शिमला।। हिमाचल प्रदेश परिवहन निगम ने 300 ड्राइवरों की भर्ती की तैयारी शुरू कर दी है। इसी साल अक्तूबर तक एचआरटीसी में नए ड्राइवर रखे जाने हैं। यह भर्ती राज्य कर्मचारी चयन आयोग हमीरपुर के माध्यम से होगी।
हिमाचल प्रदेश सरकार ने एचआरटीसी को कहा है कि इसी महीने सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएं। हाल में कंडक्टर भर्ती के परिणाम निकले थे जिसके बाद एचआरटीसी ने ड्राइवर रखने का फैसला किया था।
इस समय 500 चालकों की कमी बताई जा रही है। एचआरटीसी के पास इस समय 3400 के लगभग बसे हैं मगर ड्राइवर 3500 ही हैं। इस कारण ड्राइवरों को ओवरटाइम करना पड़ रहा है।
इन बसों को नियमित रूप से चलाने के लिए 500 और ड्राइवर चाहिए होंगे मगर फिलहाल 300 की भर्ती करने की तैयारी की जा रही है। इस मामले को अगली कैबिनेट में पेश किया जाएगा।
एमबीएम न्यूज नेटवर्क, मंडी।। 23 दिनों से बंद मंडी-पठानकोट नेशनल हाईवे बहाल हो गया है। यह पिछले साल कोटरोपी में हुए भूस्खलन वाली जगह पर फिर से भूमि का कटाव होने के कारण बंद हो गया था।
इस रास्ते के बंद होने के बाद वैकल्पिक तौर पर दो संपर्क मार्गों से सारा ट्रैफिक भेजा जा रहा था मगर इससे समस्या हो रही थी। सेना को भी रसद आदि भेजने में असुविधा हो रही थी।
अब नया ट्रेस निकालकर अस्थायी सड़क बनाई गई है। रविवार शाम पांच बजे के करीब सड़क बहाल हुई। इस दौरान सांसद रामस्वरूप शर्मा और अन्य प्रशासनिक अधिकारी मौजूद थे।
अब ज्यादा बारिश होने या किसी तरह का खतरा नजर आने पर इस सड़क को यातायात के लिए बंद किया जाएगा, बाकी समय यहां गाड़ियां आती-जाती रहेंगी।
पिछले साल 12 व 13 अगस्त की रात को कोटरोपी में हिमाचल के इतिहास का सबसे बड़ा भूस्खलन हुआ था। पहाड़ी का एक बहुत बड़ा हिस्सा दरक गया था। पहाड़ी से गिरे मलबे की चपेट में एचआरटीसी की दो बसें आई। जिस कारण 48 लोगों की मौत हो गई थी।
प्रशासन का कहना है कि इस सड़क का स्थायी समाधान बरसात के बाद निकाला जाएगा।
(यह एमबीएम न्यूज नेटवर्क का समाचार है, सिंडिकेशन के तहत प्रकाशित किया गया है)
शिमला।। भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अस्थियां हिमाचल प्रदेश की नदियों में भी विसर्जित की जाएंगी।
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष सतपाल सत्ती ने बीजेपी कार्यालय दीपकमल में बताया कि दिल्ली से अस्थि कलश लाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इन अस्थियों को ब्यास, सतलुज, चिनाब और रावी आदि नदियों में विसर्जित किया जाएगा।
भारतीय जनता पार्टी 22 अगस्त को शिमला में प्रदेश स्तरीय शोक सभा का आयोजित करेगी। इस शोक सभा में सभी हिस्सा ले सकते हैं।
शिमला।। बाढ़ से जूझ रहे केरल की मदद के लिए हिमाचल प्रदेश ने भी हाथ बढ़ाया है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने केरल सरकार को 5 करोड़ रुपये की सहायता देने का ऐलान किया है।
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा कि बाढ़ की वजह से केरल में स्थिति काफी नाजुक है और मुसीबत की इस घड़ी में हिमाचल समेत सारा देश केरल के साथ खड़ा है।
केरल में हालात में थोड़ा सुधार हुआ है।
मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई है कि जल्द ही केरल इन हालात से उबर जाएगा।
इन हिमाचल डेस्क।। केरल में बारिश के कारण भारी तबाही मची है। बारिश कम होने से हालत सुधरी जरूर है मगर अब बीमारियों का खतरा पैदा हो गया है। इस समय बीस लाख लोग राहत कैंपों में ठहरे हुए हैं। वे सभी खतरे में हैं।
8 अगस्त से लगातार तेज बारिश के कारण केरल में बाढ़ का कहर देखने को मिल रहा है। बहुत से लोगों की जान भूस्खलन के कारण गिरी है। केरल हेल्थ डिपार्टमेंट में डिजास्टर मैनेजमेंट का कहना है कि चिकनपॉक्स से जूझ रहे कुछ लोगों को शिविर से अलग किया गया है।
विभाग के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग प्रदूषित जल और वायु से पैदा होने वाली बीमारियों के खतरे से निपटने की तैयारी कर रहा है।
इन हिमाचल डेस्क।। ‘कंगन’ और ‘साएं-साएं मत कर राविए’ जैसे गानों से हिमाचल प्रदेश के संगीत प्रेमियों के बीच पहचान बना चुकीं ऋचा शर्मा ने नया गाना जारी किया है। यह गाना अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा की असली प्रेम कहानी पर आधारित है।
‘सिपाहिया’ नाम से जारी इस गाने पर उस अमर प्रेम को सलाम किया गया है, जिसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती। ऐसा प्रेम जो आज भी बना हुआ है।
डॉ. आशीष नड्डा।। आज नया बिलासपुर शहर बसे 57 साल हो गए। पुराना बिलासपुर शहर भाखड़ा बांध के कारण डूब गया था। बुंदेलखंड (चँदेरी, मध्य प्रदेश) से आए चंद्रवंशी राजा वीर चंद चंदेल ने सतलुज नदी की घाटियों में रहने वाले ठाकुरों को हराकर 700 ई में केहलूर वर्तमान बिलासपुर रियासत की स्थापना की थी।
सतधार केहलूर से विख्यात इस रियासत की प्राचीन राजधानी स्वारघाट के पास कोट नामक स्थान पर थी। इस रियासत की सीमाएं पंजाब के वर्तमान रोपड़ जिला से लेकर सुकेत, बाघल एवं काँगड़ा रियासत के साथ लगती थी। सतधार शब्द का उद्गम रियासत में पड़ने वाली सात पहाड़ियों जिन्हे लोकल भाषा में धार कहा जाता है, से था। त्यूंण, स्यूंण, कोट, नैना देवी, चैंझयार, बहादरपुर और बंदला- ये सात धारें इसी रियासत में थीं।
कालान्तर में विभिन्न शासकों ने इन धारों (पहाड़ियों) पर किलों का निर्माण करवाया, जिनके खंडहर आज भी देखे जा सकते हैं। बछरेटू बहादरपुर के किले इनमे प्रमुख हैं। केहलूर के राजा नैना देवी को कूलज्या के रूप में पूजते थे। राजा वीर चंद चंदेल ने ही नैना देवी के मंदिर का निर्माण करवाया था।
रंगमहल (Image: indianrajputs.com)
1663 में केहलूर रियासत की राजधानी सतलुज घाटी के किनारे व्यासपुर नामक स्थान पर ले आई गई। व्यासपुर का नाम महर्षि व्यास के नाम पर पड़ा था। कहा जाता है की कालान्तर में महाऋषि व्यास ने यहाँ सतलुज नदी के किनारे तपस्या की थी। व्यासपुर ही बाद में बिलासपुर के नाम से जाना जाने लगा।
सतलुज नदी के किनारे बसी यह रियासत पहाड़ी रियासतों में इकलोती ऐसी रियासत थी जो पहाड़ी किलों के स्थान पर एक मैदान पर बसी हुयी थी। बंदला एवं बडोल देवी की पहाड़ियों के बीच से बहती सतलुज घाटी के किनारे बसी यह रियासत अपने वैभव के लिए प्रसिद्ध थी। सांडू मैदान प्रदेश का सबसे बड़ा मैदान था। रंगनाथ, भूतनाथ के मंदिर राजा का महल इस ऐतिहासिक रियासत की धरोहरें थीं।
आज भी पानी घटने पर मंदिरों के अवशेष नज़र आने लगते हैं। (Image: indianrajputs.com)
1932 मे अंग्रेजो द्वारा बिलासपुर को भी ‘पंजाब स्टेट एजेंसी’ के अन्तर्गत डाल दिया गया। 1936 में पंजाब की हिल्स स्टेट के लिए जब अलग से पंजाब हिल्स स्टेट एजेंसी का गठन हुआ तो बिलासपुर भी उसका हिस्सा बना। राजा आनंद चन्द चंदेल केहलूर रियासत के अंतिम राजा रहे। 1948 में बिलासपुर रियासत भारतीय गणराज्य का हिस्सा बनी एवं बिलासपुर को “ग” श्रेणी के राज्य का दर्जा दिया गया। जुलाई 1954 में बिलासपुर को हिमाचल प्रदेश के पांचवें जिले के रूप में शमिल किया गया।
1954 में भाखड़ा बाँध के निर्माण से बनी गोविन्द सागर झील में पुराना बिलासपुर शहर डूब गया। इसी के साथ इस रियासत का सम्पूर्व वैभव भी सतलुज नदी की लहरों में लील गया शहर के साथ बिलासपुर के सैंकड़ों गावं भी डूब गए। बांध का उद्घाटन करने आये तात्कालिक प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के सामने जब लोगों ने ऐतिहासिक मंदिरों के डूबने की बात कही तो नेहरू जी ने कहा था, “भाखड़ा जैसे बाँध ही अब आधुनिक भारत के मंदिर हैं।”
बांध के पानी में डूबता हुआ महल (Image: indianrajputs.com)
नजदीकी पहाड़ी पर नए बिलासपुर को बसाया गया। नया बिलासपुर भारत का पहला प्लानिंग के साथ बना पहाड़ी शहर है।
लेखक परिचय: डॉ. आशीष नड्डा हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर के रहने वाले हैं, वर्तमान में वर्ल्ड बैंक में सोलर एनर्जी कंसल्टेंट हैं।
(मूलत: यह लेख Oct 3, 2015 को प्रकाशित हुआ था, इसे दोबारा शेयर किया जा रहा है।)
हिमाचल प्रदेश में कई पावर प्रॉजेक्ट लगे हैं और उनसे पैदा हो रही बिजली का पूरा देश फायदा उठा रहा है। मगर बांधों के कारण बहुत से लोगों को जमीन से विस्थापित होना पड़ा है। ऐसा ही किस्सा है बिलासपुर का। आज नए बिलासपुर शहर को बसे 57 साल हो गए हैं। पुराना बिलासपुर और आसपास के कई गांव भाखड़ा बांध से बनी गोविंद सागर झील में समा गए थे।
पिछले साल जिस वक्त प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गुजरात के सरदार सरोवर बांध का लोकार्पण किया गया, इस बांध के पानी में डूबने वाले गांवों के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। अपनी घर, जमीन, खेत… या यूं कहिए कि अपनी दुनिया को छोड़कर कहीं और बस जाना आसान नहीं होता। करोड़ों का मुआवाज़ा भी इस दर्द को नहीं भर सकता।
हिमाचल में कई बांधों के विस्थापितों का जीवन आज भी पटरी पर नहीं लौट पाया है। In Himachal को भाखड़ा बांध के विस्थापन का दर्द झेल रहे अविनाश ठाकुर नाम के युवक ने चिट्ठी भेजी थी, जिसके अंश हम नीचे दे रहे हैं। इस चिट्ठी को प्रकाशित करते वक्त हम भी भावुक हो गए। आप भी पढ़ें, कितना दर्द है उनकी बातों में:
“9 अगस्त 1961 को जब भाखड़ा बांध में पानी भरना शुरू हुआ और विशाल गोबिंद सागर झील बनी, पूरे बिलासपुर की आंखों में आंसू थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस प्रॉजेक्ट को आधुनिक भारत का मंदिर करार दिया था। मगर दूसरी तरफ लोग दुखी थे, जिन्होंने अपना घर, खेत, मंदिर, मैदान.. सबकुछ डूबते हुए देखा।
लोग खुद को दिलासा दे रहे थे और जुबान पर शब्द थे- चल वो जिंदे नवी दुनिया बसाणी, डुबी गए घर आई गेया पाणी। सब अपना सामान उठाकर नए आशियाने की तलाश में निकल गए। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विस्थापित लोगों को बसाने और सभी सुविधाएं देने का विश्वास दिलाया। कुछ लोगों को हरियाणा के हिसार, सिरसा और फतेहगढ़ में जमीन दी गई। लोगों को मजबूरी में अपनी बसी-बसाई दुनिया छोड़कर दूसरी जगह जाकर बसना पड़ा। देश के लिए बिलासपुर के लोगों ने यह बड़ी कुर्बानी दी है। लगभग 354 गांवों के 52 हजार लोगों को विस्थापित किया गया था। इनमें से कुछ तो हरियाणा चले गए तो कुछ हिमाचल में अन्य जगहों पर बस गए।
डूबने से पहले का बिलासपुर (Wikipedia)
हरियाणा में रह रहे भाखड़ा विस्थापितों ने हिमाचल सरकार से अपील की थी कि बिलासपुर से सिरसा के ऐलनाबाद तक सीधी बस सेवा शुरू करे। परिवहन मंत्री जी.एस. बाली ने इसे मंजूर किया और 25 जुलाई 2014 को बस अपने रूट पर चलने लगी। रात को चलने वाली बस बिलासपुर से झंडूता, बरठीं, शाहतलाई, ऊना, चंडीगढ़, पटियाला, टोहाना, फतेहगढ़ और सिरसा होते हुए ऐलनाबाद तक जाती। यह न सिर्फ वहां बसे भाखड़ा विस्थापितों बल्कि अन् लोगों के लिए फायदे की साबित हुई। झंडूता, बरठीं और शाहतलाई की ओर से चंडीगढ़ के लिए एक यही बस सेवा था। यह रूट सफल तो हुआ, मगर विभाग के ढुलमुल रवैये के चलते दो साल के अंदर ही बंद कर दिया गया। परिवहन मंत्री ने दोबारा आश्वासन तो दिया, मगर यह बस सेवा अब तक शुरू नहीं हुई।
गोविंद सागर में समाता पुराना बिलासपुर शहर (Image: indianrajputs.com)
भाखड़ा बांध विस्थापितों की भावनाओं से जुड़ा यह रूट बंद होने से हजारों लोग दुखी हैं। क्या हम लोगों को यह अधिकार भी नहीं कि हम हरियाणा से आकर उस जगह का दीदार कर सकें जहां हमारी आत्मा बसती है? यह बस सेवा तो ऐसी थी कि वहां के लोगों को हिमाचल की ठंडक का अहसास दिलाती थी। जब शाम को हरियाणा से यह बस हिमाचल की ओर चलती थी तो विस्थापित लोग सिर्फ इस बस की झलक देखने आया करते थे कि हमारी बस हमारे बिलासपुर की तरफ जा रही है।
अचानक इस बस के बंद हो जाने से लोगों में मायूसी है। पौंग बांध विस्थापितों के लिए तो निगम की पठानकोट-घड़साना और धर्मशाला अनूपगढ़ जैसी सीधी बस सेवाएं हैं तो भाखड़ा विस्थापितों के लिए क्यों नहीं? अब प्रदेश मे बसों की कमी भी नहीं और शायद स्टाफ की भी नहीं। मैं परिवहन मंत्री से अपील करता हूं कि इस बस सेवा को फिर से बहाल किया जाए। यह विस्थापित लोगों को अपने हिमाचल आने के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। कृपया इसे बहाल किया जाए।”
राजेश वर्मा।। प्रदेश सरकार द्वारा शुरू किए गए जनमंच कार्यक्रम को यदि लोकतंत्र की असली सरकार कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। घुमारवीं के हटवाड़ पंचायत में आयोजित आज के जनमंच कार्यक्रम में जाने का मौका मिला। शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज जी आज के इस जनमंच के अध्यक्ष थे।
वहां जाकर जो चीजें देखी उन्हें देख महसूस कर बस दिल से एक ही आवाज़ निकली की लोकतंत्र की बात सभी करते हैं असली लोकतंत्र वह है जब आप बिना किसी भय के, दबाव के अपनी बातें अपनी समस्याओं को सरकार व सभी लोगों के सामने रखे। यही आज हुआ हर कोई उन समस्याओं को लेकर आया था जिनसे वह पता नहीं कबसे जूझ रहा था कोई विधवा पेंशन के लिए जगह-जगह धक्के खाकर अंत में जनमंच पर पहुंची लाचार महिला थी, कोई वृद्धावस्था पेंशन के काग़ज़ी चक्करों से तंग आकर आया बुजुर्ग था, कोई जमीन जायदाद के झगड़ों से दुखी होकर, कोई नल का कनेक्शन न मिलने के कारण, कोई बिजली का कनेक्शन न मिलने के कारण तो कोई कर्मचारियों के लचर रवैये को लेकर आया फरियादी था।
इस जनमंच पर देखा की अपनी जबावदेही न समझने वाले कर्मचारियों व अधिकारियों का हिसाब किताब भी हाथों हाथ हो रहा था साथ ही समस्याओं का निराकरण भी। रोंगटे खड़े हो गए जब एक बुजुर्ग विधवा महिला पेंशन की शिकायत लेकर मंच से माननीय शिक्षा मंत्री जी को अपनी बात सुना रही थी की किस तरह उसे कागजों के नाम पर दौड़या जा रहा है जबकि दो बेटे होने के बावजूद भी वह अकेली है जमीन जायदाद भी बेटों ने अपने नाम करवा रखी है। इस बात की गवाही जनमंच का पूरा पंडाल दे रहा था फिर भी प्रशासन उसे एक पेंशन तक नहीं लगा सका वजह एक पटवारी से लेकर उच्च अधिकारियों की अपनी जबावदेही न समझना और इसी जबावदेही को पूरा करवाता करता है यह जनमंच।
यह एक ऐसा मंच है जहां आप उन कर्मचारियों व अधिकारियों की हजारों लोगों के सामने पोल खोल कर रख देते हो जो अपनी कर्तव्यनिष्ठा तक नहीं समझते और गरीबों का मज़ाक उडाते हैं। यह उन लोगों को शर्म दिलाने के लिए काफी है जो खुद तो पानी के कनेक्शन लेकर पानी की लूट करते हैं लेकिन दूसरे को अपनी जमीन से पानी का कनेक्शन तक नहीं लेने देते, ऐसे लोग यह नहीं देखते की कोई असहाय महिला अपने परिवार के लिए इस नल के कनेक्शन को लेने के लिए कब से जूझ रही है जबकि ऐसे लोगों का खुद का कनेक्शन भी तो औरों की जमीन से होकर आया है।
यह उन लोगों की आंखे खोलता है जो दूसरे की जमीन पर तो खुद के घर तक सड़क सुविधा ले लेते हैं लेकिन आगे अपनी जमीन की धौंस मारकर रोक देते हैं। यह उन कर्मचारियों की पोल खोलता है जो कहते हैं “जाओ जहां मर्जी कर दो शिकायत” लेकिन जनमंच पर सबकुछ सभी के सामने होता है अपील भी, दलील भी, फैसला भी।
यह नरेगा मजदूरों का पैसा क्यों नहीं मिला उसकी जबावदेही तय करता है। यह उन जरूरतमंद दिव्यांगों को हाथों हाथ अपंगता प्रमाणपत्र दिलाता है जिनके शरीर सूख जाते है धक्के खाकर। यह उन युवाओं को बोनोफाइड, जाति प्रमाण पत्र व अन्य महत्वपूर्ण प्रमाणपत्र हाथों हाथ दिलाता है जिन्हें हफ्तों चक्कर लगाने पडते हैं कभी पटवारी के कभी पंचायत सचिव के कभी पुलिस स्टेशन के तो कभी तहसील कार्यालयों के।
यहां पर पहुंचने वाले शिकायतकर्ता व फरियादी से यह नहीं पूछा जाता की वह किस राजनैतिक दल से संबंधित हैं क्योंकि सरकारी कार्यालयों में फिर भी यह देखकर कि कभार काम होता है लेकिन जनमंच पर नहीं, यहां पहुंचे हर “जन” का यह अपना “मंच” होता है।
आज के इस जनमंच कार्यक्रम में माननीय शिक्षा मंत्री ने जिस तरह दिल से इन जनसमस्याओं को सुना व उनका मौके पर हल करवा कर कर्मचारियों व अधिकारियों की जबावदेही तय की वह सचमें उनकी स्वच्छ, ईमानदार व संवेदनशील सोच को दर्शाती है। जिलाधीश विवेक भाटिया जी की समस्याओं को हल करने की सक्रियता उनकी युवा व जिम्मेदार सोच को दर्शाती है।
सच में लोकतंत्र के लिए ऐसे कार्यक्रम बहुत जरूरी है क्योंकि जब आप बिना भय दबाव व राजनीति के अपनी बात हजारों लोगों, सरकार व प्रशासन के सामने रखते हैं और उसका जबाव मांगते हैं व न्याय पाते हैं तो समझों असली लोकतंत्र यही है। लिखने को बहुत कुछ है इस जनमंच के उपर लेकिन वह आने वाले दिनों में एक लेख में लिखूंगा लेकिन आज जो देखा उसे अभी लिखे बिना नहीं रह सकता था वजह मुझ से जुड़ी थी आपसे जुड़ी है हम सब से जुड़ी है।
एक सीख व सलाह सभी को भविष्य में अगर कोई कर्मचारी या अधिकारी आपके काम को बेवजह लटकाए तो बस इतना कह दो की कोई न जनमंच में सबके सामने हिसाब होगा देखो फिर जबावदेही कैसे तय नहीं होती?
हलांकि यह न तो मेरा पंचायत क्षेत्र है न ही विधानसभा क्षेत्र बस घर के नजदीक होने के कारण एक मित्र से मिलने की वजह वहां ले गई वहां जाकर जो देखा व महसूस उससे बस एक ही आवाज़ निकलती है कि हां… ऐसा जनमंच हर जगह हो हर पंचायत में हो।
(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा बलद्वाड़ा, मंडी के रहने वाले हैं और उनसे 7018329898 पर संपर्क किया जा सकता है।)
शिमला।। हिमाचल प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष हंसराज की एक ‘ज़िद’ इन दिनों प्रदेश में चर्चा का विषय बनी हुई है। दरअसल कुछ समय पहले जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जगत प्रकाश नड्डा चंबा आए थे, उस दौरान चंबा के उपायुक्त और एसपी की गाड़ी ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष हंसराज की गाड़ी को ओवरटेक कर लिया था।
ऐसी जानकारी है कि अधिकारियों के वाहनों ने चुराह के विधायक और विधानसभा उपाध्यक्ष की गाड़ी को उस समय ओवरटेक किया जब वह नड्डा के काफिले के पीछे चल रही थी। विधानसभा उपाध्यक्ष ने इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया और उनकी शिकायत के आधार पर दोनों अधिकारियों को एक नोटिस भेजा गया था।
कार्मिक विभाग की ओर से चंबा के उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक, एसडीएम और एसी टू डीसी को नोटिस भेजे गए थे औऱ इस घटना पर स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा गया था। सभी अधिकारियों ने नोटिस का जवाब दिया और कथित तौर पर इसमें उन्होंने बताया है कि उन्होंने किसी तरह का प्रोटोकॉल नहीं तोड़ा है।
मगर उनका यह जवाब हंसराज को पसंद नहीं आया है। जागरण में छपी खबर के मुताबिक हंसराज ने कहा है कि जब तक ‘चंबा के उपायुक्त व पुलिस अधीक्षक जब तक खुद उपस्थित होकर अपनी गलती के लिए माफी नहीं मागते, तब तक मामला नहीं सुलझ पाएगा।’
विधानसभा उपाध्यक्ष का कहना है, “यह मामला व्यक्तिगत न होकर संवैधानिक पद की गरिमा से जुड़ा है। कोई अधिकारी संवैधानिक संस्था से ऊपर नहीं हो सकता है।” हंसराज ने अधिकारियों पर वाहन को ओवरटेक कर प्रोटोकॉल तोड़ने और संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया है। उन्होंने चंबा के सरोल गाव में किसानों के लिए आयोजित कार्यक्रम में प्रशासनिक अधिकारियों के मौजूद न होने की शिकायत भी प्रदेश सरकार से की है।
क्या हैं नियम जागरण ने प्रकाशित किया है कि हिमाचल प्रदेश में वीवीआइपी मूवमेंट को लेकर प्रोटोकॉल नहीं बना है। ‘पुरानी प्रथा के अनुसार वाहन चलते हैं। प्रोटोकॉल के लिए गाइडलाइन न होने से कई बार वीवीआइपी वाहनों के लाव-लश्कर पर भी सवाल उठे हैं। परंपरा के अनुसार वीवीआइपी मूवमेंट के समय सबसे आगे पायलट, उसके पीछे वीवीआइपी वाहन, एस्कॉर्ट और अन्य वाहन चलते हैं।’