कांग्रेस के पूर्व MLA बंबर ठाकुर की गाड़ी से आधा किलो चरस बरामद

एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। हिमाचल प्रदेश पुलिस ने मंडी में लगाए नाके के दौरान एक लग्जरी गाड़ी से लगभग आधा किलो चरस बरामद करने का दावा किया है। बताया जा रहा है कि कथित तौर पर इस कार पर चार लोग सवार थे। पुलिस के मुताबिक यह गाड़ी बिलासपुर के कांग्रेस के पूर्व विधायक बंबर ठाकुर के नाम पंजीकृत है और इसे उनका बेटा चला रहा था, जिसे नाबालिग बताया जा रहा है। कार में कुल चार लोग सवार थे जिन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया है।

पुलिस का दावा है कि सदर थाने की टीम इंसेक्टर सुनील की अगुवाई में भ्यूली पुल के पास नाका लगाकर वाहनों को चेक कर रही थी। इस दौरान पंडोह की तरफ से आई कार, जिसका नंबर HP 69 2323 था, को रोका गया। चेकिंग के दौरान डैशबोर्ड से दो पैकेट मिले, जिनसे 498 ग्राम चरस मिली।

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पुलिस का कहना है कि कार में बंबर ठाकुर के नालाबिग बेटे के अलावा तीन बालिग युवक अभिषेक ठाकुर, आकाश और अमन शर्मा सवार थे। इनमें से पहले दो तो बिलासपुर से हैं और तीसरा रामपुर से है। पुलिस ने इनके खिलाफ एनडीपीएस ऐक्ट के तहत मामला दर्ज किया है जबकि कथित नाबालिग के खिलाफ जुवेनाइल एक्ट के तहत कार्रवाई की जा रही है। मंडी के एसपी गुरदेव चंद शर्मा ने मामले की पुष्टि की है।

गौरतलब है कि बंबर ठाकुर के एक बेटे को लेकर पिछले साल फरवरी में बिलासपुर में खूब बवाल हुआ था। पूरा मामला क्या था, पढ़ने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

बिलासपुर प्रकरण: क्या है कांग्रेस MLA बंबर ठाकुर के बेटे की भूमिका?

(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क की खबर है और सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित की गई है)

 

कुल्लू: कथित तौर पर इंजेक्शन से नशा कर रही बच्ची पकड़ी, वीडियो वायरल

कुल्लू।। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हिमाचल प्रदेश में युवा पीढ़ी, खासकर टीनेजर नशे की चपेट में तेजी से आ रहे हैं। भांग से बात आगे बढ़ गई है और हेराइन, कैप्स्यूल्स और इंजेशकन तक का सहारा लिया जा रहा है। अब कुल्लू में कुछ लोगों ने एक बच्ची का वीडियो वायरल किया है, जिसमें दावा किया गया है कि इस बच्ची को उन्होंने कुछ और लड़कों के साथ इंजेक्शन से नशा करते हुए पकड़ा।

क्या है दावा
खबर के मुताबिक बंदरोल इलाके में एक पार्क के किनारे चार लड़के और लड़कियां इंजेक्शन लगा रहे थे। इस दौरान स्थानीय लोगों ने इन्हें पकड़ने की कोशिश की तो दो लड़के और एक लड़की भाग गए जबकि एक लड़की को पकड़ लिया गया।

इसके बाद इक लड़की का वीडियो बनाते हुए पूछताछ की गई जिसमें लड़की ने बताया कि सिरींज आदि मेडिकल स्टोर से मिल जाते हैं और दिल्ली से नशा लाया जाता है। उसने अपने साथियों के नाम भी बताए हैं। अफसोस, वीडियो बनाने वालों ने इस बच्ची के भविष्य का ख्याल न रखते हुए इस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया है। हमने उस वीडियो को ब्लर कर दिया है और अन्य टीनेजर लड़कों के नाम वाली जगह बीप साउंड लगा दी है ताकि उनकी पहचान सार्वजनिक न हो।

वीडियो वायरल करना गलत
आजकल मोबाइल लेकर समाज सुधारक बनने का चलन बेहद खतरनाक हो चला है। उदाहऱण के लिए इस मामले में वीडियो बनाने वाले कोर्ट में यह साबित नहीं कर पाएंगे कि उस बच्ची ने अन्य लोगों के साथ नशा किया था या नहीं, मगर वह बच्ची चाहे तो इस वीडियो को बनाकर उसकी छवि खराब करने वालों को सलाखों के पीछे डाल सकती है। क्योंकि उन्होंने इसकी छवि को नुकसान पहुचा है।

नशा करना बहुत बढ़िया काम नहीं है मगर इस मामले में जिस तरह से कथित समाज सुधारकों ने इस बच्ची को बदनाम कर दिया है, उसके लिए उनके ऊपर विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। हो सकता है बदनामी के कारण ये बच्ची डिप्रेशन में चली जाए या कोई ऐसा-वैसा कदम उठा ले। जबकि नशे की गिरफ्त में आए लोगों का इलाज इस तरह से बदनाम करने से नहीं, बल्कि काउंसलिंग आदि से किया जा सकता है।

अगर यह वीडियो सच्चा है
यह वीडियो अगर सच है तो पता चलता है कि किस तरह से खुलेआम नशाखोरी हो रही है और सरकार व प्रशासन इसपर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहा है। इस तरह के काम में कौन लोग लगे हैं, अगर उनका पता हिमाचल जैसे कम आबादी वाले प्रदेश में नहीं लग सकता तो और कहां लगेगा? मगर हिमाचल प्रदेश पुलिस पहले से ही कई तरह की नाकामियों के लिए बदनाम हो चुकी है। उससे उम्मीद किया जाना भी बेमानी है। यही काऱण है कि लोग कानून अपने हाथ में लेकर खुद पुलिसिंग करने लगे हैं, जो कि लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

मंडी में बारिश के बीच हो रही सड़कों की टारिंग, कोई पूछने वाला नहीं

मंडी।। हिमाचल प्रदेश की खराब सड़कों को लेकर लोग अक्सर परेशान रहते हैं। परेशानी इस बात को लेकर भी होती है कि सड़क पक्की होने के कुछ ही दिनों के अंदर उखड़ जाया करती है। सोचिए, जब ठंडे वातावरण में बारिश के बीच टारिंग की जाएगी तो वह टिकेगी कैसे? क्या वह आने वाले दिनों में होने वाली बरसात को सह पाएगी?

मंडी में बरोट की ओर जाने वाली सड़क में इन दिनों झटिंगरी और घटासनी के बीच टारिंग का काम चला हुआ है। मगर बलबीर ठाकुर नाम के शख्स ने फेसबुक पोस्ट में ताजा तस्वीरें और वीडियो डालकर दिखाया है कि बारिश के मौसम के बीच गीली सड़क पर ही टारिंग की जा रही है।

उन्होंने जो वीडियो डाला है, उसमें सड़क से भाप उठता नजर आ रहा है:

दरअसल गरम बिटुमिन्स शीतल बारिश के कारण ठंडी हो जाए तो वह आपस में ग्रिप नहीं हो पाती। साथ ही नीचे की सतह गीली हो तो भी ऊपर से डाली गई लेयर चिपक नहीं पाती। नतीजा, दो दिन के अंदर बिटुमिन्स उखड़ने लगती है और महीने के अंदर ही सड़क की हालत पुरानी से भी बदतर हो जाती है।

बहरहाल, आप तस्वीरें देखें जिन्हें बलबीर ठाकुर ने शेयर किया है-

तस्वीरें- (Courtesy: Balbir Thakur)

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सरकारी पैसे से खली की कंपनी के शो में किसका क्या हित है?

आई.एस. ठाकुर।। जो प्रदेश लगभग 45000 करोड़ रुपये के कर्ज पर डूबा हो और इस कर्ज से उबरने के लिए केंद्र सरकार के सहयोग के अलावा और कहीं से कुछ मिलने की उम्मीद न हो, उस प्रदेश में क्या करोड़ों का खर्च करके एक गैरजरूरी मनोरंजक कार्यक्रम करवाना तर्कसंगत है?

प्रदेश में विभिन्न विभागों के कितने ही कर्मचारी 1000 रुपया महीना या इससे कम पैसा कमा रहे हैं और खुद को खपा रहे हैं। आंगनवाड़ी, आशा, मिडडे मील वर्कर और अन्य कई पार्ट टाइम वर्कर और दिहाड़ीदारों का वेतन चिंदी-चिंदी बढ़ाकर सरकारें अपनी पीठ थपथपाती हैं, मगर संपन्न आर्टिस्ट और उसकी अकैडमी को प्रमोट करवाने के लिए करोड़ों जुटाने में दिन-रात एक कर दे रही है।

पैसा सरकार का, प्रमोशन खली का
जी हां, हिमाचल प्रदेश सरकार ‘द ग्रेट खली रिटर्न्स’ नाम से इवेंट्स का आयोजन करने जा रही है और अब उसकी फंडिंग भी खुद करेगी (पढ़ें), तीन करोड़ रुपये जुटाएगी। खली बिज़नसमैन हैं, वह क्या करते हैं क्या नहीं, वह उनका मामला है। हम उसपर सवाल नहीं उठा सकते। मगर जहां पर जनता की जेब से किसी को पैसा जाना है, वहां यह सवाल बनता है कि आखिर इस पैसे को कहां और क्यों खर्च किया जा रहा है।

आखिर इतनी दिलचस्पी क्यों?
दरअसल जैसे ही बीजेपी की नई सरकार बनी थी, खेल एवं युवा मामलों के मंत्री गोबिंद ठाकुर ‘द ग्रेट खली’ से मिले थे। खली ने जालंधर में अकैडमी खोली है, जहां WWE की तर्ज पर होने वाली स्टंट बेस्ड पूर्वनियोजित रेसलिंग की ट्रेनिंग दी जाती है। फिर ऐलान किया गया था कि हिमाचल में खली के कार्यक्रम आयोजित होंगे। बाद में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने भी इस अकैडमी का दौरा किया था।

तीन करोड़ रुपये का खर्च
खली की कंपनी CWE (जी हां, WWE तो अमरीकी कंपनी है) के कार्यक्रम करवाने के लिए जाने क्यों खेल मंत्री बेताब हैं। खर्च तीन करोड़ आना है, जबकि सभी को पता है कि WWE कोई रेसलिंग नहीं, कोई शेड्यूल्ड गेम नहीं बल्कि स्टंट आधारित परफॉर्मिंग आर्ट है।

पढ़ें- खली की रेसिलंग खेल नहीं, मनोरंजक कला है

उसी समय ‘इन हिमाचल’ ने प्रकाशित किया था कि जिस तरह का कार्यक्रम खेल मंत्री करवाना चाहते हैं, वह शेड्यूल्ड गेम नहीं है और अगर यह असल खेल होता तो उसे राष्ट्रीय खेलों, कॉमनवेल्थ गेम्स या फिर ओलिंपिक गेम्स में शामिल किया गया होता। दैनिक भास्कर ने इस संबंध में जो बात लिखी है, उसे गौर से पढ़ा जाना चाहिए-

“राज्य सरकार उन्हीं खेलों को बढ़ावा दे सकती है, जो खेल विभाग की सूची में शेड्यूल गेम्स की श्रेणी में आते हैं। इन खेलों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की आेर से ब्लॉक, जिला आैर राज्य स्तर की प्रतियोगिताएं करवाई जाती हैं। इसमें बेहतर प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों का चयन आगे के टूर्नमेंट में किए जाते हैं। इसलिए इन्हें बढ़ावा देने के लिए सालाना तौर पर इनकी एसोसिएशन को भी फंडिंग की जाती है। पहली बार राज्य में नाॅन शेड्यूल गेम्स पर राज्य सरकार फंड करेगी।”

ओलिंपिक में मेडल आएंगे?
बीजेपी सरकार बनते ही खली का इवेंट आयोजित करवाने की चर्चा शुरू हो गई थी। खेल मंत्री का कहना है कि वह खेलों को बढ़ाना देना चाहते हैं। वह तो यहां तक कह रहे थे कि पिछली सरकारों ने इस दिशा में कुछ नहीं किया। मगर सवाल अब उठता है कि एक निजी कंपनी को एक तरह से लाभ उठाने के लिए आप जो कर रहे हैं, उससे कौन से खेल को बढ़ावा दिया जा रहा है और क्या इससे ओलिंपिक में मेडल मिलने वाले हैं?

जनता भी उठा रही सवाल
अब तो लोग सवाल उठाने लगे हैं कि कई महीनों से सरकार इस कार्यक्रम को करवाने के लिए तैयारी कर रही है, जबकि खबरों के मुताबिक खेल विभाग तक इससे हाथ खड़ा कर चुका था। अब चैरिटी की बात करें, टिकटों की बात करें या कुछ भी करें; हकीकत यह है कि इस इवेंट में तीन करोड़ रुपये हिमाचल सरकार देगी। यानी वह सरकार, जो कहती है कि हम कर्ज से उबारने के लिए पाई-पाई सोच-समझकर खर्च करेगी।

पढ़ें- खली की कंपनी के रेसलिंग शो के चक्कर में बुरी फंसी सरकार

नाचना-गाना भी होगा
शेड्यूल तय हो गया है, 29 जून को पड्डल, 7 जुलाई को सोलन में खली का शो करवाया जाएगा। हिमाचल प्रदेश सरकार के खर्च पर होने वाला शो का नाम है- द ग्रेट खली रिटर्न्स. यही नहीं, खेलों का भला करने के लिए इस कार्यक्रम के लिए राखी सावंत, उर्वशी, मनोज तिवारी और बब्बू मान आदि को बुलाए जाने की खबरे हैं। इस कार्यक्रम में जिन 25 भारतीय रेसलरों के हिस्सा लेने की बात की जा रही है, उनमें से अधिकतर खली की अकैडमी के ही छात्र होंगे।

असली खिलाड़ी उपेक्षित
यानी हिमाचल सरकार अपना पैसा खर्च करके खली की कंपनी और उनके छात्रों को मंच देगी। हिमाचल में असली खिलाड़ी आज क्या कर रहे हैं। ये बात खलती है कि खिलाड़ियों की डाइट और उनकी सुविधाएं बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा, मगर एक पहले से ही संपन्न व्यक्ति का शो करवाने के लिए कर्ज में डूबा प्रदेश तीन करोड़ रुपये बहाने जा रहा है। हरियाणा मेडल पर मेडल ला रहा है क्योंकि वह खेलों और खिलाड़ियों पर नीति बनाता है, पैसे खर्च करता है। न कि माहौल बनाने के लिए तड़क-भड़कर वाले इवेंटों पर पैसे खर्च करता है।

ऐसे में हिमाचल की जनता के मन में सवाल उठना लाजिमी है कि जितनी बेताबी सरकार इस कार्यक्रम को करवाने के लिए दिखा रही है, उसमें प्रदेश का हित छिपा है या फिर इसे आयोजित करवाने के लिए बेताब लोगों का। खासकर इसमें भारी-भरकम रकम भी तो सरकारी खजाने से जा रही है।

(लेखक हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं, उनसे kalamkasipahi @ gmai.com पर संपर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

पुलिस भर्ती में धांधली: डीडब्ल्यू नेगी ने बढ़ा दी थी अभ्यर्थी की हाइट

शिमला।। हिमाचल प्रदेश पुलिस की छवि को और नुकसान पहुंचाने वाली एक खबर सामने आई है। वीरभद्र सरकार के चहेते और गुड़िया कांड के दौरान शिमला के एसपी रहे डीडब्ल्यू नेगी को पुलिस भर्ती में धांधली के मामले में विभागीय जांच में दोषी पाया गया है। इन दिनों नेगी गुड़िया केस में एक संदिग्ध की हिरासत में मौत के मामले में जेल में बंद हैं। वीरभद्र सरकार ने जिस समय नेगी को एसपी बनाया था, उस समय चर्चा थी कि वह शिमला के एसपी बनने वाले पहले एचपीएस अधिकारी हैं जबकि उनसे पहले के सभी एसपी आईपीएस थे।

क्या है मामला
कुछ अभ्यर्थियों ने शिकायत की थी कि पुलिस भर्ती में धांधली हुई थी। इसके बाद हाई कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया था और विभागीय जांच के आदेश दिए थे। उस समय राज्य के डीजीपी रहे सोमेश गोयल के नेतृत्व में बनी कमेटी ने जांच की थी। अब जांच रिपोर्ट में डीडब्ल्यू नेगी को दोषी पाया गया है। इसके साथ ही मेडिकल करने वाले डॉक्टर पर भी आरोप तय करने की सिफारिश कमेटी ने की है।

‘तीन इंच बढ़ा दी हाइट’
आरोप है कि पुलिस कॉन्स्टेबल भर्ती के दौरान एसपी डीडब्ल्यू नेगी ने एक अभ्यर्थी की ऊंचाई तीन इंच बढ़ाकर नोट की, जिससे वह भर्ती हो गया। इसपर एक अन्य युवक ने इस चयन को चुनौती दे दी थी। जांच में सामने आया है कि शिमला में होमगार्ड कोटे के इस युवक का कद कम था। मापे जाने पर युवक का कदम तय मापदंड से कम मिला। इस युवक के परफॉर्मा पर मेडिकल कर रहे डॉक्टर के भी हस्ताक्षर थे।

इस भर्ती में कुछ और युवकों का कद भी गलत मापने की जांच सामने आई है।

मंडी: झुग्गी वालों ने मंदिर के साथ बनाई पक्की ‘मज़ार’

मंडी।। मंडी शहर में जहां पर सुकेती खड्ड ब्यास नदी के साथ मिलती है, वहां पर पंचवक्त्र महादेव मंदिर है। सैकड़ों साल पुराने इस मंदिर के पास कुछ झुग्गियां नजर आती हैं। पहली बात तो यह है कि कहीं पर अवैध ढंग से किसी को बसाया नहीं जाना चाहिए और ऊपर से नदी के किनारे तो बिल्कुल नहीं। मगर प्रशासन की लापरवाही देखिए, यहां न सिर्फ झुग्गियां बनी हैं बल्कि उनके अंदर सीमेंट-ईंट से भी निर्माण हुआ है। और तो और, अब खबर आई है कि ऐतिहासिक मंदिर की दीवार के साथ अवैध ढंग से एक मज़ार नुमा ढांचा तैयार कर दिया गया है, जिसमें बाकायदा फर्श डाला गया है और ईंटों से चबूतरा सा बनाया गया है।

एनजीटी से स्पष्ट आदेश हैं कि नदियों के किनारे किसी तरह का निर्माण नहीं होना चाहिए मगर मंडी शहर में बेतरतीब निर्माण हुआ है। झुग्गियां तक बसाई गई हैं, जहां रहने वाले लोग शौच आदि के लिए सीधा ब्यास नदी जाते हैं। ये उसी जिले के मुख्यालय के हाल हैं, जिसे खुले में शौच मुक्त घोषित किया जा चुका है और जो सम्मानित हो चुका है। यही नहीं, जहां ये झुग्गियां हैं, वह फ्लड जोन है। बरसात में जब सुकेती और ब्यास दोनों उफनती हैं और आपस में मिलती हैं, पानी का प्रवाह इतना तेज होता है कि आपस में टकराकर पीछे हटता है। ऐसे में इन झुग्गियों के बह जाने का खतरा भी है, जिससे भारी नुकसान हो सकता है।

इन तमाम बातों के बावजूद प्रशासन आंख मूंदकर सोया हुआ है। अस्थायी बस्तियों की समस्या हिमाचल प्रदेश में की व्यापक समस्या बन गई है। बाहर से आने वाले मजदूर वर्ग के लोग जगह-जगह अस्थायी झुग्गियां बनाकर रहने लगते हैं और कई हिस्से तो ऐसे हैं कि वर्षों से वे वहीं बसे हुए हैं। बाहर से आकर हिमाचल प्रदेश में आकर काम करने में कोई बुराई नहीं मगर समस्या यह है कि इन लोगों की पहचान आदि के लिए प्रॉपर व्यवस्था नहीं है। कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, कोई हिसाब नहीं। कई बार अस्थायी झुग्गियों में रहने वालों को कुछ संदिग्ध गतिविधियों में भी लिप्त पाया गया है।

Image: MBM News Network

मंडी में पंचवक्त्र महादेव मंदिर पुरातत्व विभाग की निगरानी में है। हालांकि कुछ लोग मंदिर के किनारे बसे लोगों को यहां से हटाकर पार्क बनाने की मांग कर रहे हैं मगर मुद्दा यह है कि वहां पार्क भी क्यों बने। क्या नदियों के किनारे प्राकृतिक सौंदर्य को यथावत बनाकर नहीं रखा जाना चाहिए? क्या चट्टानों को प्राकृतिक स्वरूप में नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए? क्या नदी के किनारे पर बाहरी लोगों द्वारा आकर अतिक्रमण करने और स्थानीय लोगों द्वारा अतिक्रमण करने में फर्क है?

अक्सर देखा गया है कि प्रवासी मजदूर भले ही रोजगार कमाने के इरादे से हिमाचल आ रहे हों, वे खड्डों और नदी किनारे की सरकारी जमीन पर झुग्गियां बनाकर रहने लग जाते हैं। यहां उनकी पानी आदि की जरूरत तो पूरी होती ही है, कोई पूछने भी नहीं आता कि वे क्या कर रहे हैं क्या नहीं। उन्हें कोई टोकने वाला भी नहीं होता। इसका खामियाजा प्राकृतिक सौंदर्य और सरकारी योजनाओं को भुगतना पड़ता है।

टीकाकऱण आदि अभियान में ये यकीन नहीं रखते, बच्चों का वैक्सीनेशन नहीं करवाते और नतीजा ये रहता है कि इनके बच्चे संक्रामक बीमारियों के संवाहक बने रहते हैं। इससे पूरे सुरक्षा चक्र के टूटने का खतरा बना रहता है। बहरहाल, इस वक्त जरूरी है कि अस्थायी बस्तियों के संबंध में पॉलिसी बने, नदियों किनारे या कहीं पर भी बस गए लोगों की जांच की जाए और उन्हें हटाया जाए। और अगर जरूरी है तो सही जगह, नीति बनाकर योजनाबद्ध तरीके से उन्हें रिहाइश दी जाए।

शिमला-चंडीगढ़ हेली टैक्सी सेवा शुरू, 20 मिनट में होगी यात्रा

शिमला।। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और चंडीगढ़ के बीच हेली टैक्सी की शुरुआत हो गई है। आज सुबह मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने पहली उड़ान को रवाना किया। खास बात यह है कि मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर भी इस सेवा में इस्तेमाल किया जा रहा है।

किराया
अभी बस से चंडीगढ़ से शिमला आना हो तो काफी समय लगता है मगर इस सेवा से यह दूरी 20 मिनट में तय कर ली जाएगी। इसका किराया 2999 रुपये रखा गया है।

शेड्यूल
यह हेली टैक्सी सोमवार और शुक्रवार को चलेगी। प्रदेश को बेहतर कनेक्टिविटी देने, पर्यटकों को आकर्षित करने और लोगों को सुविधा देने के इरादे से शुरू की गई इस सेवा का बोझ प्रदेश के खजाने पर न पड़े, इसके लिए मुख्यमंत्री ने अपना हेलिकॉप्टर भी इस सर्विस में लगा दिया है।

सोमवार सुबह शिमला से चंडीगढ़ के लिए उड़ान भरता हेलिकॉप्टर
सोमवार सुबह शिमला से चंडीगढ़ के लिए उड़ान भरता हेलिकॉप्टर

18 सीटों वाली हेली टैक्सी शिमला के जुब्बड़हट्टी एयरपोर्ट से सुबह आठ बजे चंडीगढ़ के लिए उड़ान भरेगी और फिर चंडीगढ़ से जुब्बड़हट्टी के लिए सुबह नौ बजे उड़ान होगी।

यात्रियों को शिमला शहर से जुब्बड़हट्टी एयरपोर्ट तक हिमाचल प्रदेश के पर्यटन विकास निगम की बस ले जाएगी और इसके लिए प्रति सीट 200 रुपये अलग से देने होंगे। यह बस सुबह छह बजे लिफ्ट के पास मिलेगी।

ऐसे होगी बुकिंग
हेली टैक्सी के टिकट पवन हंस कंपनी की वेबसाइट, पर्यटन निगम कार्यालय शिमला और चंडीगढ़ व दिल्ली में स्थित हिमाचल भवन में करवाई जा सकेगी। इसके साथ ही जुब्बड़हट्टी व चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर भी एक-एक टिकट काउंटर खोले जाने की योजना है।

और जगह भी होगी शुरू
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने बजट पेश करते समय हेली टैक्सी योजना का जिक्र किया था और शिमला-चंडीगढ़ के बीच शुरू हुई यह सेवा उसी का पहला चरण है। बाद में यह योजना प्रदेश के दूसरे हिस्सों को आपस में जोड़ने के लिए भी शुरू होगी।

खोखला हो चुका है हिमाचल, कभी भी भरभराकर ढह सकता है

आई.एस. ठाकुर।।शिमला में पानी की कमी के कारण लोग परेशान हैं, इसके लिए जयराम सरकार दोषी है। कसौली में अवैध कब्जे हटाते कर्मचारियों की हत्या हो गई, जयराम सरकार दोषी है। सड़कों की खराब हालत के कारण हो रहे बस हादसों में लोग मर रहे हैं, जयराम सरकार दोषी है। तबादले हो रहे हैं, जयराम सरकार कर्मचारियों को परेशान कर रही है। सबसे बड़ी बात- जयराम ने पांच महीनों में ही हिमाचल को बर्बाद कर दिया है।”

ऊपर लिखी बातें आपको हिमाचल के कुछ लोगों से सुनाई पड़ जाएंगी या सोशल मीडिया पर दिख जाएंगी। मगर कोई ये नहीं पूछता शिमला में ऐसे हालात क्या पांच महीने में पैदा हो गए? कसौली में अवैध निर्माण किसके कार्यकाल में हुए थे? सड़कों में हादसे पांच महीने में ही हुए क्या? जयराम की सरकार आने से पहले किसी का तबादला नहीं हुआ? और सबसे बड़ा सवाल ये कि जयराम ने पांच महीनों में हिमाचल बर्बाद किया है या इसके पहले के 47 सालों (पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने से लेकर आज तक) में हुए काम का असली चेहरा हमारे सामने आया है?

मेरे ज़हन में ये सवाल एक घटना के बाद आए। कल मैंने अचानक ऐसी ही कुछ टिप्पणियां पढ़ने के बाद घर पर कहा कि जबसे जयराम ठाकुर की सरकार आई है, तबसे हिमाचल प्रदेश से नकारात्मक खबरें कुछ ज्यादा ही आ रही हैं। मानो सबकुछ कलैप्स हो (ढह) रहा हो। मेरा इतना कहना था कि मेरी बिटिया ने कहा- पापा, चलो मान लिया कि अभी ढह रहा है, मगर यह खोखला भी क्या अभी ही हुआ?

बेटी ये कहकर अपने काम में लग गई और मैं सोच में पड़ गया। बेटी की बात में दम तो था। कोई चीज़ ढहती तभी है जब वह खोखली हो। मगर हिमाचल क्या वाकई खोखला हो चुका है? क्या इसीलिए सब कुछ ढहता हुआ प्रतीत हो रहा है? और अगर यह वाकई खोखला हो चुका है इसे कमजोर करने में, इसे अंदर से खोखला करने के लिए जिम्मेदार कौन है?

देवभूमि के टैग की आड़ में छिपा सच
एक दौर था जब कहीं से जीन्स फट जाया करती थी, तब लोग रफू नहीं करवाते थे बल्कि किसी कंपनी के टैग वाला स्टिकर सिलवा देते थे। हिमाचल प्रदेश में भी ऐसा हुआ। सरकारों ने अपनी कमजोरियों, अक्षमताओं और नकारेपन के लूपहोल्स को भरने के लिए ‘देवभूमि’ का टैग लगाया। नतीजा ये रहा कि हम जिस भी क्षेत्र की बात करते, वहां ‘देवभूमि’ का टैग लगा मिलता। इस देवभूमि के टैग के नाम पर हिमाचल की जनता को उल्लू बनाया गया है क्योंकि आम हिमाचली दिल से मानता है कि हिमाचल देवभूमि है। मगर राजनेताओं और कुछ अक्षम अधिकारियों ने इसे एक टूल की तरह इस्तेमाल किया है।

 

उदाहरण के लिए पिछले दिनों एक पत्रकार मित्र ने बताया कि साल भर पहले बाहरी राज्य की पर्यटक के साथ स्थानीय व्यक्ति द्वारा कथित रूप से की गई छेड़छाड़ के मसले पर जब उसने एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से तीखे सवाल किए तो उसने ऑफ द रिकॉर्ड कहा- जाने दो न जनाब, खामखा देवभूमि बदनाम हो जाएगी। नतीजा यह रहा कि वह युवती अपनी शिकायत वापस लेकर चली गई। ठीक इसी तरह से अपने हर भाषण में पांच बार ‘देवभूमि हिमाचल’ का जिक्र करने वाले राजनेताओं ने प्रदेश का बेड़ा किस तरह गर्क किया है, वह बताने की जरूरत नहीं है। मगर फिर भी कुछ उदाहऱण आगे हैं।

शिमला में पानी का संकट क्यों?
अमूमन सभ्यताएं और शहर नदियों किनारे बसा करते थे। मगर शिमला को अंग्रेज़ों ने राजधानी के रूप चुना, जिसके आसपास कोई बड़ा प्राकृतिक जल स्रोत या जलधारा नहीं है। फिर बी उन्होंने इस जगह को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें लगता था कि यहां का मौसम काफी हद तक उनके यहां से मेल खाता है। इसके लिए उन्होंने यहां रकने के लिए लगभग 18000 लोगों की आबादी के हिसाब से पानी की व्यवस्था की और प्रॉजेक्ट लगाकर काफी दूर से पानी लाया।

मगर इसके बाद देश आजाद भी हो गया, हिमाचल केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद पूर्ण राज्य बन गया, पूर्ण राज्य बने 47 साल हो गए और इस शहर की पानी की व्यवस्था अभी भी बहुत हद तक अंग्रेज़ों द्वारा स्थापित परियोजना पर निर्भर है। फिर सवाल उठता है कि आखिर इन 47 सालों में बारी-बारी से आई बीजेपी और कांग्रेस की सरकारों ने क्या किया? ‘देवभूमि’ की राजधानी में अब लगभग ढाई लाख लोग रहते हैं। मगर कोई ऐसा सूरमा पैदा नहीं हुआ, जिसने ये सोचा हो कि आने वाले 50 सालों बाद क्या हालात होंगे।

दरअसल नेता विज़नरी होना चाहिए। प्रधान विज़नरी न हो तो चलेगा, सीएम की सोच ज़रूर दूरदर्शिता भरी होनी चाहिए। पांच बार मुख्यमंत्री बनना या तीन बार मुख्यमंत्री बनना बहादुरी का काम नहीं है। अगर आपके अंदर दूरदृष्टि नहीं है तो भले ही रिकॉर्ड बनाकर उसका बोर्ड गले में टांगकर घूमिए, आने वाले पीढ़ियां आपको एक औसत और सत्तालोभी नेता के तौर पर ही देखेगी, न कि दूरदर्शी नेता के तौर पर याद करेगी।

सोचिए शिमला में साल 2015 में गंदे पानी से पीलिया होने के कारण 32 लोग मर गए, मगर किसी पर कोई कार्रवाई नहीं। सिर्फ पानी खराब होने से 32 लोगों की जान चली गई। नंबरों पर मत जाइए, इन 32 में से आप खुद या आपका कोई अपना भी हो सकता था। और उस समय किसकी सरकार थी? और उस सरकार ने उस समय कोई योजना क्यों नहीं बनाई? अगर बनाई होती तो आज हालात अलग होते। और ये पिछली ही नहीं, उससे पिछली और उससे भी पिछली सरकारों का भी दोष है।

जंगलों को कटवाते रहे ये नेता
47 सालों की लापरवाही का हिसाब-किताब किया जाए तो नेताओं की नाकामी का एक और उदाहरण आजकल देखने को मिल रहा है। आज हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश पर शिमला में हज़ारों सेब के पेड़ काटे जा रहे हैं। हज़ारों….. जी हां, आपको लग रहा होगा कि हाई कोर्ट ने ये कैसा अजीब कदम उठा दिया, जब पेड़ लगाने की जरूरत है तो पेड़ कटवाए जा रहे हैं। दरअसल हाई कोर्ट का आदेश तमाचा है उन नेताओं के गाल पर, जो पिछले 47 सालों से आंखें मूंदकर बैठे रहे और बार-बार जीतते रहे। उनका इस इलाके में प्रभुत्व ही इसलिए बना रहा क्योंकि इन्होंने वन विभाग की आंखों पर पट्टी बांध दी ताकि उनके लोग देवदार के पेड़ काट लें, जंगलों को साफ कर दें, सरकारी जमीन कब्जा लें और कोई कुछ न देख सके।

शिमला का तापमान बढ़ा क्यों हैं? देवदार की कमी एक सेब का पेड़ पूरी कर सकता है क्या? अवैध कब्जे होते रहे, सेबों से लोग कमाई करते रहे, वे वन विभाग की आंखों पर पट्टी बांधने वाले अपने नेता को जिताते रहे और अब जब उनके अपराध पर हाई कोर्ट की नजर पड़ी, तब वे विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं। चिल्ला रहे हैं कि हाय, हम तो गरीब हैं, हमारे पेड़ काट दिए। आपके काहे के पेड़? जब पूरे देश और प्रदेश के लिए कानून एक है तो आपको अवैध कब्जे करने की छूट क्यों दी जाए?

आप शायद भूल गए होंगे कि पिछली वीरभद्र सरकार पांच बीघा तक के सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे नियमित करने के लिए कितनी बेताब थी। उससे पहले की सरकारों ने भी अवैध कब्जों को नियमित किया है। यही नहीं, शिमला में कितने ही अवैध भवनों को नियमित किया गया। किसने और क्यों किया? 47 सालों से ये खेल चल रहा है। शिमला के आसपास के पहाड़ नंगे यूं नहीं हो गए। रातोरात ये काम नहीं हुआ, बल्कि आज जनता के हितैषी बन रहे नेताओं ने जनता को मुफ्तखोरी और चोरी-चकारी की ये आदत डाली है। और तो और, तारा देवी के जंगल कट गए थे रातोरात और वन मंत्री ने कहा था- सिर्फ झाड़ियां कटी थीं। ऐसी हरकतों से हिमाचल खोखला नहीं होगा तो और क्या होगा?

सिस्टम की नाकामी का संक्रमण
कसौली में जिस होटल को गिराते समय गोली चली, उसे बनाने वाले को अवैध निर्माण की हिम्मत कहां से मिली थी? जब वह अवैध निर्माण कर रहा था, विभाग क्या कर रहा था? उसके जैसे हजारों लोगों ने ये काम इसलिए किया क्योंकि 47 सालों में यहां के नेताओं ने अवैध निर्माण को मुद्दा ही नहीं समझा। जब-जब कोर्ट कुछ करने लगता, सरकार में बैठे ये राजनेता नियम बदल देते और अवैध को वैध कर देते। इससे हर शख्स को लगता कि यार सही है, मुझे भी अवैध निर्माण कर लेना चाहिए, मुझे भी अवैध कब्जा कर लेना चाहिए, कल को रेग्युलर हो ही तो जाएगा।

यही कारण रहा कि अधिकारी भी ढीले पड़ गए। उन्हें लगता है कि कौन ऐसी-तैसी करवाए, क्यों कोई किसी का बुरा बने, कल को सरकार रेग्युलर तो कर ही देगी अवैध निर्माण या कब्जों को। यही सोच पेड़ काटने वालों, सरकारी जमीन पर सेंध लगाने वालों, नक्शे को नजरअंदाज़ कर कंस्ट्रक्शन करने वालों और हर कायदा कानून तोड़ने वालों की हिम्मत बढ़ाती रही है।

क्रशर और अवैध खनन कौन कर रहा है?
पिछले दिनों मौजूदा सरकार के एक कद्दावर नेता के बेटे के क्रशर पर अवैध खनन का आरोप लगा। हाल ही में एक पूर्व मंत्री के बेटे का कथित तौर पर अवैध रुप से चल रहा क्रशर बंद किया गया। ‘देवभूमि’ के विकास के लिए बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये नेता और इनके परिजन ही जब हिमाचल के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में लगे हुए हैं, क्या आप इनसे उम्मीद रख सकते हैं कि ये बाकी अवैध खनन करने वालों रोकेंगे या उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगे? अपने रिश्तेदारों के होटलों को सील होने से बचाने के लिए जब ये पूरा कानून बदल सकते हैं तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब अवैध कारोबारी मिलकर इन्हें ‘मनाते’ होंगे तब ये क्या करने को तैयार नहीं हो जाते होंगे।

हिमाचल की खड्डें और नदियां बर्बाद हो चुकी हैं। यह सही है कि हिमाचल विकासशील है और इसे कंस्ट्रक्शन के लिए रॉ मटीरियल चाहिए। मगर उसके लिए खनन का काम वैज्ञानिक ढंग और सीमित तरीके से क्यों नहीं हो सकता? लेकिन ऐसा तभी हो सकता है जब क्रशर आदि लगाने का उद्देश्य प्रदेश की और जनता की जरूरतें पूरी करना हो। जब क्रशर लगाने का उद्देश्य नोट छापना हो, अपनी जेबें भरना हो तो सारे नियम ताक पर रख ही दिए जाएंगे।

तबादला नीति क्यों नहीं बनी
अक्सर हल्ला मचलता है कि फ्लां सरकार तबादले कर रही है। विपक्षी जब खुद सत्ता में होते हैं, तब तबादले नहीं होते क्या? नेताओं और विधायकों के नोट पर बड़े-बड़े ईमानदार पुलिस अधिकारियों को इधर से उधर नहीं किया जाता क्या? अध्यापकों और डॉक्टरों को ट्रांसफर नहीं किया जाता? और क्या 47 सालों से यही काम नहीं हो रहा? अब तक आप खुद क्यों कोई स्थायी तबादला नीति नहीं बना पाए? बीजेपी और कांग्रेस दोनों इस सवाल से नहीं बच सकतीं क्योंकि वे दोनों बारी-बारी सत्ता में रही हैं।

कानून व्यवस्था की पतली हालत
आज से ठीक एक साल पहले जून महीने में मंडी में वनरक्षक होशियार सिंह का शव पेड़ पर लटका हुआ मिला। पुलिस ने पहले हत्या का मामला बनाया और फिर आत्महत्या का मामला बना दिया। फिर जांच केंद्र के डेप्युटेशन से लौटे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सौंपी गई और इससे पहले कि वह कुछ करते, उनसे जांच लेकर वापस सीआईडी को दे दी गई। सीआईडी कुछ नहीं कर पाई और फिर जांच हाई कोर्ट ने सीबीआई को सौंप दी। यह दिखाता है कि सरकारें किस तरह से पुलिस अधिकारियों को तंग करती हैं और एक तरह से जांच को प्रभावित करती हैं।

इसी तरह शिमला के गुड़िया केस को पुलिस ने शुरू में ही ऐसे बिगाड़कर कर रख दिया कि अब तक केस ट्रैक पर नहीं आया है। यह तो भगवान जाने या कोर्ट जाने की अब सीबीआई ने जिस चरानी को पकड़ा है, वह अकेला ही दोषी है या नहीं। मगर आज अगर सीबीआई की जांच पर भी सवाल उठ रहे हैं तो यह सीबीआई नहीं, बल्कि हिमाचल पुलिस की करतूतों के कारण उठ रहे हैं जिसने इस मामले में इतने झूठ, इतने खेल, इतनी साजिशें की कि आज कई पुलिस अधिकारी हत्या के आरोप में जेल में बंद हैं और जनता का पूरे महकमे से विश्वास उठ गया है।

इससे पता चलता है कि इन पुलिसवालों ने पहले न जाने कितने ही लोगों को बिना कसूर अंदर डाल दिया होगा और कितने ही मामलों को यूं ही रफा-दफा कर दिया होगा। यह भला हो सोशल मीडिया का जो गुड़िया केस में लोग जागरूक हुए, वरना पिछले मुख्यमंत्री तो उन पुलिस अधिकारियों की पीठ थपथपा चुके थे, जिन्होंने सीबीआई जांच में अभी तक निर्दोष पाए गए नेपालियों और कुछ अन्य लोगों को जेल में ठोक दिया था। इससे पता चलता है कि पहले की सरकारें और उनके मुखिया कितने नकारे थे कि उनके नीचे आने वाली पुलिस कुछ भी सच-झूठ बोलती थी और वे उसे मान लेते थे।

सोचिए, ऐसा खेल कबसे चल रहा होगा और संभव है कि आज भी चल रहा हो। अगर आज पुलिस महकमा जनता का विश्वास खो चुका है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? प्रदेश पर अब तक बारी-बारी राज करने वाली पार्टियां और नेता क्या जिम्मेदारी लेंगे? अधिकतर केस पुलिस ऐसे ही हवा में सॉल्व कर देने का दावा करती है। थोड़ा सा केस पेचीदा हुआ तो उसकी हवा निकल जाती है। उसे वैज्ञानिक सबूतों को जुटाने और उनके आधार पर इंटरप्रेटेशन करने का रत्ती भर अनुभव नहीं है। यही गुड़िया और होशियार सिंह जैसे केसों में देखने को मिला। मगर क्या किसी ने पुलिस का स्तर सुधारने के लिए वाकई प्रयास किए?

शिक्षा और स्वास्थ्य पर कोई नीति नहीं
हिमाचल प्रदेश साक्षरता में बेशक शानदार काम कर रहा है। मगर शिक्षा में नहीं। साक्षरता- यानी अक्षरों का ज्ञान। पढ़ना-लिखना आ जाना। मगर शिक्षा के मायने बौद्धिक विकास से हैं, ज्ञान प्राप्ति से हैं। शिक्षा तो तभी मिलेगी जब क्वॉलिटी होगी। मगर अब तक हर सरकार का ध्यान आंख मूंदकर घोषणाएं करना हैं। फ्लाणे गांव के चमचे टौंकू राम ने माग की कि गांव के प्राइमरी स्कूल को मिडल स्कूल बनाया जाए और नेता जी ने भाषण में महाराजा की तरह ऐलान कर दिया-  तथास्तु।

नए स्कूलों की स्थापना, कॉलेजों की स्थापना, शिक्षण संस्थानों का अपग्रेडेशन आंख मूंदकर किया गया। यह नहीं देखा गया कि कहां जरूरत है, कहां कितने छात्र हैं, क्या बनना चाहिए। कहीं खड्डों के पास कॉलेज खोल दिए, कहीं जंगलों में स्कूल खोल दिए तो कहीं भांग से पटी घासनियों के पास आईआईटी जैसे संस्थान की स्थापना कर दी गई।स्कूल खोले गए, कॉलेज खोले गए मगर टीचिंग स्टाफ की भर्तियां नहीं की गईं।

स्कूलों का बेड़ा गर्क
मान लीजिए एक स्कूल में 30-30 छात्रों वाली 5 क्लासें हैं। हर क्लास के 6 सब्जेक्ट हैं और स्कूल में 6 मास्टर हैं। अब होता ऐसा है कि पास में ही एक और स्कूल खोल दिया जाता है और पुराने स्कूल से आधे बच्चे उस नए स्कूल में चले जाते हैं। टीचर भी तीन-तीन बांट दिए जाते हैं। और अब क्या है कि एक वक्त में तीन टीचर तीन ही क्लास ले सकते हैं। बाकी की दो क्लासों के छात्र उस समय लुड्डी डाल रही होते हैं। फिर रिजल्ट खराब होता है तो भी मास्टर दोषी माने जाते हैं।

फिर रिजल्ट खराब होने पर माता-पिता बच्चों को प्राइवेट या दूसरे स्कूल ले जाते हैं और नए स्कूल या फिर पुराने वाले में छात्रों की संख्या कम हो जाती है और दो-तीन साल में वो दोनों स्कूल बंद होने की कगार पर पहुंच जाते हैं। अजी ऐसी ही घोषणाएं तो हुई हैं। मंचों से ऐलान करके तालियां बटोरने वालों से हिसाब लिया जाना चाहिए कि इतने स्कूल बंद क्यों हो गए हैं।

अस्पताल खुद बीमार, लगी है ‘धारा 144’
एम्स तो भगवान जाने कब बनेगा मगर आईजीएमसी और टांडा मेडिकल कॉलेज, ये वो अस्पताल हैं जो छोटी-मोटी बीमारियां देख सकते हैं और यहां डॉक्टर भी मिल जाते हैं। लेकिन गंभीर बीमारी हो गई तो पीजीआई से इधर आपको इलाज नहीं मिलेगा। और इन दो बड़े अस्पतालों में भी प्रेशर इसलिए है क्योंकि जोनल और सिविल अस्पतालों में कई-कई पद खाली हैं। कम्यूनिटी और प्राइमरी हेल्थ सेंटरों की तो बात ही न की जाए तो बेहतर है।

और ये आज ही नहीं, जबसे मैंने होश संभाला है, तभी की समस्या है। हिमाचल के हर अस्तापल में धारा 144 लगी हुई है। आपको कभी भी चार डॉक्टर एकसाथ ड्यूटी पर नहीं मिलेंगे। बाकी स्टाफ की भी कमी है। ये अस्पताल भी ऐसे हैं कि दवाइयां मिलने में भी दिक्कत हो जाए। ये सिर्फ रेफरल सेंटर हैं।

बड़ी-बड़ी बातें करने वाले स्वास्थ्य मंत्री रहे और कई-कई बार हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे नेताओं से पूछा जाना चाहिए कि आपने क्या प्लान बनाया इस इस समस्या को स्थायी तौर पर दूर करने के लिए।

टूरिजम सेक्टर का बंटाधार
हिमाचल की आय का बड़ा स्रोत है पर्यटन। बड़े-बड़े दावे करने वाले नेताओं से पूछा जाए कि आप इतने साल सत्ता में रहे, आपने कौन सा ऐसा प्लान बनाया टूरिज़म के लिए जिसने रोजगार के अवसर और पर्यटकों की सुविधाएं बढ़ाई हों।

हिमाचल की तो मिट्टी भी बिक जाए। मगर यहां के शिल्प, यहां के घेरलू उद्योगों और हस्तकला आदि को लेकर जमीन पर कुछ नहीं हुआ। पर्यटन के लिए नई जगहें विकसित नहीं की गईं और पुरानी जगहों को ढंग से डिवेलप नहीं किया गया। शिमला, मनाली, धर्मशाला में जाम की हालत देखिए आप, पार्किंग तक की जगह नहीं है।

ये तो कुदरत की देन है जो टूरिस्ट खुद हिमाचल चले आते हैं। ऊपर से कश्मीर में हालात खराब न हों तो कोई हिमाचल न आए। लोग सीधे श्रीनगर पहुंचें। उसी तरह जैसे वे लेह-लद्दाख जाते हैं।

बातें और भी हैं। हर सेक्टर का यही हाल है। जहां भी आप देखें, यही मिलेगा। शहरों में कूड़े के निपटारे की व्यवस्था नहीं है। गांवों में पानी नहीं है और जो है, वह गंदा पानी है। अनट्रीटेड वॉटर। आवारा पशुओं की समस्या से निपटने की स्थायी योजना नहीं है। किसानों और बागवानों को को प्रोत्साहित नहीं किया गया। हिमाचली कई सालों से रो रहे हैं कि बंदरों और सुअरों से बचाओ मगर कोई ठोस कदम किसी ने नहीं उठाए। जंगलों में आग लगती है हर साल मगर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई आग लगाने वालों के खिलाफ नहीं हो पाती। चीड़ के जंगलों को क्रमबद्ध तरीके से हटाकर ईको फ्रेंडली पौध लगाने का कोई प्लान नहीं। बस वादे करो, बातें करो, भाषण दो और चुनाव लड़ो।

खोखला हो चुका है हिमाचल
यही कारण हैं कि हिमाचल बाहर से तो शांत दिखता है, मगर अंदर से खोखला हो चुका है, यहां के नकारा और करप्ट सिस्टम के कारण। हमें लगता है कि हिमाचल बहुत शांत है, सब प्रदेशों से अलग है। मगर हमें ऐसा इसलिए लगता है कि हम इसकी तरफ देखते हैं तो देवभूमि का टैग नजर आता है। अगर हम इस टैग को हटाएंगे तो देखेंगे कि हमारी देवभूमि को इन दीमकों ने साल दर साल खोखला कर दिया है। यह किसी भी दिन गिरकर जमीन में मिल जाएगी। और इसका ढहना भी शुरू हो चुका है। संयोग है कि जयराम सरकार के आने पर इसकी कलई खुली है।

हर विभाग में कुछ करप्ट लोग बैठे हैं। मगर जिन ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों के दम पर हिमाचल अभी भी टिका हुआ है, उनके कंधों का बोझ कम करने की ज़रूरत है। और यह जिम्मेदारी हम सभी को निभानी होगी। हमें देखना होगा कि कौन हैं वे साजिशकर्ता, जो खुद हमारे प्रदेश को पहले खोखला कर चुके हैं और अब उनकी टांग खींचने मे लगे हैं जो आज इसे भरभरा कर बिखरने से रोकने में जुटे हुए हैं।

नए सीएम की जिम्मेदारी कम नहीं होती
हिमाचल के लोग अपने प्रदेश की तुलना अक्सर यूपी-बिहार से करते हैं और खुश होते हैं कि अपना हिमाचल बेस्ट है। मगर तुलना बेहतर जगहों से होनी चाहिए। हो सकता है हम अपने देश में कई मामलों में बेस्ट हों। मगर अब भी हम सर्वश्रेष्ठ नहीं हैं। हमारी प्रतियोगिता अपने से कमजोर लोगों से नहीं, अपने से मजबूत लोगों से होनी चाहिए। हम अगर हिमाचल को स्विट्जरलैंड कहते हैं तो ऐसा मान लेने से नहीं हो जाएगा। उसके लिए प्रयास करने पड़ेंगे।

सबसे बड़ी जिम्मेदारी नए मुख्मंयत्री जयराम ठाकुर के ऊपर है। अगर मैं यह कह रहा हूं कि हिमाचल की दशा-दिशा खराब करने के लिए पहले के राजनेता और तंत्र जिम्मेदार है तो इससे जयराम ठाकुर और उनकी सरकार की जिम्मेदारियां कम नहीं हो जातीं। पिछले पांच महीनों में मैंने देखा है कि जयराम सरकार कैसे काम कर रही है। संतुलन बनाकर, कदम-कदम नापकर, मानो सबको खुश करने की कोशिश की कोशिश की जा रही है। मगर ऐसे चलेंगे तो हिमाचल कभी भी वह रफ्तार नहीं पकड़ पाएगा जो उसे पकड़नी चाहिए।

हिमाचल का पुर्ननिर्माण करने वाला सीएम चाहिए
हिमाचल अब तक जो मुख्यमंत्री देख चुका है, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि सही मायनों में अगर हिमाचल को आगे बढ़ाना है तो इमेज कॉन्शस यानी अपनी छवि की चिंता करने वाला मुख्यमंत्री नहीं, बेबाक फैसले करने वाला दमदार मुख्यमंत्री चाहिए। हिमाचल को सरकार रिपीट करवाने के लिए चिंता करने वाला सीएम नहीं, अपने काम से पिछली सरकारों के काम को बौना साबित करने वाला सीएम चाहिए। नकारा अधिकारियों के सुझाव लेने वाला नहीं, काबिल अधिकारियों को निर्देश देने वाला सीएम चाहिए।

सिर्फ ईमानदारी से काम नहीं चलेगा, रौबदार सीएम चाहिए जिसके आगे निकम्मे और निठल्ले राजनेता और अधिकारी थर-थर कांपें। हिमाचल को चाहिए सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन यू जैसा नेता, जो कठोर से कठोर फैसले लेने का दम रखे। तभी कम आबादी वाला हिमाचल सिंगापुर की तरह कमाल कर पाएगा।

अगर जयराम ठाकुर इन पैमानों पर खरे उतर पाते हैं तो उनकी छवि खुद ब खुद बेहतर बनी रहेगी और सरकार रिपीट करवाने की भी चिंता उन्हें नहीं करनी होगी। हिमाचल प्रदेश की जनता परिपक्व है। इसीलिए उसने इस बार स्पष्ट राजनीतिक संदेश देकर उन लोगों को खारिज कर दिया, जिनके शासन से वह ऊब चुकी थी। अब अगर मौका मिला है तो मुख्यमंत्री को इस मौके को भुनाना चाहिए। जयराम के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, पाने के लिए बहुत कुछ। वह प्रदेश के हर हिस्से की जनता का प्रेम तभी हासिल कर पाएंगे, जब वह हिमाचल के पुनर्निर्माण के लिए किसी बात की चिंता किए बगैर जुट जाएंगे।

किसी की मजाल नहीं होगी जो जनहित में कठोर फैसले लेने वाले सीएम को कुछ कहे। न पार्टी, न आलाकमान और न कोई और नेता। इतिहास सबको संतुष्ट करने वालों को याद नहीं रखता। इतिहास याद रखता है उन लोगों को जो कड़े फैसले लेने का दम रखते हों। जिन्हें सही रास्ते पर चलते हुए किसी के नाराज हो जाने की परवाह न हो। जिन्हें न पद का मोह हो, न कद का। जो अपने लक्ष्य के समर्पित हों। जिनके लिए सत्ता जनता के लिए कुछ करने का माध्यम हो। और आज हिमाचल प्रदेश नए मुख्यमंत्री की ओर देख रहा है। वह उम्मीद कर रहा है कि शायद अब कुछ बदले।

इससे पहले कि हिमाचल ढह जाए,  मुख्यमंत्री को इसका पुनर्निर्माण करना होगा। मुख्यमंत्री को कानून-व्यवस्था, पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रकृति, पर्यटन, पानी, यातायात… हर क्षेत्र के सुधार के लिए कदम उठाने होंगे। हर बड़े बदलाव की मॉनिटरिंग खुद करनी होगी। अपनी सरकार या पार्टी से जुड़े लोग अगर कुछ गलत करेंगे तो उन्हें बचाने के बजाय सबसे पहले उनके ऊपर कड़ी कार्रवाई करके उदाहरण पेश करना होगा। साथ ही उन्हें पहले की सरकारों की कमियों से हुए नुकसान की भरपाई करनी होगी। समय लगेगा, मगर यह असंभव नहीं है। देखना होगा कि मुख्यमंत्री के अंदर कितनी इच्छाशक्ति है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं, उनसे kalamkasipahi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

शिमला के ठियोग में HRTC बस खाई में गिरी, 8 की मौत

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के ठियोग में एचआरटीसी की एक बस खाई में गिरने से 8 लोगों की मौत हो गई है जबकि 20 लोग जख्मी हो गए हैं। यह हादसा ठियोग-छैला सड़क पर हुआ जब गजेड़ी के पास एचआरटीसी की बस एक गहरी खाई में जा गिरी।

अभी तक प्राप्त जानकारी के अनुसार यह हादसा सुबह आठ बजे हुआ। इस बस पर 28 लोग सवार थे। हादसे के कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है।

शवों को निकालने और घायलों को अस्पताल पहुंचाने का काम लगभग पूरा हो चुका है। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि आखिर हादसा हुआ कैसे।

आशंका जताई जा रही है कि घायलों में कुछ की स्थिति गंभीर है, ऐसे में मरने वालों की संख्या बढ़ सकती है।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने फेसबुक पोस्ट के जरिए अब तक 8 लोगों की मौत और 20 के घायल होने की पुष्टि की है। संवेदना प्रकट करते हुए उन्होंने लिखा है कि प्रशासन प्रभावितों की हर संभव मदद कर रहा है।

जल संकट पर ‘स्वर्ग से एक चिट्ठी डॉक्टर वाई.एस. परमार की’

मुक्तकंठ कश्यप।। स्वर्ग से एक चिट्ठी डॉ. वाईएस परमार की
………………………………….
अज़ीज़ मुक्तकंठ!
खुश रहो, शादाब रहो!!
खुशी हुई कि तुम फेसबुक पर आ गए
पानी तुम्हें पुलिस के पहरे में मिल रहा है
ऐसे में सुरक्षित ठिकाना फेसबुक ही था
हमारे यहां खाची जी चलाते हैं फेसबुक
उन्होंने बताया कि
जब से नई सरकार चल रही है
गोलियां तो चलीं कसौली, बद्दी में
वाट्सएप भी खूब चले इन मुद्दों पर
बस नल नहीं चल रहे।

ठाकुर जगदेव आये थे परसों
कहने लगे, जयराम से कहें
पानी वाले शांता से करें सलाह
ऐसे न सुने लोगों की आह
शान्ते ने ही पानी का पैसा दिलाया था
यह शिमले का पानी-पानी होना नहीं
पर्यटन प्रदेश पर पानी फिरना है
सेनानी रहे हमारे दोस्त पंडित पद्म देव ने कहा
ये अजीब हालात हैं
या तो तबाह करती है
पूरी की पूरी परछू सतलुज के ज़रिए
या फिर पानी एक बूंद नहीं

और वो मान चंद राणा बेचारा शरीफ है
साफ बात बोलता है
कहने लगा
शांता क्या कर लेंगे अब
सुलह में सूख चुका है पानी
गंगोत्री के हैंडपम्प लाल ज़ंग उगलते हैं
जैसे पृथ्वी खून उगल रही हो
ठाकुर राम लाल कहने लगे
मैं जब सीएम बना तो इतनी कहाँ थी समस्या
पृथ्वी को लूटा है तुम सबने मिल कर
सब सही कहते हैं
चीफ सेक्रेटरी
प्रिंसिपल सेक्रेटरी
चीफ इंजीनियर
एक्सईन
एसडीओ
जेई
लाइनमैन
फिटर
इसके नीचे भी अगर कोई है
तो वो भी सही ही कहता है
सरकारी आदमी क्यों झूठ बोलेगा?

जगदेव फिर कूदे
यार सच झूठ की बात नहीं
धूमल कहाँ खातरियाँ बचा पाए?
मैं पूछता हूँ
किसकी नालायकी है यह
पांच दरिया भी नहीं बुझा पाते प्यास तुम्हारी
और बुझा लेता है कानपुर जो
जनसंख्या में हिमाचल से भी बड़ा है
ये जो टुल्लू पम्प हैं
ये धरती को यातना के औजार हैं
ठीक वैसे जैसे चीनी औजार
तिबतियों की पसलियों में सुराख करने वाले।
हिमाचल में पानी की कमी कब रही
इतने राज्य अतिथि
इतने बड़े लोग
कार्यकर्ता मंडलाध्यक्ष को
मंडलाध्यक्ष जिला अध्यक्ष को
जिला अध्यक्ष प्रदेशाध्यक्ष को
प्रदेशाध्यक्ष सरकार को
मेट जेई को
जेई एसडीओ को
एसडीओ एक्सीयन को
और वो ऊपर से ऊपर से ऊपर देते रहे पानी
दरअसल पानी को ऊपर से चलना था
तभी ज़मीन में नमी होती
मोहज्ज्ब शहर में इंसानियत
नल की टोंटी से लटक गई
बर्बरता उग आई इतनी
कि पुलिस बांट रही है पानी
यही तो काम है पुलिस का
पानी इस तरह देना कि
सब ठंडे रहें।!

बात सुन मुक्तकंठ यरा!
जयराम भुगत रहा है पहले वालों का किया धरा
अब झेलना तो उसी को है
पर मैं ऐसा शिमला छोड़ कर नहीं आया था
शिमला के पास खूब पानी था
शिमला की कुर्सियों पर बैठने वालों
की आंख में भी बहुत पानी था।
कुंज बिहारी बुटेल और
कांगड़े के दूसरे नेताओं ने बुलाया एक बार
वहां पहुंचते पहुंचते कितने ही मिले प्याऊ
एह सीरां दा भरोह
एह पक्का भरोह
एह रानिया दा भरोह
बताना अब कितने भरोह
जानता हूँ, आलसी हो तुम
पर मुझे चिठ्ठी लिखना
राजनीति में रहते मैंने बहुत स्वमार की है
अपनी खाहिशों को समेटा है बहुत
इसीलिए अब तक परमार हूं
पानी पानी होता हूँ पानी के ज़िक्र पर
बताना, शिमले को पानी मिला या नहीं
आते हुए राजगढ़ के फल ले आना।
जय राम को प्यार देना
चला लेगा सब, वक्त दो उसे!
कविये मिलें अगर तो उन्हें समझाना
अब छोड़ दें गाना
‘सांडू रे मदाना,
झीला रे कनारे
रावी चलदी चाली देहई
ब्यासा रे कन्ढे
पहले पानी बचा लो
फिर उसके गीत गाना!
तुम्हारा ही
डॉ. यशवंत सिंह परमार।

(लेखक हिमाचल प्रदेश के सोशल मीडिया सर्कल पर चर्चित हस्ती हैं। साहित्य पर पैनी नज़र रखते हैं और जनहित के मुद्दों पर भी टिप्पणियां करते हैं।)