किशन कपूर स्थानीय मुद्दों पर बिल्कुल बात नहीं कर रहे: नीरज नैयर

चम्बा।। चंबा जिला में कांग्रेस पार्टी के जिलाध्यक्ष नीरज नैयर ने एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए कहा कि कांगड़ा चंबा से बीजेपी के प्रत्याशी किशन कपूर इन दिनों चंबा के दौरे पर हैं और वो लोकल मुद्दों पर कोई बात नहीं कर रहे हैं बल्कि सर्जिकल स्ट्राइक पर बोल रहे हैं।

उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग ने कहा है कि पुलवामा अटक पर बार बार बात करना सही नहीं है लेकिन इन्होंने हर जगह सर्जिकल स्ट्राइक का बखान किया जो कि बिल्कुल गलत है।

नैयर ने कहा, “बीजेपी की सरकार हर मुद्दे पर नाकाम साबित हुई है इनके पास बोलने के लिए कुछ नहीं है। और ये शिकरिधार सीमेंट की बात कर रहे हैं तो जो डेड किलोमीटर सड़क बनी है, वो कांग्रेस के टाइम की है। इन्होंने तो एक इंच तक सड़क नहीं बनाई। किशन कपूर भी ने मंत्री रहते हुए चंबा के लिए क्या किया, इस पर बात करें।”

मंडी में आश्रय शर्मा से ज्यादा वोट तो कोई हप्पू सिंह भी ले आएगा

आई.एस. ठाकुर।। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की हालत देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी देश में इसकी हालत क्या हो रही है। हिमाचल छोटा सा प्रदेश है जहां मात्र चार लोकसभा सीटें हैं। यहां की राजनीति में जाति, समुदाय आदि का प्रभाव उतना अधिक नहीं है जितना पड़ोसी राज्यों में है। मगर हिमाचल में कांग्रेस में जिस तरह से गृहयुद्ध छिड़ा है, वैसे ही हालात अन्य राज्यों में भी होंगे। हिमाचल में एक भी सीट ऐसी नहीं है जहां पर कांग्रेस जीतने के लिए उम्मीदवार उतार रही हो। बल्कि यहां तो टिकट दिए जा रहे हैं खानापूर्ति के लिए।

यह शर्मनाक ही है कि दिग्गज नेता चुनाव लड़ने से न सिर्फ कतरा रहे हैं, इस बात का भी ख्याल रख रहे कि पार्टी के अंदर जिस नेता से उनकी राइवलरी है, कहीं वह चुनाव न लड़ ले। और फिर वे दोनों इस बात का भी ख्याल रख रहे हैं कि कोई ऐसा चुनाव न लड़ ले जो कल को उनसे बड़ा नेता बनकर उभर जाए। सोचिए, इन हालात में पार्टी अगर किसी को उम्मीदवार बनाए तो ये दिग्गज नेता उसे हराने में जुट जाएंगे, इसमें कोई शक नहीं।

अपने चक्कर में डुबो रहे पार्टी की लुटिया
कांगड़ा को ही देख लीजिए। सुधीर शर्मा और जी.एस. बाली की प्रदिद्वंद्विता किसी से छिपी नहीं। वहां से पवन काजल का नाम आ रहा है तो उससे भी कुछ लोगों को आपत्ति है। हमीरपुर से अग्निहोत्री खुद चुनाव नहीं लड़ रहे मगर वीरभद्र यह भी नहीं चाहते कि सुक्खू को टिकट मिले। मंडी में भी हालात ऐसे हैं। वीरभद्र न खुद लड़े, न प्रतिभा लड़ीं न विक्रमादित्य।

मगर वीरभद्र शायद यह भी नहीं चाहते कि किसी ऐसे व्यक्ति को टिकट मिले जो कल को इस सीट से उनके परिवार की संभावनाओं को ही खत्म कर दे। इसलिए आश्रय शर्मा को उतारे जाने का उन्होंने विरोध नहीं किया कि क्योंकि जानकारों का कहना है कि सुखराम और वीरभद्र के गले मिलने का मतलब यह न निकाला जाए कि वीरभद्र खुलकर आश्रय का समर्थन करेंगे। वह कभी नहीं चाहेंगे कि आश्रय यहां से जीते।

उधर शिमला ही एक ऐसी सीट है जिसमें विनेबिलिटी के आधार पर फैसला लेने की कोशिश की गई। यह आरक्षित सीट है और कांग्रेस के सवर्ण नेताओं और उनके बच्चों का यहां से कोई चांस नहीं है। इसलिए वे यहां पर रायता नहीं फैला पाए। सारी मारधाड़ हमीरपुर, मंडी और कांगड़ा को लेकर सीमित हो गई। मंडी में तो फिर भी आश्रय को टिकट दे दिया गया, हमीरपुर और कांगड़ा में खोदल पड़ी हुई है।

आश्रय ही क्यों, हप्पू सिंह क्यों नहीं
आश्रय के नाम पर जब से कांग्रेस में चर्चा चल रही थी, पार्टी के आम कार्यकर्ता काफी निराश दिख रहे थे। अब सुखराम के पोते को टिकट दिए जाने के बाद कार्यकर्ता बुरी तरह से टूट चुके हैं। मानो या न मानो, मंडी सदर से बाहर सुखराम परिवार का जनाधार नगण्य है। और जो ये कहते हैं मंडी में बीजेपी की इतनी सीटें पहली बार सुखराम के कारण आईं वे भ्रम में हैं। सरकाघाट, धर्मपुर, जोगिंदर नगर और करसोग जैसी जगहों पर तो इन्हें अपने दम पर चार लोग न मिलें सभा करने के लिए। कुल्लू, लाहौल-स्पीति में तो उन्हें कोई पूछे भी न।

ऊपर से लोगों में इस परिवार के खिलाफ भारी नाराजगी है। फिर किस आधार पर आश्रय शर्मा को कुलदीप राठौर मजबूत कैंडिडेट बता रहे हैं? क्या वह भूल गए कि अधिक से अधिक वोटों से जीतने की संभावना रखने वाले को मजबूत कहा जाता है, उसे नहीं जिसके अधिक से अधिक वोटों से हारने की आशंका हो।

भाजपाई भी नाराज हैं, कांग्रेसी भी। भाजपाई कभी इस परिवार को स्वीकार नहीं कर पाए और कांग्रेसी तभी से नाराज हैं जब अनिल शर्मा पाला बदलकर बीजेपी की गोद में जा बैठे थे। अब उनका फिर से कांग्रेस में आना कार्यकर्ताओं को चुभ रहा है। उन्हें दर्द इस बात का भी है कि उन्हें पार्टी के साथ वफादारी करने पर भी ऐसे मौके नहीं मिलते, जितने मौके दल बदलकर आने वाले तकाकथित अवसरवादियों को मिल जाते हैं।

हप्पू सिंह को टिकट क्यों नहीं
कांग्रेस को अगर टिकट ही देना था तो मौका था कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का। उनमें उत्साह फूंकने, उनमें उम्मीद जगाने का न कि उन्हें हताश करने का। यह दावा है कि आश्रय के बजाय कांग्रेस के किसी हप्पू सिंह (कहने का अर्थ है कोई गुमनाम-सा कार्यकर्ता) को भी टिकट दे दिया जाता तो कार्यकर्ता भी उत्साह में वोट देते और रामस्वरूप शर्मा के खिलाफ इनकमबेंसी का फायदा भी उसे होता। असंतुष्ट भाजपा समर्थक भी वोट देते। मगर अब असंतुष्ट भाजपा समर्थक कहेंगे कि इससे अच्छा तो बीजेपी को ही वोट देंगे। हताश हुए कांग्रेसी कार्यकर्ता भी अब बीजेपी को वोट देने की ओर बढ़ सकते हैं।

उदाहरण के लिए मंडी से ही यदोपति ठाकुर कांग्रेस का एक युवा और चर्चित नाम है। वह आश्रय शर्मा से ज्यादा जाना-पहचाना नाम हैं। एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस की जिम्मेदारियों के कारण वह प्रदेश में जगह-जगह घूमे हैं और खासकर मंडी-कु्ल्लू में। उनके आने से यूथ उनके साथ नहीं जुड़ता? वीरभद्र को चाहिए था कि अपने खेमे से यदोपति का ही नाम आगे कर देते। मगर ऐसा करते और यदोपति को अच्छे खासे वोट मिल जाते, वह युवा नेता के तौर पर उभर जाते तो फिर विक्रमादित्य का क्या होता?

यानी कुल-मिलाकर इस चुनाव से जनता, जनता के मुद्दे, जनता की समस्याएं… सब गायब हैं। कोई नेता अपना हित देख रहा, कोई परिवार का। पार्टी के बारे में तो कोई सोच ही नहीं रहा। कांग्रेस के नेताओं खासकर नए प्रदेशाध्यक्ष को चाहिए कि नेताओं की बैठकों में जाकर बात करके फैसले न करे, आम जनता से जुड़कर उसकी बात समझकर फैसले करे। एक नजर सोशल मीडिया पर भी डाल दो कि जहां-जहां सुखराम, अनिल शर्मा, आश्रय का जिक्र हो रहा है, वहां पर कैसे कॉमेंट आ रहे हैं। वीरभद्र सिंह की तरह आउटडेटेड पॉलिटिक्स न करें, नए दौर में कदम से कदम मिलाकर चलें और भविष्य के हिसाब से प्लैनिंग करें।

वरना हिमाचल में तो कुंडा गोल है ही, जैसे हाल कांग्रेस के हिमाचल में हैं, वैसे अगर अन्य राज्यों में भी हैं तो इस बार कहीं देशभर में चार ही सीटें न आएं।

क्या कुलदीप राठौर की चूक ने हिमाचल कांग्रेस को घुटनों पर ला दिया है?

(लेखक लंबे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

तो क्या बेटे को कांग्रेस का टिकट मिलते ही इस्तीफा देंगे अनिल शर्मा?

तो क्या बेटे को कांग्रेस का टिकट मिलते ही इस्तीफा देंगे अनिल शर्मा?

आई. एस. ठाकुर।। देश में लोकतंत्र है। जिसका जो मन करे, जब मन करे पार्टी बदल सकता है। हमारे की खूबूसरती यह है कि एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्य अलग-अलग धर्मों का अनुसरण कर सकते हैं। फिर एक ही परिवार के सदस्यों का अलग-अलग पार्टी में होने को लेकर सवाल उठाने का तो कोई मतलब नहीं। देश भर में छोड़िए, आपको अपने गांव-पड़ोस में ही कई उदाहरण मिल जाएंगे जहां पर पिता की राजनीति पसंद बेटे से अलग होती है तो कहीं एक भाई एक पार्टी में है तो दूसरा किसी और पार्टी में।

जब आश्रय शर्मा और पंडित सुखराम ने कांग्रेस में शामिल होने का फैसला किया तब सवाल यह उठा कि सुखराम के बेटे और आश्रय के पिता अनिल शर्मा तो बीजेपी में हैं। फिर ये दादा-पोता क्यों कांग्रेस में शामिल हो गए। जो लोग ये सवाल उठा रहे थे, मुझे उनके सवाल सही नहीं लगे। इसलिए क्योंकि राजनीतिक पसंद सबकी हो सकती है। हो सकता है कोई बीजेपी को पसंद करता हो तो कोई कांग्रेस को। या किसी को बीजेपी के बजाय कांग्रेस में अपनी संभावनाएं ज्यादा नजर आती हों। यह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है।

पिता का बीजेपी सरकार में मंत्री होना और बेटे का कांग्रेस का नेता होना गलत नहीं है। बेटे का अपना जीवन है, वह अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है। पिता को भी बेटे के जीवन में टोका-टोकी करने या जबरन किसी पार्टी में बनाए रखने या उसे चुनाव लड़ने से रोकने का कोई अधिकार नहीं। पंडित सुखराम, अनिल शर्मा और आश्रय शर्मा के मामले में भी यही बात लागू होती है। मगर जैसा कि मैंने कहा, हर व्यक्ति की पसंद अलग हो सकती है और परिवार के सदस्य अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों में हो सकते हैं, तो आदर्श स्थिति यह होनी चाहिए कि परिवार का हर व्यक्ति अपनी पसंद पर गर्व करे और दूसरे परिजन की पसंद का सम्मान करे।

अनिल शर्मा की गोलमोल बातें
कहने का अर्थ यह है कि अगर अनिल शर्मा बीजेपी में हैं तो उन्हें दिल से बीजेपी में होना चाहिए। अगर कोई उनसे कहे कि आपका बेटा कांग्रेस में है और अगर उसे टिकट मिला तो आप क्या करेंगे। उस पर उनका जवाब होना चाहिए- मेरे बेटे की अपनी पसंद है। उसका अपना फैसला है। उसे शुभकामनाएं। मगर मैं भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता हूं। इसकी विचारधारा में मुझे यकीन है और मैं चाहूंगा कि मैं अपनी पार्टी के प्रत्याशी के लिए मेहनत कहूं और उसे जिताऊं। बेटे के लिए शुभकामनाएं, वह अपनी पार्टी से कोशिश करे।

मगर ऐसा हुआ नहीं। अनिल शर्मा कह रहे कि मेरी कोई भूमिका नहीं, हाईकमान इस्तीफा मांगे तो दे देंगे। मैं बेटे को टिकट मिलने को लेकर आश्वस्त हूं, मैं किसी के लिए चुनाव प्रचार नहीं करूंगा। ये सारे बयान विभिन्न अखबारों और पोर्टलों में छपे हैं, (नीचे देखें)। यानी कि वह डांवाडोल हैं। उन्हें कहना चाहिए था कि मैं क्यों इस्तीफा दूं, मेरी निष्ठा पार्टी के प्रति है। कांग्रेस में जाने का फैसला बेटे का मेरा नहीं। मगर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा।

आश्रय को टिकट मिला तो इस्तीफा देंगे अनिल?
उधर बेटे को भी ऐसा ही कहना चाहिए कि मेरे पिता बीजेपी में हैं तो उनका अपना फैसला है और कांग्रेस में जाने का फैसला उनका निजी है। मगर वह यह कहते फिर रहे हैं कि जल्द ही उनके पिता फैसला लेंगे। वह अपने पिता की तरफ से बयान देते घूम रहे हैं। जो बातें अनिल नहीं कह रहे, वह आश्रय कह रहे हैं। न्यूज 18 को दिए इंटरव्यू में आश्रय ने साफ कहा कि एकजुटता से ही हम पिछले चुनाव से सफलता हासिल कर पाए और उचित समय पर वह निर्णय लेंगे। रिपोर्टर ने जब पूछा कि क्या अनिल शर्मा इस्तीफा देंगे, तो आश्रय ने कहा- वह सही समय पर हम फैसला लेंगे। यहां हम शब्द पर ध्यान दिया जाना जरूरी है।

कांग्रेस में "आश्रय " लेने के बाद क्या बोले सुखराम के पोते…

कांग्रेस में "आश्रय " लेने के बाद क्या बोले सुखराम के पोते….Pankaj Kapahi

News18 Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಮಂಗಳವಾರ, ಮಾರ್ಚ್ 26, 2019

बहरहाल, इस इंटरव्यू के दौरान आश्रय ने कहा कि हम सत्ता के भूखे नहीं हैं होते तो सरकार के चार साल बचे हैं और उसी में रहते। उन्होंने कगा कि जहां मान-सम्मान न हो, उस सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा। बहरहाल, सत्ता का भूखा कौन है, कौन नहीं यह तो जनता अपने विवेक से तय करेगी। मगर जिस तरह मंडी में सुखराम परिवार के इर्द-गिर्द ड्रामा चल रहा है, उसपर पर हर किसी की निगाहें टिकी हुई हैं।

आश्रय के लिए ‘इंश्योरेंस’ हैं अनिल शर्मा?
ऐसी चर्चा है कि अनिल खुद इसलिए इस्तीफा नहीं देना चाहते ताकि पार्टी उन्हें हटाए और फिर वह विक्टिम कार्ड खेलकर अपने पिता और बेटे के साथ मिलकर कहें कि अन्याय हो गया मेरे साथ भी। लेकिन इतना तय है कि आश्रय ने संकेत दे दिए हैं कि अगर उन्हें टिकट मिल जाता है तो पिता बीजेपी छोड़कर उनके साथ प्रचार में जुट जाएंगे। और अगर नहीं मिलता है तो अनिल शर्मा आराम से भाजपा सरकार में मंत्री बने रहेंगे, बेटा कांग्रेस में रहेगा। ऐसे में हालात यही बनेंगे कि भाजपा के मंत्री पिता कांग्रेसी बेटे के लिए काम करवाकर उसकी राजनीतिक जमीन को मजबूत करेंगे। और बीजेपी मूकदर्शक बनी रहेगी और मंडी के अपने वफादार कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करती रहेगी। ऐसा हुआ तो इसका नतीजा यह होगा कि फिर मंडी पर सुखराम फैमिली का राज बना रहेगा जो जरूरत के हिसाब से पाले बदलने के लिए जाना जाता है।

(लेखक लंबे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं. उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

वीरभद्र ने खत्म कर दिया संगठन, इसलिए नहीं मिल रहे कैंडिडेट: मनकोटिया

धर्मशाला, अमित पुरी।। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस अभी भी असमंजस में है और उमीदवार ढूंढ रही है। ऐसे में कई उमीदवार ऐसे है जो लड़ने से भी इनकार करते दिखाई दे रहे है। काँगड़ा संसदीय क्षेत्र से मेजर विजय सिंह मनकोटिया का कहना है कि उन्हें भी कांग्रेस की ओर से दिल्ली बुलावा आया और टिकट ऑफर हुई लेकिन उन्होंने साफ कहा कि वे चुनाव नही लड़ेंगे।

मनकोटिया ने फ़ोन पर बात करते हुए हमसे कहा कि कांग्रेस जब हमेशा अंत मे जब सब जगह से उमीद खो देती है तो उसे मेरी याद आती है। मनकोटिया ने कहा कि इस बार भी ऐसा ही हुआ।

उन्होंने कहा, “मैं तो चुनाव लड़ूंगा नहीं। मैने साफ इनकार कर दिया।” उन्होंने कहा कि मेरे पास राहुल के राजदूत आए थे लेकिन मैंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया।

वहीं मनकोटिया ने कहा कि कांग्रेस में संगठन को वीरभद्र सिंह ने खत्म कर दिया है और उसी वजह से आज हिमाचल में कांग्रेस की ये दयनीय हालत है। मनकोटिया ने आरोप लगाए कि आज यही वजह है कि कोई भी उमीदवार लड़ने के लिए तैयार नही हो रहा है। उन्होंने कहा, “इसी वजह से मुझे बलि का बकरा बनाने का प्रयास किया जा रहा था जो मैं नहीं बनूँगा।”

जब अचानक ढाबे पर चाय पीने रुके मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर

कांगड़ा।। कांगड़ा जिले के त्रिलोकपुर में एक ढाबे के मालिक उस समय हैरान रह गए जब मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, उनके मंत्रियों और विधायकों का काफिला उनकी दुकान के सामने रुक गया। आसपास के लोग भी यह नजारा देखकर थोड़े हैरान नजर आए।

दरअसल जिस समय मुख्यमंत्री इंदौरा से ज्वालामुखी जा रहे थे, उस समय वह त्रिकोकपुर में एक ढाबे पर चाय पीने के लिए रुक गए। जरम सिंह टी स्टॉल पर मुख्यमंत्री ने चाय की और अपने सहयोगियों के साथ चर्चा भी की।

वहां मौजूद लोगों में इस बात की चर्चा रही कि कैसे मुख्यमंत्री एक आम आदमी की तरह आए, चायपान किया और बिला चुकाकर चल दिए।

मुख्यमंत्री जयराम इससे पहले भी इसी तरह से सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा घेरा तोड़कर लोगों से मिलने के लिए चर्चा में रहे है। पिछले दिनों शिमला में बर्फबारी के दौरान उनका पैदल चलते हुए हालात का जायजा लेने का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।

बीजेपी नेता ने देश के पहले वोटर को बनाया ‘चौकीदार’, चुनाव आयोग का नोटिस

शिमला।। देश के पहले वोटर श्याम सरन नेगी के नाम के आगे चौकीदार जोड़े जाने पर चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किया है। आयोग ने किन्नौर के डीसी और श्याम सरन नेगी से पूछा है कि क्या एक पोस्टर में उनकी तस्वीर और नाम के साथ ‘मैं भी चौकीदार’ सहमति से इस्तेमाल किया गया है या नहीं। दरअसल बीजेपी के एक नेता रवि राणा ने ट्विटर पर नेगी की तस्वीर शेयर की थी जिसमें ‘मैं भी चौकीदार लिखा गया था।’ हालांकि, अब बीजेपी के इस नेता ने ट्विटर से वह तस्वीर हटा दी है।

चुनाव आयोग ने भाजपा के नेता को भी नोटिस जारी किया है। दरअसल चुनाव आयोग से शिकायत की गई थी कि भाजपा के नेता ने ऐसा पोस्टर तैयार किया है। भाजपा ने इस बार लोकसभा चुनाव में ‘मैं भी चौकीदार’ का नारा दिया है। बीजेपी के नेताओं ने अपने ट्विटर हैंडल में नाम से पहले चौकीदार शब्द जोड़ा है और अन्य नेता और कार्यकर्ता भी मैं भी चौकीदार नारे के साथ सोशल मीडिया पर चीजें पोस्ट कर रहे हैं।

श्याम सरन नेगी को लेकर बनाए गए इस पोस्टर के संबंध में एक पत्रकार ने भी चुनाव आयोग के हैंडल को मेंशन करते हुए ट्वीट किया है।

दरअसल इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना जा रहा है। वह भी इसलिए क्योंकि मतदाताओं को वोट देने के लिए प्रेरित करने के लिए चुनाव आयोग श्याम सरन नेगी को एक आइकॉन के तौर पर पेश करता रहा है जो पहले मतदाता रहे हैं और वोट देने के कर्तव्य से पीछे नहीं हटे।

कांगड़ा में बोले सीएम जयराम- अब की बार, फिर चार की चार

अमित पुरी, कांगड़ा।। कागड़ा के दौरे पर आए हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का कार्यकर्ताओं ने जमकर स्वागत किया। कांगड़ा लोकसभा सीट से बीजेपी के प्रत्याशी और अपने मंत्रिमंडल के सदस्य किशन कपूर के समर्थन में सीएम ने महिला कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत की।

सीएम ने कार्यकर्ताओं में नया जोश भरते हुए अपील की कि बीजेपी उम्मीदवार को रिकॉर्ड मतों से विजयी बनाएं ताकि केंद्र में एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बने।

कांगड़ा  में पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि देश में फिर से मोदी लहर है और एक बार फिर केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी। उन्होंने कहा, “बीजेपी ने नारा दिया है- अब की बार, 400 के पार। हिमाचल में चार लोकसभा सीटें हैं। ऐसे में मेरा नारा है- अब की बार, फिर चार की चार।”

‘चंदेल से बातचीत जारी’
मंडी में सुखराम और आश्रय के कांग्रेस में जाने के बाद आश्रय को कांग्रेस की ओर से टिकट मिलने की चर्चाओं पर सीएम ने कहा कि पूरे देश में ऐसे घटनाक्रम होते रहे हैं, मगर मंडी में रामस्वरूप शर्मा हमारे प्रत्याशी हैं और वह विजयी होंगे। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि नाराज चल रहे सुरेश चंदेल से बातचीत की जा रही है। उन्होंने कहा कि सुरेश चंदेल को रुचना चाहिए।

सीएम ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों की हर योजना का प्रचार किया जाएगा। उन्होंने कहा, “आज देश का हर व्यक्ति कर रहा है- मैं भी चौकीदार हूं। जबकि कांग्रेस के पास कोई मुद्दा ही नहीं है।”

सीएम ने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान 15 लाख रुपये दिए जाने के कथित वादे को लेकर कहा कि इस बयान को ट्विस्ट किया गया था। उन्होंने कहा कि यह कहा गया था कि अगर काले धन को वापस लाया जाता है तो यह इतनी रकम होगी कि हर गरीब व्यक्ति को 15 लाख रुपये मिल सकते हैं।

सीएम फोन पर रहे व्यस्त, कार्यकर्ता कार्यक्रम से जा रही महिलाओं को संभालने में हुए त्रस्त

कांगड़ा, अमित पुरी।। मंगलवार को कांगड़ा में भाजपा का महिला सम्मेलन आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ट्विस्ट पर ट्विस्ट देखने को मिले। पहले सीएम जयराम ठाकुर एक घण्टा कार्यक्रम में लेट पहुंचे। फिर जब कार्यक्रम शुरू हुआ तो सीएम का फ़ोन बज गया। कांगड़ा के उम्मीदवार किशन कपूर का भाषण खत्म हो गया, शांता कुमार भाषण देने आ गए लेकिन सीएम फ़ोन पर व्यस्त दिखे।

एक तरफ कांगड़ा संसदीय क्षेत्र के उमीदवार भाषण दे रहे थे तो दूसरी तरफ सीएम फ़ोन पर व्यस्त दिख रहे थे। यह पहला मौका था जब सीएम इस तरह से किसी कार्यक्रम के दौरान इस तरह फोन पर व्यस्त नजर आए। गौरतलब है कि हिमाचल में मंडी और बिलासपुर के घटनाक्रम के बाद आलाकमान लगातार सीएम जयराम के संपर्क बनाए हुए है।

हिमाचल प्रदेश के ऊर्जा मंत्री अनिल शर्मा के बेटे आश्रय शर्मा कांग्रेस में शामिल हुए हैं और बिलासपुर से सुरेश चंदेल के कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ने की खबरें आ रही हैं। चर्चा है कि इन बदले हुए हालात का प्रबंधन करने की जिम्मेदारी बीजेपी आलाकमान ने सीएम पर छोड़ी हुई है।

ऐसे में वह तय शेड्यूल के तहत जोगिंदर नगर होते हुए कांगड़ा पहुंचे और पार्टी के कार्यक्रमों में हिस्सा लिया और साथ ही आश्रय शर्मा और सुरेश चंदेल को लेकर भी आलाकमान के संपर्क में रहे। कांगड़ा सीएम ने 3 से चार बार फ़ोन काट कर दोबारा मिलाया और लंबी बात चली। चर्चा है कि सीएम इसी मामले को लेकर व्यस्त रहे।

इस बीच बीजेपी के कार्यक्रम में आई महिलाओं ने कार्यक्रम छोड़ बाहर जाना आरम्भ कर दिया। ऐसे में कुछ कार्यकर्ता बाहर डट गए और महिलाओं को जाने से रोकने लगे। यह था तो महिलाओं का सम्मेलन लेकिन इसमें काफी कुर्सियां खाली भी दिखीं। महिलाओं ने इस कार्यक्रम में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।

बता दें कि मंगलवार को कांगड़ा संसदीय क्षेत्र के उम्मीदवार किशन कपूर के प्रचार के आरंभ का कार्यक्रम कांगड़ा से किया गया था। ऐसे में चर्चा है कि अगर मंडी औऱ बिलासपुर से पैदा हुए हालात से निपटने में अगर बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व ऐसे ही व्यस्त रहेगा तो कहीं अन्य सीटों पर बुरा असर न पड़ जाए।

क्या कुलदीप राठौर की चूक ने हिमाचल कांग्रेस को घुटनों पर ला दिया है?

आई.एस. ठाकुर।। हिमाचल में लोकसभा चुनाव के सबसे आखिरी चरण में वोटिंग होगी। एक ओर जहां बीजेपी के उम्मीदवारों ने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है, कांग्रेस में समझ ही नहीं आ रहा कि हो क्या रहा है। इतने चुनाव हिमाचल में हो गए मगर कांग्रेस कभी इतनी बेबस नजर नहीं आई कि उसके दिग्गज नेता ही चुनाव लड़ने से कतरा रहे हों। हालात ऐसे हैं कि कुछ समय पहले तक जो दावेदारी जता रहे थे, वे भी गायब से हो गए हैं।

शिमला में धनी राम शांडिल के नाम की चर्चा चल रही है मगर उनके नाम का ऐलान अभी तक नहीं हुआ। मंडी से पंडित सुखराम के पोते आश्रय शर्मा को टिकट देने की चर्चा चल रही है जो पहले बीजेपी से टिकट मांग रहे थे और फिर हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुए हैं। हमीरपुर से बीजेपी के असंतुष्ट सुरेश चंदेल को टिकट दिए जाने की संभावनाओं की अटकलें हैं तो कांगड़ा में तो रायता ही फैला हुआ है।

बेबस हुई कांग्रेस
ऐसा लगता है कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने चुनाव से पहले ही हार मान ली है। कांग्रेस संगठन मानो घुटने टेक चुका है। हिमाचल प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व इतना बेबस हो चुका है कि वह अच्छा प्रत्याशी अपनी पार्टी के अंदर से नहीं ढूंढ पा रहा जो अब बीजेपी से आयातित लोगों को टिकट देने की चर्चा हो रही है। वह भी उन लोगों को, जिन्हें टिकट देना बीजेपी ने भी उचित नहीं समझा।

इससे यह पता चल रहा है कि कांग्रेस के नेताओं और पूरे के पूरे संगठन के अंदर न सिर्फ आत्मविश्वास की कमी है बल्कि अनुशासन की भी कमी है। वे पार्टी के लिए आगे आकर लोहा लेने से भी कतरा रहे हैं। ये डरे हुए लोग भला कैसे 2022 में मुख्यमंत्री बनने का ख़्वाब देख रहे हैं? हिमाचल में बने इस माहौल ने कांग्रेस के रहे-सहे कार्यकर्ताओं का मनोबल भी पूरी तरह तोड़कर रख दिया है।

अगर कांग्रेस संगठन और पार्टी के ही किसी व्यक्ति को टिकट दे तो इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा। भले वो हर जाए। मगर बाहरी लोगों को अचानक टिकट दे देने से उन कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है जो सब कुछ छोड़कर पार्टी के लिए काम कर रहे होते हैं। यह सही है कि विनेबिलिटी देखनी होती है। मगर विनेबिलिटी के चक्कर में ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए कि पार्टी की नींव ही खोखली हो जाए।

राठौर की जिम्मेदारी
पिछले दिनों जब सुखविंदर सिंह सुक्खू की जगह कुलदीप सिंह राठौर को कांग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष बनाया गया था तो उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वह संगठन को नई दिशा देंगे। राठौर ने भी कहा था कि अब नए सिरे नए जोश का संचार पार्टी में किया जाएगा। मगर राठौर के दावे धरे के धरे रहते नजर आ रहे हैं। वह खुद बेबस से नजर आ रहे हैं और दिल्ली और शिमला के बीच चक्कर काटने में व्यस्त हैं।

कुलदीप सिंह राठौर

दरअसल कांग्रेस की यह हालत इसलिए भी हुई है कि वीरभद्र सिंह आराम से बैठकर मुस्कुराते हुए सब देख रहे हैं। उन्होंने कह दिया है कि मैं खुद चुनाव लड़ूंगा नहीं, मंडी से कोई मकरझंडू लड़ेगा; शिमला से कोई भी लड़ लेगा, हमीरपुर से अभिषेक राणा को लड़ाना चाहिए और कांगड़ा से सुधीर को। इसके अलावा वह न तो कोई सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और न ही कोई जोर आजमाइश कर रहे हैं।

वीरभद्र की चुप्पी
वीरभद्र का यूं शांत बैठ जाना पहली बार देखने को मिला है। वरना विधानसभा चुनाव से लेकर लोकसभा चुनाव तक हमेशा वीरभद्र अपने या अपने लोगों को टिकट दिलाने के लिए जोर लगाते रहे है। वह इस बार अपने पसंदीदा लोगों के पक्ष में बोल तो रहे हैं मगर वह भी तब, जब कोई पत्रकार उनसे इस बारे में सवाल करे। वरना वह कोई कोशिश नहीं कर रहे कि अपने लोगों को टिकट ही दिलवा दिया जाए।

कुलदीप राठौर जब अध्यक्ष बने थे, शपथ लेने वाले दिन हुए विवाद के बाद ही यह संकेत मिल गए थे कि वह वीरभद्र पर आश्रित रहकर ही आगे बढ़ना चाह रहे हैं। यहीं उनसे चूक हो गई। उनका वीरभद्र को अधिक तरजीह देना ही आज उनके लिए अब परेशानी का सबब बन गया है। वीरभद्र चुप हो गए हैं और कुलदीप को समझ नहीं आ रहा कि क्या किया जाए। उधर अग्निहोत्री, जीएस बाली, सुधीर शर्मा, कौल सिंह… ये भी खामोश हैं। सबको चिंता है कि इस चुनाव में हारे तो भविष्य की सारी संभावनाएं खत्म। ऐसे में कुलदीप अकेले ही सब कुछ मैनेज करते नजर आ रहे हैं।

सुक्खू की राह चलते तो…
सुखविंदर सिंह सुक्खू की वीरभद्र लाख आलोचना करते हों मगर वह तिकड़मी थे। जानकारों का कहना है कि अगर वह प्रदेशाध्यक्ष होते तो कांग्रेस की हालत ऐसी न हुई होती, वह किसी न किसी तरह ऐसी व्यवस्था कर ही लेते कि कांग्रेस के अपने अंदर से ही लोग चुनाव लड़ने के लिए न सिर्फ तैयार होते बल्कि वे ऐसे उम्मीदवारों के नाम भी आगे बढ़ाते जो भाजपा को कड़ी टक्कर देने का माद्दा रखते।

वैसे अभी भी सुक्खू से वीरभद्र को दिक्कत है। तभी तो दो दिन पहले एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि सुक्खू राजनीति कर रहे हैं। बुरी तरह खज्जल नजर आ रहे कुलदीप को चाहिए था कि अध्यक्ष बनते ही उसी राह पर चलते, जो सुक्खू ने पकड़ी थी- वीरभद्र के छत्र से बाहर आओ और अन्य खेमों को भी भाव मत दो। लेकिन यहीं उनसे चूक हो गई थी।

अब शायद कुलदीप ने देर कर दी है। सबको साथ लेकर चलने के चक्कर में उन्होंने संगठन को कमजोर कर दिया है। हिमाचल का इतिहास रहा है कि चुनाव कोई भी रहा हो, कांग्रेस ने अगर वीरभद्र की पसंद के बंदे को टिकट नहीं दिया है तो चमत्कारी ढंग से या तो वह बुरी तरह हारा है या फिर हारते-हारते बचा है। ऐसा क्यों होता है, इसे लेकर कई तरह थ्योरियां चलन में हैं। अब लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ऐसे लोगों को टिकट देने की तैयारी कर रही है जो वीरभद्र खेमे के नहीं हैं। ऐसे में इनके जीतने पर पहले ही सवाल खड़ा हो जाता है।

सुक्खू ने कांग्रेस को वीरभद्र के इसी इफेक्ट से बाहर निकालने की कोशिश की थी। मगर शायद राठौर को भी लगता होगा कि हिमाचल में वीरभद्र ही कांग्रेस है, वीरभद्र के बिना कांग्रेस कुछ नहीं। लेकिन वह भूल गए कि राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं। समीकरण और प्रभाव को बदला जा सकता है। अगर राठौर समय पर सही कदम उठाए होते तो ऐसी नौबत न आती। अब चूंकि उम्मीदवारों को लेकर वही सारी भागदौड़ कर रहे हैं, ऐसे में अगर कांग्रेस के उम्मीदवार हारे तो सारा ठीकरा उन्हीं के सिर फूटेगा। इसका सीधा फायदा किसे होगा, सभी जानते हैं।

(लेखक लंबे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

हिमांशु को ढूंढने वाले युवकों को पिता ने एक लाख भेंट करके किया सम्मानित

धर्मशाला, अमित पुरी।। धौलाधार की पहाड़ियों में 8 दिन से लापता हिमांशु को सोमवार को स्थानीय ट्रेकरों ने ढूंढ निकाला। इन ट्रेकरों को एक लाख रुपये देकर हिमांशु के पिता ने सम्मानित किया।

बता दें कि धौलाधार की पहाड़ियों पर ट्रैकिक के लिया गया दिल्ली का रहने वाला हिमांशु 8 दिनों से लापता था। ग़ौरतलब है कि दिल्ली का रहने वाला 19 वर्षीय हिमांशु 7 दिन पहले अपने दोस्तों के साथ यहां घूमने आया था।

त्रियुंड में ट्रैंकिग के दौरान वे लापता हो गया और अपने दोस्तों से बिछड़ गया। उसके बाद से लगातार हिमांशु की तलाश की जा रही थी और पुलिस से लेकर आर्मी भी उसे ढूंढने का प्रयास कर रही थी। उनका 7 दिन का प्रयास नाकाम रहा मगर स्थानीय युवकों ने एक घंटे में उसे तलाश लिया।

धर्मशाला की पहाड़ियों में एक हफ्ते से भटक रहे हिमांशु नाम के छात्र को स्थानीय युवकों ने ऐसे किया रेस्क्यू। 7 दिन सिर्फ पानी पीकर बचाई जान। (वीडियो: अमित पुरी)

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಸೋಮವಾರ, ಮಾರ್ಚ್ 25, 2019

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