शिमला बस हादसा: 3 जून को ही खत्म हो चुकी थी बस की इंश्योरेंस?

शिमला।। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के लोअर खलीणी में स्कूली बच्चों को लेकर जा रही बस हादसे की शिकार क्यों हुई, इसे लेकर अभी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। हालांकि यह बात सामने आ रही है कि सड़क किनारे पार्क किए गए वाहनों के कारण तंग हिस्से से गुजरते हुए यह बस नीचे की ओर लुढ़क गई होगी।

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इस बीच हादसे की शिकार हुई सरकारी बस को लेकर नई जानकारी सामने आई है। भारत सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ ट्रांसपोर्ट ऐंड हाइवेज़ की वेबसाइट के अनुसार इस बस की फिटनेस ठीक थी हालांकि इंश्योरेंस तीन जून को ही खत्म हो चुकी थी।

फिटनेस ठीक, इंश्योंरेंस ‘खत्म’
वेबसाइट से मिली जानकारी के मुताबिक एचपी 62 3203 नंबर वाली इस बस का रजिस्ट्रे्शन 6 नवंबर 2009 को हुआ था। स्वराज माज़दा की इस बस को 29 मई, 2020 तक फिटनस सर्टिफिकेशन मिली है। मगर इंश्योरेंस खत्म होने की तारीख वेबसाइट में 3 जून, 2019 बताई जा रही है।

यहां पर ध्यान देने की बात यह है कि इंश्योरेंस खत्म हुए अभी कुछ ही हफ्तों का समय हुआ है। ऐसे में यह भी हो सकता है कि अगर विभाग ने नई इंश्योरेंस करवाई हो और उसकी जानकारी केंद्र सरकार के इस डेटाबेस में अपडेट न हुई हो। मगर इस डेटाबेस से बस की स्थिति को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब मिल गया है। दरअसल कोई भी हादसा होने पर पहले बस की स्थिति को लेकर सवाल उठते हैं, ऐसे में इस मामले में वेबसाइट से मिली जानकारी बताती है कि बस को अगले साल तक फिटनेस सर्टिफिकेशन मिली हुई थी। हालांकि बस की वास्तविक स्थिति क्या थी, यह पता नहीं चल पाया है।

इस बीच लोगों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा है। मौके पर पहुंचे शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज को लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा।

लोगों का कहना है कि सड़क किनारे बहुत से लोग अपनी गाड़ियां पार्क कर देते हैं। इस कारण सड़क तंग हो जाती है और हादसे होने की आशंका बनी रहती है। गुस्साए लोगों ने सड़क किनारे खड़ी गाड़ियों में तोड़फोड़ भी की है।

शिमला: सरकारी स्कूल बस लुढ़की, चालक और दो बच्चों की मौत

शिमला।। हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला में खलीणी के पास एक स्कूल बस सड़क से नीचे की ओर लुढ़क गई। इस हादसे में चालक और दो बच्चों की मौत की खबर है। परिचालक और आधा दर्जन बच्चे घायल हैं। कुछ घायलों की हालत गंभीर बताई जा रही है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने घटना पर दुख जताया है।

मृतकों और घायलों की सूची-

बता दें कि यह बस सरकारी थी और कॉन्वेंट ऑफ़ जीज़स ऐंड मैरी (चेल्सी) स्कूल ने इसे हायर किया था। घटना के बाद स्थानीय लोग तुरंत हरकत में आए और उन्होंने बच्चों को अस्पताल भेजा। प्रशासन की ओर से किसी के घटनास्थल पर पहुंचने से पहले ही बच्चों को अस्पताल पहुंचा दिया गया था।

घायल बच्चों को आईजीएमसी में भर्ती करवाया गया है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने चालक और दो बच्चों की मौत की पुष्टि की है। उन्होंने कहा है कि प्रशासन राहत कार्य में जुटा है और घायलों का इलाज किया जा रहा है।

हादसा कैसे हुआ, इस बारे में अभी जानकारी नहीं मिल पाई है। मगर तस्वीर से पता चलता है कि जहां पर यह बस गिरी है, वहां क्रैश बैरियर नहीं लगे थे। बता दें कि पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां पर सड़कें तीखी ढलानों पर हैं और काफी तंग हैं।

और जानकारियां आने पर खबर को अपडेट किया जाएगा।

जैसे ही और सूचनाएं आएंगी, इस खबर को अपडेट किया जाएगा।

बंजार हादसे की जांच रिपोर्ट पर क्या बोले परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के परिवहन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर ने कहा है कि बंजार में हुए दुखद हादसे की जांच रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर कार्रवाई कई गई है और ऐसे हादसे न हों, इसके लिए जरूरी निर्देश दे दिए गए हैं।

अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर परिवहन मंत्री ने लिखा है, “पिछले दिनों बंजार में हुई दर्दनाक बस दुर्घटना के कारणों की जांच के लिए प्रदेश सरकार द्वारा न्यायिक जांच करवाई गई जिसकी सिफारिशों के मद्देनजर प्रदेश सरकार ने दुर्घटना ग्रस्त बस तथा सम्बंधित बस मालिक की अन्य बसों के परमिट रद्द करने के निर्देश दिए।”

बता दें कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर ने आरोप लगाया था कि परिवहन मंत्री इस हादसे वाली बस के ऑपरेटर को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। परिवहन मंत्री ने इस आरोप को निराधारा बताया था।

फेसबुक पोस्ट में गोविंद सिंह ठाकुर ने लिखा है, “परिवहन,लोकनिर्माण तथा पुलिस विभाग के अधिकारियों को भी अपने कार्यों में कोताही बरतने के लिए आवश्यक कार्यवाही करने के लिए नोटिस जारी करने के निर्देश दिए जा रहे हैं।”

परिवहन मंत्री ने कहा है कि प्रदेश सरकार ने HRTC और निजी ऑपरेटरों को भी निर्देश दिए हैं कि जहां भी ओवरलोडिंग के मामले सामने आते हैं, वहां एचआरटीसी प्रबंधन अतिरिक्त सेवा प्रदान करे।

विदेश यात्राओं और उद्योगपतियों से क्या लाए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर

कर्म सिंह ठाकुर।। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने हाल ही में जर्मनी, नीदरलैंड और दुबई की यात्राएं की ताकि नवंबर 2019 में धर्मशाला में प्रस्तावित औद्योगिक निवेश सम्मेलन को सफल बनाया जा सके। मुख्यमंत्री के साथ उद्योग मंत्री और अन्य अधिकारी भी यात्राओं में शामिल रहे थे। कई तरह एमओयू साइन होना संकेत है कि कड़ी मेहनत से वे निवेशकों को आकर्षित करने में सफल हुए हैं।

हमारे प्रदेश को प्रकृति से अपार संपदाए उपहार स्वरूप मिली हैं। इनका प्रदेशवासियों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टि से दोहन करना प्रदेश का हक है। यह बाद ध्यान देने योग्य है कि प्रदेश में बेरोजगारों का आंकड़ा 9 लाख तक पहुंच गया है। ऐसे में इन्हें रोजगार मुहैया करवाने के लिए प्रदेश में विदेशी तथा स्वदेशी निवेश की अत्यंत आवश्यकता है। शायद इसी सोच को चरितार्थ करने के लिए प्रदेश का राजनीतिक नेतृत्व और अधिकारी विदेशों तथा देश के बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को प्रदेश में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

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निवेश बदल देगा हिमाचल की तस्वीर
पर्यटन, मैन्युफैक्चरिंग, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा परिवहन के क्षेत्र में निवेश हुआ तो इससे प्रदेश के बाजारों में नई रौनक देखने को मिलेगी। अर्थशास्त्रियों का भी यह मानना है कि जब किसी राज्य में निवेश बढ़ता है तो वहां पर विभिन्न तरह के सामानों की जरूरतें भी बढ़ जाती है, जिससे मुद्रा का आवागमन शुरू हो जाता है तथा रोजगार के नवीन साधन भी सृजित होते हैं।

हिमाचल प्रदेश भौगोलिक दृष्टि से विविधताओं वाला राज्य है। गगनचुंबी पहाड़ी पर्वत मालाएं, समृद्ध तथा मनमोहक नदियों का प्रवाह, हरियाली, खुशहाली तथा प्रदेश की जनता का भोलापन विश्व विख्यात है। यही कारण है कि प्रदेश में विदेशी तथा स्वदेशी औद्योगिक घराने निवेश करने के इच्छुक है। वैश्विक पटल पर प्रदेश की छवि शांत, ईमानदार तथा तीव्र गति से विकसित हो रहे राज्य की है।

15 अप्रैल 1948 को प्रदेश महज चार जिलों महासू, सिरमौर, चंबा के रूप में अस्तित्व में आया था। उस समय प्रदेश में शैक्षणिक संस्थान, स्वास्थ्य सुविधाएं, आवागमन के साधन लगभग शून्य थे। पूरा भारत हिमाचल की तरफ इस दृष्टि से देखता था कि यह कब असफल होगा और कब इसका विलय पंजाब में होगा। प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व के सामने अनेक प्रकार की चुनौतियां भी पैदा हुई थीं। मगर प्रदेश की जनता ने ईमानदारी तथा मेहनत के मार्ग को चुना।

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अनेकों मुसीबतों में भी घुटने नहीं टेके, कभी केंद्र से भीख नहीं मांगी सिर्फ अपने अधिकारों के लिए पैरवी की। इसी का नतीजा यह हुआ कि आज हिमाचल प्रदेश उत्तरी भारत में अनेकों भौगोलिक समस्याओं के कारण भी तीव्र गति से विकास तथा बेहतर जीवनशैली मुहैया करवाने वाला राज्य बन गया है।

सरकार के सामने कड़ी चुनौती
औद्योगिक निवेश से प्रदेश की अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा का संचार होगा लेकिन निवेशकों को बेहतर सुविधाएं मुहैया करवाना भी पहाड़ जैसी बड़ी जिम्मेदारी से कम नहीं है। निवेशकों को भूमि मुहैया करवाने में धारा 118 तथा अन्य कानूनी औपचारिकताओं से छेड़छाड़ प्रदेश की जनता को नहीं भाती है। विपक्ष भी जयराम सरकार के हर दांव-पेंच पर कड़ी नजरें गड़ाए हुए है। यदि निवेशकों को भूमि चयन, बिजली, पानी तथा सड़क मार्ग इत्यादि बुनियादी सुविधाओं में ही समस्याओं का सामना करना पड़ेगा तो कोई भी निवेशक प्रदेश में दिलचस्पी नहीं दिखाएगा।

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इतिहास इसका गवाह है कि निवेशक प्रदेश में निवेश तो करना चाहते हैं लेकिन कानून के झमेले में पढ़ कर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते। वर्तमान समय में प्रदेश के सड़कों की हालत भी अच्छी नहीं है और प्रदेश में आवागमन का मुख्य मार्ग सड़कें ही है, निवेशकों को भी सड़क मार्ग से गुजर कर ही अपने उद्योगों को स्थापित करना होगा। जयराम सरकार को सबसे पहले सड़कों के जाल को सुदृढ़ करना होगा तथा अधिकारी वर्ग से भी सचेत रहना होगा। अधिकारी वर्ग भी निवेशकों की फाइलों को टेबलो में इस तरह से घुमाता है कि निवेशक को नानी याद आ जाती है।

उसके बाद विपक्ष को प्रदेश के विकास में साझेदार बनाने का भरसक प्रयास करना होगा। वर्तमान समय में सोशल मीडिया पर भ्रामक खबरों की भी भरमार छाई हुई है। धारा 118 पर सोशल मीडिया पर फैली भ्रामक खबरों ने मुख्यमंत्री को भी चौंका दिया था। इससे भी जयराम सरकार को बचना होगा तभी औद्योगिक निवेश की धरातल तक पहुंच सुनिश्चित हो पाएगी।

जयराम से प्रदेश को हैं उम्मीदें 
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में देखें तो भाजपा के नेता शांता कुमार पानी के मुख्यमंत्री तथा प्रेम कुमार धूमल सड़क के मुख्यमंत्री के नाम से जाने जाते हैं। अब भाजपा के तीसरे मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को प्रदेश की जनता ने प्रचंड बहुमत देकर सत्तासीन किया हैl। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जय राम किस मुख्यमंत्री की उपमा से प्रसिद्ध होते हैं।

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वर्ष 2017 में जब जयराम सरकार बनी थी तो “रामराज्य” की स्थापना का सपना प्रदेश की जनता देख रही थी। लेकिन पिछले कुछ समय से प्रदेश में सड़क दुर्घटनाएं, नशाखोरी, हुड़दंग तथा गुंडागर्दी, मासूमों के साथ बलात्कार तथा निर्मम हत्याएं थमने का नाम नहीं ले रही है। इससे प्रदेश की छवि को वैश्विक पटल पर शर्मसार कर रही हैl। जयराम सरकार को कानून व्यवस्था को भी सुदृढ़ करना होगा ताकि प्रदेश की जनता यूपी, बिहार जैसे राज्यों की तरह बनने से बच जाएं।

निवेशकों से जिस तरह से मुख्यमंत्री को आश्वासन व प्रोत्साहन मिला है यह प्रदेश की भविष्य के लिए एक सकारात्मक दृष्टिकोण है। प्रदेश की जनता भी इस पुनीत कार्य में अपना भरपूर योगदान देने के लिए वचनबद्ध हो तो प्रदेश आने वाले समय में भारत में ही नहीं वैश्विक पटल पर एक समृद्ध तथा विकसित राज्य के रूप में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

(लेखक कर्म सिंह ठाकुर हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के सुंदरनगर से हैं। उनसे 98053 71534 पर संपर्क किया जा सकता है।)

सरकारें पहले लोड लेतीं तो ओवरलोडिंग की समस्या न होती

इन हिमाचल डेस्क।। समस्या ओवरलोडिंग नहीं है, समस्या है नेताओं का बिल्कुल लोड न लेना। अगर प्रदेश के कुछ बड़बोले नेताओं ने गप्पे हांकने के बजाय समय पर जमीनी हालात को समझकर जनता की समस्याओं को दूर करने के लिए परिवहन के इंतजाम किए होते तो आज यात्रियों को यूं suffer न करना पड़ता, बच्चों को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता।

बसें न मिलना, यात्रियों को बसों पर न चढ़ाना, लोगों का इसे लेकर प्रदर्शन करना- प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से आ रही इन तस्वीरों और वीडियो के लिए आज की ही नहीं बल्कि पिछली सरकारें भी जिम्मेदार हैं। इसमें कोई शक नहीं प्रदेश में पिछले दो दशकों में सड़कें बढ़ी हैं और बसों की संख्या भी। मगर किसी सरकार ने प्लैनिंग के साथ परिवहन नीति नहीं बनाई न आज इसपर कोई अमल हो रहा है।

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रुट ढंग से नहीं बनाए गए। यहीं नहीं, जहां जरूरत थी, वहां एचआरटीसी के डिपो नहीं दिए गए तो कहीं परिवहन मंत्रियों के इलाके में जबरन डिपो दे दिए गए, खड्डों में अड्डे बनाकर बसें खड़ी कर दी गईं। अब कहीं बसें खड़ी हैं तो कहीं बसें कम हैं।

एक और बात, विभाग को बसें किसी विधायक के पिछलग्गू प्रधान की सिफारिश के आधार पर नहीं बल्कि अपने डेटा के आधार पर लगानी चाहिए। विभाग को पता होना चाहिए कि कहां कितने बजे किस कपैसिटी की बसों की जरूरत है। उसे पता होना चाहिए कि कितनी बसें इस साल कंडम होंगी और उनका रिप्लेसमेंट चाहिए होगा। उसे यह भी पता होना चाहिए कि कितने ड्राइवर-कंडक्टर चाहिए, कितने रिटायर होने वाले हैं। प्यास लगने पर ही कुआं खोदा जाएगा क्या?

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साथ ही चरस गांजे के लिए नाका लगाकर रोज खड़े होने वाले पुकिसकर्मी आंखें बंद न रखें। वे ओवरलोडिंग करने वाली गाड़ियों और नियम तोड़ने वाले लोगों के चालान भी करें। इतनी सी मल्टीटास्किंग तो की जा सकती है। अगर पहले से इन बातों पर ध्यान दिया गया होता आज जैसे हालात पैदा न होते।

‘बिना नहाए मैले-कुचैले बदबूदार कपड़ों में स्कूल आएं अध्यापक’

अब अध्यापकों को बिना नहाए, फटे-पुराने, बदबूदार और मैले-कुचैले कपड़ों में स्कूल आना होगा। स्कूलों में बढ़ती छेड़छाड़ और दुष्कर्म की घटनाओं को देखते हुए यह फैसला किया गया है।

आई.एस. ठाकुर।। इस आर्टिकल का शीर्षक और ऊपर की ये पंक्तियां व्यंग्यात्मक हैं मगर वह दिन दूर नहीं जब कोई अधिकारी ऐसा ही फरमान जारी कर देगा। हो सकता है कि आने वाले दिनों में उन अध्यापक-अध्यापिकाओं को नौकरी से हटाने का फरमान जारी हो जाए जो देखने में अच्छे हों। हो सकता है कि भर्ती का भी नया नियम बना दिया जाए जिसके तहत गुड लुकिंग व्यक्ति टीचर न बन पाए क्योंकि उनके कारण स्कूल का माहौल खराब हो सकता है। ये बातें आपको अतिशयोक्ति लग रही होंगी मगर नीचे स्क्रीनशॉट में जो आप पढ़ेंगे, वह बाकायदा खबर है और कई अखबारों में प्रकाशित हुई है।

सवाल उठता है कि खबरों में जो लिखा गया है कि सज-धजकर न आएं, उसका मतलब क्या है? क्या अध्यापक स्कूलों में सेहरा बांधकर पहुंचते हैं या फिर अध्यापिकाएं ब्राइडल मेकअप लेकर आती हैं? यही नहीं, जब इस खबर को लेकर उच्च शिक्षा निदेशक की आलोचना हुई तो एक ही दिन बाद अब अध्यापकों के लिए ड्रेस कोड लाने का शिगूफा छेड़ दिया गया।

कुतर्क न दिया जाए
दरअसल उच्च शिक्षा निदेशक की ओर से अध्यापकों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान दी गई नसीहत बताती है कि उन्हें शायद यह पता ही नहीं है कि यौन अपराध होते क्या हैं और उन्हें रोकने के लिए क्या किया जा सकता है। वह शायद कुछ नया करने के लिए अपनी पुरातन सोच के हिसाब से यह कदम उठाने के लिए आमादा हैं।

स्कूली अध्यापकों का ड्रेस कोड तय करना है तो कर दीजिए। कई सालों से कई लोग यह शिगूफा समय-समय पर छोड़ते रहे हैं। वैसे भी सरकार कुछ भी कर सकती है और सरकारी कर्मचारी उसे मानने के लिए बाध्य होते हैं। मगर इस ड्रेस कोड लागू करने के लिए ये कुतर्क न दिए जाएं कि यौन अपराधों को रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है क्योंकि दोनों बातों में कोई संबंध ही नहीं है।

अध्यापकों की ड्रेस से यौन शोषण का क्या संबंध?
मामला है कुछ अध्यापकों द्वारा बच्चों के यौन शोषण की घटनाओं का। तो इसका अध्यापकों के पहनावे से क्या संबंध? क्या शिक्षा निदेशक को यह लगता है कि अध्यापकों के सज-धजकर आने से बच्चे उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं और फिर यौन आचरण के लिए आमंत्रित करते हैं या अपने साथ यौन शोषण होने पर कुछ कहते नहीं हैं? या फिर वह यह कहना चाहते हैं कि वेल ड्रेस्ड अप टीचरों का इरादा ठीक नहीं होता? उनकी बात का तो यही मतलब निकलता नजर आता है।

बच्चों के प्रति, बच्चियों के प्रति गलत निगाह रखने और उन्हें आसान शिकार समझ निशाना बनाने वाले लोग समाज में हर जगह हैं। वे परिवारों में हैं, गांवों में हैं, स्कूलों में हैं, दफ्तरों में हैं, कहां नहीं हैं? इससे निपटने के लिए क्या हर किसी को चोला पहना दिया जाए? और अगर कोई ऐसा अपराधी है, जिसकी सोच गंदी है तो क्या सादे कपड़े पहनने से उसकी सोच बदल जाएगी? क्या वह ऐसी हरकत नहीं करेगा?

जो करना है, वह करना नहीं है और फालतू के काम करने हैं। यौन अपराधों को लेकर स्कूलों में बच्चों को अवेयर करने के लिए एक प्रयास अब तक गंभीरता से नहीं किया गया। गुड टच, बैड टच सिखाने की बात नहीं की गई। स्कूलों में अध्यापकों को एक-दूसरे पर सजग होकर नजर रखने की जिम्मेदारी निभाने और शिकायतों पर तुरंत ऐक्शन के लिए कार्य योजना बनाने की बात नहीं की गई। बस अध्यापकों पर फरमान थोप दो वह भी कुतर्क के आधार पर और जिसका कोई असर होना भी नहीं है।

बच्चों के रोल मॉडल अध्यापक
यह बात सही है कि अध्यापक बच्चों के आदर्श होते हैं वे उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। मगर यह बात ध्यान में रखिए कि वेल ड्रेस्ड अप होना आपको आत्मविश्वास देता है। अगर कोई अध्यापक या अध्यापिका खुद को अच्छे से कैरी करके स्कूल आते हैं, इसका मतलब यह नहीं कि वे बच्चों को या किसी और लुभाने के लिए ऐसा कर रहे हैं। बल्कि यह उन्हें आत्मविश्वास देता है। ठीक उसी तरह, सरकारी स्कूलों में आपने प्राइवेट स्कूलों की तरह टाई इसीलिए लगाई ताकि वे खुद को हीन न समझें।

रही बात फैशन की ओर आकर्षित होने की, तो जनाब! स्कूल से बाहर बच्चों को क्या फैशन को लेकर एक्सपोजर ही नहीं है? क्या वे टीवी, मोबाइल, बड़े भाई-बहनों से कटे हुए हैं जो उन्हें फैशन पता अध्यापकों से ही चलेगा? और वैसे भी फैशन का यौन अपराधों के क्या संबंध? आपकी यह हिदायत उसी सोच का एक हिस्सा है जिसके तहत यौन अपराधों के लिए दोषियों के बजाय पीड़ितों के पहनावे को जिम्मेदार बता दिया जाता है। और आप तो उससे भी उलट यह कह रहे हैं कि सज-धजकर आने वाले यौन अपराधों को अंजाम दे सकते हैं। इससे हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है?

अगर अध्यापकों पर आपको नकेल कसनी है, खुद की उपयोगिता दिखानी है तो आप ड्रेस कोड लागू कर दीजिए, किसी ने आपको नहीं रोका। मगर कम से कम यह कुतर्क न दीजिए कि यह कदम रेप रोकने के लिए उठाया जा रहा है। इससे अध्यापकों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा मगर सभ्य समाज में आपकी खिल्ली जरूर उड़ जाएगी कि देखिए, कैसे ऊंचे पद पर बैठे अधिकारियों को बुनियादी चीजों तक की समझ नहीं है।

(लेखक हिमाचल प्रदेश से जुड़े विषयों पर लिखते रहते हैं, उनके kalamkasipahi @ gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

ये लेखक के निजी विचार हैं

कांगड़ा जैसी घटना अंबाला में भी? लड़ाकू विमान ने गिराए फ्यूल टैंक और प्रैक्टिस बम

अंबाला।। अंबाला में एयरफोर्स स्टेशन से उड़ान भरने वाला भारतीय वायुसेना का एक जगुआर लड़ाकू विमान हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बचा। उड़ान भरते ही इंजन से एक पक्षी टकरा जाने के कारण इसमें गड़बड़ी आ गई। ऐसे में विमान को हादसा टालने के लिए न सिर्फ फ्यूल टैंक गिराने बड़े बल्कि वजन कम करने के लिए प्रैक्टिस बमों को भी गिराना पड़ा।

ये चीजें शहर के बलदेव नगर में गांधी मैदान के साथ लगी बाड़ पर गिरे। इनके गिरने से जोरदार धमाके हुए और धुआं उठने लगा। इस घटना में किसी के हताहत होने की खबर नहीं है। पायलट भी जहाज को सुरक्षित उतारने में कामयाब रहा है।

उधर अंबाला में फ्यूल टैंक गिरने के बाद लोगों को लगा कि भूकंप आया है तो वे बाहर निकल गए। एयरफोर्स के अधिकारी और पुलिस टीम भी मौके पर पहुंची। भीड़ को मौके से हटाकर वहां गिरे अवशेषों को वायुसेना ने अपने कब्जे में ले लिया है।

गौरतलब है कि एक दिन पहले ऐसी ही घटना हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा में सामने आई है जहां पर आसमान में विमानों से गुजरने के बाद धमाके सुनाई दिए और एक जगह पर आग भी लग गई थी। हो सकता है कि बुधवार को कांगड़ा में भी अंबाला जैसे ही हालात के कारण ऐसा हुआ हो। हालांकि हिमाचल पुलिस अभी तक इस घटना की जांच कर रही है।

हिमाचल वाली घटना क्या है, पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें-

कांगड़ा: ‘ऊपर से जहाज उड़े, धमाका हुआ, जंगल में लग गई आग

बसों की कमी और ओवरलोडिंग पर हरकत में आई सरकार, लिए ये फैसले

शिमला।। कुल्लू जिले के बंजार में हुई बस दुर्घटना के बाद ओवरलोडिंग को लेकर बरती जा रही सख्ती से लोगों को हो रही असुविधा के बाद परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर ने परिवहन अधिकारियों के साथ मीटिंग की। इसके बाद मुख्य सचिव बी.के. अग्रवाल ने भी अधिकारियों से बैठक की।

इस दौरान अधिकारियों से पूछा गया है कि फिलहाल हालात को देखते हुए बसों में कितनी प्रतिशत ओवरलोडिगं की इजाजत दी जा सकती है। इसके लिए एक दिन के अंदर रिपोर्ट देने के लिए कहा गया है।

परिवहन मंत्री गोविंद ठाकुर

गौरतलब है कि कुल्लू में बरती जा रही सख्ती के कारण बस चालक अतिरिक्त लोगों को नहीं बिठा रहे हैं। कहीं कहीं तो कुछ बसें लोकल रूट की सवारियों को नहीं बिठा रही हैं। इससे छात्रों को भी असुविधा हुई जिससे उन्होंने प्रदर्शन करके नारेबाजी भी की थी।

परिवहन मंत्री के साथ हुई बैठक में ये फैसले लिए जाने की बात सामने आई है-

  • जहां ओवरलोडिंग की समस्या है, उन इलाकों में अस्थायी परमिट दिए जाएंगे।
  • रूट पर बसें न चलाने वाले ऑपरेटरों के परमिट रद्द किए जाएंगे।
  • ग्रामीण इलाकों में अगस्त से 124 नए रूट देना शुरू किया जाएगा।
  • अगले दो सालों के अंदर वाहनों की फिटनेस की जांच मशीनों से करने की व्यवस्था की जाएगी।
  • टैक्स जमा करने वाले ट्रांसपोर्टरों के लिए स्पेशल ट्रेनिंग कैंप लगाया जाएगा।
  • कॉन्ट्रैक्ट कैरेज बसों को रेग्युलेट किया जाएगा।

  • प्रदेश की सभी स्कूल बसों की जांच का काम तीन महीने के अंदर पूरा किया जाएगा।
  • परिवहन विभाग में अधिकारियों और कर्मचारियों के खाली पद भरे जाएंगे।
  • सड़क सुरक्षा जागरूकता के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों की मदद ली जाएगी।
  • राजस्व बढ़ाने के टारगेट को समय से पहले पूरा करने की कोशिश की जाएगी।

कांगड़ा: ‘ऊपर से जहाज उड़े, धमाका हुआ, जंगल में लग गई आग’

कांगड़ा।। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के फतेहपुर में आसमान से बम गिरने से जंगल में आग लगने की अफवाह फैली हुई है। चर्चा है कि धमाके के समय आसमान में दो विमान भी उड़ रहे थे।

दरअसल घटनास्थल के पास मौजूद बच्चों का दावा है कि जब उन्हें धमाका सुनाई दिया तो उसके बाद उन्होंने आसमान से दो जहाजों को जाते हुए देखा। इस धमाके की आवाज को 10 -15 किलोमीटर के दायरे तक सुना गया।

क्या बोले बच्चे
घटनास्थल के नजदीकी गांव भटोली गिलड़ा के स्कूली बच्चे संगम,तुषार और आर्यन खेतों में पेड़ों की छाया में खेल रहे थे। उनका दावा है कि अचानक करीब एक बजे जोर का धमाका सुनाई दिया जिसे सुन वे डर के मारे भाग खड़े हुए। इतने में उनका चाचा किशोर कुमार घर पहुंचे तो उन्होंने धमाके के बारे में बताया।

चाचा किशोर कुमार का कहना है कि जब वे धमाके वाले क्षेत्र के पास पहुंचे तो उन्होंने पाया कि उकट स्थान पर जंगल में आग भड़क चुकी है। तब उन्होंने इस बात की जानकारी वन विभाग को दी।

 

ऐसे में धमाके के बारे में यह चर्चा हो रही है कि हवाई जहाजों द्वारा बम या कोई ज्वलनशील पदार्थ वहां गिराया गया होगा, जिसकी वजह से ये आग भड़की। मगर धमाके की आवाज सोनिक बूम के कारण भी हो सकती है और आग लगने का कोई और कारण भी हो सकता है। बच्चों में कल्पनाशीलता होती है वे नटखट भी होते हैं। ऐसे में आग के कारणों को लेकर बच्चों के दावों पर पूरी तरह यकीन नहीं किया जा सकता।

क्या कहती है पुलिस
एसपी कांगड़ा कार्यालय का कार्यभार देख रहे डीआईजी कांगड़ा संतोष पटियाल का कहना है कि पुलिस ने घटनास्थल का मुआयना किया है और जांच के बाद ही यह स्थिति स्पष्ट हो पाएगी कि आग लगाने के पीछे क्या कारण था।

https://inhimachal.in/special/educative/truth-behind-mysterious-blast-in-sundernagar/

कंसल्टेंट ने दिया सुझाव- प्लास्टिक के कचरे से बनाओ पेट्रोल-डीजल

अमित पुरी, धर्मशाला।। नगर निगम धर्मशाला में सुलग रही डंपिंग साइट की आग पर काबू पाने के लिए नगर निगम ने कोशिशें तेज कर दी हैं। निगम प्रशासन के आग्रह पर धर्मशाला पहुंची दिल्ली की कंसल्टेंट डॉक्टर श्यामला के. मणी ने बुधवार को डंपिंग साइट सहित विभिन्न वार्डों का दौरा किया।

जानकारी के अनुसार डॉ. श्यामला ने निगम अधिकारियों को सुझाव दिया है कि इस कचरे में प्लास्टिक वाले कचरे से फ्यूल उत्पादित किए जाने पर विचार किया जाए। उन्होंने बताया कि प्लास्टिक कचरा फ्यूल बनाने में काम आ सकता है।

डॉ. श्यामला ने कहा कि 5 टन प्लास्टिक कचरे से 2 टन फ्यूल तैयार किया जा सकता है, जिसमें 8 फीसदी पेट्रोल होगा और बाकी डीजल। इसके अतिरिक्त कंसल्टेंट ने कहा कि बायो मिथिनेशन प्लांट भी लगाया जा सकता है। उन्होंने कहा, “अलग-अलग कचरे से विभिन्न उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।”

बुधवार को कंसल्टेंट ने मैक्लोडगंज, डंपिंग साइट, विभिन्न कम्पोस्टिंग यूनिट सहित अंडरग्राउंड डस्टबिन का भी निरीक्षण किया। एक्सईएन, नगर निगम धर्मशाला संजीव सैनी ने जानकारी देते हुए बताया कि कंसल्टेंट द्वारा बुधवार को मैक्लोडगंज, डंपिंग साइट, कम्पोस्टिंग यूनिट व अंडरग्राउंड डस्टबिन का निरीक्षण किया गया है। उनके द्वारा प्लास्टिक कचरे से फ्यूल तैयार करने तथा डंपिंग साइट की आग पर काबू पाने बारे कुछ सुझाव दिए गए हैं।

क्या प्लास्टिक से बन सकता है पेट्रोल?
प्लास्टिक से ज्वलनशील ईंधन बनाने की प्रक्रिया को प्लास्टिक पाइरोलिसिस कहते हैं। इससे बनने वाले ईंधन से अलग-अलग करके एक विकल्प को डीजल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। हाल ही में हैदराबाद के एक शख्स ने दावा किया था वह 500 किलो प्लास्टिक से 400 लीटर ईंधन बना सकते हैं। यह प्रक्रिया महंगी है और चलन में कम है। ऐसे में देखना होगा कि धर्मशाला को लेकर कंसल्टेंट की ओर से दिया गया सुझाव कितना व्यावहारिक साबित होता है।