पुलिस भर्ती फर्जीवाड़ा: एक नहीं, चार रिंगलीडरों को ढूंढ रही है पुलिस

अमित पुरी, धर्मशाला।। पुलिस भर्ती फर्जीवाड़े में अब तक 24 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। मामले की जांच जारी है और गिरफ्तारियों का आंकड़ा और बढऩे की संभावना है। फर्जीवाड़े के तार हरियाणा और उत्तर प्रदेश से जुड़े हुए हैं, जिसके चलते बाहरी राज्यों के लिए टीमें रवाना की गई हैं।

एसपी कांगड़ा विमुक्त रंजन ने दावा किया है कि इस फर्जीवाड़े में पुलिस से किसी की संलिप्तता नहीं है। फर्जीवाड़े में 3 से 4 मास्टरमाइंड होने की संभावना है, जिनकी तलाश पुलिस कर रही है। इनमें से मात्र एक की जानकारी पुलिस के पास है।

बता दें कि 11 अगस्त को जिला कांगड़ा में आयोजित पुलिस कांस्टेबल की लिखित परीक्षा के दौरान अभ्यर्थियों द्वारा इलेक्टोनिक उपकरण का इस्तेमाल करने और अभ्यर्थियों के स्थान पर अन्य युवकों द्वारा परीक्षा देने का मामला सामने आया था। जिस पर कुछ युवकों की गिरफ्तारियां हुई थी।

इस फर्जीवाड़े में अब तक 24 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें 10-11 अभ्यर्थी हैं, जिन्होंने परीक्षा देने के लिए अन्य युवकों को पैसे दिए थे। पुलिस प्रशासन की मानें तो फर्जीवाड़े से जुड़े मामले में एक ग्रुप के सरगना की जानकारी पुलिस को है, जबकि 3 से 4 गुप हैं, जिनके सरगना अभी बाहर हैं। पुलिस हर पहलू को ध्यान में रखकर जांच में जुटी हुई है।

जानें, क्या होता है चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और उसका काम क्या होगा

इन हिमाचल डेस्क।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण में कहा कि सैन्य सुधारों की दिशा में अहम कदम उठाते हुए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के पद की व्यवस्था की जाएगी। बता दें कि भारत की तीनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ाने के लिए समय समय पर इस पद की मांग उठती रही है।

सीधे शब्दों में कहें तो Chief of Defence Staff या CDS का काम भारत सरकार को सुरक्षा और सेना के मामलों पर सलाह देना होगा। इससे भी अहम काम होगा- थलसेना, नौसेना और वायुसेना के बीच सामंजस्य स्थापित करना। सीडीएस सीधे सरकार को तीनों सेनाओं से जुड़े मामलों की जानकारी देगा।

फाइव स्टार जनरल
अभी जो तीनों सेनाओं के प्रमुख होते हैं, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद उनसे भी ऊपर होगा। यानी वह तीनों सेवाओं का प्रमुख सैन्य अधिकारी होगा। अभी  भारत की तीनों सेनाओं के प्रमुख फोर स्टार जनरल हैं (ऊपर तस्वीर में तीनों की कमीज के कॉलर पर लगे सितारे देखें)। अब भावी सीडीएस फाइव स्टार सैन्य अधिकारी होगा। श्रीलंका, ब्रिटेन, कनाडा और फ्रांस समेत कई देशों में इस पद की व्यवस्था है।

फाइव स्टार जनरल बहुत वरिष्ठ सैन्य पद होता है जो जनरल से ऊपर होता है। अभी तक भारत में फील्ड मार्शल, एडमिरल ऑफ द फ्लीट और मार्शल ऑफ दि एयर फोर्स ही फाइव स्टार जनरल पद हैं मगर ये रेगुलर नहीं है। इन्हें युद्ध के समय या सेरिमोनियल रूप से (विशिष्ट सेवाओं के लिए सम्मानित करने के लिए) ही रखा जाता रहा है। सैम मानेकशॉ देश के पहले फील्ड मार्शल थे और उनके बाद के.एम. करियप्पा फील्ड मार्शल रहे थे। वायु सेना की बात करें तो अर्जन सिंह मार्शल ऑफ दि एयर फोर्स रहे थे। नौसेना में अभी तक किसी को एडमिरल ऑफ द फ्लीट नहीं बनाया गया।

अगर भारत के इस भावी पद CDS की बात करें तो अमरीका के जनरल ऑफ आर्मी, फ्लीट एडमिरल और जनरल ऑफ एयर फोर्स इस तरह के फाइव स्टार जनरल हैं। मगर वहां इन तीनों से भी ऊपर एक पद है- चीफ ऑफ आर्मीज। यह सिक्स स्टार सैन्य अधिकारी वहां की तीनों सेनाओं का प्रमुख होता है। जो काम वहां चीफ ऑफ आर्मीज का है, वही काम भारत के फाइव स्टार जनरल CDS का होगा जो यहां की तीनों सेनाओं का प्रमुख सैन्य अधिकारी होगा।

कारगिल युद्ध के बाद गठित कारगिल रिव्यू कमेटी ने भी इस पद की सिफारिश की थी। 2006 में ही इस पद के गठन को लेकर सरकार ने सभी पार्टियों से चर्चा शुरू की थी मगर कोई फैसला नहीं लिया गया। फिर 2017 में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमेटी ने तय किया था कि यह पद होना चाहिए। अब प्रधानमंत्री ने लाल किले की प्राचीर से सीडीएस का पद लाने की घोषणा की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सेना को लेकर किया बड़ा ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सेना को लेकर किया बड़ा ऐलान

नई दिल्ली।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 और 35A को हटाने का विरोध करने वाली कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। देश के 73वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने कहा कि हम न समस्‍याओं को न टालते हैं और न पालते हैं। पीएम ने सैन्य रिफॉर्म्स की बात करते हुए सीडीएस का पद लाने की घोषणा भी की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सेना को लेकर किया बड़ा ऐलान

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “सरकार बनने के 70 दिन के अंदर हमने 370 और 35 A को हटा दिया और संसद ने इसे दो तिहाई बहुमत से पारित भी कर दिया। जो काम 70 साल में नहीं हुआ, वह 70 दिन के भीतर हो गया।”

और क्या कहा पीएम ने, आगे पढ़ें:

1. आज हर नागरिक कह सकता है- वन नेशन, वन कंस्टीट्यूशन। राजनीति के गलियारों में, चुनाव के तराजू से तौलने वाले कुछ लोग, 370 के पक्ष में कुछ न कुछ बोलते रहते हैं। 370 की वकालत करने वालों से देश पूछ रहा है कि अगर यह आर्टिकल इतना अहम था, तो फिर 70 साल तक इतना भारी बहुमत होने के बाद भी आपने उसे स्थायी क्यों नहीं किया, अस्थायी क्यों बनाए रखा। आगे आते स्थायी कर देते। आप भी जानते थे, यह जो हुआ है, सही नहीं हुआ है। लेकिन सुधार करने की आपमें हिम्मत नहीं थी। मेरे लिए देश का भविष्य सबकुछ है।

2. हम न समस्याओं को टालते हैं, न समस्याओं को पालते हैं। न समस्याओं को पालने और न टालने का वक्त है। जो काम 70 साल में नहीं हुआ, वह नई सरकार बनने के 70 दिन के भीतर किया गया। संसद के दोनों सदनों ने 2 तिहाई बहुमत से इसको पारित कर दिया। हर किसी के दिल में यह बात पड़ी थी, लेकिन शुरू कौन करे, आगे कौन आए, शायद उसी की इंतजार था। इसलिए देशवासियों ने मुझे यह काम दिया। आपने जो काम दिया, उसी को करने के लिए आया। मेरा अपना कुछ नहीं है।

3. नई सरकार को 10 हफ्ते भी नहीं हुए, 10 हफ्ते के अंदर अनुच्छेद 370, 35 ए का हटना सरदार वल्लभ भाई पटेल के सपनों को पूरा करने में अहम कदम है। आगर 2014 से 2019 आवश्यकताओं की पूरी का दौर था तो 2019 के बाद का कालखंड देशवासियों की आकांक्षाओं की पूर्ति का कालखंड है, उनके सपनों को पूरा करने का कालखंड है।

4. लाखों लोग विस्थापित होकर आए उन्हें मानविक अधिकार नहीं मिले। पहाड़ी भाइयों की चिंताएं दूर करने की दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं। भारत की विकास यात्रा में जम्मू-कश्मीर बड़ा योगदान दे सकता है। नई व्यवस्था नागरिकों के हितों के लिए काम करने के लिए सीधे सुविधा प्रदान करेगी। ‘सबका साथ, सबका विकास’ का मंत्र लेकर हम चले थे लेकिन 5 साल में ही देशवासियों ने ‘सबका विश्वास’ के रंग से पूरे माहौल को रंग दिया। समस्याओं का जब समाधान होता है तो स्वावलंबन का भाव पैदा होता है, समाधान से स्वालंबन की ओर गति बढ़ती है. जब स्वावलंबन होता है तो अपने आप स्वाभिमान उजागर होता है और स्वाभिमान का सामर्थ्य बहुत होता है।

5. मैं अपने अफसरों के बीच बार बार कहता हूं कि क्या आज़ादी के इतनी वर्षों बाद सामान्य नागरिकों के जीवन में सरकारी दखल को ख़त्म नहीं कर सकते? लोग मनमर्जी से अपने परिवार की भलाई के लिए, देश की तरक्की के लिए इको सिस्टम बनाना होगा। सरकार का दबाव नहीं हो लेकिन अभाव भी नहीं होना चाहिए। सपनों को लेकर आगे बढ़ें, सरकार साथी के रूप में हर पल मौजूद हो। क्या उस प्रकार की व्यवस्था हम विकसित कर सकते हैं? पिछले पांच वर्षों में मैने प्रतिदिन एक गैर ज़रूरी क़ानून ख़त्म किए। 1450 क़ानून ख़त्म किए। अभी 10 हफ़्ते में ही हमने कई क़ानून ख़त्म कर दिए हैं।

6. आतंकवाद को पनाह देने वाले सारी ताक़तों को दुनिया के सामने उनके सही स्वरूप में पेश करना। भारत इसमें अपनी भूमिका पूरी करे, इस पर ध्यान देना है। भारत के पड़ोसी भी आतंकवाद से जूझ रहे हैं। हमारा पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान अपने आज़ादी के 100वें साल का जश्न मनाने वाला है। मैं उन्हें अनेक अनेक शुभकामना देता हूं। आतंकवाद का माहौल पैदा करने वालों को नेस्तनाबूद करने की हमारी नीति स्पष्ट है। सुरक्षाबलों, सेना ने उत्कृष्ट काम किया है। मैं उनको नमन करता हूं, उनको सैल्यूट करता हूं।

7. सैन्य रिफॉर्म पर लंबे समय से चर्चा चल रही है। कई रिपोर्ट आई हैं कि हम गर्व कर सकें, ऐसी व्यवस्था हैं। आज तकनीक बदल रही है। ऐसे में तीनों सेनाओं को एक साथ एक ही ऊंचाई पर आगे बढ़ें, विश्व में बदलते हुए सुरक्षा और युद्ध के अनुरूप हों, इसे देखते हुए अब हम चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) की व्यवस्था करेंगे।

विक्रमादित्य ने किया सरकार में अपनी पहुंच का प्रदर्शन, बीजेपी में रोष

शिमला।। शिमला ग्रामीण से कांग्रेस के विधायक और पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह ने फेसबुक पेज पर एक अखबार की कटिंग शेयर की है। खबर का शीर्षक है- विक्रमादित्य और जयराम की जुगलबंदी चर्चा में।

खबर में दावा किया गया है कि ‘विक्रमादित्य के डीओ नोट सीएम कार्यालय में धड़ाधड़ मंजूर हो रहे हैं।’ इसमें विक्रमादित्य के हवाले से कहा गया है कि ‘शिमला ग्रामीण को विपक्ष में होने का खामियाजा नहीं भुगतना होगा’

इस कटिंग को शेयर करते हुए विक्रमादित्य ने लिखा है- “सोच सकारात्मक हो तो अच्छे कार्य में कोई बाधा नहीं आती। हमारा लक्ष्य शिमला ग्रामीण का विकास करवाना है जिसके लिए हम सरकार के अच्छे कार्य का समर्थन व कमियों का विरोध करने में कभी पीछे नहीं हटेंगे।”

इस पोस्ट के साथ ही शिमला ग्रामीण के बीजेपी कार्यकर्ता असहज महसूस कर रहे हैं। शिमला जिले से ही बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता और विधायक के समर्थक भी इस पोस्ट के स्क्रीनशॉट शेयर कर रहे हैं कि कैसे उनके नेता के काम तो हो नहीं रहे मगर कांग्रेस विधायक के काम हो रहे है।

इसके अलावा प्रदेश में बीजेपी से जुड़े लोगों के व्हॉट्सएप ग्रुप्स में भी यह पोस्ट शेयर करते हुए लिखा जा रहा है कि ‘बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जिस पार्टी और जिस नेता की असफल सरकार को हटाने के लिए जीतोड़ मेहनत की थी, आज पार्टी के विधायक और उन्हीं नेता के बेटे के साथ सरकार गलबहियां कर रही है जबकि अपनी ही पार्टी के कुछ विधायकों को दूसरे खेमे का होने का आरोप लगाकर पूछा तक नहीं जा रहा।’

विक्रमादित्य सिंह

हालांकि, विक्रमादित्य के इस पोस्ट ने सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी है। क्योंकि अखबारों में आने वाली खबरों को अक्सर अटकल या निराधार कहकर खारिज कर दिया जाता है। मगर उसी खबर को शेयर करके विक्रमादित्य ने यह पुष्टि करने की कोशिश की है कि जो खबर में लिखा है, वह सच है।

अब विक्रमादित्य के इस पोस्ट के स्क्रीनशॉट बीजेपी के वो विधायक और नेता भी आपस में शेयर कर रहे हैं, जिन्हें शिकायत है कि उन्हें काम करवाने में दिक्कत हो रही है। यह काम गुपचुप व्हॉट्सएप ग्रुपों में किया जा रहा है। हालांकि बीजेपी के ही कुछ कार्यकर्ता कह रहे हैं कि यह कांग्रेस की ओर जानबूझकर लगाई गई खबर है और विक्रमादित्य ने रणनीति के तहत इसे शेयर करके बीजेपी सरकार को फंसाने की कोशिश की है।

डीएसपी ज्ञान चंद की गिरफ्तारी पर सवाल- फंसे या फंसाए गए?

कांगड़ा।। हाल ही में कथित तौर पर रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार किए गए जवाली के डीएसपी ज्ञान चंद ठाकुर के मामले को लेकर कई तरह के सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया पर बहुत से लोग यह लिख रहे हैं कि इस मामले के पीछे कोई साजिश हो सकती है। यहां तक कि कुछ पुलिसकर्मियों ने भी फेसबुक पर पोस्ट डालकर ज्ञान चंद को फंसाए जाने की आशंका जताई है।

हालांकि, इस मामले में ध्यान देने की बात यह है कि अगर कोर्ट में साबित हो जाता है कि ज्ञान चंद ठाकुर ने रिश्वत के तौर पर पैसे लिए थे, तो इस बात का कोई मतलब नहीं रह जाएगा कि पैसे कौन और क्यों दे रहा था, साजिश थी या नहीं। अगर एक रुपया भी लिया गया है तो वह अपराध है।

कौन हैं ज्ञान चंद
अपने लंबे सेवाकाल के दौरान हिमाचल में अलग-अलग जगह ड्यूटी कर चुके ज्ञान चंद तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा की सुरक्षा में भी तैनात रह चुके हैं। वह पिछले साल अक्तूबर में ही जवाली में बतौर डीएसपी आए थे। मगर चौंकाने वाली बात यह थी कि जवाली में उनकी तैनाती के चार महीने के अंदर ही उनके तबादले के आदेश कर दिए गए थे। आलम यह था कि फ़रवरी तक ही उनके ट्रांसफर की तीन कोशिशें हो चुकी थीं मगर कोर्ट स्टे होने के कारण उनका तबादला नहीं हो पाया।

जवाली में प्रभार संभालने के बाद से ही ज्ञान चंद ने नशे के खिलाफ अभियान छेड़ने की बात कही थी। इसके बाद इलाके में चरस, चिट्टा और नशीली दवाइयों के पकड़े जाने पर कई मामले दर्ज किए गए थे। हाल में चार अगस्त को ही इंदौरा में चिट्टा और कैपसूल पकड़े गए थे। पिछले लगभग 10 महीनों में जवाली पुलिस ने इस इलाके में ऐसी कई कार्रवाइयां की हैं।

पिछले दिनों जवाली पुलिस ने पौंग डैम में तैरने से रोकने पर सिख पुलिसकर्मी से हाथापाई करने वाले स्थानीय लोगों को भी पकड़ा था। इसके अलावा इलाक़े में खनन में सक्रिय लोगों के खिलाफ भी डीएसपी ज्ञान चंद द्वारा सख्त रुख अपनाने की बात चर्चा  में है। कहा जा रहा है कि वह बेहद दबाव के हालात में काम कर रहे थे।

बार-बार तबादला
इस साल फरवरी तक ही ज्ञान चंद के तीन बार उनके तबादले की कोशिश हो चुकी थी। उस समय एक पत्रकार को दिए इंटरव्यू में ज्ञान चंद ने बताया था कि उन्होंने हाई कोर्ट से स्टे लिया हुआ है, इसीलिए उनके तबादले की कोशिशें नाकाम रह रही हैं। हाल ही में उन्हें नूरपुर का अतिरिक्त प्रभार मिला हुआ था। अब ऐसी चर्चा है कि तबादला करवाने में असफल रहने के बाद अपने रास्ते से हटाने के लिए ही उन्हें फंसाने का खेल रचा गया है।

जून की तस्वीर जब जवाली के त्रिलोकपुर में युवकों को चिट्टे के साथ पकड़ा गया था। ज्ञान चंद सबसे दाएं कुर्ते-पायजामे में हैं।

क्या है मामला
हिमाचल प्रदेश पुलिस के विलिजेंस डिपार्टमेंट ने 12 अगस्त को जवाली के एसपी ज्ञान चंद को कथित तौर पर रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया था। आरोप है कि ज्ञान चंद ने एससी-एसटी एक्ट के तहत आरोपी एक शख्स से 50 हजार रुपये मांगे थे। बदले में कथित तौर पर ज्ञान चंद ने मामले को दबाने का आश्वासन दिया।

विजिलेंस के एसपी अरुल कुमार ने पत्रकारों को बताया था कि शिकायकर्ता ने कहा था कि डीएसपी ज्ञान चंद ने 50 हजार रुपये मांगे थे जिसमें से पांच हजार उसने दे दिए थे जबकि बाकी की रकम नूरपुर ऑफिस में देनी थी। बताया गया कि बाकी के 45 हजार रुपये देने के दौरान ही विजिलेंस टीम ने डीएसपी को पकड़ लिया।

रौबीले अंदाज़ की मूंछों के लिए चर्चा में रहते है ज्ञान चंद ठाकुर

मंगलवार को स्टेट विजिलेंस एवं एंटी करप्शन ब्यूरो धर्मशाला की टीम ने डीएसपी को स्पेशल जज धर्मशाला की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें एक दिन के पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया। बहरहाल, इस कार्रवाई को लेकर हिमाचल पुलिस की तारीफ हो रही थी कि कैसे उसने अपने ही विभाग के एक कर्मचारी पर कार्रवाई की। मगर अब इस कार्रवाई को लेकर कई ओर से सवाल उठना शुरू हो गए हैं। यहां तक कि डिपार्टमेंट के अंदर से भी।

पॉलिटिकल दबाव?
जवाली इलाके में चर्चा है कि डीएसपी ज्ञान चंद को सत्ताधारी नेताओं और उनके करीबियों से उलझने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। उन्हें नजदीक से जानने वाले इस घटना पर हैरानी जता रहे हैं और इसके पीछे कोई साजिश होने की आशंका से इनकार नहीं कर रहे। अधिकारी को खूंखार अपराधी की तरह पकड़कर फोटो खिंचवाने और मीडिया में जारी करने को संदिग्ध निगाहों से देखा जा रहा है। इसे अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले ही दोषी साबित किए जाने की कोशिश बताया जा रहा है।

अपने ही विभाग के आला अधिकारी के खिलाफ की गई ऐसी कारर्वाई कुछ लोगों के गले नहीं उतर रही है।

इस बीच क्षत्रिय महासभा नाम के संगठन ने आशंका जताई है कि जब स्थानीय माफिया जब हाई कोर्ट का स्टे होने के कारण ज्ञान चंद का तबादला नहीं कर पाया तो उन्हें रास्ते से हटाने के लिए यह साजिश रच दी गई। उधर बीजेपी के ही कुछ स्थानीय कार्यकर्ता भी इस घटनाक्रम पर सवाल उठा रहे हैं।

इस बीच विवादों में रहने वाले जवाली के पूर्व विधायक भी इस मामले में कूद पड़े हैं। उन्होंने कहा है कि इस मामले पर पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का यह कहना कि इस डीएसपी से स्थानीय विधायक भी परेशान थे, किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है। दरअसल शांता कुमार ने डीएसपी के पकड़े जाने को लेकर कहा है- आम लोग ही नहीं, हमारे विधायक भी इनसे परेशान थे।

पोस्ट
नीरज भारती द्वारा शेयर किए गए कथित तौर पर भाजपा कार्यकर्ता के पोस्ट का स्क्रीनशॉट

इस बीच सोशल मीडिया पर भी लोगों की राय इस मामले पर बंटी हुई नज़र आ रही है। एक धड़ा जहां उन्हें ईमानदार, विनम्र और नशा व खनन माफिया के खिलाफ सख्त रहने वाला अधिकारी बता रहा है तो दूसरे पक्ष का मानना है कि कुछ तो गड़बड़ की होगी, वरना ऐसे क्यों गिरफ्तारी की गई।

एक पक्ष ऐसा भी है जो मानता है कि दोनों बातें हो सकती हैं कि साजिशन उन्हें रुपयों की पेशकश की गई हो जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया और फिर पकड़े गए। हालांकि, ऐसा है तो यह भी अपराध ही है और इसका कोई भी बचाव नहीं हो सकता। मगर इस बीच अजीब बात यह है कि कुछ लोग उनके शरीर और लुक्स का भी मजाक बना रहे हैं और उन्हें विलेन करार देते हुए दोषी करार दे रहे हैं।

बहरहाल, अभी इस मामले की जांच चल रही है और अदालत तय करेगी कि सच क्या है और क्या झूठ।

शिमला: सरकार को क्यों पानी पी-पीकर कोस रहे हैं ऐपल बेल्ट के लोग

शिमला।। जो शिमला कुछ समय पहले तक जल संकट से जूझ रहा था, अह वह ट्रैफिक जाम से परेशान है। जिस तरह से हिमाचल प्रदेश सरकार ने शिमला शहर में पानी की व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए विभिन्न परियोजनाओं का प्रबंधन किया, पूरे देश में मिसाल दी जाने लगी कि अगर पानी के संकट को दूर करना है तो शिमला शहर से सीखो। मगर एक संकट दूर हुआ तो एक और संकट उभर आया। यह संकट है- ट्रैफिक जाम का।

वैसे तो शिमला शहर की संकरी सड़कों पर जाम लगने की बात नई नहीं है। मगर सोचिए, जो हिमाचल अपने सेबों के लिए भारत या यूं कहिए कि पूरे दक्षिण एशिया में प्रसिद्ध है, वह सेबों के पीक सीजन में ही सेबों के कारोबार के लिए सही सुविधाएं नहीं दे पा रहा। यह आज की नहीं, कई साल पुरानी समस्या है मगर साल दर साल बद से बदतर होती जा रही है।

Image: Jagran

इसका अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं कि जब सेबों से भरे ट्रक शिमला से शेष भारत के लिए रवाना हो रहे हैं, उसी समय सड़कों पर 25-25 किलोमीटर लंबे जाम लग रहे हैं। जाहिर है, ऐसे में सेब के कारोबारियों और बागवानों की हताशा चरम पर पहुंच गई है और वे हमेशा की तरह सरकार को कोस रहे हैं।

जाम ने दबोचा शिमला का गला
दो दिन पहले की बात है कि शिमला-ठियोग नैशनल हाइवे पर लगभग 25 किलोमीटर लंबा जाम लगने से बसें, निजी वाहन और सेबों के ट्रक कई घंटों तक फंसे रहे। सामान्य तौर पर रामपुर से ठियोग होते हुए शिमला जाने को आपको लगभग साढ़े तीन घंटे लगते हैं मगर परसों यही दूरी तय करने में लग गए लगभग सवा 11 घंटे।

Image: Amar Ujala

ये हालात इसलिए भी पैदा हुए क्योंकि सेबों के ट्रक अमूमन सैंज से माइपुल होते हुए सोलन के लिए सीधे जाते थे। मगर यहां पर एक पुराना पुल भारी गाड़ियों के लिए वर्जित कर दिया गया है। इस कारण सेबों से लदे भारी ट्रक शिमला होते हुए आने लगे हैं। ये कुफरी से ढली होते हुए शिमला से बाहर जा रहे हैं जिससे सड़क पर ट्रैफिक स्लो हो रहा है और जाम की स्थिति पैदा हो रही है।

सरकार से बढ़ रही नाराजगी
शिमला के एक सेब उत्पादक और कारोबारी ने नाम गोपनीय रखने की गुजाऱिश करते हुए ‘इन हिमाचल’ को अपनी समस्या भेजी है। इसमें लिखा है, “शिमला जिले की ऐपल बेल्ट में हिमाचल सरकार की छवि लगातार खराब हो रही है और स्थानीय लोगों में बहुत ज्यादा गुस्सा और नाराजगी है। इसका कारण यह है कि हिमाचल की ऐपल इंडस्ट्री की उपेक्षा की जा रही है।”

उन्होंने ‘इन हिमाचल’ को भेजे संदेश में लिखा है, “लोग ट्रैफिक जाम और प्रशासन के कुप्रबंधन से परेशान हैं। कुफरी और शनान सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं जबकि ये दोनों बहुत अहम पॉइंट हैं। कुफरी जहां शिमला के ऊपरी इलाके को जोड़ता है वहीं भट्ठाकुफर या शनान वो जगह है जो शिमला को निचले इलाकों जैसे कि चंडीगढ़ या दिल्ली से जोड़ने में बहुत अहम है।”

पुलिसवाले भी हो रहे फ्रस्ट्रेट
सेब कारोबारी के मुताबिक कुफरी और भट्ठाकुफर में पिछले एक महीने से लगातार जाम लग रहे हैं। उन्होंने लिखा है, “पिछले हफ्ते से तो स्थिति और भी खराब हो गई है और नारकंडा या कोटखाई से शिमला पहुंचने में चार से छह घंटों का समय लग जा रहा है। इस कारण लोग सरकार से नाराज होते जा रहे हैं। प्रशासन की चुप्पी सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है। हालत ऐसी है कि जिन पुलिसकर्मियों को ट्रैफिक के प्रबंधन के लिए लगाया गया है, वे भी सरकार को कोस रहे हैं क्योंकि लोग इनके साथ बदतमीजी पर उतर आए हैं।”

भट्ठाकुफर की फल मंडी
जो ट्रक या वाहन कुफरी से जैसे-तैसे आगे बढ़ हैं, ढली के पास आकर वे फिर फंस जा रहे हैं। हमें मिले संदेश में यह भी लिखा गया है कि ट्रैफिक जाम की वजह ढली के आगे भट्ठाकुफर में बनी फल मंडी है, जिसे कहीं और शिफ्ट करने की मांग सेब के बागवानों और विक्रेताओं की ओर से लंबे समय से की जा रही है।

Image: Amar Ujala

मेसेज में लिखा है, “अभी तक सरकार की ओर से बयान तक नहीं आया है। बागवानी मंत्री ने एक बार भी इस इलाके का दौरा करके हालात का जायजा नहीं लिया है। यहां तक कि इसी जिले से संबंध रखने वाले शिक्षा मंत्री को भी कोई चिंता नहीं है शायद। सरकार को तुरंत समस्या का समाधान करने के बारे में कदम उठाने चाहिए। इसके लिए कमेटी का गठन होना चाहिए और ऐपल बेल्ट से संबंध रखने वाले किसी अनुभवी व्यक्ति को यह काम सौंपा जा सकता है। जाम की यह स्थिति तुरंत सुधरनी चाहिए।”

फोरलेन निर्माण- नीम पर चढ़ा करेला
जो ट्रक कुफरी और भट्ठाकुफर की बाधाओं को पार कर लेते हैं, वे आगे चलकर फोरलन निर्माण के चक्कर में फिर परेशान होते हैं। बाहर से बसों या निजी वाहनों में आ-जा रहे लोगों को भी दिक्कत हो रही है। लेकिन इस सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इन सभी बातों के कारण हिमाचल प्रदेश की इकॉनमी में अहम योगदान देने वाला सेब का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।

चिंतपूर्णी बाजार से बच्ची का अपहरण करके बलात्कार

ऊना।। हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक पर्यटन स्थल चिंतपूर्णी में 13 साल की बच्ची के अपहण के बाद बलात्कार का मामला सामने आया है। इस मामले में अभियुक्त पंजाब की एक धार्मिक संस्था के लिए बतौर ड्राइवर काम करता है।पुलिस ने मामला दर्ज करके आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है।

पुलिस को शिकायत मिली की चिंतपूर्णी के पास के ही गांव की एक बच्ची रात 10 बजे के करीब बाजार में थी। इस बीच पंजाब के बटाला के रहने वाले आरोपी ने उसे कार में जबरन बिठाया और भरवाईं की ओर ले गया। यहां उसने बच्ची से बलात्कार किया और बाद में रास्ते में छोड़ दिया।

बच्ची ने घर पहुंचकर परिजनों को अपने साथ हुई घटना की जानकारी दी। पुलिस को शिकायत मिली तो कुछ लोगों से पूछताछ की गई। इसके बाद वारदात में इस्तेमाल की गई गाड़ी को कब्जे में ले लिया गया और फिर आरोपी चालक भी पकड़ा गया।

ऐसी जानकारी सामने आई है कि बच्ची का मेडिकल घटना के 12 घंटे बाद हुआ। डीएसपी देहरा लालमन शर्मा ने जानकारी दी है कि पीड़िता का इलाज चल रहा है और छानबीन की जा रही है।

मंडी: 4 साल की बच्ची से रेप का मामला न सुलझने से भड़के लोग

मंडी: 4 साल की बच्ची से रेप का मामला न सुलझने से भड़के लोग

मंडी।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के रिवालसर में साढ़े चार साल की बच्ची से बलात्कार के मामले में पुलिस को अब तक कामयाबी नहीं मिली है। इधर लोगों में बेचैनी और गुस्सा बढ़ता हुआ देखने को मिल रहा है। शनिवार को गुस्साए लोगों ने जमकर नारेबाजी की और सड़क को भी जाम कर दिया।

लगभग तीन घंटों तक नेरचौक-जाहू-ऊना नैशनल हाइवे बंद रहा। लोग पटड़ीधाट में जमा हुए थे जहां वे सरकार और पुलिस-प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे। दरअसल इस हफ्ते की शुरुआत में रिवालसर में चाढ़े चार साल की बच्ची से रेप की पुष्टि हुई थी। लोग नाराज हैं और उनका आरोप है कि पुलिस सुस्ती बरत रही है।

जाम लगा रहे लोगों को भरोसा देने के लिए एसडीएम बल्ह डॉक्टर आशीष शर्मा, डीएसपी तरणजीत सिंह, सरकाघाट के तहसीलदार दीनानाथ और बल्ह के एसएचओ समेत कई अधिकारी आए थे। इन्होंने लोगों को समझाने की कोशिश की मगर उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। यह सिलसिला लगभग तीन घंटों तक जारी रहा।

इस बीच मौके पर जुटे विभिन्न दलों के लोगों की आपस में बहस हुई। लोग प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस से भी बहस करते नजर आए। पुलिस ने जब अभ तक की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की और 15 दिनों के अंदर मामला सुलझाने का वादा किया, तब जाकर लोग सड़क से हटने के लिए तैयार हुए। बाद में पुलिस ने मौके पर मौजूद रहे नेताओं और चर्चित लोगों के खिलाफ सड़क जाम करने का मामला भी दर्ज किया है।

मंडी: 4 साल की बच्ची से रेप का मामला न सुलझने से भड़के लोग

हिमाचल: कहर बरपा रही है बरसात, जान-माल का हो रहा नुकसान

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में बरसात का मौसम हर साल काफी नुकसान करता है। इस साल भी मॉनसून सीजन में अब तक अलग-अलग कारणों से 152 लोगों की जान गई है। इनमें 21 की जान भारी बारिश, भूस्खलन, बादल फटने या बिजली गिरने जैसी प्राकृतिक घटनाओं से हुई है।

सरकार की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक लोक निर्माण और सिंचाई एवं जन स्वास्थय विभाग को करोड़ों का नुकसान पहुंचा है। बारिश के कारण कई सड़कों को नुकसान पहुंचा है और बहुत सारी पेयजल योजनाएं भी ठप हो गई हैं।

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मौसम विभाग का अनुमान है कि बारिश का सिलसिला 14 अगस्त तक ऐसे ही चल सकता है। मौसम विभाग के निदेशक मनमोहन सिंह का कहना है कि हिमाचल में दक्षिणी-पश्चिमी मॉनसून की सक्रियता के कारण अच्छी बरसात हो रही है।

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बस इतना बता दें कि आपको हिमाचल में जमीन क्यों खरीदनी है?

(पत्रकार आदर्श राठौर के ब्लॉग से साभार) मैं पिछले 14 साल से दिल्ली में रह रहा हूं। हर साल कम से कम 50 लोग ऐसे मिल जाते हैं जो पूछते हैं- आपके यहां बाहर के लोग जमीन नहीं खरीद सकते न? उनमें से कम से कम 10 लोग ऐसे होते हैं जो हिमाचल में जमीन खरीदने के इच्छुक होते हैं। जब भी पूछता हूं कि आप हिमाचल में जमीन क्यों लेना चाहते हैं तो अधिकतर का जवाब होता है- जन्नत है यार हिमाचल, वहां एक छोटा सा घर हो तो मजा आ जाए।

इस हिसाब मैं सोचता हूं कि कितने सारे लोग होंगे जो इसी तरह इस ‘जन्नत’ में बसने का ख्वाब देखते होंगे और उनमें से कितने सारे जमीन खरीदने की हैसियत भी रखते होंगे। जो लोग हिमाचल में बसना चाहते हैं, वे ऊना, बिलासपुर, देहरा, नूरपुर, नालागढ़, जाहू, नगरोटा या सुजानपुर की बात नहीं कर रहे होते। वे जमीन चाहते हैं शिमला, कु्ल्लू, मंडी, सोलन, चंबा और किन्नौर के पहाड़ी इलाकों में।

आज जितने भी लोग हिमाचल में जमीन खरीदने के इच्छुक हैं, वे ऐसी इच्छा न जताते अगर हिमाचल में धारा 118 न होती। क्योंकि हिमाचल में पहले से ही भीड़-भड़क्का होता, जिस पहाड़ी में देखो, वहां इमारतों की भरमार होती, उन इमारतों को बनाने के लिए खड्डों और नदी नालों को रेत-बजरी के लिए खोखला कर दिया गया होता। हिमाचल की ईकोलॉजी बुरी तरह प्रभावित हो गई होती और सबसे बड़ी बात, न तो आबादी मात्र 68 लाख होती और न ही यह छोटा सा पहाड़ी राज्य कम जनसंख्या के चलते तेजी से विकास की राह पर बढ़ रहा होता।

Image courtesy: Himachal Watcher

कुछ लोग कहते हैं कि जब हिमाचल के लोग अन्य जगह जाकर जमीन ले सकते हैं तो हिमाचल में बाहरी लोगों के लिए पाबंदी क्यों है। उनके लिए मेरा जवाब है- यह पाबंदी है, इसीलिए हिमाचल इतना खूबसूरत बचा हुआ है कि आपको यहां लगी पाबंदी अखर रही है। अगर यहां के हरे-भरे और कम आबाद इलाकों में भी शिमला की तरह कंक्रीट के जंगल खड़े हो जाते तो  क्या आप यह कहते कि यार मुझे हिमाचल जाना है, मैं ग्रेटर नोएडा वेस्ट के ऊंचे टावर की 17वीं मंजिल से दूसरे टावरों को देखकर थक चुका हूं, अब हिमाचल जाकर वहां के पहाड़ों पर बनी इमारतें देखनी हैं, वहां जाकर गर्मी महसूस करनी है?

कुछ लोगों को मेरी चिंता बेमानी लग सकती है मगर बहुत से लोग मेरी बात से सहमत होंगे क्योंकि वे जानते हैं कि पहाड़ों की हालत कैसी हो गई है। अभी जब तथाकथित बाहरी लोगों के जमीन खरीदने पर सख्ती है, उसके बावजूद धर्मशाला, मनाली, मंडी और शिमला में बहुत सारे होटेल और रिजॉर्ट दिल्ली और पंजाब वालों के हैं। या तो उन्होंने जमीन को या होटलों को लीज़ पर लिया है या फिर अपने किसी हिमाचली परिचित के नाम काम चला रहे हैं। इसके अलावा संपन्न हिमाचली भी अंधाधुंध और बेतरतीब निर्माण में जुटे हैं।

आज जो हम बची-खुची जन्नत देख पा रहे हैं, उसका सीधा श्रेय धारा 118 को जाता है। यह धारा न होती तो आज जहां लोग ट्रेकिंग पर जाते हैं, वे जगहें पॉप्युलर हनीमून डेस्टिनेशंस होतीं। कल्पना कीजिए अगर हिमाचल में सीधे जमीन खरीदने पर लगी रोक हट जाए, संपन्न लोग मुंहमांगी कीमत देने को तैयार हो जाएं तो आपके गांव के कितने सारे लोग (या आप खुद) उछलते-कूदते अपनी जमीन बेचने के लिए तैयार हो जाएंगे?

अब कुछ लोग कहेंगे कि कोई बेचना चाहता है यह उसका अपना मैटर है। लेकिन मेरा मानना है कि यह दो व्यक्तियों के बीच के सौदे का नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण का भी मसला है। ऐसा इसलिए क्योंकि हिमाचल प्रदेश में पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानूनों का पालन तो ढंग से हो नहीं रहा है। लोग मनमानी कर ही रहे हैं। ऐसे में धारा 118 ही है जो इस मनमानी की रफ्तार को कम किए हुए है, जमीनों की बिक्री और उसपर निर्माण पर लगाम लगाए हुए है और पर्यावरण के संरक्षण में अहम भूमिका निभा रही है। यह कोई बहुत आदर्श स्थिति नहीं है मगर धारा 118 की गेट कीपिंग अब तक तो हिमाचल के लिए मददगार ही रही है।

ऐसी खबरें समय समय पर सामने आती रहती हैं।

अचानक यह सवाल इसलिए उठा क्योंकि संसद में 370 पर चर्चा के दौरान कई बार हिमाचल प्रदेश का जिक्र हुआ। जब संसद में अनुच्छेद 370 पर चर्चा चल रही थी तब कई लोगों ने चिंता जताई कि इसके हटने से तो कोई भी ज म्मू, क श्मीर और लद्दाख में जाकर जमीन ले लेगा जिससे वहां के पर्यावरण और प्राकृतिक सौंदर्य को खतरा हो सकता है। इसके जवाब में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा- “370 हटते ही वहां भारत के अन्य कानून लागू हो जाएंगे, चिंता न करें। भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए पहले से कानून है।”

मुझे इस बात को सुनकर हंसी आई क्योंकि हिमाचल में भी देश के कानून पहले से ही लागू हैं। मगर क्या उनका पालन हो रहा है? नेताओं के बेटे खुलकर खड्डों में खनन कर रहे हैं, कुछ बिना परमिट क्रशर चलाते रहे, कुछ नेताओं के रिश्तेदार नियमों को ताक पर रखकर अवैध निर्माण करते हैं और उस पर एनजीटी की ओर से आपत्ति आती है तो राज्य सरकारें कानून बदल देती है। ऐसे हालात में कोई क्या उम्मीद रखे? मैं तो कहता हूं कि ज म्मू-क श्मीर और लद्दाख में भी धारा 118 जैसी व्यवस्था होनी चाहिए।

जो लोग तर्क दे रहे हैं कि जमीन न खरीदने देने से विकास रुक जाता है, वे बताएं कि जहां जमीनें खरीदने-बेचने की खुल्लमखुल्ला छूट है, वहां कौन सा विकास के कीर्तिमान स्थापित हुए हैं? हिमाचल में जब अभी ही हालात पर नियंत्रण नहीं है तो 118 के हटने के बाद जब बड़ी संख्या में संपन्न लोग यहां जमीनें खरीदेंगे, निर्माण करेंगे, चारों ओर कंक्रीट की इमारतें खड़ी होंगी। तब हिमाचल की हालत की हालत नेपाल के चुरे पर्वत वाले इलाके जैसी हो जाएगी जिसकी ऐसी-तैसी हो चुकी है।

ऐसे सौंदर्य को है खतरा

है क्या धारा 118
हिमाचल प्रदेश ने साल 1972 में टेनेंसी ऐंड लैंड रिफॉर्म्स ऐक्ट बनाया था जिसमें धारा 118 के तहत एक विशेष प्रावधान किया गया था। इसके तहत हिमाचली कृषकों के अलावा और किसी को भी हिमाचल की लैंड ट्रांसफर किए जाने पर रोक लगा दी गई। इस धारा को जोड़ने का मकसद यह था कि तब हिमाचल नया-नया बना था और यहां के लोगों की आर्थिक सामाजिक स्थिति कमजोर थी। यह देखा जाने लगा था कि पड़ोस के राज्यों के और यहां आकर बस गए संपन्न लोग औने-पौने दाम में गरीब हिमाचलियो की जमीनें खरीद रहे थे।

हिमाचल के संस्थापक कहे जाने वाले पहले मुख्यमंत्री डॉक्टर यशवंत सिंह परमार के पास ऐसे कुछ मामले आए जहां किसानों के साथ ठगी हो गई थी। ये कम पढ़े-लिखे या अनपढ़ लोग कम दाम में अपनी जमीनें बेच चुके थे और फिर उससे मिले पैसे को भी उड़ा चुके थे। आमदनी का कोई स्रोत था नहीं, गुजारे लायक जमीन भी जा चुकी थी। अब उनके सामने खाने तक के लाले पड़ गए थे। ऐसे मामले बढ़ रहे थे कि लोगों ने बिना कुछ पढ़े बस अंगूठा लगा दिया या फिर पैसा आता देख आंख मूंदकर हस्ताक्षर कर दिए।

ऐसे में धारा 118 यह सुनिश्चित करती थी कि लोगों के साथ ऐसी ठगी न हो पाए। इसे सख्त बनाते हुए यह प्रावधान भी किया गया था कि हिमाचल का ही कोई शख्स अगर यहां पहले से खेती वाली जमीन का मालिक नहीं है तो वह भी कृषि योग्य जमीन नहीं खरीद सकता। यह माना गया कि जो हिमाचल का मूल निवासी है और हाल फिलहाल बाहर से आकर नहीं बसा है, उसके पास पुश्तैनी जमीन तो होगी ही। उस समय बाहर से आकर यहां कारोबार करने के लिए रह रहे लोगों से जमीनों को बचाने के लिए यह प्रावधान किया गया था। हालांकि इस वाले प्रावधान में कुछ गड़बड़ थी, जिसके बारे में आगे बात करूंगा।

लूप होल
समय-समय पर संशोधित इस कानून के प्रावधान कहते हैं कि हिमाचल के शहरी इलाकों में कोई भी भारतीय नागरिक कारोबार या आवास के लिए निश्चित आकार का भूखंड खरीद सकता है। रिहायशी संपत्ति खरीदने पर भी रोक नहीं।इसके अलावा अगर आपको खेती वाली जमीन लेनी है, तब भी एक रास्ता है। आप बेचने वाला ढूंढिए, उसके साथ मिलकर 118 के बताए गए निर्देशों के आधार पर ज़मीन खरीदने के लिए आवेदन कीजिए, औपचारिकताएं पूरी कीजिए, फिर सरकार तय करेगी कि आपको जमीन खरीदने की इजाजत देनी है या नहीं।

खनन के कारण कई पहाड़ हो चुके हैं खोखले

यही प्रावधान गड़बड़ देता है। सरकार या समझिए कैबिनेट को इस मामले में यह जो अधिकार मिला है, उसी के दुरुपयोग के कारण आज धारा 118 एक मजाक बनकर रह गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि सभी दलों की सरकारों ने समय-समय पर 118 में छूट देने में मनमानी की है। इसी कारण आपको उनकी पार्टी के नेताओं और अन्य रसूखदारों के नाम हिमाचल पर जमीनें मिल जाएंगी।

और इजाजत देने के इस खेल में भ्रष्टाचार न हुआ हो, ऐसा होने की संभावनाएं बहुत कम हैं। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी ने आरोप लगाया था कि एक मुख्यमंत्री ने धारा 118 के मामलों का जिम्मा अपने एक करीबी मंत्री को दिया हुआ था। इस अधिकारी के खिलाफ 118 के दुरुपयोग की जांच चल रही थी मगर इस बयान के बाद जांच का क्या हुआ, कुछ पता नहीं।

सोचिए, 118 के नाम पर इजाजत देने के लिए अगर इस स्तर पर करप्शन होता तो बहती गंगा में अधिकारी हाथ न धोते हों, यह हो नहीं सकता। पिछले दिनों एक रिपोर्ट छपी थी जिसमें हिमाचल के कुछ प्रशासनिक अधिकारियों की संपत्ति चौंकाने वाली थी। उनकी आय के स्रोतों को लेकर भी जानकारी स्पष्ट नहीं थी। बहरहाल, धारा 118 के इसी लूप होल का परिणाम है कि रसूखदार लोगों के घर आपको मनाली, धर्मशाला और शिमला के ग्रामीण इलाकों में मिल जाएंगे।

ये ऐसे लोग हैं जिनका हिमाचल से कोई सीधा संबंध नहीं, हिमाचल के लिए इनका कोई योगदान नहीं। इन्हें तो सरकारों ने आसानी से जमीन खरीदने की इजाजत दे दी, मगर हिमाचल के गठन से पहले से यहां रह रहे गैर-कृषक हिमाचलियों को ऐसी ही इजाजत लेनी हो तो उन्हें पापड़ बेलने पड़ते हैं। उनके पास तो बमुश्किल जमीन खरीदने और उसके ऊपर घर बनाने के पैसे जुटते हैं। फिर वे कैबिनेट तक कैसे लॉबीइंग करेंगे, कैसे अपनी सिफ़ारिश लगवाएंगे? इसी तरह हिमाचल में लूट-खसोट मचाकर उस पैसे से दिल्ली-चंडीगढ़ में चल-अचल संपत्ति जोड़ने वाले अधिकारियों की मौज है मगर बाहर से आया जो ईमानदार कर्मचारी या अधिकारी हिमाचल में अपनी उम्र खपाकर यहीं का होकर रह जाना चाहे, वह हिमाचल में जमीन नहीं ले सकता। थैंक्स टु धारा एक सौ अठारह।

बाबाओं की मौज, हिमाचलियों से अन्याय
सरकार किसी की भी हो, इसी धारा के आधार पर गरीब और बिना पहुंच वाले गैर कृषक हिमाचलियों के आवेदन निरस्त किए जाते रहे हैं मगर ढोंगी-डफंतरी बाबाओं, नेताओं, अभिनेताओं और रसूखवालों को छूट दी जाती रही। क्या यह उन लोगों के साथ अन्याय नहीं है जिन्होंने हिमाचल को अपना सबकुछ दिया है? यह कई पीढ़ियों से हिमाचल में रह रहे लोगों के साथ अन्याय है जो यहां के होकर भी यहां जमीन नहीं ले सकते। सिर्फ इसलिए कि उनके पूर्वज भूमिहीन थे।

अभी हिमाचल के लोग ही अपने पहाड़ों को बर्बाद कर रहे हैं, 118 के कमजोर होने से यह रफ्तार बढ़ सकती है।

यह भूमिहीन हिमाचलियों के साथ इसलिए भी अन्याय है क्योंकि इसी हिमाचल में ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने सीलिंग ऐंड लैंड होल्डिंग्स ऐक्ट में अपने पक्ष में प्रावधान करवाकर बड़े-बड़े बगीचे अपने पास रख लिए, इस शर्त पर कि वह इसे बेचेंगे नहीं। जबकि बाकियों को 300 कनाल से ज्यादा भूमि सरकार को देनी पड़ी। जिन लोगों ने अपनी जमीन दे दी, वे कई हिस्सेदारों में बंटी और आज उनके वंशज भूमिहीन हो गए। वे तो अपने लिए हिमाचल में जमीन नहीं ले सकते मगर बगीचे वालों की मौज है। वे अपने हिसाब से लॉबीइंग करके सरकारों से छूट पाकर बीच-बीच में अपनी जमीन बेचते रहते हैं और नोट छापते रहते हैं। खैर, सीलिंग ऐंड लैंड होल्डिंग्स ऐक्ट के खेल पर किसी और दिन बात होगी।

बाबा राम रहीम, आसाराम जैसों को हिमाचल में डेरे चलाने के लिए जमीन मिल गई, मगर अन्य किसी भी राज्य से आए उस अधिकारी को हिमाचल में जमीन नहीं मिल सकती जो पूरे देश में कहीं भी जा सकता था मगर उसने काम के लिए हिमाचल चुना। यहां वह 30 साल ईमानदारी से काम करता रहा, प्रदेश के लिए लाभकारी योजनाएं बनाता रहा, योजनाओं को लागू करता रहा, लोगों की मदद करता रहा, यहीं टैक्स देता रहा; उसके बच्ची यहीं पैदा हुए, यहीं पढ़े, यहीं से लगाव रखते हैं। मगर रिटायर होने के बाद वह अधिकारी घर बनाने और साथ में सब्जियां उगाने के लिए हिमाचल में थोड़ी सी जमीन नहीं ले सकता। मगर बागवानी के ही नाम पर दो-दो बार एक सरकार ने अपनी पार्टी की नेत्री को जमीन खरीदने की छूट दे दी।

तो क्या किया जाए?
इन हालात को देखकर तो ख्याल आता है कि इस धारा के नाम पर बंदरबांट करने से बेहतर है कि इसे खत्म करके खुली छूट दे दो। मगर फिर चिंता उठती है कि ऐसा हुआ तो हिमाचल का जो बंटाधार अगले 50 सालो में होने वाला है, वह 5 सालों में ही हो जाएगा। बेशक इस कानून में कुछ खामियां हैं मगर इसका मतलब यह नहीं है कि धारा 118 को खत्म कर दिया जााए। क्योंकि अगर ये एक बार हटी तो इसे दोबारा नहीं लगाया जा सकेगा। ऐसा इसलिए कि संविधान के अनुच्छेद 3 71 का हवाला देने पर ही इस धारा की इजाजत हिमाचल, मिजोरम और उत्तराखंड को मिली थी। यानी हिमाचल के इस प्रावधान के लिए 3 71 का कोई सब सेक्शन समर्पित नहीं है, यूं समझिए कि गुडविल में यह विशेष अधिकार मिला है कि हिमाचल अपने यहां ऐसी व्यवस्था कर सकता है। वरना 2016 में गोवा ने भी ऐसी ही मांग की थी, जिसे ठुकरा दिया गया था।

बहरहाल, धारा 118 को हटाने के पक्ष में कुछ लोग तर्क देते हैं कि अब हिमाचल पहले वाला हिमाचल नहीं रहा जब यहां के लोगों को कोई भी फुसला सकता था। कहा जा रहा है कि यहां के लोग शिक्षित हैं, वे अपना भला-बुरा समझ सकते हैं। ऐसा कहने वाले शायद जमीनी हालात से वाकिफ नहीं हैं। मैंने बहुत सारे लोगों को पैसों की जरूरत को पूरा करने के लिए जमीन को औने-पौने दाम में बेचते हुए देखा है। भांग और चिट्टे की गिरफ्त में फंसे बेरोजगार तो पहले ही जमीनें बेचने को तैयार हैं। यह तो शुक्र है 118 का वरना ये लोग अब तक जमीनों को भी धुएं में उड़ा चुके होते।

कई जगह ऐसे मामले सामने आए हैं जह नशे के चंगुल में फंसे लोगों ने कर्ज उतारने या नशा खरीदने के लिए चुपके से जमीनें बेच दीं।

प्रेशर में तो नहीं है सरकार?
कुछ लोगों, यहां तक कि सरकार का भी यह कहना है कि धारा 118 हिमाचल के विकास की राह में बाधक है क्योंकि औपचारिकताओं के चलते कंपनियां यहां नहीं आना चाहतीं। यह बात समझ से परे है क्योंकि जिसे बिज़नस करना है, वह जमीन लीज पर लेकर भी कर सकता है और बहुत सारी कंपनियां ऐसा कर भी रही हैं। इसके लिए सरकार ने स्पेशल एरिया भी बनाए हुए हैं। किसी कंपनी को अपने प्रॉडक्ट बनाने के लिए हिमाचल में कारखाने वगैरह खोलने के लिए निवेश करना है या हिमाचल में जमीन लेकर?

मुझे लगता है कि सरकार 118 के नियमों का सरलीकरण रियल एस्टेट में निवेश के लिए करना चाहती है। यानी सरकार चाहती है कि बड़े बिल्डर और कंपनियां हिमाचल में आएं, यहां टाउनशिप, होटेल और रिजॉर्ट बनाए। हालांकि यह काम लीज पर भी हो सकता है मगर ऐसा लगता है कि निवेशक यह दबाव डाल रहे हैं कि वे तभी आएंगे, जब जमीन उनके नाम ट्रांसफर होगी। 50 हजार करोड़ के कर्ज में डूबे प्रदेश को उबारने के लिए सरकार को अगर यही रास्ता नजर आता है तो इस अप्रत्यक्ष ब्लैकमेलिंग के आगे झुकने के बजाय उसे समझदारी से काम करना होगा। उसकी समस्या का समाधान धारा 118 में ही छिपा हुआ है। मगर वह सरलीकरण या इसके खात्मे में नहीं, इसके संशोधन और सुधार में है।

धारा 118 में लाई जाए पारदर्शिता
यह सही है कि सरकार लालफीताशाही को खत्म करके प्रक्रिया को सरल करना चाहती है। वह 45 दिनों में ऑनलाइन ही यह बता देगी कि आवेदन मंजूर हुआ या नहीं। मगर इस तरह की जल्दबाजी करने से पहले जरूरी है कि धारा 118 में संशोधन किया जाए। पहला संशोधन तो यह हो कि आंख मूंदकर किसी को भी जमीन खरीदने की इजाजत देने के विशेषाधिकार को छोड़ा जाए। तय नियम बना दिए जाएं कि किसे, किस आधार पर हिमाचल में जमीन खरीदने की इजाजत दी जा सकती है। पारदर्शिता के लिए यह बेहत जरूरी है।

जितने उतावलेपन से आप बाहर के प्रदेशों के लोगों को 118 में छूट देते हैं, उतनी चिंता आपको हिमाचल प्रदेश के गैर-कृषकों की क्यों नहीं होती? दशकों से हिमाचल में रह रहे, यहां के विकास में मददगार गैर कृषक हिमाचलियों को भी  हिमाचल में जमीन खरीदने का अधिकार मिलना चाहिए क्योंकि वे भी कृषक हिमाचलियों से कम हिमाचली नहीं। यही नहीं,  हिमाचल में सरकारी नौकरी या लंबे समय तक प्राइवेट नौकरी या कारोबार कर हिमाचल के विकास में योगदान देने वालों को भी निश्चित अवधि के बाद जमीन खरीदने की इजाजत दी जाए। उनका भी हिमाचल में योगदान रहता है। वे यहीं रहकर कमाते हैं, यहीं खर्च करते हैं, यहीं टैक्स देते हैं। वे उन लोगों की तरह टूरिजम के लिए या एक आध हफ्ते के लिए छुट्टी मनाने नहीं आते जिन्हें आप नियमों को ताक पर रखकर इजाजत देते हैं।

शिमला जैसे शहर पहले ही बेतरतीब निर्माण का खामियाजा भुगत रहे हैं।

जो निवेशक हिमाचल में जमीन में खरीदना चाहते हैं, उन्हें सशर्त इजाजत दी जाए। यह देखा जाना चाहिए कि उनके हिमाचल आने से कितने लोगों को रोजगार मिलेगा, सरकार को कितने राजस्व की प्राप्ति होगी। उनके लिए एक समयसीमा तय की जाए कि इस अवधि तक आप हिमाचल में काम करेंगे तो ही आपको जमीन का मालिकाना हक मिलेगा। उन्हें बताया जाए कि इस अवधि तक जमीन लीजहोल्ड रहेगी और उसे तब तक फ्रीहोल्ड (पूरा मालिकाना हक देना) नहीं किया जाएगा, जब तक कि वे कुछ खास शर्तों को पूरा नही करते। इसमें समय पर जमीन पर निर्माण कार्य पूरा करके कारोबार शुरू करना, प्रदेश के लोगों को रोजगार देना और टैक्स आदि समय पर देना शामिल हो। अगर कोई भारतीय नागरिक निजी तौर पर यहां जमीन खरीदने के लिए आवेदन करता है तो उसके लिए भी पैमाना होना चाहिए।

साथ ही पारदर्शिता के लिए हर महीने वेबसाइट पर सूची डाली जाए कि किस व्यक्ति या कंपनी को किस आधार पर इजाजत मिली और किसे क्यों नहीं। कैबिनेट को अगर इस मामले में फैसला करने का अधिकार है तो कैबिनेट में बैठे मंत्री भी जनता के भेजे हुए हैं और जनता को यह जानने का अधिकार है कि उनके चुने नुमाइंदे क्या कर रहे हैं।

साथ बैठे सत्ता पक्ष और विपक्ष
यह हमारे चुने विधायकों, भले वे सरकार में हों या विपक्ष में, की जिम्मेदारी है कि मिलकर 118 पर चर्चा करें। हिमाचल को वाकई बचाना है तो यह काम सड़कों पर चर्चा करके या फेसबुक पर स्टेटस डालकर नहीं होगा। इस पर विधानसभा में चर्चा करनी होगी, प्रस्ताव लाना होगा और जरूरत हो तो संशोधित बिल लाना होगा। मगर लगता है कि अभी से विपक्ष इस मुद्दे पर वॉकआउट की तैयारी करके बैठा है। जब आप सदन से वॉकआउट करके गायब रहेंगे तो सरकारों को सदन से बाहर चुपके से नियमों में बदलाव करने का मौका मिलेगा ही।

दरअसल समस्या यह है कि धारा 118 को लेकर कोई भी दल संजीदा नहीं है। सत्ता में आकर मौका मिलने पर हर कोई इसका फायदा उठाता है और विपक्ष में बैठ जाने पर सरकार पर आरोप लगाता है। आज ‘सेव हिमाचल’ अभियान चला रहा विपक्ष वह बताए खुद सत्ता में रहते हुए क्या उसने भी ऐसे ही नियमों को ताक पर रखकर धारा 118 के तहत अनुमतियां देने में बंदरबांट नहीं की थी? विपक्ष में होकर साधु-संत बनना आसान है मगर आज के दौर में तथ्य छिपाए नहीं जा सकते।

हिमाचलियों के हित में एकजुट हों सरकार और विपक्ष
Image courtesy: Flickr/ Olivier Galibert

सरकार को धारा 118 में सकारात्मक संशोधन अपने से नहीं बल्कि विपक्ष और जनता की राय लेकर और उसे विश्वास में लेकर करना होगा। मगर हिमाचल के हालात को देखकर लगता नहीं कि यहां पर ऐसा हो पाएगा। एक पक्ष है जो धारा 118 को हटा देना चाहता है, जबकि दूसरा पक्ष है जो जानता है कि इसमें सुधार जरूरी हैं मगर फिर भी और कोई राजनीतिक मुद्दा न होने के कारण कह रहा है कि धारा 118 में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए। दोनों ही गलत हैं और तात्कालिक लाभ के लिए हिमाचल के हितों को नजरअंदाज कर रहे हैं।

यह लेख हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले संबंध रखने पत्रकार आदर्श राठौर के ब्लॉग से लिया गया है। आप यहां क्लिक करके उनके फेसबुक पेज से जुड़ सकते हैं।

(ये लेखक के निजी विचार हैं)