शिमला।। कोविड-19 की दवा बनाने के पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड के दावों पर आयुष मंत्रालय ने संज्ञान लिया है। मंत्रालय ने पतंजलि से कोरोना की दवा ‘कोरोनिल’ के विज्ञापनों को बंद करने और इसपर अपने दावे को सार्वजनिक करने से मना किया है।
पतंजलि द्वारा ट्वीट की गई कोरोनिल की तस्वीर
सरकार ने कहा है कि जब तक इसकी विधिवत जांच नहीं हो जाती, तब तक इसके प्रचार-प्रसार पर रोक लगी रहेगी। इस संबंध में पहले ही ‘इन हिमाचल’ ने बताया था कि बाबा रामदेव के पतंजलि द्वारा बनाई गई दवा का प्रचार या अप्रत्यक्ष विज्ञापन नहीं किया जा सकता।
आयुष मंत्रालय का बयान
इस संबंध में आयुष मंत्रालय ने पहले से ही गाइडलाइन्स जारी की थीं कि कोई भी आयुर्वेद से कोरोना के इलाज के दावे वाला विज्ञापन जारी नहीं कर सकता।
हालांकि, अब ये सवाल भी उठने लगे हैं कि जब पतंजलि ने पहले से ही दवा को लांच करने का ऐलान किया था तो आयुष मंत्रालय ने पहले रोक क्यों नहीं लगाई, लांच होने के बाद ही बयान जारी क्यों किया।
आयुष मंत्रालय के दिशानिर्देश, जिनका पालन किया जाता तो पहले ही दवा का लॉन्च रोका जा सकता था
सवाल उठ रहे हैं कि एक तरह से जब दवा का प्रचार हो गया, तभी क्यों मंत्रालय जागा।
शिमला।। योगगुरु बाबा रामदेव ने दावा किया है कि पतंजलि रिसर्च इंस्टीट्यूट ने कोरोना वायरस का आयुर्वेदिक इलाज ढूंढने का दावा किया है। मगर अब यह जानकारी सामने आई है कि आईसीएमआर और आयुष मंत्रालय ने इस दवा से दूरी बना ली है।
हरिद्वार में की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि कोरोना मरीजों पर रैंडमाइज़्ड प्लसीबो कंट्रोल्ड क्लीनिकल ट्रायल में कोरोनिल नाम की दवा को टेस्ट किया गया।
बाबा रामदेव ने कहा, “ट्रायल में 69 प्रतिशत मरीज तीन दिनों में और 100 प्रतिशत मरीज सात दिनों में ठीक हो गए।” उन्होंने दावा किया कि कोरोनिलज़ कोविड 19 की पहली आयुर्वेदिक क्लिनिकली कंट्रोल्ड, रिसर्च, साक्ष्य और ट्रायल आधारित दवा है।
हालांकि, इंडिया टुडे के मुताबिक देश की सबसे बड़ी मेडिकल बॉडी और कोरोना के इलाज की प्रमुख एजेंसी आईसीएमआर ने इस दवा के साथ कोई सम्बन्ध होने से इनकार कर दिया है। कोरोनिल को लेकर आईसीएमआर के अधिकारियों ने मीडिया को बताया कि आयुर्वेदिक दवाओं का मामला उनके नहीं, आयुष मंत्रालय के तहत आता है।
वहीं, इंडिया टुडे समूह ने जब आयुष मंत्रालय से सम्पर्क किया तो पहले अधिकारियों ने कहा कि कोरोनिल पर आईसीएमआर जानकारी देगा। जब उन्हें बताया गया कि आईसीएमआर ने आयुष मंत्रालय का नाम लिया है तो उन्होंने कहा कि राज्य सरकार (इस मामले में उत्तराखंड सरकार) की जिम्मेदारी बनती है जिसे फार्मा कम्पनी, आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली कम्पनियों को लाइसेंस देना होता हैं।
तीन दवाओं वाली कोरोनिल किट की कीमत 545 रुपये होगी। ये कहाँ उपलब्ध होगी, इसकी जानकारी हम प्रकाशित नहीं कर सकते क्योंकि आयुष मंत्रालय ने कोरोना के इलाज को आयुर्वेद से करने संबंधी किसी भी दावे के विज्ञापन पर रोक लगाई है।
आयुष मंत्रालय के दिशानिर्देश
दवा की बिक्री को लेकर जानकारी देना अप्रत्यक्ष विज्ञापन होगा। आयुष की पूरी गाइडलाइंस आप यहां टैप करके पढ़ सकते हैं।
ऊना।। कोरोना काल में डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर सेवाएँ दे रहे हैं। देश-दुनिया में बहुत सारे डॉक्टर बाकियों का इलाज करते-करते ख़ुद कोरोना की चपेट में आ रहे हैं। इन मुश्किल हालात में भी अपनी जान की परवाह किए बग़ैर फ़र्ज़ को आगे रखने के कारण ही डॉक्टरों को कोरोना वॉरियर कहा जा रहा है। मगर इन हालात में भी कुछ डॉक्टरों पर लापरवाही के आरोप लग रहे हैं।
ऐसा ही मामला सामने आया है हिमाचल में जहां पर एक डॉक्टर पर ड्यूटी में कोताही का आरोप लगाने वाले शख़्स को न सिर्फ़ पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ा बल्कि एक संदिग्ध शिकायत के आधार पर नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। वह भी तब, जब स्वास्थ्य विभाग द्वारा की गई जाँच में डॉक्टर की गलती पाई गई है। लेकिन गवाहों से लेकर सीसीटीवी फ़ुटेज जैसे साक्ष्यों को भी नज़रअंदाज़ करके पुलिस ने शिकायतकर्ता पर ही कलंदरा दर्ज कर लिया। आरोप है कि पुलिस से लेकर प्रशासन तक रसूखदार परिवार से संबंध रखने वाली महिला डॉक्टर के दबाव में आकर उसे बचाने और पत्रकार को फँसाने में जुटा है।
मामला ऊना के अंब का है। अपने बीमार पिता को अस्पताल ले गए एक पत्रकार ने लौटकर आरोप लगाया कि वहाँ मौजूद डॉक्टर ने सही से व्यवहार नहीं किया। इसके बाद डॉक्टर ने पत्रकार पर बदसलूकी का आरोप लगाया। दोनों की शिकायत पुलिस तक पहुँची और फिर मुख्यमंत्री कार्यालय तक भी। स्वास्थ्य विभाग मुख्यमंत्री के पास है ऐसे में सीएम की ओर से तुरंत मामले की जाँच के आदेश दिए गए। दोनों की शिकायतों की जाँच हुई। स्वास्थ्य विभाग के जाँच अधिकारी ने पाया कि डॉक्टर अपनी ड्यूटी का निर्वहन करने में असफल रहीं और उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
इस बीच तक स्थानीय पुलिस ने शुरुआती जाँच में बयानों आदि के आधार पर पाया कि महिला डॉक्टर के द्वारा लगाए गए आरोपों में वज़न नहीं है। मगर यहीं पूरे मामले में नया मोड़ आ गया। अचानक जिला पुलिस कप्तान ने मामले का जाँच अधिकारी बदल दिया और उसने पिछली जाँच को नज़रअंदाज़ करके एडीए द्वारा दी गई सीसीटीवी फ़ुटेज जाँच की पड़ताल की सिफ़ारिश पर अमल किए बिना ही पत्रकार पर सरकारी काम में बाधा पहुँचाने और अधिकारी को क्षति पहुँचाने के लिए कार्रवाई करते हुए कलंदरा दर्ज लिया।
अपनी शिकायत में महिला डॉक्टर ने जो दावे किए हैं, सीसीटीवी फ़ुटेज उन दावों के अनुरूप नहीं है। ऐसे में पुलिस पर भी सवाल उठ रहे हैं कि क्यों जाँच अधिकारी बदला गया और उस जाँच अधिकारी ने बिना सीसीटीवी फ़ुटेज देखे कि आधार पर पत्रकार पर कार्रवाई कर दी। अब सरकार के दो महकमे ही आमने-सामने हैं। स्वास्थ्य विभाग साक्ष्यों के आधार पर डॉक्टर को दोषी पा रहा है तो वहीं पुलिस के बदले हुए जाँच अधिकारी ने पत्रकार पर कार्रवाई कर दी। हमने पूरे मामले की पड़ताल की तो पाया कि पुलिस की ओर से मामले में की गई कार्रवाई बेहद अजीब है। ऐसा में सवाल उठने लगे हैं कि कि पुलिस ने किसी दबाव में आकर यह मामला तो नहीं बनाया।
इस संबंध में ‘इन हिमाचल’ से पास आशुतोष और महिला डॉक्टर, दोनों की लिखित शिकायतें, पुलिस द्वारा की गई शुरुआती जांच की प्रतियां और सीसीटीवी की फुटेज के क्लिप्स उपलब्ध हैं। इस पूरे मामले को समझने के लिए पूरा घटनाक्रम समझें-
दिन- 28 अप्रैल, 2020
ऊना के अम्ब के रहने वाले आशुतोष, जो कि स्थानीय पत्रकार हैं, अपने पिता को लेकर अंब अस्पताल गए। उनके पिता हार्ट पेशंट थे और उन्हें उल्टियां हो रही थीं। ड्यूटी रूम में वह तुरंत उन्हें इमर्जेंसी में ले गए क्योंकि दिल के मरीज़ों के लिए उल्टियां घातक साबित हो सकती हैं। जब वह ड्यूटी रूम पहुंचे तो उन्हें वहां मौजूद डॉक्टरों ने बताया कि इमर्जेंसी ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर जांच करेंगे।
आरोप है कि वहाँ मौजूद डॉक्टरों ने एक महिला डॉक्टर के आने का इंतज़ार करने को कहा। इस दौरान तक बाक़ी मरीज़ों को चेक किया जाता रहा। कुछ देर बाद वह डॉक्टर वहाँ पर आईं। काफ़ी देर बात जब आशुतोष के पिता का नंबर आया तो उन्हें कमरे के बाहर रखी गई कुर्सी पर बिठा दिया गया जबकि डॉक्टर काफ़ी अंदर थीं। इस बात की पुष्टि सीसीटीवी फ़ुटेज में भी होती है।
मरीज को जहां बिठाया गया था, वजह जगह डॉक्टर से तीन मीटर से भी ज़्यादा दूर थी। इसका पता आपको नीचे की तस्वीर से चल जाएगा। जहां पर मरीज़ को बिठाया गया था, वहाँ घेरा लगाया गया है।
ऐसा तब हुआ, जब स्वास्थ्य विभाग पहले ही स्पष्ट निर्देश जारी कर चुका था कि मरीज़ों और डॉक्टरों के बीच कम से कम एक मीटर का फ़ासला रखना है और जो नॉन-कॉविड पेशंट्स हैं, उनकी जाँच सामान्य तौर पर करनी है, जैसे करनी चाहिए। मगर यहाँ पर दूरी बहुत ही ज़्यादा थी, जिससे डॉक्टर की बात मरीज़ों को समझ नहीं आ रही थी। आशुतोष जब अपने पिता की समस्या के बारे में बताने के लिए थोड़ा सा आगे गए तो उन्हें हाथों से इशारा करके डॉक्टर ने पीछे जाने को कहा।
इस तस्वीर से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि डॉक्टर ने मरीज़ को कहां बिठाया था।
बहरहाल, इस दौरान तक महिला डॉक्टर ने आशुतोष के पिता की जांच तक नहीं की। ईसीजी आदि तो दूर, बीपी तक नहीं मापा गया और डॉक्टर के कहने पर नर्स ने इंजेक्शन लगा दिया। पूरी वीडियो फुटेज में दिखता है कि मरीज़ की जांच ही नहीं की गई। आशुतोष का कहना है कि महिला डॉक्टर ने जब उन्हें पर्ची पकड़ाई तो उस समय उन्होंने महिला डॉक्टर से कहा कि ‘पेशंट और आपके बीच कुछ ज़्यादा ही दूरी थी, सोशल डिस्टैंसिंग इतनी नहीं होती, मैं भी पत्रकार हूँ और सामाजिक दूरी का मुझे पता है।’
इसके बाद नर्स ने आशुतोष के पिता को इंजेक्शन दिया और वो घर आ गए। अस्पताल में हुए व्यवहार को लेकर उन्होंने फ़ेसबुक पर वीडियो डाला और उसमें आसपास के पुलिस थानों को टैग किया। उन्होंने वीडियो में नाम लिए बग़ैर बताया कि किस तरह से उनके पिता को ढंग से चेक नहीं किया गया। उन्होंने बीएमओ आदि को फ़ोन करके शिकायत की और ईमेल के माध्यम से मुख्यमंत्री कार्यालय से भी शिकायत दर्ज की और चिट्ठी भी लिखी।
आशुतोष द्वारा की गई शिकायत
इसी बीच डॉक्टर ने भी पुलिस को शिकायत दी कि आशुतोष नाम का शख्स आया और उसने सोशल डिस्टैंसिंग का पालन नहीं किया और जब उसे ऐसा करने के लिए कहा गया तो धमकाने लगा कि मैं भी सोशल डिस्टैंसिंग जानता हूं और पत्रकार हूं। डॉक्टर की शिकायत के अनुसार, आशुतोष ने पत्रकार होने की धौंस दिखाई। उन्होंने आशुतोष द्वारा फ़ेसबुक पर डाले गए वीडियो का भी ज़िक्र किया और कहा इससे उन्हें भावनात्मक रूप से ठेस पहुँची है।
इस बीच आशुतोष के पिता की तबीयत बिगड़ गई और उन्हें फिर से एक मई को अस्पताल में भर्ती करवाना पड़ा जहां वे पाँच दिन रहे। बीच में एक लैब में करवाए गए टेस्ट में पता चला कि उनके पिता के शरीर के इलेक्ट्रोलाइट्स का बैलंस गड़बड़ा गया था जिससे उन्हें स्ट्रोक का खतरा पैदा हो गया था। ऐसी स्थिति में कोई कॉमा में जा सकता है और मौत भी हो सकती है।
इसी बीच सीएमओ ऊना की ओर से मामले की जाँच शुरू हो गई। इसमें प्रारंभिक जाँच में भी डॉक्टर द्वारा ही कोताही करना पाया गया।
सीएमओ द्वारा की गई प्रारंभिक जाँच की रिपोर्ट
फिर दो मई को पुलिस ने शिकायत के आधार पर पड़ताल की और लोगों के बयान कलमबद्ध किए थे। उस रोजनामचे में जाँच अधिकारी ने लिखा कि ‘घटनास्थल’ पर बहस नहीं हुई है और इतना ही पाया गया है कि पत्रकार ने यह कहा कि मैं सोशल डिस्टैंसिंग के बारे में जानता हूँ, प्रेस रिपोर्टर हूँ।’ फिर भी, इस शिकायत पत्र को उन्होंने डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी (डीए) के पास राय के लिए भेजा।
रोजनामचे में डॉक्टर की शिकायत और जांच अधिकारी की टिप्पणी
इसे पुलिस ने डीए के पास ऑपिनियन के लिए भेजा तो उन्होंने कहा कि जिस तरह के आरोप डॉक्टर ने लगाए हैं, मौजूद गवाहों के बयान के आधार पर वैसा कोई घटनाक्रम होना नहीं पाया जाता है ऐसे में आशुतोष पर एपिडेमिक एक्ट के कोई केस नहीं बनता। हालाँकि, इसमें कहा गया था कि गया था कि सीसीटीवी फ़ुटेज का अध्ययन किया जाना चाहिए।
जाँच अधिकारी की पड़ताल पर डीए की राय।
दिन- 5 मई, 2020
सीएमओ स्तर पर की गई जाँच में आशुतोष की शिकायत सही पाई गई और डॉक्टर द्वारा की गई शिकायत को पुलिस ने उचित नहीं पाया। अब इन दोनों रिपोर्टों को आधार मानें तो डॉक्टर का दावा सही नहीं था। मगर पाँच मई को एक नया मोड़ आया। इस दिन जाँच अधिकारी को बदल दिया गया। इस अधिकारी ने डॉक्टर की शिकायत के उस हिस्से को आधार बनाया, जिसमें कहा गया था कि अन्य स्टाफ़ पीपीई किट में बैठा था मगर आशुतोष बिना पीपीई किट ही ड्यूटी रूप में घुस आया। अपनी शिकायत में उन्होंने कहा है कि सीसीटीवी फ़ुटेज में सब साफ़ हो जाएगा।
डॉक्टर द्वारा की गई कंप्लेंट का वो हिस्सा जिसके आधार पर नए जाँच अधिकारी ने कार्रवाई की
अगर जाँच अधिकारी ने सीसीटीवी फ़ुटेज देखी होती तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता। मगर ऐसा नहीं किया गया। हालाँकि, हमारे पास जो सीसीटीवी फ़ुटेज की क्लिप्स हैं, उनमें न तो इन महिला डॉक्टर ने खुद पीपीई किट पहना है और न अन्य स्टाफ़ ने। शिकायतकर्ता डॉक्टर के पास तो ग्लव्स तक नहीं थे।
डॉक्टर ख़ुद बिना पीपीई किट और ग्लव्स के थीं।
अन्य कर्मचारी भी उसी अवस्था में अंदर-बाहर जा रहे हैं जबकि कुछ ने तो मास्क तक नहीं पहना था।
डॉक्टर ने अपनी शिकायत में जिन डॉक्टर को पीपीई किट में बताया है, वह सीसीटीवी फ़ुटेज में बिना पीपीई किट पहने दिख रहे हैं।बिना पीपीई के डॉक्टर
उधर बदले हुए नए जांच अधिकारी ने आशुतोष को समझौता करने के लिए कहा मगर उन्होंने इनकार कर दिया। इसके बाद जांच अधिकारी ने पड़ताल किए बिना, सीसीटीवी देखे बिना आशुतोष पर कार्रवाई कर दी गई। जाँच अधिकारी द्वारा उनके व्यवहार को नए जाँच अधिकारी ने सरकारी अधिकारी के काम में बाधा डालना, धमकी देना और मानसिक रूप से परेशान करने वाला पाया गया। नीचे देखें, क्या लिखा गया है मगर आगे पढ़ें कि सीसीटीवी क्या कहता है।
नए जाँच अधिकारी की रिपोर्ट जिसमें आशुतोष पर कार्रवाई की तैयारी की गई।
पुलिस पर सवाल
सीसीटीवी फुटेज से पता चलता है कि आशुतोष और दिल के मरीज उनके पिता का महिला डॉक्टर से एक ही बार सामना हुआ। एक बार तब जब 30 सेकंड के लिए आशुतोष ने अपने पिता को दिखाना चाहा और जिसे लेकर डॉक्टर ने सोशल डिस्टैंसिंग के उल्लंघन की शिकायत की है और दूसरी बार तब मात्र 8 सेकंड के लिए, जब आशुतोष का कहना है कि उन्होंने डॉक्टर से कहा कि सोशल डिस्टैंसिंग के बारे में उन्हें भी अच्छी तरह पता है।
शिकायत में डॉक्टर ने यह भी लिखा है कि आशुतोष बार-बार इमर्जेंसी रूम में आकर धमकी देता रहा। मगर फ़ुटेज से पता चलता है कि डॉक्टर अपने कमरे में 3.52 पर गई थीं और 4.29 पर बाहर निकली थीं। तब तक आशुतोष अपने पिता को लेकर 4 बजकर 8 मिनट पर ही वहाँ से निकल चुके थे। सीसीटीवी फ़ुटेज में कहीं नहीं है कि वह बार-बार आकर डॉक्टर को धमकाते रहे हों। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि पुलिस ने सीसीटीवी की जाँच क्यों नहीं की और किस आधार पर शिकायतकर्ता पर ही कार्रवाई कर दी।
डॉक्टर के ख़िलाफ़ शिकायत का क्या हुआ?
इस बीच तक मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जाँच के आदेश आने पर उच्च स्तरीय जाँच शुरू हुई। इसमें पाया गया कि वाक़ई डॉक्टर ने अपनी ड्यूटी में कोताही बरती थी और जाँच अधिकारी ने तो टर्मिनेशन तक की सिफ़ारिश कर दी थी। इस जाँच के बाद डॉक्टर को शो कॉज़ यानी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। इसकी एक प्रति ‘इन हिमाचल’ के पास उपलब्ध है।
डॉक्टर को जारी कारण बताओ नोटिस की कॉपी जिसमें पहचान छिपाने के लिए नाम हटाए गए हैं।
यानी पहले सीएमओ ऊना के स्तर पर और फिर उच्च स्तरीय जाँच, दोनों में ही डॉक्टर को ड्यूटी में कोताही करते पाया गया। डॉक्टर को 10 जून तक शो कॉज नोटिस पर जवाब देना था मगर अब यह मामला ठंडे बस्ते में पड़ता दिखाई दे रहा है। पूरे इलाक़े में चर्चा है कि उक्त डॉक्टर प्रभावशाली रानजीतिक परिवार से होने के कारण न सिर्फ़ ख़ुद को बचा रही हैं बल्कि अपने ख़िलाफ़ शिकायत करने वाले शख़्स को भी झूठे आरोप में फँसा रही हैं।
इस पूरे मामले में पुलिस पर सवाल उठने लगे हैं कि आख़िर जाँच अधिकारी अचानक क्यों बदला गया और दोनों अधिकारियों की रिपोर्टों में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ क्यों है। जब डीए (पुलिस को सलाह देने वाला सरकारी विभाग) ने सीसीटीवी फ़ुटेज देखकर आगे बढ़ने के लिए कहा गया था तो बदले हुए अधिकारी ने ऐसा किए बग़ैर क्यों शिकायतकर्ता पर ही कार्रवाई कर दी।
इस बीच आशुतोष मुख्यमंत्री से इंसाफ़ मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं । सवाल उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री और प्रदेश सरकार लगातार पड़ रहे दबाव को दरकिनार कर उस पत्रकार को इंसाफ दिला पाएँगे जिसके ऑफिस में लगातार कॉल करके उनकी नौकरी छीन ली गई? क्या उन लोगों पर कार्रवाई होगी जो इस तरह के झूठे आरोप में फंसाने के खेल में शामिल हैं?
इन हिमाचल डेस्क।। रविवार सुबह 9.16 बजे से सूर्य ग्रहण लगने वाला है। भारत में सुबह 10 के बाद ही लोग सूर्यग्रहण देख पाएँगे। उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में ये ग्रहण रत्न जड़ित अंगूठी जैसा दिखाई देगा क्योंकि सूरज को चंद्रमा 98.6% तक ढक देगा। यह साल का पहला और आखिरी सूर्य ग्रहण है। लेकिन इस नज़ारे को देखने के लिए की गई छोटी सी भी गलती आपको बहुत नुक़सान पहुँचा सकती है।
कैसे है खतरनाक आप सोचिए कि सूर्य की किरणें इतनी ताकतवर होती हैं कि हम इससे करोड़ों किलोमीटर दूर होने के बावजूद गर्माहट महसूस कर सकते हैं। इसीलिए, सूर्यग्रहण के दौरान भूलकर भी लंबे समय तक सूरज की ओर न देखें वरना आंखों को नुकसान पहुंच सकता है।
सूर्य की किरणों में मौजूद पराबैंगनी या अल्ट्रावायलेट किरणें रेटिना में पहुंचकर उन कोशिकाओं को जला सकती हैं जो रोशनी के प्रति संवेदनशील होती हैं। ध्यान दें, आंखों के रेटीना में पेन रीसेप्टर यानी दर्द को महसूस करने वाली कोशिकाएं नहीं होतीं। इसलिए आपको पता नहीं चलेगा कि कब इन्हें नुकसान पहुंच गया।
इसी कारण अगर कोई लंबे समय तय सूर्य को देखता है तो उसकी आंखें हमेशा के लिए खराब हो सकती हैं। कई बार लोग अंधे हो जाते हैं तो कुछ को धुंधला दिखाई देने लगता है।
फिर कैसे देखें नजारा
बहुत बार लोग आंखों में गहरा चश्मा लगाकर भी ग्रहण देखने की कोशिश करते हैं। ध्यान दें, बहुत बार ऐसा करने के बावजूद आंखों को नुकसान पहुंचता है। इसलिए पहले से ही स्पेशल सूर्यग्रहण के लिए मिलने वाले चश्मे खरीदकर रखने चाहिए जो सूरज की 99 प्रतिशत रोशनी रोक देते हैं और आपको सूर्यग्रहण दिखाई देता है। एक सोलर फिल्टर भी आता है जिसे आप दूरबीन आदि में लगाकर सुरक्षित ढंग से सूर्यग्रहण देख सकते हैं।
इससे भी बेहतर ये होगा कि आप अपनने कैमरा स्पार्टफोन को सूरज की ओर फ़ोकस करें। ध्यान रहे, ख़ुद सूरज की ओर न देखें। फिर स्क्रीन पर दिख रहे सूरज वाले चमकदार हिस्से पर टैप करें। इससे एक्पोज़र ऑटो फ़ोकस होगा और आप स्क्रीन पर सूरज ग्रहण देख पाएँगे। आप इसका फ़ोटो भी ले सकते हैं। बहुत बार कैमरे के लेंस पर बनने वाली फ़ोटो की रिफ्लेक्श में भी सूर्यग्रहण देखा जा सकता है। नीचे की तस्वीर देखें-
इसके अलावा, पिनहोल व्यूअर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे सूरज की रोशनी कार्डबोर्ड का एक बॉक्स बनाकर कागज पर प्रॉजेक्ट की जाती है। आप कैसे घर पर ही उपलब्ध चीज़ों से पिनहोल व्यूअर बना सकते हैं, जानने के लिए ये वीडियो देखें-
इन हिमाचल डेस्क।। पूर्वी लद्दाख में चीन के सैनिकों के साथ संघर्ष में भारत के जवानों के शहीद होने के बाद देश में चीनी सामान के विरोध में कुछ लोगों ने मुहिम छेड़ी है। इस बीच, बीसीसीआई ने कहा है कि आईपीएल के मौजूदा टाइटल स्पॉन्सर वीवो से करार खत्म करने का उसका कोई इरादा नहीं है।
भारतीय क्रिकेट बोर्ड के कोषाध्यक्ष अरुण धूमल ने कहा है कि आईपीएल में चीनी कंपनी से आ रहे पैसे से भारत को ही फायदा हो रहा है, चीन को नहीं। धूमल ने कहा कि आईपीएल जैसे भारतीय टूर्नमेंटों के चीनी कंपनियों द्वारा प्रायोजन से देश को ही फायदा हो रहा है।
पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के बेटे और केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर के छोटे भाई अरुण धूमल ने कहा, ‘जज्बाती तौर पर बात करने से तर्क पीछे रह जाता है। हमें समझना होगा कि हम चीन के हित के लिए चीनी कंपनी के सहयोग की बात कर रहे हैं या भारत के हित के लिए चीनी कंपनी से मदद ले रहे हैं।’
उन्होंने कहा, ‘जब हम भारत में चीनी कंपनियों को उनके उत्पाद बेचने की अनुमति देते हैं तो जो भी पैसा वे भारतीय उपभोक्ता से ले रहे हैं, उसमें से कुछ बीसीसीआई को ब्रैंड प्रचार के लिए दे रहे हैं और बोर्ड भारत सरकार को 42% कर चुका रहा है।’ धूमल ने कहा कि इससे भारत का फायदा हो रहा है, चीन का नहीं।
बीसीसीआई को वीवो से सालाना 440 करोड़ रुपये मिलते हैं जिसके साथ पांच साल का करार 2022 में खत्म होगा। पिछले साल सितंबर तक मोबाइल कंपनी ओप्पो भारतीय टीम की प्रायोजक थी लेकिन उसके बाद बेंगलुरु स्थित शैक्षणिक स्टार्ट अप बायजू ने चीनी कंपनी की जगह ली।
धूमल ने कहा कि वह चीनी उत्पादों पर निर्भरता कम करने के पक्ष में हैं लेकिन जब तक उन्हें भारत में व्यवसाय की अनुमति है, आईपीएल जैसे भारतीय ब्रैंड का उनके द्वारा प्रायोजन किए जाने में कोई बुराई नहीं है।
मंडी।। हिमाचल प्रदेश के जलशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने मंडी में हुई प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था कि जिस तरह 1971 की लड़ाई में उनकी 9 डोगरा रेजिमेंट युद्ध के मोर्चे में आगे रही थी, उसी तर्ज़ पर आज भी वह चीन से युद्ध की स्थिति में जंग के मोर्चे पर जाने को तैयार हैं। महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा था कि वह 1969 में सेना में भर्ती हुए थे और उन्हें गर्व है कि 71 के युद्ध में पाकिस्तान को हराया था। अब उनके इस बयान को लेकर जिला परिषद सदस्य भूपेंद्र सिंह ने निशाना साधा है।
सीपीएम नेता भूपेंद्र ने जलशक्ति मंत्री के बयान को हास्यास्पद बताते हुए कहा, “जब मंत्री साहब 1969 में 9 डोगरा रेजिमेंट में भर्ती हुए थे तो दो साल में ही सेना छोड़कर घर आ गए थे। जिस 1971 की लड़ाई की वो बात कर रहे हैं, उसमें वो शामिल नहीं हुए थे।”
भूपेंद्र ने पूछा, “मंत्री ने यह नहीं बताया है कि उस समय फ़ौज छोड़कर वो घर क्यों भाग आए। इसकी जानकारी उन्होंने अब तक सार्वजनिक नहीं की है। लेकिन अब वो जब सेना में नहीं हैं और आज से पचास साल पहले दो साल के अंदर ही सेना छोड़कर आ गए थे, तब सुर्खियों में रहने के लिए सेना में जाने की बात कर रहे हैं।”
महेंद्र सिंह ठाकुर
सीपीएम नेता ने कहा, “9 डोगरा रेजिमेंट ने बेशक 71 के युद्ध में भाग लिया था मगर महेंद्र सिंह उसमें शामिल नहीं हुए थे। मगर वह जनता के बीच बार-बार इस युद्ध में शामिल होने की बात करते हैं। ऐसा बयान देने से पहले उन्हें सेना में अपनी नौकरी की डीटेल सार्वजनिक करनी चाहिए।”
जिला परिषद सदस्य ने भूपेंद्र ने कहा कि महेंद्र सिंह ठाकुर ने ऐसा ही बयान पिछले साल पुलवामा आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान से युद्ध होने की आशंकाओं के बीच दिया था और अब चीन के साथ तनाव होने पर सिर्फ़ वाहवाही लूटने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
भूपेंद्र ने कहा कि ऐसा बयान देकर मंत्री ऐसा दर्शा रहे हैं मानो देश की सेना इतनी कमजोर है कि युद्ध होने पर उसकी ऐसी हालत हो जाएगी कि उनके भाग लेने से ही युद्ध जीता जा सकेगा। उन्होंने कहा कि देशभक्ति की भावना उमड़ना सही है मगर इस तरह के बयानों से बचा जान चाहिए।
इन हिमाचल डेस्क।। गर्मियां आते ही हिमाचल प्रदेश के बाजारों में काफल नजर आने लगते हैं। ऊंचे इलाकों में रहने वाले लोग टोकरियों वगैरह में काफल लाते हैं और उन्हें बेचते हैं। लाल रंग का यह फल (बेरी कहें तो ज्यादा ठीक होगा) देखने में ही इतना आकर्षक लगता है कि खाने को दिल मचलने लगता है। और आप खा लेंगे एक बार तो मन नहीं भरेगा खा-खाकर।
खट्टा-मीठा सा यह फल रसीला होता है और अंदर एक गुठली भी होती है। अगर आप हिमाचल प्रदेश या उत्तराखंड जाएं इस सीजन में तो कोशिश करें काफल चखने को मिल जाए। फोटो देखकर कई बार लोग इसे शहतूत समझ लेते हैं मगर यह बहुत अलग तरह फल है।
काफल या कफल का साइंटिफिक नेम Myrica esculenta है। यह छोटा पेड़ होता है जो हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और नेपाल में पाया जाता है। इसे बॉक्स मर्टल, बेबेरी भी कहा जाता है। यह नेपाल, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 3 हजार फीट से 6000 फीट ऊंचाई वाले इलाकों में ज्यादा पाया जाता है। नेपाल में तो यह 1500 मीटर ऊंचाई वाले इलाकों में भी मिलता है।
Image: @burnie.420
आयुर्वेद में इसे कई औषधीय गुण बताए गए हैं। फूलों के रंग के आधार पर इसकी दो वराइटीज़ बताई गई हैं आयुर्वेद में- सफेद और लाल। इसकी छाल को टैनिंग के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। काफल फैमिली की कई किस्में एशिया के अन्य देशों, यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में भी पाई जाती हैं। उनके पौधों की किस्म अलग होती है और फल भी थोड़े-बहुत अलग होते हैं।
लोक संस्कृतियों में काफल का बड़ा महत्व है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में कई गाने ऐसे हैं जिनमें काफल का जिक्र है। काफल को लेकर कई कहानियां भी प्रचलित हैं। इनमें से एक कहानी ऐसी है कि जिसे हिमाचल प्रदेश में बुजुर्ग लोग बच्चों यह शिक्षा देने के लिए सुनाया करते थे कि तुरंत किसी नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए और बेवजह गुस्सा नहीं करना चाहिए:
एक मां अपनी बेटी के लिए काफल लेकर आई। मां ने बेटी से कहा कि अभी मैं किसी काम से जा रही हूं, शाम को आऊंगी तो साथ खाएंगे। बेटी ने कहा ठीक है, साथ ही खाएंगे। मां काम से चली गई और बेटी खुशी-खुशी इंतजार करती रही कि कब मां आएगी और कब हम काफल खाएंगे। शाम को मां आई तो बेटी चहक उठी। मां ने कहा लाओ वो टोकरी। बेटी झट से टोकरी ले आई।
मां ने देखा कि सुबह जब वह जंगल से काफल तोड़कर लाई थी, तब तो टोकरी लबालब भरी थी। मगर अब काफल कम हो गए है। पक्का इसने मेरे पीछे खाए होंगे। मां को गुस्सा आ गया कि उसकी बेटी इतनी लालची हो गई मेरी बात ही नहीं मानी। गुस्से में मां ने बेटी को घर से निकाल दिया और कहा कि निकल जा यहां से और दोबारा अपनी शक्ल मत दिखाना। बेटी रोते हुए बोलती रही कि मां, मैंने नहीं खाए काफल। मगर मां ने एक नहीं सुनी और दरवाजा बंद कर लिया।
रात हो गई। मां ने भी काफल को हाथ नहीं लगाया। टोकरी वहीं आंगन में पड़ी हुई थी। चूंकि दिनभर के काम से थककर आई थी तो उसे नींद भी आ गई थी। सुबह अहसास हुआ कि मैंने तो बेटी को रात भर बाहर छोड़ दिया। जंगल के बीच इतने जानवर हैं… हाय, कैसी मां हूं मैं। झट से उसने दरवाजा खोला। सामने वही टोकरी पड़ी थी जिसमें काफल थे। वह टोकरी भर गई थी और काफलों से लबालब हो गई थी। मां को अहसास हुआ कि मैंने बिना वजह बेटी पर शक किया, काफल दिन में गर्मी की वजह से सिकुड़ गए थे, इसी वजह से मुझे लगा कि कम हो गए। मगर रात को शीतल और नम हवाओं से फिर अपने सामान्य आकार में आ गए और टोकरी भर गई।
मां को अहसास हुआ कि मैंने बेवजह बेटी पर शक किया। वह निकली और बेटी को ढूंढने लगी तो उसके खून के निशान मिले। शायद रात को किसी जंगली जानवर ने लड़की को शिकार बना लिया था। मां ने आत्मग्लानि में नदी के पास जाकर ऊंची ढांक से छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। कहते हैं कि आज भी वो मां-बेटी पंछियों के रूप में गर्मियों में एक पेड़ से उस पेड़ पर फुदकती हैं और अपना पक्ष रखती हैं। बेटी कहती है- काफल पके, मैं नी चखे यानी मैंने काफल नहीं चखे हैं। नीचे सुनें उस पक्षी की आवाज, जिसका जिक्र इस दंतकथा में है-
कुकु-कुकु की आवाज निकालने वाला भारतीय पक्षी- Cuculus micropterus
दूसरे पक्षी की आवाज सुनाई देती है जो काफी दर्द भरी लगती है- “पूरा है पुत्री, पूरा है। वैसे जिस पक्षी का उल्लेख किया गया है वह भारतीय रिंग नेक डव है। उस फाख्ते की आवाज तो हमें नहीं मिली मगर उसकी अन्य प्रजातियों की आवाजों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वह कैसी आवाज निकालता होगा।
दंत कथाएं हमारे पूर्वजों की कल्पनाशीलता को दिखाती है। इस कहानी से सबक यही मिलता है कि बिना वजह किसी पर शक नहीं करना चाहिए और दूसरी बात यह कि गुस्सा नहीं करना चाहिए क्योंकि उससे नुकसान भी हो सकता है।
ये जून महीना है और तीन साल पहले इसी महीने मंडी जिले के करसोग में वनरक्षक का शव पेड़ से उल्टा लटका हुआ मिला था। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहकर साहित्य और समाज से विभिन्न मुद्दों पर बेबाकी से राय रखने वाले मुक्तकण्ठ कश्यप ने 2018 में एक ‘चिट्ठी’ लिखी थी। यह चिट्ठी है वनरक्षक होशियार सिंह की थी। गरीब परिवार के उस बेटे की, जिसे आज तक इंसाफ नहीं मिल पाया है।
इसी महीने विश्व पर्यावरण दिवस भी मनाया गया। इंसान जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रहा है, उसका सीधा प्रभाव पर्यावरण पर पड़ रहा है। हमारा हिमाचल प्रदेश भी इससे अछूता नहीं है। इस खूबसूरत राज्य के जंगलों की ही बात करें तो उनके ऊपर दोहरी मार पड़ रही है- जंगल की आग और वन माफिया। ऐसे में होशियार सिंह के नाम से मुक्तकंठ कश्यप द्वारा कविता के रूप में लिखी गई इस चिट्ठी में इस विषय को भी उभारा गया है।
पढ़ें-
बड़का मुक्तकंठ जी
गले मिलना!
जानता हूँ
जहाँ आप हैं
वहां सुख हो नहीं सकता!
इधर देख रहा हूं
सूख रहा है वह देवदार
जिस पर मुझे उल्टा लटके हुए
देखा था सबने आखिरी बार।
दुनिया खुद को दिखाने के लिए
करती है तय
कि कैसे देखा जाए उसे
मैं रोज उस देवदार के पास जाता हूँ
उसे कैल का
रई का
बुरांस का
सबका वास्ता देता हूं
कहता हूं
मुआ! मत सूख!
तू जितना सूखेगा
उतने ही हरे होते जाएंगे वे लोग
जो करते हैं हरियाली का सौदा
पेड़ से उल्टा लटका मिला था होशियार सिंह का शव
रंगों को एक दूसरे के साथ खड़े होना था
एक दूसरे में घुसना नहीं था
सफेद को सफेद
हरे को हरा
काले को रहना था काला।
इसे भी कहता हूं
मत सूख
तेरी जड़ों से बंधी है ज़मीन
इसी जमीन के अंदर पानी है
जिसे पीते आये हैं लोग
मैं उलटा ज़रूर था
गिरा नहीं !
देवदार ने मुझे गिरने नहीं दिया
व्याकरण के जख्म देखो
कुछ लोगों के लिए
गिरना उठने का पर्यायवाची है।
मैं एहलमी बीट में भी घूमा
मैं तारा देवी बीट में भी घूमा
वहां जो भी कुल्हाड़ी चली
उसके हत्थे पर बड़ी मुहर थी
इसलिए उसी जादुई कुल्हाड़ी का असर है
कि कागजों में
केवल झाड़ियां कटीं
सोचता हूँ
जिनके लिए देवदार भी झाड़ियां
उनके पेड़ होते होंगे कैसे पेड़?
तारादेवी में पेड़ कटने पर तत्कालीन वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी ने कहा था- झाड़ियां कटी थीं, पेड़ नहीं। (Image: Himachal Watcher)
मुझे याद आते हैं बिश्नोई
पेड़ों के साथ चिपक गए थे!
मेरे पुरखे ही रहे होंगे
संवेदना के स्तर पर!
एक चिड़िया बोली
भाई होशियार!
एक खुशबूदार पेड़ के कटते ही
खो गए मेरे अंडे
वह चिड़िया अब गाना भूल गयी है
जिनके लिए जंगल महज झाड़ियां हैं
उन्हें चिड़िया, गौरेया, घटारी का
गाना पहले भी कहाँ सुनाई देता होगा!
ये बेशर्म
जंगल को नंगा करते हैं
मोर कहां नाचे
नाचता है फिर भी मोर
सबके सामने
यह इस मोर के पैर
विभागीय चौकसी की तरह बदसूरत हैं
इसके पंख
मंत्री रहे एक मुचले आदमी के
दांतों की तरह खाली हैं
इस मोर की आँखोँ में
मोतिया उतर आया है
निगरानी की आँखोँ के बादल जैसा!
ये मोर बदसूरत है
तब भी नाचता है
जयराम ने हेल्पलाइन शुरू की मेरे नाम पर
आभार।
मैं अपनी दादी को मिलने वाली
पेंशन में झलकता हूं
पर दादी जानती है
कैसे अब तक रोती है
घुट घुट कर।
यह मुझे उस चिड़िया ने बताया
जो रोज दादी के आंगन में
दाने चुगने जाती है
कल अचानक छत पर एक कौव्वा देख
रो पड़ी दादी!
भैया। दांत उखड़ने पर ही कितना दर्द होता है
मैं तो जिगर था दादी का
फिर भी दादी के पास जिगरा है
दादी इस बात की ज़मानत है
कि होशियार सिंह आते रहेंगे।
होशियार सिंह की दादी
ये कंजरवेटर
ये डीएफओ
ये डिप्टी रेंजर
ये गार्ड
सब खराब नहीं हैं
खराबी यह है कि
कोई ठीक
किसी खराब को खराब नहीं कहता
ज़ुबाँ छिन गई है
शब्द मोनाल हो गए हैं
साहस हो गया है जाजुराणा
खैर!
कब आओगे तुम?
आते हुए कुछ बुरांस के फूल ले आना
चटनी बनाएंगे
एक साथ खाएंगे।
तुम भी अधिक दिन न रहो वहां
खतरा है
कुछ लोगों को मर कर अधिक सुना जाता है
आओ! आओ! जल्दी आओ!
तुम्हारा अनुज
होशियार सिंह
वन रक्षक।
(लेखक मुक्तकंठ कश्यप फ़ेसबुक पर साहित्य और देश-दुनिया के विभिन्न विषयों पर बेबाकी से राय देने के लिए चर्चित हैं)
‘इन हिमाचल’ पर पहली बार इसे पाँच जून, 2018 को प्रकाशित किया गया था। अब इसे फिर से पब्लिक किया गया है।
शिमला, एमबीएम न्यूज़।। हिमाचल प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग में पीपीई किट की खरीद में संभावित गड़बड़ के मामले में चंडीगढ़ की एक कंपनी के मालिक ने शिमला की एक अदालत में दाखिल अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी वापस ले ली। उनके वकील का कहना है कि इस मामले विजिलेंस द्वारा कोई संलिप्तता न पाए जाने के कारण यह अर्ज़ी वापस ली है। यह पूरा का पूरा मामला एक ऑडियो क्लिप वायरल होने के बाद सामने आया था।
कंपनी के मालिक की ओर से 12 जून को अग्रिम जमानत के लिए अदालत में अर्जी दाखिल की थी, जिस पर आज सुनवाई होनी थी। उनके वकील की तरफ से अदालत को बताया गया कि इस पूरे मामले में न तो उनकी कोई संलिप्तता है और न ही कोई ताल्लुक है। ऐसे में जमानत के लिए दायर अर्जी वापिस ली जा रही है।
वायरल आडियो मामले में 12 जून को एजेंट पृथ्वी सिंह को अदालत ने सशर्त जमानत देते हुए रिहा किया था। उसे छह जून को गिरफतार कर विजिलेंस ने पांच दिन के रिमांड पर लिया था। रिमांड के दौरान विजिलेंस ने पाया कि उसने निलंबित स्वास्थ्य निदेशक को रिश्वत के 50 हजार रूपये पहुंचाए थे। यह मामला पीपीई किट की आपूर्ति से जुड़ा है। विजिलेंस अब यह पता लगाने में जुटी है कि 50 हजार की रिश्वत निलंबित स्वास्थ्य निदेशक तक कैसे और कहां पहुंचाई गई थी।
पूर्व स्वास्थ्य निदेशक डाॅक्टर एके गुप्ता और उनकी पत्नी ने भी गिरफतारी से बचने के लिए अग्रिम जमानत की अर्जी लगाई थी, जिसे अदालत ने खारिज कर दिया था। विजिलेंस ने गत 20 मई को 43 सेकंड के वायरल आडियो के आधार पर भ्रष्टाचार का मामला दर्ज कर डाॅक्टर गुप्ता को गिरफतार किया था। हालांकि 30 जून को अदालत ने उसे जमानत पर रिहा कर दिया था। वायरल आडियो में डाॅक्टर गुप्ता और एजेंट पृथ्वी के बीच 5 लाख रूपये के लेन-देन की बात हो रही थी। विजिलेंस का दावा है कि पीपीई किट की खरीद को लेकर दोनों में सांठगांठ हुई है।
इस पूरे मामले में उठ रहे सवालों के बीच नाहन से विधायक राजीव बिंदल ने हिमाचल प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।
मंडी।। हिमाचल प्रदेश के जलशक्ति मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा है कि चीन के साथ अगर जंग होती है तो वह इस युद्ध के मोर्चे पर जाने के लिए तैयार हैं। महेंद्र सिंह ठाकुर पूर्व सैनिक हैं।
जलशक्ति मंत्री ने मंडी में एक बैठक के बाद पत्रकारों से लद्दाख में हुए घटनाक्रम को लेकर कहा कि वह पूर्व सैनिक हैं, 1969 में सेना में भर्ती हुए थे। महेंद्र सिंह ने कहा कि जब पाकिस्तान के साथ जंग हुई थी तो उनकी 9 डोगरा कमांड युद्ध के मोर्चे पर थी और उन्हें गर्व है कि पाकिस्तान की उस युद्ध में हार हुई थी।
महेंद्र सिंह जलशक्ति और बागवानी के साथ सैनिक कल्याण मंत्रालय भी संभाल रहे हैं। उन्होंने कहा, “मैं दूसरी लड़ाई लडऩा चाहूंगा और एक पूर्व सैनिक के रूप में मोर्चे पर जाने को तैयार हूं।” इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंडी के सांसद भी मौजूद थे।
पिछले दिनों मंडी के सांसद रामस्वरूप शर्मा ने कारतूस वाली बन्दूक की सफाई करते हुए तस्वीरें शेयर की थीं। विवाद होने पर उन्होंने अजीब लॉजिक दिया था कि युद्ध की स्थिति में सेना बुलाएगी तो वो वह देश की रक्षा कर सकें, इसलिए बंदूक साफ कर रहे थे। उनका यह भी कहना था कि शास्त्रों में शस्त्र रखने वालों को ही पुरुष समझा जाता है।