर रखने के लिए ये व्यवस्था बनाई गई है। दरअसल जाति व्यवस्था को बनाए रखने में इन लोगों को लाभ नजर आता है। क्योंकि खुद जो लोग जीवन में ऊपर नहीं उठ पाते, उन्हें किसी से तो बेहतर दिखना है। इसलिए वे कुछ लोगों को दबाकर रखना चाहते हैं ताकि उनकी तुलना में वो खुद को श्रेष्ठ समझ सकें। इसके लिए वे देव परंपरा और दैवीय प्रकोप का डर दिखाने से भी बाज नहीं आते। साथ ही बिना कुछ किए शराब पीने और बकरे खाने की सुविधा और कहां मिलेगी?

जब कभी इस तरह के मामले सामने आते हैं, यह कहकर बचाव किया जाता है कि मंदिर पर्सनल मंदिर है और इसमें किसे आने देना है किसे नहीं, यह हमारा अपना अधिकार है। इसी तरह से हो सकता है कै जालपू राम जी के साथ भी यही तर्क दिया जाए कि हमने अपने घर के अहाते में गुग्गा रखा था, कोई भी वहां कैसे आ सकता है। वे कह सकते हैं कि इसमें जाति का कोई ऐंगल नहीं है। हो सकता है वे उल्टा जालपू राम पर अपनी संपत्ति में घुसपैठ या चोरी की कोशिश का आरोप लगाने लग जाएं। बैकफुट पर आकर जालपू राम को ही मामला वापस लेना पड़ जाएगा।

इस तरह के मामलों में पुलिस का रवैया भी टालमटोल वाला होता है। क्योंकि पुलिस में भी तो हमारे समाज के ही लोग हैं। वे भी मानते हैं कि दैवीय शक्तियां छुआछूत मानती हैं। हमारे राजनेता भी इस व्यवस्था के साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहते हैं क्योंकि यह लोगों की आस्था का विषय है। मगर लोगों की आस्था कुतर्क भरी नहीं हो सकती और अगर कुतर्क भरी मान्यता है तो उस मान्यता को संरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए।

हिमाचल तरक्की के लाख दावे करे, आधुनिकता का लाख दावा करे, यहां पर लोग अभी भी जातिवाद के दलदल में डूबे हुए हैं। बहुत से लोग हैं जो इस भावना से ऊपर उठे हैं तो कुछ उठ रहे हैं। मगर कुछ लोग तो ऐसे हैं कि जाति आधारित पक्षपात और भेदबाव को शुतुरमुर्ग की तरह सच मानने से इनकार कर देते हैं और कहते हैं जातिवाद है ही नहीं। कुछ लोग जब बैकफुट पर आते हैं तो आरक्षण का कुतर्क देकर इस तरह के दुर्व्यवहार को सही ठहराने लगते हैं।

वे भूल जाते हैं कि आप कहां जन्म लेते हैं, इसमें आपका वश नहीं होता। आपके पैदा होने में आपका कोई योगदान नहीं होता और न ही आप यह चुनाव करते हैं कि आप कहां पैदा होने वाले हैं। फिर जन्म के आधार पर दंभ पालने का मतलब क्या है? हो सकता था कि आप दलित परिवार में जन्मे होते। तब आपको इसी तरह का दुर्व्यवहार झेलना पड़ता तो कैसा लगता?

घरों में या निजी स्थानों पर होने वाले भेदभाव को रोकना सरकार के लिए भले सरकार के लिए सीधे-सीधे संभव न हो। मगर सार्वजनिक स्थानों पर होने वाले दुर्व्यवहार को सरकार ही रोक सकती है। मंदिरों, स्कूलों, अस्पतालों, सभाओं और अन्य स्थानों पर अगर किसी तरह के जाति आधारित दुर्व्यवहार का मामला सामने आता है तो पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही प्रबुद्ध लोगों को भी उन स्थानों पर जाना बंद कर देना चाहिए, जहां के मठाधीश जाति आधारित भेदभाव करते हों। ऐसे मंदिरों का भी बहिष्कार किया जाना चाहिए, जहां का पुजारी या जहां का सिस्टम लोगों का वर्गीकरण करता है, उनका शोषण करता है। फिर वह किसी का बनाया आधुनिक मंदिर हो या सदियों पुराने देवता या द्यो का मंदिर। तभी धर्म और आस्था के इन ठेकेदारों को आईना दिखाया जा सकता है।

(मूलत: मंडी जिले के जोगिंदर नगर के रहने वाले और इन दिनों दिल्ली में कार्यरत पत्रकार आदर्श राठौर की फेसबुक टाइमलाइन से साभार)

पुलिस पर हमला कर नशे के तस्कर को छुड़ा ले गए दो दर्जन लोग

चंबा।। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के राख में चरस के साथ पकड़े गए तस्कर के साथियों ने पुलिस पर हमला कर दिया। जिस दौरान पुलिस स्पेशल इन्वेस्टिगेशन यूनिट वीडियोग्रफी कर रही थी, कथित तौर पर दो दर्जन लोगों ने पुलिस पर पथराव कर दिया।

जानकारी सामने आई है कि हमलावरों ने पुलिस के वाहन को नुकसान पहुंचाया और अपने साथी को लेकर फरार हो गए। इस मामले में दो पुलिसकर्मी भी जख्मी हुए हैं। पुलिस ने हमलावरों की गाड़ी भी अपने कब्जे में ली है। पुलिस ने तस्कर और उसके साथियों को ढूंढना शुरू कर दिया है।

पुलिस का कहना है कि संदिग्ध से 730 ग्राम चरस मिली थी। जिस दौरान छानबीन की जा रही थी, कुछ लोगों ने वहां आकर हमला कर दिया।

एसपी डॉक्टर मोनिका के हवाले से न्यूज 18 हिमाचल ने लिखा है कि एनडीपीएस ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि पुलिस के साथ मारपीट का मामला भी दर्ज किया गया है और संदिग्धों की तलाश की जा रही है।

श्रीकृष्ण पर नीरज भारती के पोस्ट को लेकर अनुराग का राहुल पर निशाना

शिमला।। अक्सर अपनी अजीब पोस्टों को लेकर चर्चा में रहने वाले कांग्रेस नेता और ज्वाली से पूर्व विधायक नीरज भारती के एक फेसबुक पोस्ट के बहाने हमीरपुर से भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने राहुल गांधी पर निशाना साधा है।

दरअसल नीरज भारती ने श्रीकृष्ण द्वारा गोपियों के ‘वस्त्रहरण’ वाले प्रसंग पर बनी एक चित्रकला को अपनी प्रोफाइल पर शेयर किया है और लिखा है- “आज इसका जन्मदिन है क्या?”

आज जन्माष्टमी है और इसी दिन डाली गई नीरज भारती के इस पोस्ट को कुछ लोग लाइक कर रहे हैं तो कुछ कॉमेंट करके गलत भी बता रहे हैं। मगर भारतीय जनता पार्टी के सांसद अनुराग ठाकुर ने इस पोस्ट के बहाने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा है।

अनुराग ने आधिकारिक फेसबुक पेज पर शेयर किए गए पोस्ट में नीरज भारती द्वारा शेयर किए गए फोटो का स्क्रीनशॉट लेकर पेटिंग में दिख रहीं गोपियों को धुंधला कर दिया है और कैलास मानसरोवर यात्रा पर गए राहुल गांधी पर टिप्पणी की है। उन्होंने साथ में नीरज भारती और हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की तस्वीरें भी शेयर की हैं, जिनकी सरकार में नीरज भारती मुख्य संसदीय सचिव (शिक्षा) थे।

अनुराग ने लिखा है, “पहले रामसेतु के ज़रिए भगवान श्रीराम और अब जन्माष्टमी पर श्रीकृष्ण के लिए ऐसा कर कांग्रेस अपनी हिंदूविरोधी मानसिकता दिखा रही है।राहुल गांधी की कैलाश मानसरोवर यात्रा एक ढोंग है और उनके संरक्षण में कृष्ण भगवान को लेकर की गई ऐसी आपत्तिजनक पोस्ट लोगों की आस्था से खिलवाड़ है.” ‪शर्म करो!

गौरतलब है कि पहले भी नीरज भारती इस तरह की टिप्पणियां करते रहे हैं और बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं और यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पर अजीब कॉमेंट कर चुके हैं। यह पहली बार हुआ है जब अनुराग ठाकुर ने इस तरह से पोस्ट डालकर विरोध किया है।

हालांकि उन्होंने अपनी पोस्ट में कहीं नीरज भारती का नाम नहीं लिया है और नीरज भारती की आलोचना भी नहीं है। उन्होंने सीधे कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधा है और इसे ‘हिंदूविरोधी’ मानसिकता का प्रदर्शन करार दिया है।

बता दें कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद एक महिला नेता के प्रति अपशब्द इस्तेमाल करने को लेकर पिछले दिनों नीरज भारती के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है।

नीरज भारती से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

वापस लिया गया 118 के तहत आवेदन करने के नियम में संधोशन

शिमला।। गैर-हिमाचली कर्मचारियों के बच्चों को हिमाचल में आवासीय जमीन खरीदने के लिए आवेदन करने की छूट दिए जाने संबंधित खबरों को लेकर मचे भूचाल के बाद हिमाचल प्रदेश सरकार ने इस तरह के संशोधन को वापस ले लिया है। अब कोई भी व्यक्ति ‘हिमाचल प्रदेश टेनंसी ऐंड लैंड रिफॉर्म्स ऐक्ट 1972’ के पहले से ही लागू नियमों के तहत जमीन के लिए आवेदन कर सकता है और कर्मचारी या उनके बेटे आवेदन करने के इन नियमों में किसी तरह की रियायत के पात्र नहीं होंगे।

इस मामले में को लेकर कुछ दिनों तक भ्रम की स्थिति बनी हुई थी क्योंकि कुछ अखबारों ने खबर दी थी कि नियमों में बदलाव किया गया है। मगर सरकार की ओर से इस मामले में कोई भी स्पष्टीकरण न आने के कारण अटकलों का दौर जारी था। आखिरकार सोमवार शाम को सरकार की ओर से स्पष्टीकरण आया कि मुख्यमंत्री ने इस मामले का संज्ञान लेते हुए आवेदन करने के नियमों में किए गए संशोधन को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश दिया है।

ऐसे में अब अगर कोई कर्मचारी खुद या अपने परिवार के किसी सदस्य के नाम पर हिमाचल में जमीन खरीदना चाहता है तो उसे पहले से ही स्थापित नियमों का पालन करना होगा, उसे किसी तरह की रियायत नहीं मिलेगी।

पढ़ें- जब वीरभद्र सरकार ने दी थी चाय के बागीचे बेचने की छूट

क्या कह रही है सरकार
हिमाचल सरकार की ओर से कहा गया है कि धारा 118 के मूलस्वरूप के साथ कोई बदलाव नहीं किया गया था, सिर्फ आवेदन करने के नियमों में संशोधन हुआ था। सरकार का कहना है कि इस मामले में फैलाई जा रही भ्रांतियों को देखते हुए मुख्यमंत्री ने तुरंत इन बदलावों को रद करने का आदेश दिया है ताकि अफवाहों पर विराम लग सके।

क्या कहता है नियम
हिमाचल प्रदेश टेनेंसी ऐंड लैंड रिफॉर्म्स रूल्स 1975 जो कि 2012 तक संशोधित है, उसमें 38 A के तहत शर्त तीसरे अनुच्छेद में लिखा गया है कि सब-रूल 2 के तहत कुछ कामों के लिए जिन योग्यताओं के आधार पर इजाजत दी जा सकती है। इसमें b) शर्त कहती है कि घर बनाने के लिए 500 स्क्वेयर मीटर(150 स्क्वेयर मीटर से काम नहीं) वे लोग जमीन ले सकते हैं

  • 1. b) जो हिमाचल में 30 से ज्यादा सालों तक काम कर रहे हों और संबंधित स्थानीय निकाय ने उसे इजाजत देने की सिफारिश की हो।

ऐक्ट की कॉपी यहां क्लिक करके देखी या डाउनलोड की जा सकती है

इसी पैमाने वाला व्यक्ति दुकान के लिए भी जमीन खरीदने का आदेवन कर सकता है। मगर अब स्पष्ट हुआ है कि सरकार ने आवेदन करने के उपरोक्त नियम को सरल बनाया था और गैर-हिमाचली कर्मचारियों के बच्चों के लिए आवेदन करने के लिए 30 साल की सेवा हिमाचल में करने की शर्त में ढील दी थी।

पढ़ें- धारा 118: हिमाचल में जमीन खरीदने में रही है बाबों की मौज

क्या है मामला
गौरतलब है कि तीन-चार दिनों से कुछ अखबारों की कटिंग सोशल मीडिया पर शेयर हो रही थीं जिनमें दावा किया गया है कि सरकार ने 118 में संशोधन किया है। दो अखबारों ने प्रमुखता से इसे अपने यहां छापा था। इस मामले में सरकार और विपक्ष की ओर से भी कोई टिप्पणी सार्वजनिक नहीं हुई थी। मगर अब स्पष्ट हुआ है कि समाचारों में कुछ सच्चाई थी।

हालांकि इससे पहले ‘इन हिमाचल’ ने भी विस्तार से बताया था कि जिस संशोधन की बात की जा रही है, वह धारा 118 में नहीं बल्कि इस धारा के तहत जमीन खरीदने के लिए किए जाने वाले आवेदन के नियमों में किया गया है।

आसान भाषा में समझें, हिमाचल की धारा 118 आखिर क्या है

करोड़ों के मालिक हैं हिमाचल प्रदेश के प्रशासनिक अधिकारी

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा धारा 118 के नियमों के कथित संशोधन करके हिमाचल में काम करने वाले अन्य राज्यों के कर्मचारियों/अधिकारियों के बच्चों को जमीन खरीदने की छूट देने और 30 साल की सीमा हटाने की खबरों के बीच सोशल मीडिया पर प्रशासनिक अधिकारियों की सपंत्ति को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।

इस संबंध में विभिन्न पेज, प्रोफाइल और ग्रुप तरह-तरह के दावे कर रहे हैं मगर इन दावों को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता।  इस कुछ अखबारों की कटिंग्स भी शेयर की जा रही हैं, जिनमें कुछ प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्ति का ब्योरा दिया गया है।

इस मामले में हिंदी अखबार दैनिक जागरण की अगस्त महीने की एक रिपोर्ट विश्वसनीय माना जा सकता है। अखबार ने इस ‘करोड़ों के मालिक हैं हिमाचल के ‘लोकसेवक’ शीर्षक के साथ अधिकारियों की संपत्ति की जानकारी प्रकाशित की थी। इसमें दावा किया गया था कि ‘सरकार चलाने वाले आईएएस अधिकारी धन्नासेठों से कम नहीं हैं।’

दैनिक जागरण ने लिखा था कि उसने आरटीआई के जरिए मिली जानकारी के आधार पर कुछ प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्ति की जानकारी छापी है। अखबार के मुताबिक ‘कार्मिक मंत्रालय को वर्ष 2017 की इस वर्ष भेजी गई प्रॉपर्टी रिटर्न में इसका खुलासा हुआ है।’

हालांकि करोड़ों का मालिक होना गलत बात नहीं है और हर कोई अपनी वैध आय के हिसाब से संपत्ति अर्जित कर सकता है, जमीन, मकान और अन्य चीजें जोड़ सकता है। इसलिए बिना किसी आधार के किसी के ऊपर यह सवाल नहीं उठाया जा सकता कि उसने क्यों और कैसे यह संपत्ति जोड़ी। बहरहाल, किस अधिकारी की कितनी संपत्ति होने का दावा किया गया था, यह जानने के लिए आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ‘दैनिक जागरण’ की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

करोड़ों के मालिक हैं हिमाचल के ‘लोकसेवक’

महासुई लोक संस्कृति को बचाने के लिए जूझता ‘चिराग’

प्रशान्त प्रताप सेहटा।। भारतीय समाज लोक संस्कृति की विविधताओं से भरा पड़ा है और लोक संगीत को इन संस्कृतियों की रीढ़ माना जाता है। किसी भी वर्ग विशेष के सांस्कृतिक इतिहास का ज्ञान उसके लोक गीतों के संकलन से लगाया जा सकता है। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध और कई कारणों से लोक संस्कृति अपना वजूद खो रही है। हिमाचल के महासुई संगीत की बात करें तो आधुनिकता के दौर में यह भी अपने मूल स्वरूप से अलग होता जा रहा है। लेकिन एक ऐसी भी शख्सियत है जो अपने गीतों के माध्यम से इस क्षेत्र की लोक संस्कृति को बचाने में जुटी है। इस शखसियत का नाम है चिराग ज्योति मजटा।

चिराग मूलतः रोहडू के करासा गांव के हैं और पेशे से वकील है। उनके पिता प्रेम ज्योति देश के जाने माने योग प्राध्यापक (रिटायर्ड), प्रशिक्षक, कोच, जज, दार्शनिक व प्रचारक हैं और माता आशा ज्योति नर्स हैं। इसके चलते चिराग ने अपना जीवन गांव से दूर कई शहरों में बिताया है।

चिराग ने अपनी दसवीं तक की पढ़ाई शिमला के डी.ए.वी न्यू शिमला, बारहवीं चंडीगढ़ व कानून की पढ़ाई देहरादून के प्रतिष्ठित लॉ संस्थान से की है। वह हिमाचल प्रदेश के स्टेट लेवल क्रिकेट खिलाड़ी भी रह चुके हैं और शिमला ज़िले का प्रतिनिधित्व भी कर चुके हैं। इसके साथ ही चिराग की विश्व इतिहास, राजनीति व समाज शास्त्र विषयों में बेहद मज़बूत पकड़ है और इतिहास विषय से सम्बंधित एक प्रतियोगिता में वह राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय स्थान अर्जित कर चुके हैं। वह हिमाचल के रियासत कालीन इतिहास और देव संस्कृति व नीतियों के बारे में भी अच्छी खासी जानकारी रखते हैं।

मेरी बचपन से ही संगीत में विशेष रुचि रही है। मैं अपने दादा जी से पारंपरिक महासुई गीतों को सुनकर ही बड़ा हुआ हूँ। लिहाज़ा जब मैंने पहली बार चिराग के गाने सुने और उनके बारे में जाना तो उनकी प्रतिभा का मुरीद हो गया। मैं यह जानना चाहता था कि अपनी संस्कृति से दूर शहर के कॉन्वेंट स्कूलों से पढ़ने और पश्चिमी सभ्यता में रहने सहने वाला मेरी उम्र का युवा आखिर इस तरह के भुले बिसरे पारंपरिक गीत कैसे गा सकता है, वह भी ठेठ पहाड़ी अंदाज में? उसी लहज़े में जैसे मेरे दादा जी मुझे सुनाया करते थे।

जिज्ञासावश जब मैंने चिराग से बात की तो उन्होंने मुझे बताया, “बचपन में मैं सदिर्यों की छुटियों में अपनी बड़ी बहन के साथ अपने नाना-नानी के पास जुब्बल के काइना गांव जाया करता था। नाना एल.आर. चांटा और नानी धनवती चांटा मुझे पारंपरिक महासुई गीत सुनाया करते थे और उन गीतो में छिपी लोक कहानियों का वर्णन करते जिनमें आमतौर पर स्थानीय देवी देवताओं से जुड़ी किवदंतियां, खूंद-खशीयों का बोइर (राजपूतों के आपसी बैर और युद्ध) और मैस्तीयों (सती होने वाली स्त्रियों) का ज़िक्र होता था। एक शहरी व छोटे बालक के लिए यह सब बेहद रोमांचक होता है। लिहाज़ा मैं भी इस बारे में जानने के लिए हमेशा उत्सुक रहता। जिसकी वजह से मुझे अपनी लोक संस्कृति और संगीत का ज्ञान हुआ।”

अपने गुरु सुरेंद्र नेगी (बाएं) के साथ चिराग

चिराग कहते है,  “मुख्य तौर पर मुझे प्रेरणा मेरे नाना से मिली। वह अपने देवता के ठाणी-बज़ीर थे व प्रतिष्टित खूंद ‘कनाल’ हैं। तो उनके साथ रहते हुए ऐतिहासिक सिधान्तों व कहानियों का ज्ञान हुआ। मुझे लोक संस्कृति का ज्ञान व लोक साहित्य के प्रति प्रेम विरासत में मिला है क्योंकि मेरे नाना नानी के साथ साथ मेरी माँ भी एक बहुत अच्छी लोक गायिका हैं।”

चिराग ने अब तक करीब चालीस लोक गीत गाए हैं और उनके तकरीबन सभी गीतों को क्षेत्रवासियों ने खुब सराहा है। चिराग ने साल 2013 में पहला गीत ‘जोऊटा-बढ़ाल का बोइर’ गाया और यह गीत इतना मशहूर हो गया कि चिराग को इसी गीत के नाम से जाना जाने लगा। यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया कि जहाँ भी चलाया जाता लोगों के होंट अपने आप इस गीत के बोलों पर गुनगुनाने लग जाते। यहां तक कि चिराग को यह गीत लोगों की फरमाइश पर नए संगीत के साथ दोबारा रिकार्ड करना पड़ा। बस यहीं से महासुई लोक गीतों का बुझता चिराग फिर चमक उठा।

इसके बाद क्या था, चिराग के एक के बाद एक गाने बाज़ार में आए और सभी हिट हो गए। बच्चो से लेकर बूढों तक सबकी जुबां पर उनके ही गीत सुनाई देने लगे। यह बात तकरीबन चार साल पहले की बात होगी मैं और मेरे पिताजी भी इस गीत को रिपीट मोड पर देर तक सुना करते थे। आज भी कई बार मेरे पिताजी इस गीत की फरमाईश करते हैं।

चिराग का गाया दूंदी का गीत हर शादी ब्याह में डीजे की धुन पर नाचने वालों की पहली पसंद है। इनके इलावा चिराग ने माधोसिंह, ज़ांज़ी, खूंद कनाल का बोइर, मैस्ती ग़रीबी, तानू, तुलू, देवता गोली नाग की रोहरू जातर, हांडौ मिंया टिकमेया, सिलदार, आंसिया आदि गीतों से भूला दिए गए इतिहास को पुनर्जीवित कर दिया है। इनके गायन की ख़ास बात यह है कि ये गीतों की कहानी का पूरा ज्ञान व बोल सब से साझा करते हैं। कोई भी इनके गीतों में गाये गए बोलों के स्पष्ट उच्चारण का मुरीद हो जायेगा, जोकि समकालीन गायकों में उपेक्षित रहता है।

मुझे चिराग के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह लगती है कि मैं जब भी उनसे मिलता हूँ या फ़ोन पर बात करता हूँ तो वह पहाड़ी बोली में बात करना शुरू कर देते है। उनके चाहने वालों को शायद विश्वास न हो लेकिन यह बिलकुल सच है कि उन्हें पहाड़ी बोली में बात करना नहीं आता । इसके बावजूद जिस ठेठ पहाड़ी अंदाज़ में वह गीत गाते हैं वह मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। इसके लिए वह हमेशा अपने नाना नानी को ही श्रेय देते है। चिराग हमेशा कहते हैं कि मैं हमेशा गीतों को उसी अंदाज़ में गाने की कोशिश करता हूँ जैसे मैं नाना नानी या बाकी बुजुर्गों से सुनता था। चिराग लगभग 300 पारम्परिक महासुई लोक गीतों के ज्ञाता हैं जो वक्त से साथ साथ भुलाए जा चुके है।

चिराग की गायिकी की एक और खास बात है कि इस युवा ने अब तक लगभग महासुई संगीत की हर एक शैली में गीत गाए है। उनका गाया रंसी बीर-ब्रह्मखाड़ा (छाड़ी), कौंल रामा –बारामा़त्रा, ओ देवा राज़िया (प्रस्तावित)- ठामरू और मादो सिंह की नाटी- हुड़क शैली में गाए कुछ मशहुर लोक गीत हैं। इतना ही नहीं चिराग अपने गाए गीतों में लोक वाद्य यंत्रों को भी बखूबी प्रयोग करते हैं। इनमें रणसिंघा, करनाल, शहनाई, बाणा, कुताल/कंछाई/कणछाल और नगारे शामिल है।

इनकी गायन शैली की ख़ास बात ही अपनी लाइन शुरू करने से पहले बूढों की तरह ‘आं………..’ का उच्चारण करना है जो स्वतः ही विदेश में बैठे व्यक्ति को भी अपने गाँव और रीती-रिवाजों की याद दिला दे। हालांकि सब कुछ ठीक ठाक चलने के बावजूद चिराग ने न जाने क्यों कुछ समय के लिए गायन से मुंह मोड़ लिया था। पूछने पर उन्होंने चुप्पी साधते हुए इस सवाल पर पर्दा डालते हुए बड़े ही वाकपटु अंदाज़ में उत्तर दिया कि “मैं अपने पहाड़ी इतिहास का शुक्रगुज़ार हूँ जिसने मुझे अपने नुमाइंदे के तौर पर चुना है व साथ ही उन सभी का जो निरंतर मेरा साथ देते आ रहे हैं। जो मेरे द्वारा गाए गए इतिहास को जानने और समझने के साथ साथ उसे ज़िंदा भी रख रहे हैं। मुझे गायन से कोई प्रसिद्धि नहीं चाहिए। मैं बस अपनी पहाड़ी संस्कृति का अमरत्व चाहता हूँ।”

खैर अच्छी बात है कि अपने चाहने वालो की गुजारिश के बाद चिराग फिर से वापसी कर रहे हैं। सात महासुई लोक गीतों से सजी उनकी नई एल्बम आगामी 15 सितम्बर को रिलीज़ होने जा रही है। चिराग कहते हैं कि “अगर मेरी संन्यास की घोषणा के बाद वापसी हो रही है तो उसमे मेरे चाहने वालो का बहुत बड़ा योगदान है और मेरी मुख्य प्रेरणा मेरा दोस्त नितीश धालटा रहे हैं। नितीश ने मेरी इस घोषणा के बाद कई दिनों तक मुझे सोने नहीं दिया और यहाँ सभी उन लोगों का नाम ले पाना संभव नहीं है जिसके लिए मैं आपसे क्षमाप्रार्थी हूँ | मेरे कुलिष्ट देवता सहदेव पाण्डव जी, करासा-काईना की माटी, नाना-नानी, माता-पिता, आदरणीय गुरु श्री सुरेन्द्र नेगी व सभी बड़ों का मुझपर परम स्नेह और आशीर्वाद है तो निश्चित ही इनकी प्रेरणाओं से मैं वापसी करने जा रहा हूँ और पुनः आप सभी को अपनी भूली बिसरी गाथाओं से अवगत करवाने 15 सितम्बर को आ रहा हूँ।”

बता दें कि चिराग ने ‘सी फोक( C FOLK)’ नाम से अपना मार्का लांच किया है और वह हिमाचल के उन चुनिंदा गायकों में से होंगे,  जिनकी अपनी व्यक्तिगत वेबसाइट होगी। इनके गीतों को यू ट्यूब पर सी फोक के नाम के चैनल पर ऑनलाइन सुना जा सकेगा व संभावित www.cfolk.in से डाउनलोड किया जा सकेगा।

संगीत के ज़रिए महासुई लोक संस्कृति को बचाने में चिराग का योगदान अतुलनीय है। चिराग एक ऐसे लोक गायक हैं जो अपनी हर एलबम में पारंपरिक क्षेत्रीय लोक संगीत और विलुप्त होती लोक रचनाओं को तरजीह देते हैं। चिराग के गायन ने युवाओं को अपनी विलुप्त होती विरासत से मिलाने का काम बखूबी किया है। मैने यह अनुभव किया है कि जब से चिराग ने गीत गाना शुरू किया युवाओं का पारंपरिक गीतों से लगाव बढ़ा है। वरना आजकल पंजाब की तर्ज पर इस क्षेत्र में भी हर दूसरा व्यक्ति खुद को गायक समझता है और ऑटो-टयूनर और तकनीक की मदद से संगीत के नाम पर इलेक्ट्रॉनिक म्यूजिक की चिल पौं से शोर शराबा फैला रहा है।

चिराग आगामी दौर में भी यूं ही गाते रहें और हम उनसे उम्मीद करते है कि वह पहाड़ी संस्कृति को अपने गाए लोक गीतों को माध्यम से जीवित रखने का प्रयास यूं ही करते रहेंगे।

(लेखक शिमला के जुब्बल के रहने वाले हैं। बाग़वानी और लेखन में उनकी रुचि है। उनसे prashantsehta89 @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)