बैजनाथ: ‘रावण द्वारा स्थापित शिवलिंग, पांडवों का बनाया मंदिर’

अमित पुरी, बैजनाथ।। शिवरात्रि के पर्व पर सुबह से ही मंदिरों में शिव भक्तों का जन सैलाब उमड़ रहा है। हर हर महादेव, बम बम भोले के नारों से मंदिर गूंज रहे हैं। अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए भक्त मंदिर पहुंच रहे हैं शिवलिंग पर जलाभिषेक कर शिव की अनुकंपना पाने की कामना कर रहे हैं। कुछ ऐसी ही धूम हिमाचल प्रदेश के कांगडा में देखने को मिली। जहां मंदिर बैजनाथ मंदिर में भी शिवरात्रि पर्व को धूम-धाम से मनाया गया।

यहां प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि पर्व पर शिवरात्रि पर झारखंड में मेला आयोजित किया जाता है तथा हजारों श्रद्धालु इस 30 दिवसीय महोत्सव के दौरान उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूरे देश के विभिन्न भाग से लोग बिहार के सुल्तानगंज से गंगा नदी के पवित्र जल ले करके वाहा से 105 किमी दूर बैद्यनाथ धाम की यात्रा करते हैं व भगवान शिव के भक्त शिवलिंग पर पवित्र जल अर्पण करते हैं। राज्यस्तरीय बैजनाथ शिवरात्रि महोत्सव का आगाज शिव मंदिर में हवन यज्ञ व शोभायात्रा के साथ हुआ। पांच दिवसीय इस महोत्सव का शुभारंभ 13 फरवरी को कांगड़ा-चंबा के सांसद शांता कुमार ने किया। विश्राम गृह से आरंभ होने वाली शोभायात्रा शिव मंदिर तक गई।

महाशिवरात्रि के पर्व पर बैजनाथ शिव मंदिर में लगी कतारे ।।। #live

In Himachal ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಭಾನುವಾರ, ಮಾರ್ಚ್ 3, 2019

बैजनाथ मंदिर (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश)
आपको बता दें कि बैजनाथ शिव मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शानदार पहाड़ी स्थल पालमपुर में स्थित है। 1204 ई. में दो क्षेत्रीय व्यापारियों ‘अहुक’ और ‘मन्युक’ द्वारा स्थापित बैजनाथ मंदिर पालमपुर का एक प्रमुख आकर्षण है और यह शहर से 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की स्थापना के बाद से लगातार इसका निर्माण हो रहा है। यह प्रसिद्ध शिव मंदिर पालमपुर के ‘चामुंडा देवी मंदिर’ से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। बैजनाथ शिव मंदिर दूर-दूर से आने वाले लोगों की धार्मिक आस्था के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह मंदिर वर्ष भर पूरे भारत से आने वाले भक्तों, विदेशी पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों की एक बड़ी संख्या को आकर्षित करता है।

महाशिवरात्रि पर कीजिए प्राचीन बैजनाथ मंदिर में पवित्र शिवलिंग के दर्शन।

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पौराणिक कथा
त्रेता युग में लंका के राजा रावण ने कैलाश पर्वत पर शिव के निमित्त तपस्या की। कोई फल न मिलने पर उसने घोर तपस्या प्रारंभ की। अंत में उसने अपना एक-एक सिर काटकर हवन कुंड में आहुति देकर शिव को अर्पित करना शुरू किया। दसवां और अंतिम सिर कट जाने से पहले शिवजी ने प्रसन्न हो प्रकट होकर रावण का हाथ पकड़ लिया। उसके सभी सिरों को पुर्नस्थापित कर शिव ने रावण को वर मांगने को कहा। रावण ने कहा मैं आपके शिवलिंग स्वरूप को लंका में स्थापित करना चाहता हूं। आप दो भागों में अपना स्वरूप दें और मुझे अत्यंत बलशाली बना दें। शिवजी ने तथास्तु कहा और लुप्त हो गए। लुप्त होने से पहले शिव ने अपने शिवलिंग स्वरूप दो चिह्न रावण को देने से पहले कहा कि इन्हें जमीन पर न रखना।

रावण दोनों शिवलिंग लेकर लंका को चला। रास्ते में ‘गौकर्ण’ क्षेत्र (बैजनाथ) में पहुंचने पर रावण को लघुशंका का अनुभव हुआ। उसने ‘बैजु’ नाम के एक ग्वाले को सब बात समझाकर शिवलिंग पकड़ा दिए और शंका निवारण के लिए चला गया। शिवजी की माया के कारण बैजु उन शिवलिंगों के भार को अधिक देर तक न सह सका और उन्हें धरती पर रखकर अपने पशु चराने चला गया। इस तरह दोनों शिवलिंग वहीं स्थापित हो गए। जिस मंजूषा में रावण ने दोनों शिवलिंग रखे थे, उस मंजूषा के सामने जो शिवलिंग था, वह ‘चंद्रभाल’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और जो पीठ की ओर था, वह ‘बैजनाथ’ के नाम से जाना गया। मंदिर के प्रांगण में कुछ छोटे मंदिर हैं और नंदी बैल की मूर्ति है। नंदी के कान में भक्तगण अपनी मन्नत मांगते है।

पांडव नहीं बना पाए पूरा मंदिर
ऐसी मान्यता है कि द्वापर युग में पांडवों के अज्ञातवास ने दौरान इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था। स्थानीय लोगों के अनुसार इस मंदिर का शेष निर्माण कार्य ‘आहुक’ एवं ‘मनुक’ नाम के दो व्यापारियों ने 1204 ई. में पूर्ण किया था और तब से लेकर अब तक यह स्थान ‘शिवधाम’ के नाम से जाना जाता है।

चंबा में जनमंच बना रंगमंच, बंद करवाए गए पत्रकारों के कैमरे

चंबा।। हिमाचल प्रदेश सरकार ने जनमंच कार्यक्रम को एक सफल और जनोपयोगी कार्यक्रम के तौर पर प्रचारित किया है मगर रविवार को चंबा में हालात कुछ अलग ही देखने को मिले। चंबा मुख्यालय की करियाँ पंचायत में जन मंच कार्यक्रम आयोजन किया गया था जहां पर आईपीएच मिनिस्टर महेंद्र सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की।

इस अवसर पर विधानसभा उपाध्यक्ष हंसराज, भरमौर के विधायक जियालाल,  भटियात के विधायाक विक्रम जरियाल और मार्केटिंग कमेटी के चेयरमैन डी.एस ठाकुर भी मौजूद रहे। सभी विभागों के आला अधिकारियों ने भी इस जनमंच कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई थी। मगर इस जनमंच में लोग काफी नाराज दिखे।

यही नहीं, प्रशासन ने मीडिया के कैमरे भी बंद करवा दिए। इससे लोगों में यह संदेश गया है कि सरकार जिस पारदर्शिता के दावे करती है, वह कहां गई? लोग इस बात से भी नाराज दिखे कि जब वह अपनी समस्याओं को मंत्री महोदय तक पहुंचा रहे थे तो उच्च अधिकारियों द्वारा उनकी आवाज को दबाने के लिए उन्हें जबरन बिठाया जा रहा था और उनकी समस्याओं को नहीं सुना जा रहा था।

बता दें कि चंबा के उपायुक्त पहले भी कई कार्यक्रमों के दौरान मीडिया वालों के कैमरे बंद करवा चुके हैं। इससे मीडियाकर्मियों में भी गुस्सा देखने को मिला। जब आईपीएच मंत्री ने मीडिया कर्मियों को प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बुलाया तो नाराज पत्रकारों ने जाने से इनकार कर दिया। ऐसे में चर्चा फैल गई कि यह जनमंच कार्यकरम पूरी तरह रंगमंच कार्यक्रम बन गया।

भुवनेश कटोच नाम के शख्स ने बताया कि उन्हें अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। वहीं कार्यक्रम में मौजूद रहे विधायक विक्रम जरियाल से जब पूछा गया कार्यक्रम के दौरान मिडिया के कैमरे क्यों बंद करवाए जाते हैं तो उन्होंने कहा कि उपायुक्त से पूछा जाएगा कार्यक्रम के दौरान कैमरे बंद क्यों करवाए गए।

बिना फायर सलामी, गोलियों के बिना ही अंतिम विदाई देने पहुंची टुकड़ी

अमित पुरी, गंगथ।। देश की सेवा में जुटे रहने वाले हमारे सैनिक जब कभी किसी मोर्चे पर शहीद हो जाएं या अन्य कारणों से जान गंवा दें, तब उन्हें संबंधित सैन्य टुकड़ी आखिरी विदाई के दौरान सलामी देती है। इस दौरान आपने भी देखा होगा कि किस तरह राइफलों से फायर करके सलामी की जाती है। मगर कांगड़ा जिले के गंगंथ में सलामी दी गई और वह भी बिना फायर के।

जानकारी अनुसार उपमण्डल इंदौरा के अधीन पड़ती पंचायत बलाख के गांव बासा लोकबां के अमरजीत सिंह ( 40) सपुत्र कालू राम जो कि सशस्त्र सीमा बल (SSB) फरीदाबाद मे तैनात थे, बीती रात को अपनी निजी गाड़ी से दिल्ली से घर छुट्टी पर आ रहे थे। मगर पंजाब के मुकेरियां में अज्ञात वाहन के साथ टक्कर के कारण उनकी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई।

उनके साथ उनकी भांजी भी थी, जो खतरे से बाहर है मगर अमरजीत की मौके पर ही मौत हो गई। रविवार को अमरजीत का उनके पैतृक गांब बासा मे अन्तिम संस्कार था। उन्हें सलामी देने के लिए एसएसबी की टुकड़ी आई थी मगर बिना फायर के ही सलामी दे दी गई।

सलामी देने आई टुकड़ी में शामिल एसएसबी के सब इन्सपेक्टर एस एस पठानिया का कहना था कि उन्होंने इसके लिए राउंड (गोलियों) के लिए अप्लाई किया था मगर उन्हें मिले नहीं। जब लोगों ने इस संबंध में पूछा तो सैनिकों ने दबे स्वर में बताया कि उन्हें राउंड दिए ही नहीं जाते।

उधर मृतक अमरजीत अपने पीछे पत्नी, बेटी, बेटे और मां को छोड़ गए हैं। उनकी असामयिक मौत से पूरे इलाके में शोक की लहर है।

भारतीय वायुसेना के मिराज लड़ाकू विमानों ने PoK में जैश के अड्डों पर गिराए बम

नई दिल्ली।। पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायुसेना ने पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में करवाई की है। अंबाला से उड़े मिराज विमानों ने अंतरराष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन किए बिना नियंत्रण रेखा के उस पर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया है।

इस घटनाक्रम की जानकारी सबसे पहले पाकिस्तान की ओर से आई। पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता ने दावा किया कि भारतीय विमानों ने सीमा का उल्लंघन किया, जिसके बाद पाकिस्तानी वायुसेना के दखल के बाद भारतीय विमानों को वापस लौटना पड़ा, जाते-जाते वे पेलोड (बम) गिरा गए।

मगर भारतीय मीडिया में वायुसेना के सूत्रों के हवाले से कुछ ही देर में खबरें आ गईं कि यह आतंकी ठिकानों पर किया गया हमला था। हालांकि पाकिस्तान ने तस्वीरें शेयर करके कहा है कि भारतीय विमानों ने बम ऐसी जगह गिराए जो खाली थी।

वहीं भारतीय विदेश सचिव विजय गोखले ने बताया है कि ख़ुफ़िया जानकारी मिलने के बाद इंडियन एयर फोर्स ने नियंत्रण रेखा पार करके जैश-ए-मोहम्मद के सबसे बड़े कैंप को तबाह किया है। इस बीच केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “देश की रक्षा के लिए बहुत ज़बरदस्त क़दम उठाया है सेना ने और सेना को इस तरह का क़दम उठाने की छूट प्रधानमंत्री मोदी जी ने दी थी. अब सेना के पीछे पूरा देश खड़ा है।”

बता दें कि पुलवामा की घटना में जवानों के शहीद होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि सुरक्षा बलों को खुली छूट दे दी गई है। इस समय दिल्ली से लेकर इस्लामाबाद तक हलचल तेज है।

रंग लाया सीएम जयराम का ‘राइजिंग हिमाचल’, आ रही हैं हजारों जॉब्स

शिमला।। हिमाचल प्रदेश में लोकसभा चुनावों के बाद बड़े पैमाने पर नौकरियां पैदा होने वाली हैं। जून माह में हिमाचल में158 कंपनियां निवेश के लिए आ सकती हैं। इन कंपनियों को हिमाचल में आने से क़रीब 39 हजार 450 पदों पर रोजगार पैदा होगा।

मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जनवरी माह के आखि़र में बेंगलुरु और हैदराबाद गए थे जहां राइजिंग हिमाचल कार्यक्रम के तहत रोड-शो के साथ-साथ बड़े निवेशकों से मुलाक़ात की थी। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कई बड़े निवेशकों के साथ MoU पर हस्ताक्षर किए थे। अब ये कंपनियां हिमाचल में क़रीब 16 हज़ार 856 करोड़ निवेश करेंगी।

इन कंपनियों के आने से हिमाचल में औद्योगिक विकास तो होगा ही, नौकरियां भी पैदा होंगी। जानें, किस क्षेत्र में कितना निवेश होगा, कितना रोजगार पैदा होगा।

नितिन गडकरी ने दिए संकेत, कांगड़ा से शांता ही लड़ेंगे चुनाव

कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शाहपुर में आयोजित पन्ना प्रमुख सम्मेलन में शिरकत करने आए केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि कार्यकर्ता कांगड़ा लोकसभा सीट से शांता कुमार को जिताने के लिए अधिक से अधिक काम करें।

बता दें कि शांता कुमार भी संकेत देते रहे हैं कि वह चुनाव लड़ सकते हैं। हालांकि सूत्रों का कहना है कि शांता कुमार खुद से टिकट की मांग नहीं करेंगे, अगर पार्टी उन्हें कहेगी तब वह चुनाव मैदान में उतरेंगे।

मगर रविवार को नितिन गडकरी ने जिस तरह से शांता कुमार को जिताने की अपील की, उससे इस बात की संभावनाएं बन रही हैं कि पार्टी दोबारा शांता कुमार को ही चुनाव मैदान में उतार सकती है।

हिमाचल में कई जगह बन्दर मारने से बैन हटा, प्रति बंदर कमाएं 500 रुपये

शिमला।। केंद्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश की कुल 169 तहसीलों-उपतहसीलों में से 91 में बंदरों को वर्मिन यानी नुकसानदेह जीव घोषित कर दिया है। केंद्र की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार 21 फरवरी 2020 तक बंदरों को मारने की इजाजत रहेगी।

इससे पहले बंदरों को शिमला नगर निगम और 38 तहसीलों में वर्मिन घोषित किया गया था जिसकी मियाद 20 दिसंबर, 2018 को खत्म हो गई थी। इसके बाद बंदरों को मारा नहीं जा सकता था।

हालांकि वर्मिन घोषित होने से कुछ होगा नहीं क्योंकि पहले भी जब बन्दर वर्मिन घोषित थे, लोगों ने बन्दर मारे नहीं। सरकारों ने अपने स्तर पर कुछ किया नहीं और बंदरों की समस्या बढ़ गई।

हिमाचल ने पिछले दो साल से शिमला और 38 तहसीलों में बंदरों को वर्मिन घोषित करने के लिए केंद्र से मांग की थी और केंद्र ने वर्मिन घोषित भी किया था। मगर दो साल में सिर्फ पांच बंदर ही मारे जा सके।

लोगों के बंदर मारने में रुचि न दिखाने के बाद ही इस बर जब वर्मिन मियाद बढ़ाने के लिए आवेदन किया तो केंद्र ने मारे गए बंदरों की संख्या पूछ ली। इसके बाद प्रदेश की जयराम सरकार को काफी प्रयास करने पड़े, जिसके बाद अब केंद्र ने वर्मिन घोषित किया है।

अब बंदर मारने के बाद मारने वाले को स्थानीय वन अधिकारी को सूचना देनी होगी जिसके बाद वह शव को अपने कब्जे में लेकर तय मानक के अनुसार उसका अंतिम संस्कार करेगा और 500 रुपये देने के लिए प्रक्रिया शुरू कर देगा।

कहां-कहां वर्मिन हुए घोषित

केंद्र की अधिसूचना के अनुसार चंबा के चुराह, भरमौर, डलहौजी, भटियात, सिहुंता और चंबा तहसील/उप तहसील में बंदर वर्मिन घोषित किए गए हैं। कांगड़ा के कस्बा कोटला, जस्वां, देहरा गोपीपुर, खुंडियां, जयसिंहपुर, बैजनाथ, धर्मशाला, शाहपुर, नूरपुर, इंदौरा, फतेहपुर, जवाली, कांगड़ा, पालमपुर और बड़ोह, बिलासपुर के झंडूता, भराड़ी, घुमारवीं, नयना देवी, बिलासपुर सदर और नम्होल, ऊना के भरवाईं, अंब, ऊना, हरोली और बंगाणा, शिमला के सुन्नी, ठियोग, कोटखाई, कुमारसैन, चौपाल, रोहडू, जुब्बल, चिरगांव, कुपवी, ननखड़ी, टिक्कर, जुन्गा, शिमला ग्रामीण, रामपुर और नेरवा शामिल हैं।

इसके अलावा पांवटा साहिब, ददाहू, पझौता, नौहरा, पच्छाद, राजगढ़, रेणुका, शिलाई, कमरऊ, अर्की, कंडाघाट, रामशहर, कृष्णगढ़, नालागढ़, कसौली, सोलन और दाड़लाघाट, मंडी, थुनाग, करसोग, जोगिंद्रनगर, पधर, लडभड़ोल, सरकाघाट, धर्मपुर, सुंदरनगर, निरमंड, बंजार, आनी, मनाली, कुल्लू और सैंज, हमीरपुर, भोरंज, नादौन, सुजानपुर, बड़सर, बिजड़ी, किन्नौर जिले की निचार, पूह, कल्पा, सांगला और मोरंग तहसीलें/उप तहसीलें शामिल हैं।

क्या हम युवाओं ने बूढ़े नेताओं और उनके बच्चों का ठेका लेकर रखा है?

राजेश वर्मा।। हमारे देश में सरकारी व निजी क्षेत्र में नौकरी के लिए न्यूनतम व अधिकतम शैक्षणिक योग्यता के साथ-साथ आयु सीमा भी निर्धारित की गयी है वहीं उसी सरकारी कर्मचारी को सरकार 58 या 60 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद रिटायर्ड कर देती है। किसी विशेष कक्षा में नियमित रूप से पढ़ाई करने के लिए आयु का पैमाना है। बच्चे को स्कूल प्रवेश के लिए भी आयु सीमा निर्धारित की गयी है। मतलब हर जगह आयु का पैमाना है, भले ही वह किसी संस्थान में प्रवेश का हो या सेवानिवृति का हो। सभी जगह यह नियम हैं परंतु एक क्षेत्र ऐसा है जहां यह नियम बेमानी साबित हो जाते हैं और वह क्षेत्र है राजनीति।

हर किसी की जुबान पर यह बात आती है की आखिर यह राजनीतिज्ञ कब संन्यास लेंगे इनके लिए न कोई 58 वर्ष की आयु सेवानिवृति की अधिकतम सीमा है न ही 60 या 65। राजनीतिज्ञों को आखिर ऐसा क्या लगाव है राजनीति से की वह न तो कभी थकते हैं न ही इनके लिए कोई सेवानिवृति की उम्र है। वैसे तो उम्रदराज नेताओं को खुद ही पीछे हट जाना चाहिए लेकिन यदि ऐसा नहीं भी होता है तो युवाओं को खुद आगे आना चाहिए।

युवाओं का देश व प्रदेश की राजनीति में आगे आना क्यों जरूरी है इसके पीछे भी कई कारण हैं। एक तरफ हम दुनिया में अपनी युवा आबादी का डंका पीट रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हें देश निमार्ण में भागीदार नहीं बना रहे। संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यहां 35.6 करोड़ आबादी युवा है जबकि पड़ोसी देश चीन की यही आबादी 26.9 करोड़ है। कोई भी देश अपनी कामकाजी आबादी से बेहतर परिणाम तभी हासिल कर सकता है जब उस पर निर्भर रहने वाली आबादी अपेक्षाकृत कम हो।

आज राजनीति में बाहुबल व शक्ति प्रदर्शन दिनोंदिन बढ़ रहा है। पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी को इसमें बदलाव की पहल करनी चाहिए। मायने यह नहीं रखता की वह किस जाति-धर्म से संबंध रखते हैं। आज देश की राजनैतिक तस्वीर बदलने की जरूरत है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता की राजनैतिक पार्टियों ने कई युवाओं को मौके भी दिए हैं लेकिन इसमें भी परिवारवाद व सगे संबंधियों का राजनीति दलों से संबंध ज्यादा देखने को मिलता है। इसके सैकड़ों उदाहरण विभिन्न प्रांतों व देश में देखने को मिल जाएंगे जबकि दूसरे युवाओं को उतना मौका नहीं मिल सका जितना मिलना चाहिए।

हम पिछले कई चुनावों से देखते आ रहे हैं, कि राजनैतिक दल चिरपरिचित नेताओं को ही बार-बार मौका देते हैं। बौद्धिक क्षमता रखने वाले व पढ़े- लिखे युवाओं का राजनीति में आना बेहद जरूरी है। जब अच्छे लोग सियासत में होंगे तो उनका नजरिया भी विकास पर आधारित होगा। युवा पीढ़ी में व्यापारी, वकील, शिक्षक, पत्रकार, किसान कवि-साहित्यकार और अन्य क्षेत्र के लोगों को भी आगे आकर सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेना चाहिए क्योंकि किसी भी पार्टी से बढ़कर उनकी अपनी व्यक्तिगत छवि होती है। आज के दौर में सभी राजनैतिक दल युवाओं का चुनाव प्रचार में जमकर सहयोग ले रहे हैं जबकि सक्रिय राजनीति में इन्हीं युवाओं को मौका नहीं दिया जा रहा। यह नेता खुद तो राजनीति में जमकर मौज उड़ा रहे हैं साथ ही अपने बच्चों रिश्तेदारों के लिए भी अपनी विरासत सौंप जाते हैं इस तरह आज का युवा वर्ग पहले इनकी जी हजूरी में जीवन व्यतीत कर देता है फिर इनके परिवार के लिए अपने जीवन को समर्पित कर देता है।

बात करें राजनीति में शुचिता की तो राजनीति में भी स्वच्छता उतनी ही जरूरी है जितनी की वह हमारे जीवन में जरूरी है। एक तरफ स्कूल, कॉलेज-यूनिवर्सिटी तथा अन्य संस्थान शिक्षकों और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं तो दूसरी तरफ देश-प्रदेश में सभी युवाओं के लिए सरकारी नौकरियों या रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। युवा भी आए दिन हो रहे नित-नए बदलाव से कहीं ना कहीं प्रभावित रहा है। किसी वर्ग विशेष अथवा धर्म के व्यक्ति को टिकट देने की परम्परा को अब बदला जाना चाहिए। जो जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद देश या अपने राज्यों की समस्याओं व नीतियों की आवाज ना उठा पाते हों ऐसे नेताओं के चुनने की परम्परा बदली जानी चाहिए। यह सब नौजवान ही कर सकते हैं और कोई नहीं।

युवाओं की समस्याएं भी देश में लगातार बढ़ रही हैं। इसमें सबसे अहम है रोजगार। नियमित डिग्री लेने के बावजूद युवाओं को मनमाफिक रोजगार नहीं मिलता। अच्छे और तेज-तर्रार युवाओं को राजनीति में जरूर आना चाहिए। यदि ऐसे युवा राजनीति में आएंगे तो वह देश का विकास तो करेंगे ही साथ ही अन्य बेरोजगार युवाओं के लिए भी कुछ न कुछ जरूर करेंगे।

जब युवा इसकी पहल करेंगे तो नीति-निर्माता व सियासी नेताओं की सोच में भी बदलाव आएगा। देश के बाहर दुनिया भर में नजर दौडाएं तो कनाडा, फ्रांस और अन्य देशों में युवा राष्ट्राध्यक्ष तक बन गए हैं। वे अपने अनुभव से सरकार और वैश्विक राजनीति चला रहे हैं। हमारी युवा शक्ति भी इस भूमिका को निभाने में सक्षम है। बस जरूरत है आगाज़ करने की और इसके लिए युवाओं को नेताओं व राजनीतिक दलों की तरफ नहीं देखना होगा उन्हें खुद फ्रंटलाइन पर आना होगा भले ही वह किसी राजनीतिक दल के माध्यम से हो किसी संस्था के माध्यम से हो या फिर निर्दलीय के रूप में ही क्यों न हो। नौजवानों के राजनीति में आने से ही राष्ट्र का विकास संभव होगा। आज की राजनीति के नेताओं का अपना व्यक्तित्व ही अच्छा नहीं रहा तो वह देश का नाम कैसे उपर कर पाएंगे?

एक और बात, देश का युवा वर्ग ऊंचाईयों को तो छूना चाहता है परंतु यह भूलता जा रहा है कि उन ऊंचाईयों को छूने के लिए वह स्वयं अपनी जड़ें राजनीतिक दलों की चमचागिरी करके खुद काट रहा है। देश की राजनीति में देश प्रेम की भावना की जगह परिवारवाद, जातिवाद और संप्रदाय ने ले ली है। आए दिन जिस तरह से नेताओं के भ्रष्टाचार के किस्से बाहर आ रहे है उससे देश के युवा वर्ग में राजनीति के प्रति उदासीनता व दूरी बढ़ती जा रही है। वह देश में रहने की बजाए विदेशों में स्थापित होने की होड़ में शामिल हैं। देश की राजेश वर्मा।। राजनीति में सुभाषचन्द्र बोस, शहीद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, लोकमान्य तिलक जैसे वह युवा नेता आज कहीं नजर नहीं आते, जो अपने होश और जोश से युवा वर्ग के मन में एक नई क्रांति का संचार कर सके। उम्रदराज बूढ़े नेता कहां से युवाओं को देशभक्ति या क्रांति की बातें सिखाएंगे?

अब समय आ गया है देश के शिक्षित युवाओं को नौकरी के लिए देश विदेश में भटकने की बजाए देश की सक्रिय राजनीति में आगे आने का। इस युवा पीढ़ी को किसी को मार्गदर्शक बनाने की बजाए खुद अपना पथ प्रदर्शक बनना होगा वर्ना भविष्य में केवल वही युवा चेहरे राजनीति में देखने को मिलेंगे जो परिवारवाद के रहमो करम पर आए होंगे भले ही उनमें योग्यता न के बराबर हो।

यह नहीं भूलना चाहिए की यदि हमारा देश आज युवा देश है तो आने वाले समय में कुछ वर्षों बाद इस देश में यह युवा आबादी सबसे ज्यादा बूढ़ों में तब्दील होगी। इसलिए इस सुनहरे काल को खोने नहीं देना चाहिए।

(स्वतंत्र लेखक राजेश वर्मा लम्बे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। उनसे vermarajeshhctu @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है)

सरकार खुद नहीं मानती कि ‘मंडी’ पहले ‘मांडव नगर’ था

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इन हिमाचल डेस्क।। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के हवाले से राज्य के मीडिया में खबरें छप रही हैं कि सरकार शहर का नाम मांडव, मांडव्य नगरी, या मांडव नगर रखने जा रही है। अलग-अलग अखबारों ने प्रस्तावित नाम को अलग-अलग ढंग से रखा है। कुछ ने तो इतिहास छाप दिया कि मांडव्य ऋषि के नाम पर इसका नाम रखा जाएगा और यहां से इसका इतिहास जुड़ा हुआ है। मगर हकीकत यह है कि हिमाचल प्रदेश सरकार आधिकारिक तौर पर खुद मानती है कि इस शहर का नाम पहले मांडव नगर था या नहीं, इसकी कोई जानकारी नहीं है।

जी हां, हिमाचल प्रदेश सरकार आधिकारिक तौर पर मानती है कि “साल 765 ईस्वी में सुकेत के गठन से पहले प्रारंभिक इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। यह क्षेत्र राना और ठाकुर के नियंत्रण में था।”

ये जानकारी हिमाचल सरकार की मंडी जिले के के लिए बनाई गई आधिकारिक वेबसाइट पर दी गई है। इसमें इतिहास के बारे में आगे लिखा गया है, “साहित्य के शुरुआती उल्लेख में एकमात्र स्थान रिवालसर है और यह स्कंद पुराण में तीर्थ यात्रा का पवित्र स्थान माना जाता है। महाभारत के एक नायक करण ने एक छोटे से गांव करणपुर की स्थापना की थी। गम्मा में एक मंदिर उस इलाके की ओर इशारा करता है जहां पांडवों को जलाने का विफल प्रयास किया गया था। इसके अलावा, पूर्वी राज्य के अस्तित्व का उल्लेख नहीं है शास्त्रीय साहित्य में।”

यानी पहले मांडव नगर इसका नाम था, इसके कोई सबूत नहीं हैं। हां, ऐतिहासिक साक्ष्यों की बात की जाए तो बौद्ध धर्म से लिंक जरूर जुड़ते हैं इस क्षेत्र के। हिमाचल सरकार के अनुसाकर, “तिब्बती परंपरा के अनुसार, पदम् संभव (750-800 ई।), महान बौद्ध भिक्षु , जिसे तिब्बत के राजा त्सोंग-डी-टीसन द्वारा बुद्ध धर्म के प्रचार के लिए बुलाया गया था, वह समय रिवालसर दौर का प्रतिनिधित्व करता है। इस आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि मंडी इस समय बौद्ध शिक्षा का एक महान स्थान रहा होगा।”

बता दें कि मंडी क्षेत्र को तिब्बती साहित्य में ज़ाहोर (सहोर) कहा जाता है। यही ऐतिहासिक साक्ष्य हैं। मगर चूंकि यह नाम बौद्ध धर्म से जुड़ा है, हिंदू धर्म से नहीं, संभवत: इसीलिए इस नाम को रखने की बात नहीं की जा रही, आधुनिक दंतकथाओं के आधार पर मांडव्य ऋषि से नाम जोड़कर मांडव नगर रखने की बात की जा रही है। चूंकि चुनाव नजदीक हैं, इसलिए इस कदम का उन लोगों पर प्रभाव पड़ सकता है जो इस तरह के तुष्टीकरण वाले कदमों से खुश हो जाया करते हैं।

अब ऐतिहासिक मंडी शहर का नाम बदलने पर विचार कर रही सरकार

मंडी।। शिमला का नाम बदलने की बात छेड़ने के बाद कड़ी आलोचना का सामना कर चुके मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने अब मंडी का नाम बदलने पर विचार करने की बात कही है।

प्रदेश सरकार जिला मंडी का नाम मांडव्य नगरी रखने पर विचार कर रही है। नारला कालेज में क्लस्टर विश्वविद्यालय के भवन की आधारशिला रखने पहुंचे मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने खुद इसकी जानकारी दी है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि मंडी का नाम बदलने को लेकर लोग खुलकर सुझाव दें, सुझावों को ध्यान में रखकर ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।