HPU में पढ़ रहे अफगान विद्यार्थियों की गुहार, बढ़ाया जाए वीजा

एमबीएम न्यूज़, शिमला।। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे अफगान विद्यार्थी खौफ में हैं। भले ही यह विद्यार्थी हिमाचल प्रदेश में हो लेकिन अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर परेशान हैं। इसके साथ ही इनकी वीजा अवधि भी समाप्त हो रही है, जिसने इन्हें चिंता में डाल दिया है।

हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला में 17 अफगान विद्यार्थी उच्च शिक्षा ले रहे हैं। इनमें दो छात्राएं भी शामिल हैं। इन सभी विद्यार्थियों ने केंद्र सरकार से वीजा अवधि बढ़ाने की गुहार लगाई है। विद्यार्थियों का कहना है कि अफगानिस्तान के हालात देख सरकार उनकी वीजा लंबी अवधि के लिए बढ़ाए। इसके साथ वे अफगानिस्तान का राष्ट्र गान, झंडा व करंसी न बदलने की भी मांग कर रहे हैं।

विद्यार्थियों का कहना है कि अफगानिस्तान में चल रहे तनाव के कारण वे ठीक से पढ़ाई भी नहीं कर पा रहे हैं। उनका यह भी मानना है कि इन घटनाओं का उनके भविष्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

एचपीयू में पॉलिटिकल साइंस में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे छात्र मिस्बाहुदीन युसूफजई ने बताया कि अफगानिस्तान में हालात काफी बिगड़ गए हैं। वहाँ जिस तरह के हालात बने हैं, उन्होंने कभी सोचा नहीं था। उनके परिजन काफी परेशान हैं। कई उनके जानकार देश छोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। उनका कहना है कि हालात सामान्य होने पर ही वो अपने देश लोैटेंगे। उन्होंने सरकार मांग की है कि जब तक वहां हालात सामान्य नहीं हो जाते, तब तक भारत सरकार वीजा अवधि को अवश्य बढाए।

वहीं, एचपीयू में एमबीए की पढ़ाई कर रही अफगान छात्रा समीरा का कहना है कि वे इस तरह के हालात अपने जीवन में पहली बार देख रही हैं। उन्होंने कहा कि वह परिजनों से वीडियो काल पर रोज बात कर रही है। लेकिन परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उन्होंने भी भारत सरकार से आग्रह किया है कि जब तक हालात सामान्य नहीं हो जाते तब तक उनकी वीजा की अवधि को बढ़ाया जाए।

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बता दें कि हर साल कई अफगान विद्यार्थी हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी, शिमला में दाखिला लेते हैं। अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भी एचपीयू के छात्र रह चुके हैं। उन्होंने 1981 से 1983 तक शिमला में रहकर पॉलिटिकल साइंस में पोस्ट गग्रेजुएशन की थी।

(यह खबर एमबीएम न्यूज नेटवर्क के साथ सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

हिमाचल में जल्द हो सकती है उपचुनावों की घोषणा

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में एक लोकसभा व तीन विधानसभा सीटों में उपचुनाव प्रस्तावित हैं। कभी भी इन सीटों पर उपचुनावों की घोषणा हो सकती है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय शिमला को भारतीय निर्वाचन आयोग की ओर से ऐसे संकेत दिए गए हैं।

इसके साथ ही मुख्य चुनाव अधिकारी शिमला को इस संबंध में पहले से तैयारी करने के निर्देश मिले हैं। सभी सीटों के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनें भी पहुंच चुकी हैं। मंडी, फतेहपुर और जुब्बल-कोटखाई के लिए पहले ही ईवीएम पहुंच चुकी थी, जबकी अर्की विधानसभा सीट के लिए भी सोमवार को राजस्थान से ईवीएम पहुंच चुकी हैं। अर्की को छोड़ बाकी सभी सीटों के लिए आयोग ने ईवीएम का पहले चरण का निरीक्षण भी कर लिया है।

राज्य में मंडी लोकसभा व फतेहपुर, जुब्बल-कोटखाई और अर्की विधानसभा के उपचुनाव होने हैं। ऐसी खबरें हैं कि कोरोना के कारण उपजी परिस्थितियां सामान्य रहती है तो 20 अगस्त के बाद कभी भी उपचुनावों का एलान हो सकता है।

15 अगस्त पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की 10 मुख्य बातें

नई दिल्ली।। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 75वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से कई बातें कीं। उनके भाषण के मुख्य अंश इस तरह से हैं-

  1. देश के सभी सैनिक स्कूलों में अब लड़कियां भी दाखिला ले सकेंगी।
  2. लोग अब मातृभाषा में पढ़ाई करें और आगे बढ़ें, इस पर ज़ोर रहेगा। नई शिक्षा नीति में प्रतिभा को जगह दी गई है।
  3. नई शिक्षा नीति में पढ़ाई के साथ-साथ खेलों को अतिरिक्त की जगह मुख्यधारा की शिक्षा का हिस्सा बनाया गया है।
  4. सरकार का लक्ष्य पूर्णता की ओर बढ़ना है- शत प्रतिशत गांवों में सड़कें हों, शत प्रतिशत परिवारों के पास बैंक अकाउंट हो, शत प्रतिशत लाभार्थियों के पास आयुष्मान भारत का कार्ड हो, शत-प्रतिशत पात्र व्यक्तियों के पास उज्ज्वला योजना का गैस कनेक्शन हो।
  5. गांवों के विकास पर ध्यान देने की जरूरत है, छोटे किसानों को तवज्जो दी जाएगी, कृषि क्षेत्र में वैज्ञानिकों की सलाह ली जाएगी।
  6. नागरिकों के जीवन में सरकार का दखल कम होगा। देश नेक्स्ट जेनेरेशन सुधार लागू किए जाएंगे ताकि देश के आख़िरी कोने पर मौजूद व्यक्ति तक आसानी से सभी सरकारी सुविधाएं पहुँच सके।
  7. पूर्वोत्तर को पूरे भारत के साथ बेहतर कनेक्टिविटी के साथ जोड़ा जाएगा।
  8. जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव करवाए जाएंगे।
  9. 75 नई वंदे भारत ट्रेनें शुरू की जाएंगी।
  10. नेशनल हाइड्रोजन मिशन की घोषणा की गई, देश को ऊर्जा के मामले आत्मनिर्भर बनाने और अक्षय ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाने पर जोर।

हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी: जब अंग्रेजों को मिली पहाड़ से चुनौती

यशपाल: भगत सिंह का वो ‘हिमाचली’ साथी, जिसे हमने भुला दिया

बदलती तारीख के साथ शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जिस दिन इस महान राष्ट्र हिन्द की धरती पर किसी महान आत्मा ने जन्म न लिया हो। तीन दिसम्बर को स्वतंत्रता सेनानी एवं भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती होती है। डॉ. प्रसाद को तो बच्चा बच्चा जानता है और शायद औपचारिकता के लिए ही सही, गाहे बगाहे उन्हें याद भी किया जाता है। परन्तु उसी दिन ऐसी ही एक और महान विभूति का जन्मदिन होता है जिसे राष्ट्र ने तो भुला ही दिया, उसके प्रदेश में भी याद करना तो दूर उसके बारे में जानने वाले भी चंद ही लोग होंगे। नई पीढ़ी ने तो कमोबेश नाम भी न सुना हो शायद। भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद का हिमाचली साथी जो बम बनाने में एक्सपर्ट था।

3 दिसम्बर 1903 को तात्कालिक कांगड़ा के भूम्पल गाँव (वर्तमान हमीरपुर तहसील नादौन) में जन्मे उस क्रांतिकारी का नाम था-यशपाल। ”

वो “यशपाल” जिन्होंने भगत सिंह चन्द्रशेखर आज़ाद, राजगुरु और सुखदेव जैसे महान क्रांतिकारियों के साथ जंग-ए-आजादी में अपना योगदान दिया। भूम्पल गाँव में अत्यंत गरीब घर में पैदा हए यशपाल के सर से पिता का साया बहुत जल्दी उठ गया था। पढ़ने के लिए उनकी गरीब माँ ने उन्हें बचपन में ही आर्य समाज द्वारा मुफ्त चलाए जाने वाले गुरुकुल हरिद्वार में भेज दिया।

बचपन से ही बच्चा यशपाल सोचता था कि भारत को गुलामी की बेड़ियों से कैसे आजाद करवाया जाए। इसी बात की जब वो सहपाठियों से चर्चा करता तो उसकी गरीबी का मजाक उड़ाया जाता। आखिर यशपाल ने एक बार बुरी तरह बीमार हो जाने के बाद गुरुकुल छोड़ दिया और उनकी माँ उन्हें लेकर लाहौर चली आईं।

लाहौर शहर उस समय पंजाब की राजधानी और शिक्षा का बहुत बड़ा हब था। मिडल स्कूल की पढ़ाई लाहौर से करने के बाद यशपाल ने हाई स्कूल की पढ़ाई फिरोजपुर से की। 17 साल का किशोर यशपाल अब महात्मा गांधी का फॉलोवर बनकर स्वतन्त्र संग्राम में अपने योगदान के लिए व्याकुल हो चला था।

गांधी जी के असहयोग आंदोलन के सन्देश को गाँव गाँव में पहुँचाने का काम यशपाल ने शुरू कर दिया था। यहाँ तक की मेट्रिक फर्स्ट क्लास करने के बाद सरकार की तरफ से सरकारी कालेज में पढ़ने हेतु स्कॉलरशिप मिल सकती थी, वो भी यशपाल ने ठुकरा दी और खुद फीस देकर नेशनल कालेज लाहौर में दाखिला ले लिया। नेशनल कालेज लाहौर आर्य समाज से सबंधित था और स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने इसकी स्थापना की थी।

यह वो कालेज था जहाँ यशपाल की मुलाकात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव थापर सरीखे नौजवानों से हुई। यही कालेज पंजाब में क्रंतिकारियों का अड्डा बना। आजादी के लिए मतवाले ये नौजावन यहाँ क्रांति और क्रांतिकारियों के इतिहास से भरी किताबें पढ़ते और आपस में भारत को आजाद करवाने के एजेंडे पर चर्चा करते। यहीं भगत सिंह ने 1928 में स्थापना कर दी Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) की। यशपाल भी इसी का हिस्सा हो गए।

भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव आजाद सरीखे लोग सामने काम करते वहीँ यशपाल परदे के पीछे HSRA को सपोर्ट करते। यशपाल बम एक्सपर्ट के रूप में HSRA के बीच प्रसिद्ध हो गए। 1अप्रैल 1929 को गुप्त रूप से लाहौर में चल रही बम बनाने की फैक्ट्री पर जब ब्रिटिश पुलिस की रेड पड़ी तो यशपाल लाहौर से भूमिगत होकर हिमाचल में अपने पैतृक इलाके कांगड़ा में आ गए।

ऐसे छुपकर काम नही चलेगा, संगठन को फिर इकट्ठा करना पड़ेगा, यह सोच मन में लेकर यशपाल जून 1929 को फिर लाहौर पहुँच गए। यशपाल लाहौर तो पहुंचे पर क्रांतिकारियों का कारवाँ बिछड़ चुका था। भगत और सुखदेव अरेस्ट हो चुके थे अन्य साथियों (जो फ्री थे) के पते यशपाल के पास नहीं थे। ये पते दे सकता था जेल में बंद सुखदेव। यशपाल वकील बनकर जेल में सुखदेव से मिले और कुछ लोगों के पते मालूम किए।

परन्तु जब तक वो उन पतों से साथियों को इक्कठा कर पाते, पुलिस ने सहारनपुर में स्थित HSRA की दूसरी बम बनाने के कारखाने पर भी रेड कर दी और HSRA से जुड़े लोग पकड़े गए। उनमें से कुछ ब्रिटिश पुलिस के मुखबिर बन गए।

यशपाल ने तब अपने ही दम पर आगे बढ़ने का विचार किया। 23 दिसम्बर 1929 को लॉर्ड इरविन को ले जा रही ट्रेन में विस्फोट हुआ। यह बम धमाका यशपाल ने किया था। इस विस्फोट से नुकसान तो हुआ पर लॉर्ड इरविन की जान बच गई। इसके बाद HSRA पर ब्रिटिश पुलिस का शिकंजा कस गया, बहुत से सदस्य गिरफ्तार कर लिए गए वेकिन यशपाल और आजाद अभी भी बाहर थे। 1930 में चंद्रशेखर आजाद ने HSRA को फिर संगटित करने के बीड़ा उठाया। यशपाल को सेंट्रल कमिटी का मेंबर बनाया गया और उन्हें पंजाब का प्रभार सौंपा गया।

यह वो समय था जब यशपाल की मुलाकात 17 साल की लड़की प्रकाशवती कपूर से हुई, जो भविष्य में उनकी पत्नी भी बनीं। परन्तु प्रकाशवती से सबंधों के चलते उन्हें अपने ही साथियों की आलोचना भी सहनी पड़ी क्योंकि HSRA वैचारिक रूप से शादी ब्याह में यकीन नहीं रखती थी। ऊपर से 17 वर्ष की कपूर को संगठन उम्र के हिसाब से भी कम मान रहा था। HSRA में यहाँ तक चर्चा चलने लगी कि यशपाल कहीं रास्ता बदलकर पुलिस के मुखबिर न हो जाएं।

सितम्बर 1930 में आजाद ने फैसला किया की HSRA के सदस्यों को अब क्रान्ति मिलकर एक जगह से नहीं बल्कि अपने अपने दम पर हर कोने से शुरू कर देनी चाहिये। इस आधार पर आजाद ने बचे संगठन के सब लोगों में हथियार बाँट दिए। 23 मार्च 1931 लाहौर असेंबली में बम फेंकने और सार्जेंट की हत्या के आरोप में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गईं। HSRA के लिए यह बहुत बड़ा झटका था। इसी बीच यशपाल ने रूस जाकर क्रांति को जिन्दा रखने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हुए। चंद्रशेखर आजाद से बेशक उनके मतभेद रहे पर मनभेद कभी नहीं था। यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि आजाद की शहादत तक यशपाल उनके साथ काम करते रहे।

गिरफ्तारी
1932 वह दौर था जब न भगत सिंह थे, न चंद्रशेखर आजाद। HSRA लगभग ख़त्म हो रहा था। यशपाल ने उसे ज़िंदा करने की ठानी और सफल भी हुए जनवरी 1932 में यशपाल एक बार पुनर्जीवित HSRA में कमांडर इन चीफ चुने गए। HSRA ख़त्म नहीं हुआ है, ऐसे पर्चे छपवाकर देशभर में बांटे गए, जिनपर कमांडर इन चीफ यशपाल का नाम लिखा था। परन्तु जनवरी जाते-जाते यशपाल आखिरकार पहले बार पुलिस की पकड़ में आ गए और 22 जनवरी को गिरफ्तार कर लिए गए।

यशपाल का हर काम परदे के पीछे का रहा था और वो कभी गांधी से प्रभावित होकर सत्याग्रही भी रहे थे। इसलिए नेहरू परिवार से संबंधित श्याम कुमारी नेहरू ने उन्हे राजनीतिक कैदी बनवा दिया। उनपर कानपुर में हत्या और इलाहबाद में पुलिस वाले की हत्या के दो मुकदमे चले थे और दोनों में अलग-अलग सजा सुनाई गई।

कुलमिलाकर उन्हें 14 वर्ष की सजा हुई। बाद में यशपाल की क्रिमिनल हिस्ट्री और गिरते स्वास्थ्य के बावजूद प्रकाशवती कपूर ने उन्हीं से शादी का संकल्प लिया और पूरा भी किया। भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि 7 अगस्त 1936 को यशपाल और प्रकाशवती की शादी जेल में ही हुई। बाद में कांग्रेस और ब्रिटिश राज के बीच हुई संधि के तहत राजनीतिक कैदियों को छोड़ने का फैसला लिया गया, जिसमें 6 वर्ष जेल में बिताने के बाद यशपाल 1938 में रिहा हो गए यशपाल भी रिहा हो गए।

क्रांतकारी यशपाल के बाद लेखक यशपाल का जन्म
यशपाल जेल से रिहा तो हुए परन्तु उनपर बैन लगा दिया गया की अब वो पंजाब नहीं जा सकते। यशपाल कांगड़ा भी नहीं आ पाए क्योंकि वह उस समय पंजाब का हिस्सा था। रिहा होते ही वह पत्नी के साथ लखनऊ चले गए। खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने अब कलम के जरिये क्रांति की मशाल जलाए रखने का फैसला किया।

यशपाल मार्क्सवादी विचारों पर लिखने लगे। उन्होंने 1939 में पहली रचना लिखी “पिंजरे की उड़ान।” उसके बाद 1941 में अपनी पत्रिका “विप्लव” का प्रकाशन शुरू किया जिसे ब्रटिश राज ने अपने विरुद्ध मानते हुए 1941 में बंद करवा दिया। हालाँकि भारत के आजाद होने पर 1947 में यह मैगजीन फिर शुरू हुई।

यशपाल वो क्रांतिकारी थे जो जिन्हे आजाद भारत में भी जेल में जाना पड़ा। “विप्लव” अपने आक्रामक विचारों और कम्युनिस्ट विचारदारा से मिश्रित रचनाओं को लिखने के कारण आज़ाद भारत की उत्तर प्रदेश सरकार ने यशपाल को 1949 में जेल में डाल दिया। ऐसा कहा गया कि रेलवे की हड़ताल जो कम्युनिस्टों द्वारा प्रायोजित थी, उसे भड़काने में यशपाल की रचनाओं का योगदान है। हालांकि 6 महीने बाद यशपाल रिहा हुए मगर “विप्लव” का प्रकाशन हमेशा के लिए बंद हो गया।

यशपाल फिर भी लिखते रहे। उन्‍होंने कथा-कहानियों, उपन्‍यास, व्‍यंग्‍य, संस्‍मरण आदि के जरिए समाज की हकीकत और मानव मन की परतों को सामने लाने की भरपूर कोशिश की। इनका उपन्‍यास ‘झूठा-सच’ बेहद चर्चित रहा है, जिसमें देश के विभाजन की त्रासदी की जीवंत तस्‍वीर खींची गई है। 1970 में भारत सरकार ने यशपाल को पद्म भूषण से भी सम्मानित किया।

1976 में “मेरी तेरी उसकी बात” के लिए यशपाल को साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया। “सिंहावलोकन” नाम की कृति से यशपाल ने अपनी जीवन को अभी तीन अध्यायों में ही पिरोया था और चौथा अध्याय पूरा नहीं कर पाए थे कि उनका निधन हो गया। यशपाल के लेखन पर कहा गया है वो प्रेमचंद का रूप थे परन्तु प्रेमचंद जहाँ गाँव पर लिखते थे, वहीँ यशपाल शहरी जीवन पर कहानियां गढ़ते थे।

मरणोपरांत यशपाल 2003 में भारत सरकार द्वारा उनके नाम से जारी एक डाक टिकट पर नजर आए थे। यशपाल तो आज नहीं हैं परन्तु हिमाचल प्रदेश ने उन्हें कभी उस सत्कार से याद नहीं किया जिसके वो असल में हकदार थे। महान क्रांतिकारियों के साथी रहे यशपाल की जयंती पर क्या आज कहीं सरकारी स्तर पर आयोजन हुआ या होता है? इसकी तो मुझे ख़बर नहीं। हिमाचली उन्हें कितना जानते हैं, इसकी भी खबर नहीं। पर हां, उनके गांव के स्कूल भूम्पल में उनकी जयंती हर साल मनाई जाती है और आज भी मनाई गई।

बारूद से शुरू करके कलम की स्याही से क्रान्ति की गाथा लिखने वाले “यशपाल” को इस लेख के माध्यम से मैं नमन करता हूँ।

संकलन : आशीष नड्डा

लेखक हिमाचल प्रदेश के जिला बिलासपुर से हैं और वर्तमान में वर्ल्ड बैंक ग्रुप में कंसल्टेंट हैं। अक्सर हिमाचल से सबंधित मुद्दों पर लिखते रहते हैं।

हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी: जब अंग्रेजों को मिली पहाड़ से चुनौती

इन हिमाचल के सभी पाठकों को स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं। आज का दिन सिर्फ उन शहीदों को याद करने का नहीं है, जिनकी वजह से हमें आजादी मिली। बल्कि आज का दिन है उनके जीवन और बलिदान से प्रेरणा लेने का और यह प्रण लेने का कि इस आजादी के सही मायनों को हम समझेंगे। अगर उन लोगों ने यह सोचकर आजादी की मांग की थी कि हम खुद इस देश को अच्छे तरीके से चलाकर प्रगति की राह पर आत्मसम्मान के साथ बढ़ेंगे तो यह सोच आज भी हमारे अंदर होनी चाहिए।

अक्सर हमारी पाठ्य पुस्तकों में उन महान विभूतियों के बारे में पढ़ाया जाता है, जिन्होंने बड़े स्तर पर उठकर अंग्रेजों की नाक पर दम किया। मगर हमें किसी एक व्यक्ति या मुट्ठी भर लोगों की वजह से आजादी नहीं मिली। उस दौर में हर घर से अंग्रेजों को प्रतिरोध की आवाज सुनाई दी थी। आइए, हम जानें कि हमारे हिमाचल प्रदेश से कौन सी ऐसी विभूतियां हुईं, जिन्होंने खुद आम जन के मन में आजादी की लालसा जगाई।

सिरमौर
सिरमौर की पहाड़ी चोटी से निकले बझेतु खड्ड के दोनों ओर बसी वादी को पझौता के नाम से जाना जाता है, क्योंकि सबसे पहले इसी क्षेत्र से राजा के खिलाफ विरोध की चिंगारी उठी थी। इसलिए इसे पझौता आंदोलन का नाम दिया गया था। वैद्य सूरत सिंह पझौता आंदलन के महानायक थे। पझौता आंदोलन’ भारत छोड़ो आंदोलन का एक हिस्सा रहा था।

ब्रिटिश अफसर ने अंग्रेजी फौज को इस आंदोलन को कुचलने के लिए राजगढ़ भेजा था, जहां उन्होंने सरोट नामक स्थान पर मोर्चा बांध कर निहत्थे लोगों पर गोलियों की बरसात की थी। राजा के सैनिकों ने कलीराम शावगी और वैद्य सूरत सिंह का का तिमंजला मकान भी डाइनामइट से उड़ा दिया। सिरमौर कमनाराम शहीद हो गए व दर्जन भर स्वतंत्रता सेनानी घायल हो गए। आजादी के बाद भी वैद्य सूरत राम लगभग एक वर्ष बाद जेल से छूटे थे।

ऊना
प्रदेश के मैदानी जिले ऊना के वासी लक्ष्मण दास भगत सिंह के चाचा सरदार अजीत सिंह के संपर्क में आने के बाद लाला लाजपत राय से मिले। उनकी पत्नी दुर्गाबाई, दोनों पुत्र सत्य भूषण एवम् सत्यमित्र ने भी स्वाधीनता संग्राम में अपना योगदान दिया। महिलायों से लेकर बच्चों तक को ऊना में इन्होंने आजादी के लिए जागृत किया।

विदेशी कपड़ों की होली जलाने के दौरान बाबा लक्षमण दास को 1930 में उनके 14 वर्षीय बेटे सत्य प्रकाश के साथ अंग्रेजी हकूमत ने बेड़ियों में जकड दिया और कोठरी में बन्द करके आटे की चक्की चलाने की सजा दी। ज़िला ऊना से अन्य स्वाधीनता सेनानियों में अनंत राम (गगरेट) जगदीश सिंह (मालहत ) ठाकुर दास (धर्मपुर) धनि राम (दुलैहड़) लक्षमण दास (ओयल ) ठाकुर वरयाम सिंह ( दौलतपुर) वतन सिंह , ख़ुशी राम , गोपी राम, जमना देवी , लक्ष्मण दास आदि ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

कांगड़ा
आज की तरह वीरों की भूमि ज़िला कांगड़ा उस दौर में भी अंग्रेजों से लोहा ले रही थी। जब तक भारत को आजादी नहीं मिल जाती, काले कपड़े ही पहनने की पहनने की प्रतिज्ञा करने वाले पहाड़ी गांधी बाबा कांशी राम ने इसी धरा पर जन्म लिया था। बम बनाने में एक्सपर्ट भगत सिंह के राईट हैण्ड माने जाने वाले यशपाल तात्कालिक कांगड़ा ज़िला से ही संबंध रखते थे। तात्कालिक कांगड़ा के नादौन से इंदरपाल नूरपुर से वजीर राम सिंह पठानिया।

आजाद हिन्द फ़ौज के रणबांकुरे कैप्टेन दल बहादुर थापा , राष्ट्र गान की धुन के रचियता राम सिंह ने इस सिलसिले को आगे बढ़ाया। राम सिंह ठाकुर को सुभाष चन्द्र बोस ने वायोलिन दिया था जिसे आजीवन राम सिंह ने अपने पास रखा कदम कदम बढाए जा ख़ुशी के गीत गाये जा गाने की धुन वही रचियता थे। इसके अलावा कांगड़ा घाटी से बिशन दत्त। बलदेव सिंह बुद्धि सिंह, बरवाल सिंह , होशियार सिंह , जैसी राम सुशील रतन , युद्धवीर सिंह कटोच लाल सिंह ,कश्मीर सिंह आदि ने माँ भारती को बेड़ियों से मुक्त करने के लिए अपना योगदान दिया।

बिलासपुर
ज़िला बिलासपुर तात्कालिक कोट केहलूर रियासत से 332 मतवालों ने स्वतंत्रता संग्राम में विभिन मोर्चो पर हिस्सा लिया। आजादी की लड़ाई से हिमाचल का जब भी जिक्र आता है स्वर्गीय दौलत राम सांख्यान का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। बिलासपुर में प्रजामंडल का गठन करके उन्होंने सीढ़ी टक्कर ब्रीटानी हकूमत से ले ली थी। अंग्रेज सरकार ने उनकी संपत्ति कुर्क करके उन्हें जेल में डालने से लेकर रियासत से तड़ीपार तक किया था।

इसी जिले से स्वर्गीय नरोत्तम दत्त शास्त्री ने सुकेत सत्याग्रह एवम प्रजामंडल आन्दोलनों में बढ़ चढ़ कर भाग लिया। धर्मवीर सिंह इस रियासत से अकेले शक्श से जो आल इंडिया सतत पीपल कॉन्फ्रेंस में भाग लेने ग्वालियर गए थे। निष्कासन की गाज इनपर भी गिरी थी , इनके अलावा आजाद हिन्द फ़ौज के बहुत सिपाही बिलासपुर से थे जिन्होंने नेताजी के साथ काम किया।

सोलन
सोलन से 68 सेनानी स्वतंत्रता संग्राम में कूदे धर्मपुर से भगवान् दास अर्की से भजनु राम ने धामी गोली काण्ड में हिस्सा लिया और कारावास गए नालागढ़ के मंगल राम को सेना में चट्गवं में ब्रटिश हकूमत से विद्रोह करने के लिए कारवास की सजा दी गयी। भारत चोर्डो आंदोलन के दौरान नालागढ़ के ही मनफल दास को एक वर्ष के लिए लाहौर की जेल में बंद कर दिया गया। अर्की से किरपा राम , केशव राम , गौरीशंकर आदि कई सेनानियों ने भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया।

हमीरपुर
तात्कालिक कांगड़ा की तहसील हमीरपुर से 8 महानायकों ने जंगे आजादी में योगदान दिया किरपा राम ज़िला के लम्बलू पंचयात से सबंध रखते थे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ इन्होंने आजाद हिन्द फ़ौज में काम किया था। बाद में किरपा राम को भारतीय सेना में शामिल किया गया। हमीरपुर ज़िला से ही बृजलाल , दुनीचंद , हरिचंद लालचन्द आजाद हिन्द फ़ौज के सक्रिय सदस्य रहे थे।

मंडी
मंडी से 50 वीरों ने आजादी के दिन के लिए संघर्ष किया कृष्णनंद स्वामी , पंडित गौरी प्रसाद , पूर्णा नन्द , हिरदा राम जैसे गांधि वादियों के साथ मंडी की रानी खैरागढ़ी (उनके बेटे जोगिंदर सेन के नाम पर जोगिंदर नगर का नाम रखा गयाहै) का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। इस साहसी राजकुमारी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ बिगुल फूंका साथ ही क्रांतिकारियों को धन भी मुहैया करवाया था। तात्कालिक सुकेत वर्तमान सुंदरनगर से भी 12 सेनानी आंदोलन का हिस्सा रहे।

कुल्लू
देव भूमि कुल्लू भी इस रण से अछूती नही रही। लग घाटी से नवल ठाकुर ऐसे मतवाले हुए जो अल्प आयु में स्कूल से भागकर आन्दोलनों में हिस्सा लेने पहुँच जाते थे और गावँ गावँ में किस्से लोगों को आजादी के नायकों के सुनाते थे। संघ के आदेश पर ढालपुर मैदान में इक्कठा हुए लोगों पर ब्रटिश हकूमत ने गोलियां चलानी शुरू की जिसमे लग घाटी के 7 युवक शहीद हुए परंतु नवल ठाकुर किसी तरह अपने आप को बचाने में कामयाब रहे।

आजादी के बाद कुल्लू रियासत में तिरंगा सर्वप्रथम किशन चन्द ने फहराया। कुल्लू के रणबांकुरों का 1857 के विद्रोह में भी नाम रहा कुल्लू से क्रांति वीरप्रताप सिंह और उनके सबंधी वीर सिंह ने सेना का गठन किया और अंग्रेज हकूमत से टक्कर ली परंतु इन दोनों वीरों को अंग्रेजों ने ग्रिफ्तार कर लिया और फांसी के फहंदी पर चढ़ दिया।

शिमला
बहुत सी छोटी रियासतों में बंटा आज का शिमला आजादी की लड़ाई का गढ़ था धामी गोली काण्ड को भला कौन हैं जानता कॉमरेड अमीचंद जैसे सेनानी शिमला से ही हुए। 1937 में धामी प्रजामंडल की स्थापना, बेगार प्रथा को बंद करने और कर में कमी के लिए धामी के मैदान में लोग जुटे और वहां के राणा के समक्ष अपनी मांगे रखीं।

इन्हीं मांगों के लिए 1939 में 1500 लोगों का समूह भागमल सौठा के नेर्तित्व में राणा के महलों की तरफ जलूस की शक्ल में चल पड़ा 16 जुलाई 1939 को घनहट्टी के पास भागमल सौठा को ग्रिफ्तार कर लिया गया। जनता उग्र हो गयी और राणा की तरफ दौड़ी पुलिस लाठी चार्ज करती रही पर विद्रोही नहीं रुके। राणा ने गोली चलाने का आर्डर दे दिया और दो व्यक्ति उमा चन्द और दुर्गा दास शहीद हो गए बहुत से लोग घायल हुए। हिमाचल प्रदेश की वादियों में गोली चलाने की यह पहली घटना थी जिसकी गूंज दिल्ली तक गयी। और राजवाड़ा शाही की तरफ एक आक्रोश पुरे प्रदेश में शुरू हुआ।

ऐसा नहीं है जिन लोगों के नाम यहाँ बताये गए मात्र यही लोग प्रदेश से जंगे आजादी का हिस्सा रहे। सैंकड़ों ऐसे भी मतवाले रहे होंगे जिनके नाम बेशक सरकारी रिकॉर्ड में नहीं होंगे पर उन्होंने भी माँ भारती को गुलामी की बेड़ियों से आजाद करवाने अपना अमूल्य योगदान दिया होगा जिसकी वजह से यह देश 15 अगस्त की सुबह आजादी का सूरज देख पाया था। ऐसे असंख्य गुमनाम सेनानियों को भी हम नमन करते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के उस दौर में सार्वजनिक नैतिक और भावनात्मक रूप से दिया गया हर योगदान करोड़ों जन्मों के पुण्य प्रताप से भी बढ़कर है।

हिमाचल में रजवाड़ाशाही और अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ पहाड़ी बलिदान

राजेश वर्मा।। 15 अगस्त यानि स्वतंत्रता दिवस देश भर में मनाने का श्रेय उन वीर स्वतंत्रता सेनानियों को जाता है जिन्होंने अंग्रेज़ों के अत्याचारों से मुक्ति दिला कर देश को आजाद करवाया। इस दिन देश में हर जगह लहराता तिरंगा झंडा हमें भारत का स्वतंत्र नागरिक होने का अहसास कराता है। हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानियों का भी इस संघर्ष में अतुलनीय योगदान रहा है। यहां के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए ही आंदोलन नहीं किया बल्कि रजवाड़ाशाही व अंग्रेज़ी हुकूमत की गुलामी की जंजीरों से भी प्रदेश को मुक्त करवाना यहां के लोगों की प्राथमिकता रही। यहां के कई राजाओं ने अंग्रेजों के लिए मुखबिरी तक की, 1845 में जब सिखों ने सतलुज पार कर ब्रिटिश राज्य पर आक्रमण किया तो वहां के राजाओं ने इस अवसर को अंग्रेजों के साथ अच्छे रिश्ते बनाने के लिए अंग्रेज़ों का साथ दे दिया।

पहाड़ी लोगों ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया बल्कि सामाजिक व राजनीतिक सुधारों के लिए स्थानीय शासकों के खिलाफ भी आवाज़ बुलंद की। प्रजामंडल द्वारा ब्रिटिश शासन का विरोध भी इसी का उदाहरण था। 1914-15 के दौरान मंडी में जो षडयंत्र हुआ था वह भी गदर पार्टी के प्रभाव में हुआ। सुकेत और मंडी रियासतों में क्रांतिकारियों द्वारा छिपकर सभाएं की गई जिसमें निर्णय लिया गया की अंग्रेज अधिकारीयों के साथ-साथ राजा के वजीर व खासमखास दरबारियों की हत्या कर उनके खजाने को लूटा लिया जाए व विभिन्न पुलों को उड़ा देना भी इनकी योजनाओं में से एक था लेकिन योजनाएं सिरे चढ़ पाती उससे पहले ही अपनों की गद्दारी के चलते उन क्रान्तिकारियों को पकड़ कर जेल में डाल दिया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन से प्रभावित होकर एक आंदोलन सिरमौर रियासत में भी हुआ। जिसे पझौता आंदोलन के नाम से जाना जाता है, सिरमौर में बझेतू खड्ड के किनारों पर बसे पझौता क्षेत्र में सबसे पहले राजा के खिलाफ विरोध की चिंगारी उठी थी। इसी पझौता आंदोलन के महानायक वैद्य सूरत सिंह थे। पझौता आंदोलन भी भारत छोड़ो आंदोलन का एक हिस्सा रहा है, अंग्रेजी हुकूमत ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए अपनी फौज को राजगढ़ भेजा जहां फौज ने सरोट नामक स्थान पर निहत्थे लोगों पर गोलियों की बरसात कर दी । इस नरसंहार की दोषी अकेले अंग्रेजी हुकूमत ही नहीं थी बल्कि स्थानीय राजाओं ने भी लोगों पर अत्याचार की सीमाएं लांघ दी। राजा के सैनिकों ने कली राम शावगी और वैद्य सूरत सिंह के मकानों को भी डाइनामइट से उड़ा दिया। बहुत से स्वतंत्रता सेनानी इस दौरान शहीद हुए व काफी संख्या में घायल भी हुए। वैद्य सूरत राम तो आजादी के बाद रिहा हुए। स्वतंत्रता संग्राम के इस संघर्ष में प्रदेश के लोग एक तरफ ब्रिटिश हुकूमत से तंग थे तो वहीं उन्हें अपनी-अपनी रियासतों के शासकों के अत्याचारों से भी तंग आ चुके थे।

आजादी के इस संघर्ष में शिमला के धामी गोली काण्ड को कोई नहीं भुला पाया है। बेगार प्रथा को बंद करने तथा करों को खत्म करने के लिए 1938 में धामी प्रजामंडल की स्थापना की गई। यहां के शासक राणा के समक्ष अपनी मांगे को पूरा करवाने के लिए बहुत से लोग मैदान में एकत्रित हुए। भागमल सौठा के नेतृत्व में 1939 में डेढ़ हजार के लगभग लोगों की भीड़ ने राणा के महलों की तरफ कूच किया। घनाहट्टी के नजदीक ही 16 जुलाई 1939 को भागमल सौठा को ग्रिफ्तार कर लिया गया। इससे उग्र हुई भीड़ राणा की तरफ़ चल पड़ी पुलिस द्वारा लाठीचार्ज चलता रहा परंतु क्रांतिकारी कहां रुकने वाले थे, राणा ने गोली चलाने का आदेश दे दिया जिससे दो व्यक्तियों उमा चन्द व दुर्गा दास को शहादत देनी पड़ी, सैंकड़ों लोग घायल हो गए। पहाड़ी राज्य में इस तरह के गोलीकांड की गूंज दिल्ली तक सुनाई दी। यहीं से रजवाड़ाशाही के पतन की शुरुआत भी हो गई। अपनी बटालियन के विरोध के बावजूद व सिरमौर में नाबालिग राजा होने के चलते अन्य सहयोगी प्रशासकों ने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया। बिलासपुर सहित कुछ अन्य शासकों ने भी अंग्रेजों का ही साथ दिया।

मंडी में राजा विजय सेन के नाबालिग होने के चलते व सुकेत रियासत में गृहयुद्ध के कारण क्रांतिकारियों को वह सहयोग नहीं मिल पाया जो मिलना चाहिए था हालांकि यहां के लोगों में देशभक्ति की भावना चरम सीमा पर थी। अपनी प्रजा व सैनिकों के विरोध के बावजूद चंबा के राजा श्री सिंह अंग्रेजों से वफादारी निभाने लगे रहे। श्री सिंह ने 1857 की क्रांति के समय राज्य में सुरक्षा के बंदोबस्त चाक चौबंद कर दिए। इसी राजा ने डलहौजी व अन्य स्थानों में बसे अंग्रेज़ों को सुरक्षा मुहैया करवाई। जो स्वतंत्रता सेनानी पकड़े गए उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। यहां स्वतंत्रता के लिए यह क्रांति इस लिए भी मंद पड़ गई क्योंकि बहुत से देशी रियासत के शासकों के साथ-साथ महाराजा पटियाला ने भी अंग्रेजों का ही साथ दिया। हमारी रियासतों के राजाओं व शासकों ने क्रांतिकारियों का साथ देने की बजाए अंग्रेजों से वफ़ादारी इसलिए निभाई ताकि उनका राज पाट चलता रहे। जब इन राजाओं को प्रदेश में स्वतंत्रता संग्राम कर रहे महानायकों का साथ देना चाहिए था तो उस समय इन्होनें अंग्रेजों का साथ देकर अपने ही लोगों से धोखा किया और यह धोखा उस प्रजा से था जिसके दम पर इनका साम्राज्य टिका हुआ था।

कुछेक राजा ऐसे भी थे जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ़ स्वतंत्रता सेनानियों का न केवल जमकर साथ ही दिया बल्कि खुद भी आगे बढ़ कर कंपनी से लोहा लिया। ऐसा ही काम बुशहर के राजा शमशेर सिंह ने किया उन्होंने कंपनी को नजराने के तौर पर व अन्य तरह की दी जाने वाली सहायता को बंद कर दिया तथा क्रांतिकारियों का खुलकर सहयोग किया। सुजानपुर टीहरा के राजा प्रताप चंद ने तो क्रांति की तैयारी अपने ही किले में कर दी थी, दुर्भाग्य कहें या अपने ही लोगों द्वारा धोखा इस क्रांति की भनक जैसे ही अंग्रेजों को लगी उन्होंने राजा को इनके ही महल में ही नजरबंद कर दिया।

अंग्रेजों के खिलाफ कुल्लू के युवराज प्रताप सिंह का योगदान भी अतुलनीय रहा है, अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने खुलकर विद्रोह किया लेकिन अपने कुछ साथियों के पकड़े जाने के बाद उन्हें भी गिरफ्तार कर लिए गया और बाद में उनको अपने ही साथी बीर सिंह के साथ फांसी दे दी गई। इस घटना ने तो यहां की प्रजा में ऐसा असंतोष भरा दिया परिणामस्वरूप जगह-जगह पर विद्रोह होने लग पड़ा बहुत से लोगों को इसके लिए शहादत तक देनी पड़ी। अत्याचारों से तंग आकर आजादी को सर्वोपरि मानते हुए अन्य क्षेत्रों जिनमें जसवां, गुलेर, हरिपुर, नौदान, नूरपुर, पठानकोट सहित के लोग भी कंपनी के खिलाफ हो चुके थे। आखिर लंबे संघर्ष व बलिदान के बाद आज देश जिस स्वतंत्रता व लोकतंत्र का आनंद भोग रहा है उसके लिए हम ऋणी हैं उन क्रांतिवीरों व महानायकों के जिनकी वजह से न केवल देश आज़ाद हुआ बल्कि हिमाचल प्रदेश को भी रजवाड़ाशाही से मुक्ति मिली।

रियासत मंडी की क्रांतिकारी रानी- ललिता उर्फ खैरागढ़ी

इन हिमाचल डेस्क।। यह बात किसी से छिपी नहीं है हिमाचल के राजे-रजवाड़े भी ब्रिटिश इंडियन के तहत आने वाले तमाम राजे-रजवाड़ों की तरह अंग्रेजों के आगे नतमस्तक हो चुके थे। मगर मंडी रियासत की रानी ललिता कुमारी ने बगावत का बिगुल फूंका हुआ था। आलम यह था कि गोरों ने रानी ललिता या रानी खैरागढ़ी को रियासत से बेदख कर उनके मंडी आने पर रोक लगा दी थी।

रानी भवानी सेन की पत्नी ललिता दरअसल खैरागढ़ रियासत की राजकुमारी थीं। उन्हें रानी खैरागढ़ी भी इसीलिए कहा जाता था। साल 1912 में राजा भवानी सेन का निधन हो गया। अंग्रेजों की परंपरा रही थी कि वारिस न होने पर वे सीधे रियासतों को अपने कब्जे में ले लेते थे। राजा भवानीसेन और ललिता के कोई अपनी संतान नहीं थी मगर बालक जोगिंदर सेन को गोद लिया गया था। वही जोगिंदर सेन जिनके नाम पर सुक्राहट्टी का नाम बदलकर जोगिंदर नगर रखा गया है।

जोगिंदर सेन मंडी रियासत के वारिस तो थे मगर संरक्षक की भूमिका निभा रही उनकी मां ललिता ने पुत्रमोह के बजाय देशप्रेम को प्राथमिकता दी। रानी खैरागढ़ी ने क्रांति का रास्ता अपना लिया। उन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम करने वाले लाला लाजपतराय के संगठन के लिए काम किया। उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष करने वालों को आर्थिक योगदान तो दिया ही, खुद भी सक्रिय भूमिका निभाई।

रानी ललिता के बेटे जोगिंदर सेन बाद में रियासत के राजा बने। उन्होंने न सिर्फ कई विकास कार्य करवाए बल्कि देश के आजाद होने पर हिमाचल के गठन में भी अहम भूमिका निभाई।

बालक जोगिंदर सेन छोटा था, मगर रानी ललिता लगातार क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ी रहीं। बम बनाने का प्रशिक्षण भी उन्होंने लिया था। मंडी में गदर पार्टी के कई सदस्य सक्रिय थे और रानी खैरागढ़ी उनके संरक्षक की भूमिका में थीं। साल 1914 में योजना बनाई गई कि नागचला स्थित सरकारी खजाने को लूट लिया जाए। पंजाब से क्रांतिकारियों की तरफ से बनाए गए बम भी मंगवाए गए थे। क्रांतिकारी मंडी में अंग्रेज सुपरिटेंडेंट, वजीर और अन्य अंग्रेज अफसरों को उड़ाना चाहते थे। नागचला में खजाने को तो लूट लिया गया, मगर दलीप सिंह और पंजाब के क्रांतिकारी निधान सिंह पकड़े गए। पुलिस ने इन्हें भयंकर यातनाएं दीं और उन्होंने सभी सदस्यों के बारे में जानकारी दे दी।

बद्रीनाथ, शारदा राम, ज्वाला सिंह, मियां जवाहर सिंह और लौंगू नाम के क्रांतिकारियों को पुलिस ने पकड़कर जेल में डाल दिया। बात रानी खैरागढ़ी की आई तो उन्हें रियासत से निकाल दिया गया। कोई और होता तो हार मान लेता या झुक जाता, मगर रानी ललिता ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने लखनऊ में प्रवास के दौरान कांग्रेस में सक्रियता से हिस्सा लेना शुरू किया। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भी हिस्सा लिया और महिला कांग्रेस की अध्यक्ष भी चुनी गईं।

मां तो मां होती है। साल 1938 में मंडी रियासत का सिल्वर जुबली समारोह था। बेटे जोगिंद्रसेन, जो मंडी के राजा थे, ने मां को लखनऊ से मंडी बुलाया। मां चल दी, लेकिन मन में एक ही आग थी कि अंग्रेज दफा होने चाहिए इस देश से। आज के जोगिंद्रनगर (सुक्राहट्टी) में हराबाग नाम की जगह है, जहां पर क्रांतिकारियों के साथ वह बैठक कर रही थीं। गांववालों ने क्रांतिकारियों के लिए खाना भेजा मगर वह शायद खराब था। रानी को हैजा हो गया और उनका निधन हो गया। अफसोस कि देश को आजाद देखे बिना ही वह इस दुनिया से चली गई।

पता नहीं कितने लोग उनकी कहानी को जानते होंगे, मगर अगर आज आपने सुनी तो इसे आगे और लोगों को बताना न भूलें। ऐसी रानी जो न सिर्फ देशप्रेमी थी, बल्कि सही मायनों में मजबूत और सशक्त महिला थी। वह न सिर्फ महिलाओं के लिए बल्कि हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

हाल ही में मंडी में उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया है-

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पढ़ें: मंडी में ऐसे मनाया गया था आजादी का जश्न

स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले मिले पाकिस्तानी गुब्बारे

मंडी।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला में कल राज्य स्तरीय स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाया जा रहा है। लेकिन स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले जिले के सुंदरनगर उपमंडल की ग्राम पंचायत चुरड के भंगलेड़ा गांव में पाकिस्तान के झंडों वाले गुब्बारों का गुच्छा मिला है। यहाँ एक ग्रामीण के घर के आंगन में यह गुब्बारे मिले हैं।

जिसके घर में गुब्बारे मिले, उस शख्स का कहना है कि शनिवार सुबह आंगन में हरे व सफेद रंग के गुब्बारों के गुच्छे पड़े थे। गुबारों में पाकिस्तानी झंडा प्रिंट था। यह देख ग्रामीणों ने इसकी सूचना पंचायत प्रधान को दी। प्रधान शक्ति धीमान ने गुबारे मिलने की सूचना पुलिस चौकी डैहर को दी।

सूचना मिलते ही डीएसपी दिनेश कुमार और थाना प्रभारी कमलकांत मौके पर पहुंचे और छानबीन करते हुए गुब्बारों को कब्जे में ले लिया है। जानकारी देते हुए डीएसपी दिनेश कुमार ने बताया कि चुरड पंचायत के भंगलेड़ा गांव में पाकिस्तान जिंदाबाद, आई लव पाकिस्तान और पाकिस्तान झंडे प्रिंटिड गुब्बारों का गुच्छा मिला है। मौका करते हुए गुब्बारों को कब्जे में लेकर जांच आरम्भ कर दी है।

हालांकि, पाकिस्तान वाले ये इस तरह के गुब्बारे पहले भी हिमाचल प्रदेश, पंजाब और राजस्थान, गुजरात, जम्मू-कश्मीर समेत कई राज्यों के इलाक़ों में मिल चुके हैं। अक्सर यह देखा गया है कि पाकिस्तान में किसी समारोह के दौरान सीमा के पास वाले इलाके से लोग इस तरह के गुब्बारे छोड़ते हैं जो कई बार हवा के प्रवाह के कारण भारत की ओर चले आते हैं। माना जा रहा है कि पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस (14 अगस्त) की पूर्व संध्या पर छोड़े ऐसे ही गुब्बारे हवा से उड़कर मंडी पहुंच गए।

क्या हिमाचल से हुई है कोरोना की तीसरी लहर की शुरुआत

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में कोरोना के मामलों में भारी वृद्धि हो रही है। उत्तर भारत में सबसे अधिक केस हिमाचल प्रदेश में ही आ रहे हैं। शुक्रवार को जहाँ उत्तर प्रदेश में 15, मध्य प्रदेश में 8, गुजरात में 17, दिल्ली में 49, हरियाणा में 16 और पंजाब में 80 केस आएं हैं, वहीं अकेले हिमाचल प्रदेश में 333 केस आए हैं।

प्रदेश में तेजी से बढ़ते कोरोना के मामले चिंता का विषय है। कोरोना के बढ़ते मामलों को कोरोना की तीसरी लहर के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि हिमाचल प्रदेश में कोरोना की तीसरी लहर की शुरुआत हो चुकी है। उत्तर भारत में तीसरी लहर की शुरुआत हिमाचल प्रदेश से हुई है।

शुक्रवार को प्रदेश में कोरोना के 333 नए मामले सामने आए, जबकि दो कोरोना पॉजिटिव मरीजों की मौत हो गई। चंबा में 70 वर्षीय महिला और मंडी में 80 वर्षीय बुजुर्ग संक्रमित पुरुष ने दम तोड़ दिया। इसके अलावा प्रदेश में 244 लोग स्वस्थ हुए। कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए राज्य सरकार प्रतिबंध लगाने पर भी विचार कर रही है। हालांकि, प्रदेश में अब एँट्री के लिए वैक्सीन सर्टिफिकेट और कोविड टेस्ट रिपोर्ट अनिवार्य की गई है।

शिमला नगर निगम के पार्षद 41वें नंबर के शहर से सीखेंगे स्मार्ट सिटी का हुनर

शिमला।। नगर निगम शिमला के पार्षद स्मार्ट सिटी का हुनर सीखने सिक्किम के गंगटोक गए हैं। इस पर सवाल उठ रहे हैं कि जो शिमला लिविंग इंडेक्स में टॉप पर रहा है। जिसकी खूबसूरती और लाइफस्टाइल को पूरे देश में सराहा जाता है। वहाँ के पार्षद 41वें नम्बर पर रहे शहर से क्या सीखेंगे। अगर स्मार्ट सिटी का हुनर सीखना है तो किसी अच्छे रेटिंग वाले शहर से सीखना चाहिए।

अभी पार्षदाें का टुअर शुरू ही हुआ है, लेकिन सैर सपाटे की फाेटाे साेशल मीडिया पर वायरल हाेने लगी है। निगम के पार्षद जिस काम के लिए गए हैं उस काम के फोटो शेयर नहीं कर रहे। एयरपोर्ट, फ्लाइट के फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं। लोगों ने इसपर पहले ही सवाल उठाए थे। ऐसे में अब पार्षदाें के ऑफिशियल टुअर काे लेकर फिर से लाेगाें में राेष पैदा हाे गया है। दिल्ली एयरपाेर्ट पर पार्षद बिना मास्क लगाए तस्वीरें पाेस्ट कर रहे हैं।

बता दें टुअर पर शिमला नगर निगम के डिप्टी मेयर समेत कुल 21 पार्षद गए हैं, बाकी 19 पार्षदाें ने इस दौरे से निजी कारणों से जाने से इनकार कर दिया। नगर निगम में कुल 34 पार्षद हैं। पार्षदों के साथ दो अधिकारी भी इस टुअर में गए हैं। विचाराें के मतभेद के बावजूद भी भाजपा-कांग्रेस पार्षद इस टुअर पर जाने के लिए एकजुट हैं। बीते वीरवार काे पार्षद अपने छह दिवसीय दौरे पर सिक्किम टुअर पर निकल गए हैं। शहरी विकास मंत्री ने भी इस टुअर हरी झंडी दी है।

पार्षद वीरवार को शिमला से कालका के लिए ट्रैवलर के माध्यम से निकले। उसके बाद शताब्दी एक्सप्रेस में कालका से दिल्ली के लिए रवाना हुए। शुक्रवार को हवाई मार्ग से सीधे गंगटोक के लिए उड़ान भरी। पार्षद गंगटोक में थ्री स्टार होटल में ठहरेंगे। वे यहां छह दिनाें तक रहेंगे। यहां पर वे सफाई व्यवस्था से लेकर पानी और नगर निगम गंगटोक के स्मार्ट सिटी के कार्यों की जानकारी लेंगे।

नगर निगम शिमला के पार्षदों का यह दौरा कोरोनाकाल से पहले ही तय हो चुका था। लेकिन कोरोना वायरस के चलते यह दौरा करीब दाे साल तक टाला गया। यह दौरा जेएनएनयूआरएम फंड के तहत है, जो एक साल पहले समाप्त हो चुका है।

इस टुअर में डिप्टी मेयर शेलेंद्र चाैहान, पार्षद आरती चाैहान, कुसुम सदरेट, सुनील धर, संजीव ठाकुर, जसविंद्र सिंह, राजेंद्र चाैहान, अर्चना धवन, रचना भारद्वाज, किमी सूद, पूरन मल, राकेश चाैहान, कमलेश मेहता, रेणु चाैहान, तनुजा चाैधरी, शारदा चाैहान, दिवाकर देव शर्मा, राकेश शर्मा, आशा शर्मा, सुषमा कुठियाला, बिट्टू कुमार पाना, जगजीत सिंह बग्गा गए हुए हैं।