शिमला।। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका वाड्रा गांधी के हाल के शिमला दौरे को लेकर फेसबुक पर कथित तौर पर की गई आपतिजनक टिप्पणी पर स्थानीय पुलिस ने आरएस नेगी नाम के एक शख्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज़ कर ली है। हाल ही में नेगी ने भाजपा की ओर से गठित ”प्रधानमंत्री जनकल्याण योजना प्रचार प्रसार अभियान समिति” के प्रदेशाध्यक्ष होने का दावा करते हुए एक प्रेस कांफ्रेंस की थी और पीएम की योजनाओं की प्रशंसा की थी।
आरोप है कि नेगी ने फेसबुक पेज पर कथित तौर पर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के भाई बहन के रिश्तों को लेकर बेहद अपमानजनक टिप्पणी की थी। नेगी की इस कथित टिप्पणी को लेकर प्रदेश युवा कांग्रेस ने प्रदेश के विभिन्न थानों में नेगी के खिलाफ एफआइआर दर्ज करने को लेकर शिकायत दर्ज़ की हैं। युवा कांग्रेस ने रामपुर, सोलन के अलावा राजधानी के थाना सदर में भी एफआइआर दर्ज करने के लिए शिकायत डाली है।
मामले की गंभीरता को समझते हुए प्रदेश भाजपा ने नेगी का पार्टी से किसी तरह का रिश्ता होने से साफ़ मन कर दिया है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतपाल सत्ती ने तहलका पोर्टल के संवाददाता को फोन पर बताया है कि प्रदेश भाजपा ने प्रधानमंत्री जनकल्याण योजना प्रचारप्रसार अभियान समिति का न तो किसी को अध्यक्ष बनाया है और न ही कोई गठन किया है। उन्होंने कहा ”अगर किसी व्यक्ति ने ऐसी टिप्पणी की है तो उसे जेल में डाल देना चाहिए। कांग्रेस को उसके खिलाफ एफआइआर दर्ज करनी चाहिए।”
वहीं तहलका के मुताबिक नेगी से कोशिश के वाबजूद संपर्क नहीं हो पाया, जबकि पुलिस ने नेगी के खिलाफ मामला दर्ज़ होने की पुष्टि की है। जिला पुलिस प्रवक्ता डीएसपी प्रमोद शुक्ला ने कहा कि पुलिस ने भादंसं की धारा 295ए और 505(2) के तहत एफआइआर दर्ज की हें।
तहलका की रिपोर्ट के अनुसार आरोपी पहले आम आदमी पार्टी का नेता होने का दावा करता रहा है। वह आम आदमी पार्टी के कार्यक्रमों में शामिल होता रहा था। हाल में आरोपी नेगी ने भारतीय जनता पार्टी की ओर से गठित प्रधानमंत्री जनकल्याण योजना प्रचार-प्रसार अभियान समिति के प्रदेशाध्यक्ष होने का दावा करते हुए संवाददाता सम्मेलन किया था।
प्रदेश युवा कांग्रेस अध्यक्ष मनीष ठाकुर ने कहा है कि अगर उनकी शिकायत पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो युवा कांग्रेस 27 दिसंबर को पुलिस का घेराव करेगी।
शिमला।। उद्घाटनों और शिलान्यासों की पट्टिकाओं में नाम को लेकर जन प्रतिनिधियों और नेताओं के बीच राजनीतिक खींचतान नई बात नहीं है। प्रदेश में एक बार फिर यह मुद्दा उछला है। काँग्रेस का आरोप है कि जयराम सरकार चुने हुए जनप्रतिनिधियों को नज़रअंदाज़ कर रही है।
कांग्रेस का कहना है कि इन पट्टिकाओं में विपक्ष के विधायकों का नाम नहीं लिखा जा रहा, जबकि बोर्डों और निगमों के अध्यक्षों और उपाध्यक्षों आदि का नाम लिखा जा रहा है। यह मुद्दा शिमला ग्रामीण से कांग्रेस के विधायक विक्रमादित्य सिंह ने भी उठाया था।
पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य ने फेसबुक पर एक वीडियो डालकर लिखा था, “भाजपा सरकार द्वारा हमारा नाम शिलान्यास पट्टिका पर नहीं लिखवाया, हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता। हमारा लक्ष्य तो हमारा नाम जनता के दिल में बसाना है जो हम श्री वीरभद्र सिंह जी के पदचिह्नों पर चलकर हासिल करने का पूर्ण प्रयास कर रहे है।”
भाजपा सरकार द्वारा हमारा नाम शिलान्यास पट्टिका पर नहीं लिखवाया, हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता ।हमारा लक्ष्य तो हमारा नाम जनता…
हालांकि मज़ेदार बात यह है कि विक्रमादित्य सिंह खुद इस बात के साक्षी रहे हैं कि उनके पिता के सीएम रहते बीजेपी के विधायकों के साथ भी ऐसा ही हुआ था। दरअसल विक्रमादित्य और उनके पिता की ही 2015 की एक तस्वीर सामने आई है, जिसमें मौजूदा सीएम और सिराज के तत्कालीन विधायक जयराम ठाकुर के इलाके में एक उद्घाटन हो रहा है। इसमें तत्कालीन सीएम वीरभद्र के साथ उनके बेटे (जो उस समय चुने हुए प्रतिनिधि नहीं थे) भी खड़े हैं। इसमें सामने की पट्टिका में सीएम का नाम है, मिल्क फेडरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष चेतराम का नाम है मगर स्थानीय विधायक जयराम ठाकुर का नाम नहीं है।
ऐसा ही वीरभद्र ने अक्टूबर 2015 में चुवाड़ी में एक भवन के लोकार्पण के दौरान किया था। इसमें बीजेपी के स्थानीय विधायक विक्रम सिंह जरयाल का नाम तो नहीं है मगर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष का नाम ज़रूर है।
खास बात यह है कि ये और ऐसी कई सारी तस्वीरें वीरभद्र सिंह के फेसबुक पेज पर ही अपलोड हुई हैं। ऐसे में विक्रमादित्य और कांग्रेस का विक्टिम कार्ड खेलना उल्टा पड़ता नज़र आ रहा है। सोशल मीडिया पर चर्चा जारी है कि कांग्रेस और शिमला रूरल के विधायक आदि बीजेपी सरकार पर जिस बात का आरोप लगा रहे रहे हैं, सत्ता में रहने पर वो खुद भी वही करते थे।
एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। अदालत ने एक ऐसे कथित गिरोह को 20 दिसंबर तक उन लोगों के पैसे लौटने को कहा है, जिसपर एक ही लड़की की शादी करवाकर पैसे ठगने का आरोप है। कोर्ट ने अभियुक्तों से कहा है कि निश्चित समय के अंदर पैसे नहीं लौटाए गए तो जेल जाने के लिए तैयार रहें।
दरअसल सरकाघाट की एक महिला पर फर्जी शादियां करवाने का धंधा करने का आरोप है। इस महिला ने कथित तौर पर एक ही लड़की की शादी कई लोगों से करवा दी और बदले में लाखों रुपये हड़प लिए। कथित तौर पर यह एक पूरा गिरोह था जिसमें पुष्पा देवी नाम की महिला के साथ उसकी बहू, बेटा, शादी करने वाली लड़की और एक अन्य शख्स शामिल हैं। इन सभी के खिलाफ बिलासपुर, हमीरपुर औऱ मंडी के पुलिस स्टेशनों में धोखाधड़ी के मामले दर्ज हैं।
इससे पहले कि पुलिस इन्हें गिरफ्तार करती, कोर्ट जाकर इन्होंने अग्रिम जमानत की याचिका डाल दी। अब 20 दिसंबर को जमानत याचिका पर सुवनाई होगी। लेकिन कोर्ट ने यह अल्टिमेटम भी दिया है कि जिन लोगों से शादी का पैसा ठगा गया है, उनका पैसा तुरंत लौटाया जाए। अगर 20 सितंबर से पहले यह रकम नहीं लौटाई गई तो जमानत भी नहीं मिलेगी।
हटली पुलिस चौकी प्रभारी लाल सिंह का कहना है कि कोर्ट ने गिरोह की मुख्य सरगना पुष्पा समेत सभी अभियुक्तों पीडि़तों के पैसे व अन्य सामान लौटने के लिए कहा है और गुरुवार को फिर कोर्ट में पेश होने को कहा गया है। लाल सिंह ने बताया कि इस गिरोह के सदस्य ठगी के पैसों का भुगतान नहीं कर रहे हैं और कह रहे हैं कि पैसे खर्च हो चुके हैं। ऐसे में पुलिस को उम्मीद है कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बाद वह पूछताछ कर सकेगी ताकि मामले के अन्य पहलू सामने आएं
(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)
शिमला।। पिछले दिनों इन हिमाचल ने सोशल मीडिया पर शेयर हो रहे एक युवक के वीडियो के बारे में जानकारी दी थी, जिसमें वह बता रहा था कि कैसे नशे ने उसे बर्बाद कर दिया। यह युवक वीडियो में बता रहा था कि वह नशे के तस्करों और सप्लायरों को पकड़वाने में मदद करने के लिए तैयार है।
उस समय सबसे पहले इन हिमाचल ने इस वीडियो के संबंध में खबर प्रकाशित की थी ताकि पुलिस इस युवक की पहचान करके इसकी मदद करे। अब जानकारी सामने आई है कि पुलिस ने नशे की लत से संघर्ष कर रहे इस युवक से संपर्क किया है। सहयोगी पोर्टल एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर के अनुसार इस युवक का नाम तुषार चौहान है और वह टिक्कर क्षेत्र का ही रहने वाला है।
वीडियो वायरल होने के बाद पुलिस ने इस युवक से नशे के तस्करों की जानकारी मांगी है मगर वह ठोस जानकारी देने में नाकाम रहा है। हालांकि डीएसपी अनिल शर्मा का कहना है कि यह अच्छी बात है कि युवक ने युवा पीढ़ी को नशे के दुष्परिणामों से अवगत करवाया है। उन्होंने माना कि हिमाचल में तो वह ठोस जानकारी नहीं दे पाया है मगर दिल्ली से जुड़ी जानकारी की पड़ताल की जा रही है।
पुलिसवाले का लिया नाम
एमबीएम को जानकारी मिली है कि जब इस युवक से यह पूछा गया कि इस खेल में पुलिस के कौन-कौन लोग शामिल हैं तो उसने कथित तौर पर उस पुलिसकर्मी का नाम लिया जिसपर पिछले दिनों शिमला में एटीएम तोड़ने की कोशिश में शामिल रहने के आरोप लगे थे।
क्यों बनाया वीडियो
युवक ने पुलिस को बताया है कि वह चिट्टे का आदी हो गया था मगर अब उसने शराब पीनी शुरू की है। यह वीडियो भी उसने शराब के नशे में ही बनाकर शेयर करवा दिया था। पुलिस ने उस जगह का भी मुआयना किया है जहां इस वीडियो को बनाया गया था।
नवनीत शर्मा की फेसबुक टाइमलाइन से साभार।। जॉन एलिया (जौन एलिया) यानी ऐसा नाम, कौतूहल जिनके नाम के साथ ही शुरू हो जाता है। अमरोहा में जन्मे,विभाजन के बाद भी दस साल तक भारत में रहे और फिर कराची चले गए। उसके बाद दुबई भी गए। संवाद शैली में,आसान शब्दों में,लगभग हर विषय पर नज्म या ग़ज़ल कह सकने वाले … मन के उलझे हुए तारों के गुंजलक को बड़ी सादगी के साथ सुलझाने वाले जौन मौत के बाद और भी अधिक मश्हूर हुए। उनकी गजलों पर दो किताबें देवनागरी में सामने आई हैं।
हिंदी जानने पढ़ने वालों को भी इस शायर के पास हर एहसास की ग़ज़लें दिखी हैं। नौजवान हों या बुजुर्ग, जॉन को सब पसंद करते हैं। उनका सोचने और कहने का ढंग लगभग सभी शायरों से अलग है। अब दौर यह है कि सोशल मीडिया पर जॉन अहमद फरा़ज और ग़ालिब से भी अधिक लोकप्रिय दिखते हैं।
14 दिसंबर 1931 को अमरोहा में जन्मे एलिया अब के शायरों में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले शायरों में शुमार हैं।’शायद’,’यानी’,’गुमान’,’लेकिन’ और गोया’ प्रमुख संग्रह हैं। इनकी मृत्यु 8 नवंबर 2004 को हुई। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें 2000 में प्राइड ऑफ परफार्मेंस अवार्ड भी दिया था। उन्हें अब तक सहज शब्दों में कठिन बात करने वाला,अजीब-ओ-गरीब जिंदगी जीने वाला,मंच पर ग़ज़ल पढ़ते हुए विभिन्न मुद्राएं बनाने वाला शायर ही माना गया है,लेकिन जॉन को अभी और बाहर आना है।
वह केवल रूमान के शायर नहीं थे, उनकी निजी जिंदगी जितनी भी दुश्वार क्यों न रही हो, वह ऐसे शायर हैं जिन्हें हर पीढ़ी पढ़ती है। एक दिन ऐसा लगा कि जॉन के साथ उनके जीते जी तो मुलाकात हो नहीं पाई, क्या अब बात हो सकती है?क्यों नहीं। फिर एक दिन माहौल बना और एक काल्पनिक मुलाकात हुई। मुलाकात में यथार्थ दाल में नमक जितना भी नहीं है। बावजूद इसके शायद यह बातचीत कुछ सच्ची बात कहे। आइए, उनकी जयंती पर मिलते हैं जॉन के साथ:
यह अमरोहा की शाम थी। कमाल अमरोही वाले ‘यूं ही कोई मिल गया था, सरेराह चलते-चलते’ को गुनगुनाते हुए उस दिन का सूरज गुरूब हो रहा था। सामने से जॉन एलिया आ रहे थे। अमरोहे की मिट्टी माथे पर लगी हुई थी। हाथ में सिगरेट लिए हुए… लेकिन सुलगाई हुई नहीं थी। इसरार ऐसा किया जिसमें हुक्म था, ‘जला के दो न…जला के दो!!!’कुर्ता पहना हुआ था। जैसे ही कहा कि आपसे मिलने की बहुत ख्वाहिश थी,ठहाका मार कर हंसे। उस हंसी में खांसी थी,क्षय रोग के दौरान का हांफना था और था हल्का सा रोना भी। बोले, ‘क्या कहा ?’ फिर से कहा कि आपसे मिलना था। इतना सुनते ही अपने सिर पर हाथ मारा और दो तीन बार मारा …फिर कहा, ‘अरे बदबख्त …कैसे ढूंढ़ लिया मुझे तुमने। जबकि मैं तो यही कहता आया हूं, कोई मुझ तक पहुंच नहीं सकता इतना आसान है पता मेरा।
आप तो सब जगह होते हैं। कहां नहीं हैं आप?
शुक्रिया जानी। मुझे पता चला है मैं लोगों के दिलों में रहता हूं…यार मैं हर उस जगह में रहता हूं जो पूरी नहीं है। जहां कहीं जो अधूरापन है,समझ लो मैं वहीं हूं। बाकी मेरा क्या पता होगा,वामपंथी रहा लेकिन खुदा को भी मानता हूं। हुस्न अच्छा लगता है लेकिन हुस्न ही सब कुछ हो ऐसा भी नहीं,मैं हर पांच मिनट बांद कुछ और ही हूं। मैं सब कुछ हूं,सब जगह हो सकता हूं लेकिन मक्कारी के साथ नहीं हो सकता।
क्या अधूरापन, दुख या अज़ीयत है आपकी ?
मेरे जानने वालों और पढ़ने वालों ने भी मेरे साथ बहुत इंसाफ नहीं किया है। मैं इतनी भाषाएं जानता हूं…उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी, फरसी, अरबी, हिब्रू और न जाने क्या क्या। कितने ही काम किए संपादक रहा,अनुवाद किए लेकिन बस लोग शेर सुनते हैं और वाह-वाह में डूब जाते हैं। जॉन केवल भाषा के हवाले से लिखे गए शेरों में नहीं है बल्कि खयाल के हवाले से मजबूती के साथ कहे गए शेरों में भी है। सबके लिए जॉन एलिया एक शायर है,बस और कुछ नहीं। इसलिए कहता हूं प्यारे,इतना आसान है पता मेरा। दूसरा दुख पाकिस्तान बना कर मुझे वहां धकेल दिए जाने का दुख है।
एक हुनर है जो कर गया हूँ मैं
सब के दिल से उतर गया हूँ मैं
कैसे अपनी हँसी को ज़ब्त करूँ
सुन रहा हूँ के घर गया हूँ मैं
कभी खुद तक पहुँच नहीं पाया
जब के वाँ उम्र भर गया हूँ मैं
लेकिन आप पाकिस्तान के होते हुए भी भारत के रहे?
हां,मैं अमरोहे का था,भारत का था,भारत का ही रहा। मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद जानते हैं कि मैं जब पाकिस्तान से भारत आया तो अमरोहा पहुंच कर उस मिट्टी में लोट गया था। मैंने चूमा उस मिट्टी को यार…। मैं भारत का ही हो सकता था और हो सकता हूं। कई दिन तक तो मैं माना ही नहीं कि मुल्क के दो टुकड़े हो गए हैं। मैं इस विभाजन के खिलाफ था। मुखालिफ़ था इस तरह की तकसीम का। लेकिन जाना पड़ा। फिर आना भी चाहा लेकिन आ नहीं पाए।
भारत और पाकिस्तान में फर्क क्या है?
फर्क यह है कि आपके यहां…..यानी मेरे भारत में फनकार के लिए बंदिश नहीं रही कभी। हमारे यहां जो लोग थोड़े से ऊपर पहुंच जाते हैं, वे किसी शायर, अदीब या फनकार को नहीं मानते। आपके यहां पंडित जवाहर लाल नेहरू अपने गले का हार पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला को देते हैं, लाल बहादुर शास्त्री बड़े गुलाम अली खान साहब का तानपूरा उठा कर चलते हैं और अटल बिहारी वाजपेयी मेहदी हसन के इलाज की पेशकश करते हैं। मेरे साथ कराची में क्या हुआ जानते हो…. एमक्यूएम पार्टी का मुशायरा चल रहा था, अरे उनका कोई लीडर आया, सब उठे, मैं नहीं उठा। फिर मैंने कोई सच्ची बात बोल दी। उनके कारिंदों ने मुझे स्टेज से फेंक दिया। यह फर्क है भाई। पाकिस्तान को बुरा नहीं कहता मैं लेकिन मेरी रूह भारत में रही है जानी। दूसरी बात यह कि आपके यहां कोई भी कुछ भी बोल सकता है। पाकिस्तान में जि़या उल हक़ के वक्त में हम पर प्रतिबंध था। खैर….एक ही फ़न तो हमने सीखा है, जिससे मिलिए, उसे खफा कीजिए।
मलिकज़ादा जावेद कहते हैं कि जॉन भाई को दुनिया के किसी भी कोने में कुछ अपराध या बुरी बात होती थी तो बुरी लगती थी और वह बेहद संवेदनशील हो जाते थे। क्या यही कारण है कि आपको सलीम जाफरी जाैन औलिया भी कहते थे?
देखो जानी,दर्द तो दर्द है। दर्द का कोई मुल्क,मज़हब,कौम या सरहद नहीं होती। दिल सबके पास है। धड़कता है। पूर्व में भी पश्चिम में भी। मेरा बेहद संवेदनशील होना मेरी फितरत है। और मैंने बख्शा भी किसी को नहीं है।
क्या आपको पता है कि व्यंग्य के बड़े आदमी मुश्ताक अहमद यूसुफी साहब ने आपके नाम के बारे में कहा था कि जब पत्रिकाओं में आपकी ग़ज़लें छपा करती थी तो वह और उनके दोस्त बड़े शौक से पढ़ते थे…यह सोच कर कि यह किसी आवारा एंग्लो इंडियन लड़की की ग़ज़लें हैं?
(ठहाका लगाते हुए बोले) नाम तक मत जाओ जाने जानाना। (फिर सिर के बेतरतीब बालों को हाथ से पीछे की ओर धकेल कर माथा चमकाते हुए बोले) एलिया तो शुरू से है लेकिन जहां तक जॉन की बात है। अब तो यार सभी कहते हैं कि और कौन सिवाय जॉन । फिर हंसे। नाम को लेकर आपका एक कविता है, सुनाएंगे ?
लो सुनो:
शर्म, दहशत, झिझक परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेतीं
आप, जी, वो मगर ये सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेतीं
अब मुझे पता है तुम और क्या सुनना चाहते हो….। लो उसे भी सुनो :
मेरी अक्ल-ओ -होश की सब हालतें
तुमने सांचे में जुनूं के ढाल दीं
कर लिया था मैं अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुमने फिर बांहें गले में डाल दीं
अच्छा एक बात बताएं, इतना अलग कैसे लिखा आपने? सहल-ए-मुमतिना यानी आसान शब्दों में शायरी करने वालों में जितनी मशहूरी आपको मिली, उतनी किसी और को नहीं। ऐसा क्यों?
यह सवाल ही बेवकूफाना है जानी। जॉन एलिया के साथ जो हुआ, वह ऐसा है कि बहुत कम लोगों के साथ हुआ। तुर्रा यह कि उस सबको मैंने जिस तरह लिया और सोचा, उसके मुताबिक मैं और कैसा लिख सकता था? अमरोहे में पैदाइश हुई, फिर कराची में रहा। वही कराची….जहां के मच्छर डीटीटी से नहीं मरते, कव्वालों की तालियों से मरते हैं। पाकिस्तान में कई काम किए। देश की बड़ी पत्रकार ज़ाहिदा हिना के साथ शादी की। खूबसूरत बच्चियां हुईं। फिर अलग भी हो गए। जो बीता है, वही तो रकम किया है। मैंने कोशिश की है कि लहजा मेरे शब्दों में बोले। अचानक सिर पर हाथ मारा और कहने लगे, ले यार सुन:
मैं भी बहुत अजीब हूं इतना अजीब कि बस
खुद को तबाह कर लिया मलाल भी नहीं
तबाह कैसे किया खुद को?
तबाह करने का कोई एक तरीका होता है? वह सब किया, जिससे मैं तबाह हो सकता था। जब पांचवीं किताब आनी चाहिए थी, तब मेरी पहली किताब आई। छपना नहीं चाहता था मैं। आज बीस साल की उम्र के शाायर दीवान छपवा रहे हैं, मैं साठ बरस का था, तब पहली किताब आई।
दुख क्या है आपका?
लो शेर सुनो :
शर्मिंदगी है हमको बहुत हम मिले तुम्हें
तुम सरबसर खुशी थे मगर ग़म मिले तुम्हें
ग़म ये नहीं कि तुम ही बहुत कम मिले हमें
ग़म तो ये है कि तुम भी बहुत कम मिले तुम्हें
घर क्यों नहीं संभाल सके?
देखो! …..कुछ चीजों के जवाब नहीं होते। सुनो शेर
एक ही मुज्दा सुबह लाती है
धूप आंगन में फैल जाती है
कौन इस घर की देखभाल करे
रोज एक चीज टूट जाती है।
चीजों को संभालना क्या इतना मुश्किल है?
हां यार। मुझसे नहीं संभलीं। जबकि मैं यह मानता हूं कि कठिन काम करना आसान है और आसान काम करना बेहद कठिन।
मशहूर शायर मलिकज़ादा मंजूर अहमद ने किसी मुशायरे में निज़ामत करते हुए कहा था, अनुभवों की वादी में जब तक इंसान सीने के बल न चल ले, वह जॉन एलिया नहीं हो सकता। क्या आप भी ऐसा मानते हैं?
(कुछ याद करते हुए) जानी! याद नहीं कब कहा लेकिन कहा तो ठीक ही है। अमरोहे में ऐसे परिवार से हूं जहां इल्म और इल्म की बात होती थी। उसके बाद मुल्क बंट गया। लकीर खिंच गई। मैं मानने को तैयार नहीं था। दस साल तक नहीं माना। कैसे छोड़ देता अमरोहा, बरेली, कानपुर या लखनऊ ? बताओ ? 1957 में पाकिस्तान चला गया। कराची में रहा। पाकिस्तान की आधिकारिक भाषा बनाने में मदद की। इल्म साथ चला। जिंदगी में इतने हादसे हुए कि तजुर्बों की कमी कहां रही। शादी की जो चली नहीं। बच्चियों के लिए कभी अच्छा पिता नहीं बन पाया।
क्या यह सच है कि आपने भारत की नागरिकता भी चाही थी?
हां, सच है। लेकिन मुझे दी नहीं किसी ने। वीजा कुछ देर के लिए एक्स्टेंड हुआ लेकिन फिर हुआ कुछ नहीं।
आप दोबारा शादी भी करना चाहते थे?
हां, करना चाहता था। लेकिन कुछ हो नहीं सका।
आपके पाकिस्तान के एक शायर हैं, मशहर बदांयुनी। उनका एक शे’र है जिसे मैं आपके लिए सवाल की तरह पेश कर रहा हूं :
चढ़े दरिया से वापस आने वालो
कहो कैसा रहा उस पार रहना?
कुछ नहीं यार….जवाब में मेरा ही शेर सुन लो :
बाहर गुज़ार दी कभी अंदर भी आएंगे
हमसे ये पूछियो कभी हम घर भी आएंगे?
खद से बिछड़े लोग कभी कुछ कह पाते हैं भला। क्या पूछ रहे हो?
अच्छा आप दस साल तक अवसाद में रहे, टीबी हो गया। फिर ये किताबें, मुशायरे ये सब कैसे हुआ, रोशनी में कैसे आए?
मेरा एक दोस्त था सलीम जाफरी। कमाल की निज़ामत करता था मुशायरों की। उसने देखा कि जॉन तो मेंटल केस हो रहा है। वह मुझे दुबई ले गया। अंधेरों से मोहब्बत करने वाला यह शख्स वहीं रोशनी में आया।
किसी के गले लग कर भी तन्हा रहने की जो अदा है आपकी, यह तो किसी को पहलू में बिठा कर भी तन्हा होने का अहसास है आपका….उसके बारे में कुछ बताइए?
यह अदा नहीं है बच्चे और न अहसास है। यही मेरी हकीकत है। मैं फितरतन ऐसा हूं। किसी चीज के परवान चढ़ने में ही उसकी ढलान लिखी होती है। मैं इल्म का सताया हुआ, इल्म का मारा हुआ आदमी हूं। इल्म सब कुछ नहीं है यार। शेर सुनाे :
आप अपना गुबार थे हम तो
याद थे यादगार थे हम तो
हमको यारों ने याद भी न रखा
जॉन यारों के यार थे हम तो
और सुन…..
अपना ख़ाका लगता हूँ
एक तमाशा लगता हूँ
उस से गले मिल कर ख़ुद को
तन्हा तन्हा लगता हूँ
कुछ कमी रह गई हो तो यह भी सुनो
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो
तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और इतने ही बेमुरव्वत हो
तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
यानी ऐसा है जैसे फुरक़त हो
अपने समकालीनों में किन लोगों को अधिक पसंद करते हैं?
नाम लेना अजीब लगता है। लेकिन पीरज़ादा कासिम, ओबेदुल्ला अलीम, कतील शिफाई, परवीन शाकिर, अहमद फराज़, फैज़ साहब समेत कई लोग हैं। पुराने वालों में सिर्फ मीर साहब। गालिब इसलिए नहीं क्योंकि मेरी नजर उन्होंने बमुश्किल 25 शे’र ठीक से कहे होंगे। भारत में मजरूह सुल्तानपुरी से लेकर मलिक जादा मंजूर अहमद, शुजा खावर, नवाज देवबंदी, वसीम बरेलवी, शहरयार जैसे नाम हैं। नए लोगों पर नहीं कहूंगा लेकिन अमीर इमाम ने रंग बांधा हुआ है। सच्ची बात सुनो जानी…भारत का हर शायर प्यारा है क्योंकि मैं सारी उम्र मन से भारतीय ही रहा हूं।
अब क्या प्रोग्राम है,आगे कहां जाएंगे?
है बिखरने को ये महफ़िल-ए-रंग-ओ-बू तुम कहाँ जाओगे हम कहाँ जाएँगे
हर तरफ़ हो रही है यही गुफ़्तुगू तुम कहाँ जाओगे हम कहाँ जाएँगे
हम हैं रुस्वा-कुन-ए-दिल्ली-ओ-लखनऊ अपनी क्या ज़िंदगी अपनी क्या आबरू
‘मीर’ दिल्ली से निकलने गए लखनऊ तुम कहाँ जाओगे हम कहाँ जाएँगे
आप क्या चाहते हैं कि जॉन को कैसे याद रखा जाएृ?
दो जॉन एलिया हैं। एक निजी जिंदगी आैर थियेट्रिक्स वाला जॉन एलिया और दूसरा है शायर, अनुवादक, संपादक। गुजारिश है कि मेरे अंदर के शायर को और खोदें।
वह दान वाला शेर सुनाइए न !!!
उम्र गुजरेगी इम्तिहान में क्या
दाग ही दोगे मुझको दान में क्या
यूं जो तकता है आसमान को तू
कोई रहता है आसमान में क्या
ये मुझे चैन क्यों नहीं पड़ता
एक ही शख्स था जहान में क्या
(लेखक ‘दैनिक जागरण’ के राज्य संपादक हैं. अख़बार में प्रकाशित उनके लेख को अनुमति लेकर यहां प्रकाशित किया गया है।)
इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश की विभिन्न लोक संस्कृतियों की झलक उनके लोकगीतों में मिलती है। ऐसे ही लोकगीतों को नए ढंग से पेश कर रहे ‘द मॉडर्न फोक नोट’ ने अपना चौथा संस्करण पेश किया है। 10 दिसंबर को पब्लिश किए गए नए वीडियो ‘द मॉडर्न फोक नोट-4’ पर अब तक एक लाख से ज्यादा व्यूज आ चुके हैं।
इसके पहले के तीन संस्करण भी काफी पसंद किए गए थे। इस बार भी गायक ए.सी. भारद्वाज ने अपनी आवाज दी है और शशि भूषण नेगी ने म्यूजिक के साथ नए प्रयोग किए हैं। वीडियो के निर्देशन राम चौहान ने किया है। कुल मिलाकर यह वीडियो सुनने और देखने में शानदार है।
ए.सी. भारद्वाज
पारंपरिक और आधुनिक वाद्य यंत्रों के बीच हिमाचल के विभिन्न हिस्सों के लोकगीतों को तो इस वीडियो में जगह मिली ही है, हिंदी गाने भी बीच-बीच में आते हैं जो शानदार बन पड़े हैं। वीडियो देखें-
क्या है मॉडर्न फोक नोट
कुछ साल पहले पाकिस्तान से जब कोक स्टूडियो की शुरुआत हुई, तब किसी ने नहीं सोचा था कि यह फॉरमैट इतना लोकप्रिय होगा। इसकी तर्ज पर हिंदुस्तान में अनप्लग्ड गानों के कई शो शुरू हुए। कोक स्टूडियो के भी कई सीजन अब तक आ चुके हैं और उनमें पुराने गानों को नए रूप में सहजता के साथ स्टूडियो में गाते हुए बनाए गए वीडियो खासे लोकप्रिय हुए।
शशि भूषण नेगी हिमाचली म्यूजिक को नई दिशा देने की कोशिश में जुटे हैं।
इसी तर्ज पर शशि भूषण नेगी ने ‘द मॉडर्न फोक नोट’ में पारंपरिक पहाड़ी लोकगीतों और कुछ अन्य गानों के साथ प्रयोग किया है। ‘The Modern Folk Note’ सिरीज के तहत एक स्टूडियो में सभी वाद्ययंत्रों में प्रवीण लोगों को बिठाया जाता है। वे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट बजाते हैं और बीच में बैठा गायक अपनी आवाज का जादू बिखेरता है।
इससे पहले के तीन संस्करण सुनने के लिए नीचे दिए लिंक पर जाएं, आपको जरूर पसंद आएंगे।
शिमला।। सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति का वीडियो वायरल हो रहा है जो खुद को खांगटा गांव का निवासी बताता है। उसका कहना है कि वह खुद तो बर्बाद हो चुका है मगर नई पीढ़ी को बताना चाहता है कि नशे से बचो। उसने नशे के कारोबारियों को खुली चुनौती भी दी है और कहा है कि मैं नशे के कारोबारियों को पकड़वाने में मदद करूंगा।
इस वीडियो को किस हालत में बनाया गया, लड़का कौन है, उसके दावे में कितनी सच्चाई है, इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई है। मगर हम इस वीडियो को इसलिए शेयर कर रहे हैं ताकि हमारे मंच के जरिए पुलिस या प्रशासन तक भी यह वीडियो पहुंचे। जरूरी है कि प्रशासन हरकत में आए और अगर यह व्यक्ति सच कह रहा हो तो इसे सुरक्षा मुहैया करवाए ताकि कहीं कोई नशे का सौदागार इसको नुकसान न पहुंचा पाए।
नीचे देखें, द लॉजिकल हिमाचली पेज पर शेयर उस युवक का वीडियो:
इस बात में कोई शक नहीं है कि हिमाचल प्रदेश में नशे का कारोबार गहरी जड़ें जमा चुका है। पहले जहां चरस-गांजे ने लोगों को गिरफ्त में लिया हुआ था, अब सिंथेटिक ड्रग्स का बोल बाला हो गया है। लोग हेरोइन, स्मैक, इंजेक्शन और कैप्सूल तक लेने लगे हैं। हिमाचल के हर हिस्से से नशे के तस्करों के पकड़े जाने की खबरें आ रही हैं और साथ ही उन लोगों की कहानियां भी सामने आ रही हैं, जो लोग नशे के आगे मजबूर हो गए हैं।
आज धर्मशाला में विधानसभा की कार्यवाही के दौरान नशे पर चर्चा हुई जिसमें नूरपुर के विधायक राकेश पठानिया ने बताया कि किस तरह से उनके यहां एक परिवार ने अपने बच्चे को जंजीरों से बांध रखा है क्योंकि वह नशे का आदी होने के कारण भाग जाता है। मगर जिस दौरान यह अहम चर्चा हो रही थी, विपक्ष वॉकआउट कर चुका था।
धर्मशाला।। बजट और मॉनसून सेशन में अधिकतर समय सदन में मुद्दों पर चर्चा करने और सरकार को घेरने के बजाय वॉकाउट करके बाहर गुजारने वाले कांग्रेस विधायकों ने एक बार फिर विंटर सेशन के पहले ही दिन वॉकआउट कर दिया और वह भी प्रश्न काल से ठीक पहले।
सदन की कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार विपक्ष को धमका रही है। इसके साथ ही कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल उठाना शुरू कर दिया। लेकिन जब प्रश्नकाल शुरू हुआ तो विपक्षी विधायक सीटों से उठे और कुछ मिनट बाद सदन से वॉकआउट कर दिया।
इसके बाद ये विधायक बाहर आकर गेट नंबर एक के पास सीढ़ियों पर बैठ गए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। विधायकों के हाथ में पेपर थे, जिनमें बड़े अक्षरों में नारे लिखे थे।
यानी साफ है कि कांग्रेस के विधायक वॉकआउट करने के मूड से ही गए थे, इसीलिए पहले से ही ये पर्चे छपवा दिए थे। वरना अगर सदन के अंदर किसी बात से नाराजगी होती और वॉकआउट करना पड़ता तो ये पर्चे कहां से आते?
पुरानी है यह खराब परंपरा
बता दें कि सदन में हाजिर रहने पर विधायकों को अतिरिक्त भत्ते मिलते हैं। इसलिए ऐसे सवाल भी उठते हैं कि विधायक अंदर जाकर हाजिरी दर्ज कराते हैं और फिर वॉकआउट कर देते हैं।
सदन के अंदर जनहित के सवाल करने और सरकार को घेरने के बजाय बाहर मीडिया के सामने फोटो खिंचवाने के मकसद से वॉकआउट कर फोटो खिंचवाए जाते हैं ताकि अगले दिन सुर्खियां लग सकें। अफसोस, अगले दिन सुर्खियां लगती भी हैं।
मगर प्रश्न उठता है कि विपक्षी नेता और विधायक जब विधानसभा सत्र न होने पर आम दिनों में भी मीडिया के सामने सरकार को घेर रहे होते हैं, वॉकआउट करके वे किन नए मुद्दों पर सरकार को घेर लेते हैं?
यह सिलसिला दशकों से चला आ रहा है। आज भारतीय जनता पार्टी सत्ता में है, मगर पहले जब वह विपक्ष में थी, तब वह भी कांग्रेस सरकार के खिलाफ बिना मतलब आए दिन वॉकआउट किया करती थी। भाजपा के तत्कालीन विधायकों को अक्सर वॉकआउट करके मीडिया के कैमरों की ओर चलकर नारेबाजी करते देखा जाता था।
आज भी यह सिलसिला जारी है कि जैसे ही मीडिया के कैमरे डाउन होते हैं, विधायक अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठकर चले जाते हैं। यानी यह सब सांकेतिक ड्रिल है। जनता के मुद्दों की किसी को फिक्र नहीं है और न ही इसे लेकर विधायकों को किसी तरह की परेशानी है।
वॉकआउट करने का लोकतांत्रिक अधिकार जन प्रतिनिधियों के पास है मगर वे रोज ही वॉकआउट करेंगे तो उन्हें जनता ने क्या वॉकआउट करने के लिए चुना है?
मंडी।। हिमाचल प्रदेश के सुंदरनगर नगर में नहर में गिरी एक महिला का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर किया जा रहा है। लोगों को यह वीडियो इसलिए आकर्षित कर रहा है क्योंकि जो महिला नहर में गिरी है, वह डूबी नहीं बल्कि तैर रही है। बिना हाथ-पैर हिलाए यह महिला ऐसे तैर रही है मानो पानी की सतह पर कोई सूखा पत्ता या तिनका तैर रहा हो।
इस वीडियो को हिमाचल प्रदेश के कुछ मीडिया पोर्टलों और अखबारों ने एक तरह से चमत्कारी घटना के तौर पर पेश किया है मगर हकीकत में यह सामान्य वैज्ञानिक घटना है। दरअसल इस वीडियो को लेकर कहा जा रहा है कि एक महिला अचानकर नहर में जा गिरी या शायद मानसिकर तौर पर परेशान होने के कारण ऐसा कदम उठा लिया। पहले लोगों को जब यह महिला तैरती हुई दिखाई दी तो उन्हें लगा कि शायद किसी का मृत शरीर तैर रहा है। मगर नजदीक से देखा गया तो महिला ठीक हालत में नजर आई। आखिरकार उसे सुरक्षित बचा भी लिया गया।
घटना तीन दिन पहले की है मगर इसके वीडियो अब वायरल हो रहे हैं। कुछ लोग इस वीडियो को फर्जी बता रहे हैं मगर यह वीडियो एकदम असली है। इससे पहले कि आप समझें कि महिला इस तरह के कैसे तैर रही है, पहले वीडियो देखें।
क्या है कारण अगर आपमें से कोई तैरना जानता होगा तो उसे मालूम होगा कि फ्लोटिंग क्या होती है। फ्लोटिंग का अर्थ है- तैरने के लिए बिना हाथ-पैर हिलाए सतह पर ऐसे रहना मानो आप कोई हल्की-फुल्की चीज हों। इसके लिए शरीर को ढीला छोड़ देना होता है और फेफड़ों में सांस भरनी होती है। फेफड़ों में मौजूद हवा आपके शरीर हो हल्का कर देती है इस कारण शरीर पानी पर तैरता रहता है। सांस को धीरे-धीरे छोड़ना होता है ताकि एकदम से फेफड़े खाली करके आप शरीर को भारी न कर दें।
हालांकि अगर आप मोटे हैं तो ऐसी स्थिति में भी पैरों वाला हिस्सा कई बार पानी के अंदर चला जाता है और सिर्फ छाती वाला हिस्सा तैरता रहता है। हालांकि फिर भी आपका सिर भी पानी के ऊपर रहता है जिससे आप डूबने से बचे रहते हैं। लेकिन आप दुबले हैं तो इससे आपको फ्लोटिंग में और ज्यादा सुविधा होती है। इस फ्लोटिंग विधा का इस्तेमाल वॉटर स्पोर्ट्स से लेकर मेडिटेशन और योग तक में किया जाता है।
हाल ही में सोशल मीडिया पर एक बाबा का वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह पानी में योग करते दिख रहे थे। यह भी इसी फ्लोटिंग टेक्नीक के कारण संभव है।
अब फिर उसी सवाल पर आते हैं कि सुंदरनगर में वह महिला कैसे इस तरह से तैर पा रही है। सबसे पहले समझने की बात यह है कि अगर आपको तैरना आता है तो आराम से फ्लोटिंग कर सकते हैं। अगर वह महिला बचपन से ही तैरना जानती रही होगी तो संभव है कि पैर फिसलने पर उसने तैरने के बजाय सुरक्षित ढंग से फ्लोट करना उचित समझा।
डूबते कैसे हैं लोग जिन लोगों को तैरना नहीं आता, उनके डूबने की वजह यह होती है कि वे घबरा जाते हैं और हाथ-पैर चलाने लगते हैं। इससे तैर तो वो पाते नहीं, उल्टा पानी के अंदर गोते खाते रहते हैं और आखिरकार डूब जाते हैं। मगर इस महिला के साथ अच्छी बात यह हुई कि उसने ऐसी कोई हरकत नहीं की। अगर वह घबराकर हाथ-पांव मारती तो शायद बहुत पहले डूब चुकी होती और व्यस्त शहर में किसी को पता भी नहीं चलता कि वह कैसे डूबी।
मगर वह शांत रही और आराम से फ्लोट करती रही। इस बीच ऐसी जानकारी सामने आई है कि महिला मानसिक तौर पर अस्थिर है। ऐसा इस हादसे के सदमे के कारण हुआ या पहले से ही ऐसी थीं, इस बारे में जानकारी स्पष्ट नहीं है। मगर जैसा कि आप वीडियो देखकर समझ सकते हैं, महिला असामान्य रूप से शांत है और बीच में हाथ भी हिलाती है।
क्या है संभावना
इस बात को लेकर तो कोई शक नहीं है कि यह महिला फ्लोटिंग के कारण ही बची। मगर यह फ्लोटिंग इरादतन थी या संयोग से, इसे लेकर संभावनाओं पर ही विचार किया जा सकता है। ऐसे में एक संभावना के तहत कहा जा सकता है कि महिला की ऐसी मानसिक स्थिति के कारण उसका पैनिक में न आकर हाऱ-पैर न हिलाना ही जीवनदायक बन गया। वह आहिस्ता-आहिस्ता सांस लेती रही और वजन कम होने के कारण मंदर रफ्तार से बह रही नहर की सतह पर तैरती रहीं।
संभव है कि पानी में कूदने के बाद शुरू में ही वह घबराकर बेसुध हो गई हो। जब आदमी बेसुध होता है तो उसका शरीर सामान्य रूप से सांस लेने जैसी क्रियाएं करता रहता है। तो हो सकता है कि महिला पीठ के बल पानी की सहत पर गिरकर बेसुध हुई हो। इस बीच शरीर ने अपने आप सांस लेना जारी रखा और इस कारण महिला डूबी नहीं बल्कि फ्लोट करती रही। वैसे भी इन्सानों के बहुत छोटे बच्चे तक फ्लोटिंग स्वाभाविक तौर पर कर सकते हैं।
तो आपके लिए भी सबक है, अगर आपको तैरना नहीं आता और कभी पानी में गिर जाएं तो घबराकर बिना वजह हाथ-पैर न मारें। हिम्मत रखें, सांस रोकें और फ्लोट करने की कोशिश करें। हो सकता है कोई आपको बचा ले। यह काम कैसे किया जा सकता है, इसके लिए नीचे दिया गया वीडियो देखें और आसान कदमों में फ्लोट करना सीखें।
शिमला।। हिमाचल प्रदेश में इन दिनों मुख्यमंत्री द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हेलिकॉप्टर को लेकर राजनीति हो रही है। हालांकि बहाना खराब सड़कों का है, मगर सवाल उठाए जा रहे हैं कि खुद मुख्यमंत्री हवाई यात्रा करते हैं, इसलिए उन्हें सड़कों की चिंता नहीं है। हालांकि ये आरोप नए नहीं हैं क्योंकि जबसे मुख्यमंत्रियों ने हेलिकॉप्टर इस्तेमाल करना शुरू किया है, तभी से विपक्ष इसी तरह के सवाल उठाता रहा है।
अब क्या हैं आरोप पहले शिमला से कांग्रेस के विधायक और पूर्व सीएम वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने सड़कों की खराब स्थिति को लेकर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर पर निशाना साधा था। उन्होंने कहा था कि सीएम हेलिकॉप्टर से यात्राएं करते हैं और उधर प्रदेश में सड़कों की हालत खराब से खराब होती जा रही है। अब नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री ने प्रदेश में हो रही सड़क दुर्घटनाओं का आंकड़ा देते हुए कहा है कि मुख्यमंत्री खुद हेलिकॉप्टर में यात्रा करते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को ‘घुमंतू’ कहकर ‘सैर-सपाटा करने वाला सीएम’ और ‘शौक पूरा करने के लिए नए हेलिकॉप्टर लेने की तैयारी’ करने का आरोप लगा दिया।
वीरभद्र पर निशाना लेकिन इसके जवाब में भारतीय जनता पार्टी भी आक्रामक हो गई है। औद्योगिक विकास निगम के उपाध्यक्ष एवं पार्टी प्रवक्ता प्रो. राम कुमार ने कहा है कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर दिल्ली में योजनाएं लाने जाते हैं जबकि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह केवल अपने भ्रष्टाचार के मामलों से बचने के लिए दिल्ली के टुअर बतौर सीएम लगाते थे। गौरतलब है कि जब वीरभद्र सीएम थे, तब दिल्ली में चल रहे मामलों की सुनवाई के लिए वकीलों से मिलने के लिए जाने के लिए उनके ऊपर हेलिकॉप्टर का दुरुपयोग करने के आरोप लगे थे।
हालांकि इस बीच सवाल यह भी उठ रहा है कि पिछले साल चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद दिल्ली जाने के लिए वीरभद्र सिंह ने हेलिकॉप्टर औ मुकेश अग्निहोत्री ने सरकारी गाड़ी के इस्तेमाल के लिए चुनाव आयोग से इजाजत मांगी थी। बाद में आयोग से अनुमति लेने के बाद उस समय वीरभद्र सरकारी हेलिकॉप्टर से दिल्ली गए थे, जब मतदान तक हो चुका था। उस समय दिल्ली में आय से अधिक संपत्ति मामले की सुनवाई भी चल रही थी।
क्यों हेलिकॉप्टर इस्तेमाल करते हैं सीएम? चूंकि सरकार का प्रमुख होने के नाते सीएम को विभिन्न जगहों पर पहुंचना होता है, ऐसे में भारी शेड्यूल के बीच यात्राओं में समय नष्ट न हो, इसलिए मुख्यमंत्री को हेलिकॉप्टर इस्तेमाल करना पड़ता है। बेशक हिमाचल क्षेत्रफल के लिहाज से छोटा प्रदेश है मगर यहां के पहाड़ी रास्ते किलोमीटर के हिसाब से दूरी को बढ़ा देते हैं। ऐसे में हवाई यात्रा करना बेशक महंगा होता है मगर यह यात्रा का समय घटा देता है। इसके साथ ही राज्य के मुख्यमंत्रियों को दिल्ली में भी विभिन्न बैठकों में आना-जाना पड़ता है। इसलिए भी यह हेलिकॉप्टर सुविधाजनक हो जाता है। मगर यह भी तथ्य है कि ये यात्राएं बहुत महंगी होती हैं।