सरकार ने क्यों बहाल किए गुड़िया केस से जुड़े पुलिसकर्मी: मनकोटिया

धर्मशाला।। पूर्व मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने गुड़िया मामले में राज्य के नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठाए हैं। मनकोटिया ने धर्मशाला में पत्रकारों से बात करते हुए यह भी पूछा कि राज्य सरकार ने गुड़िया केस और हिरासत में एक अभियुक्त की मौत के मामले में शामिल पुलिसकर्मियों को क्यों बहाल किया है।

मनकोटिया ने कहा कि सरकार को कारण बताना चाहिए कि उसे इन पुलिसकर्मियों को फिर से नियुक्ति देने की इतनी जल्दी क्यों थी। गौरतलब है कि कोटखाई मामला हैदराबाद वाली घटना की तरह ही था जहां दुराचार के बाद पीड़िता की हत्या कर दी गई थी। कोटखाई मामले में सीबीआई ने एक चरानी को अभियुक्त बनाया है मगर पीड़िता के परिजनों का कहना है कि यह एक शख़्स का काम नहीं था।

मनकोटिया ने कहा, “शुरू में कुछ मुख्य आरोपियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं। बाद में मुझे पता चला कि उनमें से कुछ देश से बाहर चले गए। पुलिस ने कुछ मासूम लोगों को पकड़ा और उनमें से एक को हिरासत में मार डाला।”

सीबीआई ने गुड़िया केस में कुछ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के ऊपर सबूत मिटाने और अभियुक्त सूरज की हत्या के मामले में केस दर्ज किया गया है। इसके बावजूद जमानत पर बाहर आए पुलिसकर्मियों को बहाल कर दिए जाने को मनकोटिया ने ग़लत बताया है। उन्होंने कहा, “इससे ऐसे जघन्य अपराधों को लेकर जयराम सरकार के रवैये का पता चलता है।”

मनकोटिया ने कहा, “राज्य के आम लोगों को अभी भी लगता है कि असल दोषियों को उनके राजनीतिक आकाओं ने बचा डाला। अब जबकि हत्या और महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों को लेकर देशभर में गुस्सा है, राजनीतिक नेतृत्व को गुड़िया केस मामले में भी स्पष्टता बरतनी चाहिए।”

बता दें कि पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने भी सीएम जयराम से माँग की है कि एक बार फिर गुड़िया मामले की जाँच की जाए।

शिमला के गुड़िया मामले की दोबारा हो जांच: शांता कुमार

शिमला के गुड़िया मामले की दोबारा हो जांच: शांता कुमार

शिमला।। पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने शिमला के कोटखाई में हुए गुड़िया केस की फिर से जांच किये जाने की जरूरत बताई है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने सीएम जयराम ठाकुर से आग्रह किया है कि इस मामले में फिर से जांच होनी चाहिए #ताकि हिमाचल के माथे पर लगे कलंक को मिटाया जा सके।’

क्या बोले शांता
पूर्व सीएम शांता ने कहा कि इस मामले को लेकर एक योग्य अधिकारियों की टीम गठित की जाए। उन्होंने कहा, “हिमाचल में कई योग्य अधिकारी हैं और उनमें कुछ रिटायर भी हैं। उन अधिकारियों की मदद भी ली जा सकती है।”

शांता ने कहा कि लोगों के बयान लेकर शक के दायरे में आए लोगों को गिरफ्तार किया जाए। उन्होंने कहा, “जब मामले में बड़े पुलिस अधिकारी अंदर रह सकते हैं तो लोगों के शक में आए लोगों को क्यों नहीं गिरफ्तार किया जाता है।”

उन्होंने कहा कि ‘इस मामले में सीबीआई की जांच तो लोगों में मजाक बन कर रह गई है। मामले में साफ है कि इसमें बड़े लोगों को बड़े लोगों ने ही बचाया है।’

वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, “पूर्व कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हुए इस मामले का भाजपा ने जम कर विरोध किया था, पार्टी सड़कों पर उतरी थी। लिहाजा, अब समय आ गया है कि इस मामले में फिर से जांच कर एक कोशिश करनी होगी।”

शांता ने आरोप लगाया, “मामले के साक्ष्यों को भले ही मिटाया गया है, लेकिन हत्या के सबूत कहीं न कहीं मिल ही जाते हैं।”

उन्होंने भारत सरकार से भी कहा कि दुष्क र्म पर जल्द कानून बनना चाहिए। संसद चली हुई है, इसमें कानून पारित करना चाहिए। इसमें दुष्क र्म साबित होने पर छह माह के अंदर आरोपियों फांसी हो। शांता ने कहा कि पुलिस चाहे तो हैदराबाद जैसे अंजाम दे सकती है और चाहे तो गुड़िया मामले की तर्ज पर अपराधियों को बचा सकती है।

ईसा मसीह और हिमाचल में नड़ के जी उठने में क्या है समानता?

यतिन पंडित।। जॉन दी बैप्टिस्ट ने एक फरिश्ते की मदद से यीशु को एक आवरण प्रदान किया था। जिसके पश्चात वे इस जगत में वो सब कर पाए जो उन्हें यीशु बनने के लिए आवश्यक था। या कहें इसी घटनाक्रम के बाद उनमें पारलौकिक शक्तियां आई थीं। – Via : Zohar stargate ancient discovery youtube channel (Translated)

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम का वर्णन विलियम हेनरी/William Henry ने अपनी पुस्तक “The Secret Of Sion” में किया है। उनके अनुसार जॉन बैप्टिस्ट ने यीशु के शरीर को किसी वाइब्रेशन से और विभिन्न विद्युतीय सतरंगी तरंगों से परिपूर्ण करवाया था। अपने एक लेक्चर वे इंगित करते हैं कि क्रिश्चियन मान्यताओं में भी कुछ अन्य स्थानों पर इसका वर्णन आता है।

परंतु इन शक्तियों के प्राप्त होने के बावजूद यीशु को कैसे क्रुसिफिक्स किया गया? ऐसा विचार अक़्सर आता है; क्रुसिफिक्स के समय वे शक्तियां या कलाएं कहां थीं जो जॉन बैप्टिस्ट ने उन्हें दीं थीं?

बचपन में क्रिश्चिएनिटी की कहानियों में सबसे ज़्यादा हैरान करने वाला कथानक यीशु का क्रॉस पर प्राण त्यागना और उसके पश्चात फिर से लौट आना लगता था। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे हिमालय की दुर्लभ संस्कृति से अधिक साक्षात्कार हुआ; और जब कुछ अन्य अद्भुत अनुभवों से सामना हुआ तो यीशु का यह री-इन्कार्नेशन वाला कथानक उनके समक्ष गौण लगने लगा।

चलिए, आज इसी इंकार्नेशन और यीशु की प्रमुख कला को ध्यान में रखते हुए उनके व्यक्तित्व के एक पहलू को हिमालय की प्राचीन संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं।

सबसे पहले यहां यह प्रश्न आवश्यक है कि, यहां ऐसा कौन है जो मरकर फिर से ज़िंदा होता है?

बेशक, मैदानी इलाकों के लोग इस कबाइली प्रक्रिया से वाकिफ़ नहीं होंगे, परंतु हिमालय के लोग, सम्भवतः अंदरूनी हिमालय के लोग भली भांति जानते हैं कि “ऐसा कौन है जो मरकर ज़िंदा होता है?”
इसका उत्तर है नड़, या जिसे स्थानीय आम बोलचाल की भाषा मे नौड़ कहा जाता है। हिमालय में नड़ प्रजाति का देव कारिंदा वो एकमात्र व्यक्ति है, जो आज भी मरकर पुनः जीवित होता है। यह हिमालय की एक कबाइली प्रथा है। इस प्रथा को निभाने के लिए यहां एक विशेष आयोजन किया जाता है जिसे ‘काहिका’ कहते हैं। जिसमे स्थानीय देवता नड़ के प्राण जाने के बाद उसे पुनः जीवित करते हैं।

पहले थोड़ा सा इस बात पर प्रकाश डाल लेते हैं कि वास्तव में नड़ समुदाय क्या है और इनका क्या महत्व है। ऊपरी हिमालय के संदर्भ में अधिकतर लोग अभी केवल शामन्स से परिचित होंगे। नड़ या नौड़ अधिकांश लोगों के लिए एक बिल्कुल नया नाम हो सकता है। आपको बता दें कि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िला में नड़ समुदाय का अस्तित्व है। यह समुदाय अधिक चर्चित नहीं परंतु इसी प्रजाति से सम्बंधित एक अन्य घटनाक्रम बेहद चर्चित है। हिमाचल के निरमण्ड और शिमला ग्रामीण में मनाया जाने वाला ‘भूंडा उत्सव’ बहुत प्रसिद्ध है। जिसमे देव परम्परा के अनुरूप चयनित एक व्यक्ति को रस्से पर बांधकर खाई की ओर भेजा जाता है। यह उत्सव प्राचीन काल के नरमेध यज्ञ का कबाइली स्वरूप माना जा सकता है।

प्राचीन है हिमाचल की देव पंरपरा

इसी प्रकार से ज़िला कुल्लू में मनाया जाने वाला “काहिका” देव-उत्सव भी इसी प्रथा का एक अलग स्वरूप है। जिसमे बलि के लिए चयनित व्यक्ति ‘नौड़’ कहलाता है। ऐसा माना जाता है कि नड़/नौड़ समुदाय एक ही खानदान के वंशज होते हैं, जिन्हें इस परम्परा को निभाने के लिए चयनित किया जाता है। कुल्लू की देव परम्परा में काहिका उत्सव से जुड़ा एक नियम यह भी है कि, यदि मरने के बाद नड़/नौड़ देवताओं की शक्ति से जीवित ना हो पाए तो संबंधित देवता की सारी संपत्ति उसकी पत्नी को दे दी जाती है।

बेशक आज यह प्रथा प्रतीकात्मक रूप में निभाई जाती हो और कालांतर में इस प्रथा में कुछ बदलाव भी आए होंगे; परंतु नड़ समुदाय का अस्तित्व उतना ही पुराना है जितना पुराना पहाड़ों में बसने वाले कबीलों का अस्तित्व है; और विशेष बात यह है कि नड़ या नौड़ विशेष समुदाय का वह व्यक्ति है जो जगत के पाप स्वयं पर लेकर प्राण देता है और देव अनुकम्पा से पुनः जीवित होता है। ऐसा ही मिलता-जुलता वर्णन यीशु के विषय मे देखने को भी मिलता है। जिन्होंने जगत के पाप स्वयं पर लेकर अपने प्राणों की आहुति दी थी।

तो क्या, हम इस आधार पर यह मानें कि यीशु भी एक प्रकार के नड़ थे? हो सकता है यह विचार कहीं तक सही हो, पर यहां एक पक्ष और भी है।

यीशु के सम्बन्ध में आमतौर पर एक और बात भी सामने आती है। यह सर्वविदित है कि वे प्रभु का सन्देश लोगों तक पहुंचाते थे। वैसे भी यीशु के जीवन को यदि देखें तो वे जीवन पर्यंत परमात्मा के संदेश वाहक ही बने रहे। ऊपर जॉन बैप्टिस्ट और यीशु का जो वर्णन किया है, कि उन्होंने यीशु को एक आवरण के रूप में कलाएं प्रदान की, इसके बारे में एक मत यह हो सकता है कि यह दरअसल वह प्रक्रिया जॉन का यीशु को शामन/ओरेकल/गूर विद्या का ज्ञान देना है।

तो यहां अब दूसरा प्रश्न :

विश्व भर के प्राचीन कबीलाई कल्ट्स के अनुसार लोगों के लिए प्रभु का सन्देश/पैगाम कौन लाता है?

इसका सीधा जवाब है – गूर, जिसे अधिकतर लोग ओरेकल या शामन्स के रूप में जानते हैं।

सम्भवतः यह प्रणाली भी लगभग उतनी ही पुरानी है जितना पुराना नड़ समुदाय है।

तो, यहां एक सवाल यह भी उठता है कि क्या यीशु नड़ थे या देवताओं के ओरेकल/गूर थे?

इस प्रश्न के विपरीत, ऐसा बहुत कम देखने मे आता है कि कोई गूर या शामन इस प्रकार से पूजित हुआ हो, जैसे यीशु हुए हैं। हां, बेशक कुछ गूर पूजित हुए हैं, परंतु केवल कुछ एक विशेष परिस्थितियों में ही और बहुत ही सीमित मान्यता के अंतर्गत।

तीसरा पक्ष एक विचार यह भी देता है कि यीशु का नड़ होना या ओरेकल होना, दो प्राचीन प्रजातियों के मध्य उनके वर्णसंकर होने का संकेत हो सकता है।

ख़ैर… नड़ और गूर सम्प्रदाय तथा यीशु का इनमें से एक होना या ना होना, फिलहाल गहन तथा तार्किक शोध की मांग करता है। परंतु हिमालय की विभिन्न लोक परंपराओं के आधार पर देखें, तो यहां आज भी स्थानीय शामन प्रणाली इसी ओर इशारा करती है कि जो देवताओं का संदेश लाता है, वह गूर/शामन होता है। साथ ही, यहां की नड़ जाति और देवताओं से सम्बंधित परम्परागत प्रणाली हमे बताती है कि पाप छिद्रण अथवा प्रायश्चित के लिए इस समुदाय के लोग आज भी पहले की तरह ही अपने प्राणों की बलि देकर जगत के पाप अपने ऊपर लेते हैं। तथा दूसरों के लिए अपने प्राण देकर देव अनुकम्पा से पुनः जीवित होने की प्रथा को बनाए हुए हैं।

कई देशों की प्राचीन संस्कृतियों में शामन का स्थान अहम रहा है

संस्कृतियों के सापेक्ष अध्ययन में इस तरह की मिलती जुलती बातें सामने आना कोई नई बात नहीं है। एक जिज्ञासु होने के नाते वैसे भी हम सबके मन मे ऐसे बहुत से प्रश्न विचरते रहते हैं। यह भी सम्भवतः अभी एक नया विचार है, एक ऐसा विचार, जिससे परम्परागत सोच वाले लोगों को असहमति भी हो सकती है। परंतु यह एक नए पक्ष के रूप में हिमालय और अन्य संस्कृतियों के विभिन्न आयामों के अध्ययन को एक अलग दिशा दे सकता है। एक अलग आयाम और एक नए दृष्टिकोण के रूप में इस पर विचार करके, बहुत सी अबूझ बातों को समझने का प्रयत्न तो किया ही जा सकता है। नड़ और गूर सम्प्रदाय के विषय मे ऐसी कई गूढ़ बातें हैं जिनपर यदि गौर किया जाए, तो हमे अपने इतिहास और संस्कृति से सम्बंधित बहुत से सवालों के जवाब मिल सकते हैं। बस हमे यह ध्यान रखना होगा कि हिमालय की इन प्राचीन प्रथाओं का यथोचित सम्मान रखा जाए।

यहां.. हिमालय और हिमालय की अबूझ संस्कृति के संबंध में कृष्णनाथ जी की लिखी पंक्तियां याद आती हैं :―

हिमालय को कौन पूरा जान सकता है ? केवल हिमालय ही हिमालय को जानता है । या शायद …. वह भी नहीं जानता ! आँख ; आँख को कहाँ देख सकती है?

(लेखक यतिन पंडित कुल्लू से हैं और हिमाचल प्रदेश की संस्कृति व देव परंपराओं के इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं।)

कुल्लू का नाम ‘कुल्लू’ कैसे पड़ा, वजह शायद वो नहीं जो आप मानते हैं

उन्नाव में जलाई गई रेप विक्टिम का दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में निधन

दिल्ली।। उत्तर प्रदेश के उन्नाव में अभियुक्तों द्वारा जलाई गई रेप पीड़िता का शुक्रवार रात पौने 12 बजे निधन हो गया। पीड़िता को गंभीर हालत में दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया था जहां उसका इलाज चल रहा था।

अस्पताल के बर्न्स ऐंड प्लास्टिक के एचओडी डॉक्टर शलभ कुमार नर बताया कि 11.10 बजे लड़की के दिल की धड़कनें थम गईं। इसके बाद उसे बचाने की कोशिश की गई मगर 11.40 पर उसने दम तोड़ दिया।

 

बाकी टाइम पुलिस ढंग से काम करे तो ऐसे एनकाउंटरों की जरूरत न पड़े

आई. एस. ठाकुर।। हैदराबाद में डॉक्टर का बलात्कार दुखद था। उससे भी त्रासद है आरोपियों की पुलिस हिरासत में संदिग्ध मुठभेड़ में मौत। 4 निहत्थे आरोपी जिन्हें हवालात से कड़ी सुरक्षा के बीच ले जाया गया था, उन्हें काबू करने के लिए गोली ही मारनी पड़े, यह बात हजम नहीं होती। ऐसा लगता है पुलिस ने इन युवकों को अपनी खाल बचाने के लिए मार डाला।

गुड़िया केस याद कीजिये जब पुलिस ने नेपाली मजदूरों को रेपिस्ट बता केस सॉल्व करने का दावा किया था और सीएम ने पीठ थपथपाई थी। बाद में सीबीआई के पास केस जाने से पहले एक आरोपी की हिरासत में मौत हो गई और उस मामले में कई वरिष्ठ अधिकारी जेल जाकर लौटे हैं और अभी भी अभियुक्त हैं।

लोग कह रहे हैं कि हैदराबाद के आरोपियों ने जुर्म कुबूल किया था। रायन पब्लिक स्कूल गुरुग्राम में बच्चे की हत्या हुई थी तो पुलिस ने बस ड्राइवर की पिटाई करके उससे जुर्म कुबूलवा लिया था। ये तो सीबीआई जांच में पता चला कि पुलिस ने कहानी गढ़ी थी और असली हत्यारा एक स्टूडेंट ही है। यानी पुलिस की जांच पर पूरी तरह भरोसा नहीं किया जा सकता।

हैदराबाद में भी ऐसा न हुआ हो, इस बात की क्या प्रमाणिकता है? सब जान और मान रहे हैं कि यह सामान्य एनकाउंटर नहीं बल्कि प्लान बनाकर किया गया काम है। फिर आप कैसे पुलिस के इस काम को समर्थन दे सकते हैं? कोर्ट को न्याय करना था। जब तक कोर्ट किसी को दोषी नहीं ठहराता, उसे निर्दोष माना जाता हूं और अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है। उन्हें यह मौका नहीं मिला। मान लो कल को कोई आपको फंसा दे और फिर कोर्ट में केस जाने से पहले आपकी भी ऐसे जान चली जाए?

अगर यही लोग दोषी थे, इनके खिलाफ सबूत थे तो एनकाउंटर की क्या जरूरत आन पड़ी? एक तो पुलिस की आलोचना हो रही थी, फिर इसकी भी पक्की गैरन्टी नहीं कि पुलिस ने असली दोषी ही पकड़े थे और फिर इस केस के ऑफिसर ने 2008 में भी ऐसा ही एनकाउन्टर करके दो आरोपी मार डाले थे।

बाकी मौकों पर अगर पुलिस ढंग से काम करे तो किसी एक घटना में अपनी इज्जत बचाने के लिए फर्जी एनकाउंटर करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर पुलिस चुस्त रहे, शिकायतों को गंभीरता से ले, ढील न बरते और आधुनिक ढंग से सुबूत जुटाकर मजबूत केस बनाए तो कोर्ट में मामला भी जल्दी निपटेगा और सजा भी सख्त मिलेगी।

ऐसी व्यवस्था हो जाए तो कोई भी शख्स किसी तरह का अपराध करने से पहले सौ बार सोचेगा। वरना अभी अपराधियों को लगता है कि एक तो हम पकड़े नहीं जाएंगे और अगर पकड़ लिए गए तो जांच ऐसी वाहियात होगी कि आराम से बच जाएंगे।

इसीलिए हम शुरू से कहते हैं कि देश में पुलिस सुधारों की जरूरत है। स्मार्ट और अच्छे से ट्रेन्ड पुलिसकर्मियों को जरूरत है जो अपराधों को हाथ में पेन-पेपर लेकर खानापूर्ति करके नहीं बल्कि दिमाग इस्तेमाल करके सॉल्व करें।

(लेखक लंबे समय से हिमाचल से जुड़े विषयों पर लिख रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं। उनसे kalamkasipahi @ gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है)

ये लेखक के निजी विचार हैं

कुल्लू का नाम ‘कुल्लू’ कैसे पड़ा, वजह शायद वो नहीं जो आप मानते हैं

यतिन पण्डित।। हिन्दू पक्ष के अनुसार हमने बहुत सी किवदंतियां और बहुत से सन्दर्भ पढ़े हैं जिनमे कुलूत नाम का वर्णन अन्यान्य अपभ्रंशों के साथ जोड़ा जाता है।

विद्या चंद ठाकुर जी द्वारा कुल्लू नाम के विषय मे विस्तार से लिखा गया है, जिसके अनुसार वामन पुराण, महाभारत के कर्ण पर्व, कुलांतपीठ महात्म्य के अंतर्गत कुल्लू नाम से मिलते जुलते नामों का उल्लेख किया गया है। वहीं, कोलासुर, कुलौंउत राक्षस तथा कोली समुदाय से कुल्लू नाम के उध्दृत होने की संभावना भी प्रकट की गई है।

इसी प्रकार विद्या चंद ठाकुर जी के अलावा भी सभी देशी-विदेशी साहित्यकारों ने इन्हीं सन्दर्भों के आधार पर कुल्लू का नाम कुल्लू होने की संभावना व्यक्त करते हुए इस स्थान की कथा को आगे बढ़ाया है।

जहां तक सम्भावना और अनुमान की बात है, इस स्थान विशेष के लिए चीनी यात्री ह्वेन शांग द्वारा सम्बोधित नाम ‘क्लू-तो’ हमे इस नाम के एक अलग पक्ष को देखने पर मजबूर करता है। भोटी भाषा में ‘क्लू’ शब्द का अर्थ उस स्थान के विषय मे है जहां ‘snake gods’ रहते हों। ऐसे ‘snake gods’ जिनका जल पर अधिपत्य हो। अब यही नाम हिंदुकुश की काफ़िर प्रजाति के सम्बंध में देखिए। हिंदुकुश के प्रमुख पूर्व इस्लामिक देवताओं में से एक देवता हैं ― बागिष्त। बागिष्त देवता का दूसरा नाम ‘opkulu’ है। वहां भी ‘kulu’ शब्द जलधाराओं और नाग जाति की जलीय शक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है।

वैसे भी, कुल्लू में ऐसा कौन सा जलाशय या झरना है जिसका सम्बन्ध किसी ना किसी रूप में नागों के साथ ना आता हो? बारिश के देवताओं में भी यही नाग जाति के देवता ही प्रमुख माने जाते हैं। नागणी सौर, बूढ़ी नागिन, किसी तालाब या झील के पास ―नागे रा डेहरा और ऐसे ही अन्य सैंकड़ों स्थान, जहां नागों का जल पर आधिपत्य है। क्या यह नाग और जल का सम्बंध काफ़ी नहीं, समझने के लिए कि कुल्लू का नाम इस संदर्भ में भी तो हो सकता है। हम लोगों को हमेशा पौराणिक सन्दर्भों का गौरव आयात करने की आवश्यकता क्यों पड़ जाती है।

पुराण और गौरव गाथाओं का अपना महत्व है। वे अपनी जगह हैं और स्थानों से संबंधित वास्तविकता अपनी जगह।

Kulu नाम के विषय मे जहां तक मेरा निजी मत है, यह नाम हिंदुकुश और भोट भाषाओं में स्पष्ट रूप से जल से सम्बंधित देव शक्तियों को प्रस्तुत करता है। बाकी मान्यताओं के अनुसार आप जो भी मानते हों, उसका भी पूरा सम्मान है। चाहे किसी पुराण के व्याख्यान को मान लीजिए, या महाभारत के किसी अंश में वर्णित कुलूत नाम को।

पिछले वर्ष तक मैं भी यही मानता था, बस मेरी जिज्ञासु प्रवृति मुझे इन पौराणिक किवदंतियों पर विश्वास करने नहीं दे रही थी।

आने वाले वर्षों में बहुत से लोगों के लिए तार्किक शोध के विषय के रूप में kullu के नाम का वास्तविक उद्गम आपके समक्ष रख दिया है। हो सकता है कोई इस विचार पर बेहतर तरीके से आगे बढ़कर सशक्त खोज कर सके। सबकुछ सबके पास तो नहीं हो सकता ना! बेशक, इस विषय पर ह्वेन शांग और अन्य लेखकों के सन्दर्भों को कोट किया जा सकता है। पर वे सन्दर्भ कभी और शेयर करना बेहतर रहेगा। फिलहाल मानना ना मानना आपकी सहज बुद्धि पर निर्भर करता है। बाकी ब्रह्मांड पुराण का कौलान्तक पीठ पर लिखा गया खंड वैसे ही अस्तित्व में आया है, जैसे आदि मनु के लिखे गए 600 के लगभग श्लोक आज 2400 हो चुके हैं। #अलख_निरंजन🙏

(लेखक यतिन पंडित कुल्लू से हैं और हिमाचल प्रदेश की संस्कृति व देव परंपराओं के इतिहास में दिलचस्पी रखते हैं।)

हिमाचल के इंजीनियर क्यों पड़े हैं क्लास थ्री-फ़ोर नौकरियों के चक्कर में?

मयंक जरयाल।। पिछले महीने हिमाचल प्रदेश में 1195 पदों के लिए पटवारी की भर्ती परीक्षा हुई जिसमें प्रदेश के हजारों डिप्लोमा और डिग्रीधारक इंजीनियरों ने भी भाग लिया। बेरोज़गार इंजीनियरों पर जहां सोशल मीडिया पर चुटकुले, मीम शेयर कर उनकी दुर्दशा का ख़ूब मखौल उड़ाया गया, वहीं समाज के एक वर्ग ने उनके माथे पर महत्वाकांक्षाहीन तक लिख दिया।

क्या सच में प्रदेश के डिप्लोमा- डिग्रीधारी इंजीनियर महत्वाकांक्षाहीन हैं? इंजीनियरों की इस दुर्दशा के क्या कारण हैं? क्या वजह है कि वे इंजीनियरिंग सर्विसेज, गेट और एसडीओ की परीक्षाएं न दे कर तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के पदों पर अवेदन कर रहे हैं? इन सवालों का जवाब तलाशने की किसी ने कोशिश नहीं की।

क्यों है यह हालत
2003 में भारत सरकार ने पूर्व इसरो चेयरमैन यू.आर राव की अध्यक्षता में ‘देश में तकनीकी शिक्षा के हालात’ का जायज़ा लेने के किए एक कमेटी गठित की थी। उसी कमेटी की रिपोर्ट में राव साहब ने चेताया था कि अगर इसी गति से धड़ाधड़ इंजीनियरिंग शिक्षण संस्थान खुलते रहे तो निकट भविष्य में देश में इंजीनियरों की बाढ़ आ सकती है, जिसके अंजाम ठीक नहीं होंगे। राव साहब का कहना था कि जिस तेज़ी से इंजीनियर मैनुफैक्चर करने की फैक्ट्रियां खोली जा रही हैं, उस गति से देश में रोजगार के अवसर उत्पन्न नहीं हो रहे हैं।

राव कमेटी ने स्थिति काबू में लाने के लिए कुछ सुझाव सरकार को दिए थे जैसे-

● प्रति दस लाख की जनसंख्या पर इंजीनियरिंग की 350 सीटों से ज़्यादा किसी भी सूरत में हों (तब राष्ट्रीय औसत 150 सीटों का था)।

● फैकल्टी में केवल पीएचडी किये हुए शिक्षक ही नियुक्त किए जाएं ताकि शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट न आए।

● नए कॉलेज और सीटें आवंटित करने पर सरकार सख़्त रवैया अपनाए।

● जिन कॉलेजों में फैकल्टी व इंफ्रास्ट्रक्चर उपयुक्त नहीं है उन्हें तत्काल बन्द कर दिया जाए और अगले 5 साल कोई नए कॉलेज न खोले जाएं।

पर अफ़सोस भारत सरकार ने महान अंतरिक्ष वैज्ञानिक और आर्यभट्ट सैटेलाइट मिशन के वास्तुकार रहे प्रोफ़ेसर यू.आर राव के सुझावों को दरकिनार करते हुए अगले 10-12 साल में देश के हर नुक्कड़, हर गली मोहल्ले में इंजीनियरिंग कॉलेज खोल दिए।

हिमाचल प्रदेश इसका जीता जागता उदाहरण है। हिमाचल प्रदेश तकनीकी विश्विद्यालय से मान्यता प्राप्त 17 कॉलजों के अलावा अकेले इस छोटे से प्रदेश में 18 निजी विश्विद्यालय हैं। जिनमें से 10 अकेले सोलन जिले में हैं। उनमें भी 4 एक ही ग्राम पंचायत में! अधिकांश कॉलेजों में निम्न स्तर की शिक्षा प्रदान की जा रही है।

जहां 2004 में देश में 1500 इंजीनियरिंग कॉलेज थे वहीं 2016 तक आते आते कॉलेजों की संख्या 3415 पहुंच गई। 2005 में देश में इंजीनियरिंग की 5 लाख सीटें थी जो 2015 तक आते आते साढ़े 16 लाख हो गईं। इंजीनियरों की घटती मांग के बावजूद किसी मंदिर में लगे भण्डारे में बांटे जाने वाले हलवे के प्रसाद की भांति सीटें आवंटित की जाती रहीं।

पढ़ें- तकनीकी एवं उच्च शिक्षा के मामले में सुस्त और अदूरदर्शी रही है हिमाचल की पॉलिसी

राव कमेटी के सुझाव न मानने का नतीजा क्या हुआ?
ये बेरोज़गार इंजीनियरों की विशाल फ़ौज राव कमेटी के सुझावों को न मानने का ही नतीजा है। एस्पायरिंग माइंड्स कम्पनी के 2018 के राष्ट्रीयव्यापी स्तर पर हुए सर्वे के बाद देश में बहुत हो-हल्ला हुआ था। उस सर्वे के अनुसार देश के-

● 95% इंजीनियर कोडिंग के लिए अनुपयुक्त हैं। मतलब हर साल तैयार हो रहे 15 लाख में से लगभग सवा 14 लाख।

● केवल 1.4% इंजीनियर कंपाइल होने वाला कोड लिख सकते हैं।

● Tier 1 कॉलेजों की तुलना में Tier 3 कॉलेजों के विद्यार्थियों की कोडिंग स्किल्स 5 गुना बद्तर है।

अगर बेरोज़गार इंजीनियरों को एक अगर धर्म घोषित कर दिया जाए तो जनसंख्या के आधार पर ये हिन्दू धर्म और इस्लाम के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा धर्म होगा। हास्यास्पद लगने वाली ये बात बेहद निराशाजनक है।

जाहिर कारणों की वजह से निजी कंपनियों में अच्छी नौकरी प्राप्त करने में असफ़ल रहने के बाद बेरोज़गार इंजीनियरों का यह वर्ग जब तकनीकी रूप से अक्षम रह जाता है तो निराश हो कर सरकारी नौकरियों की तरफ़ रुख करता है जहां वह रोज़गार और बेहतर भविष्य की तलाश में चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों से भी गुरेज नहीं करता।

हां ये बात सच है कि मेहनत करने पर हालात और स्थिति को बदला जा सकता है। समाज में हमारे आसपास ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ तमाम मुश्किलों के बावजूद होनहार छात्रों ने सफ़लता हासिल की है। लेकिन इतने निम्न स्तर की तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने के बाद अधिकांश डिग्रीधारक खुद को इंजीनियरिंग सर्विसेज और गेट जैसी परीक्षाओं के लिए अनुपयुक्त पाते हैं। अंततः निराश हो कर तृतीय व चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरियों का रुख करते हैं।

पिछले साल भारत सरकार ने आईआईटी हैदराबाद चेयरमैन बी. वी. आर. मोहन रेड्डी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी देश में ‘इंजीनियरिंग शिक्षा हेतु लघु और मध्यम अवधि की योजना’ पर AICTE को सिफारिशें प्रदान करने के लिये। इस कमेटी की रिपोर्ट चिल्ला चिल्ला कर कहती है कि,

● 2020 से नए इंजीनियरिंग कॉलेज न खोले जाएं।

● सिविल, मेकैनिकल, इलेक्ट्रिकल जैसे परम्परागत पाठ्यक्रमों में तो ख़ास कर सीटें बढ़ाने की अनुमति बिल्कुल न दी जाए।

● इसकी जगह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ब्लॉकचैन, रोबोटिक्स, क्वांटम कंप्यूटिंग, डेटा साइंसेज, साइबर स्पेस, 3डी प्रिंटिंग और डिज़ाइन जैसी उभरती तकनीकों पर अंडरग्रेजुएट स्तर पर पाठ्यक्रम शुरू किए जाएं।

अभी भी देर नहीं हुई
खराब बुनियादी ढाँचे, संबंधित उद्योगों से जुड़ाव और प्रयोगशाला की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रहे देश के अधिकांश निजी शिक्षण संस्थानों में फीस तो भारी भरकम वसूलते हैं, लेकिन यहां इंटर्नशिप और रोज़गार का कोई प्रबन्ध नहीं होता है।

अधिकांश शैक्षिक संस्थानों में नवाचार, इन्क्यूबेशन और स्टार्ट-अप के लिये उचित माहौल का अभाव है। जिस कारण से स्वरोजगार के क्षेत्र में भी अभी उतनी सफलता हाथ नहीं लग पाई है।

लिहाज़ा अंडर-ग्रेजुएट्स के लिये उद्यमिता ऐच्छिक पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिये। संस्थानों को इन्क्यूबेटर सेंटर, मेंटर क्लब और एक्सेलरेटर प्रोग्राम शुरू करने की भी आवश्यकता है।

जैसे डॉक्टरी में इंटर्नशिप व चार्टर्ड अकाउंटेंट में आर्टिकलशिप अनिवार्य है, उसी तरह इंजीनियरिंग में भी उच्च स्तरीय इंटर्नशिप की आवश्यकता है जिससे प्रायोगिक शिक्षा प्रदान कर कौशल विकास में मदद मिले।

आए दिन अखबारों में कभी इंजीनियरों के कोयम्बटूर नगर निगम में सफ़ाई कर्मचारी तो कभी उत्तर प्रदेश में चतुर्थ श्रेणी के पदों के लिए आवेदन करने की खबरें निराश करती हैं।

दिवंगत प्रोफेसर यू. आर राव आज जीवित होते तो तकनीकी शिक्षा की ऐसी दुर्दशा देख बेहद निराश होते।

AICTE द्वारा रेड्डी कमेटी की सिफारिशें मान ली गई हैं। उम्मीद है कि आने वाले समय में तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में जिस व्यापक सुधार की आवश्यकता है उसमें हम कुछ हद तक सफ़ल हो पाएंगे।

(लेखक चंबा जिले के रहने वाले हैं। इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग में बीटेक करने के बाद प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी कर रहे हैं। ट्रेकिंग और ट्रैवल राइटिंग में रुचि रखने वाले मयंक के यात्रा वृतांत उनके ब्लॉग ‘हिमालयन फ़ेरीटेल‘ पर पढ़े जा सकते हैं।)

ये लेखक के निजी विचार हैं

हिमाचल के युवा नकारा हैं नहीं मगर बना दिए गए हैं

हिमाचल के सरकारी स्कूलों के बच्चों को वर्दी देने में करोड़ों का घोटाला: राठौर

शिमला।। हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों के बच्चों को दी गई वर्दी में गड़बड़ी की खबरें आने के बाद इसकी खरीद की प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। सरकार की ओर से दिए गए बैगों की क्वालिटी पर प्रश्न उठ रहे हैं।

अब इस पूरे मामले पर हिमाचल कांग्रेस ने भी सरकार को घेरने की कोशिश की है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कुलदीप राठौर ने वर्दियों की खरीद में घोटाले का आरोप लगाया।

राठौर ने कहा, “सरकार ने वर्दी पर 56 करोड़ रुपये खर्च किए हैं लेकिन इसकी क्वालिटी ठीक नहीं हैं। बच्चों को दिए गए बैग भी घटिया किस्म के हैं। राज्य के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को मामले को गंभीरता से लेकर जांच करवानी चाहिए।”

कुलदीप सिंह राठौर

गौरतलब है कि कई जगह से बच्चों की वर्दियों में रोएं खड़े होने (बुरक आना) और एक दो धुलाई में ही रंग उतारने की खबरें आ रही हैं।

यह विषय इन दिनों पूरे हिमाचल में चर्चा का विषय बना हुआ है। पहले इस वर्दी को देने में की गई लेट लतीफी भी चर्चा में थी। इस बीच ऐसी खबरें हैं कि सीएम ने मामले में रिपोर्ट तलब की है।

हिमाचल के युवा नकारा हैं नहीं मगर बना दिए गए हैं

नवनीत शर्मा।। कई बार ख्याल आता है कि अगर बिहार, राजस्थान, कश्मीर और कुछ हद तक उत्तर प्रदेश न हों तो हिमाचल प्रदेश का क्या बने? नेपाल न हो तो सेब की आर्थिकी कौन संभाले? भवन निर्माण से लेकर सेब के बाग संभालने तक, रंग रोगन करने से लेकर दर्जी का काम… कृषि का काम और हज्जाम का काम कौन करेगा? शिमला की बर्फ में पांव धंसा कर पीठ पर गैस का सिलेंडर उठा कर कौन चलेगा? हिमाचल प्रदेश को इनका आभारी होना चाहिए। लेकिन हिमाचल प्रदेश के समाज का एक हिस्सा अपने ही होने के प्रति आभारी नहीं है, इनका आभार क्यों व्यक्त करेगा?

यह उस प्रदेश की बात है जहां बेरोजगारों की संख्या साढ़े आठ लाख के करीब दर्ज बताई जाती है। जहां सरकारी नौकरी को जीने की पहली शर्त माना जाता है। एक व्यक्ति पीएचडीधारक है…एक एमएससी है…एक एमफिल है…एक इंजीनियर है…. ये कोई काम नहीं करते सिवाय इसके कि पटवारी की परीक्षा के लिए आवेदन करें…। सचिवालय में अगर चतुर्थ श्रेणी का पद विज्ञापित हो तो उसके लिए आवेदन करना भी इनका अधिकार है। लेकिन स्वरोजगार ऐसा शब्द है जिसका नाम लेना गवारा नहीं है। यही त्रासदी है हिमाचल की। यहां इस बात पर समाज का हिस्सा अवश्य शोर उठाएगा कि प्रवक्ताओं की भर्ती में बाहर के लोगों को शामिल क्यों किया गया। आपत्ति इस पर भी हो सकती है कि तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों में झारखंड के लोग क्यों आए? लेकिन इस बात का जवाब ऐसी मानसिकता के पास नहीं है कि हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा परीक्षा में 27 में से चार पद क्यों रिक्त रहे हैं। जाहिर है स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रित और सामान्‍य वर्ग से संबद्ध पूर्व सैनिक वाली श्रेणी के लिए ‘उपयुक्त अभ्यर्थी’ ही नहीं मिले।
मिलने में संकट उत्पन्न होना ही था, क्योंकि जब बिना प्रतियोगिता के प्रवक्ता का पद भाता हो, जब सपना तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पद हों…. एचएएस यानी हिमाचल प्रशासनिक सेवा तो बहुत दूर की बात हो गई न।

आदर्शविहीनता को दोष देना बहुत आसान है पर आदर्शविहीनता है नहीं। अपने आसपास आदर्श हैं लेकिन श्रम और समय के सम्मान का संकट है। वरना सराज घाटी की छतरी पंचायत का निशांत सरकारी स्कूल में पढ़कर भी इस पद पर पहुंच जाए तो जाहिर है… उसने अभाव का रोना नहीं रोया बल्कि पिछले वर्ष खंड विकास अधिकारी का पद पाकर भी मेहनत जारी रखी और इस बार एसडीएम या उपमंडल मजिस्टे्रट बनकर ही सुकून पाया। बेहद साधारण पृष्ठभूमि है… पिता स्टेट सीआइडी में इंस्पेक्टर हैं, माता गृहिणी हैं। जिसके पास दृष्टि है, उसके लिए बेरोजगारी का मतलब ही क्या है? और अगर बेरोजगारी है ही तो फिर हिमाचली युवाओं को बाहर का छोड़ें, घर का काम करने में भी परेशानी क्यों है? जब कौशल नहीं होगा तो बेरोजगारी स्वत: होगी।

हिमाचल प्रदेश में समाज के अलावा शासकों की भी बड़ी भूमिका रही है। 45 साल तक सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया जा सकता है। इस मृगतृष्णा में जीवन के हरे वर्ष अतीत हो चुके होते हैं। इन्वेस्टर्स मीट का आयोजन संभवत: इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ेगा और हल भी दे सकता है लेकिन श्रम के सम्मान को किस पाठ्य पुस्तक में पढ़ाया जाता है।

पर्यटन और बागवानी के अलावा पशुपालन में बेहद संभावना है लेकिन कोई यह भी तो बताए कि करना चाहता कौन है? यह गरीबी रेखा के लिए कैसा आकर्षण है कि सरकारी कागजों में उसकी छांव सबको भली लगती है। सब उसे ओढऩा चाहते हैं! अकर्मण्यता की बर्फ क्या इतनी सर्द होती है कि पुरुषार्थ का ताप उस तक पहुंच ही नहीं पाता? यह कौन सी पीएचडी है कि हिंदी में प्रार्थनापत्र ही गलतियों से लैस हो ? किस जज्बे की इंजीनियरिंंग है कि पटवारी बनना स्वीकार है? कौन सा आत्मसम्मान है कि दिल्ली के ढाबे में काम करना आसान है लेकिन गांव में दो गाय नहीं पाली जा सकती? यह कौन सी समझ है कि चोर रास्ते से दुबई या कहीं और जाने के चक्कर में जीवनभर की कमाई लुटाई जा सकती है लेकिन पर्यटकों के लिए होटल या रेस्तरां नहीं खोला जा सकता? व्‍यवस्‍था सहयोग न करे तो शोर मचाया जाए। तकलीफ जाहिर की जाए।

इस सबके आलोक में अब बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और नेपालियों के श्रम के बिना हिमाचल को देखें और कल्पना करें कि क्या हम कुशल हैं? श्रम का सम्मान करते हैं? किसी स्कूल में एनएसएस के स्वयंसेवी परिसर की सफाई करें या बावड़ी का पानी बचाने की कोशिश करें तो राई का पहाड़ और तिल का ताड़ बन जाता है..। हिमाचल के सब संसाधनों का माकूल दोहन हो जाएगा अगर अभिभावक और अध्यापकों के साथ जनप्रतिनिधि भी इन्सानसाजी सीख लें। यह क्या समझ है कि हर जनप्रतिनिधि हैंडपंप या महिला मंडल को चिमटे, ढोलकी और गिलास देने को तत्पर रहता है लेकिन पूरे स्काउट्स एंड गाइड जैसे संगठन के पास अपना प्रशिक्षण भवन अब तक नहीं है। यही प्राथमिकताएं पहचानी जाएं तो सपने सीधे होंगे। अकर्मण्यता और असमंजस में जीने वालों के सपने कहां से सुहाने होंगे?

यह समय आबिद अदीब के इस शे’र को पढ़ने का है:

जहां पहुंच के कदम डगमगाए हैं सबके
उसी मकाम से अब अपना रास्ता होगा

(लेखक ‘दैनिक जागरण’ हिमाचल प्रदेश के संपादक हैं। यह लेख उनके स्तम्भ ‘खबर के पार’ का विस्तृत संस्करण है।)

जघन्य अपराधों के आरोपियों की मॉब लिंचिंग की बात करना मूर्खतापूर्ण

तरुण गोयल।। सांसद जया बच्चन कह रही हैं कि तेलंगाना कांड के सब अभियुक्तों को सरे राह जला दिया जाए, पब्लिक के हवाले कर दिया जाए। फेसबुकिए कह रहे कि किसी भी वकील को उन तीन बदमाशों का केस नहीं लड़ना चाहिए

प्रद्युम्न ठाकुर याद है आपको? Ryan International स्कूल में पढ़ने वाला वो 7 साल का बच्चा?

सितंबर 8, 2017 में स्कूल के बाथरूम में प्रद्युम्न ठाकुर का गला रेत दिया गया। लड़के की मौके पर मौत हो गई। गुडगाँव पुलिस, जो अब गुरुग्राम पुलिस हो गई थी पर हरकतें उनकी अब भी गुडगाँव लेवल की ही थी, ने एक SIT बनाई। 3-3 DCP ने केस देखा और रिकार्ड समय मे डिक्लेयर कर दिया कि स्कूल बस के कंडक्टर अशोक कुमार ने पहले लड़के का रेप किया और बाद में चाकू से गला रेत दिया।

अशोक कुमार को जेल हो गई, बकायदा पुलिस कमिश्नर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अशोक कुमार को खूनी बताया। खट्टर सरकार ने ट्वीट कर खुद को बधाई दी।

तब भी जनता पागल हो गई थी। उस कंडक्टर को भी पब्लिक पीटना चाहती थी। उसके चक्कर मे कई ड्राइवर-कंडक्टर दिल्ली-गुडगाँव में पीटे भी गए।

और फिर CBI इन्क्वायरी हुई, गुडगाँव पुलिस का फैलाया हुआ गोबर साफ हुआ तो कंडक्टर अशोक कुमार निर्दोष निकला। प्रद्युम्न ठाकुर की मौत उसी के स्कूल के एक सहपाठी ने की थी। 7 साल के बच्चे को 16 साल के लड़के ने exam postpone करवाने के चक्कर मे मार दिया।

पर अशोक कुमार बच गया। उसे किसने बचाया? इस देश की न्यायिक प्रक्रिया ने, जो हर समय न सही, कभी-कभी तो सफल हो ही जाती है। इसीलिए कोर्ट कचहरी बनाई गई है, इसीलिए बड़े से बड़े आतंकी को भी वकील दिया जाता है। अगर उसे वकील न दिया जाए, तो वो न्यायिक प्रक्रिया पूरी न होने के कारण वैसे भी दोषी ही साबित नहीं होगा

Mob Lynching का किसी भी सभ्य समाज मे कोई स्थान नहीं है।

It’s not the severity of punishment but the surety of punishment that ‘can’ stop such ghastly crimes. And that has to come only through courts and not in open streets.

(लेखक ट्रैवल ब्लॉगर हैं और हिमाचल प्रदेश से जुड़े मुद्दों पर भी चुटीली टिप्पणियां करते रहते हैं। यह लेख उनकी फेसबुक टाइमलाइन पर भी प्रकाशित हुआ है)

ये लेखक के निजी विचार हैं।

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