सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को बिना शर्त माफी मांगने के लिए कहा

नई दिल्ली।। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष और हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर से कहा कि वह अपने खिलाफ शुरू की गई अवमानना की कार्यवाही में राहत पाने के लिये बिना शर्त, बिना सवाल और स्पष्ट रूप से माफी मांगें। न्यायालय ने उन्हें निर्देश दिया कि वह माफी मांगते हुये एक पेज का संक्षिप्त हलफनामा दायर करें, और साथ ही यह स्पष्ट कर दिया कि वह पूर्व में माफी के लिये दिये गये उनके हलफनामे पर विचार नहीं करने जा रहा।

न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति  डी वाई चंद्रचूड़ की एक खंडपीठ ने कहा कि वह ठाकुर द्वारा पूर्व में माफी के लिये दिये गये हलफनामे पर विचार नहीं करने जा रही है और उनसे बिना शर्त माफी मांगते हुये एक पेज का संक्षिप्त हलफनामा दाखिल करना होगा। पीठ ने कहा, हम आपको एक और मौका देंगे। हम सुझााव देते हैं कि आप गलत जानकारी या गलत संवाद जो भी हुआ उसके लिये एक पेज का हलफनामा दे जिसमें स्पष्ट भाषा में यह हो कि इसके लिये आप बिना सवाल और बिना शर्त माफी मांगते हैं।

न्यायालय ने ठाकुर से कहा कि वह 14 जुलाई को माफी मांगने के लिये अदालत में खुद मौजूद रहें। पीठ ने संकेत दिये कि वह हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से भाजपा सांसद ठाकुर की माफी स्वीकार कर अवमानना की कार्यवाही को बंद करना चाहती है। ठाकुर की तरफ से पेश हुये वरिष्ठ अधिवक्ता पी एस पटवालिया ने कहा कि यद्यपि उनके मुवक्किल बिना शर्त माफी मांगना चाहते हैं, मेरिट के आधार पर उनका काफी मजबूत पक्ष है जिससे यह साबित हो सकता है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया। पटवालिया ने कहा, मैं बिना शर्त माफी मांगने के लिये तैयार हूं। मैं पहले ही ऐसा कर चुका हूं। समस्या यह है कि यह धारणा नहीं बननी चाहिये कि मैंने कुछ गलत किया।

न्याय मित्र के तौर पर न्यायालय की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमण्यम ने इस मामले में कहा कि अगर न्यायालय ठाकुर को माफी देने में उदार है तब उन्हें कुछ नहीं कहना लेकिन माफी बिना शर्त और स्पष्ट होनी चाहिये। पीठ ने हालांकि कहा कि वह इस मामले के गुण दोष पर नहीं जायेगी। न्यायालय ने बीसीसीआई की स्वायाता के मुद्दे पर आईसीसी को लिखने को लेकर गलत हलफनामा देने पर इस साल दो जनवरी को ठाकुर के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी।

सरकार ने हाई कोर्ट में कहा- 2 हफ्तों में पूरी होगी होशियार सिंह की मौत की जांच

शिमला।। मंडी के करसोग में मृत पाए गए फॉरेस्ट गार्ड होशियार सिंह के मामले में सरकार ने हाई कोर्ट को बताया है कि दो हफ्तों के अंदर जांच पूरी कर ली जाएगी। सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि अगर जांच पूरी होने के बाद कोई शक रह जाता है तो सीबीआई या किसी भी एजेंसी से जांच करवाने में हमें कोई आपत्ति नहीं होगी। गौरतलब है कि इस केस में हाई कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया है।

जंगल में उल्टा टंगा पाया गया था होशियार का शव

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ के सामने सुनवाई के दौरान कोर्ट मित्र ने मांग की कि इस मामले की जांच की निगरानी स्वयं हाईकोर्ट करे। कोर्ट द्वारा पूछे गए सवाल पर सरकार ने कहा कि संवेदनशील जगहों पर चेक पोस्ट लगाने के बारे में वन विभाग संबंधित अधिकारियों से बात करके संभावनाएं तलाशी जाएंगी। सरकार ने कहा कि वनों को माफिया से बचाने और पेड़ों के संरक्षण के लिए भी विभागों से बात की जाएगी।

हाईकोर्ट ने पक्षकारों को 11 जुलाई तक वनों को सुरक्षित रखने, वन संरक्षण में कार्यरत कर्मियों को आ रही दिक्कतों से निजात दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इस बारे में जरूरी सुझाव देने को कहा है। साथ ही 2 सप्ताह में प्रतिवादियों को स्टेटस रिपोर्ट दायर करने के आदेश दिए। अब 11 जुलाई को इस मामले की अगली सुनवाई होगी।

जंगल में मृत पाई गई 2 दिन से लापता 10वीं की छात्रा, पुलिस को रेप के बाद हत्या की आशंका

शिमला।। शिमला जिले में 10वीं की छात्रा का शव मिलने से सनसनी फैल गई है। यह छात्रा 2 दिन से लापता थी। इसका शव स्कूल के साथ लगते जंगल में में मिला है। बताया जा रहा है कि छात्रा के शरीर पर कपड़े नहीं थे। ऐसे में पुलिस ने फिलहाल रेप के बाद हत्या की आशंका व्यक्त करते हुए संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज करके छानबीन शुरू कर दी है।

मृतक छात्रा एक सरकारी स्कूल में पढ़ती थी और दो दिनों से उसके बारे में कोई पता नहीं चल रहा था। बताया जा रहा है कि गुरुवार सुबह पुलिस को घटना की जानकारी मिली कि जंगल में एक लड़की का शव नग्न अवस्था में पड़ा हुआ है। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शिनाख्त की। पता चला कि पास के ही स्कूल में पढ़ने वाली 16 वर्षीय छात्रा है।

इस बीच पुलिस ने डॉक स्क्वैड की मदद लेते हुए भी छानबीन करने की कोशिश की। बताया जा रहा है कि घटनास्थल के पास से खाली बोलतें भी मिली हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों और फरेंसिक एक्सपर्ट्स ने भी घटनास्थल का मुआयना किया है। बताया जा रहा है कि गले में निशान भी नजर आ रहे थे। वर्दी शव से कुछ ही दूरी पर मिली है।

होटल कर्मचारी पर नहा रही टूरिस्ट का वीडियो बनाने का आरोप

मंडी।। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले में एक शर्मनाक घटना सामने आई है। एक होटल के कर्मचारी पर महिला पर्यटक का नहाते हुए वीडियो बनाने का आरोप लगा है। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है और जांच के लिए उसके स्मार्टफोन को साइबर सेल के पास भेजा गया है। (तस्वीर प्रतीकात्मक है)

हिंदी अखबार पंजाब केसरी ने पुलिस के हवाले से लिखा है कि महाराष्ट्र के अमरावती से एक परिवार हिमाचल घूमने आया था और बुधवार शाम को जोगिंदर नगर के एक होटल में रुका था। महिला को नहाते वक्त ऐसा लगा कि कोई झांक रहा है। उसने देखा कि होटल का कर्मचारी मोबाइल से वीडियो बना रहा है। महिला ने इसकी सूचना अपने परिजनों और होटल मैनेजमेंट को दी।

अखबार लिखता है कि सूचना मिलने के बाद पुलिस मौके पर पहुंची और युवक का मोबाइल कब्जे में ले लिया। अब साइबर सेल इस बात की जांच करेगा कि क्या मोबाइल में वीडियो बनाया गया था या नहीं और बनाने के बाद कहीं डिलीट तो नहीं कर दिया गया था। बताया जा रहा है कि अन्य पहलुओं से भी मामले में जांच की जा रही है।

न कभी प्रेशर में रहा हूं और न ही आगे प्रेशर में रहूंगा: डीजीपी सोमेश गोयल

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के नए डीजीपी सोमेश गोयल ने पदभार ग्रहण कर लिया है। शिमला में पत्रकार वार्ता कर अपने इरादे जाहिर किए। उन्होंने कहा कि ‘न मैं दबाव में रहा हूं और न ही आगे रहूंगा।’ कानून के मुताबिक काम होगा। उन्होंने कहा कि वन रक्षक होशियार सिंह की मौत का मामला उनके ध्यान में है और इसे लेकर विभागीय अफसरों से जानकारी लेने के बाद उचित कदम उठाया जाएगा।

गोयल  ने कहा कि राज्य में नशे की स्थिति पर भी काबू पाया जाएगा। गोयल ने कहा कि अगर राज्य में ड्रग्स को लेकर स्थिति कंट्रौल में होती तो मुख्य सचिव को राज्य में जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत न पड़ती। डीजीपी ने कहा कि पुलिस को ‘पीपल फ्रैंडली’ बनाया जाएगा और सर्विस डिलीवरी को ठीक किया जाएगा।

नए डीजीपी ने कहा कि पुलिस के आधुनिकीकरण को लेकर भी वे काम करेंगे और यह कैसे होगा इसका प्लान बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि जहां तक मैन पावर की बात है, इसे दूर करने को पुलिस में 1200 पदों की भर्ती की जा रही है। इससे मैन पावर की कमी काफी हद तक दूर होगी।

‘सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को नजरअंदाज कर हुई HPPSC चेयरपर्सन और मेंबर की नियुक्ति’

शिमला।। हिमाचल प्रदेश सरकार ने प्रदेश के पब्लिक सर्विस कमिशन के चेयरपर्सन और एक सदस्य की नियुक्ति की है। मगर आरटीआई में खुलासा हुआ है कि इस मामले में नियमों का पालन नहीं किया गया। हिमाचल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सीधा उल्लंघन किया है, जिसमें कहा गया था कि पब्लिक सर्विस कमिशन में अपनी मर्जी से चेयरपर्सन या सदस्यों की नियुक्ति बंद कर देनी चाहिए। दरअसल आरटीआई मेंपता चला है कि जिन लोगों को सरकार ने नियुक्ति किया था, उन्होंने इन पदों के लिए आवेदन ही नहीं किया था। यही नहीं, इनके अलावा किन्हीं अन्य व्यक्तियों की चर्चा ही नहीं हुई इन पदों के लिए।

‘द वायर’ में छपी रिपोर्ट के मुताबिक हिमाचल प्रदेश के आरटीआई ऐक्टिविस्ट देव आशीष भट्टाचार्य को आरटीआई से पता चला है कि चेयरपर्सन नियुक्त किए गए मेजर जनरल धर्म वीर सिंह राणा (रिटायर्ड) और सदस्य नियुक्त मीरा वालिया ने इन पदों के लिए आवेदन ही नहीं किया था। साथ ही इन पदों के लिए अन्य लोगों के नामों पर विचार नहीं किया गया। गौरतलब है कि वालिया रिटायर्ड IAS ऑफिसर सुभाष आहलुवालिया की पत्नी हैं, जो कि मुख्यमंत्री के प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी भी हैं।

द वायर के मुताबिक इस मामले में भट्टाचार्य का कहना है कि पता चलता है कि हिमाचल प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान नहीं किया। उन्होंने कहा कि हिमाचल के मुख्यमंत्री और ब्यूरोक्रैट्स को अदालत की अवमानना करने में कोई डर नहीं है। गौरतलब है कि 15 फरवरी 2013 को दिए गए फैसले (State of Punjab vs Salil Sabhlok) में जस्टिस ए.के. पटनायक कऔर जस्टिस मदन बी. लोकुर ने कुछ गाइडलाइन्स तय की थीं। जस्टिस लोकुर ने ऑर्डर में लिखा था कि पंजाब सरकार चेयरपर्सन और सदस्यों के चयन के लिए प्रक्रिया और दिशानिर्देशों को तय करे ताकि पंजाब  पब्लिस सर्विस कमिशन में मनमर्जी से नियुक्तियां न की जा सकें।

भट्टाचार्य द्वारा 17 मई 2017 को डाली गई आरटीआई से पता चला है कि राणा और वालिया की नियुक्ति में हिमाचल सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। उन्होंने कहा, ‘दोनों की केसों में अडिशनल चीफ सेक्रेटरी (पर्सनल) तरुण श्रीधर के ऑफिस से नोट चला जिसमें मुख्यमंत्री और चीफ सेक्रेटरी से नियुक्तियों पर फैसला लेने के लिए कहा गया था। चीफ सेक्रेटरी ने अप्रूवल दिया और मुख्यमंत्री ने मीरा वालिया और मेजर जनरल धरम वीर सिंह का नाम सुझा दिया। उसी दिन राज्यपाल ने भी साइन कर दिए।’ आरटीआई ऐक्टिविस्ट का कहना है कि यह सिलेक्शन पूरी तरह गैरकानूनी है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है।

पार्षद संजय परमार पर हमले के विरोध में बीजेपी का प्रदर्शन

शिमला।। नगर निगम पार्षद संजय परमार पर हमले को लेकर बीजेपी ने मंगलवार को जिलाधीश कार्यालय के बाहर  धरना-प्रदर्शन किया। प्रदर्शऩ के बाद जिलाधीश को ज्ञापन भी दिया गया। इस प्रदर्शन की अध्यक्षता भाजपा जिला अध्यक्ष संजय सूद ने की। उनके साथ शिमला के विधायक सुरेश भारद्वाज, प्रदेश उपाध्यक्ष रूपा शर्मा व प्रवक्ता महेंद्र धर्माणी भी उपस्थित रहे।

इस मौके पर शिमला के विधायक ने कहा कि मुख्यमंत्री अपने क्षेत्र की नगर निगम में 4 में से 3 सीटें हार गए और मुख्यमंत्री के ऊपर भ्रष्टाचार के अनेकों केस चल रहे हैं। इस कारण से कांग्रेस कार्यकर्ता पूरी तरह से बौखला गए हैं और इस बौखलाहट में आकर मारपीट पर उतर आए हैं। उन्होंने कहा कि इन गुंडों को मुख्यमंत्री और उनके बेटे का संरक्षण मिल रहा है। कल भी सरकार ने 15 मिनट के मैडीकल को 6 घंटे लगा दिए, जिससे साफ होता है कि सरकार इन आरोपियों को बचाने में लगी है।

भारद्वाज ने कहा कि अभी तक आरोपियों को पकडऩे में पुलिस नाकाम रही है। उन्होंने कहा कि संजय परमार की नाक में फ्रैक्चर हो गया है। उन्होंने मांग की है कि आरोपी 24 घंटों के भीतर गिरफ्तार होने चाहिए। इस बीच सोशल मीडिया पर कुछ सेकंड्स का वीडियो सर्कुलेट हो रहा है जिसमें कुछ लोग जंय परमार पर हमला करते दिख रहे हैं। यह पता नहीं चल पाया है कि वीडियो किसने बनाया और किसने अपलोड किया। नीचे देखें:

चट्टानों पर पेंटिंग होने देने पर सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल सरकार पर लगाया था 1 करोड़ का फाइन

इन हिमाचल डेस्क।। मामला सितंबर 2002 का है। उस वक्त हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी। सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर 2002 को हिमाचल प्रदेश सरकार पर 1 करोड़ रुपये का भारी-भरकम जुर्माना लगाया। क्यों? क्योंकि हिमाचल प्रदेश सरकार अपने कर्तव्य का निर्वहन करने में अक्षम रही थी। और यह कर्तव्य था- कुल्लू मनाली-रोहतांग हाइवे पर संवेदनशील चट्टानों पर कंपनियों ने विज्ञापन बना दिए थे मगर सरकार ने इसपर कोई ऐक्शन नहीं लिया।

इस मामले में कोर्ट ने एक एक्सपर्ट कमिटी भी बनाई थी जिसने विडियो फिल्म के साथ कोर्ट में सबूत दिए थे। रिपोर्ट के मुताबित एमबीडी बुक्स ने 78 विज्ञापन चट्टानों पर पेंट किए थे, कोकाकोला ने 44 और पेप्सिको ने 6 विज्ञापन बनाए थे। कमिटी ने अंदाजा लगाया था कि इन विज्ञापनों को चट्टानों से हटाने का खर्च 1.75 करोड़ होगा। इससे पहले 17 सितंबर को कोर्ट ने पेप्सिको, कोका कोला और 10 अन्य कंपनियों पर भी फाइन लगाया था और 48 घंटों के अंदर रकम जमा करने को कहा था। (इस मामले में फाइनैंशल एक्सप्रेस ने Rape of the Rock नाम से सीरीज चलाई थी, जिसे आप यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं)

चट्टानों पर पेंट से लिखने में क्या है गलत?
रॉक पेंटिंग यानी चट्टानों पर इश्तिहार बनाना या स्लोगन आदि लिखना वन संरक्षण अधिनियम 1980 (Forest Conservation Act 1980) का सीधा उल्लंघन है। इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश में तत्कालीन बीजेपी सरकार को भारी-भरकम 1 करोड़ जुर्माना लगाया था। मगर बीजेपी ने इससे सबक नहीं लिया है। 15 साल बाद बीजेपी सरकार में आने की इच्छुक है और अभी से इलेक्शन मोड में आ गई है। इसके लिए उसके कार्यकर्ताओं ने तमाम नियमों को ताक पर रखते हुए चट्टानों पर बीजेपी का चुनाव चिह्न कमल बनाना और नारे लिखना शुरू कर दिया है। चट्टानें छोड़िए, PWD द्वारा रोड सेफ्टी के लिए बनाए गए पैराफिट और अन्य जगहों पर रिफ्लेक्शन के लिए बनाए गए सफेद निशानों पर भी स्लोगन लिखे जा रहे हैं।

चट्टानों पर चढ़कर हो रही ‘कलाकारी”

समस्या यह है कि सबसे पहले In Himachal ने जब धारटीधार (नाहन) की तस्वीरें छापी थीं तब एक शख्स ने लिखा था कि हम कार्यकर्ताओं के बजाय हमारे नेताओं से पूछिए जिनसे हमें नारे आदि लिखने का निर्देश मिला है। बावजूद इसके यह सिलसिला प्रदेश भर में जारी है। प्रदेश की राजधानी शिमला तक में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए चट्टानों पर कमल के निशान बनाए जा रहे हैं। ध्यान रहे कि यह काम उसी बीजेपी के कार्यकर्ताओं द्वारा किया जा रहा है जिसके सर्वोच्च नेता और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महत्वाकांक्षी ‘स्वच्छ भारत’ मिशन चला रहे हैं।

चट्टानों पर नारे लिखे जा रहे हैं

हिमाचल प्रदेश सरकार बैठी है चुप
चूंकि इसी तरह के मामले में 2002 में सरकार को कोई कार्रवाई न करने की वजह से सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी का सामना करना पड़ा है, ऐसे में इस सरकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह खुद आगे बढ़कर न सिर्फ बीजेपी बल्कि अन्य शिक्षण संस्थानों या कंपनियों पर कार्रवाई करे जो फिर से प्रदेश के सौंदर्य को बिगाड़ते हुए चट्टानों पर अपना प्रचार कर रही है। सरकारी संपत्ति (पैराफिट, सड़क किनारे लगे खंबे आदि) पर भी न तो कोई पोस्टर लगाया जा सकता है और न ही नारे लिखे जा सकते हैं। इस मामले में भी संबंधित धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। वरना कहीं ऐसा न हो कि फिर से सरकार के बजाय कोर्ट को कार्रवाई करनी पड़े और एक बार फिर खुद सरकार को भी यह झेलनी पड़े।

क्या नुकसान हो सकता है बीजेपी को?
पार्टियां छवि को होने वाले नुकसान की चिंता तो करती नहीं हैं, इसलिए यह सोचना बेमानी है कि पार्टी खेद प्रकट करते हुए अपने कार्यकर्ताओं को कहेगी कि इन रॉक पेंटिंग्स को हटाए। हो सकता है लगता हो कि सरकार अपनी आएगी तो डर काहे का, केंद्र में भी अपनी सरकार है। मगर ध्यान रहे कि कोर्ट को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। ‘इन हिमाचल’ ने इस मामले में कानून के जानकारों से बात करी तो उन्होंने कहा, ‘यदि यह मामला कोर्ट पहुंचा तो 2002 की तरह कोर्ट उसी तरह बीजेपी से जुर्माना भरने के लिए कह सकता है, जैसे पेप्सी, कोक और अन्य कंपनियों को कहा था। यह फाइन उतना ही हो सकता है जितना खर्च सब जगह की गई पेंटिंग को हटाने में आएगा।’

एजेंसियों के सर्वे के बाद भी ऊहापोह की स्थिति में क्यों है बीजेपी?

सुरेश चम्ब्याल।। चुनाव आयोग ने कमर कस ली है इसी के साथ राजनीतिक गर्माहट भी प्रदेश में बढ़ गई है। बीजेपी जहाँ दल-बल के साथ चुनावी राण में कूद गई है वहीँ कांग्रेस अपने अपने नेताओं के दम पर उनसे सबंधित एक एक सीट को पक्का करने में जुटी हुई है। भाजपा जहाँ एक इकाई के रूप में नारों और रथयात्रा के शोर के साथ माहौल बंनाने में जुटी है वहीँ कांग्रेस नेता और मंत्री विधायक अपने अपने क्षेत्रों का रुख कर चुके है, सचिवालय खाली हैं। बीजेपी के रोज के हमलों का जबाब कांग्रेस की तरफ से हाल फिलहाल मुख्यमंत्रीं और प्रवक्ता ही देते नजर आ रहे हैं। बीजेपी ने जो तीन प्राइवेट फर्मों से सर्वे करवाया था उसकी रिपोर्ट आलकमान के सामने पहुँच गई है। और सर्वें के निष्कर्ष की बातें कहीं न कहीं बीजेपी के दिग्गज नेताओं की जुबानी इशारों में बाहर भी निकलने लगी हैं। खबर यह है कि सर्वे में दो मुख्य बिंदुओं पर प्राइवेट फार्मों को फोकस करने के लिए कहा गया था। पहला यह कि संगठन, पदाधिकारी और कार्यकर्ता क्या चाहता है और दूसरा की प्रदेश की आम जनता क्या चाहती है।

इन दोनों मोर्चों पर अलग अलग रुझान पार्टी को मिले हैं, ऐसा सर्वे रिपोर्ट में निकल आने की बात कही गयी है। हैदराबाद की एक फर्म जो इससे पहले भी कई सर्वे कर चुकी है और उत्तर प्रदेश में पार्टी ने उसी पर चलने का फैसला लिया था के अनुसार। प्रदेश में रुझान दो भागों में विभग्त है। अधिकांश पार्टी पदाधिकारी और काडर पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल के घोषित नेतृत्व को जीत का मंत्र बता रहा है, वहीँ जेपी नड्डा के नाम की माला वो पदाधिकारी जप रहे है जिनका संगठन में वजूद कभी नगण्य कर दिया गया था या हाशिये पर धकेल दिए गए थे। परन्तु ऐसे लोगों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं है। वहीँ गाँवों शहरों और कालेज काडर से युवा वर्ग के संवाद के रुझान या सर्वे में निकलकर बताया जा रहा है कि प्रदेश के लोग पार्टियों से इतर नया मुख्यमंत्री देखना चाहते है।

जिस तरह से उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ चले है और मीडिया समाज में उनकी चर्चाएं है हर निर्णय पर बहस छिड़ रही है। ऐसा ही गैर परम्परागत नेतृत्व हिमाचल में भी अधिकांश लोग चाहते है। जो मौजूदा स्थापित नेताओं में लोगो को नहीं लगता की मिल पायेगा। सर्वे के अनुसार कांगड़ा में भी पार्टी अब आगे मजबूत हुयी है गुटबंदी कहीं न कहीं अब ज्यादा असर डालती हुई नहीं दिख रही है। वही ऊपरी हिमाचल जिसमे शिमला सबसे महतवपूर्ण जिला है वहां एक सद्भावना लहर वीरभद्र सिंह के लिए भी चल रही है।

कांग्रेस अपने परम्परागत वोट बैंक के आधार पर इस चुनाव को जीतना चाहती है और बी जी पि उसी परम्परागत वोट बैंक की एक पीढ़ी को अपने पक्ष में करते हुए आगे बढ़ना चाहती है। और इसी लिए ऊहापोह में है की नेतृत्व अगर पुराना चेहरा दिखाया तो नया वोटर नई उम्मीद में उस जज्बे के तहत साथ नहीं आएगा जिसके तहत वो आम लोगों के बीच माहौल बनांना चाहते है। और दूसरी दुविधा ये है कि अगर कोई नया चेहरा दिया तो समर्थक कादर के साथ स्थापित लीडरशिप गाहे बगाहें अड़ंगा डाल सकती है। इसलिए पार्टी अभी तक यह निर्णय नहीं कर पा रही है की किस स्थिति में उसे ऑप्टिमम रिजल्ट प्राप्त होगा, चुनाव में परम्परगत चहेरे को कमान देकर या नए चेहरे को कमान देकर। हालाँकि उम्र बीजेपी के लिए कोई ख़ास मुद्दा नहीं है कर्णाटक में येदुरप्पा को कमांड देकर पार्टी यह जता चुकी है।

राज्यों की जीत ही उसके लिए महत्वपूर्ण है। फिर भी ऊहापोह की यह स्थिति बी जे पी आलाकमान को सफल उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश , मॉडल पर चलने की तरफ भी सोचने को मजबूर कर रही है। जहाँ बिना चहेरा दिखाए मोदी के नाम पर बी जे पी ने कामयाबी के ऐतिहासिक झंडे गाड़ दिए थे। योगी आदित्यनाथ जो आज पार्टी का मोदी के बाद सबसे बड़ा फेस हो गए है इसी लहर से निकले हुए नेता हैं। वहीँ त्रिवेंद्र सिंह रावत के चयन ने बीजेपी के हर नेता को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है की मुख्यमंत्री वो भी या कोई भी हो सकता है। कुलमिलाकर प्रदेश में आने वाले समय में यही कयास लगते रहेंगे की अगला सी एम् फेस बी जी पि किसे देती है। और नहीं देती है तब भी यह रोमांच चुनावी फैसले आने के बाद तक जारी रहने की सम्भावना है। दूसरी बात यह लग रही है पार्टी इस बार टिकट के लिए आवेदन नहीं मांगेगे जैसा अमूनन करती आयी है इस बार सतसत कमेटी खुद ही नाम तय करके आलाकमान को फैसले के लिए भेजेगी। यह बात अध्यक्ष सत्ती भी पुख्ता कर चुके है।

पार्टी बिना फेस के भी लड़ सकती है यह ब्यान केंद्रीय मंत्री जे पी नड्डा ने हाल में ही सिरमौर में दिया है। दिग्गज नेतायों के मुंह से निकले यह बोल इन तथ्यों को पुख्ता करते हैं की सर्वे की रिपोर्ट आलाकमान के पास पहुँच चुकी है और उसी से ऐसा कुछ निकल कर आया है। पर फाइनल क्या होगा यह समय के गर्भ में छुपा है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विभिन्न मसलों पर लिखते रहते हैं। इन हिमाचल के लिए भी कुछ वक्त से लिख रहे हैं।)

डिस्क्लेमर- ये लेखक के अपने विचार हैं और इनके लिए वह स्वंय जिम्मेदार हैं। इन हिमाचल इनसे सहमत या असहमत होने का दावा नहीं करता।

मुख्यमंत्री वीरभद्र को हाई कोर्ट का झटका, मनी लॉन्ड्रिंग का केस जारी रहेगा

शिमला।। अपने खिलाफ चल रहे आय से अधिक संपत्ति मामले को हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और उनके परिजन राजनीतिक दुर्भावना से बनाया गया मुकदमा बताते थे मगर अब तो कोर्ट के ताजा फैसले के बाद उनके ये दावे भी निरर्थक साबित होते दिख रहे हैं। सत्यमेव जयते का नारा लगाते हुए देश की न्याय व्यवस्था पर भरोसा जताने वाले मुख्यमंत्री को अब कोर्ट से एक और झटका लगा है। दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने समेत तमाम आरोपियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग केस रद्द करने की मांग की थी।

दिल्ली हाईकोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को झटका देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने ईडी की एफआईआर रद्द करने की मांग की थी। वीरभद्र ने मनी लांड्रिंग के मामले में हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की थी कि उनके खिलाफ ईडी द्वारा दायर किए गए इस मामले को तुरंत रद्द कर दिया जाए। वीरभद्र और अन्य की ओर से दायर याचिका पर हाईकोर्ट के जस्टिस आरके गौबा के समक्ष मामले की सुनवाई हुई थी जिस पर सोमवार को ये नतीजा सामने आया है।

गौरतलब है कि यह मामला 2009-2011 के बीच का है जब वीरभद्र सिंह इस्पात मंत्री हुआ करते थे। इस दौरान उन पर 6.1 करोड़ की संपत्ति अर्जित करने का आरोप है। सीबीआई सीएम और उनके परिजनों पर 2009 से 2011 के बीच आय के ज्ञात स्रोत से अधिक धन इकट्ठा करने के आरोपों की जांच कर रही है। इस दौरान वीरभद्र केंद्रीय इस्पात मंत्री थे। जांच एजेंसी ने आरोप लगाया है कि केंद्रीय मंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने अपने और अपने परिजनों के नाम पर एलआईसी की पॉलिसी के माध्यम से भारी मात्रा में निवेश किया था।

इससे पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 84 वर्षीय वीरभद्र सिंह, उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह और पुत्र विक्रमादित्य को पूछताछ के लिए तलब किया था। ईडी ने सीबीआई की ओर से आपराधिक मामला दर्ज कराए जाने के बाद संज्ञान लेते हुए सितंबर 2015 को मुख्यमंत्री और अन्य के खिलाफ दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम कानून (पीएमएलए) के तहत मामला दर्ज किया था। आय से अधिक संपत्ति मामले में वीरभद्र और उनकी पत्नी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के उच्च न्यायालय के इनकार के चंद घंटों के बाद ही सीबीआई ने 31 मार्च को उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया था। उच्च न्यायालय ने वीरभद्र का यह तर्क खारिज कर दिया था कि राजनीतिक प्रतिशोध के चलते यह मामला दर्ज किया गया था।