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| साभार; CNN |
किसी के साथ जबरदस्ती होली खेलना आपको जेल पहुंचा सकता है
कार्यकरणी गठन से नाखुश वरिष्ठ भाजपा कार्यकर्ता ने अमित शाह को लिखा पत्र
इन हिमाचल डेस्क
” आदरणीय
श्री अमित भाई शाह जी
राष्ट्रीय अद्यक्ष भारतीय जनता पार्टी

आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक से फलों की बागवानी करने लगे है अब लाहौल-स्पीति के किसान

यह क्रिकेट का राजनीतिकरण नहीं, राजनीति का क्रिकेटीकरण है
- सर्वेश वर्मा
हिमाचल प्रदेश पिछले दिनों से चर्चा में है। चर्चा ही वजह है धर्मशाला में मैच को लेकर हुआ बवाल। मेरा मानना है कि यह मैच होना चाहिए था और इसके विरोध की कोई वजह नहीं थी। जिन लोगों ने भी इसका विरोध किया, वे ठोक वजह नहीं बता सके। नेताओं से पूछा गया कि आप क्यों विरोध कर रहे हैं, तो उनका कहना था कि शहीदों के परिवार विरोध कर रहे हैं, इसलिए उनकी भावनाओं का सम्मान होना चाहिए। शहीदों के परिजनों के मन में गुस्सा क्यों था, यह बात समझ आती है। उन लोगों की भावनाओं पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, क्योंकि उन्होंने अपना खोया है। पूर्व सैनिक होने के नाते मैं इस बात को समझ सकता हूं।
मैच रद्द होने के बाद एक अलग ही हाल सोशल मीडिया पर देखने को मिल रहा है। बीजेपी और कांग्रेस के दो खेमे आपस में पहले बहस किया करते थे, अब मैच समर्थनक और मैच विरोधी खेमे हो गए हैं। क्रिकेट ने राजनीति की दूरियों को पाट दिया है। अब मैच एक बड़ा मु्द्दा हो गया है। प्रदेश के नेताओं पर छींटाकशी हो रही है, अभद्र भाषा इस्तेमाल हो रही है। गिरने के चरम स्तर तक गिरकर आरोप लगाए जा रहे हैं। छुटभैय्ये नेता तो छोड़िए, बड़े नेताओं के परिजन तक इस कीचड़ में कूद चुके हैं।
आज मैंने हिमाचल के पूर्व मुख्यमंंत्री प्रेम कुमार धूमल के छोटे बेटे और BCCI सचिव अनुराग ठाकुर के छोटे भाई अरुण की फेसबुक पोस्ट देखी तो विचलित हो गया। मैच रद्द होने से मैं भी आहत हुआ हूं, मगर जिस तरह की भाषा अरुण ने इस्तेमाल की है, वह चौंकाने वाली है। राजनीति में आने के लिए डेस्परेट दिखने वाले अरुण कई बार पहले भी वीरभद्र सिंह के प्रति असंयमित होकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर चुके हैं। मगर इस बार उन्होंने अपनी ही पार्टी के सीनियर नेता पर निशाना साधा है।
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| अरुण ठाकुर (फेसबुक टाइलाइन से साभार) |
अरुण ठाकुर के पिता प्रेम कुमार धूमल जिस नेता की उंगली पकड़कर राजनीति में आए थे, आज अरुण उसी पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं। वह लिखते हैं-
ऊपर जो शब्द मैंने बोल्ड किए हैं, वे पालमपुर में शांता कुमार द्वारा चलाए जा रहे ट्रस्ट के नाम की तरफ इशारा करते हैं। गौरतलब है कि शांता कुमार ने इस मैच का विरोध किया था। जिस तरह से मैच के समर्थन या विरोध को लेकर हम सभी की अपनी राय हो सकती है, उसी तरह से शांता कुमार की राय भी हो सकती है। मगर जब आर राजनीति में एक पार्टी का सहारा लेकर आने की इच्छा रखते हैं, उसी पार्टी के पितामहों पर निशाना साधना आपको शोभा नहीं देता।
जिन लोगों के विक्रम कुछ नहीं कर पाए उनके गठबंधन ने एक फ़्रॉड विनय को गोद लेके इस प्रदेश के साथ इतना बड़ा धोखा कर दिया । …
Posted by Thakur Arun Singh on Wednesday, March 9, 2016
ऐसी ही एक पोस्ट नीरज भारती की देखी। उस पोस्ट में नीरज भारती ने अनुराग ठाकुर को छक्का कहा है। आपत्ति इस बात से नहीं है कि अनुराग ठाकुर को छक्का कहा गया। छक्का कहना दिखाता है कि नीरज भारती की समझ का स्तर कितना है। छक्का शब्द हिंदुस्तान औऱ पाकिस्तान में उस तबके के लिए अपमानजनक रूप से कहा जाता है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने तृतीय लिंग या थर्ड जेंडर की पहचान दी है। वे हमारी और आपकी ही तरह इंसान हैं। अब तक वे उपेक्षित होते रहे, उस बात के लिए, जिसमें उनकी कोई गलती नहीं। उन्हें छक्का कहना और उनका उपहास उड़ाना सभ्य समाज को शोभा नहीं देता। इसी तरह से किसी और इसी तरह के शब्द संबोधित करना मानसिक दिवालियेपन की ही निशानी है। वैसे भी नीरज भारती के बारे में कुछ कहना भी बेकार लगता है। मुख्मंत्री ने उन्हें हिमाचल कांग्रेस का ब्रैंड ऐंबैसडर बना रखा है।
कुछ भारतीय जनता पार्टी के अंधभक्त भौंकु इस छक्के को HPCA का शेर कह रहे हैं बिल्कुल ठीक कह रहे हो अंधभक्त भौंकुऔं ये सिर…
Posted by Neeraj Bharti on Tuesday, March 8, 2016
मैं कभी राजनीति में नहीं पड़ा, न ही मेरी रुचि रही कभी। मगर मैंने सजग नागरिक होने के नाते प्रदेश की राजनीति पर नजर रखी है। वीरभद्र और शांता कुमार में लाख बुराइयां सही। इन बुुजुर्ग नेताओं ने हिमाचल के मौजूदा स्वरूप को आकार देने में महत्वूर्ण भूमिका निभाई है। शांता कुमार ने जो नीतियां बनाईं, उनमें से बहुतायत आज भी प्रदेश में फॉलो की जा रही हैं। वीरभद्र ने भी उन नीतियों को सराहा है और उन्हें जारी रखा है। इन नेताओं को पसंद करना या न करना आपके वश में है। उनकी आलोचना भी होनी चाहिए, मगर तथ्यों एवं तर्कों के आधार पर। व्यक्तिगत लांछन लगाकर नहीं।
यह अफसोस की बात है कि प्रदेश में लाँछन लगाने की राजनीति चरम पर है। अरुण ठाकुर की ही बात की जाए तो वह बीजेपी के मंच से कभी कुछ नहीं बोलते। कभी नीतियों पर चर्चा नहीं, फैसलों पर राय नहीं। मगर जब उनके पिता या भाई को लेकर कोई सवाल उठे, तो हिमाचल भाजपा उन्हें आगे कर देती है और पार्टी के मंच से वह वीरभद्र पर निशाना साधते हैं। फिर दोबारा गायब हो जाते हैं। अब एक कदम बढ़कर उन्होंने उस शख्त पर हमला कर दिया, जिसने प्रदेश में पार्टी को स्थापित किया है।
मैच तो एक बहाना है। प्रदेश में क्रिकेट के नाम पर जिस तरह से राजनीति हो रही है, वह अफसोसनाक है। असल मुद्दे गायब हैं। बजट पर कोई चर्चा नहीं, लोगों की समस्याओं का कोई जिक्र नहीं, बस मैच की चिंता है। अफसोस, उम्मीद थी कि राजनीति बदलेगी। मगर यह नहीं पता था कि राजनीति का क्रिकेटीकरण हो जाएगा।
(लेखक पूर्व सैनिक हैं और इन दिनों एक निजी यूनिवर्सिटी में अध्यापन कार्य कर रहे हैं।)
मैच कैंसल होने से धर्मशाला में सुधीर शर्मा के प्रति रोष
कागड़ा।।
भारत और पाकिस्तान के बीच टी-20 वर्ल्ड कप मुकाबले को धर्मशाला से कोलकाता शिफ्ट होने को लेकर कांगड़ा जिले में बहुत से लोगों, खासकर युवाओं में नाराजगी देखी जा रही है। धर्मशाला में व्यापारी वर्ग में खासा रोष देखने को मिल रहा है। लोग न सिर्फ कांग्रेस सरकार और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को कोस रहे हैं, बल्कि स्थानीय विधायक और शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा को भी बराबर जिम्मेदार बता रहे हैं।
धर्मशाला में एक वर्ग का मानना है कि मुख्यमत्री वीरभद्र सिंह द्वारा खुलकर धर्मशाला मैच का विरोध करने के पीछे दरअसल सुधीर शर्मा का ही हाथ है। कहा जा रहा है कि सुधीर नहीं चाहते थे कि धर्मशाला में मैच हो और अनुराग ठाकुर के प्रति समर्थन जुटे। इसीलिए उन्होंने मुख्यमंत्री के करीबी होने का फायदा उठाते हुए उन्हें इस मुद्दे पर गुमराह किया और मैच का विरोध करवाया। चर्चा है कि इसी वजह से मैच को लेकर सुधीर निजी राय व्यक्त करते रहे और खुलकर मैच का समर्थन नहीं किया।

व्यापारी वर्ग में इस बात को लेकर गुस्सा है कि खुद को मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का करीबी बताने वाले सुधीर शर्मा ने इस मैच को लेकर खुलकर कोई स्टैंड क्यों नहीं लिया। लोगों का मानना है कि सुधीर चाहते तो वह मुख्यमंत्री को मना सकते थे और समझा सकते थे कि यह मैच धर्मशाला के लिए कितना महत्वपूर्ण है। यही नहीं, उन्हें शहीदों के परिजनों से भी बात करनी चाहिए थी और समझाने की कोशिश करनी चाहिए थी। लोगों का कहना है कि सुधीर को अभी भी बताना चाहिए कि वह मैच के समर्थन में थे या पक्ष में।
गौरतलब है कि सुधीर शर्मा ने कहा था कि यह उनकी निजी राय है कि मैच होना चाहिए। मगर इसके अलावा वह सक्रिय रूप से कुछ भी कहते या करते नजर नहीं आए थे। धर्मशाला के लोगों में इस बात को लेकर भी गुस्सा है कि कांग्रेस ने इस मामले में राजनीतिक रंजिश के लिए शहीदों के परिवारों को ढाल बनाया। वहीं एक बड़ा तबका यह भी मानता है कि पाकिस्तान के साथ मैच नहीं होना चाहिए था और अच्छा हुआ कि यह कोलकाता शिफ्ट हो गया।
बाहर दवाई के तौर पर उगाई जाती है द्रागल या गाजल बेल
ये है द्रागल बेले या गाजल बेल. एक ऐसा पौधा जिसका फल भयंकर खुजली पैदा करता है. इसका वैज्ञानिक नाम है- Mucuna pruriens. इसे velvet bean या cowitch समेत कई सारे नामों से जाना जाता है. ये अफ्रीका, कैरेबियाई द्वीपों और भारत में पाई जाती है.

हमारे हिमाचल में तो ये झाड़ियों और जंगलों में ही उगती है लेकिन बाहर इसकी खेती की जाती है. एक तो इसलिए क्योंकि ये नाइट्रोजन फिक्सेशन करके जमीन को उपजाऊ बनाती है. इसे Green manure यानी कि Cover crop के तौर पर उगाया जाता है. साथ ही इसकी बिक्री भी की जाती है क्योंकि इसे आयुर्वेदिक दवा के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है. अफ्रीका में इसे सांप के काटने पर इलाज के लिए इस्तेमाल करते हैं.
इससे भयंकर खुजली होती है क्योंकि पकी हुई बीन्स के बाहर महीन बाल की तरह कांटे होते हैं जो त्वचा से चिपककर खुजली पैदा करते हैं. खुजली को कम करने के लिए या तो गोबर मला जाता है या फिर तंबाकू के पौधे की पत्तियां रगड़ी जाती हैं. साथ ही इनकी गुठली को बच्चे घिसकर गर्म करते हैं और शरारत के तौर पर दूसरे बच्चों से छुआते हैं. कई बार लोग दुर्भावना या शरारत के तौर पर इसका इस्तेमाल लोगों को परेशान करने के लिए करते हैं.
क्रिकेट की रार के बीच शिमला में अनुराग -वीरभद्र की मीटिंग !
- इन हिमाचल डेस्क
वहीँ इस मामले में वीरभद्र सिंह ने मीटिंग के बाद कहा है की अच्छा होता अनुराग ठाकुर पहले आते जो पहल अब की है उसे पहले करने की है जरूरत
वहीं परिवहन मंत्री ने जीएस बाली अनुराग ठाकुर से अपील की है की भूतपूर्व सैनिकों की भावनाओं का ख्याल रखते हुए मैच स्थानांतरित करें
शिमला धर्मशाला में भारत-पाक मैच का मामला शहरी विकास मंत्री सुधीर शर्मा ने कहा मैच भूतपूर्व सैनिकों की भावनाओं के खिलाफ
सोचा नहीं था कि कोई नेता ऐसे मां-बहन की गाली देगा और मुख्यमंत्री चुप बैठेंगे
कभी नहीं सोचा था कि एक विधायक पहले तो अभद्र भाषा इस्तेमाल करेगा और फिर उसे टोका जाएगा तो वह हमारी मां **** की बातें करेगा। (पूरी बात पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)। इसकी भी कल्पना नहीं की थी कि यह सब खुलेआम होगा और कोई मंत्री, मुख्यमंत्री या नेता कुछ नहीं करेगा।
यही नहीं, वह खुलेआम कहता है कि यह मेरी ही आईडी है। मीडिया में भी कह चुका है कि मैं लोगों को उनकी भाषा में ही जवाब देता हूं। फिर भी कार्रवाई नहीं हो रही।

मुख्यमंत्री से शिकायत की जाती है तो वह कहते हैं कि पहले बीजेपी वाले अपने को सुधारें। हम तो बीजेपी वाले हैं, न कांग्रेस वाले। हम हिमाचल के नागरिक हैं। हमारे लिए हिमाचल सत्ता का जरिया नहीं, हमारी जान और मान है। हमारे यहां का नेता अगर हमारी मां और बहन **** की बातें करेगा तो यह हमसे बर्दाश्त नही ंहोगा।
पिछली बार नीरज भारती नाम के इस शख्स ने पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को B…..C और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर M…. C को लिखा था। तब विवाद हुआ था, मगर बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से नहीं उठाया। सब जानते हैं कि इसका अर्थ क्या होता है। ऊपर से जनाब ने सफाई दी थी कि BC मतलब Before Christ और MC मतलब Mahan Chanakya. ये शब्द वाक्य में कैसे फिट बैठते हैं, इसे समझाने में वह नाकाम रहे थे। (पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
ये राजनेता खामोश रहते हों तो रहें, हम आम लोग खामोश नहीं बैठेगें। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को जवाब देना होगा कि उन्होंने क्यों ऐसे घटिया इंसान को CPS एजुकेशन बनाया है। क्या उन्हें इनकी भाषा में कुछ गलत नजर नहीं आता। और कहां गए मुख्यमंत्री के आईटी सलाहकार, जो आए क्रांतिकारी बातें करते हैं। क्या वे बता सकते हैं कि आईटी की कौन सी धारा के तहत यह अपराध हो रहा है? क्या वे बता सकते हैं कि उनकी पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे इस शख्स के खिलाफ कार्रवाई की मांग क्यों नहीं करते वह?
(लेखक इन हिमाचल के नियमित स्तंभकार हैं, इन दिनों आयरलैंड में हैं।)
नीरज भारती ने पार कीं बदतमीजी की हदें, शर्मसार हुआ हिमाचल
बदतमीजी के लिए पहचाने जाने वाले कांगड़ा के ज्वाली से कांग्रेस विधायक और शिक्षा विभाग के मुख्य संसदीय सचिव नीरज भारती ने सोशल मीडिया पर सारी हदें पार कर दी हैं। देश की कई दिग्गज हस्तियों के प्रति अपशब्द इस्तेमाल कर चुके और महिलाओं के प्रति अभद्र भाषा इस्तेमाल कर चुके नीरज भारती ने अब जिस तरह की भाषा इस्तेमाल की है, उससे पूरे हिमाचल सा सिर शर्म से झुक जाता है।
पढ़ें: क्या हिमाचल के लोग नेता से मां-बहन की गालियां बर्दाश्त करेंगे?
नीरज भारती ने न सिर्फ अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर मां-बहन की गालियां निकाली हैं, बल्कि खुलेआम चुनौती दी है कि यह मेरी ही आईडी है, मैं ही इसे ऑपरेट करता हूं और जो उखाड़ना है, उखाड़ लो। क्या कॉमेंट नीरज भारती ने किए हैं, हम उस भाषा को दोहराना पसंद नहीं करते। मगर स्क्रीनशॉट हम नीचे दे रहे हैं, ताकि आप खुद पढ़ लें। सत्ता के नशे में चूर नीरज भारती लगातार ऐसी भाषा इस्तेमाल कर रहे हैं और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा रही। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह उनका बचाव करते नजर आते हैं। बुद्धिजीवी कांग्रेस कार्यकर्ता आंखें मूंद लेते हैं और विपक्षी बीजेपी नेता इसपर सतही धमकियां देने के अलावा कुछ नहीं करते।
मगर यह सिर्फ राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश की प्रतिष्ठा से जुड़ा विषय है। हिमाचल प्रदेश में शिक्षा जैसा अहम विभाग संभाल रहा शख्स इस तरह की भाषा इस्तेमाल करे तो यह शर्म की बात है। छक्का शब्द इस्तेमाल करने का विरोध करने पर आरटीआई ऐक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य के खिलाफ अपमानजनक भाषा इस्तेमाल की गई। गौरतलब है कि देवाशीष ने ही शिमला में प्रियंका वाड्रा द्वारा किए जा रहे भवन निर्माण को लेकर आरटीआई से जानकारी मांगी थी। इसससे बौखलाए नीरज भारती ने क्या कहा, नीचे देखिए…
कब तक लाहौल-स्पीति की अनदेखी करती रहेंगी हमारी सरकारें?
लाहौल स्पीति के मडग्राम में होने वाला योर मेला 28 फरवरी से शुरू होने जा रहा है। लाहौल-स्पीति से जुड़े मुद्दे उठाने वाले पेज Lahaul Spiti ने अपनी पोस्ट में बताया है कि जनजातीय विकास विभाग और डिस्ट्रिक्ट ऐडमिनिस्ट्रेशन लाहौल की लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। आलम यह है कि लोगों में प्रसिद्ध इस मेले पर सरकार पैसा नहीं खर्च करती है। स्थानीय लोग ही अपने दम पर कई सालों से इस मेले का आयोजन कर रहे हैं।
फेसबुक पेज ने जो पोस्ट शेयर की है, उसका टेक्स्ट हम नीचे यथावत दे रहे हैं:
‘लाहौल स्पीति के अंचल-अंचल में लोक संस्कृति, लोक नृत्य, लोक गीत और लोक साहित्य अनन्य आयामों में बिखरा पड़ा है। शायद इसी परिप्रेक्ष्य में कहा भी गया है, ‘चार कोस पे पानी बदले, आठ कोस पे वाणी।’ यही बदलती हुई वाणियां, मसलन वे बहु बोलियां हैं, जो सांस्कृतिक विविधता के विविध लोकरूपों में आयाम रचती हैं।
मगर जनजातीय विकास विभाग और जिला प्रशासन लाहौल के लोक संस्कृति और लोक नृत्य के संरक्षण के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं। मङ्ग्राम योर में सरकार ने एक रुपया भी आजतक नहीं खर्च किया मगर गाँव के लोग अपने दम से इतने सालों से योर मेला आयोजित कर रहे हैं।

हमें अपनी ज्ञान परंपरा और इतिहास बोध भी इसी लोक संस्कृति से होता है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनेताओं और नौकरशाहों की सांस्कृतिक चेतना विलुप्त हो रही है। इन दोनों ने लाहौल में जो सांस्कृतिक बहुलता है, उसे सर्वथा नजरअंदाज कर सांस्कृतिक सरोकारों का मुंबइया फिल्मीकरण कर दिया। वैचारिक विपन्नता का यह चरम, इसलिए और भी ज्यादा हास्यास्पद व लज्जाजनक है, क्योंकि जिलें में ज्यादातर जनजातीय अधिकारी हैं, जो जनजातीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ध्वजा फहराने का दंभ भरती हैं।
हमारी लोक संस्कृतियां ही हैं, जो अवाम को संस्कृति के प्राचीनतम रूपों और यथार्थ से परिचित कराती हैं। हजारों साल से अर्जित जो ज्ञान परंपरा हमारे लोक में वाचिक परंपरा के अद्वितीय संग्रह के नाना रूपों में सुरक्षित है, उसे उधार की छद्म संस्कृति द्वारा विलोपित हो जाने के संकट में डाला जा रहा है। इस संकट को भी वे राज्य सरकारें आमंत्रण दे रही हैं, जो संस्कृति के संरक्षण का दावा करने से अघाती नहीं हैं।’






