अब हिमाचल में जिलों के अंदर बिना कर्फ्यू पास कर सकेंगे यात्रा

शिमला।। कोरोना संकट कर कारण लगाए गए लाॅकडाउन की वजह से आवागमन में दिक्कतों का सामना कर रहे प्रदेशवासियों को हिमाचल सरकार ने कुछ राहत दी है। अब सरकार ने लाॅकडाउन के दौरान जिलों के भीतर ई-पास के जरिए ही आवागमन की अनिवार्यता खत्म कर दी है।

नई व्यवस्था के तहत, अब जिलों के अंदर बिना कर्फ्यू पास के भी लोग आवामगन कर सकेंगे। हालांकि, एक से दूसरे जिले में जाने के लिए कफर्यू पास जरूरी होगा। प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने सोमवार को यह घोषणा की।

सीएम ने सभी जिलों के उपायुक्तों व पुलिस अधीक्षकों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बातचीत करते हुए निर्देश दिए कि जिलों के अंदर आवाजाही की अनुमति अब बिना पास के दी जाए।

ध्यान दें, बद्दी पुलिस जिला (जिसमें बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ क्षेत्र भी शामिल है) को छोड़कर दूसरे जिलों के लिए आवाजाही की अनुमति परमिट से दी जाए।

40 साल पहले हमीरपुर की वो शाम जब बुजुर्ग ने अजनबी से माँगी लिफ्ट

संकट के इस दौर में हम अपने घर न आएं तो और कहां जाएं?

आदर्श राठौर के फ़ेसबुक पेज से साभार।। आराम से अपने घरों में दुबककर बैठे कुछ लोग हायतौबा मचा रहे हैं कि बाहर से लोगों को हिमाचल लौटने दिया जा रहा है। आप क़िस्मत वाले हैं जो आपको अपने प्रदेश में रहकर कमाने (कुछ को बैठकर खाने) का मौक़ा मिला। मगर सभी आपकी तरह सौभाग्यशाली नहीं।

बहुत से लोगों को लगता है कि हिमाचल तो लगभग कोरोना मुक्त हो गया था, ये तो बाहर से लौटे लोगों ने काम बिगाड़ दिया। कुछ अख़बारों की सुर्खियों और नेताओं के प्रचार ने उन्हें आँकड़ों में ऐसा उलझाया है कि वे इंसानियत से मुँह मोड़ बैठे हैं

जो कुछ लोग कोरोना पॉज़िटिव पाए जा रहे हैं, वे शौक़ से संक्रमित नहीं हुए और न ही वे आप लोगों को संक्रमित करने के लिए लौट रहे हैं। वे तो परेशानी और बेबसी में अपने घर लौटना चाहते हैं। और मुश्किल आने पर हर कोई यही करता है। घर-परिवार ही तो इंसान का आख़िरी सहारा होता है।

क्या आप चाहते हैं कि वे लोग घर से दूर पराये शहर में एक छोटे से कमरे में बेबसी में कोरोना से दम तोड़ दें और फिर कई दिन बाद उनकी लाश मिले तो वहाँ का प्रशासन तुरंत लावारिस बताकर फूंक दे? शिमला का उदाहरण आपके सामने है कि सरकाघाट के बच्चे के साथ क्या हुआ। बाहर क्या होगा, इसकी आप कल्पना कर सकते हैं। परिवारवालों को अपनों की राख भी मिल पाएगी, इसकी गारंटी नहीं है।

हिमाचल में रोज़गार के पर्याप्त अवसर मिले होते तो कौन ठंडे पहाड़ों से उतरकर गर्म मैदानी इलाक़ों में जाना चाहता? हिमाचल की ही बात नहीं है, कोई भी अपनी जन्मभूमि शौक़ से नहीं छोड़ता। वे परिवार का पेट पालने के लिए भारी मन से बाहर जाते हैं, छोटे-छोटे कमरों का भारी-भरकम किराया चुकाते हैं, कई घंटों तक मेहनत करते हैं और जो कमाई होती है, उसे घर भेज देते हैं।

उदाहरण के लिए कितने ही हिमाचली हैं जो दिल्ली में गाड़ी चलाते हैं और साल में बमुश्किल एक बार घर लौट पाते हैं। उनका भेजा पैसा हिमाचल में खर्च होता है, वे घर भी बनाते हैं तो हिमाचल में ही। ऐसे कई लोग है जो अपनी उम्र बाहर खपा देते हैं और उनके भेजे पैसे से हिमाचल की आर्थिकी मज़बूत होती रहती है।

आज जब लॉकडाउन के कारण काम न मिलने से उनके पास खाने और किराये के लिए पैसे नहीं हैं तो वे घर लौटना चाह रहे हैं। ख़ुद तो वे बाहर रह भी जाएं, मगर घर से बुजुर्ग माँ-बाप, पत्नी या छोटे बच्चे रो-रोकर वापस आने के लिए कह रहे हैं। इन हालात में उनके अपने ही प्रदेश के लोग उनसे मुँह मोड़ रहे हैं, सोशल मीडिया पर भला-बुरा कह रहे हैं। अगर किसी व्यक्ति में लक्षण होंगे भी, तो इस ग़लत व्यवहार के कारण वह टेस्टिंग के लिए सामने नहीं आएगा। इसका नतीजा क्या होगा, आप जानते हैं।

यह सही है कि लौट रहे लोगों की बॉर्डर पर टेस्टिंग होनी चाहिए और ऐसा करने के संसाधन नहीं हैं तो लोगों को क्वॉरन्टीन करना चाहिए। सरकार के पास सबको संस्थागत क्वॉरन्टीन करने के साधन नहीं हैं, ये भी सच है। इसलिए, जिन लोगों घरों में अलग कमरे हैं, उन्हें वहीं पर और जिनके परिवार के सदस्य अधिक मगर कमरे कम हैं, उन्हें पंचायत या स्कूल के कमरों में क्वॉरन्टीन रखा जाए।

बाक़ी डरिए मत, ये लोग आपके घर में घुसकर आपके मुँह में नहीं थूक देंगे। न ही कोरोनावायरस कोई ‘करंट’ है कि संक्रमित व्यक्ति के गाँव में कदम रखने से ही गाँववासी संक्रमित हो जाएँगे। अगर आप ढंग से सोशल डिस्टैंसिंग, मास्क पहनने और हाथ धोने जैसे काम करते रहेंगे तो आपको कैसे कोरोना हो जाएगा?

हाँ, अगर ज़्यादा ही चिंता है तो आसपड़ोस में नज़र रखें कि जिन्हें क्वॉरन्टीन किया गया है, वे नियम तो नहीं तोड़ रहे। इस मुश्किल दौर में शांति और समझदारी से पेश आइए, संक्रमित लोगों के प्रति संवेदना रखिए। जो लोग बेरोज़गार होकर, हताश होकर घर लौट रहे हैं, उनका सहारा बनिए।

(यह लेख पत्रकार आदर्श राठौर के फ़ेसबुक पेज से साभार लिया गया है, ये उनके निजी विचार हैं)

40 साल पहले हमीरपुर की वो शाम जब बुजुर्ग ने अजनबी से माँगी लिफ्ट

मंत्री की तस्वीर लगे हैंडवॉश और सैनिटाइजर बाँटने पर विवाद

शिमला।। कोरोना संकट के बीच जनशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर और उनकी बेटी की तस्वीरों वाले हैंडवॉश बाँटे जाने के मामले पर विवाद खड़ा हो गया है। इस हैंडवॉश, सैनिटाइजर में मैन्युफैक्चरिंग डेट, किन चीजों से बना है और एलर्जी तो नहीं हो सकती है, ऐसी कोई जानकारियाँ नहीं छापी गई हैं। ऐसे में इन चीजों का आवंटन पूरे इलाक़े में चर्चा का विषय बन गया है।

इस मामले को लेकर धर्मपुर न्याय मंच ने सवाल उठाते हुए इसे ‘मुश्किल दौर में राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश’ करार दिया है। मंच के मुख्य सलाहकार और ज़िला परिषद सदस्य भूपेंद्र सिंह की ओर से जारी बयान के मुताबिक़, “धर्मपुर विधानसभा क्षेत्र में आज़कल मन्त्री महेंद्र सिंह और उनकी बेटी के नाम व फ़ोटो के लेबल लगे हैंडवॉश और सैनिटाइजर भाजपा बूथ कमेटियों के माध्यम से गांवों में बांटे जा रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री जयराम का फोटो गायब है जिनके मौन रहने से यह परिवार फलफूल रहा है।”

मंच की ओर से सवाल उठाया है कि अगर सरकार व मन्त्री कोरोना के वचाव के लिए कोई सामग्री वितरित करना चाहते हैं तो उन्हें पंचायत के जनप्रतिनिधियों या सभी गांवों में सरकार के दिशा निर्देश से बनी सर्व कमेटियों से ये सामग्री वितरित करवानी चाहिए न कि पार्टी कमेटियों के माध्यम से।

क्या है सैनिटाइज़र्स और हैंडवॉश में?
मंच के मुताबिक़, “आपत्तिजनक बात ये है कि इन दोनों चीज़ों पर मन्त्री और उनकी बेटी का ही फ़ोटो छपा है। इन सैनेटाइनर में कोई पता नहीं कि क्या डाला गया है, निर्माण करने की तारीख क्या है, कहीं इससे किसी को गंभीर एलर्जी तो नहीं होगी, यह भी नहीं मालूम। मापदंडों को लेकर कई सवाल हैं जिनपर प्रशासन को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। अगर कोई जनप्रतिनिधि या समाजसेवी किसी गरीब को अनाज देता है और फोटो खिंचवा लेता है तो यह सरकार एफआईआर करने की धमकी देती है।”

ज़िला परिषद सदस्य भूपेंद्र सिंह ने कहा कि हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार बनते ही दो साल पहले मंत्री की बेटी वंदना गुलेरिया ने आदर्शनी नाम से एनजीओ बनाया था जिसमें बीजेपी से जुड़े और सदस्य भी हैं। उन्होंने आरोप लगाया, “इस संस्था के माध्यम से विभिन्न गतिविधियों के नाम से कैंप लगाए जाते हैं जिनमें सरकारी विभागों को जबरन शामिल किया जाता है। इस संस्था ने सफेद रंग की टोपी के बीच कमल निशान चिपकाकर इसका राजनीतीकरण कर दिया है।इस संस्था को आज तक कितना सरकारी पैसा लुटाया गया इसकी भी जांच होनी चाहिए।”

न्याय मंच ने इस सबको सत्ता का दुरुपयोग बताया और कहा, “देश व्यापी लॉकडॉउन में गत सप्ताह मन्त्री के बेटे ने नियमों के विपरीत अस्पतालों में जाकर सभी कर्मचारियों को इकठ्ठा करके फ़ोटो खिंचवाए औऱ अब उनकी बेटी अपने व अपने पिता व मन्त्री के फ़ोटो हैंड वाश और सेनिटाइजरों की बोतलों पर छाप कर धाड़ता क्षेत्र में बांटना शुरू कर दिया है।”

मंत्री ने मास्क छूकर उन्हीं हाथों से पुलिसकर्मियों को पहनाई फेस शील्ड

कुल्लू।। हिमाचल के परिवहन, वन एवं युवा मामलों के मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने रविवार को कुल्लू और मंडी जिलों की सीमा पर झीड़ी में तैनात पुलिसकर्मियों को फेस शील्ड प्रदान की। प्रदान ही नहीं की, अपने हाथों से पहनाई भी जिसका वीडियो उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर भी डाला है। हालांकि, इस दौरान उनसे एक चूक हो गई।

नीचे दिए वीडियो को 16वें सेकंड में देखें, कैसे वह अपना मास्क अडजस्ट कर रहे हैं और फिर उन्हीं हाथों से अगले कर्मचारी को शील्ड पहना रहे हैं। यही नहीं, शील्ड उन्हें और लोग पकड़ा रहे हैं। यानी कई हाथों से गुजरकर यह शील्ड सीधे पुलिसकर्मियों के चेहरे पर लगाई जा रही है।

कोविड-19 के दौरान मंडी और कुल्लू की सीमा झिडी में सेवाएं दे रहे पुलिस कर्मियों को संक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए “फेस शील्ड प्रदान करते हुए।

Govind Singh Thakur ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಭಾನುವಾರ, ಮೇ 10, 2020

यह मामूली बात लग सकती है लेकिन खतरनाक कोविड-19 जिस तरीके से फैलता है, उसे देखते हुए मंत्री जी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। वैसे खुद पहनाने की जरूरत ही क्या थी? और अगर ऐसा करना ज़रूरी था तो हर बार हैंड सैनिटाइजर यूज करना चाहिए था और कम से कम अपना मास्क अडजस्ट करने से पहले और बाद में तो जरूर करना चाहिए था।

ऐसा इसलिए, क्योंकि कोरोना वायरस से बचाव के लिए जारी दिशानिर्देश बहुत सावधानी बरतने को कहते हैं। तीन बातों से समझा जा सकता है कि कैसे सामान्य सी लगने वाली इस घटना में लापरवाही साफ नजर आती है।

पहली बात– शील्ड को सैनिटाइज करके साफ हाथों से व्यक्ति को खुद पहनना चाहिए। शील्ड बांटना अच्छी बात है मगर इस खुद पहनाने के दिखावे से बचना चाहिए।

दूसरी बात– जिन हाथों को मंत्री जी शील्ड पहनने के लिए दूसरों के चेहरे के करीब ले जा रहे हैं, उनसे अपने मास्क को बीच से नहीं पकड़ना चाहिए। अगर कोई कर्मचारी संक्रमित होगा तो उससे मंत्री जी खुद संक्रमित हो सकते हैं।

तीसरी बात– अगर अपना मास्क छू लिया तो हाथ साफ किए बिना फेसशील्ड को पकड़कर दूसरे लोगों के चेहरे पर नहीं लगाना चाहिए था। कहीं आप खुद संक्रमित हुए तो जिन हाथों से आपने मास्क पकड़ा है, उनसे फेसशील्ड पहनकर कर्मचारियों को भी संक्रमित कर सकते हैं।

जरा सी लापरवाही भी खतरनाक हो सकती है। इसीलिए तो मास्क पहनना और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए कहा जा रहा है।

सरकाघाट: ख़ुद ही पुलिस बन गए लोग, लगाए अवैध नाके, अब होगी कार्रवाई

रितेश चौहान।। सरकाघाट से संबंध रखने वाले कोरोना संक्रमित युवक की मौत और उनकी माँ के पॉज़िटिव पाए जाने के बाद उनके इलाक़े में लोगों ने अपने स्तर पर ही नाके लगाना शुरू कर दिया है। जिन जगहों पर पुलिस ने नाकेबंदी की है, वहाँ पुलिसकर्मी भी तैनात हैं, मगर बाक़ी जगहों में लोगों ने ख़ुद ही नाके लगा दिए हैं। प्रशासन अब बफ़र ज़ोन मे भी ऐसे नाके लगाने वालों पर एफआईआर करने की तैयारी में है।

गाँव के कुछ लोगों ने ख़ुद ही पुलिस बनकर मसेरन, भटोह, रसेहड़ में नाकेबंदी कर दी है। इन अवैध नाकों के कारण आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा और मीलों पैदल ही चलना पड़ा। लोगों की फ़रियाद किसी ने भी नहीं सुनी। जब इस संबंध में इन हिमाचल ने शनिवार सुबह पोस्ट डाली तो कुछ लोगों ने कॉमेंट और मेसेज करके धमकाना शुरू कर दिया। ‘इन हिमाचल’ को रिपोर्ट करने का कैंपेन छेड़ दिया गया। हालांकि,  मामला ‘इन हिमाचल’ पर आने के बाद पुलिस-प्रशासन हरकत में आया।

डीएसपी ने कहा, “इसके अलावा किसी भी जगह रोड पर लगाया गया नाका ग़ैरक़ानूनी है। पुलिस सूचना मिलने पर जाँच करेगी और दोषी पाए जाने पर एफआईआर दर्ज करेगी।”

पुलिस ने नहीं लगाया यह नाका। ऐसे कई नाके लगाए गए हैं जिनपर कार्रवाई होनी है।

क्या बोले एसडीएम
एसडीएम ज़फ़र इक़बाल ने कहा है कि पुलिस के अलावा कोई भी शख़्स सड़क बंद नहीं कर सकता है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें जानकारी मिली थी कि लोगों ने बफ़र ज़ोन में सड़कें बंद कर दी हैं। उन्होंने कहा, “डीएसपी से कहा गया है कि इन नाकों को अपनी निगरानी में हटाएं। ये नाके क्यों नहीं हटाए गए, इस पर रिपोर्ट तलब होगी।’

डीएसपी ने कहा- होगी एफआईआर
डीएसपी चंद्रपाल सिंह ने बताया की रोपड़ी और देवब्राड़ता पंचायतों के लिए सरौरी, रिस्सा (सिर्फ़ रोपड़ी जाने वाले रास्ते की तरफ़)और पाट्टी (जझैंल से रोपड़ी) में ही पुलिस ने नाके लगाए हैl  उन्होंने कहा कि वहाँ पर 24 घंटे पुलिस कर्मी तैनात किए गए हैं ताकि ऐंबुलेंस और आवश्यक सेवाओं के अलावा और कोई वाहन देवब्राड़ता और रोपड़ी पंचायतों में ना जा सकेंl

अस्त्रों-शस्त्रों से युक्त व्यक्ति ही गिना जाता है पुरुष: रामस्वरूप शर्मा

मंडी।। हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट के बीजेपी के सांसद रामस्वरूप शर्मा ने कहा है कि ‘हमारे राष्ट्र की परंपरा रही है कि अस्त्र शस्त्रों से युक्त व्यक्ति ही पुरुष गिना जाता है।’ दरअसल कुछ दिन पहले रामस्वरूप शर्मा ने अपने घर पर लाइसेंसी बंदूक़ की सफ़ाई की तस्वीरें अपने फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट की थीं। उसके बाद लोगों ने उन्हें ट्रोल कर दिया था।

अब इस संबंध में ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान मंडी के सांसद ने सफ़ाई दी है। सांसद ने कहा, “ईरान में हर व्यक्ति को मिलिटरी लेनी पड़ती है, उसे युद्ध में जाना पड़ता है। इन कांग्रेसियों के बारे में कुछ नहीं कहा जाता। ये जो तथाकथित कांग्रेसी और वामपंथी हैं, टुकड़े-टुकड़े गैंग है, और भी हैं।

उन्होंने कहा, “ये तो हमारी परंपरा रही है राष्ट्र की। अस्त्र शस्त्रों से युक्त व्यक्ति ही पुरुष गिना जाता है। हमारी सेना श्रेष्ठ होनी चाहिए, हमारे नागरिक श्रेष्ठ होने चाहिए। मैंने अपनी लाइलेंसशुदा गन, जो चुनावों के समय जमा करवानी पड़ती है, उसे काफ़ी समय से उसे छुआ नहीं गया था। उसकी सफ़ाई की, तेल दिया जैसे एक सैनिक अपने अस्त्र-शस्त्र को ठीक करता है। मैंने वैसे किया, वो गौरव की बात है। मगर कांग्रेसियों को ये पसंद नहीं आया।”

ग़ौरतलब है कि इससे पहले लॉकडाउन के बीच दिल्ली से जोगिंदर नगर लौटने पर भी सांसद की आलोचना हुई थी। इसके जवाब में उन्होंने विवाद को कांग्रेस की साज़िश करार दिया था।

अफ़सरों को आपदा फंड से दिए 3 लाख के स्मार्टफ़ोन, कुछ के नंबर ऐक्टिव नहीं

शिमला।। कोरोना संकट के कारण बाहर फँसे हिमाचलियों की सुविधा के लिए सरकार की ओर से नियुक्त नोडल अधिकारियों को दो लाख 90 हज़ार रुपये के स्मार्टफ़ोन ख़रीदकर दिए गए है। यह मामला पूरे हिमाचल में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक स्मार्टफ़ोन का दाम 17,900 रुपये है।  दैनिक जागरण अख़बार का कहना है कि ये रक़म आपदा फंड से खर्च की गई है।

इन स्मार्टफोन्स को नए नंबरों के साथ अधिकारियों को दिया गया है। ऐसी शिकायतें भी आ रही थीं कि इन नंबरों पर कॉल किया जाए तो कोई उठा नहीं रहा। इसकी पड़ताल के लिए ‘इन हिमाचल’ ने रैंडम चेक किया तो पाया कि कुछ नंबरों को वाक़ई उठाया नहीं जा रहा तो कुछ पर इनकमिंग की सुविधा ही नहीं है। हालाँकि, राहत की बात ये है कि कुछ नंबरों को उठाया जा रहा है

चेकिंग के लिए इन हिमाचल ने तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना के लिए वित्त सचिव अक्षय सूद के नाम पर जारी 9459472832 पर शनिवार दोपहर कॉल किया तो इनकमिंग कॉल फ़ैसिलिटी नहीं मिली। जिस नंबर पर कॉल ही न पो पाए ऐसे नंबर भला किस काम के?

रैंडम चेकिंग के तहत मनमोहन शर्मा (निदेशक कार्मिक) को असम, मिजोरम, अरुणाचल, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा व मेघालय के लिए नोडल ऑफ़िसर बनाया गया है। इनके नंबर 9459457476 पर दोपहर कॉल किया गया तो उठाया नहीं गया। हो सकता है कि व्यस्त रहे हों। हालाँकि, अच्छी बात यह थी कि मंडलायुक्त शिमला राजीव शर्मा, जो कि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और उत्तराखंड के नोडल ऑफ़िसर बनाए गए हैं, के नाम पर जारी नंबर 9459455714 पर कॉल किया गया तो पहले वह मिस हो गई मगर दूसरी तरफ़ से कॉल बैक आया।

सवाल ये भी उठ रहे हैं कि जब सरकार ने पहले ही हेल्पलाइन नंबर जारी किए हुए हैं तो अधिकारियों को फ़ोन क्यों दिए गए। मगर सरकार का कहना है कि अधिकारियों के निजी फ़ोन वॉट्सऐप मेसेज आदि से भर गए थे जिससे उन्हें अन्य कामों में भी दिक़्क़त हो रही थी, इसलिए अस्थायी तौर पर उन्हें ये फ़ोन दिए गए हैं।

किसके लिए कौन सा नंबर

  • अक्षय सूद (सचिव वित्त)- तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश व तेलंगाना, 9459472832
  • राजीव शर्मा (मंडलायुक्त शिमला)-  जम्मू कश्मीर, लद्दाख व उत्तराखंड, 9459455714
  • डॉ. एसएस गुलेरिया (श्रमायुक्त)- झारखंड व ओडिशा, 94594.55279
  • राकेश कंवर (सचिव, राज्यपाल)- उत्तर प्रदेश, 94594.55841
  • देवदत्त शर्मा (विशेष सचिव वित्त)- बिहार, 94594.57046
  • मानसी सहाय ठाकुर (प्रबंध निदेशक खाद्य एवं आपूर्ति) महाराष्ट्र, गोवा व पुडुचेरी, 94594.73112
  • सुदेश मुखटा (निदेशक वित्त) केरल, लक्षद्वीप व कर्नाटक, 9459457061
  • चंद्र प्रकाश वर्मा (निदेशक हिप्पा)- सहायक नोडल अधिकारी, 9459457107
  • ललित जैन (निदेशक ग्रामीण विकास)- पंजाब, चंडीगढ़ व मोहाली, 94594.85157
  • हेमराज बैरवा (विशेष सचिव ऊर्जा)- राजस्थान, गुजरात, दादर व नगर हवेली, दमन व दीव, 94594.57292
  • नीरज कुमार (विशेष सचिव वन) मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, 94594 57659
  • मनमोहन शर्मा (निदेशक कार्मिक) असम, मिजोरम, अरुणाचल, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा व मेघालय, 9459457476
  • रोहित जम्वाल (निदेशक प्रारंभिक शिक्षा)- अंडेमान व निकोबार, सिक्किम, 9459457587

(स्रोत- जागरण)

फ़ीस के बहाने कैसे लूट रहे हैं चैरिटी के नाम पर खुले प्राइवेट स्कूल

पंडित ओंकार।। शिक्षा को पूरी दुनिया में बेहतर और सम्मानित जीवन जीने के लिए बेहद बुनियादी और आवश्यक चीज़ समझा जाता है। इसीलिए, देश अपने यहां विकास के लिए शिक्षा पर ध्यान देना अपनी पहली प्राथमिकता मानते हैं। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि स्कूल विद्या के मंदिर होते हैं। चूंकि स्कूलों का नैतिक महत्व इतना ज़्यादा है, इसलिए सरकारों का भी ज़ोर रहता है कि जो कोई स्कूल या शिक्षण संस्थान खोलना चाहता है, वह नॉट फॉर प्रॉफिट या गैर-लाभकारी (मुनाफा कमाना जिसका मकसद न हो) संस्थान के तौर पर इन्हें पंजीकृत करवाए न कि कमर्शल इंडस्ट्री के तौर पर।

भारत में अधिकतर निजी स्कूलों को सोसाइटी रजिस्ट्रेशन ऐक्ट या फिर ट्रस्ट ऐक्ट के तहत पंजीकृत किया जाता है। मगर गैर-लाभकारी संस्थान होने के बावजूद इस बात में कोई शक नहीं कि ये स्कूल पैसे छापने की मशीनें बन गई हैं जहां पर बच्चों को शिक्षा पाने के लिए भारी-भरकम फीस देनी पड़ती है। हालांकि इस बात की कोई गारंटी नहीं कि इस शिक्षा में गुणवत्ता भी होती है या नहीं। वैसे यह अलग से चर्चा का विषय है।

मुनाफ़ा नहीं कमा सकते स्कूल
स्कूलों को सोसाइटी या ट्रस्ट के तौर पर पंजीकृत किए जाने के पीछे का विचार यह है कि शिक्षा को देश के लिए एक पवित्र सेवा समझा जाता है और इस काम से किसी तरह के मुनाफे की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह हर नागरिक का मौलिक अधिकार है कि वह अच्छी शिक्षा पाए और इसलिए ऐसे संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस काम के लिए वाजिब फीस ले। इस मौलिक अधिकार के लिए ही 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लाया गया था।

यह सच है कि हिमाचल प्रदेश में चल रहे अधिकतर निजी स्कूलों को सरकारों की ओर से सहायता नहीं मिलती। इसलिए उन्हें स्कूल चलाने के लिए अपने स्तर पर ही फंड जुटाने होते हैं। इसीलिए शायद इन स्कूलों की फीस सरकारी स्कूलों या सरकार से मदद पाने वाले स्कूलों की तुलना में अधिक होती है।

देश में सरकारी स्कूलों की हालत देखकर भी निजी स्कूलों की तरफ़ आकर्षित हो रहे लोग (प्रतीकात्मक तस्वीर)

मगर एक सवाल ऐसा है जिसका आज तक जवाब नहीं मिल पाया। वो ये कि इन स्कूलों द्वारा बच्चों से ली जाने वाली फीस के बदले उसी अनुपात में सुविधाएं भी मुहैया करवाई जाती हैं या फिर इस पैसे को वे अपने मुनाफे के लिए निकाल लेते हैं?

हाल के सालों में सरकारी स्कूलों के प्रति सरकार की उदासीनता और उनमें शिक्षा की खराब क्वॉलिटी के कारण लोग निजी स्कूलों का रुख करने लगे हैं। उन्हें लगता है कि उनके बच्चे को अच्छे असवर मिलेंगे, अच्छी शिक्षा मिलेगी। इस कारण बहुत से लोगों और संस्थाओं ने स्कूल खोल दिए हैं। मगर दुर्भाग्य से उनका उद्देश्य सेवा करना नहीं होता बल्कि इससे मुनाफा कमाना होता है।

हिमाचल प्रदेश में लगभग 1400 निजी स्कूल हैं और उन्हें हिमाचल प्रदेश एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस रेग्युलेशंस ऐक्ट और राइट टु एजुकेशन ऐक्ट के तहत काम करना होता है। भले ही स्कूलों के लिए कई सारे से नियम कानून बनाए गए हैं मगर अभी तक इनकी कार्यप्रणाली की जवाबदेही तय करने का कोई सिस्टम नहीं बनाया गया है।

फ़ीस के लिए दबाव क्यों डाला जा रहा
हाल के कुछ हफ्ते आम जनता के लिए मुश्किलों भरे रहे हैं। कोविड 19 के चलते लगाए गए लॉकडाउन के कारण अधिकतर आबादी की आय प्रभावित हुई है। कुछ को सैलरी नहीं मिल रही, कुछ की कम हो गई है तो कुछ मज़दूरी नहीं कर पा रहे। इस बात के बावजूद अधिकतर स्कूल दबाव बना रहे हैं कि बच्चों के अभिभावक पूरी की पूरी फीस भरें। इस कारण पहले से परेशान लोग और दबाव में आ रहे है।

हैरानी की बाद ये है कि ये ‘कल्याणकारी’ और मुनाफा न कमाने के नाम पर खुले संस्थान, जो सरकार से टैक्स वगैरह में कई तरह की रियायतें हासिल करते हैं, एक महीने के लिए फीस नहीं टाल सकते। वो भी तब, जब उनके पास ऐसे संसाधन नहीं हैं जो इस दौरान खराब हो जाएंगे।

छात्रों से ज़्यादा फ़ीस लेकर बड़ा हिस्सा मैनेजमेंट की जेब जाए तो क्या फ़ायदा?

निजी स्कूलों का फीस लेने को लेकर जो तर्क दिया जा रहा है, वो भी कुछ हजम नहीं होता। स्कूल कह रहे हैं कि उन्हें अपने कर्मचारियों (टीचर वह अन्य स्टाफ) का वेतन देना है और ऐसा तभी हो पाएगा जब वे फीस ले पाएंगे। उनके इस बहाने का मतलब है कि स्कूल के पास इतना सरप्लस फंड ही नहीं है कि फीस न मिलने पर वे कर्मचारियों का वेतन नहीं दे पाएंगे। क्या वाकई? क्या एक महीने फीस से ही इन स्कूलों का उस महीने भर का खर्च निकलता है?

इसी बात से स्कूलों के काम करने के काम करने के तरीके पर सवाल खड़ा होता है और सरकार पर जवाबदेही तय करने की जिम्मेदारी आती है। क्या सरकार को देखल देकर इन स्कूलों पर नकेल नहीं कसनी चाहिए? क्या सरकार को देखना नहीं चाहिए कि स्कूल चला रही सोसाइटीज़ और ट्रस्टों के पास कितना सरप्लस फंड है? क्या सरकार को चेक नहीं करना चाहिए कि उस स्कूल का मैनेजमेंट अपने लिए कितनी सैलरी ले रहा है?

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अकाउंट बुक्स में गोलमाल पर लगे लगाम
यह सार्वजनिक है कि बहुत सारे स्कूल अपनी अकाउंट बुक्स में गोलमाल करके फीस से मिलने फंड को स्कूल चलाने पर होने वाले खर्च और अपने स्टाफ की सैलरी के नाम पर दिखाते हैं। इसके लिए वे अपने स्टाफ की सैलरी बहुत ज्यादा दिखाते हैं जबकि वास्तव में उन्हें कम पैसे देते हैं। कुछ स्कूल को तो सैलरी के तौर पर अध्यापकों को अकाउंट में ज्यादा पैसे डालते हैं मगर बाद में उनसे कुछ रकम कैश से ले लेते हैं।

तो फिर ये सरप्लस या बचा हुआ पैसा कहां जाता है? दरअसल मैनेजमेंट के लोग इस पैसे से अमीर हो रहे होते हैं। वे शिक्षण संस्थानों के नाम पर पैसा कमाते हैं और अपनी जेबें भरते हैं। स्कूल में होने वाले इवेंट्स का खर्च फ़र्ज़ी बिलों से ज़्यादा दिखाया जाता है और बाक़ी बचा पैसा मैनेजमेंट की जेब में जाता है। साथ ही, मैनेजमेंट के लोगों ने अपना वेतन बहुत ज़्यादा रखा होता है। चूंकि सरकार इस खेल को लेकर कभी कोई कार्रवाई करने में रुचि नहीं दिखाती इसलिए यह गोरखधंधा इस तरह से लालची लोगों के संस्थानों को प्रोत्साहन दे रहा है।

जब राज्य सरकार किसी निजी स्कूल या संस्थान को मान्यता देती है तो देखा जाता है कि इन्होंने निश्चित शर्तें पूरी की हैं या नहीं। मगर यह भी देखा जाना चाहिए कि भारतीय संविधान में नागरिकों को दिए शिक्षा के अधिकार को लेकर ये संस्थान प्रतिबद्धता दिखाते हैं या नहीं। इसलिए सरकार का फर्ज है कि वो प्रभावी नियामक कदम उठाए ताकि इन स्कूलों की कार्यप्रणाली पर नजर रखी जा सके।

फ़ीस ज़्यादा लेकर कम सुविधाएँ देने वाले निजी स्कूलों को बंद करना चाहिए या नहीं?

सरकार को कुछ ऐसे प्रावधान लाने चाहिए कि कि निजी स्कूलों को रेग्युलेट किया जाए। क्योंकि अभी जो नियम हैं, वे बिना दांत के शेर की तरह हैं। उनमें दम नहीं कि शिक्षा को नोट छापने का धंधा बनाने को रोक सकें। नियम बनाया जाना चाहिए कि सभी निजी स्कूलों का ऑडिट सरकारी एजेंसी करेगी। अभी जो स्कूलों द्वारा खुद ही अपने ऑडिट रिपोर्ट जमा करने का प्रावधान है, उसे ख़त्म किया जाना चाहिए। सरकार देखे कि स्कूलो में क्या सुविधाएं दी जा रही हैं, इनके पास क्या साजो-सामान हैं और वे फ़ीस के अनुरूप हैं या नहीं। साथ ही मैनेजमेंट की सैलरी भी फिक्स कर दी जानी चाहिए।

शिक्षा मौलिक अधिकार है, इसलिए सरकार को इस काम को अपने हाथ में लेना चाहिए। उसे देखना चाहिए कि स्कूलों के पास कुछ सरप्लस फंड रहे और वो उस संस्थान की जरूरत से ज्यादा न हो। रेवेन्यू एक्सपेंडिचर को भी मॉनिटर किया जाए और ब्लॉक एजुकेशन ऑफिसर या डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन अथॉरिटी को ऑडिटर नियुक्त करने का अधिकार दिया जाए।

यह देखा गया है कि स्कूल अपने छात्रों को अपने यहीं से किताबें-कॉपियां या अन्य चीजें खरीदने को मजबूर करते हैं। वे अपने परिसर में ही दुकाने खोलते हैं और उनसे भी मुनाफा कमाते हैं। इससे होने वाले मुनाफे को वे छात्रों के साथ साझा नहीं करते। इसलिए, स्कूलों में शिक्षण सेवाओं के नाम पर चल रहीं इन व्यावसायिक गतिविधियों पर भी लगाम लगाई जाए।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा से हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

हमीरपुर में पाया गया कोरोनावायरस संक्रमण का नया मामला

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर जिले में कोरोना का मामला मिला है। संक्रमित मरीज 29 अप्रैल को दिल्ली से हिमाचल लौटा था। इस मामले के सामने आने के बाद इलाके को सील कर दिया गया है।

कोरोना संक्रमित उपमंडल बड़सर का रहने वाला है। बिझड़ी तहसील का तीन किलोमीटर क्षेत्र कंटेनमेंट जोन में शामिल किया गया है। प्रशासन ने कर्फ्यू में दी जाने वाली ढील अनिश्चितकाल के लिए रद्द कर दी है। आज से दुकानें नहीं खुलेंगी, सभी तरह की गतिविधियों पर रोक लगाई गई है।

एक दिन पहले इस व्यक्ति का सैंपल लिया गया था। वह दो बच्चों और पत्नी सहित 29 अप्रैल को दिल्ली से लौटा था। कोरोना संक्रमित को कोविड-19 अस्पताल भोटा में शिफ्ट किया गया है। परिवार के सभी 11 सदस्यों को भी क्वारंटीन किया गया है।

40 साल पहले हमीरपुर की वो शाम जब बुजुर्ग ने अजनबी से माँगी लिफ्ट

बिंदल ने सरकार को दिया पेड़ काटने और खनन बढ़ाने का सुझाव

शिमला।। कोरोना संकट के बीच प्रदेश की अर्थव्यवस्था में जान डालने के लिए बीजेपी के प्रदेशाध्यक्ष ने कोविड 19 संकट से निपटने के लिए बनी कमेटी के मुखिया जलशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह को कुछ सुझाव दिए हैं।

डॉ. राजीव बिंदल गुरुवार को सुझावों को लेकर सचिवालय पहुंचे और महेंद्र सिंह ठाकुर को एक प्रति सौंपी। इनमें बताया गया है कि कैसे सरकार राजस्व में बढ़ोतरी कर सकती है।

क्या हैं सुझाव
बीजेपी की ओर से सरकार को दिए गए सुझावों मे खैर के पेड़ों के कटान पर लगी रोक हटाकर इसकी अनुमति देने की मांग उठाई गई है ताकि इससे प्रदेश की आमदनी बढ़ सके।

कहा गया है कि #रेत बजरी पत्थर और गटका के लिए सभी स्थानों पर माइनिंग लीज जल्द दी जाएं। आमदनी बढ़ाने के लिए सरकार पड़ोसी राज्यों से तालमेल बिठाकर राज्यों से शराब पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाए, ताकि पड़ोसी राज्यों में भी शराब का दाम बराबर हो।

इसके अलावा कहा गया है कि पंजाब से बिजली पर हिमाचल के हिस्सा की मांग जोरदार ढंग से उठाई जानी चाहिए। सुझाव है कि सीमेंट उद्योग से मिलने टैक्स को भी बढ़ाया जाना चाहिए ताकि प्रदेश को आर्थिक मंदी से उभारा जा सके।

साथ ही कृषि, बागवानी, स्वरोजगार व अन्य कई सुझाव भी दिए गए है।

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